शनिवार, 10 जुलाई 2021

चरमपंथियों के हवाले अफगानिस्तान,afganistan,taliban,amerika

 राष्ट्रीय सहारा

 

                 


 

शक्ति,द्वंद,प्रतिस्पर्धा और प्रयोग की वैश्विक कूटनीति की नाकामी का यह सबसे बड़ा उदाहरण है,जो चरमपंथियों की गुरिल्ला मोर्चाबंदी के सामने अंततः पस्त पड़ गयाअशांति,अस्थिरता और मानव अपराधों के जंजाल में उलझे हुए अफगानिस्तान के करोड़ों लोगों को विश्व समुदाय से यह अपेक्षा थी की वे शांति और खुशहाली के राज्य की स्थापना की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ेगेलेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ और दो दशक के बाद फिर से तालिबान के मध्ययुगीन कानूनों के हवाले इस देश को कर दिया  गया हैबिना किसी ठोस समझौते और योजना के नाटो और अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से लौट चूके है और इसी के साथ मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को भारतीय उपमहाद्वीप से जोड़ने वाले देश अफगानिस्तान में शांति स्थापना की आशाएं भी खत्म हो गई  हैचरमपंथी तालिबान के बेलगाम लड़ाके अफगानिस्तान के कई क्षेत्रों में कोहराम मचाते हुए काबुल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैउनके अत्याचारों और नृशंसता का खौफ इस कदर है कि सुरक्षा बलों का मनोबल भी गिर गया है और वे बिना किसी प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर रहे हैं


अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में हिंसा अचानक से बढ़ गई है और तालिबान का ज़्यादा से ज़्यादा इलाक़ों पर नियंत्रण बढ़ाता जा रहा हैतालिबान ने ताजिकिस्तान से  लगे हुए सीमावर्ती प्रांत बदाख्शान में कई क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है तालिबान चरमपंथियों के साथ संघर्ष के बाद अफ़ग़ानिस्तान के एक हज़ार से अधिक अफ़ग़ान सैनिक अपनी जान बचाने के लिए पड़ोसी देश ताजिकिस्तान भाग गए हैं


दरअसल नाटो और अमेरिका अफगानिस्तान में शांति का स्थायी समाधान खोजने में बुरी तरह विफल  रहे हैयहां सैन्य गतिविधियों में होने वाले अरबों डॉलर की चुनौती से आर्थिक और सामरिक शक्तियां भी घबरा गई है। अब उन्होंने अफगानिस्तान को उस रास्ते पर छोड़ दिया जहां से यह देश पुनः 1990 के दशक की स्थिति की ओर लौट सकता है,जहां गृहयुद्द,हिंसा और  चरमपंथ के पनपने की स्थितियां मजबूत थी


इस समय तालिबान के डर से काबुल में स्थित कई विदेशी दूतावास बंद हो गए है तथा विदेशी लोग अफगानिस्तान को छोड़कर जा रहे हैतालिबान से यह अपेक्षा बेमानी है कि वह किसी शिष्टाचार,आदर्श या अंतराष्ट्रीय नियमों का पालन करेगाइन सबके बीच देश की आधी आबादी अर्थात् महिलाएं और लडकियां निराशा और हताशा से भर गई हैऐसा लगता है कि कुछ ही दिनों बाद काबुल से वह पोस्टर  गायब हो जाएंगे जिसमें लडकियों को स्कूल जाते हुए दिखाया गया है आपको याद होगा कि तालिबान के शासन में लडकियों का स्कूल जाने पर प्रतिबन्ध था जबकि इस समय अफ़गानिस्तान में लगभग एक करोड़ बच्चे स्कूल जा रहे हैं जिनमें अच्छी-ख़ासी संख्या लड़कियों की भी है अफ़ग़ानिस्तान की संसद में आज कम से कम 25 फ़ीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैंअफ़गान महिलाएँ आज  मीडिया और  कला जैसे क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर काम कर रही हैं और कई युवा महिलाएँ अधिकारी भी हैंब्रिटेन के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल सर निक निक्टर ने दावा किया था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अफगानिस्तान में एक सभ्य समाज का निर्माण किया है और वे अधिक खुले दिमाग वाले हो गए हैं। वास्तव में तालिबान को लेकर यह दावा गलत नजर आता हैउसके किसी भी प्रतिनिधिमंडल में कोई महिला प्रतिनिधि नहीं रही तालिबान ने महिलाओं के लिए एक कड़ा ड्रेस कोड लागू किया था जिसके तहत अगर कोई महिला नीले रंग की चदरी से सिर से पाँव तक नहीं ढंकी होती थी तो उसे कोड़े मारने की सजा दी जाती थीतालिबान अब भी देश में इस्लामिक और शरीयत पर आधारित शासन की बात कहता रहा है जिसमें महिलाओं की बेहतर जिंदगी की कोई उम्मीद नजर नहीं आती है


