गांधी बनाम सावरकर.माफीनामे पर मनमर्जी...! पॉलिटिक्स

 

 पॉलिटिक्स  



                           





 

भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी की स्थिति समुद्र में तैरती उस छोटी नाव की तरह है जिसकी सफलता पर सदा कौतूहल बना रहता है।लेकिन वह नाव तमाम झंझावतों से जूझती हुई और थपेड़ों को सहती हुई लंबी दूरी तय कर लेती है और अंततः सफलता अर्जित कर किनारे लगा देती है।आज़ादी के आंदोलन में भी गांधी की स्थिति कुछ ऐसी ही थी इस बूढ़े आदमी को लेकर सब संशय में होते थे लेकिन मंजिल तक पहुँचने के लिए यह बूढा आदमी सबकी जरूरत भी बन गया था। यह भी बेहद दिलचस्प है महात्मा गांधी पर संशय रखने वालों में अंग्रेज,जवाहरलाल नेहरु,सरदार वल्लभभाई पटेल,सुभाषचंद्र बोस,भगत सिंह से लेकर वीर सावरकर जैसे अनगिनत लोग थे। यह बात और है कि अधिकांश को गांधी के लक्ष्य को लेकर कोई संदेह नहीं था,हालांकि कम से कम उसमें सावरकर शुमार नहीं थे।

बहरहाल अप्रत्याशित परिणामों से अपरिहार्य बनने का महात्मा गांधी का सफर बदस्तूर जारी है। इस सफर में रक्षा मंत्री राजनाथसिंह भी शुमार हो गए है और उन्होंने इसमें यह कहकर नया रंग भरने की कोशिश की है कि सावरकर ने ख़ुद को माफ़ किए जाने के लिए महात्मा गांधी  के कहने पर दया याचिका दायर की थी। राजनाथसिंह ने यह किस आधार पर कहा,यह बताना बहुत मुश्किल है। भारतीय राजनीति की यह सच्चाई है कि राजनेताओं को यहां अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी है। आम आदमी या बुद्धिजीवी भले ही नीति नियमों या क़ानूनी दुष्चक्र में फंस जाएं लेकिन नेताओं को नियम कायदों से काफी राहत मिली हुई है या उन्होंने इसे असाधारण तौर अर्जित कर लिया है।


 

गांधी और सावरकर-विचारधाराओं में गहरा अंतर

महात्मा गांधी और वीर सावरकर के जीवन और विचारधारा  में  गहरा फर्क था जो उनके कार्यों में भी प्रतिबिम्बित हुआ। महात्मा गांधी सर्व धर्म समभाव और सार्वभौमिकता के गहरे पक्षधर थे जबकि वीर सावरकर के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद में आज़ादी निहित थी। वीर सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व:हू इज़ अ हिन्दू' में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि राष्ट्र का आधार धर्म है,हिन्दुस्थान का मतलब हिन्दुओं की भूमि से है।


महात्मा गांधी के उदय के पहले सावरकर की दया याचिका दायर हुई थी

 

वीर सावरकर करीब ढाई दशक तक तक किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों के क़ैदी रहे।11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त 1911 को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा था,तब महात्मा गांधी भारत की आज़ादी के आंदोलन से कहीं दूर दक्षिण अफ्रीका में काले लोगों के हितों के लिए संघर्ष कर रहे थे।


भारत में गांधी मिटटी की मूरत

 

गांधी दुनिया के लिए शांति और अहिंसा के दूत है लेकिन भारत के लिए ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। भारत के राजनेताओं और लोगो के लिए गांधी मिट्टी की वह मूरत है जिसे वे मनचाहा आकार देते रहे है,उसके साथ खेलते है और अक्सर तोड़ भी देते है। हालांकि वह मिट्टी बिना किसी का नुकसान किए नये आकार के लिए फिर से तैयार हो जाती है।


 

आलोचना के लिए सदैव तैयार तैयार गांधी

9 जनवरी 1915 को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर हमेशा के लिए भारत आ गए थे। यही से मोहनदास करमचन्द गांधी का महात्मा बनने का सफर शुरू हुआ। वे जब जहाज़ से उतरे थो उन्होंने एक लंबा कुर्ता धोती और एक काठियावाड़ी पगड़ी पहनी हुई थी। यह उनके विचारों को प्रतिबिम्बित कर रहा था। बापू ने भारतीय धरती पर अपने पहले ही कार्यक्रम में यह भी साफ कह दिया था कि,भारत के लोगों को शायद मेरी असफलताओं के बारे में पता नहीं है। आपको मेरी सफलताओं के ही समाचार मिले हैं। लेकिन अब मैं भारत में हूं तो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से मेरे दोष भी देखने को मिलेंगें। मैं उम्मीद करता हूं कि आप मेरी गलतियों को नजरअंदाज करेंगे। अपनी तरफ से एक साधारण सेवक की तरह मैं मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित हूं।"


 

नाकामियों के लिए गांधी को जिम्मेदार ठहराने का रिवाज

 

