गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

नया बांग्लादेश भारत से कहीं आगे,bangladesh bharat

 पॉलिटिक्स

                         


 90 के दशक में उदारीकरण,वैश्वीकरण और निजीकरण के बड़े बाज़ार में भारत ने स्वयं को बड़े ग्राहक के रूप में प्रस्तुत किया था और दुनिया भर की निगाहें भारत पर केन्द्रित हो गई थी।  यह वह समय था जब भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी से बूरी तरह जूझ रहा था। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर अस्तित्व में आएं बांग्लादेश को दुनिया के सबसे गरीब,पिछड़े और नाकाम देशों में शुमार किया जाता था। इस समय यह देश अपनी स्थापना के 50 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है और जिसने इसकी सफलताओं ने तमाम आशंकाओं को धराशायी करते हुए दुनिया के सफल और खुशहाल देशों की सूची में अपने को शुमार कर कर लिया है। भारत की और सहायता के लिए देखने वाला यह देश अब कई मायनों में भारत से आगे निकल गया है। प्रति व्यक्ति आय,आर्थिक स्थिरता और मानव विकास को लेकर बांग्लादेश कि प्रगति से संयुक्त राष्ट्र भी हैरान है। पिछले साल की शुरुआत मे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने दावा किया था कि अगर भारत अपने यहां अवैध रूप से आने वाले हर व्यक्ति को नागरिकता देता है तो आधा बांग्लादेश खाली हो जाएगा। इसका जवाब देने में बांग्लादेश की सरकार ने देर नहीं की थी। उनका कहना  था कि जब उसकी अर्थव्यवस्था भारत से बेहतर है तो कोई देश छोड़कर भारत को जाना चाहेगा। बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज़मान ख़ान ने कहा था कि बांग्लादेश इतना गरीब नहीं है कि वहां के लोग भारत में जाएंगे। वास्तव में भारत और बांग्लादेश की तुलना की जाएं तो वैश्विक सूचकांक बांग्लादेश की बेहतरी की पुष्टि भी करते है।


भारत से कहीं बेहतर है बांग्लादेश

1971 में बांग्लादेश बनने के बाद वहां नकारात्मक जीडीपी वृद्धि थी जो बाद के सालों में बेहतर होती गई। पिछले दशक में बांग्लादेश के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि देखी गई है। एशियाई विकास बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश ने सबसे तेज़ी से बढ़ती दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्था बनकर भारत को पीछे छोड़ दिया है। 2019 में भारत की अनुमानित विकास दर 5.3 फीसदी थी जबकि बांग्लादेश की अनुमानित विकास दर 8 फीसदी थी। तेज़ी से होते इस विकास ने बांग्लादेश को सबसे कम विकसित देश के तमगे से आज़ाद कर दिया। बांग्लादेश ने अपने मानव विकास सूचकांकों में महत्वपूर्ण सुधार किया है,वह शिशु मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा दर में भारत से आगे है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2020

वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भूख के मामले में भारत 'गंभीर' स्थिति में है।107 देशों पर आधारित इस रिपोर्ट में भारत 94वें स्थान पर है। सूचकांक में भारत का स्थान बांग्लादेश से बहुत पीछे है और वह 75वें स्थान पर है।



ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2020

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2020 में दिखाया गया है कि भारत की महिलाओं से ज्यादा जिंदगी बांग्लादेश की महिलाएं जीती है। भारत इस सूची में 112वें स्थान पर है जबकि बांग्लादेश बेहतर रैंकिंग के साथ 50वें स्थान पर है। भारत की महिलाओं का जीवन काल 68.6 है वहीं इसकी तुलना में बांग्लादेश की महिलाएं 72.5 साल में ज़्यादा लंबा जीवन जीती हैं।

 

शिशु-मातृ मृत्यु दर

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 2019 में पांच साल से कम आयु के जिन बच्चों की मौत हुई। उनमें से आधे बच्चों की मौत नाइजीरिया,भारत, पाकिस्तान,कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और इथियोपिया में हुई। केवल नाइजीरिया और भारत में करीब एक तिहाई बच्चों की मौत हुई। जबकि बांग्लादेश ने मानव विकास के पैमाने पर भी महत्वपूर्ण सुधार देखे हैं। इस संबंध में बच्चों और माताओं का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है। 1974 में बांग्लादेश में पैदा हुए प्रत्येक 1000 शिशुओं में से 153 की मृत्यु हो जाती थी।  2018 में यह संख्या घटकर मात्र 22 रह गई है। कभी गरीबी और कुपोषण के लिए बदनाम बांग्लादेश में 1981 में मातृ मृत्यु दर 4.6  फीसदी थी जो अब महज डेढ़ फीसदी तक सिमट गई है।  