नाटो और अमेरिका ने तालिबान के साथ एक समझौता किया था जिसके तहत ये तय हुआ था कि विदेशी सैनिक वहाँ से निकल जाएँगे और बदले में तालिबान वहाँ अल-क़ायदा या किसी अन्य चरमपंथी गुट को अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में गतिविधियाँ नहीं चलाने देगातालिबान का शासन हिंसा पर आधारित है और इससे चरमपंथी गुट न केवल पनपेंगे बल्कि दुनिया में आतंकवाद बढने की आशंका भी बढ़ेगीअफगानिस्तान में अधिकांश समय पश्तूनों का ही राज रहा है और तालिबान भी मुख्यतया पश्तूनों और सुन्नी मुसलमानों का ही संगठन है  नाटो द्वारा 2001 में तालिबान को सत्ता से बेदखल करने के बाद से अफगानिस्तान के बड़े जातीय-अल्पसंख्यक समूह तालिबान के प्रभाव से दूर रहे है और वे तालिबान को स्वीकार करने को तैयार भी नहीं हैभौगोलिक और जनसांख्यिकीय दोनों लिहाज से अफगानिस्तान के गैर-पश्तून समूहों में देश की आधी से अधिक आबादी शामिल है। मात्र ताजिक,उज्बेक और हजारा समूह ही देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैंतालिबान के शासन में हजारा समूह के लोगों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था। करीब चार दशक पहले सोवियत सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद वहां विभिन्न समूहों में टकराव गृहयुद्ध में तब्दील हो गया था जिसका अंत काबुल पर तालिबान के कब्जे से हुआ था। 2001 के बाद इन बीस सालों में इस गैर-पश्तून समुदायों ने अपनी स्थिति बेहद मजबूत कर ली है और उनकी युवा पीढ़ी तालिबान के प्रभाव को खत्म करने के लिए तैयार है। वे अपने घरों में हथियार जमा कर रहे है और यह भयावह स्थिति उत्पन्न होने का स्पष्ट संदेश है।  अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता  के बढने से इस्लामिक स्टेट और अलकायदा  के मजबूत होने की संभावनाएं बढ़ गई है।  इस्लामिक स्टेट ने बहुत कम समय में अफ़ग़ानिस्तान के कम से कम पांच प्रांतों हेलमंद,ज़ाबुल,फ़राह,लोगार और नंगरहार में अपनी मौजूदगी का अहसास कराया हैं,अब इनके बीच संघर्ष और बढ़ेगा।


अफगानिस्तान में लोकतंत्र और वैधानिक शासन के खिलाफ तालिबान के मन में गहरी नफरत रही हैइसे ढाई दशक पहले दुनिया ने बदतरीन रूप में देखा था 1996 में यूएनओ के दफ़्तर में घुसकर अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्र प्रमुख नजीबुल्लाह की तालिबान ने न केवल निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी थी बल्कि लोगों को डराने के लिए उन्हें लैंप पोस्ट पर टांग भी दिया थाएक बार फिर अफगानिस्तान उसी मुहाने पर खड़ा नजर आता है जहां लोकतन्त्र समर्थक नेताओं की जिंदगी संकट में पड़ गई है। दूसरी ओर पाकिस्तान का तालिबान को खुला समर्थन रहा है,अत: वह तालिबान नियंत्रित अफगानिस्तान को पसंद करेगा,लेकिन भारत के लिए स्थिति इसके ठीक उलट है

पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं में लगभग तीन अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया हैकई परियोजनाएं ऐसी हैं जो कि आने वाले कुछ सालों में पूरी होने वाली हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्धारण और उसकी सफलता के कुछ विशिष्ट आधार होते है जिनमें भू राजनैतिक और भू सामरिक नीति बेहद महत्वपूर्ण है तालिबान मुक्त अफगानिस्तान से न केवल पाकिस्तान को नियंत्रित किया जा सकता था बल्कि कश्मीर में आतंकवाद को रोकने में भी मदद मिलती रही थी। भारत के लिए तालिबान से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करना मुश्किल होगा क्योंकि पाकिस्तान के हित इससे प्रभावित होंगे और वह भारत को अफगानिस्तान से दूर रखने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। बहरहाल अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से भारत समेत पूरी दुनिया में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ेगी।    

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

तलाक की नई तहज़ीब,talak aamirkhan kiran rao

 
विजय मत   

                   

                          