गांधी के सपनों के भारत में राम राज्य था,वह कभी बन न सका और न ही उसकी कोई संभावना दिखाई देती है।गांधी के नजर ग्राम स्वराज पर थी जिससे वे भारत की गरीबी और करोड़ो लोगों की दयनीय स्थिति को दूर करने चाहते थे लेकिन कथित पंचायती राज भी सामन्तवाद के जंजाल से कभी मुक्त न हो सका और गरीबी के खत्म होने की आशाएं भी टूट गई। इन सबके बीच नाकामियों के लिए गांधी को जिम्मेदार ठहराते हुए उनकी आलोचना के कई बहाने ढूंढे और गढ़े जाते है,लेकिन इन सबके लिए गांधी हमेशा तैयार रहते है। उन्हें जीवित रहते भी आलोचनाओं से कोई फर्क न पड़ा और अब उनके अवशेषों को भी इससे ज्यादा सरोकार कहीं नजर नहीं आता।


 

शुद्द रक्त बनाम विशुद्ध भारतीयता

 

गांधी का वैचारिक और जीवन जीने का तरीका शुद्ध भारतीय था जिसमें त्याग.ममता,सत्य,निर्मलता और सहिष्णुता के गुण समाहित रहे।गांधी के प्रति लोगो की आसक्ति भी इसीलिए थी कि वे बेहद आम नजर आते थे और यहीं उन्हें असाधारण बना देता था।अमेरिकी पत्रकार लुइस फिशर ने अपनी पुस्तक महात्मा गांधी - हिज लाइफ एंड टाइम्स में लिखा हैं कि लोगों के छूने से उनके पैर और पिंडली इतनी खुरच जाती थी कि वहां पर गांधी के सहायकों को वेसलीन लगानी  पड़ती थी। गांधी का राम राज्य विविधताओं को एकाकार किए हुए थे,जाहिर है गांधी ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ऊपर बहुलता और सार्वभौमिकता को प्राथमिकता दी थी। गांधी जानते थे कि एक संस्कृति,एक इतिहास,एक धर्म और एक भाषा के आधार  बंधुत्व की बातें कर विविधताओं वाले देश में एकता स्थापित नहीं की जा सकती। पुराने रीतिरिवाज,मूल्यों और मिथकों को याद कर लोगों को जोड़ने से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मजबूत होगा। भाषा,इतिहास,रंग,संस्कृति,साझा विश्वास और मूल्य के आधार पर लोग जुडाव महसूस करेंगे लेकिन यह पूरे भारत की आवाज नहीं हो सकती क्योंकि यह बहुसांस्कृतिक,बहुधार्मिक और बहुभाषाई राष्ट्र है।


 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में सावरकर का विश्वास

 

महात्मा गांधी की नजर में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का रास्ता आसान और सरल था लेकिन वे जानते थे कि इससे विविधता वाले भारत की आज़ादी का मार्ग नहीं खुल सकता था। यह किसी विशेष क्षेत्र को उद्देलित तो कर सकता था लेकिन समूचे भारत को इसके सहारे जोड़ देना आसान नहीं था। वहीं वीर सावरकर को हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रणेता माना जाता है। सावरकर ने मुसलमानों की पुण्यभूमि सुदूर अरब बताया और कहा कि उनकी मान्यताएं,उनके धर्मगुरु,विचार और नायक इस मिट्टी की उपज नहीं हैं। यह गांधी के विचारों से बिलकुल भिन्न था।


धर्म को लेकर गांधी और सावरकर का स्पष्ट वैचारिक स्तर

गांधी की हिन्दू धर्म में गहरी आस्था थी लेकिन वह अपनी आस्था को किसी पर थोपने का प्रयास नहीं करते थे और सभी धर्मों का समान सम्मान करते थे। हिन्द स्वराज में गांधी ने कहा कि,हिंदुस्तान में चाहे जिस धर्म के लोग रह सकते है,इससे यह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नए लोग उसमें दाखिल होते है,वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते,वे उसकी प्रजा में घुल मिल जाते है। ऐसा हो,तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जायेगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों का समावेश का गुण आना चाहिए। हिंदुस्तान ऐसा था और आज भी है।” वहीं सावरकर ने हिन्दू राष्ट्रवाद को लेकर अपनी स्पष्ट सोच को समाज के सामने रखा।


कानून को लेकर अलग समझ

चम्पारण आन्दोलन के दौरान गांधी स्वयं अदालत में उपस्थित हुए। उन्होंने साफ कहा कि,अदालत में गांधी ने कहा, "मैं इस आदेश का पालन इसलिए नहीं कर रहा कि मेरे अंदर कानून के लिए सम्मान नहीं है बल्कि इसलिए कि मैं अपने अन्तःकरण की आवाज को उस पर कहीं अधिक तरजीह देता हूं।" वीर सावरकर उग्र थे,और उन्होंने अंग्रेजी शासन का विरोध भी उग्रता से किया। उनके माफीनामे पर समय समय पर अलग अलग विचार सामने आते है लेकिन वह अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए आजीवन प्रयत्नशील रहे।   

 