संसद में प्रतिनिधित्व

बांग्लादेश संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भी भारत से बेहतर है।  बांग्लादेश में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 22 प्रतिशत है जबकि भारत में 13 प्रतिशत ही है।

 

भारतीय अर्थव्यवस्था पाँच ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का सपना सच होना मुश्किल

 

दो साल पहले दावोस में वर्ल्ड इकॉनामिक फ़ोरम की बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि  2024-25 तक भारतीय अर्थव्यवस्था पाँच ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगी। इसके पीछे 2018-19 का वह आर्थिक सर्वे का विजन था जिसमें उम्मीद जताई गई थी कि 2020-21 से लेकर 2024-25 तक भारत की अर्थव्यवस्था आठ प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ेगी। यह माना गया था कि जीडीपी में औसत वृद्धि दर 12 प्रतिशत के आसपास होगी जबकि महंगाई की दर चार प्रतिशत रहेगी। अगर भारत इस लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब होता है तो वह जर्मनी को पछाड़कर अमेरिका,चीन और जापान के बाद चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। मौजूदा समय में भारत की अर्थव्यवस्था 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की है। राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान (एनएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2018-19 में जीडीपी 6.1 प्रतिशत से बढ़ रही थी जबकि 2019-20 में यह 4.2 प्रतिशत से बढ़ी। अप्रैल से जून, 2020 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में 23.9 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।



इन आंकड़ों से साफ है कि आने वाले कई वर्षों तक भारत का पाँच ट्रिलियन डॉलर कि अर्थव्यवस्था तक पहुंचना मुश्किल है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ ने अपनी 20-2021 के लिए प्रस्तुत  रिपोर्ट में भारत कि अर्थव्यवस्था को लेकर यह अनुमान लगाया कि यह 1952 से भी बदतर स्थिति में पहुँचने कि ओर है।  जाने माने अर्थशास्त्री सुब्रमण्यम स्वामी के अनुसार चालू वित्त वर्ष में जीडीपी दर 2 प्रतिशत से भी कम रह सकती है। जबकि 1952 में देश की जीडीपी वृद्धि दर 2.6 फीसदी रही थी। कोरोना महामारी के दौरान भारत कि अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान हुआ जबकि बांग्लादेश की जीडीपी 5.24 फ़ीसद की दर से बढ़ी। इस देश के विकास कि दर इतनी तेज है रही है कि सत्तर के दशक की तुलना में आज प्रति व्यक्ति आय 18 गुना बढ़ चुकी है। साल 2020 में यह 2017 डॉलर तक पहुँच गई है। ग़रीबी की दर घटकर 20.5 हो गई है। हाल ही में सेंटर फ़ॉर इकोनॉमिक्स एंड बिज़नेस रिसर्च की आई रिपोर्ट में बांग्लादेश के बारे में ये अनुमान लगाया गया है कि साल 2035 तक वो दुनिया की 25वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।


भारत ने बाज़ार बन कर खुशियां ढूंढता है जबकि बांग्लादेश बड़ा निर्यातक बन गया है....

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 2030 तक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने के लिए तैयार है। इस रिपोर्ट को 'फ्यूचर ऑफ कंजम्पशन इन फास्ट-ग्रोथ कंज्यूमर मार्केट - इंडियानाम दिया गया है। वहीं बांग्लादेश ने अपनी उत्पादन दर बढ़ाने पर ज़ोर दिया। सत्तर के दशक में बांग्लादेश का उत्पादन दर महज साढ़े तीन फीसदी तक था और बांग्लादेश को निर्यात से होने वाली आमदनी केवल 29.7 करोड़ डॉलर थी।  आज, पचास साल बाद, बांग्लादेश निर्यात में अरबों डॉलर कमा रहा है। साल 2020 में बांग्लादेश ने 39.6 अरब डॉलर की कमाई की। पिछले एक दशक में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में हर साल औसतन छह से सात प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। इस दौरान बांग्लादेश,चीन के बाद रेडिमेड कपड़ों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश बना है।

