बस्तर को बदलता सीआरपीएफ,राष्ट्रीय सहारा 227 Bn Crpf sukma bastar

 राष्ट्रीय सहारा


                    

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से 60 किलोमीटर दूर नक्सलवाद घटनाओं के लिए अतिसंवेदनशील माना जाने वाले सुकमा जिले के तोंगपाल में बाज़ार रोशन है। हर गुरुवार को यहां हाट लगता है जिसमें दूर दराज के आदिवासी आते है। छत्तीसगढ़ को तेलांगना और आंध्रप्रदेश से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर स्थित तोंगपाल में कुछ सालों पहले नक्सली खुले आम घूमते थे। लाल झंडा और नक्सली राज को यहां देखा जाता था।  लेकिन जब से सीआरपीएफ की 227 बटालियन यहां तैनात की गई है,बस्तर का यह दक्षिणी अंचल पूरा बदल गया है।


तोंगपाल में कन्या और बालक हॉस्टल समेत तेंदुपत्ता की मंडी लगती है। यहां कॉलेज भी खुल गया है।  सीआरपीएफ का एक बेस कैम्प कोयला भट्टी में भी है। इसके पूर्व में नजदीक की चंदामेटा की पहाड़िया है जो नक्सलियों की शरण स्थली मानी  जाती थी। इसके पास ही कटे कल्याण की  पहाड़ियां है,जहां हिडमा समेत कई नक्सली के आने का अंदेशा बना रहता है।

नक्सली हमलों के कारण अतिसंवेदनशील समझे जाने वाले दक्षिणी बस्तर के कई इलाकों में सीआरपीएफ सुरक्षा के साथ जनकल्याण को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। लोगों का डर दूर करने और खेलों की और आदिवासी युवाओं को आकर्षित करने के लिए तोंगपाल के खेल मैदान में सीआरपीएफ की टीमें क्रिकेट मैच खेल रही है,जहां उप कमांडेंट बृज मोहन राठौर,बबन कुमार सिंह और दुष्यंत गोस्वामी उनका हौसला बढ़ाते नजर आते है। यह इलाका बेहद खतरनाक माना जाता था। 2014 में यहीं से महज एक किलोमीटर दूर नक्सलियों ने आईइडी ब्लास्ट करके 15 सैन्य कर्मियों की हत्या कर दी थी।


सुकमा के नक्सली प्रभाव से ग्रस्त और अतिसंवेदनशील माने जाने  वाली दरभा घाटी,झीरम घाटी,तोंगपाल,कोयला भट्टी और सुदूरवर्ती कुमा कोलेंग में सीआरपीएफ तैनात है। झीरम घाटी में 25 मई 2013 को नक्सलियों ने सलवा जुडूम के संस्थापक महेंद्र कर्मा,पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल,कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी।  इस वीभत्स घटना के बाद सीआरपीएफ की 227 बटालियन  को यहां भेजा गया था। 22 अप्रैल 2013 को भोपाल में स्थापित इस बटालियन ने सुकमा में साल 2014 के अंतिम महीने से काम करना शुरू किया। इसके बाद नक्सलियों पर इसका ऐसा खौफ है कि वे पिछले आठ सालों में बटालियन के एक भी जवान पर एक भी हमला करने में न तो कामयाब हो पाए है और न ही सीआरपीएफ ने उन्हें ऐसा कोई अवसर दिया है।


नक्सलियों ने कई बार आईइडी तो लगायें लेकिन चौकस और सतर्क बटालियन के जांबाजों ने समय रहते उन्हें निष्प्रभावी कर दिया।  इस साल जनवरी में एक लाख की इनामी नक्सली मुन्नी समेत कई नक्सलियों को सीआरपीएफ ने मार गिराया था,यही नहीं नक्सली बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण करने को मजबूर भी हो रहे है। पिछले महीने 10  नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था जिसमे पांच हजार से लेकर एक लाख तक के नक्सली थे,जिनसे भारी और विध्वंसक हथियार बरामद किए गये। कमान्डेंट पी.मनोज कुमार इसका श्रेय जवानों को देते है। वे कहते है कि केंद्र और राज्य सरकार का इन इलाकों में विकास को लेकर बेहद अच्छा समन्वय है और सीआरपीएफ को इसका खूब फायदा मिल रहा है। वे बताते है कि हमारा साफ सन्देश है सुरक्षा भी,शांति भी और विकास भी।




हालांकि यह ऐसे इलाके है जहां हर समय नक्सली हमले का खौफ बना रहता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने जिन 405 कुख्यात नक्सलियों की पहचान की है,उसमे से अधिकांश इन्हीं इलाकों में प्रभावशील माने जाते है और उन पर 5 हजार से लेकर 25 लाख तक के इनाम घोषित किए गए है। सीआरपीएफ का एक बेस कैम्प सुकमा के सुदूरवर्ती इलाके कुमा कोलेंग में है जिसके दक्षिण पश्चिम दिशा में उड़ीसा के नक्सल प्रभावित मलकानगिरी की  कुख्यात पहाड़ियां है। इन इलाकों में नक्सल की कुख्यात बस्तर डिविजन प्रभावशील रही है। मलकानगिरी के कलेक्टर आरवी कृष्णा का नक्सलियों ने अपहरण फरवरी 2011 में किया था और सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का अपहरण 2012 में नक्सलियों ने किया था।  राष्ट्रीय राजमार्ग 30 की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सीआरपीएफ के पास है। जब से सीआरपीएफ की  227 बटालियन को यहां तैनात किया गया है,कोई भी नक्सली हमला कामयाब नहीं हो सका है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग को छत्तीसगढ़ के विकास की जीवन रेखा माना जाता है और नक्सली इसे बाधित करने की फ़िराक में रहते है। 


सीआरपीएफ दुर्गम और खतरनाक नक्सली प्रभाव वाले इलाकों में रोड निर्माण में सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन इलाकों में  मोबाईल की सुविधा उपलब्ध कराना नामुमकिन समझा जाता था क्योंकि टावर को नक्सली उड़ाने की धमकी दे चूके थे,लेकिन             सीआरपीएफ  की मुस्तैदी से नक्सली कामयाब नहीं हो सके और कई टावर लगे जिससे विकास को नई दिशा मिली। यह समूचा इलाका बिजली की सुविधा से महरूम था लेकिन अब यह रोशन हो गया है। सीआरपीएफ ने इस क्षेत्र के बच्चों को पुलिस और सेना में भर्ती होने के लिए जरूरी प्रशिक्षण सुविधा भी उपलब्ध करा रही है,इसके परिणाम सामने आ रहे है और नक्सली इससे परेशान है।


सीआरपीएफ आगे रहकर जनता से मिलती है और उनका सहयोग भी करती है। केंद्र और राज्य सरकार की सहायता से और उनकी योजनाओं को सामान्य जन तक पहुँचाने का काम सीआरपीएफ बखूबी कर रही है। आम ग्रामीण आदिवासियों को चिकित्सा सुविधाएँ,शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हेतु वाटर प्यूरी फायर,मनोरंजन और जागरूकता के लिए रेडियो,घर को रोशन करने हेतु सोलर लालटेन,महिलाओं को किचन हेतु कडाई,स्टील के घड़े,मलेरिया जैसी घातक बीमारी से बचाव हेतु मच्छरदानियां आदि सामग्री का वितरण,आम आदिवासी और गरीब बच्चों को कुपोषण से बचाव हेतु विटामिन समेत कई दवाइयों का नियमित वितरण किया जाता है।  


सीआरपीएफ इस क्षेत्र के बच्चों को पुलिस और सेना में भर्ती होने के लिए जरूरी प्रशिक्षण सुविधा भी उपलब्ध करा रही है,इसके परिणाम सामने आ रहे है और नक्सली इससे परेशान है। इस इलाके में पिछले 8 सालों में इस क्षेत्र में कोई अप्रिय घटना घटित नहीं हुई। सीआरपीएफ के जनकल्याण जुड़े  कार्यो के कारण लोगों का विश्वास उन पर बढ़ा है।

बस्तर के इलाके में शांति,सद्भावना और विकास की सीआरपीएफ की कोशिशों के बीच धार्मिक आयोजन से यहां रहने वाले लोग अभिभूत है। इस साल नवरात्र पर सुकमा के तोंगपाल  में स्थित सीआरपीएफ ने एक अनोखा आयोजन कर बेटियों की पूजा की,उन्हें उपहार दिए और एक भंडारे का आयोजन किया जिसमें दूर दराज के कई आदिवासी शामिल हुए। नक्सल से प्रभावित  माने जाने वाले छत्तीसगढ़ के अति संवेदनशील बस्तर में लोगों के सर्वांगीण विकास के लिए सीआरपीएफ लगातार कार्य कर रही है। इसके उजले परिणाम सामने आ रहे है। स्कूलों में शिक्षा बिना बाधित चल रही है,लोग बेखौफ होकर अपने काम में जुटे है। आदिवासी आसानी से बाज़ार पहुंचकर तेंदुपत्ता,शहद और महुआ बेचकर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे है। इन इलाकों में सीआरपीएफ के सफल होने का एक प्रमुख कारण इस अर्द्धसैनिक बल का भ्रष्टाचार मुक्त होना भी है। जबकि नक्सल ग्रस्त इलाकों में अन्य संस्थाओं पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगते रहे है। जाहिर है सीआरपीएफ के कार्यो और योजनाओं से सीख कर अन्य अर्द्धसैनिक बल और संस्थाएं नक्सली क्षेत्रों में काम करें तो निश्चित ही आंतरिक सुरक्षा की इस बड़ी चुनौती से पार पाया जा सकता है।

मेरी आने वाली किताब,"सुकमा ग्राउंड जीरो" से....

ब्रह्मदीप अलूने 
 

 

 

 

 

 

 

अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और युद्द अपराध international court and war crime, prajatrntra

 प्रजातंत्र

                                                                   

युद्द में अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के अनुरूप व्यवहार पेचीदा प्रश्न रहा है।युद्द,संघर्ष या युद्द जैसे हालत में भी मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए 1949 में जेनेवा कन्वेंशन बनाया गया था और दुनिया के देशों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे इसके मापदन्डों के अनुसार व्यवहार सुनिश्चित करेंगे लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट और भयावह नजर आती है।दरअसल रुस के हमलें को झेलते यूक्रेन के लोगों पर बेतहाशा अत्याचार की कई घटनाएं सामने आ रही है।महिलाओं से बलात्कार करके उनकी हत्याएं की गई है,अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों को रूस की सेना लगातार निशाना बना रही है। लोगों के घरों को जलाया गया है और घायल लोगों को भी कोई भी  रियायत नहीं दी जा रही है।कुछ दिनों पहले  नीदरलैंड्स के द हेग में 38 देशों के प्रतिनिधियों की मुलाक़ात हुई।इन देशों ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट से रूस के ख़िलाफ़ कथित युद्ध अपराधों की जांच करने की गुज़ारिश की थी।


यह बेहद दिलचस्प है कि संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक समस्याओं के लिए अंतराष्ट्रीय न्यायालय तो बनाया लेकिन कोई जेल नहीं बनाई।ऐसे में अंतराष्ट्रीय न्यायालय किसी को युद्द अपराधी घोषित भी कर दे तब उस अपराधी को उसके स्वयं के देश में ही जेल में डालना होगा।सवाल यह उठता है कि पुतिन को क्या रूस की जेल में डाला जा सकता है।यूक्रेन युद्द में मानवीय गरिमा को तार तार करने वाले सैनिक भी तो पुतिन की योजना पर काम कर रहे है,जाहिर है उन्हें भी रूस की किसी जेल में नहीं डाला जा सकता।इंटरनेशनल कोर्ट में जिस व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला चलाया जाता है उसे कोर्ट में पेश करना बेहद ज़रूरी होता है, सवाल यह है कि पुतिन या उनके सैन्य अधिकारियों को कौन इंटरनेशनल कोर्ट में आने के लिए मजबूर कर सकता है।


श्रीलंका के वर्तमान राष्टपति गोताभाये राजपक्षे पर उनके देश में तमिल संघर्ष को दबाने को लेकर कई गंभीर आरोप लगे हुए है।राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे बहुसंख्यक सिंहली जनता के नायक बन माने जाते है। उनका संबंध परम्परावादी दल श्रीलंका पोदुजन पेरामुना से है जो आमतौर पर बहुसंख्यक सिंहलियों के हितों के प्रति उदार और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के लिए अपेक्षाकृत कठोर माना जाता है। गोटाभाया राजपक्षे पूर्व में देश के रक्षामंत्री रहे है। इनके कार्यकाल और आक्रामक नीतियों से तमिल पृथकतावादी संगठन एलटीटीई का खात्मा हुआ था।करीब एक दशक पहले ब्रिटेन के चैनल-फ़ोरने श्रीलंकास किलिंग फ़ील्डनामक एक डॉक्युमेंट्री  फिल्म के जरिए इसकी पुष्टि भी की थी कि श्रीलंकाई सेना ने तमिल छापामारों को 2009 में पूरी तरह तबाह कर दिया था और इस तरह 25 साल से लड़ा जा रहा युद्घ समाप्त हुआ था।फ़िल्म में तमिल पुरूषों की हत्या करते हुए और तमिल महिलाओं की नग्न लाशों को दिखाया गया है।वीडियो देखने से लगता है कि तमिल महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न भी हुआ था।संयुक्त राष्ट्र ने एक विशेष जांच में यह पाया कि तमिल नागरिकों की हत्या करते हुए श्रीलंकाई सेना के वीडियो प्रामाणिक हैं।


श्रीलंका में कई तमिलों को बंदी बनाया गया था जिन पर बाद में श्रीलंका की सेना ने खूब अय्ताचार किए गये थे।जेनेवा कन्वेंशन में युद्धबंदियों को अमानवीय हालात में नहीं रखा जा सकता और युद्धबंदियों पर अत्याचार पर मनाही है लेकिन ऐसा करने पर क्या होगा ये स्पष्ट ही नहीं है।


मध्यपूर्व में यमन के हालात बद से बदतर हो गए है।यहां संयुक्त राष्ट्र की  ऐसी कोई भी एजेंसी नहीं है जो युद्द अपराध पर नजर रख सकें।हुती और यमन के अन्य जातीय समूहों के बीच हिंसक संघर्ष करीब एक दशक से चल रहा है जिससे इस देश की व्यवस्थाएं ही अस्त व्यस्त हो गई है।देश में युद्ध  के साथ भुखमरी से मौते हो रही है।यमन की 3 करोड़ की आबादी का क़रीब 80 फ़ीसदी हिस्सा जीने के लिए वैश्विक समुदाय द्वारा दी जा रही मदद पर निर्भर है।संयुक्त राष्ट्र  के अनुसार  अब तक देश में  करीब चार लाख लोग मारे जा चुके हैं,इस युद्ध में अब तक दस हज़ार से ज़्यादा बच्चे मारे जा चुके हैं या ज़ख्मी हो गए हैं।लड़ाई के चलते वहां अब तक 40 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं।देश के 3 करोड़ लोगों में से  पौने दो करोड़ लोगों को अभी पेट भरने के लिए मदद की ज़रूरत है।अनुमान है कि इस साल के अंत तक यह गिनती बढ़कर  करीब दो करोड़ हो जाएगी।यमन के 50 लाख लोग भुखमरी के कगार पर खड़े हैं,जबकि क़रीब 50 हज़ार लोग पहले से ही भुखमरी जैसे हालातों का सामना करने को मजबूर हो गए है।सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन  द्वारा यमन में लगातार हमले किए जा रहे है,अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न तो सऊदी अरब के किंग हाजिर होंगे और न ही उनके सहयोगी।ऐसे में यह मानवीय संकट बढ़ता ही जा रहा है और इसके फ़िलहाल रुकने की कोई संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आती।




वहीं मध्यपूर्व के एक और देश सीरिया का हालात भी बेहद खराब है।संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सीरिया के सुरक्षा बलों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों का दमन करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से मानवता के ख़िलाफ़ अपराध किए हैं।सीरिया में बच्चों समेत आम नागरिकों की हत्याएं की गईं,यातनाएं दी गई और उनका यौन शोषण तक किया गया।मानवाधिकार मामलों की संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख ने कहा है कि सीरिया में हुई एक जाँच से मिले सबूतों के मुताबिक़ देश में युद्ध अपराध उच्चतम स्तरसे अधिकृत थे।इसमें राष्ट्रपति बशर अल-असद का नाम भी शामिल है।सीरिया में संयुक्त राष्ट्र के जाँच आयोग को मानवता के विरुद्ध अपराध के और युद्ध अपराध के बेहद गंभीर सबूत मिले हैं लेकिन इस पर कार्रवाई की कोई संभावना दूर दूर तक नहीं नजर आती।


दक्षिण एशियाई देश म्यांमार की सैन्य सरकार वहां के नागरिकों को लगातार निशाना बना रही है।संयुक्त राष्ट्र में सेना द्वारा मानवता के खिलाफ व्यापक अपराध और सुनियोजित हमलों के साक्ष्य भी मौजूद है।जेनेवा कंन्वेंशन में कहा गया है कि युद्ध के समय आम नागरिकों के साथ किसी भी तरह का अमानवीय व्यवहार नहीं किया जाएगा। दुनिया भर की कई शीर्ष सत्ताएं अंदर और बाहर आम नागरिकों पर युद्द थोप रहे है,उन्हें यातनाएं दे रहे है,सामूहिक नरसंहार कर रहे है और मानवता को चुनौती भी दे रहे है।अफ़सोस,अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था आधी अधूरी है और अधिनायकवादी ताकतों को इसका भरपूर फायदा मिल रहा है।

कश्मीर पर सवाल शरीफ की राजनीतिक मजबूरी kshmir shahbaz sharif pak rashtriy sahara

राष्ट्रीय सहारा

                                                

शहबाज़ शरीफ पाकिस्तान के कब तक प्रधानमंत्री रहेंगे,यह वे स्वयं भी नहीं जानते लेकिन वे यह जरुर जानते है कि 2018 के आम चुनावों में इमरान खान को पाकिस्तान की फौज का बड़ा समर्थन हासिल था। फौज ने समूची चुनावी व्यवस्था का मनमाना संचालन किया। न्यायपालिका पर दबाव बनाकर नवाज शरीफ के चुनाव पड़ने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इसके बाद इमरान खान सेना के प्रभाव से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए। जब इमरान खान से सेना पर हावी होने की कोशिश की तो सेना ने उन्हें बड़ी चालाकी से सत्ता से बेदखल कर दिया।


ऐसे में शहबाज़ शरीफ सेना और जनता को साथ लेने की कोशिशों में प्रधानमंत्री बनते ही जुट गए और उन्होंने पहला दांव कश्मीर का खेला। दरअसल  पाकिस्तान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के केंद्र में कश्मीर को रखना इस देश के राजनेताओं की ऐसी मजबूरी बन गया है जिससे वे बाहर निकल ही नहीं सकते। पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ ने पाकिस्तान की भारत को लेकर नीति के सम्बन्ध में कश्मीर पर वही नजरिया रखा जो उनके पूर्व के प्रधानमंत्री इमरान खान का हुआ करता था। जाहिर है सरकार बदलने के साथ पाकिस्तान की भारत को लेकर नीतियों में किसी बदलाव की गुंजाइश  को शहबाज़ शरीफ ने अपने पहले ही भाषण में खत्म कर दिया। डेढ़ साल के बाद पाकिस्तान में आम चुनाव है और शाहबाज़ शरीफ का कार्यकाल इतने  ही समय का हो सकता है,उनसे ज्यादा अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए। शरीफ यह भलीभांति जानते है कि कश्मीर को लेकर उनके दृढ़ता के दिखावे से न केवल पाक की जनता का उन्हें समर्थन हासिल होगा बल्कि वे सेना का समर्थन भी हासिल कर सकते है। इस समय कश्मीर पर जहां शहबाज़ विष वमन करते दिखाई देंगे वहीं अमेरिका पर उनकी नीति अलग हो सकती है और यह उनकी मजबूरी भी होगी। वे अपने पूर्ववर्ती इमरान खान से अलग हटकर अमेरिका के समर्थन की कोशिश भी कर सकते है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की सेना लोकतंत्र के मुखौटे के रूप में शरीफ का इस्तेमाल कर अमेरिका से आर्थिक मदद हासिल करना चाहती है जो फ़िलहाल रुकी हुई है। 2018 में तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान की सैनिक सहायता और आर्थिक सहायता रोकने का ऐलान करते हुए कहा था कि,हमने पाकिस्तान को पिछले 15 सालों में बेवकूफों की तरह 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और उन्होंने इसके बदले में हमारे नेताओं को बेवकूफ समझकर झूठ और धोखे से अलावा कुछ नहीं दिया है। वे आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं जिनका हम अफगानिस्तान में शिकार कर रहे हैं,अब और नहीं। इन वैश्विक आलोचनाओं और ग्रे वॉच लिस्ट में होने के बाद भी पाकिस्तान ने साढ़े तीन हजार से ज्यादा संदिग्धों को आतंकवाद की वॉच लिस्ट से ही हटा  दिया था। जिसकी पश्चिमी देशों में खासतौर पर काफी आलोचना हुई।


शहबाज़ शरीफ को अमेरिका को विश्वास में लेकर आगे बढना है और कश्मीर पर विष वमन करके जनता और सेना का विश्वास भी मजबूत करना है। वैसे भी अमेरिका के हित पाकिस्तान के लोकतंत्र में पूरे होते नहीं  दिखाई देते। गौरतलब है कि अमेरिका ने पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही को प्रश्रय देते हुए  अय्यूब ख़ान,जनरल याह्या खान,जनरल ज़िया-उल-हक़ और जनरल परवेज मुशर्रफ को भरपूर समर्थन दिया। सेना ने अमेरिका की आर्थिक मदद को देश के विकास से ज्यादा सैन्य सुविधाओं के लिए खर्च किए। 


शरीफ स्वयं व्यवसायी है और सेना इसका बड़ा लाभ ले सकती है। पाकिस्तान के आर्थिक हितों और विभिन्न व्यवसायों में सैन्य अधिकारियों की बड़ी भागीदारी और निजी हित रहे है। पाकिस्तान की आम जनता महंगाई से भले ही त्रस्त हो लेकिन सैनिकों की सुविधाओं से कभी समझौता नहीं किया जा सकता। सरकारें सेना के दबाव में ही देश का आर्थिक बजट तय करती है।  शरीफ अपने व्यवसायी हितों के साथ राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए कश्मीर के नेताओं को राजनीतिक समर्थन बढ़ाते दिख सकते है।  वैसे भी कश्मीर के नेताओं से का रुख पाकिस्तान की सत्ता से सम्बन्ध गांठे रखने का रहा है और महबूबा मुफ़्ती  इस प्रकार की राजनीति में माहिर समझी  जाती है। महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद अपने राजनीतिक  भविष्य को लेकर गहरे असमंजस में है। उनकी राजनीतिक जमीन खिसक गई है। महबूबा अनुच्छेद 370 के पक्ष में बेहद मुखर रही है और उसे पुन: बहाल करवाने के लिए वह तालिबान का सहारा लेकर कश्मीर को आतंक के जंजाल में फिर से धकेलने के कुत्सित प्रयास कर रही है। कश्मीर में चरमपंथ को सामाजिक स्वीकार्यता के साथ राजनीतिक समर्थन देने का काम महबूबा मुफ़्ती कई सालों से करती रही है। वह राजनीतिक सभाओं में राजनीतिक कैदियों को रिहा करने,सभी उग्रवादियों से वार्ता करने और आतंकवादियों के लिए कहर बने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को बंद करने की वकालत करती रही है। अपने स्वायत्तता प्रेम के कारण घाटी के अलगाववादियों एकमात्र पसंद महबूबा ही मानी जाती है। पाकिस्तान,आईएसआई,तालिबान और कश्मीर में आतंकवाद का गहरा संबंध रहा है। आतंकी संगठनों को लेकर महबूबा आमतौर पर खामोश रहती है।  महबूबा वहीं भाषा बोलती रही है जो पाकिस्तान को पसंद हो। अब शहबाज़ शरीफ और महबूबा दोनों अपनी राजनीतिक हसरतों को पूरा करने के लिए एक दूसरे का सहारा ले सकते है। 


इमरान खान की लोकप्रियता को कम करके उन्हें आने वाले आम चुनावों में किसी राजनीतिक लाभ न लेने देने से रोकना शाहबाज़ शरीफ का प्रमुख लक्ष्य होगा  ऐसे में वे भारत विरोध और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में पाकिस्तान के अलगाववादी और कट्टरपंथी समूहों की लामबंद करने के प्रयास में और तेजी से ला सकते है। वे भारत के विरुद्ध भ्रामक प्रचार को बढ़ावा देते दिख सकते है।  प्रचार आधुनिक समय में एक प्रभावशाली साधन है जिसका उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनीति में विदेश नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आर्थिक और सैनिक शक्ति के साथ किया जा रहा है। शरीफ कम समय में ज्यादा राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिशों में पाकिस्तान विदेशों में बसे अपने नागरिकों के जरिए कुप्रचार के कूटनीतिक हथियार से दुनियाभर में भारत की छवि को खराब करने का अभियान बढ़ा सकते है।   लेकिन उनके इन प्रयासों से न कश्मीर का भला होगा,न ही पाकिस्तान का। यह बात और है की शहबाज़ शरीफ के राजनीतिक हित पूरे हो सकते है।  बहरहाल अल्पकालीन प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के दौर में भारत से अच्छे संबंधों की बात बेमानी ही होगी। 

पड़ोसी देशों को लेकर बेहतर कूटनीति की जरूरत हस्तक्षेप राष्ट्रीय सहारा, bharat pdosi desh kutiniti rashtriya sahara

 

हस्तक्षेप

राष्ट्रीय सहारा


वैदेशिक संबंधों का महत्वपूर्ण आधार राष्ट्रीय हित होते है,किसी राष्ट्र की वैदेशिक नीति नैतिकतापूर्ण हो या न हो,व्यवहारिक और यथार्थवादी अवश्य होना चाहिएरूस यूक्रेन युद्द को लेकर भारत की वैदेशिक नीति बाइडेन की नजर में भले ही ढुलमुल हो लेकिन राष्ट्रीय और सामरिक हितों के लिहाज से बेहद संतुलनकारी तथा सजग रही हैसमुदी सुरक्षा के लिए अहम क्वाड जैसे सैन्य संगठन का हिस्सा रहने के बाद भी भारत का रूस को लेकर अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया से अलग रुख  कूटनीतिक हलकों को भी चमत्कृत करने वाला हैयह इतना अविश्वसनीय माना जा रहा है कि इमरान खान और चीन जैसे भारत के प्रतिद्वंदी भी भारत की विदेश नीति की  सराहना किए बिना न रह सके


 

भारत की वैश्विक छवि गुटनिरपेक्षता,तटस्थता या असंलग्नता वाले एक ऐसे राष्ट्र की रही है जो जियो और जीने दो की नीति पर चलता रहा हैयही कारण है कि भारतीय सैनिक शांति सेना में तो भागीदारी करते है लेकिन किसी सैन्य गठ्बन्धन का हिस्सा बनकर वैदेशिक संघर्ष में कभी भाग नहीं लेते दुनिया की महाशक्तियों अमेरिका,फ़्रांस,ब्रिटेन,रूस और जापान जैसे देशों से भारत के मजबूत आर्थिक और सामरिक संबंध है,वहीं भारत दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश भी है और इस नाते पड़ोसी देशों पर भारत का प्रभाव का बड़ा महत्व है

 


पड़ोसी देशों को लेकर भारत की वैदेशिक नीति नियन्त्रण और संतुलन पर आधारित रही हैपड़ोसी देश भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम होते है,अत: भारत पड़ोसी देशों की आर्थिक,राजनीति और सामरिक नीति को नियंत्रित और संतुलित रखने में तत्परता  दिखाता रहा है। इन सबके बीच भारत और चीन के आपसी संबंध भारत की पड़ोस की नीति को अक्सर प्रभावित करते रहे है। चीन और भारत के संबंध 1962 के बाद से ही बेहद खराब रहे है1990 के दशक में वैश्वीकरण और उदारीकरण का युग  गहरे बदलाव लाने में सफल रहाचीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन कर उभरा है,वहीं भारत दुनिया का बड़ा बाज़ार हैदोनों देशों के बीच 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से तनाव चरम पर हैइसके बाद भी चीन का भारत के बाज़ार पर कब्जा है और भारत सरकार के तमाम दावों के बाद भी चीन से व्यापरिक सम्बन्धों में न तो कोई संतुलन बन सका है और न ही चीन पर निर्भरता कम हुई है  हाल ही में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भारत की यात्रा की है2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद चीन के किसी उच्च राजनयिक की यह पहली यात्रा थी  चीन भारत के साथ सीमा विवाद को जस के तस रखते हुए आर्थिक संबंधों पर आगे बढने की नीति पर चलता रहा है। भारत के लिए चीन की यह नीति असहज रही है लेकिन भारत उसे अब तक स्वीकार करता रहा है। साल 2017 में भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर सैन्य तनातनी बढ़ी हुई थी। लेकिन अचानक एक दिन दोनों देशों ने इस पर शांति बनाए रखने की घोषणा कर दी। चीन और भारत ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले डोकलाम को अलविदा कहने का फैसला कर अंततः यह बता दिया था कि  दुनिया में आर्थिक फ़ायदे के लिए कोई भी सौदेबाजी की जा सकती है। हालांकि  इस बार  भारत का रुख भिन्न  नजर आया है भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष से कहा कि भारत सीमा मुद्दे को दोनों देशों के समग्र संबंधों से अलग नहीं करेगा


 

भारत का हालिया रुख स्वागत योग्य तो है लेकिन चीन को दबाव में लाने के  लिए भारत को दक्षिण एशिया के देशों पर अपना निर्णायक प्रभाव बनाएं रखना होगा वर्तमान में चीन का दक्षिण एशिया पर प्रभुत्व लगातार बढ़ता जा रहा है भारत के दो पड़ोसी देश मालद्वीप और श्रीलंका को ही ले,भारत की सहायता पर निर्भर यह देश अब चीन की तरफ झुके हुए दिखाई पड़ते है क़रीब चार लाख की आबादी वाले मालद्वीप की दूरी भारत से बहुत कम है,इस देश में भारत का प्रभाव रहा है लेकिन पिछलें कुछ सालों में मालदीव में चीन की दिलचस्पी बढ़ी हैइस समय यह देश चीन से आर्थिक सम्बन्धों के जाल में फंस गया है मालद्वीप समुद्री जहाजों का महत्वपूर्ण मार्ग है,भारत और चीन दोनों चाहते हैं कि उनकी नौसैनिक रणनीति के दायरे में यह इलाक़ा रहेमालदीव को चीन अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड में एक अहम रूट के तौर पर देख रहा हैइस समय मालदीव में विपक्ष समर्थित इंडिया आउट कैंपेन ज़ोरों पर है इस कैंपेन की शुरुआत 2018 में हुई थी। यह भारत की समस्याओं को बढ़ा रहा है। मालदीव आर्थिक रूप से भारत पर निर्भर है मालदीव के लोग इलाज के लिए भी भारत ही आते हैं। लेकिन अब चीन यहां कई बड़ी परियोजनाओं पर काम करके भारत पर सामरिक बढ़त लेता जा रहा है। चीन की मालदीव में मौजूदगी हिंद महासागर में उसकी रणनीति का हिस्सा हैभारत के लक्षद्वीप से मालदीव क़रीबी 700 किलोमीटर दूर है,इसलिए चीन यहां से भारत पर नजर रख सकता है


भारत के एक और पड़ोसी श्रीलंका और चीन के रिश्ते भी भारत की परेशानियां बढ़ाने वाले है। चीन ने श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट का निर्माण कर हिंद महासागर में भारत की चुनौती को बढ़ा दिया हैश्रीलंका ने चीन को लीज़ पर समुद्र में जो इलाक़ा सौंपा है वो भारत से महज़ 100 मील की दूरी पर है। जाफना के तीन द्वीपों पर प्रस्तावित चीनी ऊर्जा परियोजना भारत की नई चुनौती है।  ये तीनों द्वीप तमिलनाडु के समुद्री तट से बहुत दूर नहीं हैंचीन इन दोनों देशों में बेल्ट एंड रोड के काम को तत्परता से पूरा कर रहा है


चीन की भारत को घेरने की रणनीति से उत्पन्न चुनौती का मुकाबला करने के लिए भारत को अपने पड़ोसी देशों से संबंध सुदृढ़ करने की जरूरत है मालद्वीप और श्रीलंका जैसे देश भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए बेहद अहम है रूस यूक्रेन युद्द के बीच भारत ने अपनी सामरिक प्रतिबद्धता के लिए निश्चित ही कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिचय दिया है। अब पड़ोसी देशों को लेकर भी सजग और संतुलित वैदेशिक नीति की दरकार है।

नाटो की प्रासंगिकता का संकट nato ukrine russia china janstta

 जनसत्ता


                                   


                            

नाटो की यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप को संतुलित और नियंत्रित रखने की नीति चीन की आर्थिक रणनीति और रूस की सामरिक आक्रामकता के आगे बूरी तरह पस्त पड़ चुकी है। लातिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों में चीन सहायता कूटनीति का एक आक्रामक अभियान चला रहा है जिसे वह लिबेरो अमेरिका या अमेरिका से आज़ादी के तौर पर प्रचारित करता है। ब्राज़ील,मेक्सिको और कोलंबिया  चीन से आर्थिक साझेदारी को लेकर दीर्घयोजना को आगे बढ़ा है वहीं क्यूबा, निकारागुआ और वेनेज़ुएला जैसे देश अमेरिका को ठेंगा दिखाकर चीन से व्यापक आर्थिक समझौते को लेकर आगे बढ़ चूके है। चीन इन देशों के क्षेत्रीय संगठन सीईएलएसी के साथ अपने रिश्तों को उंचाई पर ले जा रहा है और यह अर्जेंटीना के नेतृत्व में हो रहा है।


लातिन अमेरिका और कैरिबियाई देश चीन की बेल्ट रोड योजना का अहम हिस्सा बन चुके है। वेनेज़ुएला और क्यूबा अमेरिका विरोध के चलते चीन के समर्थन में खड़े है। अल साल्वाडोर और होन्डुरास जैसे देशों में भी चीन अपना प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पश्चिम यूरोप में भी चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है,चीन का नया सिल्क रोड  पांच महाद्वीपों में फैला बुनियादी परियोजनाओं का एक महत्वाकांक्षी नेटवर्क है जिसके सहारे वह  अमेरिकी महाद्वीप और नाटो के सहयोगी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ा रहा है।


चीन मध्य-पूर्वी यूरोपीय देशों के सदात व्यापक रणनीति के तौर पर काम कर रहा है उनमें अल्बानिया,बोस्निया एवं हर्जेगोविना,बुल्गारिया,क्रोएशिया,चेक गणराज्य,एस्टोनिया,ग्रीस,हंगरी,लात्विया,उत्तरी मेसिडोनिया,मॉन्टेनिग्रो, पोलैंड,रोमानिया,सर्बिया,स्लोवाकिया और स्लोवेनिया शामिल हैं। इसमें कई देश नाटो सैन्य संगठन का हिस्सा है जिसकी स्थापना ही साम्यवाद को रोकने के लिए हुई थी। यूरोप के चारो और से घेर लेने की नीति की तहत चीन बाल्कन देशों के साथ सहयोग को लेकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। ये देश रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिका चीन को एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए खतरनाक बताता है जबकि चीन पश्चिमी बाल्कन  देशों के  उन महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर प्रभाव  बढ़ा रहा है जो पश्चिमी यूरोप,उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया से क़रीब हैं। चीन आर्थिक समझौतों के साथ ही यूरोप के कई बंदरगाहों में रूचि दिखा रहा है। वह ग्रीस के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह पिरेयस की व्यवस्थाओं का संचालन करता है,तुर्की के तीसरे बड़े पोर्ट कुम्पोर्ट पर भी चीन का ही नियंत्रण है। इसके साथ-साथ दक्षिण यूरोप के कई बंदरगाहों में चीन की भागीदारी है। पश्चिमी बाल्कन देशों में चीन का निवेश दोगुना हो गया है,इन देशों पर चीन का कर्ज बढ़ता जा रहा है और यह स्थिति अमेरिका और यूरोप को चिंता में डालने वाली है। यूरोपीय संघ के करीबी  अल्बानिया,नॉर्थ मेसिडोनिया,मॉन्टिनेग्रो,सर्बिया,बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना चीन के कर्ज के जाल में फंसे हुए देश है।  चीन लातिन अमेरिका,कैरिबियाई और बाल्कन देशों के साथ सांस्कृतिक सम्बन्धों को भी आगे बढ़ा रहा है। इन देशों से बड़ी संख्या में छात्र चीन के विश्वविद्यालयों में जा रहे हैं,सर्बिया और मॉन्टिनेग्रो में तो कई स्कूलों में कंफ्यूशियस क्लासरूम तक खोले गए हैं।


चीन के आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग का असर कूटनीतिक रूप से भी दिखने लगा है। अमेरिका वीगर मुसलमानों के अधिकारों को लेकर मुखर है वहीं बाल्कन के देश चीन की आलोचना के किसी भी प्रस्ताव में कोई दिलचस्पी नही दिखाना चाहते। बाल्कन प्रायद्वीप दक्षिण-पूर्वी यूरोप का एक बड़ा क्षेत्र है  और यहां इस क्षेत्र में चीन की कूटनीतिक बढ़त रणनीतिक बढ़त नहीं बन जाएं,इसे लेकर अमेरिका और नाटो आशंकित है। बाल्कन दक्षिणी यूरोप का सबसे पूर्वी प्रायद्वीप है और यह तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। इसके पूर्व में काला सागर, ईजियन सागर,मरमरा सागर,दक्षिण में भूमध्यसागर,पश्चिम में इयोनियन सागर तथा एड्रियाटिक सागर हैं। चीन का इस क्षेत्र में बढ़ा रुतबा अमेरिका और नाटो पर रणनीतिक बढ़त लेता हुआ दिखाई देता है।


लातिन अमेरिका में रूस की नीति भी बेहद प्रभावशाली रही है।  पुतिन ने 2000 के दशक की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाया है और यह चुनौतीपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि रूस और चीन ने मिलकर दुनिया में एक नया ब्लोंक बनाने की कोशिश की है और वे इसमें काफी हद तक सफल भी हो रहे है।


यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामकता और इस पर वैश्विक दबाव का काम न करना भी दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रहा है। अन्तराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप को एक तानाशाही दखलंदाजी माना जाता है जो एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के मामलों को पलटने के लिए करता है। पूर्वी यूरोप के इस्टोनिया,लातविया,लिथुआनिया,पोलैंड और रोमानिया में अमेरिका के  नेतृत्व में नाटो के सैनिक तैनात है। इसके साथ ही नाटो ने बाल्टिक देशों और पूर्वी यूरोप में हवाई निगरानी भी बढ़ाई है जिससे आकाश से भी रूस पर नजर रखी जा सके।  यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यह साफ हो गया कि रूस पर दबाव बनाने की नाटो और अमेरिका की यह योजना कारगर नहीं हो सकी। यह स्थिति नाटो और अमेरिका को परेशान करने वाली है। 


2008 में नाटो के बुखारेस्ट सम्मेलन में नाटो सहयोगियों ने सदस्यता हेतु यूक्रेन और जॉर्जिया की यूरो-अटलांटिक आकांक्षाओं का समर्थन किया था तथा इस बात पर सहमति व्यक्त जताई थी की ये देश नाटो के सदस्य बन जाएंगे। लेकिन  रूस ने अमेरिका के पूर्व की ओर नाटो क्षेत्र के विस्तार के विकल्प को खारिज कर दिया और नाटो की असल चुनौती यही से बढ़ गई। दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो का एक प्रमुख लक्ष्य साम्यवादी सोवियत संघ के कूटनीतिक,राजनीतिक और सामरिक प्रभाव  को सीमित  करना था जिसमें उसने सफलता भी पाई। लेकिन पिछले दो दशक में रूस में पुतिन के प्रभाव तथा चीन की आक्रामक सहायता कूटनीति  से वैश्विक परिदृश्य पूरी बदल गया है।


2008 में जॉर्जिया और यूक्रेन को अपने गठबंधन में शामिल करने के नाटो के इरादे की घोषणा के बाद रूस ने जॉर्जिया पर आक्रमण किया तथा उसके कई क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद 2014 में रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया। इस समय भी यूक्रेन रूस के हमलों के बाद तबाह होने की कगार पर है।


नाटो की हर किसी के लिए दरवाजे खुले रखने की नीति कमजोर हो चूकी है और वह यूक्रेन के मामलें में चाह कर भी कुछ न कर सका है। यूक्रेन नाटो में शामिल होने को लेकर एक तय समयसीमा और संभावना स्पष्ट करने की मांग करता रहा है।  जबकि नाटो रूस के दबाव के आगे बेबस हो गया और अब तो यूक्रेन के राष्ट्रपति जेंलेंसकी भी यह साफ कह चूके है कि नाटो रूस से डर गया।


नाटो और अमेरिका के खिलाफ रूस और चीन का रणनीतिक सहयोग खुले रूप से उभर कर सामने आ रहा है। इस साल  बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों के आयोजन का अमेरिका ने राजनयिक बहिष्कार किया था। वहीं रूस और अमेरिकी विरोधी देशों ने इसे अवसर की तरह लिया। अर्जेंटीना और इक्वाडोर के राष्ट्रपतियों ने अमेरिका के कूटनीतिक बहिष्कार को नज़रअंदाज़ कर शीतकालीन ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात की। यूक्रेन पर रूस के हमलों की आशंकाओं के बीच बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों के समापन हुआ। इसके बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। ऐसा लगता है कि चीन यूक्रेन हमलें से अपने आयोजन के प्रभावित होने को लेकर आशंकित था और इसीलिए रूस ने इस आयोजन के खत्म होने का इंतजार किया।


यूक्रेन को लेकर अमेरिकी और नाटो की नीति का असर दुनिया के कई क्षेत्रों में रणनीतिक रूप से पड़ सकता है। नाटो और अमेरिका के विरोध को नजरअंदाज कर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के पृथकतावादी विद्रोही इलाक़े दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र राज्य की मान्यता दे दी। रूस आधिकारिक से रूप  यहां दाख़िल  हो गया और आश्चर्य नहीं इसके रूस में विलय की जल्द घोषणा कर दी जाएं। ऐसा भी नहीं है कि पुतिन यूक्रेन तक ही सीमित रहेंगे। हो सकता है पुतिन आगे चलकर पोलैंड,बुल्गारिया और हंगरी में भी यूक्रेन जैसी ही सैन्य कार्रवाई कर सकते है। एशिया के कई देश यूक्रेन संकट में रूस का विरोध करने से बचे है और यह स्थिति अमेरिका और नाटो को असहज  करने वाली है। अफगानिस्तान में तालिबान का सत्ता में लौटना और नाटो सेनाओं द्वारा उसे अस्थिर छोड़ जाने से इस सैन्य संगठन की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है।


लातिन अमेरिकी की ब्राज़ील,चिली,अर्जेंटीना जैसी कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में चीन पहले ही द्विपक्षीय व्यापार में अमेरिका से आगे बढ़ चुका है। पेरू,वेनेज़ुएला,कोलंबिया,इक्वाडोर  जैसे देश चीन के प्रभाव में है। इन देशों का चीन से सहयोग बढने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में चीन का सैन्य खतरा अमेरिका और यूरोप के मुहाने पर होगा तथा रूस की भूमिका खतरनाक स्थिति पैदा कर सकती है। ताइवान को लेकर चीन की आक्रामक नीति को अभी तक अमेरिका रोकने में कामयाब रहा था लेकिन आने वाले समय में भी यह दबाव काम करें,इसकी संभावना कम हो गई है।


शक्ति संतुलन को लेकर कोई भी स्पष्ट विचार नहीं हो सकता क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र केवल ऐसे संतुलन में  विश्वास रखता है जो उसके पक्ष में हो और यहीं से दूसरे पक्ष में असंतुलन स्थापित हो जाता है। अभी तक नाटो और अमेरिका सैन्य संतुलन कायम करने के लिए दुनिया के किसी भी हिस्से पर सैन्य कार्रवाइयों को अंजाम देते रहे है। लेकिन यूक्रेन पर हमले के बाद रूस की परमाणु युद्द की धमकी के आगे नाटो बेबस नजर आया है। यूक्रेन में नाटो के रणनीतिक प्रतिकार से बचने की नीति से वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर असमंजस बढ़ गया है।


चीन और रूस को रोकने के लिए नाटो और अमेरिका  के सामने आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर कई चुनौतियां है। चीन का यूरोप और अमेरिका महाद्वीप में आर्थिक रूप से बढ़ता प्रभाव कैसे कम किया जाएं इसे लेकर कोई प्रभावी योजना नाटो के पास फ़िलहाल नहीं है,वहीं रूस के परमाणु हमलों से बचने का यूरोप के पास कोई सुरक्षा कवच भी फ़िलहाल नहीं है। यह पहले से कहीं आक्रामक,नई साम्यवादी,आर्थिक और सामरिक चुनौती है जिसका सामना करने का सामर्थ्य अमेरिका और नाटो के पास फ़िलहाल तो नहीं है।

 

कश्मीरी पंडितों के पलायन का अफगानिस्तान कनेक्शन kshmir pandit afganistan minorties peoples samachar

 

पीपुल्स समाचार

                                                                    

बेनजीर भुट्टों अपनी आत्मकथा 'द डॉटर ऑफ द ईस्ट' में लिखती हैं कि,मेरे पास 1990 में आईएसआई के दफ्तर से यह संदेश आया कि सऊदी अरब,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के एक लाख से ज्यादा मुजाहिदीन इस बात के लिये तैयार है की वह कश्मीर में घुसकर कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई में मदद करें। वह सारे बहादुर और प्रशिक्षित है और हिंदुस्तान की फौजों से बड़ी आसानी से लोहा ले सकते है। बेनजीर आगे लिखती है,यह जानते हुए कि इस तरह की हस्तक्षेप पूर्ण गतिविधि से कश्मीर के लोगों को नुकसान ही होगा,मैंने इस योजना पर अपना विरोध जता दिया। मैंने फौज और आईएसआई दोनों को आदेश दिया कि वह नियंत्रण रेखा पर फौजे तैनात करें और इस बात का ध्यान रखें कि कोई भी अफगानी मुजाहिदीन पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर में न दाखिल हो पाए।


बेनजीर भुट्टों अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उन्होंने पाकिस्तान में आतंक की पौद पर खुलकर चिंता जताई थी। दरअसल अफगानिस्तान में सोवियत सेना के विरुद्द लड़ चूके मुजाहिदीनों के कश्मीर में इस्तेमाल करने की व्यापक योजना जिया-उल-हक बहुत पहले तैयार कर चूके थे। 1980 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सीआईए के नेतृत्व में सोवियत संघ को अफगानिस्तान से बाहर निकालने का अभियान शुरू किया गया था। इस दौर में ही पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जिया-उल-हक ने भारत को तोड़ने के लिए एक रणनीतिक अभियान ऑपरेशन टोपैक शुरू किया था। वहीं साम्यवाद के खिलाफ सीआईए के अभियान में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सऊदी अरब को सक्रिय साझीदार बनाया गया था। तीनों ने मिलकर मुस्लिम देशों से स्वयंसेवकों का चयन,प्रशिक्षण और उन्हें हथियार देकर अफगानिस्तान भेजना शुरू किया। इसे जिहाद का नाम दिया गया और समूचे मुस्लिम संसार से कट्टरपंथी ताकतों को इस जिहाद में शामिल होने का आह्वान किया गया। यह जिहाद पूरे एक दशक तक चला और इस दौरान अमेरिका पूरी ताकत के साथ पाकिस्तान के पीछे खड़ा रहा। सोवियत रूस अंतत: इस युद्ध में टिक नहीं पाया और उसे 1989 में अफगानिस्तान छोडऩा पड़ा। अमेरिकी मदद से मुजाहिदीनों ने एक अजेय समझी जाने वाली महाशक्ति को करारी शिकस्त दे दी थी। इन आतंकियों को तैयार करने के लिए पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में व्यापक प्रशिक्षण केंद्र बनाएं गए थे। पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। इन्हीं केन्द्रों से हरकत-उल अंसार,हरकत उल मुजाहिदीन,हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन निकले जिन्होंने कश्मीर में आतंक का जाल बिछाया था।


पाकिस्तान की ऑपरेशन टोपैक की छाया युद्द की योजना के अनुसार कट्टरपंथी मौलवियों को कश्मीर घाटी में भेज कर बहुसंख्यक मुसलमानों को भड़काया गया। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में हमला करने वाले अधिकांश आतंकी विदेशी ही होते थे। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने वाले कई आतंकियों को कश्मीर में भेजा। इन आतंकियों ने भारतीय सेना,पुलिस अधिकारी,प्रशासन के लोग और कश्मीरी पंडितों पर व्यापक हमले किए थे। पाकिस्तान की शह पर भारत समर्थित लोगों पर हिंसक हमले किए गए और उनकी हत्याएं की गई।  


कश्मीरी पंडितों के पलायन की योजना अफगानिस्तान-सोवियत संघ युद्द के बाद की परिस्थितियों का फायदा लेने के लिए पाकिस्तान ने तैयार की थी।  इस दौरान अफगानिस्तान में रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों पर भी बेतहाशा अत्याचार किए गए। इसमें अफगानिस्तान के मुजाहिदीनों का पाकिस्तान ने भरपूर उपयोग किया।


हिन्दू सिख अल्पसंख्यकों में से अधिकांश काबुल, ग़ज़नी, हेलमंद, ख़ोस्त और नंगरहार सूबों में रहते थे। पाकिस्तान के इशारे पर जिस प्रकार  कश्मीर में पंडितों को निशाना बनाया उसी प्रकार तालिबान ने अफगानिस्तान में रह रहे हिंदू और सिखों को जानबूझ कर निशाना बनाया। 90 के दशक की शुरुआत तक अफगानिस्तान में दो लाख से ज्यादा हिंदू और सिख थे। अब यहां इनकी संख्या एक से दो हजार ही रह गई है। 90 के दशक में तालिबान के शासन में इस देश की व्यवस्था अंधकार युग में जाना प्रारम्भ हुई,जब यहां कड़े इस्लामिक कानून लागू किए गए


हिंदू और सिखों को पीले रंग वाले कपड़े होते थे ताकि लोगों के बीच उनकी पहचान हो सकेउनकी जमीन प्रभावशाली लोगों ने छीन ली और यहीं से अल्पसंख्यकों का जीवन नारकीय बनना शुरू हो गया1999 में भारतीय विमान का अपहरण और उसके बाद आतंकियों को अफगानिस्तान की जमीन पर सुरक्षित छोड़ा जाना तालिबान और कश्मीर के आतंकवादियों के मजबूत गठजोड़ के कारण ही संभव हुआ था शीत युद्द के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ की परम्परागत शत्रुता से अफगनिस्तान में आतंकवाद फला फूला और बाद में पाकिस्तान के षड्यंत्र के कारण यह कश्मीर और आफ्गानिस्तान के अल्पसंख्यकों के लिए भी नासूर बन गया।

तकरीबन ढाई सौ साल पहले अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर तक महाराजा रणजीत सिंह का शासन था। एक बार की बात है कि महाराजा रणजीतसिंह ने एक कुरान को महंगे दाम देकर खरीदा और उसे श्रद्धापूर्वक चूमा तो उनके विश्वसनीय सलाहकार फकीर अजीजुद्दीन ने कहा कि महाराज आप जो ऊँचे दामों में खरीद रहे है उसका आपके लिए कोई उपयोग नहीं है।  इस पर रणजीतसिंह बोले की, ईश्वर ने मुझे सिर्फ एक आँख ही इसीलिए दी है कि मै सभी को समान नजरों से देख सकूँ। पाकिस्तान ने ऑपरेशन टोपैक की नीति से भारतीय उपमहाद्वीप की उस विविधता पर ही करारी चोट की जिससे कश्मीरी पंडित कराह रहे है

 

brahmadeep alune

इस्लामिक देशों में महिलाओं पर अत्याचार,स्वदेश islamic woman swdesh

    स्वदेश                       पाकिस्तान की मदरसा शिक्षा का प्रभाव                                                                    ...