वीर सावरकर की देशभक्ति के गहरे रंग

वीर सावरकर की पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857 चर्चित किताब थी जिसमें उनका स्वरूप धर्मनिरपेक्ष नजर आता है। उन्होंने 6 बार अंग्रेज़ों को माफ़ी पत्र दिए लेकिन यह उनकी देशभक्ति को तोलने का कारण नहीं हो सकता3 जुलाई 1906 को सावरकर ने लन्दन की धरती पर कदम रखा और यहीं से पराधीन भारत को अभिनव भारत में बदलने की शुरुआत हो गई। उनके लंदन पहुंचने से आज़ादी के मतवालों में असीम ऊर्जा का संचार हुआ और इंडियन हॉउस में चैतन्य आ गया। बैरिस्टरशिप को लेकर सावरकर के मन में उत्साह नहीं था,दरअसल वे यूरोप में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मसाल जलाकर दुनिया भर में अंग्रेज सत्ता और उपनिवेश के प्रति जागरूकता फैलाना चाहते थेअभिनव भारत एक गुप्त संस्था थी,इसमें युवकों को जोड़ने के लिए उन्होंने फ्री इण्डिया सोसायटी का गठन कियाहर रविवार को इसकी बैठक आयोजित की जाती जिसमे सावरकर का मुख्य उदबोधन होताअपनी संस्कृति,सभ्यता के मूल्यों और स्वराज की उत्कंठा से प्रेरित उनका भाषण युवाओं को अभिभूत कर देताअपने उदबोधन में सावरकर 1857 के संग्राम के वीरों के चरित्र को प्रभावी शैली में प्रस्तुत करतेविनायक दामोदर सावरकर पहले भारतीय थे जिन्हे दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस पर सावरकर मुस्कुराते हुए बोले,अंततः अंग्रेज़ हुकूमत ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान ही लिया। उनके गले में 40 साल कारावास का पट्टा देखकर जेलर ने उनसे पूछा की क्या तुम इतने साल की सजा काटने तक जीवित रहोगे। वीर सावरकर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि,मैं जरुर जीवित रहूँगा लेकिन उसके पहले ही ब्रिटिश हुकूमत भारत से समाप्त कर दी जाएगी।" इतिहास गवाह है,वीर सावरकर की भविष्यवाणी अक्षरश: सही साबित हुई।

 


 

इंदिरा गांधी की नजर में वीर सावरकर

इंदिरा गांधी ने अपने एक साक्षात्कार में एक दिलचस्प बात कही थी की भारत की विभिन्नताओं की विशेषताओं में राष्ट्रप्रेम शामिल होता है,और यही इस विशाल राष्ट्र की शक्ति है। वास्तव में वीर सावरकर का उग्र राष्ट्रवाद भारत की सार्वभौमिकता से कभी मेल नहीं खाता था लेकिन इससे उनके राष्ट्र के प्रति बलिदान को कभी कमतर नहीं आँका जा सकता। हालांकि उनका व्यक्तिव बहुत विवादास्पद रहा जो उनके खान पान से लेकर वैचारिक तौर पर भी सामने आया। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के शक़ में विनायक दामोदर सावरकर को मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया गया था। बाद में उन्हें फ़रवरी 1949 में इस आरोप से बरी कर दिया गया था।


आज गांधी भी नहीं है और सावरकर भी नहीं है। भारत की विविधता,धार्मिक एकता और सार्वभौमिकता के लिए महात्मा गांधी के विचार अपरिहार्य नजर आते है।  वहीं सावरकर को भी अप्रासंगिक नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का बहुमूल्य समय भारत की आज़ादी के प्रयासों में और फिरंगियों का विरोध करते हुए बिताया था। गांधी और सावरकर के रास्ते अलग अलग थे। गांधी आलोचना से दूर रहकर रचनात्मकता में भरोसा करते थे। उनकी रचनात्मकता में प्रखर राष्ट्रवाद की उग्रता कभी दिखाई नहीं दी,इसलिए महात्मा गांधी से वीर सावरकर को किसी भी प्रकार से जोड़े जाने की जरूरत भी नहीं होना चाहिए।

 

असरदार अपराधियों पर नजरिया,राष्ट्रीय सहारा

 

राष्ट्रीय सहारा 13 oct 2021

                 


                                                


मध्यप्रदेश के सागर के रहने वाले सहोदरा और राजू यादव का नाम शायद ही किसी को याद होगा। सहोदरा बाई ने 13 मई 2008 को उसके देवर पप्पू की हत्या का मामला दर्ज कराया था। इसके बाद इस परिवार पर पुलिस और न्याय व्यवस्था का कहर टूट पड़ा। पुलिस ने इस मामले में सहोदरा बाई,उनके पति राजू यादव व रिश्तेदार माधव पर उल्टा हत्या का मामला दर्ज कर जेल भेज दिया। इस दौरान उनके मासूम बच्चें रोते बिलखते रहे और दर दर ठोकरें खाने को मजबूर हो गए। पुलिस की जाँच पर भरोसा करते हुए आरोपियों को निचली अदालत ने उम्र कैद की सजा सुना दी। 13 साल जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस दम्पत्ति को बेगुनाह मानते हुए रिहा करने के आदेश दिए और पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। इन 13 सालों में सहोदरा और राजू यादव की एक बेटी और दो बेटों ने मजदूरी करते हुए अपना बचपन बीता दिया। उनकी पढाई छूट गई। लेकिन इन सब के बीच तीनों भाई-बहनों ने मिलकर न्याय के लिए लड़ाई जारी रखी । जिला न्यायालय से लेकर हाईकोर्ट तक वकीलों को फीस दी और सुप्रीम कोर्ट तक गए। इस साल वे अपने निर्दोष मां-बाप को छुड़ाकर लाने में सफल हो गये। हिंदुस्तान में ऐसे हजारों मामलें मिल जायेंगे जहां कई आरोपी लंबी जेल काटने के बाद बेगुनाह करार दिए जाते है। इन सबमें आरोपियों को लेकर समाज का नजरिया बेहद सख्त देखने में आता है। लेकिन जब रसूखदार लोगों पर पुलिस कार्रवाई की बात आती है तो वे गुनाहगार होने के बावजूद आम जन के द्वारा मासूम करार दे दिए जाते है।




