धर्म से अभिशिप्त मानव अधिकार,राष्ट्रीय सहारा dhrama manvadhikar

 राष्ट्रीय सहारा




                                        

धर्म का संबंध आस्था से है तो उसके केंद्र में प्रत्येक प्राणी और मानव के प्रति दया और करुणा के भाव होना चाहिए। यदि धर्म का संबंध विश्वास से है तो उसमें प्रत्येक मानव की गरिमा में असीम विश्वास होना चाहिए। यदि धर्म का अर्थ शांति से है तो वह मानवीय गुण व्यवहार में प्रतिबिम्बित होना चाहिए। यदि धर्म जीने का तरीका है तो उसमें परस्पर द्वेष और घृणा नहीं होना चाहिए। यदि धर्म का संबंध ईश्वरीय श्रद्धा,पूजा पाठ,ईश्वरीय उपासना,आराधना आदि से है तो उसमें मानव मात्र के प्रति प्रेम के भाव आना चाहिए। यदि धर्म व्यवस्था,कानून,नीति या समाज के परिचालन का तरीका है तो उसमें असमान भाव और विरोधाभास की सम्भावनाएं नगण्य होना चाहिए।


दुनिया भर में मानवाधिकारों की स्थिति का आंकलन किया जाएँ तो हिंसा,अत्याचार और उत्पीड़न के पीछे धार्मिक साया नजर आता है।अलग अलग देशों में इसके प्रकार भिन्न भिन्न होते है लेकिन धर्म को बचाने के नाम पर हिंसा का खेल बदस्तूर जारी है।


पिछले दिनों पाकिस्तान के सियालटकोट की एक फ़ैक्ट्री में काम करने वाले श्रीलंका के नागरिक प्रियांथा कुमारा को भीड़ ने ईशनिंदा के आरोप में पीट-पीटकर मार डाला बाद में उनके शव को जला दिया। इस वीभत्स घटनाक्रम में शामिल कुछ युवाओं ने वीडियो बनाकर बाकायदा पैग़ंबर मोहम्मद के अपमान और इस्लाम का हवाला देकर इसे न्यायोचित ठहराया।1980 के दशक में कश्मीर से लाखों पंडितों के पलायन का कारण कट्टरपंथी धर्मान्धता रही जिसे इस्लाम से जोड़ा गया। यहां पर प्रियांथा कुमारा को मानव ही नहीं माना गया,ऐसे में उनके अधिकारों का तो शायद ही हिंसक भीड़ को विचार आया हो।


भारतीय जनमानस भी उससे बहुत अलग नहीं है। यहां धार्मिक आतंकवाद से ज्यादा एक अलग और कही खतरनाक किस्म का जातीय आतंकवाद है जो मंदिरों में जाने से किसी को रोक देता है और उस पर ईश्वर को अशुद्ध करने का आरोप लगाकर निशाना भी बना देता है,यहां तक की इस कारण कई लोगों को मार भी डाला जाता है। दलितों,पिछड़ों और आदिवासियों के मानव अधिकारों को लेकर सरकार की सजगता को उन्मादी भीड़ किनारें करके उन्हें निशाना बनाती रही है।सितंबर 2015 में दिल्ली के पास दादरी के बिसाहड़ा गाँव में अख़लाक़ नाम के अधेड़ को उनके घर से खींचकर निकालने और पीट-पीट कर हत्या कर डालने की घटना सामने आई थी।भीड़ ने मोहम्मद अख़लाक़ पर गोमांस रखने का आरोप लगाया था।हमले में अख़लाक़ की घटना स्थल पर ही मौत हो गई थी। बहुत सारे लोगों ने इसे धर्म से जोड़कर न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी की।


2015 में केन्या की गारिसा यूनिवर्सिटी कॉलेज पर हुए एक आतंकी हमले में चरमपंथियों ने मुसलमान छात्रों को जाने दिया था और ईसाइयों को अलग करके गोली मार दी थी।उस हमले में 148 लोग मारे गए थे। यहां पर धर्म और पहचान के नाम पर निशाना बनाया गया. यहां पर अल-शबाब नाम का कट्टरपंथी संगठन इस्लामिक शासन स्थापित करने की मांग करता रहा है।इस साल नवदुर्गा पर बंगलादेश में पूजा पंडालों में कुरान रखने की अफवाह पर हिन्दुओं पर हमलें किये गये और कई हिन्दुओं की हत्याएं कर दी।फ़्रांस में एक धर्मांध नवयुवक द्वारा एक शिक्षक का गला रेत कर हत्या कर दी गई। आरोप था कि टीचर ने अपनी क्लास में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था। 


