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पुतिन के सामने राजनीतिक चुनौती,putin,navelini rushia

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  जनसत्ता             नोविचोक नर्व एजेंट एक रासायनिक पदार्थ है जिसे रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी अपने दुश्मनों के खिलाफ अचूक हथियार की तरह उपयोग करती रही है । इससे बचना नामुमकिन है लेकिन ब्लॉगर एलेक्सी   नवेलनी न केवल इस जहर से बच निकलने में कामयाब रहे बल्कि उन्होंने रूस के सर्वसत्तावादी पुतिन की राजनीतिक सत्ता को हिला कर रख दिया है । नवेलनी को कुछ महीने पहले रासायनिक जहर देकर मारने की आशंका के बीच जर्मनी इलाज करवाने जाना पड़ा था और इसके बाद वहां उनके इस दावे की पुष्टि भी हुई थी ।   अब नवेलनी जैसे ही इलाज करवाकर अपने देश वापस लौटे तो रूस में उन्हें हिरासत में ले लिया गया ।   लेकिन इससे पुतिन विरोधी प्रदर्शनों की बाढ़ आ गई है ।   देश के कई शहरों और कस्बों में जिस प्रकार नवेलनी के पक्ष में लोग लामबंद हो रहे है वह अभूतपूर्व है और पुतिन की चिंता बढ़ती जा रही है ।    दरअसल समतामूलक वर्गविहीन समाज उदार,खुलापन और स्वतन्त्रता का पक्षधर होता है । 1917 में हुई रूस की क्रांति निरंकुश,एकतंत्री,स्वेच्छाचारी जारशाही की बंदिशों से आज़ाद होने के लिए ही हुई थी । जिसके बाद रूस में कुलीन जमींदारों,साम

धर्म,राजनीति और अर्थशास्त्र से आशंकित बापू का भारत,religion,politics,gandhi

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  हम समवेत                                    यदि हम धर्म,राजनीति और अर्थशास्त्र से “मैं और मेरा” निकाल सकें तो हम शीघ्र ही स्वतंत्र हो जायेंगे और पृथ्वी पर स्वर्ग उतार सकेंगे , महात्मा गांधी के ये शब्द सदा प्रासंगिक नजर आते है । बापू की विचारधारा ही सर्वसमावेशी थी,इसलिए उनकी आस्था और मान्यताएं कभी नहीं डिगी । अब किसान आंदोलन को ही लीजिये,किसानों की समस्याओं में “मैं और मेरा” अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है,यह अर्थशास्त्र पूंजीपतियों से भी जुड़ता है इसलिए किसानों की आशंकाएं निर्मूल भी नहीं है । किसानों के साथ ही अन्य हित समूह भी अपने आर्थिक फायदों के लिए “मैं और मेरा”   का उद्देश्य पूरा करने के लिए कृत संकल्पित नजर आ रहे है। शीर्ष सत्ताधारियों की “मैं और मेरा” की नीति उनकी राजनीतिक सत्ता के लिए संजीवनी होती है,सत्ता साधन सम्पन्न भी होती है अत: उसके लिए अपना लक्ष्य पाना अन्यों की अपेक्षा आसान होता है । रही सही कसर धर्म पूरी कर देता है जिसे राजनीतिक भ्रमजाल में उलझाकर इतना उद्देलित कर दिया जाता है की उसका प्रतीकात्मक असर लाल किले से होकर किसान आंदोलन जैसे न जाने कितने जन आंदोल

राष्ट्र को वैसा ही रहने दीजिये,जैसा वह है। gandhi-bhart

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    प्रजातंत्र                                                                 खादी के तिरंगे झंडे को स्वयं महात्मा गांधी ने चुना था ।   केसरिया , हरे और सफ़ेद रंग के बीच में चरखा रखा हुआ था जो भारत की आत्मनिर्भरता और अहिंसा का प्रतीक था ।   कई दशकों तक जन आंदोलनों में यह भारत की अस्मिता और आज़ादी का प्रतीक बना रहा ।   लेकिन आज़ादी के समय कुछ लोगों के द्वारा चरखे को गांधी का खिलौना कहकर इसे हटाने पर जोर दिया गया और अंततः इसे हटा भी दिया गया ।     इसकी जगह अशोक चक्र को रखा गया , यह चक्र सम्राट अशोक के विजेता सैनिकों का युद्द चिन्ह था ।   इस प्रकार सख्ती तथा साहस के प्रतीक दो शेरों के बीच शक्ति तथा सत्ता का प्रतीक अशोक का धर्म चक्र नये भारत का प्रतीक बन गया ।   गांधी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने साफ कहा , यह डिज़ाइन कितना ही कलात्मक क्यों न हो , मैं कभी ऐसे झंडे को सलामी नहीं दूंगा जिसके पीछे इस प्रकार का संदेश हो ।   लेकिन इन घटनाओं