दरअसल क्रूज पर ड्रग्स रेव पार्टी में शामिल होना आम आदमी के वश की बात नहीं है,इसमें लाखों रूपये खर्च कर शामिल हुआ जाता है। हाल ही में शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन खान और कई रईसजादो को नारकोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो ने मुंबई से गोवा जा रहे एक क्रूज में छापेमारी कर एक रेव पार्टी का भंडाफोड़ कर गिरफ्तार किया तो इसकी दिलचस्प प्रतिक्रिया देखने को मिली।


कभी हां कभी ना फिल्म में शाहरुख के साथ नजर आ चुकीं सुचित्रा कृष्णमूर्ति ने ट्वीट किया और लिखा कि बॉलीवुड को निशाना बनाने वालों के लिए, फिल्मी सितारों पर सभी एनसीबी छापे याद हैं? हां कुछ नहीं मिला और कुछ भी साबित नहीं हुआ,यह एक तमाशा है। प्रसिद्धि की कीमत। जाहिर है सुचित्रा ने भारत की स्थापित वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने से गुरेज नहीं किया जबकि ऐसी हिमाकत करने पर कई विद्वान,पत्रकार और प्राध्यापक स्थापित वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने के आरोप में जेल में डाल दिए जा चुके है। 


जाने माने अभिनेता सुनील शेट्टी ने आरोपियों का बचाब करते हुए कहा कि,जब एक जगह रेड होती है तो वहां बहुत सारे लोग होते है। ऐसे में हम ये क्यों मान लेते हैं कि बच्चे ने ड्रग्स ही लिया है। उस बच्चे को सांस लेने की जगह देते हैं। जब हमारी इंडस्ट्री में कुछ भी होता है तो मीडिया एकदम से टूट पड़ती है। यह देखा गया है कि मुम्बई की माया नगरी का बर्ताव अपराध को लेकर बेहद लचीला रहा है। 1993 के मुम्बई ब्लास्ट के बाद हथियारों के साथ पकड़े गए संजय दत्त को मासूम कहकर छोड़ने की सार्वजनिक अपील कई बार सामने आई थी।


इन सबके बीच बॉलीवुड की बेहिसाब चमक दमक में अंडरवर्ल्ड की बेतहाशा अवैध कमाई की भूमिका सामने आती रही है और नशे के व्यापार से आने वाला पैसा यहां लगाने के तथ्य भी सामने आये है। ड्रग्स और मादक पदार्थों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां पर्दे के पीछे यह स्वीकार करती है कि उनके द्वारा तस्करी का जो मॉल पकड़ा जाता है वह 2 फीसदी भी नहीं होता। साफ़ है कि मादक पदार्थों की तस्करी भारत में बड़ा व्यापार है बल्कि उसका उसका ढांचा इतना मजबूत है कि उसे खत्म किया जाना आसान नहीं है। देश के कई उद्योगपतियों और राजनेताओं को रियल स्टेट और स्टॉक एक्सचेंज में अपना व्यवसाय चलाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए और उसका सबसे बड़े माध्यम मादक पदार्थों की तस्करी है। जिसमें उद्योगपतियों,राजनेताओं,पुलिस के चुनिंदा आला अधिकारियों और अपराधियों का मजबूत गठजोड़ होता है। नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2 करोड़ लोग अफीम,3 करोड़ से ज्यादा गांजा और पूरे देश में करीब 8.5 लाख लोग ड्रग्स इंजेक्ट करते हैं। भारत में इस समय कैनाबिस से लेकर ट्रामाडोल जैसी नशीले पदार्थों का उपयोग हो रहा है। इस   नशीले कारोबार से जुड़े लोगों की धर पकड का सदैव स्वागत किया जाना चाहिए। फिर चाहे उसका आरोपी कोई भी क्यों हो। 


अन्य देशों में अपराध को लेकर आम नजरिया समानता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।  चीन की पुलिस ने चीनी-कनाडाई पॉप स्टार क्रिस वू को कथित तौर पर यौन संबंध बनाने के लिए कई बार युवा महिलाओं को धोखा देने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया । गायक, अभिनेता, मॉडल और टैलेंट शोज़ के जज के रूप में भी काफी ख़्याति अर्जित करने वाले क्रिस वू की करतूतों को नादानी कहने का साहस किसी ने नहीं दिखाया।  वही मैनचेस्टर सिटी के स्टार फुटबॉलर कायले वॉल्कर और इंग्लिश प्रीमियर लीग की टीम चेल्सी के राइजिंग स्टार कैलम हडसन ओडोई को कोरोना के नियमों को भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था।

कानून का शासन सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित होता है। इसी कारण सभी लोग कानून की आज्ञा का पालन करते हैं। जिस राजनीतिक समाज में कानून को उचित महत्व दिया जाता है। वहीं पर कानून के शासन की स्थापना हो जाती है। कानून का शासन अनेक संविधानिक व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण सिद्धान्त के रूप में कार्य करके नागरिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं का रक्षक बना हुआ है। भारत में कानून के शासन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक रूप से पारदर्शिता और  एक राय की बेहद जरूरत महसूस की जाती रही है।