फ्रांस में पैंगबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर छिड़ी बहस के बीच ही नाइस शहर में एक और हमला हुआ। जहां हमलावर ने अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए स्थानीय चर्च पर हमला किया, इसमें तीन लोगों की मौत हो गई एक महिला का गला काट कर निर्मम हत्या कर दी गई। 2019 में श्रीलंका में ईस्टर पर एक मुस्लिम अतिवादी संगठन द्वारा भयंकर आतंकवादी हमला हुआ और इसमे सैंकड़ों लोग मारे गए थे। इसकी कड़ी प्रतिक्रिया वहां के मुसलमानों ने झेली। मस्जिदों पर हमले हुए। मुसलमानों की दुकानों का बहिष्कार किया गया। यहां के मुसलमानों ने कई स्थानों पर श्रीलंका के प्रति अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए अपनी मस्जिदों को गिरा दिया। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले आम है। श्रीकृष्ण ने गीता में एक सन्देश देते हुए कहा था कि मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है. जैसा वो विश्वास करता है वैसा वो बन जाता है। दुनिया भर में होने वाली धार्मिक उत्पीड़न की घटनाओं से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि धर्म को लेकर लोगों में पवित्र भावनाएं होनी चाहिए लेकिन वह विद्वेष के रूप में सामने आ रही है।

क्या धर्म रहस्य है क्योंकि धर्म कभी रहस्य नहीं हो सकता। जहां रहस्य होता है वहां बुद्धि श्रेष्ठता और विवेक शुन्यता दोनों भाव आने की पूर्ण संभावना होती है। और जब विवेक शून्य हो जाए तो भ्रम पैदा होता है। भ्रम से चेतना  व्यग्र होती है और तब तर्क नष्ट हो जाता है। जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है।स्पष्ट है जो मन को नियंत्रित नहीं करते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करता है।


संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा अंगीकार कर मानव अस्मिता और सम्मान को सुनिश्चित करने का प्रयास किया था,इसके साथ ही वैश्विक समुदाय से यह अपेक्षा भी की गई थी की वह मानव अधिकारों का पालन व्यवस्था की दृष्टि से भी करेंगे। इस घोषणा में समाहित किया गया की जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई  फर्क न रखा जाएगा।


गांधी का मानना था कि धर्म कोई पंथ नहीं बल्कि मानव के भीतर के मूल्य  होते हैं। अब  दुनिया भर में हिंसक घटनाओं के बीच लगातार मानवीय मूल्य दरकिनार किए जा रहे है और अफ़सोस इसे धर्म से जोड़ा जा रहा है।धर्म के नाम पर जारी इस संघर्ष को रोकने के प्रयास नाकाफी साबित होते जा रहे है। इसका एक प्रमुख कारण वह असुरक्षा की भावना है जो धार्मिक मान्यताओं के आधार पर  एक दूसरे को उत्तेजित करती रही है और इसमें धार्मिक गुरुओं और राजनीतिज्ञों का प्रमुख योगदान है।मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने शिक्षक की हत्या को न्यायोचित ठहराते हुए कहा था कि,मुस्लिमों को गुस्सा करने का और लाखों फ्रांसीसी लोगों को मारने का पूरा हक है।


ऐसा लगता है  कि धर्म और उसकी मान्यताओं से समाज पूरी तरह बिखर कर अलग थलग होने को बेकाबू है। धर्म किसी को अलग थलग कर सकता है,शायद ही इसकी कल्पना कुछ शताब्दियों पहले किसी ने की होगी। धर्म और  उसकी मान्यताओं की इस लड़ाई में मानवाधिकार असहाय और बेबस है।  धार्मिक अत्याचारों की विभिन्न घटनाओं से मानवता शर्मसार हो रही है।विडम्बना ही है कि धर्म मानव अधिकारों का रक्षक बनने के स्थान पर उसका अस्तित्व मिटाने की ओर अग्रसर नजर आता है।

आइए ढूंढते है आंबेडकरवादियों को...ambedkarvadi sandhya prakash

 सांध्य प्रकाश


 

                   

                                                               

विचारधारा को लेकर रूढ़िवादियों का साफ कहना है की यह समुद्र मे भटकी नाव की तरह है। इसलिए रूढ़िवादी विचारधारा के बजाय परम्पराओं और प्रथाओं को महत्व देते है। डॉ.आंबेडकर परम्पराओं और प्रथाओं से अभिशिप्त समाज को झंझावातों से निकाल कर स्वतन्त्रता की उस मानवीय अवधारणा को स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध रहे जिसका रास्ता सामाजिक न्याय के द्वार खोलता है।  डॉ.आंबेडकर के द्वारा इस दिशा में उठाया हर कदम अभूतपूर्व था लेकिन वे कठिनाई में भी अपने संकल्प से कभी नहीं डिगे। उस समय भी नहीं जब नामी रईस सेठ घनश्याम दास उनसे मिलने आए और बाबा साहब को अपने आंदोलन की दिशा बदलने के लिए 10 लाख देने की पेशकश की। इस पर डॉ.आंबेडकर ने साफ कहा था कि,मैं अपने आप को किसी को बेचने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ


दरअसल आंबेडकर के बाद का भारत सामाजिक न्याय की स्थापना करने में इतना असफल रहेगा,इसकी कल्पना स्वयं आंबेडकर ने भी नहीं की होगी। हालांकि वे दलित प्रतिनिधियों के राजनीतिक व्यवहार को लेकर आशंकित तो थे। इसीलिए उन्होंने 1955  में शेड्यूलड कास्ट सम्मेलन में अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग की थी।


डॉ.आंबेडकर वंचित वर्गों के विशेष अधिकारों को लेकर जीवन भर लड़ते रहे। अपनी मृत्यु के कुछ दिनों पहले ही उन्हें दलित प्रतिनिधित्व की राजनीतिक अभिलाषाओं को लेकर यह एहसास हो गया था कि इससे वंचित वर्गों में भी एक सामंती वर्ग तैयार हो जाएगा जो येन केन कर सत्ता को अपने हाथ में रखने के लिए तत्पर होगा और राजनीतिक दलों के लिए वे दलितों का चेहरा बना दिये जायेंगे। हुआ भी ऐसा ही। संसद में अनुसूचित जाति के 84 और अनुसूचित जनजाति के 47 सदस्य हैं। देशभर की राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति के 614 सदस्य और अनुसूचित जनजाति के 554 सदस्य हैं। संसद और विधानसभाओं के ये सदस्य दलगत विचारधारा से संचालित होते है,उनमें अपने वर्गों के हितों के लिए आवाज उठाने का साहस नहीं होता और डॉ.आंबेडकर इसी बात से डरते थे। उन्हें लगता था कि दलगत विचारधाराओं में रूढ़िवाद हावी है और उसे बिना समाप्त किए देश में सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित नहीं की जा  सकती। आज़ाद भारत में कांशीराम ही ऐसे नेता रहे जिन्होंने पारंपरिक सत्ता को चुनौती देकर बहुसंख्यक पिछड़ों की राजनीति को नई ताकत और पहचान दी। उनकी इसी राजनीति के बूते मायावती,लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह और राम विलास पासवान जैसे नेताओं का उभार हुआ। देश के सबसे बड़े सूबों में शुमार उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में ये लोग सत्ता के शीर्ष पर भी बैठे,लेकिन गरीब-वंचित बेबस,बेहाल और लाचार लोगों का जीवन शोषण,अपमान,असहिष्णुता,उत्पीड़न,सामाजिक और आर्थिक असमानता तथा  अत्याचार के अभिशाप से कभी मुक्त नहीं हो पाया ।


डॉ. आंबेडकर जीवन भर गरीब मजदूरों के लिए लड़ते रहे वहीं उनके बूते संसद और विधानसभा की सीढ़ियाँ चढ़ने वाले वंचित वर्ग के सांसद विधायक वहीं भाषा बोलते है जो उनकी राजनीतिक पार्टी तय करती है। यह भी किसी से छुपा नहीं है की संसदीय लोकतंत्र में भी राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष पर सामंतवाद और पूंजीवादी शक्तियां हावी है।


डॉ.आंबेडकर के सहयोगी रहे एन.सी.रट्टू अपनी किताब 'रेमिनेंसेंसेज़ एंड रिमेंबरेंस ऑफ़ डाक्टर बीआर आंबेडकर' में लिखते है कि,बाबा साहब अक्सर कुलीन वर्ग के समारोहों में जाने से बचते थे, उनका कहना था कि,मैं वहाँ अपना बहुमूल्य समय बर्बाद नहीं करना चाहता। दूसरे मुझे शराब पीने का शौक नहीं हैं जो इस तरह की पार्टियों में सर्व की जाती है। डॉ.आंबेडकर शराब जैसी बुराइयों से दूर रहकर करोड़ों लोगों को संदेश देना चाहते थे जो जिससे वंचित वर्ग का उद्धार हो सके।


