मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

अफगानिस्तान पर असमंजस आत्मघाती,afganstan india

 राष्ट्रीय सहारा   

                        


इतिहास को भुलाकर गहरी रणनीति के विचार को आगे लाने का अवसर एक बार फिर भारत के सामने है। करीब चार दशक से राजनीतिक अराजकता,अस्थायित्व,आतंकवाद,आंतरिक गतिरोध और वैश्विक हस्तक्षेप से जूझते अफगानिस्तान का भविष्य अनिश्चितता कि ओर बढ़ रहा है। इस समय दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश और अफगानिस्तान के पारंपरिक मित्र भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होना चाहिए,लेकिन कूटनीतिक हलकों में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अफगानिस्तान को लेकर हो रही बातचीत या महाशक्तियों के फैसलों में भारतीय हित नदारद है। 



दरअसल दो दशक से अफगानिस्तान में तालिबान को उखाड़ फेंकने की तमाम कोशिशों में नाकाम रहने के बाद  अमेरिकी सेना वहां से जाने को तैयार है और इस प्रकार एक बार फिर इस दक्षिण एशियाई देश में तालिबान का कथित इस्लामी शासन  कायम होने का खतरा मंडरा गया है। पाकिस्तान के पूर्व सैनिक तानाशाह जनरल मुशर्रफ कहा करते थे कि वे पाकिस्तान को एक उदारवादी देश बनाने के लिए प्रतिबद्ध है,तालिबान भी विश्व समुदाय यह भरोसा दिला रहा है कि वे अफगानिस्तान में आतंकवाद को नहीं पनपने देंगे और इस देश को एक उदार देश बनाएँगे। पाकिस्तान में कथित लोकतंत्र होने के बाद भी यह देश उदार नहीं हो पाया,फिर धार्मिक उन्माद के आधार पर स्थापित तालिबान पर वैश्विक समुदाय कैसे भरोसा कर सकता है,यह आश्चर्यजनक है। वहीं भारत अफगानिस्तान को लेकर बदलते घटनाक्रम पर अब तक खामोश है और यह ठीक तीन दशक पहले की उस भारतीय कूटनीति कि याद दिला रहा है जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने रुको और देखों की नीति अपनाई थी और इसके दूरगामी परिणाम बेहद नुकसानदेह साबित हुए है। वे अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति नजीबुल्ला को भारत में शरण देने को लेकर चार साल तक असमंजस में रहे। इस कारण नजीबुल्ला अपने ही देश में फंसे रहे और उन्हें भारतीय दूतावास के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र संघ के दफ्तर में रहने को मजबूर होना पड़ा। अंतत: 27 सितंबर,1996 को अफगानिस्तान स्थित यूएनओ के दफ़्तर में घुसकर  नजीबुल्लाह को तालिबान के लड़ाकों ने खींच कर उनके कमरे से निकाला और सिर में गोली मार कर राजमहल के नज़दीक के लैंप पोस्ट से टांग दिया था। नजीबुल्ला की हत्या के बाद अफगानिस्तान ने तालिबान का बर्बर शासन देखा। तालिबान को पाकिस्तान की खुफियाँ एजेंसी आईएसआई का शिशु माना जाता है। अफगानिस्तान में कश्मीर चरमपंथियों को व्यापक प्रशिक्षण दिये गए,इससे कश्मीर में आतंकवाद का सबसे बुरा दौर देखा गया। 1999 में भारतीय विमान का अपहरण कर उसे कांधार ले जाया गया। भारत की अटलबिहारी सरकार ने इसके बदले कई कुख्यात आतंकवादी छोड़े और इन्हें लेकर भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंतसिंह स्वयं कांधार गए। इस समूचे घटनाक्रम में भारत की छवि एक कमजोर देश के रूप में उभर कर सामने आई थी।


2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद तालिबान कमजोर हुआ है और सामरिक रूप से इसका सीधा लाभ भारत को मिला है। यह भी देखा गया है कि अफगानिस्तान के लोग भारत को पसंद करते है और वे इस देश के भविष्य निर्धारण में भारत की बड़ी भूमिका भी देखना चाहते है।   

अफ़गानिस्तान में इस समय बैंकिंग,सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों को स्थापित करने में भारत की बड़ी भूमिका है और कृषि, विज्ञान,आईटी और शरणार्थी पुनर्वास के कार्यक्रमों में भी वह सहयोग दे रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफ़गान सीमा तक रेल चलाने की भारत की योजना है और इससे भारत यूरोप तक पहुँच सकता है। इसे चीन की वन बेल्ट योजना के प्रभाव को रोकने के तौर पर भी देखा जाता है।


अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी पाकिस्तान के लिए हमेशा चिंता का विषय रही है। अफगानिस्तान से भारत और पाकिस्तान के सम्बन्धों की जटिलता पर बेनज़ीर भुट्टों ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि,अफगानिस्तान का पाकिस्तान से एक लंबे समय से सीमा रेखा डूरन्ड लाइन को लेकर झगड़ा रहा है। इसके अलावा पख्तून लोगों ने 1947 में हिंदुस्तान के बँटवारे के समय,पाकिस्तान बनाने कि बड़ी खिलाफत की थी। अफगानी लोग खुद को हिंदुस्तान से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते है,उन्हें पाकिस्तान पक्ष से असुरक्षा का भाव रहता है।


अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरन्ड रेखा को लेकर विवाद है। दोनों देशों के बीच इसी रेखा को सीमा निर्धारण का आधार माना जाता है। अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकारें पाकिस्तान को चुनौती देती रही है जबकि तालिबान को लेकर स्थिति अलग है।  तालिबान पाकिस्तान की सेना के नियंत्रण में है और तालिबान के नेता और उनके परिवार पाकिस्तान के शहरों में रहकर यहां सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।  जाहिर है अफगानिस्तान में तालिबान का शासन पाकिस्तान के लिए मुफीद है और इसीलिए उसने अफगानिस्तान में शांति स्थापित होने,लोकतंत्र कायम होने और तालिबान को खत्म करने के वैश्विक प्रयासों को कभी सफल होने ही नहीं दिया है। इसके साथ ही तालिबान को अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति और पाकिस्तान तथा चीन के सामरिक,राजनीतिक और आर्थिक सहयोग का बड़ा फायदा मिलता रहा है। अफगानिस्तान के घने और ठंडे पर्वतीय प्रदेश,ऊंची ऊंची घाटियां,ऊबड़ खाबड़ रास्ते तालिबान और मुजाहिदीनों के  लिए सुरक्षित पनाहगह माने जाते है। इस देश के अधिकांश क्षेत्रों में घात लगाकर हमला करने में ज्यादा सफलता मिलती है। 1979 में तत्कालीन समय की विश्व की श्रेष्ठ सोवियत संघ की सेना के विरुद्द मुजाहिदीनों को सफलता मिलने का प्रमुख कारण यहीं था की इन आतंकवादी समूहों की छोटी मोटी टुकड़ियों ने गुरिल्ला पद्धति से अपने से अधिक सुसज्जित नियमित सेना के विरुद्द कम से कम क्षति उठाकर उन पर श्रेष्ठता स्थापित कर ली। पिछले दो दशकों से अमेरिकी सेना को भी इस कठिन स्थिति का सामना करना पड़ा। हालांकि अमेरिका और नैटो सेना ने हवाई हमलों और सेटेलाइट का व्यापक उपयोग कर अत्याधुनिक तरीके से तालिबान को गहरी क्षति पहुंचाई। ऐसे में अमरीका की हवाई शक्ति के बिना अफ़ग़ान सेना का कोई भविष्य दूर दूर तक नजर नहीं आता है और अमेरिका के वहां से जाते ही तालिबान स्थापित सरकार को खत्म करके फिर से शासन पर काबिज हो जाएगा,इसकी पूरी संभावना है।


इस समय अफगानिस्तान में चीन की दिलचस्पी काफी हद तक बढ़ गई है और पाकिस्तान चीन की  महात्वंकांक्षी वन बेल्ट परियोजना में शामिल करने के लिए अफगानिस्तान पर लगातार दबाव बना रहा है। भारत इस परियोजना का बड़ा विरोधी रहा है और इसमें अफगानिस्तान के शामिल होने से यह सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण ही होगा।  इसके साथ ही इस्लामिक स्टेट भी अफगानिस्तान के कई इलाकों में प्रभावी है। तालिबान के प्रभाव में आते ही यह देश फिर आंतरिक अशांति का सामना करेगा और इससे इस्लामिक स्टेट मजबूत होगा,जिसके दूरगामी परिणाम भारत समेत पूरी दुनिया के लिए घातक हो सकते है।


अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी देश में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना चाहते है जबकि उन पर यह वैश्विक दबाव बढ़ रहा है कि वो तालिबान को सत्ता में लाएं और एक संभावित गृहयुद्ध की ओर जाने से बचें। भारत को यह समझना होगा कि तालिबान का अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज होने से कश्मीर में आतंकवाद  पुन: उभर सकता है। जाहिर है भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक चुनाव और लोकतांत्रिक सरकार के पक्ष में आवाज बुलंद करना चाहिए।

 

 

रविवार, 18 अप्रैल 2021

भीड़तंत्र की मूर्खता की पराकाष्ठा bhidtantra india

 दबंग दुनिया


                    

गौतम बुद्ध राजघराने से जुड़े थे और उन्हें सत्ता के अवगुणों का बेहतर ज्ञान था। वे सत्ता के अहम में डूबे राजा और उनकी राजनीति को दुखद विज्ञान कहते थे। लगभग डेढ़ हजार साल पहले  दिए गए बुद्द के ये राजनीतिक विचार भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान प्रयोगशाला में राजनीति के स्तर और उसके अंतिम लक्ष्य को चित्रित करने के लिए काफी है।  बुद्द ने आगे कहा था कि सत्ता का लोभ राजा के लिए सबसे प्रिय होता है और राजनीति ऐसी चीज़ है जो अपने माता पिता के हनन को भी जायज ठहरा देती है। अत: राजनीति दारुण दुख का विज्ञान है।


दरअसल भारत के विकास के परम वैभव को देखने कि मदहोशी में डूबी भीड़ लाशों के ढेर और जलती हुई चिताओं से रोशन राजनीतिक पार्टियों की चुनावी सभाओं में बेतहाशा उमड़ रही है। इन सभाओं में सपने बांटे जा रहे है और लोग पागलों कि तरह उन सपनों को लूट लेने को आमादा नजर आ रहे है। यह भीड़ महाकुंभ में भी नजर आई जो मुक्ति के पवित्र स्नान की भावना से दूर सामाजिक दुख और अवसाद का कारण बनने को ज्यादा प्रेरित नजर आई। आखिर भारत जैसे प्राचीन और जियो और जीने दो की सभ्यता वाली भूमि पर यह कैसे संभव हो सकता है। लेकिन यह हम सबने कुंभ के मेले मे देखा। कुंभ जैसे स्नान मुख्यत: साधू,सन्यासियों या तपस्वियों के लिए एक प्रमुख धर्म या संस्कार होता है। इससे जनता को दूर रखा जा सकता है। धर्म को आचरण से ज्यादा प्रदर्शन की वस्तु समझने वाले आधुनिक समाज को न तो महामारी की विभीषिका से बचाने के लिए इस स्थान से दूर रखने के बारे में सोचा गया और न ही जनता को स्वयं यह परवाह थी।


  

यह सब भारत के लोकतंत्र में ही हो सकता है जहां जिंदगी के आसन्न संकट के बीच भी धार्मिक और चुनावी महोत्सव जारी है। बंगाल को भारत भूमि में विद्वत्ता के लिए पहचाना जाता है लेकिन यह राजनीतिक कारणों से किसी राष्ट्रीय आपदा के संकट को स्वीकार करने से भी इंकार कर देंगी,यह कल्पना किसी ने नहीं की होगी। महामारी के प्रकोप से मरते लोग और उससे उपजी बेबसी,निराशा और हताशा भारत की त्रासदी बन गई है। यह किसी एक स्थान,गांव,कस्बे या शहर का हाल नहीं है बल्कि समूचे भारत का दृश्य है। इस बीच देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे है और नेताओं के चमकीले भाषण बदस्तूर जारी है। इन राजनीतिक कार्यक्रमों में उमड़ती भीड़ अपनी मौत कि आहट को क्यों न सुन पा रही है,यह आश्चर्यजनक है।   


