अस्थिरता की आग में श्रीलंका shrilanka asthirta bharat janstta

 जनसत्ता


                     

विकासशील देशों में संचालित लोकतांत्रिक प्रणाली की यह लोकप्रिय मान्यता रही है कि जनता करिश्माई नेतृत्व को सम्पूर्ण सत्ता सौंपकर खुशियां ढूंढती है। आर्थिक-सामाजिक पिछड़ापन,सांस्कृतिक टकराव,राजनीतिक अस्थायित्व  तथा जातीय विविधता तीसरी दुनिया के देशों की बड़ी समस्या रही है। यहां अतिलोकप्रिय नेतृत्व उभरने से अधिनायकवाद के पनपने का खतरा बढ़ जाता है। भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका अतिराष्ट्रवादी राजपक्षे परिवार की सत्ता पर एकाधिकार बनाएं रखने की कोशिशों और विपक्ष को दरकिनार करने की सत्तारूढ़ पार्टी की चेष्टा से गहरे संकट में फंस गया है। महंगाई दर में अभूतपूर्व वृद्धि और रोजमर्रा की चीजों के भाव आसमान छूने से लोगों में गुस्सा और हताशा बढ़ गई है,देश में हिंसक प्रदर्शन हो रहे है तथा देश के कई सरकारी संस्थानों को आग के हवाले किया जा रहा है। सरकार के आपातकाल और कर्फ्यू की घोषणा को लोग नजरअंदाज करके हिंसक प्रदर्शनों में शामिल हो रहे है। इस प्रकार एक बार फिर  श्रीलंका में गृह युद्द छिड़ने की आशंका गहरा गई है।


दरअसल तमिलों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को दबाकर तथा सिंहली राष्ट्रवाद को उभार कर देश की सर्वोच्च सत्ता को अपने प्रभाव में लेना वाला राजपक्षे परिवार पिछलें कुछ समय से लोकतंत्र की मूल मान्यताओं को ही नजरअंदाज करता रहा। लोकतंत्र सलाह,समन्वय और सहयोग से मजबूत होता है,वहीं करिश्माई नेतृत्व में आधिपत्यवादी प्रवृति को बढ़ावा मिलने की संभावना बनी रहती है। राजपक्षे परिवार ने अतिराष्ट्रवाद को राजनीतिक हथियार की तरह प्रयुक्त करके लोगों का भरोसा जीता और बाद में राष्ट्रहित की विपक्षी दलों की सलाह को दरकिनार कर चीन से एकतरफा समझौते कर लिए इन्हीं समझौतों के कारण देश आर्थिक बदहाली के दुष्चक्र में बूरी तरह उलझ गया है। श्रीलंका में 2009 में लिट्टे की समाप्ति से राजपक्षे परिवार की लोकप्रियता में अभूतपूर्व इजाफा हुआ था। महिंदा राजपक्षे ने सिंहली राष्ट्रवाद को श्रीलंका की अस्मिता से जोड़कर देश में अपनी राजनीतिक स्थिति को बहुत मजबूत कर लिया।  सिंहली बाहुल्य इस देश में तमिल और भारत विरोध राजपक्षे की प्रमुख नीतियां रही और इसका फायदा चीन ने उठाया। राजपक्षे सरकार के चीनी कर्ज के बूते ग़लत आर्थिक प्रबंधन ने संकट को बढ़ा दिया और इससे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई पिछले एक दशक के दौरान श्रीलंकाई सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं के लिए विदेशों से बड़ी रक़म कर्ज़ के रूप में ली हैबढ़ते कर्ज़ के अलावा कई दूसरी चीज़ों ने भी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट कीजिनमें भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं से लेकर मानव निर्मित तबाही तक शामिल है


श्रीलंका की राजपक्षे सरकार अपने देश के आर्थिक मॉडल को बदल देने की योजनाओं को आगे बढ़ा रही थी। वह छोटे किसानों के हितों की अनदेखी करके जैविक खेती के चीन के व्यापारिक मॉडल में उलझ गई। राजपक्षे सरकार ने अचानक ही रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया,इससे कृषि समुदाय पर व्यापक रूप से असर पड़ा है और कृषि अर्थव्यवस्था चौपट हो गईचीन ने अपनी वन बेल्ट वन रोड़ परियोजना के तहत श्रीलंका को अरबों डॉलर का कर्ज़ दिया हैइस समय श्रीलंका चीन के क़र्ज़ तले दबा हुआ है और यह अंदेशा है कि कर्ज न  चूका पाने की स्थिति में श्रीलंका के अधिकांश क्षेत्रों का चीन अधिग्रहण कर सकता है


राजपक्षे परिवार के प्रभाव में संसद ने पोर्ट सिटी इकोनॉमिक कमिशन बिल भी पारित किया थायह बिल चीन की वित्तीय मदद से बनने वाले इलाकों को विशेष छूट देता हैविशेष आर्थिक ज़ोन विकसित करने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के नाम पर बनाये गए इन कानूनों को लेकर न तो विपक्षी दलों से बात की गई और न ही देश में आम राय कायम करने की कोशिश की गई। इसका असर व्यापक हुआ और विपक्षी दलों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ जनता को लामबंद करना शुरू कर दिया। विपक्षी दलों के साथ देश के छोटे किसान और युवा जुड़ने लगे।