देशभर में दलितों और आदिवासियों को निशाना बनाने की घटनाएं अनवरत जारी है। इस वर्ग से आने वाले सांसद और विधायक अक्सर अपनी पार्टी की भाषा बोलते है। उना हो या हाथरस,उनमें अपने वर्गों के हितों के लिए मुखर होने का साहस नहीं दिखाई पड़ता।  वे उन राजनीतिक दलों से संचालित होते है,जिनके लिए वंचित वर्ग का औचित्य पिछड़ापन और गरीबी है। राजनीतिक दलों के लिए इन वर्गों से ऐसा प्रतिनिधित्व तैयार किया जाता है या उसे चेहरा बनाया जाता है,जिन्हें आम कठपुतली की तरह उपयोग किया जा सके और आम तौर पर यह प्रतिबिम्बित भी होता है।  पिछले साल हाथरस में दलित युवती के साथ दरिंदगी के बाद भी पुलिस और सत्ता का रुख बेहद निर्मम और शर्मनाक रहा। प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप और सीबीआई की जांच के बाद सच्चाई सामने आ सकी  जबकि यूपी सरकार ने हाईकोर्ट में जो हलफनामा पेश किया था,वह पीड़ित की न्याय की उम्मीदों को ध्वस्त करने वाला था। इस समूचे  घटनाक्रम में  उस क्षेत्र के सांसद जो स्वयं दलित वर्ग से है, वे आरोपियों से मिलने जेल पहुँच गए। यहां तक की उन्होंने पीड़ित परिवार से मिलने की जहमत तक न उठाई।


जाहिर है वंचित वर्ग के उद्धार के लिए डॉ.आंबेडकर जैसे नेता चाहिए जिनका  लक्ष्य सत्ता नहीं बल्कि सामाजिक और व्यापक राजनीतिक परिवर्तन हो,जिससे करोड़ों लोग सम्मान से जी सके। जो वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए लड़ सके और बिना राजनीतिक हितों के वे असमानता और अत्याचारों के खिलाफ संसद और अन्य मंचों पर मुखरता से आवाज उठा सके। अफसोस अब न तो डॉ.आंबेडकर है और न ही कोई आंबेडकरवादी।

 

नेपाल की राजनीति nepal oli swdesh

 स्वदेश


राजनीतिक विचारधारा की मुख्य विशेषता यह है कि यह शासक वर्ग की सत्ता को सुदृढ़ बनाती है। क्योंकि जब लोग मन से उनकी नीतियों और निर्णयों का समर्थन करने लगते है तो उन्हें चुनौती देने को तत्पर नहीं होते। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली देश की मूलभूत,लोकतांत्रिक और लोक कल्याणकारी जरूरतों को नजरअंदाज कर साम्यवादी सत्ता की मजबूती के विशिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्द नजर आते है। उनकी चुनावी राजनीति भारत विरोध के इर्द गिर्द घुमती रही है और वे इसे व्यापक जनसमर्थन हासिल करने का अस्त्र समझने लगे है। पिछले दिनों कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल के एक कार्यक्रम में ओली ने दावा किया की अगर उनकी पार्टी सत्ता में लौटी तो वह कालापानी,लिंपियाधुरा और लिपुलेख को भारत से वापस ले लेंगे।


अगले साल नेपाल में आम चुनाव है और ओली सत्ता को हासिल करने की संभावनाओं को आक्रामक राष्ट्रवाद में तलाश कर रहे है। पिछले कुछ सालों से नेपाल का राजनीतिक तंत्र ओली की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और कम्युनिज्म मजबूत करने की सनक से बूरी तरह पस्त रहा है। ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड की पार्टी सीपीएन-माओवादी सेंटर गठबंधन को 2018 में हुए आम चुनावों में 174 सीटों पर जीत  हासिल हुई थी। प्रधानमंत्री पद के लिए ओली का समर्थन यूसीपीएन-माओवादी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल और मधेशी राइट्स फोरम डेमोक्रेटिक के अलावा  13  अन्य छोटी पार्टियों ने किया भी किया था। बहुमत होने के बाद भी ओली अपनी विवादास्पद छवि और लगातार भारत विरोधी कार्यों के चलते अपने कार्यकाल के पूर्ण होने के पहले ही सत्ता से हाथ धो बैठे।


दरअसल  करीब दो सौ साल पुरानी राजशाही को जन आन्दोलनों और हिंसक विद्रोहों से समाप्त करने वाली नेपाली जनता पिछले डेढ़ दशक से किसी करिश्माई लोकतांत्रिक नेतृत्व की राह देख रही है। वहीं ओली की वामपंथ से आसक्ति,भारत विरोध और चीन से प्रेम उनके देश की समस्याओं को लगातार बढ़ा रहा है। नेपाल के लिए भारत एक अहम साझीदार है। भारत और नेपाल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध इतने मजबूत है की इन्हें अलग किया जाना संभव ही नहीं हो सकता।        नेपाल से भारत के ऐतिहासिक सम्बन्धों के साथ यह कड़वी हकीकत है की वहां के सामान्य जनमानस में भारत के बड़े होने और स्वयं के छोटे होने का भाव रहा है जो समय समय पर कडुवाहट के रूप में सामने आता है। यह भावना वहां पर राजतंत्र के दौर से ही देखी गई है।