कोरोना महामारी के आने से ठीक पहले 2019 में बांग्लादेश ने क़रीब 34 अरब डॉलर के रेडिमेड कपड़ों का निर्यात किया था। इस सेक्टर में क़रीब 40 लाख लोगों को काम मिला हुआ है,जिनमें से अधिकांश महिलाएं हैं। बांग्लादेश में बनने वाले कपड़ों का निर्यात सालाना 15 से 17 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है। बांग्लादेश की सफलता में रेडिमेड कपड़ा उद्योग की सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है। कपड़ा उद्योग बांग्लादेश के लोगों को सबसे ज़्यादा रोज़गार मुहैया कराता है। कपड़ा उद्योग से बांग्लादेश में तकरीबन 41 लाख लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। कृषि क्षेत्र ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन 1980 के दशक के बाद से उद्योग ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। विशेष रूप से रेडीमेड कपड़ा उद्योग ने रोज़गार सृजन और निर्यात दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बांग्लादेश की निर्यात आय का करीब 83 फ़ीसद इसी सेक्टर से आता है।



प्रोफ़ेसर  अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस का गहरा योगदान

1971 में पाकिस्तान से अलग होकर अस्तित्व में आया बांग्लादेश अव्यवस्थाओं से लम्बें समय तक जूझता रहा। बांग्लादेश के संस्थापक मुजीबुर्रहमान की कट्टरपंथियों ने 1975 में हत्या कर दी थी। इन चुनौतियों के बीच बांग्लादेश के एक प्रोफ़ेसर  अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस  ने अपने देश को बदहाली से उबारने के लिए महिलाओं की दशा सुधारने की ठानी और एक ऐसे बैंक का ख़ाका तैयार किया जिसकी पहुँच हर ज़रूरतमंद के दरवाज़े तक होवर्ष 1976 में प्रोफ़ेसर यूनुस ने चटगाँव विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रयोग के तौर पर कुछ गाँवों में इस योजना को लागू कियाधीरे-धीरे लोगों में जागरुकता बढ़ी और इस बैंक की मदद से स्वयं सहायता समूहों ने स्वरोजगार का रास्ता अपनाना शुरू कियाबैंक की सफलता को देखते हुए बांग्लादेश सरकार से वर्ष 1983 में इसे क़ानूनी तौर पर बैंक के रूप में मान्यता मिल गईअब यह बैंक समूचे बांग्लादेश के गाँव गाँव तक अपनी पहुंच बना चूकी हैलघु वित्त संगठन की तरह काम कर रहे इस बैंक की योजना बुनियादी स्तर पर बेहद सफल रही हैमहिलाओं को स्वरोजगार मिलने से देश की प्रगति ने रफ्तार पकड़ी है और अब यह मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ा रही हैमोहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को “सामाजिक और लोकतांत्रिक विकास में योगदान’के लिए  साल 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार  से सम्मानित किया गया था। प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन भारत और बांग्लादेश में बेहद सम्मानीय माने जाते है,उन्होंने एक कल्याणकारी राज्य का समर्थन करते हुए कहा है कि “राज्य का कार्य लोगों की क्षमताओं में वृद्धि व उनका मानवीय विकास करना है।भारत ने लगातार इस दिशा में काम किया है और बांग्लादेश की सरकार भी कल्याणकारी राज्य के रूप में पहचान बनाने को प्रतिबद्द नजर आती है।



बांग्लादेश धर्म निरपेक्ष मूल्यों को आगे बढ़ा रहा है

दुनिया भर के कई देशों में पिछले एक दशक से दक्षिणपंथी सरकारें अति राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा दे रही है वहीं  बांग्लादेश धर्म निरपेक्ष मूल्यों को लेकर लगातार आगे बढ़ा रहा है।  बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका में स्थित प्रसिद्द ढाकेश्वरी मंदिर को करीब 50 करोड़ टका की कीमत की जमीन देने की घोषणा कर यह संदेश दिया की तरक्की और स्थायित्व के लिए सभी का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। प्रधानमंत्री के अनुसार समानता,सौहाद्रता और परस्पर धार्मिक सद्भाव से ही उनका देश मजबूत हो रहा है और सफलता की ओर बढ़ रहा हैइस्लामिक राष्ट्र होने के बाद भी बांग्लादेश में हिन्दूओं का भरोसा जीतने के लगातार सरकार के प्रयास जारी है और मौजूदा सरकार ने इस बार देशभर में 30 हजार से ज्यादा दुर्गा पंडालों में पूजा उत्सव के शांति प्रिय आयोजनों को सुनिश्चित कर यह संदेश देने की कोशिश भी की है कि धर्म किसी का भी व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन त्योहार का संबंध सबसे होता है



 

