शनिवार, 5 जून 2021

औद्योगिक आतंकवाद से अभिशिप्त पर्यावरण,aatnkvad paryavarn sandhy praksh

 सांध्य प्रकाश 

               

प्रशांत महासागर में करीब 34 लाख किलोमीटर के दायरे में फैले द्वीपों के देश किरिबाती के लोग अपने अस्तित्व पर मंडराते संकट को देख रहे है। पृथ्वी के निरंतर बढ़ते तापमान के कारण 30 से 35 साल के बाद यह द्वीप डूब जाएगायही हाल खूबसूरत मालद्वीप का भी हैभारत के दक्षिणी सिरे से करीब 595 किलोमीटर दूर करीब 1200 द्वीपों में बसा यह देश अपना अस्तित्व बचाएं रखने के लिए दुनिया के अन्य देशों से गुहार लगा रहा है कि वे कार्बन उत्सर्जन कम करें या इसका विकल्प खोजे। वैज्ञानिकों का दावा है कि समुद्र में जलस्तर एक या दो फुट बढ़ने से कई देशों का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगाइससे प्रभावित देशों में बंगलादेश,चीन,थाईलैंड,मिस्र तथा इंडोनेशिया जैसे देश भी होंगे जबकि भारत के कई तटीय इलाके भी जलमग्न हो जायेंगे भारत की साढ़े सात हजार किलोमीटर लम्बी तटरेखा के आसपास करीब 25 करोड़ लोग रहते है,इनका जनजीवन तापमान वृद्धि से बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है


विकास के नाम पर बेतहाशा कार्बन के उत्सर्जन से वायुमंडल में लगातार तापमान में वृद्धि हो रही है और इसका असर दुनिया भर में देखा भी जा रहा है आर्कटिक में एक विशाल बर्फ से ढका महासागर है,इसे दुनिया का सबसे ठंडा क्षेत्र माना जाता हैपिछले कुछ वर्षों से आर्कटिक से सिर्फ़ बर्फ़ ही नहीं ग़ायब हो रही है बल्कि जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां के जंगलों में भयंकर आग लग रही हैआग इतनी भयानक है कि बर्फ़ में भी आग लग जा रही हैआर्कटिक में दुनिया के कुल जंगलों का एक तिहाई हिस्सा मौजूद हैप्रकृति के अप्रत्याशित परिवर्तनों से हिमालय भी प्रभावित हो रहा हैनैनीताल की नैनी झील के पीछे दिखने वाले हरे-भरे पहाड़ आग और धुएं से प्रभावित है तो इसका प्रभाव नेपाल तक दिखाई दे रहा हैउत्तरी अमरीका के पर्माफ्रॉस्ट यानी हमेशा बर्फ़ से ढंके रहने वाले इलाक़े जैसे अलास्का में भी बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है यहां अब बर्फ़ की जगह पानी नज़र आने लगा हैबर्फ़ में क़ैद मीथेन जैसी ख़तरनाक गैस वातावरण में घुल रही है बर्फ़ीले इलाक़ों की गर्मी बढ़ने से केवल मीथेन या कार्बन डाई ऑक्साइड ही हवा में नहीं मिल रही है बल्कि इसकी वजह से  वर्षों से दबे हुए जानलेवा जीवाणु भी बाहर आ रहे हैं स्वीडन में एटमी कचरे को बर्फ़ के नीचे दबा कर रखा गया है अगर बर्फ़ इस प्रकार पिघलती रही तो ये एटमी कचरा भी खुले में आ जाएगा,जिससे रेडियोएक्टिव तत्व वातावरण में मिलकर कोहराम मचा सकते है


कार्बन ही धरती का तापमान बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है जाहिर है कार्बन का उत्सर्जन नियंत्रित करके मानव अस्तित्व को संकट से उबारा जा सकता है लेकिन विकास की अंधी दौड़ के चलते यह संभव नहीं दिखाई पड़ता अमेरिका जैसे देश अपने औद्योगिक संस्थानों से निकलने वाले जानलेवा धुएं को रोकने को बिल्कुल तैयार नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे विकास की रफ्तार रुक जाएगी और बेहिसाब बेरोजगारी बढ़ेगीवहीं भारत जैसे देश विकास के नाम पर करोड़ों वृक्षों को काट रहे हैइसका सीधा असर भारत की जलवायु पर होगा और सूखे और बाढ़ की स्थितियां बढ़ सकती हैइस समय वायुमंडल में जितना भी कार्बन जमा हुआ है उसके लिए ज्यादातर जिम्मेदार अमेरिका और यूरोप के देशों की विलाशितापूर्ण जीवन शैली है अमेरिका ने सबसे ज्यादा ग्रीन हॉउस गैसों का उत्सर्जन किया है लेकिन वह पेरिस समझौते को लेकर भी नकारात्मक रुख अपनाएं हुए है 2015 में पेरिस में 195 देशों के बीच यह सहमति बनी थी कि  जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को नियंत्रित किया जायेगापेरिस समझौते के जरिए वैश्विक समुदाय से यह अपेक्षा की गई की बिना किसी दबाव के सभी देश स्वयं अपने उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं,इसमें किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान नहीं है।


संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक अगले नब्बे वर्षों में दुनिया का तापमान 1.4 से 5.8 तक बढ़ जायेगा,जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा अनेक देशों के तटवर्ती इलाके जलमग्न हो जायेंगे,नये रेगिस्तान बनेगे या सूखे इलाकों में भी भयंकर बढ़ जैसे हालात बनेंगेपिछले सौ सालों में रूस में स्थित काकेशस पर्वत में कुल ग्लेशियरों में से आधों की बर्फ खत्म हो चुकी है,अनुमान है की 2035 तक सभी मध्य पूर्वी हिमालयी ग्लेशियर खत्म हो जायेंगेचीन में जहां समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है वहीं 40 सालों में तियेंशन पर्वत के ग्लेशियर की बर्फ़ 25 प्रतिशत सिमट गयी हैभारत की जीवनधारा गंगा को जीवनदान देने वाला गंगोत्री ग्लेशियर 30 मीटर सालाना की दर से सिकुड़ता जा रहा है


2019 में स्पेन के मैड्रिड शहर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र के 25 वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में मशहूर पर्यावरणविद ग्रेटा ने वैश्विक स्तर के नेताओं के बारे में कहा कि वो बड़ी-बड़ी बातों से भ्रम पैदा करना बंद करें और 'रियल एक्शन' करके दिखाएंभारत ने 2015 में पेरिस समझौते के तहत वादा किया था कि वह तीन सौ करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखने लायक जंगल लगायेगालेकिन देश में विकास के नाम पर जिस प्रकार बेतहाशा पेड़ काटे जा रहे है,उससे साफ है कि तापमान नियन्त्रण की वैश्विक कोशिशों में भारत की भूमिका नकरात्मक ही है मुंबई में मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए आरे के जंगल काटे जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चूका हैदेश में अलग-अलग प्रोजेक्ट्स और योजनाओं के लिए पिछले 5-6 वर्षों में एक करोड़ से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। 2019 में सरकार ने लोकसभा में भी माना था कि पिछले पांच साल में एक करोड़ नौ लाख पेड़ काटे गए हैं। 


दूसरी ओर विकसित देश औद्योगिक विकास को रोकना ही नहीं चाहते और वे इसके लिए गरीब,पिछड़े और अल्पविकसित देशों को जिम्मेदार ठहराते है 
अमरीका में आज भी हर व्यक्ति 15,000 किलोवाट बिजली खर्च करता है, जबकि भारत में आज भी करोड़ों लोगों के पास बिजली नहीं है  विकसित देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की महज 22 प्रतिशत है,लेकिन वे 88 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों एवम् 73 प्रतिशत ऊर्जा का इस्तेमाल करते है,साथ ही दुनिया की 85 प्रतिशत आय पर भी उनका नियंत्रण है विकासशील देशों की जनसंख्या सकल विश्व जनसंख्या की 78 प्रतिशत है,जबकि वे मात्र 12 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों और 27 प्रतिशत ऊर्जा का ही इस्तेमाल करते है उनकी सकल आय विश्व की कुल आय की मात्र 15 प्रतिशत ही है


विश्व में अमेरिका का एक नागरिक हर साल लगभग 16 मीट्रिक टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन करता हैइसके बाद कनाडा,रूस,जापान और जर्मनी का नम्बर आता है जापान ने 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों को शून्य करने और कार्बन-तटस्थ समाज बनने का लक्ष्य रखा हैजापान उस दिशा में काम कर रहा है और वहां नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। जापान के प्रधानमंत्री योशिहिडे सुगा ने  दुनिया को पर्यावरण के खतरों से आगाह करते हुए यह नसीहत दी थी कि हम सबकों यह नजरिया बदलने की जरूरत है कि जलवायु के खिलाफ मुखर उपायों से परिवर्तन को बढ़ावा मिलेगा और औद्योगिक संरचना और अर्थव्यवस्था में विकास होगा। असल में संकट यही है कि दुनिया के अधिकांश देश पर्यावरण की कीमत चुकाकर विकास को तरजीह दे रहे है। यह विकास विनाशकारी है,यह समझने को न तो आम लोग तैयार है और न ही दुनिया की अधिकांश सरकारें। 

श्रीलंका पर अब चीनी बादशाहत,shrilnka china rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा                    

                 

                

दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन के बनते बिगड़ते खेल में अब चीन ने भारत से निर्णायक रूप से बढ़त हासिल कर ली है। चीन कि नजरें पाकिस्तान के बाद श्रीलंका को अपने सामरिक और आर्थिक सम्बन्धों के जाल में पूरी तरह जकड़ लेने पर थी।  भारत के धुर विरोधी राजपक्षे बंधु इस समय श्रीलंका कि सर्वोच्च सत्ता पर काबिज है और उन्होंने चीन कि आर्थिक और सामरिक महत्वाकांक्षाओं को साकार कर भारत के लिए संकट बढ़ा दिया है।   


दरअसल हाल ही में श्रीलंका सरकार ने उस इकोनॉमिक कमीशन बिल संशोधन पर मोहर लगा दी है जिसके अनुसार एक चीनी कंपनी कोलंबो पोर्ट सिटी का निर्माण  करेगी। चीन पर पहले से आश्रित श्रीलंका की अर्थव्यवस्था इस समय गहरे संकट में है और चीन इसका लगातार फायदा उठा रहा है श्रीलंका पर कुल विदेशी क़र्ज़ क़रीब 55 अरब डॉलर से ज्यादा हो चूका है और यह श्रीलंका की जीडीपी का  करीब 80 फ़ीसदी है इस क़र्ज़ में चीन और एशियन डिवेलपमेंट बैंक का 14 फ़ीसदी हिस्सा है,जापान का 12 फ़ीसदी,विश्व बैंक का 11 फ़ीसदी और भारत का दो फ़ीसदी हिस्सा है ऐसे माहौल में भी श्रीलंका का व्यवहार आशंकित करने वाला है कोरोना की मार से बेहाल और पस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे चीन से अपने आर्थिक रिश्तों को जरूरी तो बता रहे है लेकिन इसके पहले उन्होंने यूरोपीय यूनियन के राजदूतों के एक समूह से कहा था कि श्रीलंका को नए निवेश की ज़रूरत है न कि नए क़र्ज़ की। ऐसा लगता है कि  गोटाभाया चीन के कर्ज की कीमत तो समझ रहे है लेकिन उसके गहरे दबाव में भी निर्णय ले रहे है। वहीं चीन के गहरे व्यापारिक हित श्रीलंका में है। चीन और श्रीलंका के बीच दक्षिण समुद्री बंदरगाह हम्बनटोटा को लेकर 1.1 अरब डॉलर का समझौता पहले ही हो चूका है। श्रीलंका में चीन की अनेक  परियोजनाएं चल रही है और उसने श्रीलंका को  तकरीबन डेढ़ सौ करोड़ डॉलर का कर्ज़ भी दे रखा है। मध्यपूर्व से होने वाले तेल आयात के रूट में श्रीलंका एक अहम पड़ाव है,इसीलिए चीन की यहां निवेश करने में रुचि है।


अब चीन की कंपनी को कोलंबो पोर्ट सिटी निर्माण को मंजूरी मिलने से यह साफ हो गया है कि 2019 में श्रीलंका की सरकार ने भारत और जापान के साथ कोलंबो में ईस्ट कॉन्टेनर टर्मिनल बनाने को लेकर जो समझौता किया था,उसके पूरे होने कि संभावना अब खत्म हो गई है। इस समझौते को श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बताकर इसके भविष्य पर कुछ समय पहले महिंदा राजपक्षे ने सवालिया निशान खड़ा किया भी  था भारत और जापान से चीन की कड़ी प्रतिद्वंदिता है और चीन श्रीलंका में इन देशों की मौजूदगी को खत्म करना चाहता है,ऐसा लगता है कि चीन के समर्थक महिंदा राजपक्षे ने इसके भविष्य पर चीन के दबाव में ही सवाल उठाये थे


वहीं भारत के लिए श्रीलंका एक पड़ोसी देश ही नहीं बल्कि सुरक्षा कि दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। दो करोड़ 10 लाख की आबादी वाला श्रीलंका हिंद महासागर में स्थित एक द्वीप है। इसका उत्तरी भाग भारत के दक्षिणी पूर्वी समुद्र तट से मात्र कुछ ही किलोमीटर दूर है।  तमिलनाडु के रामनाथ पुरम जिले से श्रीलंका के जाफना उप प्रायद्वीप तक का सफर दोनों देशों के मछुयारे  छोटी छोटी नौकाओं से आसानी से तय कर लेते है। भारत के दक्षिण हिन्द महासागर में स्थित श्रीलंका सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। श्रीलंका पूर्वी एशिया व्यापार का बड़ा केंद्र है और ग्रीक,रोमन और अरबी व्यापार करने के लिए इसी मार्ग से गुजरते है। श्रीलंका की भू राजनीतिक स्थिति उसका स्वतंत्र अस्तित्व बनाती है लेकिन भारत से उसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता सामरिक दृष्टि से ज्यादा असरदार साबित होती है। श्रीलंका भारत से  निकटता और निर्भरता से दबाव महसूस करता रहा है और यह भारत के लिए बड़ा संकट है। जबकि भारत की नीति उसके प्रति ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से बेहद मित्रवत रही है दोनों देशों को आज़ादी लगभग साथ साथ ही प्राप्त हुई लेकिन श्रीलंका की राजनीतिक और वैदेशिक नीति में भारत विरोध प्रारम्भ से ही दिखाई दिया भारत दक्षिण एशिया में साझी संस्कृति का सम्मान करते हुए उसके अनुरूप पड़ोसी देशों से व्यवहार करता है और इस समूचे क्षेत्र को सैनिक गठबंधनों से दूर रखने को कृतसंकल्पित रहा है,वहीं श्रीलंका की सामरिक नीति पश्चिमी देशों की और झुकती हुई और पूरे क्षेत्र को संकट में डालने वाली रही है1947 में ब्रिटेन से श्रीलंका की सैन्य संधि को लेकर भारत में बेहद असमंजस का माहौल बना तो कुछ वर्षों बाद  श्रीलंका के तत्कालीन प्रधानमंत्री कोटलेवाल ने मुखरता से यह कहने से गुरेज नहीं किया की पड़ोसी भारत उनके देश को हथिया न ले इसलिए बेहतर है यहां ब्रिटिश सैन्य अड्डा बना रहे। श्रीलंका का भारत के प्रति यह अविश्वास बाद में भी बदस्तूर जारी रहा। पाकिस्तान से नाभिकीय सहयोग और चीन से सबसे ज्यादा हथियार खरीदने की श्रीलंकाई नीति में भारत को चुनौती देने की भावना ही प्रतिबिम्बित होती है।


2009 मे श्रीलंका में एलटीटीई  के खात्मे के साथ 26 साल तक चलने वाला गृह युद्ध समाप्त हुआ तो चीन पहला देश था जो उसके पुनर्निर्माण में खुलकर सामने आया था चीन ने श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट का निर्माण कर हिंद महासागर में भारत की चुनौती को बढ़ा दिया हैश्रीलंका ने चीन को लीज़ पर समुद्र में जो इलाक़ा सौंपा है वह भारत से महज़ 100 मील की दूरी पर है हंबनटोटा बंदरगाह दुनिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक है और महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में बने इस बंदरगाह में चीन से आने वाले माल को उतारकर देश के अन्य भागों तक पहुंचाने की योजना रही है चीन भारत का सामरिक प्रतिद्वंदी है और स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स से समुद्र में भारत को उसकी घेरने की सामरिक  महत्वाकांक्षा साफ  नजर आती है,चीन भारत को हिन्द महासागर में स्थित पड़ोसी देशों के बन्दरगाहों का विकास कर चारो और से घेरना चाहता है हम्बनटोटा पोर्ट पर उसके अधिकार के बाद अब चीनी कंपनी कोलंबो पोर्ट सिटी के निर्माण से भारत की समुद्र में चिंताएं बढ़ गई है


भारत कि तमाम कोशिशों के बाद भी श्रीलंका इस तथ्य को दरकिनार करता रहा है  की भारत से सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता सामरिक दृष्टि से उसके लिए भी ज्यादा असरदार साबित होती है। इस समय राजपक्षे बंधु अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाकर तथा न्याय,शांति और औचित्य को भ्रामक धारणा मानकर उसे ख़ारिज कर रहे है। वह तमिलों के अधिकारों की रक्षा को लेकर अस्पष्ट है और चीन जैसे आक्रामक देश से सम्बन्ध मजबूत कर भारत की समुद्री सुरक्षा को भी संकट में डाल रहे है।


शक्ति संतुलन की व्यवस्था अस्थाई और अस्थिर होती है,वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को शांति और स्थिरता बनाये रखने का एक साधन माना जाता है,इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वैदेशिक नीति में आवश्यकता के अनुसार बदलाव करना और उसकी गतिशीलता को बनाये रखना भारत को श्रीलंका को लेकर अपनी वैदेशिक नीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

 

 

सोमवार, 31 मई 2021

छ्द्मासन,Baba Ramdev IMA

 पॉलिटिक्सवाला पोस्ट                       


दिल्ली के डॉ.अनस मुजाहिद की उम्र महज 26 साल थी। उनकी अभी शादी भी नहीं हुई थी। पिछले साल से लगातार डॉ.अनस कोविड से प्रभावितों का इलाज कर रहे थे, किंतु वे भी दुर्भाग्य से इसके शिकार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। इस महामारी कि विभीषिका में भारत के विभिन्न इलाकों में काम करने वाले कई डॉक्टर्स की सेवाएं अभिभूत कर देती है,उनका जीवन हर दिन चुनौतियों से घिरा हुआ है। किसी ने दरवाजे  के बाहर खड़े होकर अपनी बेटी का जन्मदिन मनाया तो कई डॉक्टर्स कई महीनों से अस्पताल से अपने घर ही नहीं लौटे है। दिल्ली के ही एक ख्यात डॉक्टर अपनी कार में खड़े होकर माईक से यह अपील करते हुए अक्सर दिखते है कि,लोग बेहद आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलें और यदि उन्हें खांसी बुखार के लक्षण हो तो बिना परेशान हुए कैसा इलाज करें। ऐसे कई डॉक्टर्स है जो कोविड से प्रभावित लोगों कि लगातार बड़ी संख्या में मौत से दुखी होकर फूट फूट कर रोएं भी होंगे।


यह वह जानलेवा और कठिन दौर है जब लोग अपने घरों में कैद है और पड़ोसी के यहां जाने के भी महीनों बीत चूके होंगे। अपने पड़ोस और परिजनों के गुजर जाने के बाद भी कोविड के डर से लोग अंत्येष्टि में भी शामिल नहीं हो रहे है। उस समय हजारों डॉक्टर अपनी जान को जोखिम में डालकर पूरी मुस्तैदी से कोविड मरीजों के बीच है और ऐसा करते हुए भारत समेत दुनिया में हजारों डॉक्टर्स की मौत हो गई है। ऐसे समय में एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति और आधुनिक डॉक्टर्स को निशाना बनाने की कोई भी कोशिश किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं की जा सकती। फिर चाहे वह योगगुरु बाबा रामदेव ही क्यों न हो।


दरअसल बाबा रामदेव का समूचा जीवन दर्शन भारतीय जीवन पद्धति कि श्रेष्ठता के प्रदर्शन से आगे बढ़कर व्यवसायिक और भौतिकवादी अभिलाषाओं की ओर तत्पर नजर आता है और यह उनके व्यक्तित्व और कार्यों से प्रतिबिंबित भी होता है। कुछ दिनों पहले बाबा रामदेव ने कहा था कि एलोपैथिक दवाएँ खाने से लाखों लोगों की मौत हुई है। उन्होंने एलोपैथी को 'स्टुपिड और दिवालिया साइंस' भी कहा था। कोरोना महामारी में जब लोग ऑक्सीज़न कि तलाश में दर दर भटक रहे थे और देशभर में हजारों लोगों कि  ऑक्सीज़न कि कमी से मौत हो रही थी,उस समय बाबा रामदेव का यह बयान बेहद शर्मनाक था कि,ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है,वातावरण में भरपूर ऑक्सीजन है लेकिन लोग बेवजह सिलेंडर ढूँढ रहे हैं। एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति को अक्सर निशाना बनाने वाले रामदेव पर यह भी आरोप है कि उन्होंने एक अभ्यास शिविर में जनता के सामने कहा था की आधुनिक चिकित्सा का अभ्यास करने वाले डॉक्टर बीमारियों के प्रचारक हैं और मरीज़ों की बीमारियों को भुना रहे हैं। बाबा रामदेव के इस प्रकार के विचारों में उनकी व्यवसायिक प्रतिबद्धताएं ज्यादा दिखाई देती है। 


गौरतलब है कि बाबा रामदेव ने योग गुरु की पहचान से आगे बढ़ते हुए 2006 में पतंजलि आयुर्वेद के नाम से एक कंपनी शुरू की थी जो डेढ़ दशक बाद भारत की प्राकृतिक और हर्बल की एक बड़ी कंपनी के तौर पर पहचान बना चूकी है,इसका टर्नओवर दस हजार करोड़ के करीब पहुँच गया है। भारत के हर्बल बाज़ार पर उनकी कंपनी ने अपनी अच्छी पकड़ बनाई है और उनका सपना इसे दुनिया की सबसे बड़ी आयुर्वेद कंपनी बनाने का है। ब्रिटेन समेत कई देशों में उनकी कंपनी का कारोबार है। बाबा रामदेव किसी व्यवसायी कि तरह ही आगे बढ़े तो इसमें कोई परेशानी नहीं है लेकिन वे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए कभी धर्म की आढ़ लेते है,कभी भारतीय सभ्यता का हवाला देते है तो कभी कभी उग्र राष्ट्रवाद को उभार कर खुद को नायक कि तरह प्रस्तुत करने की कोशिशें भी करते है। इन सब में वे योग  की  पूर्णता और पवित्रता को भूला बैठे है। वास्तव में योगगुरु की ही उनकी असल पहचान रही है।


 दूसरी तरफ एलोपैथी या आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने अपने अनुसंधानों,तकनीक और प्रयोगों से उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की है तथा फौरी राहत देने के लिए यह दुनियाभर के करोड़ों लोगों का विश्वास अर्जित कर चूकी है। खासकर महामारी और गंभीर बीमारियों का इलाज कर मानव जाति का अस्तित्व बचाने में एलोपैथी की भूमिका अतुलनीय है। शल्य चिकित्सा पद्धति में इसका कोई जवाब नहीं है। जहां तक बाबा रामदेव के हर्बल उत्पादों की बात की जाएं तो उनकी गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे है और नेपाल में तो कई दवाओं पर प्रतिबंध भी लगाया जा चूका है। ऐसा विश्वास किया जाता है की हर्बल और प्राकृतिक उत्पादों की शुद्धता सदैव बरकरार रहना चाहिए,लेकिन बाबा रामदेव की कंपनी अपनी विश्वसनीयता को असंदिग्ध रखने में सफल नहीं हुई है।  


योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को समाधि से जोड़ते हुए कहा था कि यह ऐसी स्थिति है जिसमें बाहरी चेतना विलुप्त हो जाती है। महर्षि पतंजलि को अपने आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर करोड़ों भारतीयों का ध्यान आकर्षित करते बाबा रामदेव के आचरण और व्यवहार में अधीरता और अनंत भौतिक अभिलाषाएं प्रकट होती है। वे अक्सर भारतीय दर्शन,धर्म ग्रन्थों और आदर्शों कि बात तो करते है जबकि स्वयं उपनिषद कि उस नसीहत को भूला बैठे है जिसके अनुसार योग कि उच्च अवस्था प्राप्त करने के लिए  संयमित वाणी,संयमित शरीर और संयमित मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। योग और आयुर्वेद को हमारी सभ्यता और संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल है। इस उपचार पद्धति कि स्वीकार्यता भी बहुत है लेकिन बाबा रामदेव ने अन्य उपचार पद्धतियों को व्यवसायिक दृष्टिकोण से निशाना बनाकर आयुर्वेद की सार्वभौमिक मान्यताओं और मूल्यों को बड़ी क्षति पहुंचाई है। उनका अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए लोगों को भ्रमित करने जैसे कृत्य कोरोना जैसी महामारी के रोकथाम में बड़ी रुकावट बन सकते है। अत: इन्हें हर हाल में रोका जाना चाहिए।   

 

 

 

शुक्रवार, 21 मई 2021

राजीव हत्याकांड पर रहम की राजनीति rajiv gandhi murder

दबंग दुनिया


 

                    

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के 30 साल पूरे होने के 48 घंटे पहले तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस हत्याकांड से जुड़े मुख्य दोषी पेरारिवलन को जेल से तीस दिन की छुट्टी देने का आदेश जारी कर दिया।लिबरेशन टाइगर्स तमिल ईलम के पेरारिवलन ने राजीव गांधी की हत्या में उपयोग में लाये गए बेल्ट बम के लिए शिवरासन को 9-बेल्ट बैटरी उपलब्ध करायी थी। 20 वी सदी के इस सबसे सनसनीखेज हत्याकांड पर दुनिया भर की नजर रही है लेकिन भारत में इसके दोषी राजनीतिक प्रश्रय और क्षेत्रीय राजनीति के बूते अब तक जीवित है।


दरअसल भारत में एक पूर्व प्रधानमंत्री की निर्मम हत्या से जुड़े दोषियों को उच्च स्तर पर राजनीतिक और कानूनी मदद से बचाव की कोशिशें हैरान करने वाली है।  मुरुगन, संथन और पेरारीवालन की निचली अदालत ने 1997 में और सर्वोच्च अदालत ने 11 मई 1999 को राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद साल 2000 में इस मामले में फांसी की सजा पाए दोषियों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। यह याचिका साल 2000 और 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम के पास आई लेकिन उनके द्वारा इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। भारत में यह कानूनी अधिकार है कि दया याचिका पर राष्ट्रपति के निर्णय न होने तक दोषियों को सजा नहीं दी जा सकती।


अब यह याचिका राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास आई और उन्होने चार साल के इंतजार के बाद 12 अगस्त 2011 को दया याचिका खारिज कर दी। अब दोषियों का फांसी चढ़ना तय था लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप ने कानूनी न्याय को मात दे दी। 26 अगस्त 2011 को तीनों दोषियों को फांसी देने कि तारीख 9 सितंबर 2011 बताया गया। अब यहीं से तमिल राजनीति के अगुवा अपने वोट बैंक के लिए लामबंद हुए। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता डीएमके नेता एम करुणानिधि,एमडीएमके महासचिव वाइको,द्रविदड कझगम प्रमुख के वीरमानी, पीएमके नेता डॉ.एस.रामदोस,राज्य के सीपीआई और सीपीएम नेता,तमिल नेशनल मूवमेंट के नेता पी नेदूमारन, नाम थमिझार के नेता और फिल्म डायरेक्टर सीमान ने दोषियों की सजा माफ कर उनकी सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की। 30 अगस्त 2011 को तमिलनाडु विधानसभा ने अभूतपूर्व तरीके से एक प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति से फांसी कि सजा को रोकने का आग्रह किया।


तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव भारत कि संघीय और एकल प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाला था। यह राज्य कि स्वायत्ता कि कोशिशों के तौर पर भी देखा गया। राजनीतिक हस्तक्षेप और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव के कारण फांसी कि तारीखें फिर टल गई। बाद में 18 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका पर देरी के आधार पर फांसी कि सजा पर रोक लगा दी।  साथ ही यह शर्त भी लगा दी कि तमिलनाडु सरकार उन्हें रिहा न करें तो उन्हें पूरी जिंदगी जेल मे बितानी पड़ेगी।  

इसके बाद तमिलनाडू कि जयललिता सरकार ने ज़ोर शोर से यह प्रयास किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े सभी अभियुक्तों को जेल से रिहा कर दिया जाएं। इसके साथ ही वे तमिल प्रेम का प्रदर्शन करके तमिल वोट पर अपनी पार्टी का दावा मजबूत कर सके। 19 फरवरी 2014 को मुख्य मंत्री जय ललिता ने एलान किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े इन तीन अभियुक्तों के साथ अन्य चार जल्द ही खुली हवा में सांस लेंगे।


इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हत्यारों को छोड़ने कि तमिलनाडु सरकार कि पहल को नाजायज ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल नाडु सरकार को नोटिस जारी कर इस पर रोक नहीं लगाई होती तो तमिलनाडु कि सरकार इन हत्यारों को रिहा कर चुकी होती। राजीव गांधी की हत्या के मामले की जांच करने वाली स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम के प्रमुख पुलिस अफसर डीआर कार्तिकेयन ने अपनी किताब सत्य की विजय:राजीव गांधी की हत्या एक अन्वेषणमें इस हत्याकांड के कई अहम पहलू उजागर किए है। जांच में यह सभी तथ्य सामने आयें जिसके अनुसार राजीव गांधी को मारने की साजिश नवंबर 1990 में श्रीलंका के जाफना में बनी थी। इस दौरान घने जंगलों में लिट्टे चीफ प्रभाकरण और उसके चार साथी बेबी सुब्रह्मण्यम,मुथुराजा,मुरूगन और शिवरासन इस साजिश में शामिल रहे थे और यहीं पर राजीव गांधी की हत्या के लिए मानवबम धनू का सहारा लेने का फैसला हुआ लिया गया था।  