चीन और अन्य देशों के कर्ज का ब्याज न चूका पाने के कारण लोगों पर कर्ज का बोझ बढने लगा। कई महीनों से श्रीलंका में गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़ने के लिए लोग प्रदर्शन कर रहे है,गो गोटाबाया गो के नारे अब हिंसक प्रदर्शन के रूप में बदल चूके हैदेश के सामने सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक संकट का है और सबसे पहले उसी से निपटे जाने की ज़रूरत है जनता को  राजपक्षे परिवार पर किसी तरह का भरोसा नहीं है,यही कारण है कि हिंसक संघर्ष की चपेट में राष्ट्रपति भवन भी आ गया हैश्रीलंका में कैबिनेट भंग हो गई है और यह राजनीतिक अस्थिरता देश के लिए बड़े संकट का कारण बनती जा रही है



गोटाबाया राजपक्षे और उनकी सरकार ने देश को अभूतपूर्व आर्थिक संकट से उबारने के लिए विपक्षी दलों का सहयोग लेकर एक सर्वसमर्थित सरकार की स्थापना कम से कम छह माह पहले ही कर देनी थीइससे लोगों का गुस्सा कम करने में बड़ी मदद मिल सकती थी इसके स्थान पर गोटबाया ने सार्वजनिक चीजों के वितरण पर सेना का पहरा लगा दिया और यही से लोगों का सरकार पर अविश्वास बढ़ता गया रोजमर्रा की चीजों के लिए लोगों के अति प्रयास उनके गुस्से का कारण बन गए और यहीं से प्रतिरोध बढ़ता गया


राजपक्षे की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी को देश में व्यापक जन समर्थन हासिल था और इसका प्रमुख कारण महिंदा राजपक्षे और उनके छोटे भाई गोटभाया की तमिलों के प्रति कड़ी नीतियां थी बाद में राजपक्षे ने श्रीलंका में सिंहली राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया और इसी के सहारे उन्होंने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली विपक्षी यूनाइटेड नेशनल पार्टी की कम होती लोकप्रियता से श्रीलंका में राजपक्षे परिवार मजबूत हो गया और यहीं से पनपा सत्ता का अधिनायकवाद इस देश की आर्थिक बर्बादी का कारण बन गया लोग जब सरकार के विरोध में आगे आये तो उन्हेंकड़ाई कडाई से रोकने की सरकार की नीति का असर विपरीत हुआ।  राष्ट्रपति राजपक्षे ने राष्ट्रव्यापी आपातकाल की घोषणा की तो इससे पुलिस को बिना वॉरंट के लोगों को हिरासत में लेने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने का अधिकार मिल गया। प्रदर्शनकारियों की बड़ी संख्या में गिरफ्तारी से विरोध प्रदर्शन देशभर में फ़ैल गए।


श्रीलंका की बिगड़ती स्थिति का प्रमुख कारण चीन की उच्च ब्याज दर है जिसकी किश्तों का समय पर भुगतान करने के लिए श्रीलंका को और ज्यादा कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में देश में लोक कल्याणकारी योजनाएं बंद हो गई है,आम जनता को मिलने वाली सब्सिडी को रोक दिया गया है और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाएं रखने की कोशिश की जा रही है।   


भारत की चेतावनी के बाद भी वन बेल्ट वन रोड़ परियोजना से श्रीलंका के कायाकल्प होने की धून में  श्रीलंकाई नेतृत्व ने दुबई और सिंगापूर की तर्ज पर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र श्रीलंका को बनाने की चीनी पेशकश को आँख मूंदकर स्वीकार कर लिया। श्रीलंका कुछ समय पहले ही गृहयुद्द से उभरा है और अब यदि वह कर्ज से कुचक्र से नहीं निकला तो यह देश तबाह हो सकता है बैंक बंद हो जायेंगे,लोगों की नाराजगी बढ़ती गई तो हिंसा भयावह हो सकती है 


यह देखा गया है कि चीन अपनी अंतरराष्ट्रीय विकास परियोजनाओं के लिए ज़रूरी वित्त प्रतिबद्धताओं के लिए अमेरिका और दुनिया के दूसरे कई प्रमुख देशों की तुलना में लगभग दोगुनी धनराशि ख़र्च करता है इनमें से ज़्यादातर धनराशि राष्ट्रीय बैंकों से उच्च ब्याज दर के जोख़िम पर ऋण के रूप में ली जाती है ऋण की राशि चौंकाने वाली है विकास के नाम पर दी जाने वाली इस राशि को लेकर शुरुआत में यह अनुमान  लगाना मुश्किल होता है कि कर्ज़ से उनकी प्रगति किस हद तक प्रभावित होगी