यह नए भारत में गढ़े जा रहे विवाह के नए मूल्य है जो सत्यमेव जयते की पवित्रता को लांघने को तैयार है  यह जीवन के चरम लक्ष्य को अलगाव के नए सांचे में ढालकर शांति और सुकून को तलाशना चाहते है। इसमें विवाह का अर्थ और उद्देश्य बदलने की बेचैनी है,इसमें भारतीय संस्कृति के पारिवारिक दायित्वों और सामाजिक मर्यादाओं को दरकिनार कर उसे न्यायोचित ठहराने की तत्परता भी दिखाई पड़ती है। हाल ही में आमिर खान और उनकी पत्नी के बीच हुए तलाक को इन दोनों सितारों के द्वारा सहजता,सरलता और आदर्शों के साथ बड़े सलीके से समाज के सामने प्रस्तुत किया गया है। बॉलीवुड के रुपहले पर्दे  के काल्पनिक कथानक से अलग हकीकत को बयां करने की प्रभावशाली सितारों की इस कोशिश को महज दो व्यक्तियों  की निजी जिंदगी तक सीमित नहीं किया जा सकता। 


खासतौर पर आमिर खान की एक कलाकार के तौर पर भारत में छवि शानदार रही है।  उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर यादगार फ़िल्मों में प्रभावशाली किरदार निभाया है।  आमिर खान  टीवी शो सत्यमेव जयते से भी जुड़े रहे जिसे पिछले दशक का सबसे चर्चित शो भी कहा जाता हैसत्यमेव जयते में वे विवाह,दहेज,छुआछूत,पिछड़ापन,बाल विवाह जैसे विषयों पर बेहद प्रभावी और बेबाकी से अपने विचार रखते थे। ऐसा  विश्वास किया जाता है कि सत्यमेव जयते एक ऐसा  भारतीय कार्यक्रम है जिसने मनुष्यों की सोच को परिवर्तित और प्रभावित किया तथा दर्शाए गए मुद्दो को समझने की क्षमता प्रदान की  इस दौरान विवाह पर आधारित एक विशेष कार्यक्रम में आमिर खान ने कहा था कि,विवाह एक बहुत अहम मोड़ होता है हमारी जिंदगी का,यकीनन हमें उसके लिए तैयारी करना चाहिए तैयारी करना चाहिए जिंदगी के उस खूबसूरत सफर की,जो दो लोग साथ में मिलकर तय करते हैइसे एक अगरबत्ती बनाइए जिसकी खुशबू फैलती रहे


गौरतलब है कि भारतीय संस्कारों में वैयक्तिक दृष्टि से विवाह पति-पत्नी की मैत्री और साझेदारी है। यह जन्म जन्मांतर का बंधन समझा जाता है,जहां प्रेम और निःस्वार्थ त्याग के असंख्य सन्देश हैसत्यमेव जयते को लेकर यह कहा जाता था कि सत्यमेव जयते केवल एक कार्यक्रम नही बल्कि लोगो के विचारो को बदलने के लिए एक आंदोलन है। उस समय इसके  प्रस्तोता आमिर खान ने विवाह को लेकर जो संदेश दिया था,वह भारत के करोड़ों माता पिता पसंद आया होगा क्योंकि भारतीय माता पिता अपनी संतान में इन्हीं वैवाहिक संस्कारों के पालन की कामना करते है।


लेकिन अब आमिर खान ने स्वयं के विवाह और जिंदगी को लेकर जो व्यवहार और सार्वजनिक प्रदर्शन किया है,वह बेहद गैर जिम्मेदारीपूर्ण और असामाजिक प्रतीत होता है। कभी भारत के करोड़ों लोगों को विवाह की महत्ता समझने की सीख देने वाले आमिर खान और उनकी पत्नी ने एक दूसरे से तलाक लेकर अलग होने की समूची कवायद को बाकायदा मीडिया के सामने अप्रत्याशित रूप से प्यार भरे अंदाज प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे सामान्य घटना की तरह प्रस्तुत किया और कहा कि, “हमने कुछ समय पहले एक दूसरे से अलग होने की शुरुआत की थी और अब इसे औपचारिक रूप देने में सहज महसूस कर रहे हैंवे यह कहने से भी नहीं चूके कि उनके रिश्ते में विश्वास,सम्मान और प्यार बढ़ा है। अंत में आमिर और किरण कहते है कि वे अपने जीवन में एक नया अध्याय शुरू करना चाहेंगेपति-पत्नी के रूप में नहीं,बल्कि बच्चे के माता पिता और परिवार के रूप में।” हम सब जानते है कि विवाह संस्कार,विधि और पद्धति है तथा इसका उद्देश्य पूरे जीवन के लिए है।  ऐसे में तलाक के बाद आमिर खान और किरण का परिवार और उसके दायित्वों को पूरा करने का भरोसा अप्रासंगिक और अव्यवहारिक नजर आता है पति पत्नी के रिश्ते से पृथक होकर विवाह के नये प्रतिमानों को लेकर जो आमिर खान अब जो संदेश दे रहे है,उसमें  परिवार नामक इकाई को दरकिनार कर  दिया गया है। इस प्रकार आमिर खान अब सामजिक अवमूल्यन और पारिवारिक अलगाव को बढ़ावा देते नजर आ रहे है जिसकी उनसे अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।