ब्रिटेन के राजा या रानी को कुछ विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। उस पर कानून की सीमाएं नहीं लगाई जा सकती हैं। विदेशों में भेजे जाने वाले राजदूतों व विदेश विभाग के कर्मचारियों को भी कुछ विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां प्राप्त हैं। लेकिन भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग उद्योगपतियों,राजनेताओं या फ़िल्मी कलाकारों को भी ऐसी ही उन्मुक्तियां देने के पक्ष में अक्सर खड़ा हुआ नजर आता है। कानून का पालन सबके लिए बाध्यकारी है,इस बार पर सब अक्सर एक मत होते है लेकिन कानून के पालन को लेकर नजरिये में अक्सर विरोधाभास नजर आता है।


ऐसा माना जाता है कि न्याय की अवधारणा व्यक्ति की उचित या तर्कशील भावना पर आधारित है। जो कुछ व्यक्तियों  की अंतरात्मा को भाता है वह न्यायपूर्ण है और जो उसकी अंतरात्मा को प्रसन्न नहीं करता है,वह उसकी दृष्टि में अन्यायपूर्ण है। भारत जैसे देश में आम जन की दृष्टि न्याय को लेकर तर्कशील होने के साथ मानवीय होने लगे तो निश्चित तौर पर इसका फायदा सहोदरा और राजू यादव जैसे गरीब लोगों को मिलेगा। बहरहाल उद्योगपतियों,राजनेताओं या फ़िल्मी कलाकारों और उनकी संतानों को कानून से ऊपर समझने का तंत्र कम से कम भारत में स्थापित न हो,यह हम सबकी जिम्मेदारी है

खतरा बनती किम की मिसाइले जनसत्ता kim north koria

 

जनसत्ता


                     


क्रूज़ मिसाइलें कम ऊंचाई और धीमी रफ़्तार से अपने लक्ष्य की ओर जाती हैंये  मिसाइलें लक्ष्य की ओर जाते समय कई बार मुड़ सकती हैं और दिशा बदलते हुए कहीं से भी हमला कर सकती हैंउत्तर कोरिया की राष्ट्रीय और वैदेशिक नीति कई दशकों से क्रूज की तरह ही अप्रत्याशित और असहज करने वाली रही है,इसीलिए समूचा विश्व इस देश से आशंकित रहता हैउत्तर कोरिया एक बार फिर बैलेस्टिक और क्रूज़ मिसाइलों का परीक्षण कर अपने आक्रामक इरादों का इजहार कर रहा है। इसका  एक प्रमुख कारण चीन की कुटिल भूमिका भी है। वह बड़ी चालाकी से एशिया प्रशांत क्षेत्र के अपने विरोधियों को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया का उपयोग करता रहा है। बीते कई वर्षों से उत्तर कोरिया के परमाणु और बैलेस्टिक मिसाइलों के निरंतर परीक्षण के बाद भी चीन ने उसे संयुक्तराष्ट्र के आर्थिक प्रतिबंधों से अप्रभावित और अमेरिका के किसी सैन्य आक्रमण से लगातार बचाएं रखा है। उत्तर कोरिया पर विध्वंसक हथियारों की तस्करी के कई मामलें सामने आ चूके है और यह जाल सीरिया से लेकर म्यांमार तक फैला हुआ है। अब तालिबान जैसे संगठन भी इस अवसर की प्रतीक्षा में है कि वे परमाणु हथियार और मिसाइल हासिल कर ले। जाहिर है दुनिया को आतंकवाद और अशांति से बचाने के लिए उत्तर कोरिया को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है।



 

हाल ही में अमेरिका,ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए ऑकस  समझौते का उत्तर कोरिया ने विरोध करते हुए इसे कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु हथियारों का जखीरा जमा करने वाला कदम बढ़ाया हैऑकस  समझौते के तहत अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया को न्यूक्लियर पन्नडुबी की तकनीक मुहैया करवाएगा वास्तव में इस नए सुरक्षा समझौते को एशिया पैसेफ़िक क्षेत्र में चीन के प्रभाव से मुक़ाबला करने के लिए बनाया गया है। चीन ने इस समझौते को खतरनाक बताया था। ऐसा लगता है कि चीन बड़ी चालाकी से एशिया प्रशांत क्षेत्र के  अपने विरोधियों को धमकाने के लिए एक बार फिर उत्तर कोरिया को सामने कर रहा है। वास्तव में शक्ति संतुलन के सिद्धांत और उसके व्यवहारिक प्रयोग में भारी अंतर्विरोध पाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद कुछ वर्षों तक यह महसूस किया गया था कि सामूहिक सुरक्षा के लिए सैन्य गठबंधनों की आपसी प्रतिद्वंदिता  को रोकने में मदद मिलेगी और शक्ति संतुलन का प्रभाव कम होगा।  लेकिन वैश्विक स्तर पर इस समय अव्यवस्था हावी है और कई राष्ट्र अराजकता और अशांति को बढ़ावा दे रहे है।