ओली ने सत्ता में रहते भारत और नेपाल के सम्बन्धों को प्रभावित करने के लिए धार्मिक,ऐतिहासिक और सामरिक रूप से तथ्यों को उलट पुलट कर भारत से सीमा विवाद को बढ़ाया और इसे राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ दिया।  उन्होंने नेपाल का नवीन मानचित्र जारी कर भारत के उत्तराखंड के कालापानी,लिंपियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल का हिस्सा बताया था। प्रधानमंत्री के रूप में ओली का यह कदम बेहद अप्रत्याशित रहा और ऐसा करके उन्होंने नेपाल के भविष्य को दांव पर लगा दिया। कालापानी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले के पूर्वी हिस्से में स्थित एक क्षेत्र है। यह क्षेत्र उत्तर में चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ अपनी सीमा साझा करता है,वहीं पूर्व और दक्षिण में इसकी सीमा नेपाल से लगती है। 1870 के दशक से सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे में लिपुलेख डाउन से कालापानी तक का इलाक़ा ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा है। भारत की आज़ादी के बाद से नेपाल के राणा शासक और नेपाली राजाओं ने इनको लेकर कोई दावा नहीं किया लेकिन अब ओली इसका राजनीतिक फायदा देख रहे है।  वे दोनों देशों के बीच सीमाई विवाद का कारण बनाकर लोगों में भारत विरोधी भावनाएं भडकाने की कोशिश कर रहे है। ओली का भारत विरोध सीमा के साथ अन्य क्षेत्रों में भी देखा गया है। 2015 में नेपाल ने अपना नया संविधान बनाया था और आरोप लगे थे कि नए संविधान में तराई के इलाक़ों में रहने वाले मधेशियों के अधिकारों को अनदेखा कर दिया गया। मधेशियों का भारत से रोटी बेटी का सम्बन्ध रहा है। अपने संवैधानिक अधिकारों की मांगों को लेकर मधेशी बहुल तराई के इलाक़ों में हिंसक प्रदर्शन भी हुए और इस दौरान कुछ लोगों की मौत भी हुई थी। जब 2015 में नेपाल के संविधान मसौदे को लेकर मधेसियों ने आंदोलन किया था,तब भारत-नेपाल सीमा कई दिनों तक ठप रही थी। इस समय नेपाल ने अपनी कुछ महत्त्वपूर्ण सीमा चौकियों पर भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था। मधेशी व्यापार और व्यवसाय में नेपाल में अग्रणी माने जाते है। उनके द्वारा नेपाल के कई तराई के इलाक़ों में आर्थिक नाकेबंदी हुई तो ओली ने इसके लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए 2016 में चीन की यात्रा की और उन्होंने चीन के साथ 'ट्रेड एंड ट्रांसपोर्टेशन अग्रीमेंट' यानी व्यापार और परिवहन समझौता कर लिया। ओली का यह कदम भारत को चुनौती देने वाला रहा और यहीं से भारत और नेपाल के कूटनीतिक रिश्ते भी प्रभावित हुए बिना ण रह सके।  नेपाल हिन्दू धर्म का प्रमुख स्थल रहा है लेकिन ओली ने सार्वजनिक रूप से कई बार कहा है कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है और अगर कभी कोई ईश्वर रहा है तो वो सिर्फ कार्ल मार्क्स थे। वे राम जन्मभूमि को भी चुनौती देते नजर आयें जिसके लिए उन्हें उनकी स्वयं की कम्युनिष्ट पार्टी से ही गहरे विरोध का सामना करना पड़ा।


नेपाल भारत के लिये एक मध्यवर्ती क्षेत्र के रूप में कार्य करता है। चीन पर रणनीतिक बढ़त बनाएं रखने के लिए भारत ने नेपाल की सुरक्षा को सदैव अहम समझा है। हालांकि नेपाल भारत विरोध के बाद भी 2017 में चीन की वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में शामिल हो गया है और इसे भारत के लिए बड़ा झटका माना गया। गौरतलब है कि पाकिस्तान और चीन के बीच सीपीईसी और काराकोरम हाइवे का जो संबंध है उसमें भारत का विरोध है। चीन ने बिना भारत की अनुमति के पीओके से रास्ता निकाल दिया,जबकि यह इलाका भारत के अंतर्गत आता है। यह देखा गया है कि पिछले कुछ सालों से नेपाल की चीन से प्रभावित नीतियों के कारण वहां भारत के आर्थिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक और सुरक्षा हितों की रक्षा करना लगातार बेहद चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

 

 


 