सामाजिक विषयों पर टीवी शो के जरिए कई समस्याओं को सामने लाने वाले आमिर खान सत्यमेव जयते का चेहरा तो बन गए लेकिन अफ़सोस वे यह समझने में नाकामयाब रहे कि परिवार का सत्य पति पत्नी का आपसी विश्वास,आत्म-समर्पण और निष्काम भाव से किया गया प्रेम है



बहरहाल आमिर खान समेत अन्य बॉलीवुड सितारों को समाज के प्रति ज्यादा जवाबदेह होने की जरूरत है। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके उन्मुक्त और अव्यवहारिक विचारों से भारतीय मूल्यों को गहरी चोट पहुंच सकती है अंततः  इन सितारों पर करोड़ों लोगों की नजरें होती है और  ये लोग अपने पसंदीदा किरदारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

ड्रोन आतंक की दस्तक ..... ! Drones for Terrorism In India

 

पॉलिटिक्स          

 

                  

27 जून की अलसुबह होने को करीब ढाई तीन घंटे बचे होंगे कि जम्मू एयरफोर्स स्टेशन पर देर रात दो धमाके हुए पहला धमाका रात 1 बजकर 37 मिनट पर  हुआ और दूसरा ठीक 5 मिनट बाद 1 बजकर 42 मिनट पर  हुआ  इन  धमाकों की इंटेंसिटी बहुत कम थी लेकिन ये आतंकी हमला था और इसे ड्रोन के जरिए अंजाम दिया गया था वास्तव में यह भारत की जमीन पर ड्रोन की सहायता से किया गया पहला आतंकी हमला था इसके बाद भारत की खुफियां एजेंसियां हरकत में आई और ताबड़तोड़ सुरक्षा इंतजामात को चाक चौबंद किया गया इसके बावजूद की अभी तक भारत के पास ड्रोन हमलें से बचने या उसे पहले ही रोक देने की कोई तकनीक या रडार सिस्टम जैसे इन्फ़्रास्ट्रक्चर नहीं है जो इस तरह के उड़ने वाले उपकरणों का पता लगा सके ऐसा भी नहीं है कि भारत की सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे हमलें का अंदेशा नहीं था बल्कि भारत की यह  सुरक्षा खामी रही है कि उसके सुरक्षा उपाय घटनाओं के होने के बाद शुरू होते है आपको बता दें कि पिछले साल ऐसी खबरें आई थी कि पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने चीन से कुछ ड्रोन्स खरीदे थे. माना जाता है कि ये ड्रोन 20 किलो तक का पेलोड उठाने और 25 किलोमीटर तक उड़ान भरने में सक्षम है जम्मू एयर फ़ोर्स स्टेशन में दो धमाकों को लेकर शुरुआती जांच में पाया गया है कि 2-2 किलो के इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोज़िव डिवाइसेज़ हवा से गिराए गए थे यह सैन्य बेस नियंत्रण रेखा से महज 14 किलोमीटर दूर है मतलब साफ है कि यह पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा के उस पार से उड़ने वाले ड्रोन के दायरे में है


 पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने इसे लेकर आगाह किया था

 

पंजाब में पिछलें दो तीन वर्षों में कई बार संदिग्ध ड्रोन देखे जा चूके है और 21 नवंबर 2020 को इसे लेकर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह  ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर बताया भी था कैप्टन के अनुसार अगस्त 2019 में पंजाब के कुछ इलाकों में एक चीनी ड्रोन के ज़रिए राइफ़ल और पिस्तौल गिरायी थी साथ ही  फ़िरोज़पुर और तरनतारन सेक्टर्स में भी इस प्रकार की घटनाएं हुई मुख्यमंत्री ने यह भी लिखा था कि सीमा पार से 5 किलोमीटर आकर 'चिन्हित जगह' पर लंबी दूरी के हथियार गिराना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है इस पत्र के बाद राज्य के ख़ुफ़िया प्रमुखों,पंजाब पुलिस और सीमा सुरक्षा बल के बीच उच्च स्तरीय बातचीत हुई थी