जांच अधिकारी डी. आर कार्तिकेयन के मुताबिक महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या से भी ज्यादा राजीव गांधी मर्डर जटिल था क्योंकि इसमें हत्यारे और उसके इरादे के बारे में जानकारी तलाशना बहुत टेढ़ी खीर था। साथ ही यह मामला एक अन्य राष्ट्र से भी जुड़ा था। एसआईटी ने इस कार्य में बड़ी तेजी दिखते हुए सीबीआई,रॉ,कैबिनेट सचिवालय से मिले इंटेलीजेंस इनपुट पर चर्चा के साथ हत्या से पहले तमाम कोड वाले संदेशों के आदान-प्रदान को भी समझने की कोशिश की।  ज्यादातर संदेशों का आदान-प्रदान तमिलनाडु के आतंकी संगठनों के बीच हो रहा था। इसके लिए एक कंट्रोल रुम बनाया गया जो 24 घंटे काम करता था। 10 हजार लोगों के बयान लिए गए जबकि 1 लाख से ज्यादा  तस्वीरों की स्क्रूटनी भी की. 1477 दस्तावेजों को कोर्ट में सुबूत के तौर पर पेश किया गया। जांच कि दृष्टि से यह बेहद जटिल केस था लेकिन  एसआइटी ने एक साल के भीतर 20 मई 1992 को चार्जशीट पेश कर दी थी। इस आत्मघाती बम हमले में कुल 18 लोगों की मौत हो गई। इसमें राजीव गांधी के निजी सुरक्षा अधिकारी,एसपी,पत्रकार और कई अन्य लोग शामिल थे। इसके दोषी सरकारों  की रहम पर जेल से बाहर आते रहते है। इन्हें राजनीति के साथ सामाजिक प्रश्रय भी मिलता है।


राजीव गांधी के साथ 17 अन्य जो लोग मारे गए थे,उनका न तो किसी को चिंता है न ही परवाह। जबकि नलिनी की बेटी लंदन में रहकर आराम का जीवन यापन कर रही है। राजनीतिक पार्टियां इन्हें अब भी निर्दोष कहती है जबकि राजीव गांधी के पुत्र और सांसद राहुल गांधी की बात उतनी ही प्रासंगिक लगती है ने कि अगर प्रधानमंत्री के हत्यारे छूट सकते है तो आम आदमी न्याय की कैसे उम्मीद कर सकता है। वहीं भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कहा था कि, ये सभी कट्टर आतंकवादी है। यह कहना बेतुका है की देरी से फैसले के कारण उन्हें मानसिक प्रताड्ना हुई। जो लोग उनके द्वारा मारे गए,उनके अधिकारों के बारे में क्या कहेंगे।

 

बुधवार, 19 मई 2021

भारत का फिलिस्तीन पर दांव India support Palestine in UN

 राष्ट्रीय सहारा




                         

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कूटनीति का बेहद अहम योगदान होता है जिसके जरिए किसी भी देश के द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति की जाती है। बीसवी सदी के महान कूटनीतिक विचारक हंस मोर्गेंथाऊ ने कहा था कि कूटनीति यह वह कला है जिसके द्वारा राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्वों को अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में उन मामलों में अधिक से अधिक प्रभावशाली रूप में प्रयोग में लाया जाए जो कि हितों में सबसे स्पष्ट रूप से सम्बन्धित हैं। दरअसल इस्राइल और फिलिस्तीन विवाद में भारत ने फिलिस्तीन के पक्ष में आवाज बुलंद करके सभी को हैरत में डाल दिया। ऐसा भी नहीं है कि भारत ने पहली बार फिलिस्तीन का समर्थन किया है,लेकिन भारत में 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह माना जा रहा था कि भारत इस्राइल के साथ खड़ा होगा। इस समय इस्राइल और फिलिस्तीन के बीच गहरा तनाव है और भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए फिलिस्तीन का समर्थन करने से गुरेज नहीं किया।


संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत टीएस तिरूमूर्ति ने कहा कि भारत फिलिस्तीन की जायज़ मांग का समर्थन करता है और दो-राष्ट्र की नीति के ज़रिए समाधान को लेकर वचनबद्ध है। इसके साथ ही तिरूमूर्ति ने भारत की यह मांग भी रखी की,  “दोनों पक्षों को एकतरफ़ा कार्रवाई करके मौजूदा यथास्थिति में बदलाव की कोशिश नहीं करनी चाहिए,इसमें यरुशलम में किसी भी तरह का बदलाव न करना शामिल है।”


इस समय इस्राइल पूर्वी येरूशलम से फिलिस्तीनीयों को बाहर करने की नीति पर काम कर रहा है और ऐसे में भारत ने फिलिस्तीन को लेकर जिस प्रकार खुलकर समर्थन दिया उसे कूटनीतिक हलकों में अप्रत्याशित समझा जा रहा है। आपको याद होगा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2017 में इस्राइल की यात्रा की थी। आज़ाद भारत के किसी प्रधानमंत्री की यह 70 सालों में पहली इस्राइल यात्रा थी,जहां हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी के लिए इस्राइल के प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित थे और यह भारत के लिए अभूतपूर्व था। इसके पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फिलिस्तीन की जमीन पर 14 मई 1948 को अस्तित्व में आएं नए देश इस्राइल का कडा विरोध किया था और भारत की इस्राइल को लेकर दूरी की यह नीति कई वर्षों तक जारी रही। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी और बाद में नरसिम्हा राव ने इस्राइल से दूरी को दूर कर इसे नियंत्रण और संतुलन के आधार पर स्थापित किया।