भारत की तमाम कोशिशों के बाद भी श्रीलंका इस तथ्य को दरकिनार करता रहा है की भारत से सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता सामरिक दृष्टि से उसके लिए भी ज्यादा असरदार साबित होती है। चीन के गहरे व्यापारिक हित श्रीलंका में है। चीन और श्रीलंका के बीच दक्षिण समुद्री बंदरगाह हम्बनटोटा को लेकर अरबों डॉलर का समझौता भारत की अनदेखी करने की श्रीलंका की नीति के कारण ही संभव हुआ है। श्रीलंका में चीन की अनेक  परियोजनाएं चल रही है और उसने श्रीलंका को  तकरीबन डेढ़ सौ करोड़ डॉलर का कर्ज़ भी दे रखा है। मध्यपूर्व से होने वाले तेल आयात के रूट में श्रीलंका एक अहम पड़ाव है,इसीलिए चीन की यहां निवेश करने में रुचि है।


वहीं भारत के लिए श्रीलंका से मजबूत संबंध सामरिक और सांस्कृतिक तौर पर भी बेहद जरूरी है। भारत के लिए  श्रीलंका की अस्थिरता आंतरिक सुरक्षा का संकट बढ़ा सकती है। श्रीलंका में रहने वाले तमिलों के भारत से मजबूत संबंध है और वे कई दशकों से श्रींलंका में उत्पीड़न झेलने को मजबूर है श्रीलंका में सिंहल बहुसंख्यकों द्वारा उत्पीड़ित श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी भारत में पनाह के लिए आते है और इसका प्रभाव भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु पर पड़ना स्वभाविक है जो ऐतिहासिक रूप से तमिलों की मातृभूमि समझी जाती है श्रीलंका द्वीप का उत्तरी भाग भारत के दक्षिण पूर्वी समुद्र तट से मात्र कुछ किलोमीटर दूर है और तमिलनाडू प्रदेश के रामनाथ पुरम जिले से जाफना प्रायद्वीप तक का समुदी सफर  छोटी छोटी नौकाओं में आसानी से प्रतिदिन लोग करते है श्रीलंका की आबादी का लगभग 20 फीसदी तमिल है और वे भारतीय मूल के है। भारत के दक्षिणी तमिलनाडु राज्य से इन तमिलों के रोटी और बेटी के संबंध है। भारत श्रीलंका को लेकर मित्रवत व्यवहार करता रहा है जिसे राजपक्षे बंधु नजरअंदाज करते रहे।


श्रीलंका का संकट नव उपनिवेशवाद की चुनौतियों को सामने लाने वाला है।  अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में यह एक जटिल संकल्पना है जहां गरीब देश महाशक्तियों के आर्थिक शिंकजे की दासता में उलझ जाते है,इसका प्रभाव उनकी राजनीतिक संप्रभुता पर भी पड़ता है। विकास के नाम पर चीनी कर्ज  के कारण श्रीलंका की संप्रभुता पर संकट गहरा गया है। फ़िलहाल इस देश में शांति बहाल करने के लिए वहां सर्वदलीय सरकार के साथ देश के लोकप्रिय क्रिकेटरों,कलाकारों और भारत के सहयोग की दरकार है।  

 

यौनकर्मी-मजबूरी से मजदूरी के सफर में हांफती जिंदगी youn krami prajatntra

 प्रजातंत्र        


किसी स्कूल में अपने बच्चें को प्रवेश दिलाने वाली शख्स यदि यह कह दे की वह यौनकर्मी है तो समझ लीजिए वहां बच्चें को प्रवेश तो मिलेगा ही नहीं बल्कि  बेहद अपमानजनक घूरती हुई निगाहों से उस महिला को रूबरू भी होना पड़ेगादरअसल सामाजिक न्याय की कठिन डगर पर चलते हुए भारत की एक सच्चाई यौन कर्मियों का जीवन भी है एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन 35 लाख महिलाएँ देह व्यापार के पेशे में हैं,जहां खुद से ज्यादा बच्चों के बेहतर जीवन की तलाश होती है और यह तलाश कहां खत्म हो इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल होता है



कोलकाता के उत्तर में शोभा बाज़ार है और यहीं से लगा हुआ है सोनागाछीइसे एशिया का यौन कर्मियों का सबसे बड़ा बाज़ार कहा जाता है हिना की स्कूल में जब यह पता चला की वह कथित रूप से एक रेड लाईट या बदनाम इलाके की रहने वाली है तो उस पर स्कूल में  कमेंट होने लगेहिना ने जब यह शिकायत अपने प्रिंसिपल से की तो उसे यह कहकर स्कूल से निकाल दिया गया की उसके रहने से वहां का माहौल खराब होगायह समस्या हिना नहीं बल्कि गुड्डी, गुलनाज़,रेखा और लीना की भी थीइन समस्याओं से जूझते हुए यौन कर्मियों के बच्चों ने सोनागाछी में एक संगठन बनाया,आमरा पदातिक जिसका मतलब है हमारी पैदल सेनायह संगठन रात को बच्चों की नाईट सेंटर के जरिए देखभाल करता हैमाँ अपने काम में  व्यस्त रहती है और उनके छोटे बच्चें इसी सेंटर पर रहते है,जहां उन्हें गीत और नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाता है