दरअसल दुनिया में विभिन्न राष्ट्रों के व्यवहारों को नियंत्रित करने के लिए किसी केन्द्रीय एजेंसी का अभाव न्याय,सुरक्षा एवम् शांति व्यवस्था की राह में संकट बन गया है। कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया की बेलगाम आक्रामकता और अपेक्षाकृत शांत रहने वाले दक्षिण कोरिया का उसके जवाब में पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल के परीक्षण से आणविक युद्द का खतरा बढ़ गया है  इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि कोरियाई प्रायद्वीप में वैश्विक शक्तियाँ आपने सामने है और अमेरिकी पूंजीवाद का सामना चीन और रूस के साम्यवादी आक्रामकता से है। कोरिया को लेकर महाशक्तियां दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही आमने सामने रही है। उत्तर कोरिया की साम्यवादी सरकार ने 1950 में जब दक्षिण कोरिया पर हमला किया था,तब उसे बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सेना की कमान एक अमेरिकी जनरल मैक ऑर्थर के हाथों में थी। लेकिन तब भी उस युद्ध का निर्णायक समाधान इसलिए नहीं हो सका था,क्योंकि चीन के उत्तर कोरिया के साथ आने का अंदेशा था और आज भी हालात जस के तस है। इस घटना के बाद लगभग 7 दशकों से दक्षिण कोरिया के अमेरिका से गहरे आर्थिक और सामरिक संबंध है और अमेरिका उत्तर कोरिया  को लेकर बेहद आक्रामक नीति अपनाएं हुए है। वहीं उत्तर कोरिया में साम्यवादी सत्ता को मजबूत करके रूस और चीन अपने वैश्विक हितों का संवर्धन कर रहे है


इस प्रायद्वीप की समस्या के शांतिपूर्ण निपटारे  के लिए  पूंजीवाद और साम्यवाद  को मित्रता करनी होगी,और इसकी संभावना कहीं नजर नहीं आती सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध उत्तर कोरिया को बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण से रोकता है लेकिन क्रूज़ मिसाइलों के परीक्षण का प्रतिबंध उस पर लागू नहीं होता हैइसके पहले  अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी यह आंकलन किया था कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों के लिए प्लूटोनियम का उत्पादन कर रहा है। अब क्रूज़ मिसाइलों और फिर उसके बाद बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण दिखाता है कि उत्तर कोरिया ने अपने मिसाइल विकसित करने,टेस्ट करने और उसके मूल्यांकन के अभियान को दोबारा शुरू कर दिया हैउत्तर कोरिया जिन विध्वंसक हथियारों के निर्माण के संलग्न है उसमें नई अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल,परमाणु सक्षम बैलेस्टिक मिसाइल और पनडुब्बी-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल शामिल है


उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की सामरिक नीति भय और सौदेबाजी से प्रेरित रही है। 1990 के दशक में एनपीटी पर सहमति जताने वाला उत्तर कोरिया करीब डेढ़ दशक बाद ही इस संधि से हट गया था।  किम जोंग हथियारों के निर्माण को राष्ट्रीय सुरक्षा आत्म-निर्भरता से जोड़ते है लेकिन उनके इरादें आशंकित करते रहे है समस्या यह भी है कि तमाम वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी उत्तर कोरिया को काबू में नहीं किया जा सका हैनवम्बर 2017 में प्योंगयांग ने अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर दुनिया को ठेंगा दिखाने की कोशिश की थी,जिसके जवाब में संयुक्तराष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया की पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति पर कड़े  प्रतिबन्ध लगाये थे। इन प्रतिबंधों में खास तौर पर पेट्रोलियम पदार्थो को शामिल किया गया है। उत्तर कोरिया अधिकांश पेट्रोलियम पदार्थों का इस्तेमाल अपने अवैध परमाणु और बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरा करने के लिए करता है।


कोरियाई प्रायद्वीप में समुद्र के रास्ते तस्करी करने की भौगोलिक संभावनाएं उत्तर कोरिया के लिए मुफीद भी हैइसके पश्चिम में पीला सागर है,पूर्वी चीन सागर दक्षिण में है और जापान सागर इसके पूर्व में हैअंतर्राष्ट्रीय नजरों से बचकर समुद्री रास्तों से ही उत्तर कोरिया के हितों की पूर्ति हो जाये इसके लिए उसने अपने द्वीपों को ही विकसित कर लिया हैइस समय  उत्तरी कोरिया समुद्र के अंदर रहस्यमय कृत्रिम द्वीप बना रहा है जिसका इस्तेमाल वह  सैन्य योजनाओं के लिए करेगाइन मानव-निर्मित द्वीपों का निर्माण येलो सी में कराया जा रहा हैउत्तर कोरिया अपने समुद्री द्वीपों का उपयोग परमाणु और मिसाइल परीक्षण के लिए भी करता रहा है


दुनिया के सामने उत्तर कोरिया द्वारा हथियारों का अवैध व्यापार करना बड़ी चुनौती बन गया है। यदि इसे सख्ती से रोका नहीं गया तो वह समय दूर नहीं जब आतंकियों के पास ऐसी हायपरसोनिक क्रूज मिसाइलों का भंडार होगा जो ध्वनि से पांच गुना तेज रफ्तार से उड़कर किसी दूरस्थ देश में कोहराम मचा देंगी। फ़िलहाल उसकी अर्थव्यवस्था चीन और रूस की सहायता से समुद्र में होने वाली तस्करी से चल रही है। उत्तर कोरिया पर यूएन के आर्थिक प्रतिबंधों के बाद भी चीन और रूस उसक साथ व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं। ये साम्यवादी देश अमेरिकी को चुनौती देने के उत्तर कोरिया को रोजमर्रा की जरूरतों का सामान मुहैय्या कराते हैं साथ ही उसे परमाणु ईंधन और हथियार बनाने के लिए धन, साधन और तकनीक भी देते रहे है