  

इन सबके बीच फिलिस्तीन को लेकर भारत की वैदेशिक नीति बेहद सकारात्मक रही है और वैश्विक मंचों पर भारत की लगभग सभी सरकारों ने इसका इजहार भी किया है। फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को फिलीस्तीनी लोगों के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में समकालीन रूप से मान्यता देने वाला भारत पहला गैर-अरब देश था। इसके पहले 1975 में भारतीय राजधानी में एक पीएलओ कार्यालय स्थापित किया गया था। इस प्रकार अरब देशों के बाद भारत ही वह राष्ट्र था जिसने फिलिस्तीन का लगातार अभूतपूर्व समर्थन किया था। 2018 में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी फिलिस्तीन  की यात्रा की थी जहां उन्हें फिलिस्तीन के सर्वोच्च सम्मान ग्रैंड कॉलर से नवाजा गया था।


किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी वैदेशिक नीति का सबसे अहम उसके राष्ट्रीय हित होते है। भारत का फिलिस्तीन के समर्थन का यह एक महत्वपूर्ण कारण है। अरब देशों को  इस्राइल का मध्य पूर्व में अस्तित्व अस्वीकार्य रहा है और 1967 में यह युद्द के रूप में उभर कर सामने आया था। 1967 में जब जार्डन, सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुस्लिम देशों ने एक साथ इस्राइल पर हमला किया था तब उसने पलटवार करते ही मात्र छह दिनों में इन सभी को धूल चटा दी थीउस घाव से अरब देश अब भी नहीं उबर पाएं है यह युद्ध 5  जून से 11 जून 1967 तक चला और इस दौरान मध्यपूर्व संघर्ष का स्वरूप ही बदल गया इतिहास में इस घटना को सिक्स वॉर डे के नाम से जाना जाता है। इस्राइल ने मिस्र को ग़ज़ा से,सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट और पूर्वी यरुशलम से धकेल दिया थाइसके कारण करीब पांच लाख फ़लस्तीनी बेघरबार हो गए थे।  युद्द में जीते गये इलाके अब इजराइल के कब्जे में है और खाड़ी देशों के लाख प्रयासों के बाद भी इस्राइल इन इलाकों को छोड़ने को तैयार नहीं है



सऊदी अरब के पूर्व विदेशमंत्री प्रिंस साउद अल फैसल ने एक बार कहा था कि इजराइल किसी भी तरह के कानून,नियम या धार्मिक मान्यताओं और मानवीय पक्षों को धता बताते हुए अपने लक्ष्य की और अग्रसर रहता है। सऊदी अरब इस्लामी सहयोग संगठन 57 देशों के प्रभावशाली समूह का अगुवा है। संयुक्त राष्ट्र के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संगठन है। यह संगठन इस्राइल का मुखरता से विरोध करता रहा है। ओआईसी का पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण सदस्य है और वह कश्मीर का भ्रामक प्रचार करके इस संगठन का भारत के खिलाफ उपयोग करने को लगातार प्रयासरत रहता है।


2019 में जब भारत ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर राज्य के पुनर्गठन की घोषणा की थी तब पाकिस्तान ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया करते हुए इस पर ओआईसी की आपात बैठक बुलाने की मांग की थी। इस समय भारत के पक्ष में सऊदी अरब आया था और उसकी प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही थी। यही नहीं जब भारत के विरोध में तुर्की और मलेशिया जैसे देशों ने नकारात्मक बयान दिये तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी भी दी थी।  इसके पहले 2016 में मोदी की पहली सऊदी यात्रा के दौरान सऊदी अरब के बादशाह सलमान ने उन्हें सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया था। बाद में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भारत की यात्रा भी की थी। सऊदी अरब में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की संख्या सबसे ज़्यादा है,वहां 26 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं।  भारत के इस समय सऊदी अरब से मजबूत संबंध है और इसका राजनीतिक,सामरिक और आर्थिक फायदा भारत को लगातार मिल रहा है। सऊदी अरब के लिए भारत विश्व की आठ बड़ी शक्तियों में से एक है,जिसके साथ वो अपने विज़न 2030 के तहत रणनीतिक साझेदारी करना चाहता है।



इस समय दुनिया बड़े बदलावों से गुजर रही है और भारत को पड़ोस के देशों से कड़ी रणनीतिक चुनौतियां मिल रही है। भारत,अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध लगातार मजबूत हुए है वहीं पाकिस्तान,चीन,रूस और ईरान जैसे देश भी लामबंद हुए है। भारत के इस्राइल से मजबूत सामरिक संबंध तो है लेकिन भारत की भू रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियां यह इजाजत नहीं देती की भारत खुलकर इस्राइल का समर्थन करें,ऐसे में सऊदी अरब समेत खाड़ी के कई देशों से भारत के संबंध खराब हो सकते है,जबकि इन देशों में भारत के लाखों लोग काम करते है और तेल को लेकर भी भारत इन देशों पर निर्भर है। जाहिर है भारत ने हालिया तनाव में फिलिस्तीन का समर्थन करके न केवल अरब देशों को सकारात्मक संदेश दिया है बल्कि ओआईसी में पाकिस्तान के भारत विरोध की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है।

 

 

 

 

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