भारतीय उपमहाद्वीप में बहुसंस्कृतिवाद मजबूत रहा है और बांग्लादेश ने इसे ही अपनी ताकत बनाकर अपनी नीतियों में लागू करने का प्रयास किया है। दक्षिण एशिया के बाक़ी देशों को बांग्लादेश के समावेशी विकास और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बढ़ावा देने कि नीतियों को अपनाने की जरूरत है।

शनिवार, 27 मार्च 2021

दांव पर तमिलों का भविष्य

 

राष्ट्रीय सहारा


                            

यह ऐतिहासिक मान्यता रही है कि दक्षिण भारत के तमिलों ने सिंहलियों को पराजित किया था,इसीलिए सिंहली तमिलों को लेकर आशंका ग्रस्त रहे है और उनकी यह नीति भारत के संदर्भ में सदैव नजर आती है  श्रीलंका में करीब 20 लाख तमिल बसते है,जो कई वर्षों से सामाजिक,धार्मिक और आर्थिक  उत्पीड़न सहने को मजबूर है। तमिल बराबरी पाने के संविधानिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत है लेकिन भारत की कोई भी पहल श्रीलंका में अब तक वह 13 वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू करवाने में सफल नहीं हो सकी है  जिससे तमिलों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए कई तरह के अधिकार मिलने का मार्ग प्रशस्त हो सकता हैभारत के सामने बड़ी चुनौती यह रही है कि वह श्रीलंका की सरकार से उसे लागू करवाएं। इसके विपरीत श्रीलंका ने अपनी राजनीतिक व्यवस्था में सिंहली राष्ट्रवाद की स्थापना कर और भारत विरोधी वैदेशिक ताकतों से संबंध मजबूत करके भारत पर दबाव बढ़ाने की लगातार कोशिश की है जिससे वह तमिलों को लेकर अपने पड़ोसी देश से सौदेबाज़ी कर सकेफ़िलहाल श्रीलंका अपनी इस नीति में सफल होता दिखाई दे रहा है 


दरअसल पिछले महीने भारत यात्रा पर आएं श्रीलंका के विदेश सचिव एडमिरल जयनाथ कोलंबेज ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत का सक्रिय समर्थन मांगते हुए कहा था की भारत उसे मुश्किल वक़्त में छोड़ नहीं सकता  अब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका पर तमिलों के व्यापक नरसंहार के आरोप का  प्रस्ताव पास हुआ तो वोटिंग के दौरान चीन और पाकिस्तान ने प्रस्ताव के विरोध में वोट किया  जबकि भारत ने वोटिंग से दूरी बनाए रखते हुए ग़ैर हाज़िर रहने का फैसला लिया  यह श्रीलंका की राजनयिक विजय रही क्योंकि तमिलों का सम्बन्ध सीधे भारत से है और भारत की इस पर ख़ामोशी उसके नियंत्रण और संतुलन की नीति दर्शाती है हालांकि इसका कोई भी दीर्घकालीन लाभ भारत को मिलता दिखाई नहीं पड़ रहा



श्रीलंका में प्रवासी भारतीयों की समस्या एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा रही है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में भारत के तमिलनाडू राज्य से गये तमिलों की तादाद अब श्रीलंका में लाखों में है लेकिन मानवधिकारों को लेकर उनकी स्थिति बेहद खराब है। श्रीलंका के जाफना,बट्टिकलोवा और त्रिंकोमाली क्षेत्र में लाखों तमिल रहते है जिनका संबंध दक्षिण भारत से है। श्रीलंका के सिंहली नेताओं द्वारा तमिलों के प्रति घृणित नीतियों को बढ़ावा देने से तमिलों का व्यापक उत्पीड़न बढ़ा और इससे इस देश में करीब तीन दशकों तक गृहयुद्ध जैसे हालात रहे। 2009 में श्रीलंका से तमिल  पृथकतावादी संगठन लिट्टे के खात्मे के साथ यह तनाव समाप्त हुआ,जिसमें  हजारों लोगों की जाने गई। इस दौरान श्रीलंका की सेना पर तमिलों के व्यापक जनसंहार के आरोप लगे। वैश्विक दबाव के बाद श्रीलंका ने सिंहलियों और तमिलों में सामंजस्य और एकता स्थापित करने की बात कही लेकिन हालात जस के तस बने हुए है। 