 

करीब आठ साल पहले कोलकाता में एक छह दिवसीय यौनकर्मी महोत्सव का आयोजन हुआ था जिसमें सैकड़ों यौनकर्मी और उनकी बेहतरी के लिए काम करने वाले लोग जुटे थेइस छह-दिवसीय उत्सव का मकसद महिलाओं की खरीद-फरोख्त रोकना,यौनकर्मियों को मौलिक अधिकार दिलाना और उनको उनके हक के प्रति जागरूक बनाना थाइन सबके बीच यौनकर्मियों के मानवाधिकार की बहसें वास्तविक धरातल पर वहीं खत्म हो जाती है जब इस पेशे का सुनकर न तो किरायें के घर मिलते है और न ही सरकार की किसी योजना का विशेष लाभ। न्याय की उम्मीदें उन थानों में भी अक्सर खत्म हो जाती है जहां घूरती निगाहें में न्याय नहीं बल्कि उनका मोबाइल नंबर मिलने का ज्यादा उत्साह दिखता है।


 

यौनकर्मियों की एक बड़ी चुनौती उम्र भी है जो ढलने के साथ बेरोजगारी बढ़ाती है और बुढ़ापे में किसी आसरे की कल्पना मुश्किल हो जाती हैकोलकाता में कुछ पुनर्वास केंद्र है,देश में कुछ चुनिंदा स्थान ही ऐसे मिल पाते हैयौनकर्मियों के लिए बनाए जा रहे पुनर्वास केंद्र की जगह को लेकर भी विवाद होते है और स्थानीय लोगों के विरोध के बाद इसे बंद करने या नई जगह ढूंढने के लिए स्थानीय प्रशासन को मजबूर होना पड़ता है

 


मायानगरी मुंई का कमाठीपुरा इलाका लोगों की जरूरत भी है और बदनाम भी है करीब साढ़े तीन सौ साल पहले तेलंगाना से आएं गरीब मजदूरों को बाढ़ ग्रस्त इलाकें में पनाह मिल पाई थी जो बाद में देह व्यापार की मंडी बन गया  यहां की समस्याएं अब भी ज्यों की त्यों है,लोग पीढ़ियों से इस धंधे का भाग बनते रहे है लेकिन वह इससे बाहर क्यों न निकल पा रहे है इसका जवाब सामाजिक न्याय मिलने की अँधेरी खोह में गुम है

 


देश का दिल दिल्ली का जीबी रोड भी इसकी हकीकत को बयाँ करता हैमध्यप्रदेश का रतलाम,मंदसौर और नीमच को जोड़ने वाला तकरीबन 125 किलोमीटर का इलाका अफीम,मानव तस्करी और सौदेबाज़ी का हाईवे माना जाता है। हाइवे से गुजरते हुए वाहनों की रफ्तार अमूमन बहुत तेज होती है लेकिन इस इलाके में यह रफ्तार थम जाती है। सड़क किनारें कई स्थानों पर ट्रकों की लंबी लंबी लाईनों के बीच लड़कियों के झुंड दिखते है। आधुनिक भारत और विकास की इबारतों से दूर यह काला और बदतरीन सच इस रास्ते से गुजरने वाले हर शख्स को दिखता है। हाइवे किनारें खड़ी झोपड़ियों के बाहर संज संवर कर बैठने वाली लड़कियों की पूरी जिंदगी अपनी सौदेबाज़ी में ही खफ़ जाती है। यहां रोटी कमाने की मजबूरी है,समाज की खराब परम्पराओं का अभिशाप है,गरीबी का दंश है और इन सबके बीच अपराध का बड़ा कारोबार भी है।


आज़ाद भारत की यह बदतरीन हकीकत है कि देह व्यापार में संलिप्त महिलाओं के पुनर्वास के लिए कोई दीर्घकालीन नीति नहीं बन पाई हैइसका खामियाजा लाखों परिवारों को भोगना पड़ रहा हैमजबूर यौनकर्मियों के जीवन में अंधकार है और वे गुमनामी के साये में ज़िंदगी जीने को मजबूर हैइनकी उजाले की तलाश कभी खत्म भी होगी या नहीं,कुछ कहा नहीं जा सकता


 

यह भी दिलचस्प है कि सोनागाछी में यौनकर्मियों के बच्चों को नृत्य सिखाने के लिए जो खास शिक्षक आते है वह सबसे पहले इन बच्चों को वह भाव भंगिमा सिखाते है कि अपनी आंखों से कैसे खुद को मान-सम्मान से देखा जाता हैदुनिया में और लोग क्या नजरिया रखते हैं ये मायने नहीं रखता दरअसल मजबूरी से मजदूरी के सफर में हांफती यौनकर्मियों की जिंदगी बदहाल है लेकिन उनके बच्चों के मन में माँ के प्रति गहरा सम्मान होता है और उसे बनाएं रखने की ललक भी कमाल की होती है

वैदेशिक नीति की उलझन foreign policy india rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा

         

                                                                             


यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वोन ने हाल ही में अपनी भारत यात्रा के दौरान भारत को आगाह करते हुए कहा कि रूस और चीन के बीच दोस्ती की कोई सीमा नहीं हैयूक्रेन संकट में भारत की रूस के साथ स्थिर वैदेशिक नीति को लेकर पश्चिमी देश असहज हुए है और अमेरिकी राष्ट्रपति समेत कई राष्ट्राध्यक्ष

भारत को नसीहत दे रहे है जिसमें जिसमें चीन को लेकर भारत की सुरक्षा चुनौतियों को यथार्थवादी दृष्टिकोण  से देखने की सलाह दी जा रही है

 


यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामकता और मानवाधिकार के व्यापक हनन के बाद भी भारत का कूटनीतिक मोर्चे पर अपने शक्तिशाली मित्र रूस के साथ खड़ा दिखाई देना उसकी वैचारिक सहमति से ज्यादा सामरिक मजबूरी  समझा गया अमेरिका और यूरोप की नजर भारत के रुख पर थी और पश्चिम की यह अपेक्षा रही कि भारत रूस के प्रभाव से मुक्त होकर राजनयिक व्यवहार करें लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की चिन्ताओं और चुनौतियों के लिए भारत ने वहीं किया जो किसी जिम्मेदार सम्प्रभु देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए करना चाहिएइन सबके बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शानदार तरीके से न केवल भारत की नीति का बचाव किया बल्कि यूरोप को बहुउद्देश्यीय राजनयिक व्यवहार से बाज़ आने की नसीहत भी दीपश्चिमी देश भारत की सामरिक और भौगोलिक चुनौतियों से वाकिफ है और वे भारत से सामरिक साझेदारी मजबूत करने  के प्रति संकल्प व्यक्त कर रहे है


भारत की इस समय सामरिक सुरक्षा की चिंताओं में सबसे ऊपर चीन से लगती हुई सीमा हैइस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चीन ने भारत और चीन को बाँटने वाली मैकमोहन रेखा को कभी स्वीकार ही नही किया है पिछलें दो सालों से भारत चीन सीमा पर गहरा तनाव है और यह विवाद थमता भी नजर नहीं आ रहा है चीन से किसी भी अप्रत्याशित हमलें से निपटने के लिए भारत को आधुनिक हथियारों की जरूरत है और इसके लिए हमारी सबसे ज्यादा निर्भरता रूस पर है1971 में भारत और रूस के बीच हुई सुरक्षा संधि कुछ बदलावों के साथ ही लेकिन मजबूत साझेदारी का प्रतिबिम्ब रही है


वहीं बदलते समय के साथ भारत के परम्परागत शत्रु चीन के प्रति रूस का व्यवहार नियंत्रण और संतुलन से कहीं आगे बढ़ गया हैचीन एक साम्यवादी देश होने के साथ सुरक्षा परिषद का सदस्य हैवह दुनिया की बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति हैतकनीकी स्तर पर भी चीन बेहद समृद्द राष्ट्र के रूप में उभरा हैयूक्रेन पर रूस के हमलें के बाद पश्चिमी देशों ने रूस को आर्थिक प्रतिबंधों से लाद दिया है किंतु पुतिन इन प्रतिबंधों से कभी प्रभावित या विचलित नहीं हुए इसका एक प्रमुख कारण रूस चीन के व्यापक साझा हित है


भारत और पाकिस्तान में विवाद के बीच रूस भारत का विश्वसनीय साझेदार रहा है जबकि चीन को लेकर विवाद के समय रूस का व्यवहार बदल जाता है। चीन और भारत के बीच सीमा पर हिंसक संघर्ष के बाद युद्द जैसी स्थितियों में भी रूस  का मौन भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाता रहा है। रूस की चीन को लेकर असल हकीकत 1962 के भारत चीन युद्द में सामने आई जब रूस के सर्वोच्च नेता खुश्चेव ने भारत को लड़ाकू विमानों की खेप भेजने में देरी करके अप्रत्यक्ष रूप से चीन की मदद की थी। वह  भी उस दौर में  जब चीन और तत्कालीन सोवियत संघ के सम्बन्ध बेहद खराब हुआ करते थे और सीमा पर इन दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे से भीड़ जाया करती थी। भारत से युद्द के बाद चीन  का 1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर रूस से युद्द हुआ था और रूस की परमाणु हमलें की धमकी के बाद चीन को वहां से कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा था


1991 में सोवियत संघ के विघटन और वैश्वीकरण की नीति के बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलने के साथ चीन का आर्थिक दबदबा बढ़ा और आगे चलकर  रूस पर बढ़त हासिल हो गई इसी का प्रभाव है कि चीन का रूस से सीमा विवाद लगभग समाप्त हो चूका है2004 में  रूस और चीन के बीच हुए समझौते में सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था इस समय चीन और रूस आर्थिक साझेदारी को लगातार बढ़ा रहे है,चीन रूस से गैस और हथियार खरीद रहा है तथा चीन की कई कम्पनियां रूस में बड़े पैमाने पर निर्माण में मदद कर रही है दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गलियारे वन बेल्ट-वन रोड परियोजना को लेकर 2017 में चीन में  द्वारा आयोजित शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन शामिल हुए जबकि  भारत ने इसके मार्ग को विवादित बताकर इस सम्मेलन का बहिष्कार किया था। इस दौरान चीन ने कश्मीर को लेकर भारत के हितों की अनदेखी की तो पुतिन इससे अप्रभावित नजर आएं।


इतिहास गवाह रहा है कि चीन की चुनौती से निपटने में अमेरिका और पश्चिमी देश भारत के साथ उस समय भी खड़े थे जब भारत के राजनयिक संबंध उनसे बहुत खराब थे और सहायता पाने की संभावना दूर दूर तक नहीं थी। 1962 के युद्द में अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत को युद्दक विमान समेत हथियार भेजने में बिल्कुल  देरी नहीं की थी और इसी दबाव के कारण चीन को एकतरफा युद्द विराम की घोषणा कर वापस पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा था। गलवान घाटी विवाद पर भी अमेरिका का रुख भारत के पक्ष में साफ नजर आया था।


इस समय हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए भारत को अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के सामरिक सहयोग की जरूरत है। सैनिकों के लिए विंटर क्लोथिंग भारत अमेरिका और यूरोप से ख़रीदता है। भारत,जापान,अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया  के समूह क्वाड के साझा उद्देश्य को लेकर चीन के साथ रूस भी इसकी आलोचना करता रहा है। इस क्षेत्र में चीन ने कई देशों को चुनौती देकर विवादों को बढ़ाया है। भारत-चीन सीमा पर निगरानी रखने में भारतीय सेना को अमेरिकी एयरक्राफ़्ट से मदद मिलती है। इस समय सीमा पर चीन से बेहद तनाव पूर्ण संबंध है और युद्द की आशंका बनी रहती है। चीन पर दबाव बनाने के लिए रूस से ज्यादा अमेरिका और पश्चिमी देश मददगार हो सकते है और  उनसे मिलने वाली सामरिक सहायता की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।


1950 के दशक में भारत के ख्यात राजनयिक कृष्ण मेनन ने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा था कि हमें गले लगाने की कोशिश न करें,हम अपना दोस्त खुद चुनते है1962 के चीन से युद्द में कृष्ण मेनन ही भारत के लिए खलनायक बन गए थे। चीन से युद्द के छह दशक होने को आएं है लेकिन चुनौतियां वहीं की वहीं है। भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर के तेवर अमेरिका और पश्चिमी देशों को लेकर बेहद सख्त है वहीं ये देश चीन और रूस की जिस भागीदारी के प्रति भारत को आगाह कर रहे है,उसे भी नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता। अंततः अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है और न ही कोई स्थाई शत्रु होता है।

दक्षिण एशियाई का संकट,जनसत्ता south asia janstta

जनसत्ता


 

            

 भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण,राजनीतिक अस्थायित्व और आतंकवाद से प्रभावित अति संवेदनशील क्षेत्रों में शुमार दक्षिण एशिया विश्व शांति के लिए चुनौती बढ़ाता रहा है सबसे अधिक और सबसे घनी आबादी वाले इस भौगोलिक क्षेत्र में तक़रीबन दो अरब लोग बसते है और यह दुनिया की कुल आबादी का एक चौथाई है किसी भी वैश्विक आर्थिक संकट का सामना इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा पड़ता है और भुखमरी का संकट गहरा जाता है पिछले दशक में दक्षिण  एशिया में यूनिसेफ ने दस करोड़ लोगों के भूखा रहने को मजबूर होने की आशंका जताई थी और इस समय इस संख्या में भारी इजाफा हो गया है


 

वैश्विक भुखमरी सूचकांक की हालिया रिपोर्ट में पाकिस्तान,बांग्लादेश,नेपाल और श्रीलंका की स्थिति बेहद निम्नतम बताई गई है जलवायु परिवर्तन और कोविड महामारी से भुखमरी का संकट तो बढ़ा ही है साथ ही शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार की समस्याएं भी विकराल हो गई है  दक्षिण एशिया के कई देश राजनीतिक उथल पुथल के शिकार रहे है और भारत को छोड़कर अन्य देशों में अस्थिरता का अंदेशा बना रहता है  दक्षिण एशिया के देशों में आपसी सहयोग के लिए  दक्षेस की स्थापना 1985 को गई थी और इस संगठन का उद्देश्य दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग से शांति और प्रगति हासिल करना बताया गया था लेकिन विभिन्न देशों के बीच विवाद इस पर पूरी तरह हावी रहे और इसी का परिणाम है कि दुनिया की बड़ी आबादी वाला यह संगठन आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में विफल रहा है


 

नेपाल,श्रीलंका और मालद्वीप जैसे देश पर्यटन पर निर्भर रहे है और कोविड के प्रभाव के कारण इनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है रूस युक्रेन युद्द के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमत से महंगाई आसमान पर है और लोगों का जीना मुश्किल हो गया है विदेशी मुद्रा की कमी किसी देश की अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावित कर सकती है,यह खतरा पाकिस्तान पर भी मंडरा रहा है पारंपरिक तौर पर माना जाता है कि किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम से कम 7 महीने के आयात के लिए पर्याप्त होना चाहिए लेकिन दक्षिण एशिया के कई देश दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गए है


 

नेपाल के पास अभी जितनी विदेशी मुद्रा बची है उससे सिर्फ़ छह महीनों का आयात बिल ही भरा जा सकता है श्रीलंका ने विदेशी क़र्ज़ों के भुगतान को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है श्रीलंका अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद से क़र्ज़ों के भुगतान करने की कोशिश कर रहा है इसके अलावा श्रीलंका भारत और चीन जैसे देशों से भी मदद लेने की कोशिश कर रहा है क़रीब  तीन सौ अरब डॉलर की पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट का सामना कर रही है  श्रीलंका में अफरा तफरी का माहौल है,नेपाल के लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है वहीं मालद्वीप मदद के लिए भारत की ओर देख रहा है


 

नेपाल करीब 62 फीसदी विदेशी व्यापार भारत से करता है और करीब 14 फीसदी चीन से नेपाल की सबसे बड़ी समस्या वहां राजनीतिक अस्थायित्व है और चीन इसका फायदा उठाकर उसे कर्ज के जंजाल में फंसा चूका है विकास के नाम पर चीन द्वारा दिया जा रहा कर्ज और उसकी जटिलताओं के जाल में नेपाल के साथ पाकिस्तान,श्रीलंका और मालद्वीप भी उलझते जा रहे है दक्षिण एशिया में श्रीलंका,नेपाल और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भारी व्यापार घाटे से जूझ रही है इसके साथ ही तेल की बढ़ती क़ीमतें और मज़बूत होता डॉलर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भारी पड़ रहा है श्रीलंका की मुद्रा रुपये भी डॉलर की तुलना में हर दिन नई गिरावट की तरफ बढ़ रही है पाकिस्तान को लगातार चालू खाते और बजटीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है,विदेशी कर्ज़ लगातर बढ़ रहा है,मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है,निवेशकों के आत्मविश्वास में तेज़ी से कमी आ रही है और देश बेहद ग़रीबी की स्थिति में है


 

चीन जैसी विदेशी संस्थाओं पर बहुत अधिक निर्भरता ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमज़ोर बना दिया है इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान के पास अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए कोई विदेशी जमा पूंजी शेष नहीं बची है। नेपाल और श्रीलंका की भी कुछ यही स्थिति है। दक्षिण एशिया में अफ़ग़ानिस्तान का मानवीय संकट बेहद गंभीर अवस्था में पहुंच गया है तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश में गरीबी,सूखा और बिजली की कमी की लोग बेहाल है यहां दो करोड़ से ज्यादा लोगों पर भुखमरी का संकट गहरा रहा है और बिना तनख्वाह के सरकारी नौकरी करने को मजबूर लोगों की ज़िंदगी मुश्किल होती जा रही हैतालिबान के सत्ता में काबिज होने के पहले जब तक अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व वाली सरकार थी,तब तक अफगानिस्तान की जीडीपी का 43 फीसदी हिस्सा विदेशी मदद से आता था तालिबान के आने के बाद वैश्विक आर्थिक मदद तो बंद हुई है बल्कि अमेरिका ने उस पर कई प्रतिबंध भी लगा दिए हैं अफ़ग़ान सरकार की संपत्ति,केंद्रीय बैंक का रिज़र्व सब फ्रीज़ कर दिया गया है प्रतिबंधों के कारण वहां की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है


आर्थिक तंगी का असर देश में दिखने लगा है और लोगों में तालिबान का विरोध बढ़ रहा है। तालिबान इससे बचने और उबरने के लिए तस्करी को बढ़ावा दे सकता है। अफगानिस्तान अफीम के उत्पादन के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता हैतालिबान पैसा बनाने के लिए अफीम की खेती को बढ़ावा दे सकता है जिससे नशीले पदार्थों का कारोबार फलने फूलने की आशंका गहराने लगी है। इसका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। तालिबान की सत्ता हेरोइन के अवैध कारोबार को बढ़ावा देती है तो भारत उसके लिए बड़ा बाज़ार है। भारत में संगठित अपराधियों के साथ आतंकवादियों का मजबूत  गठजोड़ है। मादक पदार्थों की तस्करी,हथियारों की तस्करी,मानव तस्करी,जाली मुद्रा,साइबर अपराध,मनी लांड्रिंग से लेकर दंगे भड़काना,साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाना और सामरिक सूचनाओं को लीक करने जैसे संवेदनशील मामलों में अपराधी आतंकियों के मददगार होते है। मादक द्रव्यों का चलन तो बहुत पुराना है लेकिन इसमें अथाह और आसान धन की सुलभता से माफिया ने इसका जाल विश्वव्यापी बना दियाइसे सरकारी मान्यता न मिलने के बाद भी माफिया के साथ,पुलिस,प्रशासन,गुप्तचर एजेंसियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाते हैमादक द्रव्यों के तस्करों के साथ अपराधियों का गठजोड़ पनपता है और इसके बाद,अवैध मुद्रा,मानव तस्करी और अवैध हथियारों का कारोबार इन्हें आतंकवाद से जोड़ देता हैमादक पदार्थों की तस्करी के साथ,केमिकल निर्माण और आतंकियों से संबंधों का त्रिकोण व्यापक तबाही का सबब बन सकता है


भारत की भौगोलिक स्थिति इस त्रिकोण के बेहद मुफीद हैबर्मा,थाईलैंड और लाओस इसके कारोबार को दुनिया में फैलाते है और माफिया के लिए यह गोल्डन ट्रेंगल माना जाता है। देश के उत्तर पूर्वी राज्यों की सीमा बिलकुल सुरक्षित नहीं है बंगाल के कई इलाके तस्करी के केंद्र के रूप में कुख्यात हैपाकिस्तान-अफगानिस्तान और ईरान के गोल्डन क्रिसेंट से भारत जुड़ा हुआ हैपाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई ने इसी इलाके का फायदा उठाकर अवैध पैसों से आतंकवाद  को  खूब बढ़ाया है। पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता से वहां की फौज को बढ़ावा मिलता है और यह भारत की सुरक्षा के लिए संकट बढ़ने के संकेत होते है।


श्रीलंका में सरकार के कमजोर होने से तमिल समस्या एक बार फिर उभर सकती है।  लिट्टे की समाप्ति के एक दशक बाद वहां रहने वाले तमिल भारत के तमिलनाडु राज्य की ओर रुख कर सकते है। तमिल समस्या का किसी भी स्थिति में बढ़ना भारत की सामरिक और आंतरिक सुरक्षा के इए संकट बढ़ा सकता है। हिन्द महासागर से जुड़े मालद्वीप में भारत विरोधी प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हो रहे है इसके बाद भी भारत सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अपने इस पड़ोसी देश को करोडो डॉलर की वित्तीय सहायता दे रहा है। भूटान को लेकर भी भारत ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाएं है। भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम इस देश का प्रबन्धन भारत सम्हालता रहा है और उसकी पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की प्रभावी भूमिका होती है। अभी तक भूटान भारत के लिए अन्य देशों से बेहतर सहयोगी साबित हुआ है।   



दक्षिण एशिया के कई देशों की आंतरिक स्थिति इस समय बेहद चिंताजनक हैमहंगाई और गरीबी बढ़ने से असमानता का स्तर लगातार बढ़ रहा है,स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होकर आम जनता से दूर हैभारत जैसी लोक कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए न तो सरकारों के पास पैसा है और न ही कोई दीर्घकालीन योजनाबच्चें लगातार स्कूल से दूर हो रहे हैदक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में ई-लर्निंग के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं है और इसके कारण शिक्षा अपने निम्नतर स्तर तक जा सकती है। इससे अपराध बढ़ सकते है और धार्मिक उन्माद को भी बढ़ावा मिल सकता है। दक्षिण एशिया की बहुसांस्कृतिक पहचान है और सभी देशों को अप्रिय स्थिति उत्पन्न न होने देने के लिए सतर्क रहने की जरूरत होती है। इस समय आवश्यकता इस बात की है कि दक्षेस के देश आपसी व्यापार और सम्बन्धों को बेहतर करके आपसी सहयोग को बढ़ाएंहालांकि वापसी विवाद के चलते यह संभव होता नहीं दिखाई पड़ता। चीन जैसे देश का हस्तक्षेप दक्षिण एशिया के देशों के लिए घातक साबित हो रहा है। चीन  इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कर्ज की कूटनीति को अपना रहा है। उसने अपने सामरिक हितों को पूरा करने के लिए कई देशों में सैन्य अड्डे भी बना लिए है।  भारत का व्यवहार दक्षिण एशिया के देशों से बड़ा मित्रवत रहा है और भारत की तरफ से पड़ोसी देशों को  वित्तीय सहायता सर्वाधिक अनुकूल शर्तों पर  दी जाती है। जबकि चीन की कर्ज की कठिन शर्तों के प्रकोप को श्रीलंका बूरी तरह भोग रहा है। पाकिस्तान और श्रीलंका के पास चीन के कर्ज का सूद देने के पैसे नहीं है।    


बहरहाल दक्षिण एशिया के देशों को यह समझने की जरूरत है कि उसकी जरूरत हथियार नहीं बल्कि  करोड़ों लोगों की रोजी रोटी है। इस क्षेत्र से महाशक्तियों को दूर रखने और मानवीय संकट से उबरने के लिए साझा प्रयासों की जरूरत है, यह धार्मिक.सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर समन्वयकारी हो सकते है। दक्षिण एशिया में लोगों की एक दूसरे देशों में आवाजाही बढने से रोजगार के अवसर बढ़ेगे और यह इस क्षेत्र की शांति स्थापना की उम्मीदों को भी मजबूत करेगा। दक्षेस की भावना को मजबूत करने और आपसी सहयोग बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है नहीं तो मानवीय संकट विकराल रूप धारण कर लेगा।    

 

brahmadeep alune

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