सवाल यह भी उठता है कि क्या राष्ट्रीय आपदा के संकट में भारत में कुछ राज्यों में होने वाले चुनावों को टाला जा सकता था। बेशक संवैधानिक रूप से तो यह बेहद आसान था लेकिन  इस पर विचार करना न तो सत्ताधारी दल को जरूरी लगा न ही देश की विपक्षी पार्टियों ने ऐसी कोई पेशकश की। इसका कारण यह भी तो है कि भारत में सत्ता भले ही परिवर्तित होती रहे लेकिन सत्ता के केंद्र में अभिजनवादी होते है और उन्हें आम जनता के हितों से कोई ज्यादा सरोकार नहीं होता। इन अभिजनों को लोकतंत्र भीड़ तंत्र नजर आता है जो अपंग होकर भी लंबी दौड़ लगाने का माद्दा रखते है और राजनीतिक दल उनसे यह आसानी से करवा भी लेते है।


एक बार फिर देश के कई इलाकों से भूखे प्यासे मजदूर वापस अपने घरों को लौट रहे है। उसमें से कितने ज़िंदा लौट पाएंगे यह किसी को पता नहीं और न ही इसकी चिंता करने की किसी ने जरूरत समझी। जनता चुनावों में जीत दिलाकर सत्ता की ऑक्सीजन राजनीतिक पार्टियों को इसीलिए देती है क्योंकि कठिन समय में जिंदगी को बचाने के लिए जब उन्हें ऑक्सीजन की जरूरत पड़े,उन्हें मिल जाएँ। ऐसा हुआ नहीं। कई मासूम,युवा और बूढ़े आक्सीजन के इंतजार में जिंदगी से अलविदा कह गए। पूरे के पूरे परिवार उजड़ गए। न जाने कितने सपने इन लोगों के साथ चले गए और जो पीछे छूट गए उनके जीवन का क्या होगा किसी को पता नहीं।


इसके लिए जिम्मेदार भी तो भीड़ तंत्र ही है जो अपने सुनहरे भविष्य की पहचान करने में अक्सर नाकाम रहता है। उसकी बेहतरी शिक्षा,स्वास्थ्य और सड़कों में है लेकिन उसे तो जातीय और धर्म में सब कुछ नजर आता है।  भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,लोकतंत्र की जड़े भले ही इसमें मजबूत हो लेकिन अंतत: यह जागरूक लोकतंत्र बिल्कुल भी नहीं है। 


एथेंस के दार्शनिक प्लेटो ने लगभग ढाई हजार साल पहले अपनी किताब 'द रिपब्लिक' में मतदाताओं की योग्यता और सोच पर सवाल उठाएँ थे। उन्होने कहा था कि मतदाता अप्रासंगिक बातों जैसे कि उम्मीदवार के रूपरंग आदि से प्रभावित हो सकते हैं। उन्हें ये अहसास नहीं रहेगा कि शासन करने से लेकर सरकार चलाने के लिए योग्यता की ज़रूरत होती है। किसी नेता के लिए मतदान करना उन्हें काफ़ी जोखिम भरा लगा।  


वहीं भारत के करोड़ों लोगों के लिए मतदान से बढ़कर कुछ भी नहीं है,यहां तक कि जिंदगी भीं नहीं। जब आम आदमी जिंदगी के लिए इतना लापरवाह होगा तो सत्ता के लिए तो उनकी जिंदगी सस्ती होगी ही।  2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि,कोई भी नागरिक अपने आप में क़ानून नहीं बन सकता है। लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाज़त नहीं दी जा सकती। शुक्र है माननीय न्यायालय का जो भारत को लोकतन्त्र समझती है। जबकि यकीनन हम भीड़ तंत्र का हिस्सा है जो सत्ता से उचित,विवेकपूर्ण और बुद्धिमत्तापूर्ण फैसलों की अपेक्षा नहीं करती बल्कि वह भावनाओं के राज को पसंद करती है। अब यही भावनाएं मौत का मंजर लेकर खौफ का कारण बन गई है जो जलती हुई चिताओं के रूप में हम सबक़ों चिढ़ा रही है।  

 

 

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

क्या संविधान ख़तरे में है,sanvidhan khtre men hai

 

पॉलिटिक्स

                              


संविधान के लिए सिर्फ यह काफी नहीं है कि उसमें लिखा क्या गया है,बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि संविधान को आप किस तरह पढ़ रहे है,समझ रहे है और उसे किस तरह पढ़ाया जा रहा है। यहां तक की उसकी व्याख्या किस तरह की जा रही है,यह भी अहम हो जाता है। डॉ.आंबेडकर इस बात को भलीभांति जानते भी थेउन्होंने कहा भी था कि संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता,बल्कि व्यवस्थाओं का संचालन करने वाले लोगों तथा अपनी राजनीति की पूर्ति के लिए बनाये जाने वाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है


आज़ाद भारत के लोकतांत्रिक जीवन में संविधान को अलग अलग तरीके से समझने और समझाने की कोशिशें बेहद आम है  वैसे देश का संविधान इतना उदार और वृहत है की न्यायालय के इतर भी लोग और राजनीतिक पार्टियां अपनी पसंद के अनुसार संविधान को देखने और समझने की कोशिश करते रहते है।  संविधान लागू ही हुआ था कि 1951 में रोमेश थापर बनाम राज्य मद्रास के मामले में न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा यह कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय का गठन  लोगों के मौलिक अधिकारों के रक्षक और संरक्षक के तौर पर किया गया है।  जाहिर है इससे यह साफ हो जाता है कि कोई अन्य संस्था या निकाय आम जनमानस के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती। आज़ादी के बाद सैंकड़ों ऐसे मामले मिल जाएंगे जब राजनीतिक या सामाजिक द्वेषवश लोगों को कानूनी मामलों में फंसा दिया जाता है। वे दसों साल जेल कि सजा काट चुके होते है,तब यह तथ्य सामने आता है कि वे निर्दोष है। इस दौरान कथित मुलजिम का परिवार बर्बाद हो चूका होता है,जवान बेटे कि रिहाई का इंतजार करते बूजुर्ग माँ बाप मर जाते है। पत्नी और कहीं चली जाती है और जेल से निकलने के बाद जिंदगी में सब कुछ लूट चूका होता है। ऐसे मामलों में पुलिस की जांच और न्यायालय का निर्णय का फैसला सब कुछ तय कर देता है लेकिन इन गंभीर गलतियों को व्यवस्था का एक अंग स्वीकार कर लिया गया है। 