इस समय श्रीलंका की सत्ता में राजपक्षे बंधुओं का प्रभाव है। श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे बहुसंख्यक सिंहली जनता के नायक बन माने जाते है। उनका संबंध परम्परावादी दल श्रीलंका पोदुजन पेरामुना से है जो आमतौर पर बहुसंख्यक सिंहलियों के हितों के प्रति उदार और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के लिए अपेक्षाकृत कठोर माना जाता है। गोटाभाया राजपक्षे,प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के भाई होने के साथ ही देश के रक्षामंत्री रहे है। इनके कार्यकाल और आक्रामक नीतियों से तमिल पृथकतावादी संगठन एलटीटीई का खात्मा हुआ था और इसीलिए वे देश की बाहुल्य सिंहली जनता की पहली पसंद बनकर उभरे है। 


गोटाभाया राजपक्षे की नीतियां तमिल और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के प्रति घृणा को बढ़ावा देने वाली है। करीब एक दशक पहले श्रीलंका से तमिल  पृथकतावादी संगठन लिट्टे के खात्मे के बाद हजारों तमिलों को श्रीलंका की सेना ने बंदी बनाया था और यह विश्वास भी दिलाया था की उन्हें वापस उनके घर लौटने दिया जायेगा।  लेकिन इतने वर्षों बाद भी सैंकड़ों तमिल परिवार हर दिन अपने प्रियजनों के घर लौटने की बांट जोह रहे है  और उनके लौट आने की कोई उम्मीद दूर दूर तक नजर नहीं आती।  इन तमिलों का सम्बन्ध भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडू से है।  इसीलिए भारत सरकार की भूमिका इस संबंध में बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक हो सकती है।  भारत श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति को लेकर सतर्क रहता है और उसकी यह दुविधा वैदेशिक नीति में  साफ नजर आती है। 



भारत के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित श्रीलंका सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। श्रीलंका पूर्वी एशिया व्यापार का बड़ा केंद्र है और ग्रीक,रोमन और अरबी व्यापार करने के लिए इसी मार्ग से गुजरते है। श्रीलंका की भू राजनीतिक स्थिति उसका स्वतंत्र अस्तित्व बनाती है लेकिन भारत से उसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता सामरिक दृष्टि से ज्यादा असरदार साबित होती है। श्रीलंका भारत से  निकटता और निर्भरता से दबाव महसूस करता रहा है और यह भारत के लिए बड़ा संकट है। भारत जहां श्रीलंका की एकता,अखंडता और सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी की भूमिका निभाता रहा है वहीं श्रीलंका की सरकारों का व्यवहार बेहद असामान्य और गैर जिम्मेदार रहा है।


 

श्रीलंका में शांति और स्थिरता के लिए भारत की सैन्य,सामाजिक और आर्थिक मदद के बाद भी तमिल संगठन लिट्टे से निपटने के लिए श्रीलंका ने भारत के प्रतिद्वंदी देश पाकिस्तान से हथियार खरीदें।  पिछले एक दशक में श्रीलंका के ढांचागत विकास में चीन ने बड़ी भूमिका निभाई है और चीन का इस समय श्रीलंका में बड़ा प्रभाव है। 1962 के भारत चीन युद्द के समय श्रीलंका की तटस्थ भूमिका हो या 1971 के भारत पाकिस्तान युद्द में पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों को तेल भरने के लिए अपने हवाई अड्डे देने की हिमाकत,श्रीलंका भारत विरोधी कार्यों को करने से कभी पीछे नहीं हटा है। भारत की सामरिक सुरक्षा को दरकिनार कर श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर दे दियाइस साल भारत ने वैक्सीनमैत्री के तहत श्रीलंका को 50 हज़ार कोरोना वैक्सीन की डोज़ कर भारत श्रीलंका मैत्री को मजबूत क्र्न्बे की कोशिश की। वहीं राजपक्षे सरकार ने भारत के साथ एक ट्रांसशिपमेंट परियोजना के करार को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसका प्रमुख कारण सिंहली प्रभाव में काम करने वाली ट्रैड यूनियनों का विरोध रहा जो भारत के बढ़ते प्रभाव को तमिलों के लिए मुफीद बता रही थी। भारत को इस मसले पर कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहिए था लेकिन ऐसी कोई भी कूटनीतिक कोशिश नहीं देखी गई।