ड्रोन का खतरा कितना गंभीर

ड्रोन मानव रहित विमान कहे जाते है और खास टूर पर यह तीन प्रकार के होते है जिन्हें रिमोटली पायलटेड एयरक्राफ्ट,ऑटोनॉमस एयरक्राफ्ट और मॉडल एयरक्राफ्ट कहा जाता है ड्रोन्‍स बैटरी पर चलते हैं इसलिए ज्‍यादा शोर नहीं करते। यह मैनुअली ऑपरेट किए जा सकते हैं या फिर नीचे उड़ने के लिए प्रोग्राम किए जा सकते हैं सामान्‍य सिविल और मिलिट्री रडार्स की पकड़ में यह नहीं आते क्‍योंकि उनका रडार क्रॉस-सेक्‍शन काफी छोटा होता है  आकार में कम होने की वजह से यूं निगरानी भी मुश्किल है ड्रोन काफी नीचे उड़ते हैं और इसलिये किसी भी रडार सिस्टम द्वारा इसका पता नहीं लगाया जा सकता है  ड्रोन का उपयोग करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे दूर से नियंत्रित किया जा सकता है और यह हमलावर पक्ष के किसी भी सदस्य को खतरे में नहीं डालता है इस पर घातक आयुध लादे जा सकते है और इससे बड़ा नुकसान पहुंचाया जा सकता है पारंपरिक हथियारों की तुलना में ड्रोन अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं और काफी विनाशकारी हो सकते हैं।


सऊदी अरब पर हुती विद्रोहियों का ड्रोन हमला

आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी ने आतंकवाद को भी एक विज्ञान की शक्ल दे दी हैअब आतंकवाद जातीय,धर्मान्ध,अशिक्षित,कट्टरपंथी ताकतों के साथ वैज्ञानिक मस्तिष्क भी शामिल हो चुके हैइस साल फरवरी में दक्षिणी सऊदी अरब के एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर यमन के हूती विद्रोहियों ने ड्रोन से हमला कर उसे बड़ा नुकसान पहुंचाया था इसकी वजह से एक नागरिक विमान में आग लग गई थी  यह एयरपोर्ट यमन की सीमा के काफी पास है और हूती विद्रोही अक्सर इसे निशाना बनाते रहते हैं  ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने दावा किया कि उन्होंने चार ड्रोन की मदद से एयरपोर्ट पर हमला किया था


अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का यह बेहतरीन उदाहरण है

ड्रोन मानवरहित बहुत ही छोटे और टोही विमान होते है जिन्हें रोबोट की तर्ज पर सुदूर स्थान से नियंत्रित और संचालित किया जाता है और इनसे लक्ष्य को टारगेट किया जा सकता हैवर्तमान में इसका प्रयोग जासूसी करने और बिना आवाज किए मिसाइल या घातक हथियारों से हमला करने हेतु भी किया जा रहा है


ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी ड्रोन हमले में मारे गए

पिछले साल जनवरी में ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी बग़दाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हवाई हमले में मारे गए थे इस हमले की ज़िम्मेदारी अमरीकी ने ली थी जनरल सुलेमानी और ईरान समर्थित मिलिशिया के अधिकारी दो कार में बगदाद एयरपोर्ट जा रहे थे तभी एक कार्गो इलाके में अमरीकी ड्रोन ने उन पर हमला कर दिया इस काफिले पर कई मिसाइलें दागी गईं थी सुलेमानी को पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को चलाने का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था


ड्रोन हमला कैसे किया जाता है

ड्रोन को उड़ान भरने के लिए एक खुली जगह या बिल्डिंग की सबसे ऊपरी मंज़िल चाहिए होती है यह 30 से 40 किलोमीटर तक की दूरी भी कवर कर सकते हैं जम्मू एयरफोर्स स्टेशन से पाकिस्तान बॉर्डर की वायु मार्ग दूरी 14 किलोमीटर है, जबकि सड़क के द्वारा 22 किलोमीटर है।

 


वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो पर ड्रोन से आतंकी हमला

करीब तीन साल पहले लातिन अमरीकी देश वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो राजधानी कराकास में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे,उसी समय विस्फोटकों से लदा एक ड्रोन सभा स्थल पर फट गया। यह ड्रोन सेना या पुलिस  का नहीं बल्कि आतंकियों द्वारा संचालित था। इस घटना में वेनजुएला के राष्ट्रपति तो बच गए लेकिन दुनियाभर की सुरक्षा एजेंसियों  के सामने  एक नई चुनौती आ खड़ी हुई।  इस घटना से यह साफ हो गया था कि नाभिकीय,जैविक,रासायनिक और आत्मघाती आतंकवाद से निपटने की जद्दोजहद  के बीच अब ड्रोन आतंकवाद ने अपनी दस्तक दी है