1973 में सुप्रीम कोर्ट ने  केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरला केस में कहा था कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के खिलाफ़ नहीं हो सकता है। यह देखा गया है कि कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के लिए ऐसी कोई व्यवस्था स्वीकार्य करना मुश्किल हो जाता है जहां उनकी सर्वोच्चता को चुनौती मिले।  ऐसे में संविधान में इच्छा के अनुसार बदलाव भी हुए,समीक्षा करने का दुस्साहस भी किया गया और इसके साथ ही संवैधानिक पदों पर बैठे जिम्मेदार नेता चुनावी सभाओं में प्रस्तावना की भावना की सरेआम धज्जियां उड़ाने से नहीं चूकते है। यह बात और है कि चुनाव आयोग किस पर संज्ञान ले और किस पर खामोशी ओढ़ ले,इसे लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने 703 पन्नों का फैसला दिया था और यह  साफ किया था की संसद की शक्तियां अनियंत्रित नहीं हैं। लेकिन सरकार,उनके नुमाइंदों और बहुमत को कैसे नियंत्रित करें,यह संकट भी बना रहता है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में रिकार्ड लोकसभा सीटें जीतकर बनने वाली राजीव गांधी की सरकार ने शाहबानों के केस में समानता के अधिकार के कानूनी ढांचे को ही निशाना बनाने से गुरेज नहीं किया,तो कर्नाटक के एक दिग्गज नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री अनंतकुमार हेगड़े ने भारत के संविधान से 'सेक्युलर' शब्द को हटाने कि बात कह दी।


 

अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने संविधान  से उत्पन्न विसंगतियों को दूर करने के लिए एक समीक्षा आयोग बनाया और उसकी कमान एक पूर्व न्यायधीश को सौंप दी। इस पर तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि संविधान में परिवर्तनों के बजाय राजनेताओं को अपने आचरण में परिवर्तन करना चाहिए। क्योंकि संविधान निर्माताओं ने जिन आदर्शों का निर्माण किया था उनका खुला उल्लंघन हो रहा है।  इंदिरा बनाम राज नारायण 1975 के वाद में मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे मुक्त तथा निष्पक्ष चुनाव को संविधान के आधारभूत ढांचे का भाग नहीं माना। आस्टिन ग्रेनविले की किताब वर्किंग ए डेमोक्रेटिक कांस्टिट्यूशन- ए हिस्ट्री ऑफ द इंडियन एक्सपीरियंस में लिखा है  कि जस्टिस रे अक्सर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को फोन करके उनसे बात करते थे।  बल्कि कई बार वो मामूली बातों पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव को भी फोन करके उनसे सलाह लिया करते थे। जस्टिस रे के ही कार्यकाल के दौरान देशभर में आपातकाल लगाया गया था। लेकिन भारत की राजनीतिक परंपरा का यह एकमात्र सिर्फ उदाहरण है, ऐसा भी नहीं है। पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई न्याय के देवता बनकर भी संतुष्ट नहीं हुए और न जाने किस ख्वाईश को लिए राज्यसभा में चले गए। राजनीतिक दृष्टि से भी तो यह निर्णय ठीक नहीं। और जहां तक संवैधानिक दृष्टि की बात है तो उसके लिए उन्मुक्त आसमान है। 


संविधान सभा के उच्च विद्वानों के बीच देश के निर्माण की समग्र दृष्टि के साथ  डॉ. आंबेडकर ने यह महत्वपूर्ण चेतावनी दी थी कि जनता को अपनी मांगों को पूरा करने के लिए संविधानेतर आंदोलनों से अब परहेज़ करना चाहिएइसे वे ग्रामर ऑफ एनार्की यानी अराजकता का रास्ता बताते हैं दिलचस्प बात है कि देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपनी राजनीतिक हसरतों को पूरा करने के लिए संविधानेतर बातें करते है और उस आधार पर आंदोलन भी खड़ा करने से नहीं चूकते।


पूर्व राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने राष्ट्रपति रहते अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा था कि,कई बार मैने खुद को बेहद दुखी और असहाय पाया। कई बार मैं अपने देश के नागरिकों के लिए कुछ न कर सका। सीमित शक्तियों के कारण मैं असमर्थ था। जाहिर है देश के राष्ट्रपति के तौर पर भी जब संविधान की भावना और लोकहित के अनुसार काम करना मुश्किल हो सकता है तो फिर आम आदमी की मुश्किलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह शब्द भले ही एक पूर्व राष्ट्रपति के हो लेकिन इसमें एहसास तो संविधान की उस किताब का है। जो कसमसाती रहती होगी अपनी लाचारियों और मजबूरियों पर। पर हकीकत तो यह भी है कि संविधान की उस किताब की कोई जुबान नहीं है इसीलिए उसे अलग अलग जुबानों से बोला जाता है। इन सबके बाद भी संविधान बना हुआ है और बरकरार भी है। यकीन मानिए,जब तक यह बरकरार है,इसे खतरे में मत समझिए।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

जांबाजों का मनोबल गिरने न पाए,naxsal crpf india

 राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप विशेषांक 





                                                                                                                                     