श्रीलंका में भारतीय तमिलों के हितों की रक्षा तथा भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए अग्रगामी और आक्रामक कूटनीति की जरूरत है। संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के विरुद्द रखा गया प्रस्ताव श्रीलंका पर दबाव बढ़ाने के लिए बड़ा मौका था,जिस पर भारत का कड़ा रुख श्रीलंका पर मनौवैज्ञानिक दबाव बढ़ा सकता था। कूटनीति के तीन प्रमुख गुण होते है,अनुनय,समझौता तथा शक्ति की धमकी। भारत श्रीलंका के साथ अनुनय और समझौता सिद्धांत से अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में असफल रहा है,यह समझने की जरूरत है। राजपक्षे बंधु सिंहली हितों,अतिराष्ट्रवाद को बढ़ावा देने तथा चीन और पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध मजबूत करने की नीति पर कायम है। ऐसे में उनसे तमिल और भारतीय हितों के संरक्षण की उम्मीद नहीं की जा सकती।  

बदहाल वेनेजुएला के लोकतांत्रिक सबक,venejuela

 जनसत्ता


            

·         दुनिया में तेल की कीमतों का निर्धारण करने वाला लातिन अमेरिकी देश वेनेजुएला इस समय आर्थिक और राजनीतिक रूप से गहरे संकट में फंस गया है। राजनीतिक सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाएं रखने की कोशिश और अमेरिकी विरोध के बूते वैश्विक जगत में आक्रामक पहचान बनाने की इस देश के नेतृत्व की नीति के दुष्परिणाम यहां के लोगों के लिए जानलेवा हो गए है।  करीब सवा तीन करोड़ की आबादी वाले इस देश के पास अपार खनिज संसाधन है लेकिन इसके बाद भी लगभग 7 लाख लोग ऐसे हैं जिनके पास दो वक्त का खाना खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। 


यूनाइटेड नेशन फूड प्रोग्राम एजेंसी के अनुसार वेनेजुएला के हर तीन में से एक नागरिक के पास खाने के लिए भोजन नहीं है। मुद्रा इतनी कमजोर स्थिति में है की वहां के 10 लाख बोलिवर के नोट की भारत में कीमत महज 36 रुपये के बराबर है। दुनिया के कच्चे तेल के सबसे बड़े केंद्र समझे जाने वाले इस देश में महंगाई बेतहाशा बढ़ गई है। देश के कई इलाके पानी की समस्या से जूझ रहे है,मुद्रा संकट बढ्ने से भोजन मिलना बहुत महंगा हो गया है और लोग भूखे रहने को मजबूर है। सुपर बाज़ार पर सरकारी नियंत्रण स्थापित कर दिया गया है,जहां महंगा और दूषित खाना बेचा जा रहा है,रोजगार छीन गए है और लोग दूसरे देशों में भागने को मजबूर हो रहे है। भ्रष्टाचार चरम पर है,कानून व्यवस्था की स्थिति संकट में है। अपराध बहुत बढ़ गए है और जेलों में खूनी संघर्ष होने लगे है। वेनेजुएला जेलों की दयनीय स्थिति के लिए बदनाम है। यहां की जेलों में आवश्यकता से अधिक कैदी भरे होते हैं और समूचे लातिन अमेरिका में इनकी हालत सर्वाधिक खराब है। इन सबके बीच बड़ा सवाल यह भी है की देश की राजनीतिक अस्थिरता का संकट कैसे खत्म हो,इसको लेकर भी स्थिति अस्पष्ट है।


वेनेजुएला के इस संकट के पीछे विकासशील देशों में संचालित लोकतांत्रिक परम्पराओं की वह मान्यता भी काफी हद तक जिम्मेदार है जहां करिश्माई नेतृत्व को सम्पूर्ण सत्ता सौंपकर आम जनता खुशियां ढूंढती है और राजनीतिक सत्ता पर जनता का यह अतिविश्वास अंतत: आत्मघाती बन जाता है। 1998 में देश के राष्ट्रपति बने ह्यूगो शावेज पर इस लोकतांत्रिक देश का मसीहा बनने की धुन सवार थी। उन्होंने लंबे समय तक देश की सत्ता पर काबिज रहने के लिए लोकलुभावन नीतियों का सहारा लिया। शावेज 1998 से लगातार डेढ़ दशक तक देश के राष्ट्रपति रहे। उनके कार्यकाल में जनता को सुख,शांति,वैभव और आराम की जिंदगी के सपने दिखाकर सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने पर ज़ोर दिया गया। वहीं दूसरी और अन्य संवैधानिक निकायों को कमजोर करके सत्ता पर एकाधिकार कायम करने के लिए जनता को मुफ्त में सुविधाएं दी गई और ऐसी योजनाओं को बड़े पैमाने पर लागू किया गया। लोगों को आधुनिक जीवन शैली में जीने के लिए पैसे दिए गए। इन सबसे आम जनमानस का ह्यूगो शावेज पर विश्वास बढ़ता गया। जनता का विश्वास जीतकर शावेज ने राजनीतिक सत्ता का इस प्रकार दोहन किया की इससे संवैधानिक संस्थान राष्ट्रपति की कठपुतली बनकर रह गए। वेनेजुएला के लोग बेहद विनम्र और आसान चरित्र के माने जाते है। ये लोग राजनीतिक सिद्धांत की इस सीख को नजर अंदाज कर गए की राजनीतिक प्रभुत्व सदैव आर्थिक प्रभुत्व पर आधारित होता है तथा राजनीतिक करिश्माई सत्ता को संप्रभु बना देना राष्ट्र के भावी भविष्य को संकट में डाल सकता है। शावेज पर लोगों का भरोसा इतना बढ़ गया था की कार्यपालिका और न्यायपालिका के सारे अधिकारों को राष्ट्रपति के अधीन कर लिया गया। शावेज की लोकप्रियता के आगे विपक्ष नाकाम रहा  और इसका असरकारक विरोध भी न हो सका। 