नेपाल जहां अपने देश में भारत से व्यापारिक सम्बन्धों को सीमित करने की नीति पर काम कर रहा है वहीं चीन भारत के इस मित्र राष्ट्र को अपने आर्थिक जाल में उलझा चूका है। नेपाल में तेल,गैस एवं अन्य खनिजों की खोज कर रहा है,सड़क और रेल के जरिए चीन नेपाल को जोड़ने की कवायद चल रही हैं। नेपाल के लोगों में गहरी पैठ बनाने के लिए चीन वहां हजारों की संख्या में स्कूल भी खोल रहा है। चीन की इस नीति में ओली बड़े मददगार रहे है और वह  नेपाल के नव लोकतंत्र को वामपंथ की राह पर धकेल कर व्यवस्था पर आधारित चीनी मॉडल को अपने देश में भी आगे बढ़ाते दिखाई देते है। 

भारत के उत्तर पूर्व में स्थित नेपाल के साथ सद्भाव और सहयोगपूर्ण सम्बन्ध भारत के राजनीतिक,आर्थिक और सामरिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभी तक नेपाल भारत के लिए एक ऐसा भूभाग से जुड़ा देश है जिसका लगभग सारा आयात और निर्यात भारत से होकर जाता है। भारत के कोलकाता और अन्य बंदरगाहों से नेपाल को व्यापार सुविधा तथा भारत होकर उस व्यापार के लिए पारगमन की सुविधा प्रदान की गयी है। नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योकि भारत में बहने वाली नदियों का उदगम भी इन क्षेत्रों में पड़ता है। इस प्रकार दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर है।भारत लगातार नेपाल के विकास में अपना अहम योगदान देता रहा है।


चीन हमेशा से ही नेपाल के साथ विशेष सम्बन्धों का पक्षधर रहा है,तिब्बत पर कब्जे के बाद उसकी सीमाएं सीधे नेपाल से जुड़ गयी है। चीन की नेपाल नीति का मुख्य आधार  यह है कि नेपाल में बाह्य शक्तियां अपना प्रभाव न जमा सके तिब्बती आटोनामस रीजन की सुरक्षा हो सके। इसलिए नेपाल में भारत के प्रभाव को कम करने की उसकी कोशिशें बदस्तूर जारी है। उसने नेपाल में अनेक परियोजनाएं आक्रामक ढंग से शुरू कर तिब्बत से सीधी सड़क भारत के तराई क्षेत्रों तक बनाई,रेल मार्ग को नेपाल की कुदारी सीमा तक  जोड़ा और इसके साथ ही नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक और सैनिक मदद से चीन का समर्थन और आम नेपालियों में उनके द्वारा भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशें रची गयी।

चीन ने नेपाल में राजनीतिक समर्थन हासिल करके अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया है,उसकी भारत के एक और अहम सामरिक पड़ोसी देश भूटान को लेकर भी वैसी ही नीति नजर आती है। भारत भूटान की सुरक्षा को लेकर भी अग्रणी मोर्चे पर रहा है लेकिन इस साल अक्टूबर में भूटान ने भारत को बिना विश्वास में लिए चीन के साथ एक सामरिक समझौते की ओर कदम बढ़ाएं है।


नेपाल और भारत के बीच 1850 किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा है, जिससे भारत के सिक्किम,पश्चिम बंगाल,बिहार,उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जुड़े हैं। नेपाल भारत की तरफ़ ही खुलता है जबकि चीन और नेपाल के बीच बड़े पहाड़ों की श्रृंखलाएँ हैं। ओली ने लिपुलेख के जिस  क्षेत्र पर दावा किया है वह इलाक़ा ट्राइजंक्शन है। चीन,नेपाल और भारत तीनों की सीमा  यहां से लगती है। भारत के लिए यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है वहीं ओली इस क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ाकर भारत के लिए सुरक्षा संकट बढ़ा सकते है। 


कम्युनिस्ट पार्टी के नेता केपी शर्मा ओली के भारत को लेकर निरंतर विरोधी और आक्रामक तेवर के पीछे चीन की शह साफ दिखाई पड़ती है। ऐसा प्रतीत होता है कि चीन ओली के सहारे नेपाल में अपनी पकड़ मजबूत करके भारत  की जमीनी सीमा को घेरने की नीति पर काम कर रहा है जिससे उसे रणनीतिक बढ़त मिल सके। बहरहाल भारत को ओली की सर्व सत्तावादी साम्यवादी महत्वाकांक्षाओं से सावधान रहने और नेपाल के राजनीतिक भविष्य पर कड़ी निगाहें रखने की जरूरत है।  

 

 

 

 

 

संविधान में हिंदुत्व, sanvidhan hindutv राष्ट्रीय सहारा

 राष्ट्रीय सहारा 

                         




                                                                     

                                                        

मै समाज से पृथक होकर अपनी अस्मिता की तलाश नहीं कर सकता। इसके लिए मुझे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय सभ्यता को अपनाना ही होगा। भारत के संविधान निर्माता यह भलीभांति जानते और समझते थे कि विविधता का सम्मान करते हुए भी भारतीय सभ्यता ही भारत और संविधान की पहचान बन सकती है। संविधान की मूल किताब में राम,कृष्ण.भगवतगीता,गंगा,विक्रमादित्य जैसे चित्र उन आदर्शों और मूल्यों का प्रतिबिम्ब है। संविधान की मूल किताब संसद के पुस्तकालय में अब भी संग्रहित है।