अपने शहीद जवानों के खून से सने कलश को शौर्य,साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानने वाला सीआरपीएफ को भारत की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा पहरुआ समझा जाता है जिनसे  सुकमा के घने जंगलों समेत पूरे रेड कॉरिडोर में नक्सली खौफ खाते हैये जांबाज़ जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में पृथकतावादी और अलगाववादी संगठनों से मुकाबला करते है और उनके निशाने पर भी होते है नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है,इसका सबसे कठिन पहलू यह है कि यह ऐसी लड़ाई है जिसमें दुश्मन का बहुत कम पता चल पाता है। घने जंगलों की खाक छानते हुए नक्सल विरोधी अभियान का हिस्सा होना बेहद खतरनाक चुनौती होता है। एक बार किसी ऑपरेशन के लिए अपनी बटालियन के साथ रवाना होने के बाद यह पता ही नहीं होता की वापस कब लौटना है। कई बार जंगलों की खाक  छानते हुए 10-10 दिन तक हो जाते है। इस दौरान कड़ी सतर्कता के साथ सावधानी रखना होता है। कोबरा बटालियन के एक अधिकारी ने बताया,माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन पर जाते  हुए हम अपना सामान इकट्ठा कर कैंप में रख कर जाते थे और साथ में एक चिट्ठी भी छोड़ कर जाते थे की यदि मै लौट न पाया तो चिट्टी और सारा सामान हमारे घर तक पहुंचा दिया जाएँ।” वापस जिंदा न लौट पाने की आशंका के साथ माओवादियों का मुकाबला करना इन क्षेत्रों में काम करने वाले सुरक्षा और पुलिस जवानों की हकीकत मानी जाती है। ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को अपने परिवार से बात करने की मनाही होती है और आमतौर पर इस अनुशासन का पालन सभी के द्वारा किया जाता है।


माओवाद के प्रभाव वाले इलाकों में सुरक्षाबलों को बेहद विषम परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और ऐसे में उनके लिए स्वयं का मनोबल बनाएं रखना बेहद कठिन होता है।  महज साठ दिनों की छुट्टी हर साल मिलती है और विपरीत परिस्थितियों में वह कम या रद्द भी हो सकती है देश के अंदर भारतीय सेना जैसी चुनौतियों का सामना करने के बाद भी सीआरपीएफ़ अत्याधुनिक हथियारों की कमी,सैन्य साजो सामान का अभाव,मूलभूत सुविधाओं की कमी और उच्च स्तर के सेवा लाभों से महरूम हैरणक्षेत्र में सेवा के दौरान और मारे जाने के बाद भी इन जांबाजों को सेना के सभी लाभ नहीं मिल पाते,यहीं नहीं अफ़सोस उन्हें शहीद का दर्जा भी नहीं दिया जाता सातवें वेतन आयोग की सिफारिश स्वीकार कर अर्द्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा देने की केंद्र की घोषणा अभी तक साकार रूप नहीं ले सकी है। कैंटीन की सुविधा उस प्रकार नहीं मिलती जैसे आर्मी को मिलती है,उन्हें पेंशन की सुविधा भी नहीं है। जो सामान मंगाते है,उस पर जीएसटी देने को मजबूर है।  इनकम टैक्स में कोई  विशेष छूट नहीं और इन सबके साथ नक्सलियों से अग्रिम मोर्चों पर लड़ने को तत्पर और तैयार रहना पड़ता है नक्सली क्षेत्रों में काम करने वाले अन्य बलों के भी सीआरपीएफ़ जैसे ही हालात है


 

इन सबके बीच यह कडवी हकीकत है कि तमाम प्रशिक्षण के बाद भी जंगलों की जानकारी सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर नक्सलियों को होती है। वे स्थानीय परिवेश में घुले मिले होते है तथा इन परिस्थितियों का फायदा भी वे खूब उठाते है,जिससे सुरक्षाबलों को ज्यादा नुकसान होने की आशंका बनी रहती है माओवादियों और अन्य लोगों में पहचान कर पाना भी मुश्किल होता है सुरक्षा एजेंसियों के पास माओवादियों के कई नेताओं और उनके सहयोगियों की कोई पुख्ता जानकारी नहीं  होती कि वे  कौन हैं और किन इलाक़ों में रहते हैंऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते है जब जंगल में किसी के पास हथियार हो,अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है

घने जंगलों से गुजरते हुए सुरक्षा बल हमेशा सावधान रहते है की उन पर किसी की भी नजर न पड़ेमाओवादी आदिवासियों की गरीबी का फायदा उठाकर  उन्हें विकास से दूर रखे हुए हैसुरक्षाबल सभी की नजरों से बचने के लिए रात में पैदल सफर करते है जबकि दिन में उनके लिए छूपना ज्यादा बेहतर रहता हैखासतौर पर माओवादी गुरिल्ला पद्धति से युद्द करते है,जिसमे छूपकर तथा घात लगाकर हमला किया जाता है कोबरा बटालियन भी इसी पद्धति पर काम करना पसंद करती हैबदलते दौर में आधुनिक संचार के साधनों के आने से सुरक्षा बल अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सम्पर्क में रह पाना काफी हद तक संभव हुआ है लेकिन कुछ  सालों पहले हालात ऐसे नहीं थे। कुछ वर्षों पहले एक बार घने वन में प्रवेश करने के बाद सभी से सम्पर्क टूट जाते थे


माओवादी एम्बुश लगाकर सुरक्षा बलों को घेर लेते है और इसके बाद  चारों और से हमला करते है,जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सकेइस दौरान नक्सली बेहद घातक हथियारों का इस्तेमाल करते है और सुरक्षा बलों के लिए उनका सामना करना  बेहद मुश्किल होता हैखासकर बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर लड़ना नक्सली इलाकों में मुश्किल होता हैजम्मू कश्मीर जैसे इलाकों में आंतरिक शांति के लिए तुरत फुरत कार्रवाई करनी होती है जबकि नक्सली इलाकों में कब इसकी जरूरत पड़ेगी,यह भी पता नहीं होताबुलेट प्रूफ जैकेट का वजन करीब 4 किलो होता है और कड़े मौसम से इसे पहनकर कर रखना मुश्किल हो जाता है खासकर तब जबकि सुरक्षाबलों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। नक्सली इलाकों में आपरेशन शुरू होने का कोई निश्चित समय भी नहीं होता अत: सुरक्षा बल बिना बुलेट प्रूफ जैकेट के ही लड़ते है और इसीलिए हताहतों की संख्या बढ़ जाती है