आमतौर पर लोकतंत्र में करिश्माई सत्ता लोकप्रिय होती है किंतु यह स्थिति आदर्श नहीं मानी जाती। मजबूत लोकतंत्र के लिए शासन व्यवस्था के सभी निकायों का मजबूत होना जरूरी होता है तथा मजबूत विपक्ष की जरूरत बनी रहती है। जबकि    करिश्माई सत्ता के बारे में यह विश्वास किया जाता है की कोई एक दल लोकतंत्र पर हावी हो जाता है और वह प्रतिस्पर्धी दलों को उभरने नहीं देता। यह दल करिश्माई नेतृत्व के बल पर लोगों के दिलों में जगह बना लेता है। इसके बाद वह देश को आधुनिकीकरण और विकास की दिशा में ले जाने का दावा करता है और इस तरह अपनी सत्ता की वैधता का आधार ढूंढ लेता है। वेनेजुएला में यही सब देखा गया और अब तेल की दुनिया का अग्रणी यह देश राजनीतिक अस्थिरता और बदहाली से बूरी तरह जूझ रहा है।


2013 में शावेज नहीं रहे और इसके बाद उनके सहयोगी निकोलस मादुरो देश के नए राष्ट्रपति बने। लेकिन उनके लिए चुनौतियाँ कुछ अलग प्रकार की थी। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई और इसका गंभीर असर पहले से ही संकट से जूझ रही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पर पड़ा।  निकोलस मादुरो इस समय अमेरिका से सम्बन्धों को बेहतर करके अपने देश की अर्थव्यवस्था को उबार सकते थे लेकिन उन्होंने शावेज की नीतियों को ही अपनाया और अमेरिकी विरोध जारी रखा। अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए मादुरो की नजर रूस और चीन पर टिकी हुई थी।  यह दोनों देश लातिन अमेरिका में अपना कूटनीतिक और सामरिक महत्व बनायें रखने के लिए वेनेजुएला को मदद देने आगे भी आए। इन सबके बाद भी 2015 में वेनेजुएला में महंगाई दर 180 फीसदी तक बढ़ गई थी। इस समय भी मादुरो ने कोई सबक न लेते हुए अर्थव्यवस्था के लिए बेहद असंतुलनकारी कदम उठाएं2016 में नोटबंदी की घोषणा करके उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया। इससे आम जनजीवन बहुत प्रभावित हुआ और देश की अर्थ और आंतरिक व्यवस्था चरमरा गई।

2019 में देश के सामने राजनीतिक संकट और ज्यादा बढ़ गया। इस समय यहां राष्ट्रपति चुनाव के जो नतीजे आए थे,उसमें सत्ताधारी निकोलस मादुरो चुनाव जीत गए,लेकिन उन पर वोटों में गड़बड़ी करने का आरोप लगा। चुनाव में मादुरो के सामने खुआन गोइदो थे। निकोलस मादुरो को साम्यवादी देशों रूस और चीन का समर्थन हासिल है। जबकि खुआन गोइदो को अमेरिका,ब्रिटेन समेत यूरोपियन यूनियन का समर्थन हासिल है। इस समय मादुरों और गोइदो दोनों देश का राष्ट्रपति होने का दावा करते है। इस प्रकार वेनेजुएला का राष्ट्रपति इस समय कौन है,इसे लेकर ही कोई भी स्पष्ट स्थिति नहीं है। 