दक्षिण कोरिया की 1953 से अमरीका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में हजारों अमरीकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैंमिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार हैवही चीन और उत्तर कोरिया के बीच 1961 से पारस्परिक सहायता और सहयोग के रक्षा संधि हैं। अमेरिका और चीन दोनों एक  दूसरे के कड़े प्रतिद्वंदी है। चीन पर निगाहें रखने के लिए अमेरिका  के लिए दक्षिण कोरिया सामरिक रूप से मुफीद ठिकाना है,वहीं अमेरिका और जापान को धमकाने के साथ  समुद्र में अपना प्रभुत्व कायम रखने के लिए चीन को उत्तर कोरिया की जरूरत है।


इस क्षेत्र में शांति की उम्मीदें 2018 में दिखाई पड़ी थी  उस समय उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन से मुलाक़ात करने के लिए दक्षिण कोरिया पहुंच गए थे 1953 में कोरियाई युद्ध के बाद ये पहला मौक़ा था जब किसी उत्तर कोरियाई नेता ने दक्षिण कोरियाई ज़मीन पर पैर रखा थाइस मौके पर उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया ने संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करके पूरे कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से आज़ाद करने के साझा मक़सद पर सहमति जताई थी। हालांकि यह उत्तर कोरिया का आर्थिक प्रतिबंधों को कम करके देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर करने का प्रयास था। यह देखा गया है कि उत्तर कोरिया आवश्यकता अनुसार शांति के करार करने और उसे तोड़ने का माहिर खिलाडी है। इस साल मई में  अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि वह उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन से मुलाक़ात करने के लिए तैयार हैं लेकिन दोनों के बीच उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चर्चा होनी चाहिए हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के लिए उत्तर कोरिया को मनाना मुश्किल काम होगा जाहिर है बाइडन यह जानते है कि उत्तर कोरिया चीन की दबावकारी और आक्रामक वैश्विक नीतियों में भागीदार हैबाइडन से पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किम जोंग-उन के साथ तीन बार मुलाक़ात की थी जिसका कोई नतीजा नहीं निकला था।


अमेरिका तथा दक्षिण कोरिया के सामरिक संबंध बहुत गहरे है,दक्षिण कोरिया अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीददार भी है। जबकि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था और सामरिक क्षमता पर चीन का कब्जा है। उत्तर कोरिया अपनी जीडीपी का बड़ा हिस्सा सेना पर खर्च करता हैयह जीडीपी के 25 फ़ीसदी को सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करता है। रूस और चीन के लिए उत्तर कोरिया हथियारों का बड़ा बाज़ार है। कोरियाई प्रायद्वीप में उत्तर कोरिया के विध्वंसक हथियारों के परीक्षण का जवाब दक्षिण कोरिया से भी आक्रामक तरीके से मिलने से युद्द की आशंकाओं को बल मिला है,ऐसे में एशिया प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर नया संकट गहरा गया है। बाइडन चीन को लेकर सख्त है और उनकी यही नीति उत्तर कोरिया को लेकर भी देखने को मिल सकती है। विश्व शांति के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है

धर्म या गांधी ...? पॉलिटिक्स

 

 पॉलिटिक्स                             

                       


                                                               

दुनिया को धर्म की ज्यादा जरूरत है या गांधी की। मानव अस्तित्व को बचाएं रखने के लिए यह विचार किए जाने की जरूरत बार बार पड़ रही है। धर्म का अर्थ सदाचार,शांति,सहिष्णुता और संयम है। धर्म को देखने की दृष्टि सबकी अलग अलग हो सकती है लेकिन जब इस दृष्टि में श्रेष्ठता के भाव आ जाते है तो वह उसके  विध्वंसक होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। गांधी के सहयोगी विनोबा भावे ने कहा था कि गांधी के विचारों में सदैव ऐसा मनुष्य और समाज रहा जहां वह करुणा मूलक,साम्य पर आश्रित स्वतंत्र लोक शक्ति के रूप में वह आगे बढ़े।


भारत  में कितने गांधीवादी है इसे लेकर बहस किए जाने की कोई जरूरत नजर नहीं आती क्योंकि गांधी की अस्मिता को चुनौती राज दर्शन का मनपसन्द अध्याय बना दिया गया है लेकिन बाकि विश्व भारत को गांधी के नजरिये से बार बार देखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में जब अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से व्हाइट हाउस में मुलाकात की तो दोनों ने महात्मा गांधी को  खूब याद किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने महात्मा गांधी को लेकर कहा कि विश्व को आज उनके अहिंसा, सम्मान और सहिष्णुता के संदेश की जितनी जरूरत है,उतनी शायद पहले नहीं थी। धार्मिक असहिष्णुता से न  तो अमेरिका बचा है और नही भारत। जबकि इन दोनों देशों को दुनिया में लोकतंत्र के लिहाज से बेहतर माना जाता है।