छत्तीसगढ़ को नक्सल हमलों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है और यहां पर काम करने के दौरान सुरक्षाबलों के अनुभव बेहद भयावह होते है यहां के कयी इलाकों में इतनी गरीबी है कि महज दस रूपये देकर बच्चों से भी नक्सली लैंड माईन के धमाके करवा देते हैसीआरपीएफ के अधिकारी  कंधे पर बैच  लगाकर ऑपरेशन नहीं करते क्योंकि ऐसे में नक्सलियों के लिए वे पहला निशाना बन सकते है नक्सली हमलों में यह भी देखा गया है कि इसमें महिलाओं की भी बड़ी भूमिका होती हैवहीं ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों में महिलाओं का होना ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता हैनक्सली महिलाओं को लेकर सुरक्षाबलों के सामने कठिन चुनौती होती हैमध्य प्रदेश,छतीसगढ़ और महाराष्ट्र से लगे बालाघाट और आसपास कई महिला नक्सली काम कर रही है। नक्सलियों की पहचान दलम से होती है और बालाघाट के इलाके में इनका संगठन एमएमसी के नाम से जाना जाता है एम  का अर्थ मध्यप्रदेश,एम से महाराष्ट्र और सी से छतीसगढ़ होता है अभी बालाघाट इलाके में मलाजखंड दलम, टांडा दलम और दर्रे कसा दलम कार्य करते हैहर दलम में महिलाएं होती है,इन्हें सामाजिक न्याय के नाम पर इतना भ्रमित किया जाता है कि वे शोषण को भी समूह के प्रति सेवा का अनिवार्य हिस्सा समझने लगती है ऐसे में सुरक्षाबलों के लिए सावधानी रखने के साथ ही मानवीय पक्ष का पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है और अक्सर यह जानलेवा भी होता है


माओवादी प्रभाव के लिए कुख्यात रेड कॉरिडोर भौगोलिक जटिलताओं का क्षेत्र है। नेपाल से शुरू होकर भारत के कई राज्यों के सीमांत क्षेत्रों से गुजरने वाला यह इलाका गरीबी और पिछड़ेपन से अभिशिप्त है। इसमें से अधिकांश इलाकों में घने जंगल है,जहां माओवादी छूपे होते है और नक्सल विरोधी अभियानों से जुड़े सुरक्षाबलों की समस्या यहीं से गहरा जाती है। आंध्रप्रदेश में ग्रे-हाउंड्स की सफलता से उत्साहित केंद्र सरकार ने 2008 में स्पेशल एक्शन फ़ोर्स की स्थापना की जिसे कोबरा बटालियन नाम दिया गया। इसके लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जांबाज़ जवानों को तरजीह दी गई। कड़े परीक्षण के बाद 150 जवानों का चयन किया गया और इन्हें बाद भी कठिन हालातों में रहने का प्रशिक्षण दिया गया। शुरूआती दौर में इनकी उम्र 35 साल से कम हो यह विशेष रूप से ध्यान रखा गया। इसके पीछे यह कारण बताया गया की जंगल की कठिन परिस्थितियों में ज्यादा  ऊर्जा से भरपूर युवा ही बेहतर काम कर सकते है


लेकिन अब हालात भी बदले है और सुरक्षा की चुनौतियां ज्यादा बढ़ गई है। इस समय नक्सली विरोधी ऑपरेशन में उन सभी को भाग लेना होता है जो बटालियन के सदस्य हो। ऑपरेशन के लंबा खींचने के दौरान 40 साल या इससे ज्यादा के जवान युवाओं के मुकाबले जल्दी  थक  जाते है और माओवादी अक्सर लौटते हुए जवानों को ही निशाना बनाते है। बहरहाल नक्सली इलाकों में काम करने वाले अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस को सेना की तरह सेवा और सामरिक सुविधाओं को देने की जरूरत है,जिससे न केवल इन जवानों का मनोबल ऊँचा बना रहे बल्कि वे माओवाद पर नकेल कसने के लिए और बेहतर तथा कारगर उपाय भी कर सके।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

माओवादियों से निपटने की नीति,maovad india

 

जनसत्ता                                                                                                      

                                                                         


छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर के जंगलों में माओवादी हमले में सुरक्षाबलों के 22 जवानों के मारे जाने से इन क्षेत्रों में माओवाद के प्रभाव के कमजोर पड़ने के सरकारी दावों की सच्चाई भयावह रूप में सामने आ गई है,वहीं आंतरिक सुरक्षा के लिए इस बड़ी समस्या से निपटने की नीति भी सवालों में है। दरअसल नेपाल से शुरू होकर देश के कई राज्यों की भौगोलिक जटिलताओं से गुजरने वाला रास्ता जिसे लाल गलियारा भी कहते है,माओवादियों के लिए कई कारणों से सुरक्षित पनाहगाह है। सीमाई इलाकों की सामाजिक और आर्थिक विषमताएं विद्रोह पनपने का मजबूत आधार बनती है। वहीं जातीय संरचना,पिछड़ापन,गरीबी,अशिक्षा और सामन्तवाद से संतप्त समूहों को लामबंद करके वैधानिक व्यवस्था को चुनौती मिलने की आशंकाएं बढ़ जाती है। नक्सलियों ने बुनियादी रूप से पिछड़े हुए सुदूरवर्ती और भौगोलिक रूप से कटे इलाकों पर अपना प्रभाव कायम किया हुआ है पिछले पांच दशकों से नक्सलवाद की विध्वंसकारी नीतियों को झेल रहा देश अब तक कोई ऐसी बहुआयामी मिश्रित रणनीति अपनाने में नाकाम रहा है जिससे आंतरिक शांति कायम करने में महती सफलता मिल सके।