निकोलस मादुरो ने शावेज की नीतियों पर चलकर उनके देश को पूंजीवाद और साम्यवाद के द्वंद का केंद्र बना दिया है।  चीन की कंपनियों का जाल पूरे देश में फैला हुआ है और उसने वेनेजुएला को कर्ज के जाल में उलझा लिया है। हालांकि चीन से वेनेजुएला के मजबूत संबंध शावेज के दौर से ही थे। शावेज अपने देश की आर्थिक संपन्नता का उपयोग लोकतन्त्र को मजबूत करने के लिए कर सकते थे। लेकिन उन्होंने अपने देश को साम्यवाद का मजबूत स्तंभ बनाना ज्यादा जरूरी समझा। चीन और रूस जैसे साम्यवादी देशों की शह पर उन्होंने अमेरिकी कंपनियों एक्सॉन एवं कोनोको फिलिप्स को वेनेजुएला से अलविदा कहने को मजबूर कर दिया था


वेनेजुएला के राजनीतिक नेतृत्व ने देश में पर्यटन के क्षेत्र में उभरने की अपार संभावनाओं पर कभी ध्यान नहीं दिया। वेनेज़ुएला पश्चिम में कोलम्बिया,पूर्व में गुयाना और दक्षिण में ब्राजील से घिरा हुआ है। कैरिबियाई द्वीप जैसे त्रिनिदाद और टोबैगोग्रेनाडाकुराकाओअरुबा और लीवर्ड एंटील्स, वेनेज़ुएला तट के पास स्थित हैं। ऐसे में दुनिया का बेहतरीन पर्यटन केंद्र बनने की इस देश में अपार संभावनाएं है। लेकिन इस देश के नेतृत्व ने अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर ही केन्द्रित रखा। पेट्रोलियम और लोह अयस्क यहां की उर्वरा जमीन से इतना निकलता है कि  यह देश कच्चे तेल का सबसे बड़ा निर्यातक माना जाता है तेल की बढ़ती कीमतों से चमकने वाला यह देश तेल की कीमतें घटते ही हांफने लगा। शावेज ने अल्पकालिक राजनीतिक हितों के लिए कोई ऐसी दीर्घकालीन नीति नहीं बनाई जिससे देश का आर्थिक ढांचा अस्त व्यस्त होने से बच सके इसके साथ ही शावेज ने अपनी दानशीलता से लोगों को पंगु बना दिया था और वे मुफ्तखोर  होकर सरकार पर निर्भर हो गए थे इन सबसे शावेज सत्ता में तो बने रहे लेकिन देश आर्थिक रूप से गहरे संकट में फंसता चला गया इस समय  वेनेजुएला की सरकार हजार मूल्य के नोटों से आगे बढ़कर लाखों की मुद्रा वाले नोट छाप रही है। सरकार देश के आर्थिक संकट का समाधान इस प्रकार ढूंढ रही है।  उसका मानना है की आम लोग बड़ी संख्या में नकदी को लेकर बाज़ार जाने से बचेंगे। आर्थिक संकट के साथ राजनीतिक विरोध बदस्तूर जारी है। राष्ट्रपति मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के लिए ख़्वान ग्वाइदो देशभर में चरणबद्ध आंदोलन चला रहे हैहड़तालों और विरोध प्रदर्शनों से जन जीवन अस्त व्यस्त है


वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो साम्यवादी विचारधारा को बनाएं रखने के लिए कृत संकल्पित नजर आ रहे है और यह स्थिति इस देश को अस्थिरता की और ही ले जा रही है। वहीं अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देश ख़्वान ग्वाइदो को मजबूत करके इस तेल से समृद्द देश में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते है। जर्मन वैज्ञानिक कार्ल मैन्हाइम की एक किताब है आइडियोलॉजी एंड यूटोपिया। मैन्हाइम ने इस किताब में विचारधारा और कल्पनालोक में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा है की विचारधारा मिथ्या चेतना को व्यक्त करती है और उसका ध्येय प्रचलित व्यवस्था को बनाएं रखना है दूसरी और कल्पनालोक परिवर्तन की शक्तियों पर बल देता है। इस समय वेनेजुएला यदि अपनी प्रचलित विचारधारा के साथ चला तब उसका आर्थिक और राजनीतिक संकट से उभरना आसान नहीं होगा,वहीं पूंजीवाद का कल्पना लोक नया लेकिन इस बदहाल देश के लिए फिलहाल बेहतर विकल्प नजर आ रहा है।

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