लोकतान्त्रिक नेहरु ने जब हिटलर और मुसोलिनी से मिलने से इंकार किया,nehru,musolini,hitlar

 

सुबह सवेरे




अंग्रेजों की कड़ी प्रतिद्वंदिता और गुलामी के दंश को लंबे समय तक झेलने के बाद भी लोकतंत्र के प्रति सम्मान का जो जज्बा भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने दिखाया था उसकी कोई और मिसाल नहीं हो सकतीआजादी के बाद जो मंत्रिमंडल बनी उसमें पंडित नेहरू  स्वयम को प्रधानमंत्री के रुप में भी मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों के बराबर समझते हुए कभी किसी अन्य मंत्री के कामों में दखल नहीं देते थे। एक बार सरदार पटेल ने उन्हें खासतौर पर कहा था कि आप अन्य मंत्रियों के कार्यों में दखल दे सकते है।


लोकतान्त्रिक मूल्यों को लेकर उनके इस आग्रह की प्रशंसा अटलबिहारी वाजपेयी ने भी की थी। अटलबिहारी वाजपेयी संसद में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले इकलौते सदस्य थे लेकिन इसके भी पंडित नेहरु उनका गहरा सम्मान करने थे। एक  बार तो अटलबिहारी वाजपेयी ने पंडित नेहरु पर हमला करते हुए कहा था कि, आपका मिला जुला व्यक्तित्व है। आप में चर्चिल भी हैं और चैंबरलेन भी है। लेकिन पंडित नेहरु इस पर नाराज नहीं हुए बल्कि शाम को किसी बैंक्वेट में जब बे अटलजी से मिले तो उनका उत्साहवर्धन करते हुए बोले कि  आज तो बड़ा जोरदार भाषण दिया आपने।

पंडित नेहरु देश में लोकतंत्र मजबूत रहे,इसका प्रयास निरंतर करते रहे। उन्होंने वैचारिक मतभेद के बाद भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ.आम्बेडकर को अपनी अंतरिम सरकार में मंत्री बनाया था। उनकी बेटी इंदिरा गांधी अपनी पिता की सहयोगी रही लेकिन उन्हें संसद में ले जाने का कोई भी कार्य पंडित नेहरु ने कभी नहीं किया।1964 में नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को राज्यसभा भेजा था। इस तरह वे पहली बार सांसद नेहरू की मौत के बाद बन सकी थी।जबकि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद पंडित नेहरु ने उनके परिवार की ओर विशेष ध्यान दिया। एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल के बेटे और बेटी, दोनों ही एक साथ लोकसभा और फिर राज्यसभा  सांसद रहे थे।

नेहरु स्वतंत्रता के पहले से ही लोकतांत्रिक सिध्दांतों को लेकर इतने सजग थे कि उनकी नीतियों में किसी आज़ाद मुल्क की दृढ नीतियों झलक मिलती थी। वे सोवियत संघ के मॉडल को तो बहुत पसंद करते थे लेकिन उन्होंने साम्यवाद को स्वीकार करने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि वे साम्यवाद को लोकतंत्र के अनुकूल नहीं समझते थे। नेहरु के विचार में नफरत और हिंसा से भरी कोई भी विचारधारा भारत को स्वीकार नहीं हो सकती इसीलिए उन्होंने समाजवाद के मॉडल को अपनाया। साम्यवाद के अपरिवर्तनशील ढांचे को उन्होंने अस्वीकार कर दिया। नेहरु के विचार में जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक पक्ष के प्रति साम्यवाद की घृणा उद्देलित करती है।नेहरु ने भारत की प्रगति के लिए समाजवाद का धीमा लेकिन प्रगतिशील मार्ग चुना। वे जानते थे की भारत जैसे पिछड़े राष्ट्र में सामाजिक संगठन का वास्तविक समाजवादी आधार धीरे धीरे ही आ सकता है।


इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने 1936 में अपने देश में जवाहरलाल नेहरु को आमंत्रित कियागुलाम भारत के उस दौर में भी नेहरु लोकतांत्रिक,मानवीय और वैश्विक सरोकारों को लेकर पूरी दुनिया में पहचाने जाने लगे थे नेहरु ने तत्कालीन समय की महाशक्ति के आमन्त्रण को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया की वह उस देश में जाना बिलकुल नहीं पसंद करेंगे जहां तानाशाही हो और लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया हो मुसोलिनी इटली को अपनी सल्तनत मान कर उसपर निरंकुश शासन करने लगा था,उसने अपने विरोधियों को बुरी तरह कुचलने के लिए कड़े कानून बनाए और अनेक लोगों को मार डाला था। नेहरु को मुसोलिनी की क्रूर नीतियाँ कभी स्वीकार नहीं की।

1938 में नेहरु के साथ एक बार फिर दिलचस्प घटना घटीजर्मनी की नाजी सरकार ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित कियाइस आमन्त्रण पत्र में साफ लिखा गया था की जर्मनी की नाजी सरकार उनके नात्सी मत के खिलाफ विचारों को जानती है फिर भी सरकार चाहती है कि नेहरु उनके देश में आकर हालात को देखे नेहरु ने एक बार तानाशाही शासन के देश जर्मनी के निमंत्रण को पूरी विनम्रता के साथ अस्वीकार कर दियायहीं नहीं नेहरु ने एक बड़े कार्यक्रम में हिटलर और मुसोलिनी की नीतियों का कड़ा विरोध करने से भी गुरेज नहीं किया


नेहरु का सोचना था की कोई भी राष्ट्र कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो वह अपने नागरिकों को साधन नहीं समझ सकता और न ही उस तरीके से व्यवहार कर सकता है वे लोकतंत्र को सर्वोपरी संस्था स्थापित करने  के लिए जीवन भर कृतसंकल्पित रहे जमींदारी उन्मूलन को लेकर न्यायालयीन हस्तक्षेप की आशंका को उन्होंने ख़ारिज कर दिया थानेहरु ने संविधान सभा के सामने कहा था कि” सीमाओं के अंतर्गत कोई  न्यायाधीश और न उच्चतम न्यायालय अपने को एक तीसरा सदन नही बना सकता है कोई भी उच्चतम न्यायालय और कोई भी न्यायपालिका निर्णय में समस्त समाज की आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करने वाली संसदीय सार्वभौम इच्छा से ऊपर नहीं हो सकती नेहरु की दृष्टि में भारतीय संसद ही अंततः संतुलन सत्ता थी

पंडित नेहरु संसद में बैठकर विपक्षी सदस्यों को पूरी गंभीरता से सुना करते थे। एक बार ऐसा भी आया जब बहुमत की सत्ता की शक्ति को नजरअंदाज कर उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों के विरोध के बावजूद 1963 में अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष की ओर से लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना मंज़ूर किया और उसमें भाग भी लिया।


इस साल एक कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने में पंडित नेहरु के योगदान की सराहना करते हुए उनके योगदान को बहुमूल्य बताया था। लोकतंत्र का चौथा और मजबूत स्तम्भ मीडिया को माना जाता है और पंडित नेहरु इसे पारदर्शी रखने के प्रतिबद्ध रहे। वे कहते थे कि मीडिया पर अंकुश लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है।आज़ादी के कुछ सालों बाद जब नेहरु चर्चिल से मिले और चर्चिल ने उनसे पूछा कि इतना सब कुछ सहने के बाद भी आप हमसे घृणा क्यों नहीं करते। जवाब में नेहरु ने कहा कि हम इसलिए आपसे घृणा नहीं करते  क्योंकि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है और मैं  एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के प्रधानमंत्री के रूप में आपके सामने हूँ।

 

कट्टरपंथियों से घिरे इमरान,pak imran janstta

जनसत्ता



                                                                   

धार्मिक अराजकतावाद के समर्थक उदार और बहुल राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्द होते है तथा वे वैधानिक सरकार को अनावश्यक और अवांछनीय मानकर उसे उखाड़ फेंकना चाहते है।वहीं पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में धार्मिक,कट्टरपंथी और रुढ़िवादी संगठनों से बिल्कुल परहेज नहीं किया जाता और ये देश में अपरिहार्य बना दिए गये है।यहां  अराजकतावाद को स्वीकार किया जाता है,इसे मजबूत किया जाता है और राजनीतिक दलों के द्वारा सत्ता पाने के लिए हथियार की तरह आजमाया भी जाता है।


दरअसल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने देश के एक प्रतिबंधित धार्मिक और राजनीतिक संगठन तहरीक-ए-लब्बैक के हिंसक आंदोलन से निपटने के लिए माफ़ी और रिहाई का राजनीतिक दांव खेला है।  बीते कई दशकों से पाकिस्तान की विभिन्न राजनीतिक  सत्ताएं  कानून और संवैधानिक नियमों को दरकिनार कर कट्टरपंथी ताकतों की धार्मिक मांगों पर सहमति के संकेत देती रही है। यह स्थिति कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करती है और वे दबाव समूह की तरह सत्ता से व्यवहार करने लगते है। यह भी देखने में आया है कि पाकिस्तान में सेना,आईएसआई,धार्मिक,आतंकी और राजनीतिक संगठनों में बड़ी जुगलबंदी रही है और यह सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता के बेहद करीब भी होते है। इस्लामिक आंदोलन के रूप में तहरीक-ए-लब्बैक का गठन 1 अगस्त 2015 को कराची में हुआ था। कट्टरपंथी प्रदर्शनों और धार्मिक मांगों को लेकर यह पाकिस्तान में बेहद प्रभावशाली धार्मिक और राजनीतिक संगठन के रूप में तेजी से अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहा है जो रसूल अल्लाह इस्लामिक संगठन के नाम से भी पहचाना जाता है। यह देश में शरिया कानून की स्थापना की मांग कर रहा है तथा फ्रांस से पाकिस्तान के राजनयिक सम्बन्ध समाप्त करने की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन भी करता रहा है। गौरतलब है कि फ्रांस की सरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी की मुखर समर्थक रही है वहीं दुनिया के कई इस्लामिक देश इसे ईशनिंदा की तरह देखते है। फ़्रांस की सरकार ने अपने देश में आतंकी हमलों को  रोकने के लिए मुस्लिमों पर कई प्रतिबंध लगाएं है और इसका पाकिस्तान में इसका इस्लामिक धार्मिक संगठन कड़ा विरोध करते रहे है।


इमरान खान सार्वजनिक रूप से यह कह चूके है कि फ़्रांस के राजदूत को वापस भेजने जैसे किसी कदम से पाकिस्तान और फ़्रांस के सम्बन्ध खराब हो सकते है तथा इससे पाकिस्तान का आर्थिक संकट गहरा सकता है। वहीं यूरोपियन यूनियन का साफ कहना है कि पाकिस्तान  वैदेशिक संस्थानों की सुरक्षा के सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का पालन करना सुनिश्चित करें।पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है,उसकी मुद्रा एशिया के देशों में सबसे निम्नतम स्तर पर है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान वैश्विक समुदाय से सहायता लेकर देश को आर्थिक संकट से उबारना चाहते है। पाकिस्तान विदेशी मदद पर अपनी आर्थिक स्थिति के लिए बहुत हद तक निर्भर है।  पाकिस्तान का आयात बिल भी लगातार बढ़ रहा है इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार भी ख़ाली होता जा रहा है।  पाकिस्तान अब तक किसी तरह से भुगतान संतुलन के संकट से बचा हुआ है। 


पाकिस्‍तान पर 30 दिसंबर 2020 तक कुल 294 अरब डॉलर का कर्ज था जो उसकी कुल जीडीपी का 109 प्रतिशत है। सऊदी अरब से हालिया कर्ज के बाद पाकिस्तान आने वाले समय में अभूतपूर्व संकट में फंसता दिखाई दे रहा है। इस समय पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से छह अरब डॉलर का पैकेज हासिल करने में लगा है।पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए यह बेहद अहम पैकेज है।


इमरान खान के लिए पाकिस्तान को आतंकवादियों के हिमायती देशों की सूची से बाहर निकालने की चुनौती बरकरार है।फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट में बने रहना देश की अर्थव्यवस्था को तोड़ने वाला है। इससे पाकिस्तान को हर साल करीब 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है। इमरान खान को डर सता रहा है की एफएटीएफ़ पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करता है तो पहले से ही लचर चल रही अर्थव्यवस्था पर ख़तरा और बढ़ जाएगा,क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मदद नहीं मिल पाएगी।


वहीं आर्थिक संकट और कट्टरपंथी ताकतों के हिंसक प्रदर्शनों के बीच इमरान खान का राजनीतिक व्यवहार बेहद लचर नजर आता है। यह किसी से छूपा नहीं है कि इमरान खान ने सत्ता की सीढियां जिस तेजी से चढ़ी है उसमें उनकी कट्टरपंथी संगठनों से सम्बन्धों और उनकी हिमायत की अहम भूमिका रही है।इमरान खान ने वैश्विक दबाव के बाद भी हाफिज सईद जैसे आतंकियों की आलोचना करने से परहेज ही किया है।संयुक्त राष्ट्र की तरफ से अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित हाफिज सईद को लेकर पाकिस्तान की भूमिका संशय बढ़ाती रही है।उसे कई बार गिरफ्तार किया गया और गुपचुप रिहा भी कर दिया गया।2020 में आतंकी फंडिंग के जुर्म में उसे 10 साल 6 महीने कैद की सजा हुई थी। वहीं पाकिस्तान की एक ऐंटी-टेरर कोर्ट ने मुंबई हमलों के इस मास्टमाइंड को दो और मामलों में 10 साल कैद की सजा सुनाई थी। लेकिन इन सबके बाद भी हाफिज सईद  के सावर्जनिक जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है। उसे देश में अतिविशिष्ट सुविधाएं हासिल है और सुरक्षा घेरा भी दिया गया है।जबकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 के तहत और अमेरिका के वित्त विभाग ने सईद को विशेष रूप से वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था।


इमरान खान,बेनजीर भुट्टों की हत्या के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान के प्रति उदार व्यवहार के लिए भी अपने खुद के देश में आलोचना झेलते रहे है। यह आतंकी संगठन पाकिस्तान में शरिया पर आधारित एक कट्टरपंथी इस्लामी शासन कायम करना है।पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर मौजूद इलाक़ों में टीटीपी का ख़ासा प्रभाव है।तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पर पाकिस्तान में चरमपंथ की कई घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है। इस साल अगस्त में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद अफगानिस्तान -पाकिस्तान सरहदी इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान का प्रभाव और ज्यादा बढ़ गया है। कुछ दिनों पहले इमरान खान ने तहरीक-ए-तालिबान से कडाई से निपटने की अपेक्षा यह अपील की थी कि टीटीपी से जुड़े ये लोग अपने हथियार डाल देंगे तो उन्हें माफ़ कर दिया जाएगा और वो आम लोगों की तरह जीवन बिता सकेंगे।तहरीक-ए-तालिबान ने 16 दिसंबर 2014  में पेशावर में स्थित आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला किया था।इस हमलें में 134 छात्रों सहित 143 लोग मारे गए थे। इसके बाद जब इमरान खान इस  स्कूल में पहुंचे थे तब आतंकियों से इसी प्रेम के कारण हमले में मरने वाले बच्चों के परिजनों ने उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया।स्कूल के बाहर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने इमरान ख़ान का कड़ा विरोध किया और 'गो इमरान गो' के नारे लगाए थे।


2018 में पाकिस्तान की सर्वोच्च सत्ता हासिल करने के बाद इमरान खान से अपेक्षा की गई थी कि वे देश को कट्टरपंथी ताकतों से उबार कर एक कामयाब देश के रूप में स्थापित करेंगे। लेकिन उनकी नीतियां पाकिस्तान को गर्त में धकेलने वाली साबित हुई है।भारत पर आतंकी हमलों को रोकने में नाकामी के चलते वह अपने पड़ोसी देश से सामान्य सम्बन्ध बनाने में भी असफल रहे। चीन पर निर्भरता उनके देश के लिए घातक बनती जा रही है।पाकिस्तान में ग्वादर और चीन के समझौते को लेकर कहा जा रहा है कि पाकिस्तान चीन का आर्थिक उपनिवेश बन रहा है। ग्वादर में पैसे के निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर 40 सालों का समझौता है। चीन का इसके राजस्व पर 91 फ़ीसदी अधिकार होगा और ग्वादर अथॉरिटी पोर्ट को महज 9 फ़ीसदी मिलेगा। इससे साफ है कि  पाकिस्तान का अगले चार दशकों तक  ग्वादर पर नियंत्रण नहीं रहेगा।  चीन ने पाकिस्तान को उच्च ब्याज़ दर पर कर्ज़ दिया है। पाकिस्तान कि खस्ताहाल आर्थिक स्थिति से यह बल मिला है कि पाकिस्तान पर आने वाले वक़्त में चीनी कर्ज़ का बोझ और बढ़ेगा।सऊदी अरब ने एक बार फिर से पाकिस्तान की मदद की है। सऊदी ने पाकिस्तान को 4.2 अरब डॉलर की मदद देने की घोषणा की है।  सऊदी अरब इस क़र्ज़ पर 3.2 फीसदी का ब्याज लेगा। दो साल पहले भी पाकिस्तान को आर्थिक संकट से बचाने के लिए चीन,सऊदी अरब और यूएई ने छह अरब डॉलर का क़र्ज़  दिया था।अफगानिस्तान में तालिबान के लौटने से दुनियाभर में पाकिस्तान की खूब आलोचना हुई है। अफगानिस्तान के नागरिकों में रैलियां निकालकर पाकिस्तान विरोधी नारे लगाएंहै।चीन पाकिस्तान की मदद करके उसे भारत के खिलाफ उपयोग करता रहा है वहीं सऊदी अरब आर्थिक मदद के बदले पाकिस्तान पर सैन्य और अन्य  तरीकों से ईरान विरोध मुखर करने को लेकर दबाव बढ़ा सकता है।


2018 में अमरीकी के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को धोखेबाज़ और झूठा करार दिया था।उन्होंने कहा कि पिछले 15 सालों में पाकिस्तान को अरबों डॉलर की सहायता दी गई और ये मूर्खतापूर्ण फैसला था। उन्होंने हम अफ़ग़ानिस्तान के आतंकवादियों को पनाह देने को लेकर पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की थी। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बाइडेन भी  पाकिस्तान के इरादों को लेकर संशय जताते रहे है।


इमरान खान को अपने देश की वैश्विक छवि को बेहतर करने के लिए और देश को कर्ज से बचाने के लिए पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों को काबू में करना होगा,लेकिन उनमें ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती।आतंकवादियों की फंडिंग को लेकर पाकिस्तान पर फाइनैंशल ऐक्शन टास्क फोर्स के प्रतिबंधों से बचने और मुक्ति पाने के लिए पाकिस्तान में 78 संगठनों पर पाबंदी लगाई गई है। लेकिन इस सूची में शामिल संगठनों के न तो तमाम राजनीतिक कार्यालय सीलकिए गए है और न ही इनके चंदा इकट्ठा करने को लेकर कोई प्रतिबंध जमीन पर दिखाई देता है।


आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के कर्ज और जीडीपी का अनुपात 2023 के अंत तक 220 फीसदी से ज्यादा तक हो सकता है।इसका मतलब साफ है कि पहले से ही बदहाल पाकिस्तान के अभूतपूर्व आर्थिक संकट में फंसने की आशंका बढ़ती जा रही है।2023 में इमरान खान सरकार के पांच साल पूरे हो जायेंगे।  इमरान खान की अदूरदर्शिता,खराब व्यवस्थाओं और आतंकियों के प्रति लचर नीति से बेकाबू आर्थिक संकट देश में राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा दे सकता है।जाहिर है इससे संवैधानिक व्यवस्थाएं ठप्प होगी और कट्टरपंथी ताकतें ज्यादा मजबूत होगी।आईएसआईएस,जैश-ए-मोहम्मद,हिजबुल मुजाहिदीन,तालिबान  और अलकायदा जैसे वैश्विक  आतंकी संगठन पाकिस्तान में पहले ही मजबूत  है,ये बेकाबू होकर वैश्विक सुरक्षा संकट बढ़ा सकते है।

दीपावली दुनियाभर में,पॉलिटिक्स

 पॉलिटिक्स

                     


 

दीपकों के दिव्य आलोक से उल्लासित दीपावली का उत्सव भारतीय सभ्यता और संस्कृति का गौरवशाली इतिहास समेटे है। यह प्रारम्भ कब हुआ,इसे लेकर विभिन्न मत रहे है लेकिन यह विश्वास किया जाता है कि भगवान राम की चौदह साल के बनवास के बाद अयोध्या वापसी की याद में इसे मनाया जाता है। तभी से हर कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है।


राम अनादी अनंत से इस पावन भूमि के पालनकर्ता है और उनके आदर्शों को सहेजने में कई साम्राज्यों का योगदान रहा है।  भारत में कई साम्राज्य आएं और खत्म हो गए लेकिन दीपावली का उत्सव निरंतर जारी रहा। औरंगज़ेब के  जमाने में रामायण फारसी में पद्म अनुवाद के रूप में सामने आई। शाहजहाँ के समय 'रामायण फौजी' के नाम से गद्यानुवाद हुआ। तर्जुमा-ए-रामायण भी इसी दौर में नायाब रूप में सामने आई। अकबर ने तो बाकायदा राम सिया के नाम पर एक सिक्का जारी किया था। चांदी का इस सिक्के पर राम और सीता की तस्वीरें उकेरी गई थीं और दूसरी तरफ कलमा खुदा हुआ था।


मुगलकाल में दीपावली को भी खूब मनाया जाता था। मुगल बादशाह दिवाली के जश्न की शुरुआत आगरा से  किया करते थे और रोशनी के इस त्योहार को बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया था। सिख समुदाय के लोगों के लिए दीपावली का दिन बेहद खास है। यह वह दिन है, जब मुगल सम्राट जहाँगीर ने ग्वालियर किले की जेल से 52 हिंदू राजकुमारों के साथ-साथ छठे सिख गुरु हरगोबिन्द सिंहजी को भी आजाद कर दिया था। इस दिन को यादगार बनाने के लिए 1577 में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी गई थी। पूरे विश्व के और भारत के सिखों द्वारा बंदी छोड़ दिवस का उत्सव पूरे दिन स्वर्ण मंदिर में प्रार्थना के साथ मनाया जाता है।


दीपावली के पर्व का भारतीय सभ्यता पर प्रभाव सभी धर्मों में दिखाई पड़ता है। बौद्ध धर्म के लिए यह दिन शांति और उल्लास का प्रतीक है। इस दिन सम्राट अशोक ने कलिंग के खूनी युद्ध के बाद, हिंसा का त्याग किया था और बौद्ध धर्म को अपनाते हुए, शांति और ज्ञान को प्राप्त करने वाले मार्ग का अनुसरण किया था।  म्यांमार में मान्यता प्रचलित है कि भगवान बुद्ध ने ज्ञान का प्रकाश पाने के बाद इसी दिन भूमि पर अवतरण किया था। प्रत्येक घर को इस दिन रोशनी से खूब सजाया जाता है और लोग इस दिन नए वस्त्र पहनना शुभ मानते हैं। इस दिन मंदिरों में भक्तों की बड़ी भीड़ होती है।


जैन धर्म के अनुयायी इस दिन को, अपने भगवान महावीर के निर्वाण के प्राप्ति का प्रतीक मानते हैं। महावीर स्वामी जी के द्वारा मृत्यु लोक को छोड़ने पर उनके शिष्यों ने दीपक जलाकर खुशियाँ प्रकट की थी। बस उसी याद में जैन धर्म के लोग दिवाली को मुख्य रूप से मनाते हैं। दुनिया भर में जैन समुदाय के लोग इस दिन प्रार्थनाओं के साथ-साथ उत्सव का आयोजन करते हैं।


दुनिया के विभिन्न देशों में दीपावली का उल्लास अलग अलग रंगों में नजर आता है। कनाडा में दीपावली पर भारत की ही तरह दीपकों की रोशनी की जाती है और खूब आतिशबाज़ी की जाती है। ब्रिटेन में भारतीय बहुत संख्या में रहते है और उनका यहां पर खूब प्रभाव है,वहां रहने वाला भारतीयों के साथ पाकिस्तान के लोग भी इस आयोजन में शामिल होते है। लोग दिवाली पर दीये जलाने और आतिशबाजी का आनंद लेते हैं।


श्रीलंका में दीपावली का बहुत महत्व है और भारत की तरह ही यह देश भी रौशनी से नहा लेता है। यहां  पहले दीये जलाकर सब रोशनी करते हैं और फिर एक साथ मिलकर खाना खाते हैं । दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम राष्ट्र इंडोनेशिया में रामायणकालीन परम्पराओं का पालन अब भी किया जाता है। वहां रामायण के पात्रों को लोग जीते है और इसका प्रभाव इस इस्लामिक देश की संस्कृति में भी परिलक्षित होता है। इंडोनेशिया में रामलीला का मंचन बहुत प्रसिद्ध है जिसे भव्य तरीके से दिखाया जाता है। एक बार पाकिस्तान के कुछ चोटी के नेता इंडोनेशिया की यात्रा पर गए तो उन्हें भी दीपावली पर रामलीला का मंचन दिखाया गया। इस पर पाकिस्तान के एक नेता ने इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णों से पूछा कि एक इस्लामिक देश में रामलीला का क्या काम। इस पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपिता समझे जाने वाले सुकर्णो ने दिलचस्प जवाब दिया की इस्लाम हमारा धर्म है और रामायण हमारी संस्कृति।


2017 में इंडोनेशिया के कलाकारों को अयोध्या में दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में हिंदुओं की आबादी  महज दो फीसदी है। लेकिन राम और शिव यहां की संस्कृति में रचे-बसे हुए हैं। यहां हर तीज-त्योहार वैसे ही मनते हैं, जैसे भारत में मनाए जाते हैं। बाली,सुमात्रा और सुलावेसी, पश्चिम पापुआ में दीपावली प्रमुख पर्व है। दीपावली के लिए अनुष्ठान 30 दिन पहले शुरू हो जाते हैं। लोग 30 दिनों तक व्रत रखते हैं। यहां कुछ जगहों पर दीपावली अधर्म पर धर्म की जीत के तौर पर मनाया जाता है।


थाईलैंड में दीपावली खास अंदाज में मनाई जाती। इस दिन स्थानीय निवासी केले के पत्तों के छोटे-छोटे खंड बनाकर जल में प्रवाहित करते हैं। प्रत्येक खंड में एक जलती हुई बाती, एक मुद्रा तथा धूप होती है। इसके अलावा वे लोग अपने घरों को प्रकाश से सजाते हैं।


मलेशिया में दीपावली को हरि दिवाली के तौर पर जाना जाता है। इस दिन लोग तेल और पानी से स्नान करते हैं और फिर देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। इतना ही नहीं भारत की ही तरह मलेशिया में भी दीपावली के मेले लगाए जाते हैं। मलेशिया में प्रकाश पर्व राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। वहां के लोग इस त्योहार को बिल्कुल भारतीय रीति रिवाजों से बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है। इस मौके पर मलेशिया के लोग आतिशबाजी में काफी रुचि दिखाते हैं। खाड़ी देशों मेंबड़ी संख्या में भारतीय रहते है। दुबई में आतिशबाजी व सजावट होती है। यहां दीपावली पर सबसे ऊंची आतिशबाजी होती है,जिसे देखने काफी संख्या में पर्यटक आते हैं।


दीपावली हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। अत: भारत के लोग दुनिया में जहां भी रहे,उनके लिए दीपावली सबसे बड़ा त्यौहार होता है।

 

धन की सत्ता,पॉलिटिक्स dhan ki stta poitics

 

पॉलिटिक्स






                             

                                                              

लोकतंत्र के बुनियादी सवाल लोक कल्याण से जुड़े है लेकिन भारत का लोकतंत्र नेता कल्याण के आसपास घूमता रहा है। लोकतंत्र में जनता का मन महत्वपूर्ण है लेकिन भारत में नेता का धन महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र समानता की बात करता है लेकिन भारत के धन कुबेर इस समानता को कूड़े दान में फेंकते नजर आते है।  लोकतंत्र का अर्थ सेवा से है लेकिन भारतीय लोकतंत्र में सारा मेवा नेताओं के पास है। दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब भारत में रहते है लेकिन सबसे अमीर नेता आपको भारत में मिल जायेंगे।  समाजवादी भारत जनकल्याण की दुहाई देता रहा और इस बीच नेता कल्याण और उनका उत्थान आश्चर्यचकित करता रहा है।


इस दिवाली भारत के राजनेताओं और राजनीतिक दलों की अकूत सम्पत्ति पर पाठकों के लिए हमारी खास रिपोर्ट। दरअसल जनता महंगाई,भ्रष्टाचार,बेरोजगारी से बेहाल है,कई बैंक  कंगाल है वहीं हमारे लोकतंत्र के कथित पहरुएं  मालामाल है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एक ख्यात और विश्वसनीय गैर सरकारी संगठन है  जो चुनावी और राजनीतिक सुधारों के क्षेत्र में लगातार काम कर रहा है। नेशनल इलेक्शन वॉच के साथ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स भारतीय राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने और चुनावों में धन और बाहुबल के प्रभाव को कम करने का प्रयास कर रहा है। इनकी ताजा रिपोर्ट राजनीतिक दलों की नमी और बेनामी सम्पत्ति को सामने लाई है। हमारे राजनीतिक दलों के पास कितनी सम्पत्ति है,उसका ब्यौरा इस संगठन के अनुसार इस प्रकार है...


बेनामी सम्पत्ति

एडीआर के अनुसार राष्ट्रीय दलों ने 2019-20 में अज्ञात स्रोतों से 3,370 करोड़ रुपये से अधिक का संग्रह किया है- 
वित्तीय वर्ष 2019-20 के दौरान,भाजपा ने अज्ञात स्रोतों से 2,642.63 करोड़ रुपये की आय घोषित की,जो अज्ञात स्रोतों से राष्ट्रीय दलों की कुल आय का 78.24 प्रतिशत (3,377.41 करोड़ रुपये) है। वहीं कांग्रेस ने अज्ञात स्रोतों से 526 करोड़ रुपये की आय घोषित की,जो अज्ञात स्रोतों से राष्ट्रीय दलों की कुल आय का 15.57 प्रतिशत है।

 

नामी सम्पत्ति

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के विश्लेषण के अनुसार देश के 48 राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की संयुक्त संपत्ति 7,372 करोड़ रुपये से अधिक है। एडीआर रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान 7 राष्ट्रीय और 41 क्षेत्रीय दलों द्वारा घोषित कुल संपत्ति क्रमशः 5349.25 करोड़ रुपये और 2023.71 करोड़ रुपये थी।

 

सम्पत्ति के मालिक

राष्ट्रीय दल

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी 2900 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति के साथ शीर्ष पर है। यह कल सम्पत्ति का 54.29 फीसदी है राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस ने 928.84 करोड़ रुपये सम्पत्ति घोषित की है यह कुल सम्पत्ति का 17.36 फीसदी है। जबकि बसपा 738 करोड़ की सम्पत्ति बताती है और यह कुल सम्पत्ति की 13.80 फीसदी है।

 

क्षेत्रीय दल

क्षेत्रीय दलों में, समाजवादी पार्टी द्वारा सबसे अधिक संपत्ति 572.21 करोड़ रुपये की सम्पत्ति,बीजद ने 232.27 करोड़ रुपये और अन्नाद्रमुक ने 206.75 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी। सबसे कम पूंजी सीपीआई ने 24.87 करोड़ रुपये और राकांपा ने 31.05 करोड़ रुपये घोषित की थी।

चुनाव अधिकारों से संबंधित इस समूह की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए 42 क्षेत्रीय दलों की कुल आय 877.957 करोड़ रुपये थी। रिपोर्ट के अनुसार, टीआरएस ने सबसे अधिक 130.46 करोड़ रुपये की कमाई की है,जो उन सभी दलों की कुल आय का 14.86 प्रतिशत है, जिनकी आय का विश्लेषण किया गया था। इस रिपोर्ट में विश्लेषण किए गए 42 क्षेत्रीय दलों की कुल आय में शिवसेना की आय 111.403 करोड़ रुपये और वाईएसआर-सी की 92.739 करोड़ रुपये थी, जो क्रमश: 12.69 फीसदी  और 10.56  फीसदी है।

 

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल दलों की असल सम्पत्ति पर फिर भी संशय 

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल आईसीएआई के दिशानिर्देशों का पालन करने में विफल रहे हैं,जो पार्टियों को वित्तीय संस्थानों, बैंकों या एजेंसियों के विवरण घोषित करने के लिए निर्देशित करते हैं और जिनसे ऋण लिया गया था।

 

 


मोदी काल में बीजेपी बन गई सबसे अमीर राजनीतिक पार्टी

सम्पत्ति के मामलें में कभी शीर्ष पर रहने वाली कांग्रेस पिछड़ गई और बीजेपी ने 2014-15 में पार्टी के सत्ता में आने के बाद निर्णायक बढ़त बना लीबीजेपी ने 2004-05 में तक़रीबन 123 करोड़ की संपत्ति ज़ाहिर की थी जो अब उससे कई सौ गुना अधिक है  2004-05 से 15-16 के बीच बीजेपी की संपत्ति में 627 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है

 

ये सिर्फ़ घोषित संपत्ति के आंकड़े हैंइससे किसी पार्टी की कुल संपत्ति का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता


आम आदमी के मुकाबले 1400 गुना रुपया आपके सांसद की जेब में है

इंडिया टुडे की डाटा इंटेलिजेंस यूनिट की एक खास रपट के मुताबिक 2019 में चुने गए सांसदों की औसत आय आम जनता की औसत आय से करीब 1400 गुना ज़्यादा हैमाने हर वो रुपया जो आपकी जेब में है,उसके लिए आपके सांसद की जेब में 1400 रुपए हैं 13 राज्य थे जहां सांसदों की संपत्ति राज्य की प्रति व्यक्ति आय से 100-1000 गुना के बीच थी15 राज्य ऐसे थे जहां नेताओं की आय राज्य की प्रति व्यक्ति आय से 1000 गुना से भी ज़्यादा थी

 


भारत के सबसे बड़े अमीर किसे और कितना चंदा देते है,पता नहीं

चंदा लेने से जुड़े नियमों के तहत राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से ज़्यादा चंदा देने वाले दानकर्ताओं के नाम सार्वजनिक करना होता है सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट नाम की एक कंपनी ने बीजेपी को अकेले 251.22 करोड़ रुपये चंदे के तौर पर दिए ये बीजेपी को मिलने वाले कुल चंदे का 47.19 फीसदी है. इसी कंपनी ने 13.90 करोड़ रुपये कांग्रेस को भी दिए हैं सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट का नाम शायद पहले नहीं सुना होगा ये एक कंपनी है जो कॉरपोरेट दुनिया से पैसा लेकर राजनीतिक दलों को चंदा देती है

फोर्ब्स ने साल 2021 के लिए भारत के 10 सबसे अमीर अरबपतियों की सूची जारी की है लिस्ट में मुकेश अंबानी पहले नंबर पर बने हुए हैं उनकी नेटवर्थ 84.5 अरब डॉलर की है गौतम अडाणी सूची में दूसरे स्थान पर हैं. अडाणी की नेट वर्थ 50.5 अरब डॉलर है सूची में तीसरे स्थान पर शिव नाडर हैं,जिनकी नेटवर्थ 23.5 अरब डॉलर है  

प्रत्येक राजनीतिक दल में धनबल को प्राथमिकता

 

नई लोकसभा में कुल 475 सांसद करोड़पति हैं। 17वीं लोकसभा के 542 सांसदों में से 475 सदस्य करोड़पति हैं। इस सूची में मध्य प्रदेश के नकुलनाथ 660 करोड़ रुपए की संपत्ति के साथ टॉप पर हैं। इसके बाद तमिलनाडु के कन्याकुमारी से सांसद वसंतकुमार एच (417 करोड़ रुपये) का दूसरा नंबर है। तीसरे स्थान पर कर्नाटक के बेंगलुरू ग्रामीण से चुनाव जीते डी के सुरेश (338 करोड़ रुपये) का आते हैं।


भाजपा के 88 फीसदी सांसद और कांग्रेस के 96 फीसदी सांसद करोडपति

इस बार को लोकसभा में 266 सदस्य ऐसे हैं जिनकी संपत्ति पांच करोड़ या उससे अधिक है। बीजेपी के 303 सांसदों में से 265 (88  फीसदी ) करोड़पति हैं। वहीं शिवसेना के सभी 18 सांसदों ने अपनी संपत्ति एक करोड़ रुपए से अधिक बताई है। कांग्रेस के जिन 51 सांसदों के हलफनामों दायर किए है। उनमें से 43 (96 फीसदी) सांसद करोड़पति हैं। इसी तरह डीएमके के 23 में से 22 सांसद (96 फीसदी),तृणमूल कांग्रेस के 22 में से 20 सांसद (91 फीसदी) और वाईएसआर कांग्रेस के 22 में से 19 सांसदों (86 फीसदी) की संपत्ति एक करोड़ से अधिक है।




गरीबी में भारत अफ्रीका से  भी बदतर

यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम के ग्लोबल मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स 2021 के हिसाब से भारत में गरीबी का स्तर अफ्रीका के गरीबों के जैसा ही है और कई मामलों में अफ़्रीकी के बेहद गरीब देश के ओग भारत के गरीबों के मुकाबलें बेहतर स्थिति में हैलेकिन भारत के अमीर इस स्थिति को बदल सकते हैऑक्सफैम की रिपोर्ट इन इक्वलिटी वायरस नाम की रिपोर्ट में कहा गया कि मार्च 2020 के बाद की अवधि में भारत के 100 अरबपतियों की संपत्ति में 12,97,822 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई हैअगर देश के ये रईस इतनी राशि 13.8 करोड़ सबसे गरीब लोगों में बांट दें तो हर व्यक्ति को 94,045 रुपये दिए जा सकते हैं

बहरहाल कानूनी तरीके से संपत्ति अर्जित करने पर भारत में कोई रोक नहीं है लेकिन साल दर साल संपत्ति बढ़ाने का नेताओं के पास जो फॉर्मूला है वो आज तक जनता में किसी को हासिल नहीं हो पाया है। यही कारण है कि नेता मालामाल होते जा रहे है और जनता कंगाल होती जा रही है

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...