भारत का धर्मभीरु और कथित परम्परावादी विद्वतजन गांधी से उद्देलित होता रहता  है। यहाँ के सामान्य नागरिक के लिए गांधी एक ऐसा रहस्य है जिसे वह समझने की कोशिश भर करता रहता  है। युवा पीढ़ी के लिए गांधी अबूझ सी पहेली है,और वह अप्रत्यक्ष स्रोतों से हासिल आधे अधूरे ज्ञान से गांधी का मूल्यांकन करते  रहते  है। संस्कृतिवादी अपने सांचे में ढालकर गांधी का अक्स कई मोर्चो पर बदलते नजर आते है। दक्षिणपंथियों के लिए गांधी एक घाव की तरह है,जिसे याद कर वे बार बार कराहते रहते है। वामपंथियों अक्सर स्थापित वैधानिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होते है ऐसे में गांधी का अस्तित्व ही उन्हें स्वीकार नहीं। यदि बात सियासत की की जाए तो वह रामघाट की और बार बार देखती है और समयानुसार गांधी को परखती है। कभी वे  स्वच्छता के प्रतीक बना दिए जाते है तो कभी साम्प्रदायिकता की झाड़ू से उनके सार्वभौमिकतावाद को मिटा देने की कोशिश की जाती है। वे कभी वसुदैव कुटुम्बकम के प्रतीक होते है तो कभी कभी अम्बेडकर के साथ उनकी तस्वीर लगाने से ख़ामोशी से परहेज कर लिया जाता है। पाकिस्तान में वे हिन्दुओं के प्रतिनिधि के तौर पर इस प्रकार गढ़ दिए गए जैसे जिन्ना कथित पृथकतावादी मुसलमानों की उन्मादी भीड़ के साथ अलग देश बनाने में कामयाब हो गए थे।


महात्मा गांधी से एक प्रार्थना सभा में यह पूछा गया कि क्या इस्लाम और ईसाई प्रगतिशील धर्म है जबकि हिन्दू धर्म स्थिर या प्रतिगामी। इस पर गांधी ने कहा कि,”नहीं मुझे किसी धर्म में स्पष्ट प्रगति देखने को नहीं मिली,अगर संसार के धर्म प्रगतिशील होते तो आज विश्व जो लड़खड़ा रहा है वह नहीं होता।“ दरअसल धर्म को लेकर क्या दृष्टि होना चाहिए और इसे दिशा कौन दे,इसे लेकर आधुनिक समाज अंतर्द्वंद से घिरा नजर आता है और इस विरोधाभास में राजनीतिक हित मानवीय संकट को व्यापक स्तर तक बढ़ा रहे है। धर्म यदि व्यक्तिगत आस्था तक सीमित है और इसकी सुरक्षा को लेकर व्यक्तिगत चिंताएं व्यक्ति महसूस करता है तो इससे धार्मिक विद्वेष बढ्ने की आशंका बनी रहती है। दुनिया के सामने व्यक्तिगत आस्था से उठा यह मानवीय संकट यूरोप के प्रगतिशील समाज से लेकर भारत,पाकिस्तान,श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे पिछड़े देशों तक दिखाई भी देता है।


द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह अपेक्षा की गई थी की आधुनिक दुनिया मध्यकालीन धार्मिक द्वंद को पीछे छोड़कर समूची मानव जाति के विकास पर ध्यान देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दुनिया भर में आस्था को अंधविश्वास से तथा धार्मिक हितों को व्यक्तिगत सम्मान से जोड़ने की राजनीतिक विचारधाराएँ बढ़ गई,इसके साथ ही सत्ता प्राप्त करने का इसे साधन भी बना लिया गया। महात्मा गांधी इसे लेकर आशंकित तो थे ही।  

गांधी ने अंग्रेजी शासन में हिन्दू मुसलमानों में एकता की कोशिशों से पूरी दुनिया में सार्वभौमिकता का सन्देश दिया। उन कोशिशों के अवशेष अब राजनीति के कहकरे में कहीं नजर नहीं आते।  कुछ मिसालें अवश्य है। भारत के राष्ट्रवादी राष्ट्रपति कहे जाने वाले डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने कार्यकाल में संसद में अपने भाषण के दौरान पंथनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल कर यह संदेश देने कि कोशिश कि थी  की धर्म आस्था का विषय है जबकि हम सबकी पहचान भारतीय ही हो सकती है। डॉ. कलाम ने अपने जीवनकाल में कोई भी एक ऐसी बात नहीं की या आचरण नहीं किया जिससे यह लगे कि किसी धर्म विशेष के प्रति उनका लगाव या झुकाव था। गांधी में  सर्वधर्म समभाव से सबसे ज्यादा जिन्ना डरते थे। जिन्ना के कुत्सित इरादों को गाँधी बखूबी जानते थे  और वे किसी भी कीमत पर देश का विभाजन रोकना चाहते थे।  महात्मा गांधी ने  माउन्टबेटन के सामने इस शर्त पर जिन्ना को देश का प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा था कि जिन्ना की मंत्री परिषद् जो भी कदम उठाए वे कुल मिलाकर भारतीय जनता के हित में हो। वास्तव में देश को विभाजन से बचाने का ये अनूठा तरीका गांधी ने अपनाया था और गांधी जिन्ना की हसरतों से पूरी तरह वाकिफ भी थे,हालांकि गांधी के इन विचारों से कभी जिन्ना को अवगत नहीं कराया गया।


अब गांधी नहीं है लेकिन धर्म है। यदि धर्म हिंसा का कारण बने तो यह विचार किया जाना चाहिए की हमें किसकी जरूरत है,धर्म की या गांधी की।  गांधी धार्मिक हिसा को मानवता के लिए कलंक मानते थे। वे अब भी याद दिलाते है कि हिंसा हिंदुस्तान के दुखों का इलाज नहीं है और उसकी संस्कृति को देखते हुए उसे आत्मरक्षा के लिए कोई अलग और ऊँचे प्रकार का अस्त्र काम में लाना चाहिए।


हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने धर्म को लेकर अपना मत रखते हुए कहा कि,कोई भी मुल्क तभी एक राष्ट्र माना जाएगा जब उसमे दूसरे धर्मों के समावेश करने का गुण आना चाहिए। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्मों में दखल नहीं देते,अगर देते है तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है।

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...