आतंकियों से निपटने का मुख्य हथियार

आतंकियों के लिए ड्रोन सामूहिक विनाश का एक प्रमुख शस्त्र बन सकता है। अभी तक अनेक देश ड्रोन का सुरक्षा कारणों से उपयोग कर रहे है। अमेरिका ने ड्रोन को आतंकियों के विरुद्ध प्रमुख हथियार बना कर लगातार आतंकियों को गहरा नुकसान पहुंचाया है। अफगानिस्तान,पाकिस्तान,सोमालिया और यमन जैसे आतंकियों के गहरे प्रभाव वाले देशों में अनेक कुख्यात आतंकी इन ड्रोन हमलों में मारे गए है। अमेरिका ने दुर्गम इलाकों में ढूंढ़कर आतंकियों को निशाना बनाने में उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की हैहार्न ऑफ अफ्रीका कहलाने वाले सोमालिया में साल 2016 में अमेरिका ने अल शबाब के आतंकियों को निशाना बनायासोमालिया की राजधानी मोगादिशू से करीब 120 मील उत्तर में अमेरिकी ड्रोन हमले में आतंकवादी गुट अल-शबाब के 150 से अधिक आतंकी मारे गए थेइस हमले में एक ट्रेनिंग कैंप को निशाना बनाया गया,जहां बड़े पैमाने पर हमले की योजना बनाई जा रही थी और सोमालिया में अमेरिकी और अफ्रीका की संयुक्त सेनाओं के लिए खतरा बनने वाले थेड्रोन से इस इलाके पर बहुत दिनों से नजर रखी  जा रही थी

 

परिंदों की तरह भी होते है ड्रोन


चीन के अशांत जिनजियांग प्रान्त की निगरानी ड्रोन के जरिये की जाती हैकबूतर और परिंदों  की तरह दिखने वाले इन हाई टेक ड्रोन को पहचान पाना बहुत मुश्किल होता हैआकार में यह इतने छोटे होते है कि आसमान में इन्हें परिंदों से अलग कर पहचानना नामुमकिन होता हैइनकी हरकते आम पक्षियों की तरह होती हैये आसमान में मजे से उड़ते है,राडार की पकड़ से बाहर होते है और इनका वजन 200 ग्राम के आसपास होता है


ड्रोन को मार गिराना विध्वंसक

संयुक्त राज्य अमेरिका के रक्षा विभाग की रक्षा उन्नत अनुसंधान परियोजना एजेंसी ने एक ऐसा ड्रोन बनाया है जो किसी मक्खी या हमिंग बर्ड जैसा हैदुनिया का सबसे छोटा पक्षी है हमिंग बर्ड और ये इकलौता है जो विपरीत यानी पीछे की दिशा में उड़ सकता है। यह ड्रोन इसी तर्ज पर काम कर सकता है। दुनिया भर के बाजारों में आसानी से उपलब्ध ड्रोन में बारूद की जगह न्यूक्लियर डिवाइस फिट कर दिया जाये और पक्षी की तरह उड़ते हुए यदि वह किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की सभा स्थल पर फट जाए तो सामूहिक विनाश का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे ड्रोन यदि  सुरक्षा एजेंसियों की नजर में आ भी जाए तो भी उन्हें आसमान में नष्ट करना आत्मघाती और खतरनाक हो सकता है।

भारत है कितना तैयार


रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन ने दो ड्रोन-विरोधी  निर्देशित उर्जा हथियार सिस्टम विकसित किये हैं,जिसमें 2 किमी की दूरी पर हवाई लक्ष्य को निशाना बनाने के लिये 10 किलोवाट और 1 किमी की रेंज के लिये 2 किलोवाट लेज़र के साथ एक कॉम्पैक्ट ट्राइपॉड-माउंटेड है। लेकिन इनका अभी बड़ी संख्या में उत्पादन होना बाकी है। सशस्त्र बल  फ़िलहाल इज़रायली `स्मैश-2000 प्लस' कम्प्यूटरीकृत अग्नि नियंत्रण और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक साईट्स जैसी  अन्य प्रणालियों का भी सीमित संख्या में आयात कर रहे हैं जिसे दिन और रात दोनों स्थितियों में छोटे शत्रु ड्रोन के खतरे से निपटने के लिये बंदूकों और राइफलों पर लगाया जा सकता है।


देश में लग सकता है ड्रोन के उपयोग या खरीदी पर प्रतिबन्ध

ड्रोन का उपयोग हवाई फोटोग्राफी,कृषि में कीटनाशकों का छिड़काव,पर्यावरणीय परिवर्तनों की निगरानी आदि के लिये भी किया जाता है। परमाणु शक्ति सम्पन्न भारत के पास अत्याधुनिक और घातक हथियार तो है लेकिन ड्रोन हमलें से बचने के लिए फ़िलहाल बड़ी संख्या में माकूल उपकरण अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए पूरी संभावना है कि भारत सरकार आतंकी हमलों की आशंका से निपटने के लिए ड्रोन की खरीदी और उपयोग को फ़िलहाल प्रतिबंधित कर सकती है। 

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

पाक में धर्मांतरण पर कानून की कवायद,religious minorities forcibly converted in Pakistan

सांध्य प्रकाश 

 

                                                               


 

अल्पसंख्यक होना कितना बड़ा गुनाह हो सकता है,यह पाकिस्तान के हिन्दुओं और ईसाईयों के हालात देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। गरीबी,उत्पीडन,अत्याचार,शोषण और ईशनिंदा के खौफ से अभिशिप्त अल्पसंख्यक नाबालिग बेटियों के अपहरण और उनके धर्मांतरण को झेलने को मजबूर है। दुनिया के कई मानव अधिकार संगठन पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों को लेकर इस इस्लामिक देश की कड़ी आलोचना करते रहे है। अब पाकिस्तान सरकार अल्पसंख्यकों को लेकर दुनिया में अपनी छवि सुधारने की कोशिश करती हुई दिखाई दे रही है। इस समय पाकिस्तान में जबरदस्ती धर्मांतरण को रोकने के लिए एक कानून का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है,हालांकि यह लागू किया जा सकेगा  या नहीं,इसको लेकर संशय बरकरार है


दरअसल पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर असंख्य अत्याचार की घटनाएं होती है और वहां नाबालिग लडकियों का जबरदस्ती धर्मांतरण बड़ा मुद्दा रहा हैयह माना जाता है कि पाकिस्तान में हर साल कम से कम एक हजार हिन्दू और ईसाई लड़कियों का अपहरण करके उनसे निकाह रचा लिया जाता है यह इतना सुनियोजित होता है कि मासूम बच्चियों के घर वापस लौटने की संभावनाएं खत्म हो जाती हैदो साल पहले पाकिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता ज़ैनब बलोच ने मुल्तान की रीना और रीमा का रोते हुए वीडियो ट्विट्टर पर पोस्ट किया थामहज 10 और 12 साल की ये मासूम रोते हुए बता रही थी  कि जिन लड़कों से उनका निकाह जबरदस्ती कराया गया, वो उन्हें और उनके घर वालों को मारते-पीटते हैं


पाकिस्तान में अल्पसंख्यक बेहद गरीबी का सामना करने को मजबूर हैबमुश्किल जीवन यापन करने वाले ये लोग अत्याचारों के खिलाफ राजनीतिक और सामाजिक दबाव के चलते आवाज ही नहीं उठा पातेपुलिस थाने में इनकी आवाज सुनी नहीं जाती और अदालतों में न्याय पाने के लिए वकीलों की उंची फीस देने में ये असमर्थ होते हैपाकिस्तान में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि धर्म परिवर्तन दबाव में या लालच देकर किया गया है या लड़की की मर्ज़ी से,ये साबित करना मुश्किल होता है,अदालत में तो ये और भी मुश्किल होता हैअदालत यदि जांच का आदेश दे तो उन्हें शेल्टर होम भेज दिया जाता हैपाकिस्तान के धार्मिक संगठनों,प्रशासनिक संस्थाओं और मीडिया में यह प्रचारित किया जाता है कि लड़कियों ने अपनी इच्छा से  इस्लाम कुबूल किया है इन सबसे निपटना पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के लिए आसान काम नहीं है


 

पाकिस्तान में अक्सर अल्पसंख्यक यह सवाल उठता रहा है कि,आख़िर नाबालिग़ हिंदू लड़कियां ही इस्लाम से क्यों प्रभावित होती हैं? क्यों उम्रदराज़ मर्द या औरतें इससे प्रभावित नहीं होते? क्यों धर्मपरिवर्तन के बाद लड़कियां केवल पत्नियां बनती हैं,बेटियां या बहनें नहीं बनतीं?

पाकिस्तान में धर्मांतरण की घटनाओं को लेकर कोई डाटाबेस तैयार नहीं है अन्यथा और भयावह आंकड़े सामने आ सकते हैइमरान ख़ान की सरकार ने एक संसदीय  समिति बनाई  है जो एक कमेटी की सुझावों पर विचार करेगी धर्मांतरण को रोकने के लिए कमेटी ने जो मुख्य सुझाव दिए है,उसके अनुसार धर्मांतरण को  किसी वयस्क का अधिकार बताया गया है वहीं  कम उम्र के लोगों के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए और इसके धर्मांतरण के लिए एक सरकारी तंत्र होना चाहिए और इसी के तहत हुए धर्मांतरण को वैधता मिलनी चाहिएदूसरे लोगों या संस्थाओं को धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार नहीं होना चाहिएकमेटी ने देश में धर्म परिवर्तन के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष करने की सिफ़ारिश की हैहालांकि इमरान खान की सरकार सिफारिशों को कानून के रूप में अमली जामा पहनाएगी,इसकी सम्भावना नगण्य हैइसका प्रमुख कारण इमरान की पार्टी पर कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव हैइमरान खान कि पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ कट्टरपंथियों कि पार्टी मानी जाती है।  खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बारीकोट, स्वात इलाके से तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी से विधायक रह चुके बलदेव सिंह दो साल पहले भारत आ गए  थे और उन्होंने मोदी सरकार से भारत में राजनैतिक शरण  की मांग कीबलदेव ने साफ कहा कि,पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत लगातार खराब होती जा रही है और वहां रह रहे अल्पसंख्यकों के लिए लंबी लड़ाई लड़े जाने की ज़रूरत हैयह पाकिस्तान में रहकर संभव नहीं था इसलिए मैं यहां आया हूं और अब साहस से वहां के लोगों की आवाज़ उठाउंगा।”


पाकिस्तान में कई दरगाहें अल्पसंख्यकों का धर्मांतरण कराने को बदनाम है. कुछ घटनाओं में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनल मौलवियों का इन्टरव्यू लेकर उन्हें प्रोत्साहन देते है,यहीं नहीं धर्मांतरण करने का लाइव प्रसारण जैसे कार्य भी किए जाते है। ऐसा भी नहीं है कि अन्तराष्ट्रीय दबाव में इसे रोकने की कोशिश नहीं की गई है। कुछ साल पहले पाकिस्तान के सिंध राज्य की सरकार ने धर्मांतरण के लिए न्यूनतम आयु पर कानून बनाने की कोशिश की थी,लेकिन इसे कट्टरपंथियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था

2016 में सर्वसम्मति से बिल पारित किया लेकिन धार्मिक समूहों ने इसे गैर-इस्लामिक बताते हुए धर्मांतरण की आयु सीमा पर आपत्ति जताई और राज्यपाल को विधेयक पर हस्ताक्षर करने से रोकने के लिए विधानसभा को घेरने की धमकी दे डाली2019 में,अल्पसंख्यक संरक्षण विधेयक का एक संशोधित संस्करण सिंध विधानसभा में एक हिंदू सदस्य नंद कुमार द्वारा पेश किया गया था  इसका भी धार्मिक और राजनीतिक दलों ने खुल कर विरोध किया। उनका कहना था कि सरकार अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर उन लोगों के लिए अवरोध पैदा कर रही है जो धर्म परिवर्तन की इच्छा रखते हैं


पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से पांच प्रतिशत गैर-मुसलमान थे उपमहाद्वीप के बंटवारे के समय,पश्चिमी पाकिस्तान या मौजूदा पाकिस्तान में पन्द्रह फीसदी हिंदू रहते थे। जबकि वर्तमान में उनकी संख्या घटकर मात्र डेढ़ फीसदी प्रतिशत रह गई है। इसका प्रमुख कारण धर्मांतरण और असुरक्षा को बताया जाता हैपाकिस्तान में हिंदुओं के बाद ईसाई दूसरा सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह है पाकिस्तान के इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन आपसी रंजिशें निकलने के लिए ईसाईयों पर ईशनिंदा का आरोप लगाते रहे है। ईशनिंदा को पाकिस्तान में सबसे बड़ा अपराध माना जाता है और लोगों की भावनाएं इसे लेकर बेहद आक्रामक होती है जहां भारत का कानून बिना धार्मिक भेदभाव किये सभी को समान अधिकार देता है वहीं पाकिस्तान में ऐसा बिलकुल नहीं है


2014 में पाकिस्तान कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन कि घटनाओं को रोकने,ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग रोकने और अल्पसंख्यकों कि सुरक्षा के लिए देश में एक संवैधानिक निकाय का गठन होना चाहिए,जो स्वतंत्रता पूर्वक काम कर सके और सरकार को सलाह दे सकेजिससे देश के अल्पसंख्यकों कि सुरक्षा सुनिश्चित हो और उनकी बेहतरी के कार्य हो सके। लेकिन पाकिस्तान ने इसे भी राजनीतिक निकाय की तरह ढाल दिया और अल्पसंख्यकों की न्याय की रही सही आशाएं भी खत्म हो गई। बहरहाल यह आशंका बढ़ गई है कि अल्पसंख्यकों को लेकर पाकिस्तान की सरकार और धार्मिक संगठनों का रुख उदार और समानता पर आधारित नहीं हुआ तो कुछ ही सालों में यह देश विविधतापूर्ण पहचान खो देगा।

brahmadeep alune

बिक गया पाकिस्तान.... ! bik gaya pakistan politics

  पॉलिटिक्स                                                                                                             पाकिस्तान...