एक इतिहासकार ने संविधान और मौलिक अधिकारों को लेकर एक दिलचस्प टिप्पणी की थी कि देश  की संविधान सभा आम लोगों के मौलिक अधिकारों को उस वक्त तैयार कर रही थी जब मुल्क मौलिक गड़बड़ियों के नरसंहार से होकर गुजर रहा था।


हालांकि आस्था के कठिन प्रश्न पर कोई गलती नहीं हो,इसके प्रति नेता सचेत थे और नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव के जरिये भारत की भविष्य की तस्वीर को साफ भी किया। यही उद्देश्य प्रस्ताव भारत के संविधान की  प्रस्तावना में समाहित है और इसे संविधान की आत्मा भी कहा गया। प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास, प्रतिष्ठा और अवसर की समता,व्यक्ति की गरिमा,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को बनाएं रखने को लेकर प्रतिबद्धता जाहिर की गई है।


भारत विविधता को समेटे हुए है और ऐसे में संविधान का विशिष्ट रूप भारत की पहचान भी नजर आये इसको लेकर शांति वन में नेहरु की चर्चा एक जाने माने चित्रकार से हुई और इसके बाद संविधान में वह प्रतिबिम्बित हुआ। संविधान के सभी 22 अध्यायों को ऐतिहासिक और पौराणिक चित्रों और किनारियों से सजाया गया है। इन चित्रों में  भगवान राम,भगवद्गीता का  उपदेश,भगवान नटराज का चित्र,महावीर स्वामी,बुद्द,गंगा,मुगल बादशाह अकबर,टीपू सुल्तान,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई,सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह,वैदिक काल में चलाए जा रहे गुरुकुल  के एक प्रतीकात्मक चित्र के साथ राजा  विक्रमादित्य  नजर आते है। भारत सार्वभौमिकता से चलता रहा है और यहां यह रचा बसा है। इस देश ने राम से परस्पर सद्भाव और सामंजस्य सीखा है। मुगलकाल में भी इसे स्वीकार किया गया अकबर ने तो बाकायदा राम सिया के नाम पर एक सिक्का जारी किया था चांदी का इस सिक्के पर राम और सीता की तस्वीरें उकेरी गई थी

जिन्हें हिन्दुस्तान की समझ नहीं,वे यहां से चले जाएं

संविधान सभा के एक सदस्य आर.वी.धुलेकर ने जब यह कहा...

संविधान की मूल किताब में उकेरे गए चित्रों से यह साफ हो गया की विविधता को स्वीकार करते हुए भी भारत को राम राज्य और भारतीय सभ्यता के मूल्यों पर आधारित राष्ट्र के रूप में अंगीकार किया गया। हिन्दुस्तानी पहचान को लेकर कई बार बहस भी हुई। संविधान सभा के एक सदस्य आर.वी.धुलेकर ने सबको खरी खरी सुना दी। धुलेकर ने भाषा को लेकर एक संशोधन प्रस्ताव पेश करते हुए था कि,जो लोग हिन्दुस्तानी नहीं समझते है उन्हें इस देश में रहने का कोई हक नहीं है। जो लोग भारत का संविधान बनाने के लिए इस सदन में मौजूद है, लेकिन हिन्दुस्तानी भाषा नहीं समझते वे इस सदन के सदस्य बनने के काबिल नहीं है। बेहतर है की वे यहाँ से चले जाएँ।

 


 

आध्यात्मिकता पर लौकिकता को तरजीह

धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता में मान्यताओं का नहीं बल्कि धर्म के प्रति गहरा वैचारिक  मतभेद दिखाई पड़ता है। धर्मनिरपेक्षता राज्य की नीति हो सकती है वहीं पंथ निरपेक्षता में राज्य या व्यवस्थाओं के लिए कोई आदेश नहीं होता। पंथ निरपेक्षता भारतीय शब्द है जिसमें सर्वधर्म समभाव प्रदर्शित होता है। धर्म का संबंध आध्यात्मिकता से स्वत: जुड़ता है और विविध धर्मों में अलग अलग मान्यताएं संघर्ष का कारण बन सकती है। भारतीय संविधान में इसीलिए आध्यात्मिकता पर लौकिकता को तरजीह  देते हुए इसे पंथनिरपेक्ष कहा गया। भारतीय संविधान में पंथनिरपेक्षता की सभी अवधारणाएँ विद्यमान हैं अर्थात् हमारे देश में सभी धर्म समान हैं और उन्हें सरकार का समान समर्थन प्राप्त है।


 

मैं हिन्दू क्यों हूँ, सलमान खुर्शीद को शशि थरूर का  जवाब

हिंदुत्व "रूढ़िवाद" या "नैतिक निरपेक्षता" का एक चरम रूप  नहीं है..

सलमान ख़ुर्शीद की नई किताब 'सनराइज़ ओवर अयोध्या' हाल ही में बाज़ार में आई है,जिसकी एक लाइन पर विवाद हो रहा है,जिसमें हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और बोको हराम से की गई है  खुर्शीद का विरोध कांग्रेस के ही एक नेता  गुलाम नबी आज़ाद ने करते हुए कहा कि हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और जिहादी इस्लाम से करना तथ्यात्मक रूप से ग़लत और अतिशयोक्ति है  वहीं हिन्दूवाद को लेकर शशि थरूर अपना नजरिया अपनी किताब में रख चूके है।  धर्म आस्था से जुड़ा प्रश्न है,वहीं भारतीयता या इसे हिन्दूवाद  भी कह सकते है,इसके दायरे असीमित है। शशि थरूर ने अपनी किताब मैं हिन्दू क्यों हूँ,में इसे कुछ इस प्रकार बयाँ किया है,हिन्दूवाद विदेशियों द्वारा भारत के स्वदेशी धर्म को दिया गया नाम है। इसके दायरे में बहुत से सिद्धांत और धार्मिक व्यवहार आते है,जो पंथवाद से लेकर अनीश्वरवाद तक और अवतारों में आस्था से लेकर जातिवाद में विश्वास तक फैले है,परन्तु इनमें से किसी में भी हिन्दू के  लिए  कोई अनिवार्य मूलमन्त्र नहीं है। हमारे धर्म में कोई भी हठधर्मिता नहीं है।  

 

गांधी एक दूसरे के धर्म में दखल देने के खिलाफ रहे

द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह अपेक्षा की गई थी की आधुनिक दुनिया मध्यकालीन धार्मिक द्वंद को पीछे छोड़कर समूची मानव जाति के विकास पर ध्यान देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दुनिया भर में आस्था को अंधविश्वास से तथा धार्मिक हितों को व्यक्तिगत सम्मान से जोड़ने की राजनीतिक विचारधाराएँ बढ़ गई,इसके साथ ही सत्ता प्राप्त करने का इसे साधन भी बना लिया गया। महात्मा गांधी इसे लेकर आशंकित तो थे ही।  हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि,कोई भी मुल्क तभी एक राष्ट्र माना जाएगा जब उसमे दूसरे धर्मों के समावेश करने का गुण आना चाहिए। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्मों में दखल नहीं देते,अगर देते है तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है।


अदालत में हिंदुत्व

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने डॉ. रमेश यशवंत प्रभू बनाम श्री प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और अन्य, बाल ठाकरे बनाम श्री प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और अन्य और श्री सूर्यकांत वेंकटराव महादिक बनाम श्री सरोज संदेश नाइक केसों में 11 दिसंबर 1995 को अपने फैसले में कहा था कि हिंदुत्व या हिन्दूवाद एक जीवन शैली है और हमें यह देखना होगा कि चुनावी भाषणों में इन शब्द का किस संदर्भ में उपयोग किया गया है


हिंदुत्व पर अटलबिहारी वाजपेयी का नजरिया अपनाने की जरूरत

हिंदुत्व भारत की पहचान रही है और वह लोकाचार में दिखाई भी पड़ती है। हिंदुत्ब को  राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिशों और इसके उभार की  आशंकाओं पर  अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना नजरिया साफ किया था। वाजपेयी ने भारत में साम्प्रदायिक विद्वेष के बहुसंख्यकों पर प्रभाव को लेकर संसद में सर्वधर्म समभाव को हिन्दू धर्म की जन्म घूंटी बताते हुए कहा था की इस देश में ईश्वर को मानने वाले भी है और ईश्वर को नकारने वाले भी है,यहाँ किसी को सूली पर नही चढ़ाया गया। किसी को पत्थर मारकर दुनिया से नही उठाया गया,ये सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है। ये अनेकान्तवाद का देश है,और भारत कभी मजहबी राष्ट्र नहीं हो सकता ।


बहरहाल हिंदुत्व को समझने वाले,इसे न  समझने वाले और इसका राजनीतिक दोहन करने की कोशिश करने वाले सभी को अटलबिहारी वाजपेयी के विचारों को ग्रहण करने की जरूरत है। उन्होंने जिस हिंदुत्ब की बात की थी वहीं संविधान में भी नजर आता है। जरूरत इस बात की है कि उसे समझें,विचारों,व्यवहार और लोकाचार में उसका पालन सुनिश्चित करें।

 

 

 

 

 

 

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...