पिछड़े इलाकों में विकास के लिए माओवादियों से बातचीत की जरूरत है, वे इन इलाकों में विकास को अवरुद्ध कर अपनी समांतर सत्ता स्थापित किए हुए है। इसे  स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन ओर ज्यादा घातक बना देता है। आदिवासी युवाओं के पिछड़ेपन के कारण उनके दिग्भ्रमित होने और उनके द्वारा हिंसक रास्ते को अपनाने की आशंका बढ़ जाती है। माओवाद के इस अभियान को महज जंगल या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। नक्सलवादी होने का आरोप कई बार ऐसे लोग झेलने को मजबूर होते है जो शांतिप्रिय जीवन जीना चाहते है। वे जंगल में रहकर माओवादियों की समांतर सत्ता के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते,अत: उन्हें मजबूरी में नक्सलवादी समूहों का हिस्सा बनने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे लोगों को नक्सलवादियों के चंगुल से आज़ाद करवाने की नीतियां प्रभावी नहीं  हो सकी है। आदिवासी इलाकों में गरीबी और रोजगार का बड़ा संकट रहा है, यह स्थिति माओवादी शक्तियों को मजबूत करने के लिए काफी है।



माओवाद से निपटने की नीतियों में आमतौर पर सुरक्षात्मक कदमों पर फोकस किया जाता है। नक्सलवादी समूहों में स्थानीय लोग शामिल होते है अत: इसके लिए सैन्य विकल्प को ज्यादा तरजीह देना समस्या को बढ़ाता रहा है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स इन कार्रवाइयों में अग्रणी भूमिका में होती है। स्थानीय परिस्थितियों,भाषा,रीति रिवाज और नक्सलियों की पहचान न कर पाने की कमियां न केवल आंतरिक संघर्ष को बढ़ा रही है बल्कि इससे लगातार बड़ी संख्या में सुरक्षाबल हताहत भी हो रहे है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा के दुर्गम जंगलों में एसटीएफ,सीआरपीएफ,डीआरजी औऱ कोबरा बटालियन के लगभग दो हज़ार जवानों के नक्सल विरोधी साझा अभियान में कई ऐसी रणनीतिक खामियां सामने आई है जिसकी कीमत कई जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ीछत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों बीजापुर,नारायणपुर  और दंतेवाड़ा के करीब 4 हजार किलोमीटर क्षेत्र में घने जंगल है।  सुकमा की सरहद आंध्रप्रदेश और ओडिशा से मिलती है,यह माओवादियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन का सुगम  रास्ता है। पुलिस के पास इस बात की जानकारी थी कि कुख्यात और इनामी नक्सली हिड़मा और उसकी पूरी टीम इस इलाके में मौजूद हैपुलिस  ने हिड़मा और उसके साथियों की तलाश में घने जंगलों में व्यापक तलाशी अभियान चलाया लेकिन यहां किसी भी माओवादी का पता नहीं चला। नक्सली इलाके में रास्तों को लेकर सुरक्षाबल बेहद सावधानी का प्रयोग करते है अत: उन्होंने बीजापुर के बासागुड़ा रोड पर वह रास्ता चुना जो बंद माना जाता है और यहीं पर नक्सलियों ने  सुरक्षाबलों पर चारों और से हमला कर दियाइसको लेकर नक्सली पहले ही तैयारी कर चुके थे,उन्होंने आसपास के जंगलों में पोजीशन ले रखी थी और  गांवों को खाली करवा लिया था 


माओवादी एम्बुश का इस्तेमाल कर पूरी बटालियन को चारो और से घेर लेते है और सुकमा में एक बार फिर यही देखा गया। नक्सली इलाकों को लेकर यह साफ है की सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर तैयारी और जानकारी जंगलों की नक्सलियों को होती हैगुप्तचर एजेंसियों के पास माओवादियों के कई नेताओं की कोई जानकारी नहीं हैउन्हें ये भी नहीं पता कि उनके नेता और सदस्य कौन हैं और किन इलाक़ों में रहते हैंऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते है जब जंगल में किसी के पास हथियार हो,अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है। यहां यह तथ्य भी उभर कर आता है कि  विभिन्न एजेंसियों के साझा अभियान को अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं होता। अलग अलग ट्रूप्स की अपनी कमांड होती है और माओवादी हमलें से अप्रत्याशित परिस्थितियां उत्पन्न होने  पर समन्वय भंग होने की आशंका बढ़ जाती है 

देश में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र स्थापित करने और एनआईए  जैसी जाँच एजेंसी का प्रावधान तो किया गया है लेकिन नक्सलवाद पर अभी तक ऐसी कोई रणनीति नहीं बन सकी है।   एसटीएफ, सीआरपीएफ, डीआरजी औऱ कोबरा बटालियन के साझा खोजी अभियान के पहले गुप्तचर एजेंसियां नाकाम रहीजिस गांव में पहले से ही ताले लगे थे और नक्सली घरों के अंदर छुपे थे,इस योजना का पता न  कर पाना सुरक्षाबलों के लिए जानलेवा साबित हुआमार्च से लेकर मई तक खेती का समय नहीं होता,इसीलिए नक्सली केडर की भर्ती का यह मुफीद समय माना जाता है।  ऐसी जानकारियां सामने आई है की नक्सलियों के बड़े नेता कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को अपने अभियान से जोड़ते है।  सुरक्षा एजेंसियां इस दौरान बड़े अभियानों की योजना बनाती है जिससे ज्यादा संख्या में माओवादियों को पकड़ा जा सके लेकिन भयावह  हकीकत यह है कि इन्हीं महीनों में ही नक्सली सुरक्षाबलों को बड़ा नुकसान पहुँचाने में कामयाब हो जाते है।


केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स भारत की सबसे बड़ी आर्म्ड पुलिस फोर्स है। यह पुलिस फोर्स भारत के केन्द्रीय  गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होती है। जंगल में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान नक्सलियों के लिए ओपन टारगेट होते है,जबकि जंगल में रहने वालों की पहचान करने और नक्सलियों को पहचानने के लिए स्थानीय पुलिस बेहतर तरीके से काम कर सकती है। नक्सल विरोधी फ्रंटलाइन फोर्स डीआरजी में अधिकतर स्थानीय युवा भर्ती किए जाते हैं, जिनमें नक्सली संगठनों को छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले युवा होते हैं।  स्थानीय होने का उन्हें फायदा मिलता है वे स्थानीय लोगों में आसानी से घुल मिल सकते है तथा  पूर्व नक्सली होने के चलते उनके तौर-तरीकों की जानकार होते है वे भौगोलिक और सामाजिक जानकारियों का फायदा उठाकर छिपकर निगरानी में सक्षम भी होते है जाहिर है माओवादी इलाकों में डीआरजी जैसे स्थानीय बलों को ज्यादा तरजीह देने और उन पर निर्भरता बढ़ाने की जरूरत है 


1967 में ही ऑल इंडिया कमेटी ऑन कम्यूनिस्ट रिवोल्यूशनरी का गठन किया गया था जिसमें पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,आंध्रा,तमिलनाडु,उत्तरप्रदेश,केरल और जम्मू कश्मीर के नेता शामिल हुए थे और उन्होंने संगठन को मजबूत करने,सशस्त्र संघर्ष चलाने तथा गैर संसदीय मार्ग अपनाने का निर्णय लिया था। इससे यह साफ था कि वंचितों,गरीबों और शोषितों के हितों के नाम पर स्थापित संगठन ने लोकतंत्र की वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए हिंसक और अलोकतांत्रिक रास्ता चुना। लोकतांत्रिक देश में जहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए व्यापक संविधानिक उपाय है,वहां आश्चर्यजनक रूप से माओवाद को मजबूत करने में बड़ी भूमिका स्थानीय राजनीति की भी रही है। यह देखा गया है कि राजनीतिक दल स्थानीय स्तर पर सत्ता हासिल करने के लिए नक्सलियों का समर्थन हासिल करने से भी आमतौर पर परहेज नहीं करते  है और यह समस्या को ज्यादा गंभीर बनाता है। बिहार के लंबे समय तक नक्सलग्रस्त सन्देश प्रखंड का मॉडल पूरे देश में अपनाने की जरूरत है। इस इलाके में नक्सलियों का प्रभाव खत्म करने के लिए पंचायत चुनावों का सहारा लिया गया,जिसमें अधिकतर मुखिया माओवादी चुने गए। लेकिन समय के साथ विकेंद्रीकरण का फायदा जनता को मिला और लोगों का मोह माओवादियों से भंग हो गया।  इस समय यह इलाका माओवाद के प्रभाव से मुक्त है। इससे साफ है कि राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को मजबूत करने और छत्तीसगढ़ समेत देश के माओवाद ग्रस्त अन्य इलाकों में राजनीतिक दलों को अपना केडर बढ़ाने की जरूरत है। जिससे लोकतांत्रिक सहभागिता बढ़ सके और माओवादी शक्तियों की समांतर सत्ता को कमजोर किया जा सके। माओवादी को आदिवासियों के पिछड़ेपन और अशिक्षा का  खूब फायदा  मिलता है। वे रणनीतिक रूप से जंगल के इलाकों में विकास कार्य होने नहीं देना चाहते। सड़क,स्वास्थ्य सेवाओं और स्कूल से दूर गरीब नौनिहालों पर नक्सलवादियों की नजर होती है और उनका कम उम्र से ही ब्रेन वाश कर दिया जाता है। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास के कार्य होने से युवाओं को नक्सलियों से जुड़ने से रोकने में मदद मिल सकती है। विकेन्द्रीकरण और लोकतंत्र सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में समन्वित प्रयासों की जरूरत है।


यूपीए शासनकाल में नक्सलियों पर त्वरित कार्रवाई और उन्हें समाप्त करने के लिए  के लिए  'इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान भी बनाया गया जिसे ख़त्म करके वर्तमान सरकार ने 'सिक्योरिटी रिलेटेड एक्स्पेंडीचर' यानी एसआरई योजना पर  फोकस किया हैइस योजना के तहत नक्सल विरोधी अभियान और नक्सल प्रभावित इलाक़ों के लिए संचार माध्यमों को विकसित करने और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए भत्ते का प्रयोजन किया गया हैयह भत्ता केंद्र सरकार राज्यों को देती हैइसके तहत नक्सल प्रभावित इलाक़ों में तैनात सुरक्षा बलों और थानों के लिए भी धन का आवंटन किया जाता है

दरअसल केंद्र और राज्य में अलग अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने का असर नक्सलवाद से निपटने के तरीकों को भी प्रभावित करता है। छत्तीसगढ़ के माओवादी मांग करते रहे है की बस्तर से सुरक्षाबलों के कैम्प हटायें  जाएं और माओवादी नेताओं को रिहा कर दिया जाएं राज्य सरकार कहती है कि माओवादी पहले हथियार छोड़ें,फिर बातचीत की  पहल करें जबकि राज्य सरकारों को इस सम्बन्ध में दोहरी रणनीति पर काम करने की जरूरत है बातचीत के विकल्प खोलने से नक्सलियों की पहचान करने में सुगमता हो सकती है 


2017 में माओवादी हिंसा से प्रभावित दस राज्यों में एकीकृत कमान के गठन की पहल करते हुए सभी राज्यों की साझा रणनीति बनाकर एक आठ सूत्रीय समाधान तैयार किया गया था। इसके अंतर्गत कुशल नेतृत्व,आक्रामक रणनीति,अभिप्रेरणा  और प्रशिक्षण,कारगर ख़ुफ़िया तंत्र,कार्य योजना के मानक,कारगर प्रौद्योगिकी,प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना और वामपंथी आतंकियों के वित्त पोषण को विफल करने की रणनीति को शामिल करने की जरूरत बताई गई थी। वास्तव में नक्सलवाद से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस,स्थानीय शासन,स्थानीय लोग,स्थानीय परिवेश और स्थानीय राजनीति में समन्वय स्थापित करने और स्थानीय व्यवस्थाओं को बेहतर करने की ज्यादा जरूरत है 

 

brahmadeep alune

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

  सुबह सवेरे            मसला ये नहीं की दर्द कितना है , मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही...