बुधवार, 23 दिसंबर 2020

मोदी ने बेहतर बनाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की छवि,AMU MODI

 

दबंग दुनिया


  

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जब प्रवेश करते है तो इसके द्वार पर लिखी यह पंक्तियां आपका स्वागत करती है,इल्म हासिल कीजिए,माँ की गोद से मौत तक। इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय ने भारत के शिक्षित भविष्य की बुनियाद उस दौर में रखी थी जब गुलामी की जिल्लत युवाओं में सिहरन और निराशा पैदा कर रही थी। हाल ही में इस विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री ने अपने दिलचस्प भाषण में उस दौर को याद भी किया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की उपयोगिता और महत्व की सराहना भी की। दुनिया भर के इस्लामिक देशों से भारत के कूटनीतिक और राजनीतिक संबंधों को बेहतर करने में भी इस संस्थान की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रधानमंत्री मोदी इसका महत्व जानते है और उन्होंने इस विश्वविद्यालय की खूबियों को शानदार तरीके से सबके सामने रखा। 

 

दरअसल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहचान दुनियाभर में एक उत्कृष्ट मुस्लिम शिक्षा संस्थान के रूप में होती है और दुनियाभर में मुस्लिम विद्वान यहां से शिक्षा अर्जित कर कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैइसे हिंदुस्तान के मुसलमानों की इच्छाओं का केंद्र कहा जाता है लेकिन जो इस शिक्षा संस्थान में पढ़ते है वे यह भली भांति जानते है की इस शिक्षा संस्थान की धर्मनिरपेक्ष और उदारवाद मूल्यों को बढ़ावा देने में अहम भूमिका रही हैइसकी स्थापना का उद्देश्य स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय भावनाओं को मज़बूत आधार एवं स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा देना था इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खां ने जिन संघर्ष और साहस के साथ अलीगढ़ विश्वविद्यालय की नींव रखी वह अनुकरणीय है देश में जब अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ रहे थे तब सैयद अहमद खांने असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द किताब लिखकर मुसलमानों को स्वतंत्रता की भारतीय चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीधर्म की कट्टरपंथी ताकतों पर सीधा प्रहार करते हुए सर सैयद ने लोगों से यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि कुरान के उपदेशों को तर्क के आधार पर समझने का प्रयत्न करें

इस संस्थान में शुरुआत से ही अरबी फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ  संस्कृत  कि शिक्षा की भी व्यवस्था की गईसर सैयद अहमद खां इस विश्वविद्यालय के जरिए मुसलमानों समेत सभी समुदायों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना चाहते थेदेश की सर्वोत्तम सुविधाओं से शुमार इस विश्वविद्यालय में तकरीबन 25 फ़ीसदी विद्यार्थी गैर मुसलमान पढ़ते हैयहाँ संस्कृत का विभाग बेहद ख्यात माना जाता हैपूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण की राजनीति, धर्म,कर्म,विज्ञान,गणित,समाज,अर्थ,मेडिकल,इंजीनियरिंग जैसे सैकड़ों विभाग विद्यार्थियों के लिए पूरी गुणवत्ता के साथ उपलब्ध होते हैयहां की सेंट्रल लायब्रेरी दुनिया की अहम लायब्रेरी मानी जाती हैयहाँ पर महाभारत  का फारसी अनुवाद भी है तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता से संबंधित कई पांडुलिपियां भी उपलब्ध है यहां अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता है तो तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र भी सहेज कर रखे गए है

शिक्षा का स्तर भी इतना जबरदस्त की देश के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन,कैफ़ी आजमी,न्यायविद आर.पी.सेठी,मशहूर इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद और इरफ़ान हबीब,भौतिक शास्त्री पियारा सिंह गिल जैसी अनेक नामी गिरामी हस्तियां यहां से निकली हैहॉकी के जादूगर  ध्यानचंद ने कलाइयों से कमाल करना इसी विश्वविद्यालय से सीखा था। खान अब्दुल गफ्फार खान की शिक्षा भी अलीगढ़ मुस्लिम  विश्वविद्यालय में ही हुई थी। उनके देश प्रेम के बारे में कहा जाता है कि  वह ऐसे हिन्दुस्तानी थे जिसकी हर साँस में एहले वतन डोलता था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुदाई खिदमतगार और लाल कुर्ती आंदोलन छेड़कर पठानों को लामबंद करने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शिखर नेता रहे।धर्म के नाम पर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान देश बनने का पूरी उम्र उन्होंने खूब विरोध किया। लोग इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम इच्छा का केंद्र समझते है लेकिन सर सैयद अहमद खां से जिस नीव पर यह इमारत खड़ी की है उससे प्रतीत होता है कि भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने में इस संस्थान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पिछले कुछ वर्षों से देखने में आया है की अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को राजनीतिक कारणों से उभारने और निशाना बनाने की घटनाएं लगातार सामने आई है। इससे इस विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। कुछ विवादों को आधार बनाकर एक स्वर्णिम शिक्षा संस्थान का गौरव धूल धूसरित करना देश और समाज के लिए नुकसानदायक है। जबकि भारत के बहुसांस्कृतिक समाज और साझा संस्कृति को मजबूत करने में यह संस्थान बहुमूल्य योगदान देता रहा है। कोरोनाकाल में भी एएमयू ने हजारों लोगों का मुफ्त टेस्ट किया, आइसोलेशन वार्ड बनाएं,प्लाज्मा बैंक बनाएं और इन सबके साथ ही पीएम केयर फंड में बड़ी राशि का योगदान भी दिया स्पष्ट है की अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय लगातार अपने कार्यों और दायित्वों से समाज और राष्ट्र की सेवा के प्रति सजग रहकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाता रहा है। 

इस समय दुनिया कट्टरपंथ से बूरी  तरह से जूझ रही है ऐसे में इसके संस्थापक सर सैयद अहमद खां के विचार और उद्देश्य इस समय ज्यादा प्रासंगिक हो जाते है,उन्होंने कट्टरपंथ का जवाब आधुनिक शिक्षा को माना था इस समय भारत की एकता और अखंडता के समक्ष कई चुनौतियां है,इससे राष्ट्र जूझ भी रहा है। अभी भी भारत में सांप्रदायिकता की चुनौतियां किसी भी स्तर से कम नहीं हुई है,ऐसे में हमारी साझी संस्कृति को मजबूत करने की बड़ी जरूरत है  प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस चिंता को साझा  करते हुए कहा भी की पिछली शताब्दी में मतभेदों के नाम पर काफी वक्त खराब हो गया है, लेकिन अब वक्त ना गंवाते हुए नये भारत,आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को पूरा करना है।

बहरहाल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का शताब्दी समारोह कई मायनों में ऐतिहासिक रहा मोदी ने इसके स्वर्णिम इतिहास को सामने लाकर न केवल विश्वविद्यालय की छवि को बेहतर बनाया बल्कि समाज को समन्वय और विकास के संदेश भी दिए  जिसकी इस समय राष्ट्र को बड़ी जरूरत है

 

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

रूस का इस्लामिक चक्रव्यूह russia islam

 राष्ट्रीय सहारा

                     


         

रूस की सामरिक नीतियों में अब इस्लामिक देशों के नेतृत्व की अग्रगामी नीति प्रभावशील है और पुतिन की वैश्विक रणनीति में यह प्रतिबिम्बित भी हो रहा है। यूरोप और एशिया के कई देशों को छूने वाले दुर्गम कॉकेशस में अजरबेजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-काराबाख पर आधिपत्य को लेकर कड़े संघर्ष के बाद रूस के हस्तक्षेप से शांति वार्ता आर्मेनिया के लिए अप्रत्याशित रही,लेकिन उसे जमीन खोकर भी शांति संधि मानने को मजबूर होना पड़ा। रूस के अजरबैजान और आर्मेनिया दोनों ही देशों से बेहतर संबंध है लेकिन आर्मेनिया में उसका सैन्य अड्डा है तथा दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग संधि भी है। इसके बाद भी रूस ने अजरबैजान के हित में कदम उठायें। अजरबैजान के पक्ष में तुर्की,पाकिस्तान और सीरिया के लड़ाके युद्द मैदान में थे, जबकि रूस ने आर्मेनिया के पक्ष में युद्द में भाग नहीं लिया। दरअसल नागोर्नो-काराबाख का परिणाम पुतिन की इस्लामिक देशों से सम्बन्ध मजबूत करने की वह रणनीति है जिससे उन्होंने अमेरिका समेत सभी देशों को चकित कर दिया अज़रबैजान मुस्लिम बाहुल्य होकर ईरान और तुर्की का मित्र देश है,इन दोनों देशों से अमेरिका के संबंध खराब है जबकि रूस इन मुस्लिम देशों का सामरिक साझेदार बन गया है  

अज़रबैजान युद्द में तुर्की की भूमिका किसी से छुपी नहीं है सोवियत संघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए  अज़रबैजान को तुर्की ने 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करते हुए उसे अपना भाई बताया था। जबकि आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं। 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी थी। आर्मेनिया और अजरबैजान  के बीच भीषण युद्द में तुर्की ने अजरबैजान का खुलकर समर्थन किया। यह भी तथ्य सामने आए है कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ने वाले कई लड़ाके भी अजरबैजान कि और से युद्द के मैदान में झोंक दिये गए थे। नागार्नो काराबाख़ के इलाक़े में इस साल 27 सितंबर को लड़ाई भड़की थी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन की मध्यस्थता के बाद नवंबर में ये जंग उस वक़्त ख़त्म हुई जब दोनों देश संघर्ष विराम के लिए तैयार हो गए थे। समझौते के तहत आर्मीनिया के नियंत्रण वाले सात इलाक़े अज़रबैजान की दख़ल में आ गए। इन क्षेत्रों पर पहले आर्मीनिया का क़ब्ज़ा हो गया था। अज़रबैजान में इस लड़ाई को एक बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है जबकि आर्मीनिया में इसे कई लोग आत्मसमर्पण कह रहे हैं।

मास्कों को कैस्पियन,काला,बाल्टिक,श्वेत सागर और लाडोगा झील जैसे पांच सागरों का पत्तन कहा जाता है। इस सागरों से लगते देशों के साथ रूस के संबंध और उसके प्रभाव से रूस के वैश्विक प्रभुत्व का पता चलता है। इन क्षेत्रों के अधिकांश इस्लामिक देशों से रूस के मजबूत सम्बन्ध है। अमेरिका की आँख में चुभने वाला ईरान कैस्पियन सागर के तट पर है, जो रूस का सामरिक मित्र है। अमेरिकी के द्वारा ईरान पर बनाएं जा रहे दबाव को ख़ारिज करते हुए पुतिन ने ईरान के साथ रणनीतिक सम्बन्धों को मजबूती दी है। इसके साथ ही रूस ने ईरान और चीन के साथ हिंद महासागर और ओमान की खाड़ी में चार दिवसीय संयुक्त सैन्य अभ्यास कर अमेरिकी नीतियों को चुनौती देने से भी गुरेज नहीं किया इस समय रूस ईरान को सबसे ज्यादा हथियार देने वाला देश भी है 

मध्य पूर्व में ईरान और इजराइल के सम्बन्ध नाजुक है,ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की एक हमले में मौत को लेकर ईरान में बहुत गुस्सा है और उसने इजराइल को सबक सिखाने की धमकी भी दी है फ़ख़रीज़ादेह की ईरान की राजधानी तेहरान के पास अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी थी। फ़ख़रीज़ादेह कि हत्या बेहद गोपनीय मिशन के तहत सुनियोजित रणनीति से की गई और ऐसे सनसनीखेज काम करने के लिए मोसाद कुख्यात रही है। इसके पहले इस साल की शुरुआत में बगदाद में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के टॉप मिलिटरी कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी मारे गए थे। सुलेमानी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड की कुद्स फोर्स के प्रमुख थे जो दुनिया भर में ईरान विरोधी ताकतों को निशाना बनाती रही हैसुलेमानी को पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को चलाने का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था। ईरान इन हत्याओं को लेकर इजराइल और अमेरिका को जिम्मेदार ठहराता रहा है। अब ईरान के पक्ष में रूस खुलकर सामने आ गया हैरूस के विदेश मंत्री सर्गेई लैवरोव ने कहा है कि रूस ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या के मामले में ईरान के साथ खड़ा है उन्होंने साफ कहा की यह हत्याएं क्षेत्र में अशांति पैदा करने के मकसद से की गई है और यह किसी भी देश के लिए अस्वीकार्य है। रूस  के ईरान के साथ आने से स्पष्ट है की मध्य पूर्व के तनाव का और ज्यादा बढ़ सकता है।

ईरान और तुर्की से मजबूत सम्बन्धों के बूते रूस ने मध्य पूर्व और यूरोप में अमेरिकी प्रभुत्व को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई है। रूस सीरिया की असद सरकार का बड़ा मददगार है और उसके सीरियाई संकट में असद के पक्ष में खड़ा होने के बाद सीरिया कि सरकारी सेना मजबूत हुई है जबकि अमेरिका तथा  नैटो के प्रभाव में कमी आई है। सीरिया कि सरकारी सेना ने रूस के समर्थन से सैन्य अभियान चला रखा है। सीरिया में सुन्नी मुस्लिम कुल जनसंख्या का 74 प्रतिशत हैं जबकि शिया क़रीब 13 प्रतिशत रहते है। अल्पसंख्यक शिया समुदाय से संबंधित असद  का सुन्नी बहुल देश सीरिया में सत्ता में बने रहना सऊदी अरब जैसी इस्लामिक ताकतों को स्वीकार नही है,वहीं रूस के समर्थन से ईरान असद को सत्ता में बनाएँ रखने के लिए हथियारों कि अबाधित आपूर्ति समेत सामरिक मदद करता रहा है। अमेरिका का पारम्परिक मित्र सऊदी अरब सीरिया के विद्रोही संगठनों को सहायता देकर असद की सरकार को सत्ता को उखाड़ फेंक देना चाहता है। लेकिन रुस और ईरान के समर्थन से असद मजबूत बने हुए है।

रूस ने तुर्की से सम्बन्ध मजबूत करके मध्यपूर्व के संघर्ष पर नियन्त्रण और संतुलन का दांव खेला है और यह सफल भी रहा है। अमेरिका ने तुर्की के खिलाफ रूस से खरीदे गए एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को लेकर प्रतिबन्ध लगायें तो यह साफ हो गया की पुतिन ने नैटो और यूरोप में भी सेंध लगाकर यूरोप के मुस्लिम देश तुर्की को अमेरिका के सामने खड़ा कर दिया है। नैटो के प्रभाव को लेकर रूस चौकन्ना रहा है जबकि तुर्की नैटो  का सदस्य देश है।  S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को दुनिया की उन्नत श्रेणी का सिस्टम माना जाता है। यह सिस्टम जमीन से हवा में मार करत है और किसी भी हवाई हमले का पता लगाकर उसे हवा में ही नष्ट करने में सक्षम है। अमेरिका ने तुर्की के इस समझौते को नैटों देशों की सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया है। लेकिन तुर्की ने अमेरिका की किसी भी मांग को मानने से इंकार कर दिया है।

बहरहाल रूस ईरान,तुर्की के साथ पाकिस्तान से भी मजबूत सम्बन्ध बनाने की और अग्रसर है। ये सभी मुस्लिम देश अमेरिका के पारम्परिक और सामरिक मित्र सऊदी अरब की इस्लामिक देशों के नेतृत्व की क्षमता को चुनौती दे रहे है। जाहिर है अमेरिका और रूस की आपसी प्रतिद्वंदिता का असर इस्लामिक देशों को भी प्रभावित करेगा,इस रणनीति में पुतिन ज्यादा ताकतवर बनकर इस्लामिक देशों पर अपना प्रभुत्व कायम करते दिखाई पड़ रहे है।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

भारत की रणनीति से टूट गया पाकिस्तान,pakistan bngladesh,vijay divas

 प्रजातंत्र

बांग्लादेश का उदय

     


                                                                                                                                        

एयर चीफ मार्शल पी.सी.लाल ने अपनी पुस्तक,माई इयर्स विद इंडियन एयर फ़ोर्स में लिखा है,1971 के युद्द का लक्ष्य पूर्व में अपनी पकड़ को मजबूत करना था,जिससे वहां पाकिस्तानी सेना की ताकत को इस हद तक बेअसर करके छावनी बना सके जो की संभावित बांग्लादेश राष्ट्र के लिए हो। दरअसल पाकिस्तान की परम्परागत शत्रुता की चुनौतियों से रूबरू तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के निर्माण में भारत की सामरिक,राजनीतिक,वैदेशिक और कूटनीतिक भूमिका को इतना रणनीतिक तरीके से अंजाम दिया था की भारत की ऐतिहासिक उदार सामरिक नीति की अवधारणा को ही उन्होंने बदल कर रख दिया।

16 दिसम्बर 1971 को बांग्लादेश के विश्व नक्शे पर उभरने के बाद,इस पूरे अभियान का कई देशों के सैन्य संस्थानों में अध्ययन किया जाता है। नेशनल डिफेंस कॉलेज ऑफ़ पाकिस्तान के जंगी दस्तावेज में भारत पाकिस्तान के बीच 1971 के इस समूचे युद्ध पर कुछ इस तरह लिखा गया है,हिंदुस्तानियों ने पूर्वी पाकिस्तान के खिलाफ हमले का खाका तैयार करने और उसे अंजाम देने की योजना को बिलकुल ऐसे पक्के ढंग से बनाया था जैसे किताबों में होता है। यह जंग सोच समझकर की गई तैयारी,बारीकी से बैठाए गए आपसी तालमेल और दिलेरी से अंजाम देने की बेहतरीन मिसाल है।

ब्रिटिश सेनाधिकारी कैनेथ हंट ने कहा,भारतीय सेना ने 14 दिनों में बांग्लादेश के 50 हजार वर्गमील क्षेत्र मे एक लाख से अधिक पाकिस्तानी सेना को परास्त करके विश्व के सैनिक इतिहास में शौर्य और रणकौशल की नई मिसाल कायम की है। इस समय भारतीय सेना की तुलना विश्व की सबसे ऊंची कोटि की सेनाओं से की जा सकती है। अमेरिकी जनरल ने लिखा,भारतीय सेना ने लगता है कि 1967 के अरब इसराइल युद्ध से बहुत सीखा है। इसराइली सेना की भांति भारतीय दस्ते पूर्व बंगाल में तेजी से बड़े और मजबूत छावनियों को घेरकर छोड़ते गए तथा कुछ दिन में ढाका तक पहुंच गए। दुनिया में कोई भी यह आशा नहीं कर सकता था कि भारतीय सेना ऐसी सफाई से अमेरिकी हथियारों से लैस विशाल पाकिस्तानी सेना को इतनी जल्दी परास्त कर देगी। विश्व की कई देशों में भारतीय सेना की तेजी पर आश्चर्य प्रकट किया गया। अमेरिका गुप्तचर संस्था सीआईए के तत्कालीन अध्यक्ष ने स्वीकार किया कि वे भारतीय सेना की तेजी को समझने में असफल रहे।

पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना की 1971 की कार्रवाई को द लाईटनिंग कैंपेन का नाम दिया गया था। जसवंतसिंह अपनी किताब “खतरें में भारत” में लिखते है, भारत के लिए यह एक बेहद जटिल सैन्य अभियान था, जिसके लिए बहुत उच्च स्तर की सैनिक,कूटनीतिक,राजनैतिक,सामाजिक और प्रशासनिक तैयारी की जरूरत थी।

पाकिस्तान के नेता और सेना बंगलाभाषियों को लगातार निशाना बना रहे  थे,पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने स्थानीय नेताओं और धार्मिक चरमपंथियों की मदद से भीषण अत्याचार किये बांग्लादेश सरकार के मुताबिक इस समय लाखों बंगलाभाषी लोगों की हत्या कर दी गई थी। पाकिस्तान की आंतरिक समस्या के कारण भारत की सीमा पर लाखों बंगलाभाषियों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा था। इस समय भारत ने बेहद चतुराई से इस मानवीय समस्या का हल करते हुए मुक्तिवाहिनी का निर्माण किया और बंगलादेश के निर्माण को सुनिश्चित किया। हालांकि जमीनी स्तर पर सैन्य कार्रवाई को अंजाम देना आसान नहीं था। भारत की सेना के लिए यह बेहद कठिन चुनौती थी। जिस इलाके में यह कार्रवाई होनी थी,वह गंगा,पद्मा,मेघना और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों और उनकी सहायक नदियों के बहाव का जलोढ़ मैदानी इलाका था। छोटी छोटी नदियों के घने जाल को पार करते हुए सेना को आगे बढना था। इसके बावजूद सेना का यह लक्ष्य था की इस लड़ाई को तीन सप्ताह में जीत लेना है,अन्यथा संयुक्तराष्ट्र का युद्द विराम को लेकर दबाव का भी डर था और इससे पाकिस्तान को विभाजित करने के लक्ष्य में कामयाबी नहीं मिल पाती।

पूर्वी कमान के सेनापति ले.जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने बांग्लादेश में भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। उनके शब्दों में हमारी विजय के कारण इस प्रकार हैं,दक्ष रणनीति,कुशल सेनापतित्व,जवानों का शौर्य और बांग्लादेश की जनता, इन सबको विजय का श्रेय मिलना चाहिए। लेकिन यदि सबसे अधिक श्रेय किसी को दिया जाए तो वह प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को दिया जाना चाहिए। निर्णय उन्हीं का था। हमें जो काम सौंपा गया उसे हमने पूरा करने का यत्न किया। मुझे खुशी है कि जवानों की मदद तथा वायुसेना और नौसेना के सहयोग से मैं अपनी जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभा सका।

इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को विभाजित कर बांग्लादेश की पटकथा लिखने की तैयारी 1965 के पाकिस्तान युद्द के बाद से ही शुरू कर दी थी। भारत को सीमा पर कई मोर्चों पर एक साथ जूझना पड़ता था और चीन की चुनौती बड़ी समस्या बढ़ा रही थी। 1962 और 1965 के युद्द में गुटनिरपेक्ष देशों की भूमिका से खफा इंदिरा गांधी ने 1971 में सोवियत संघ से मैत्री और रणनीतिक रक्षा संधि कर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च राष्ट्रीय हित के रूप में स्थापित किया। सोवियत संघ से भारत की मैत्री संधि की वैश्विक आलोचना को दरकिनार कर उन्होंने ऐसी इबारत लिखी जिससे पाकिस्तान,चीन और अमेरिका का दबाव धराशाई हो गया। उन्होंने साम्यवादी खेमे में जाने के वैश्विक आरोपों को झेलने का साहस दिखाते हुए हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सोवियत संघ के साथ शांति,मैत्री और सहयोग के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। उस समय यह समझौता भारतीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इस संधि से यह सुनिश्चित किया गया था कि भारत के विरुद्द किसी आक्रमण की अवस्था में यह साम्यवादी देश भारत की सुरक्षा करेगा। इससे उन्होंने अमेरिका की भारत को दबाने की नीतियों को कड़ा प्रतिकार किया। इंदिरा गांधी ने अमेरिकी नीतियों को भी निशाना बनाने से परहेज नहीं किया।  उन्होंने अमेरिका के वियतनाम पर हमलों की कड़ी आलोचना करते हुए भारत में पांच स्थानों पर अमेरिकी सूचना केन्द्रों  को बंद करवा दिया। यहीं नहीं भारत ने उत्तर वियतनाम की राजधानी हनोई में भारतीय कार्यालय के दर्जे को ऊँचा करने की घोषणा कर महाशक्ति अमेरिका के दंभ को तार तार कर दिया।

इस दौर में यह कहा जाने लगा था कि भारतीय विदेश नीति यथार्थवाद की ओर बढ़ रही है। 1971 में सोवियत संघ से मैत्री संधि तथा बंग्लादेश के स्वतंत्र राज्य के रुप में उदय में उसकी निर्णायक भूमिका ने अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर भारत के कद को बढाया। यह सोवियत संघ से मित्रता ही थी कि अमेरिकी नौ सैनिक बेडा हिन्द महासागर से ही लौट गया और चीन को खामोशी से अपने मित्र राष्ट्र पाकिस्तान को विखंडित होते देखना पड़ा। पिछले पचास सालों से रुस भारत का एक प्रमुख सामरिक सहयोगी देश है। भारतीय नौसेना लगभग पूरी तरीके से रुसी उपकरणों तथा रुसी हथियारों से लैस है जबकि भारतीय वायुसेना में भी 70 प्रतिशत हथियार और उपकरण रुस में उत्पादित है। दुनिया के किसी भी दूसरे देश के साथ भारत का इतने विशाल स्तर पर सहयोग नहीं है।  1974 में भारत द्वारा किया गया परमाणु परीक्षण हो या युद्धपोत पण्डुब्बिया,आधुनिकतम टैंक, मिसाइल तकनीकी,स्पेस तकनीकी समेत भारत की रक्षा जरूरतों को पूरी करने में रूस ने तत्परता से अपनी बड़ी भूमिका निभाई।

बांग्लादेश के जन्म के साथ पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत की भी पराजय हुई। उसे अपने जन्म के महज 24 साल बाद 55 हजार वर्गमील का इलाका गंवाना पड़ा। बांग्लादेश बन जाने से भारत की 4712 किमी लंबी सीमा रेखा पर दुश्मन का आमना-सामना सदैव के लिए समाप्त हो गया,जिससे हमारे सैन्य खर्च का बड़ा हिस्सा अन्य विकास के कार्यो में लगाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। भारत को पूर्व और उत्तर से घेरने वाले पाकिस्तान को उत्तर तक सीमित करके भारत ने उस पर सदा के लिए निर्णायक बढ़त हासिल कर ली। पाकिस्तान को एक क्षेत्र से पूरी तरह काट देने से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्धारण में मदद मिली और इसका लाभ भारत को राष्ट्रीय समृद्धि और विकास में लगातार मिल रहा है। जबकि पाकिस्तान का एक बड़ा उपजाऊ और खनिज संसाधनों से परिपूर्ण भाग उसके हाथ से छूट गया जिससे अब वह कंगाल होने की कगार पर पहुंच गया है।


वास्तव में इंदिरा गांधी की पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों पर हो रहे अत्याचारों और वहां के बदलते घटनाक्रम पर पैनी निगाहें थीं,उन्होंने इसे पाकिस्तान को सबक सिखाने का एक बड़ा अवसर माना। दुनिया में हमलावर राष्ट्र की छवि से बचने के लिए वे पाकिस्तान पर पहला हमला नहीं करना चाहती थी, वहीं दूसरी ओर वे बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी को समर्थन देकर ख़ामोशी से भारत की सामरिक तैयारियों को पुख्ता करने में जुटी हुई थी। भारत की इस दोहरी नीति से घबराएं पाकिस्तान ने वही गलती की जिसकी प्रतीक्षा भारत को थी। दिसम्बर 1971 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कलकत्ता के एक विशाल मैदान में भाषण दे रही थी और उसी समय उन्हें खबर मिली की अचानक पाकिस्तानी विमानों ने उत्तर में श्रीनगर से लेकर दक्षिण में उत्तरलार्इ के सीमा के आधे दर्जन हवार्इ अडडों पर एक साथ हमला किया है। हवार्इ हमलों की चेतावनी समस्त उत्तर भारत के नगरों.कस्बों में गूँज उठी।

3 दिसम्बर की चांदनी रात पाकिस्तान के इतिहास की सबसे अंधेरी रात बन गयी। दृढ़ निश्चयी इंदिरा गांधी की मजबूत कूटनीतिक,रणनीतिक और राजनीतिक जुगलबंदी ने पाकिस्तानी शासकों के सभी मंसूबों  पर पानी फेर दिया और एक हजार वर्ष तक भारत से लड़ते रहने का दम भरने वाले पाकिस्तानी 14 दिनों में ही युद्धक्षेत्र से भाग खड़े हुए। इस तथ्य को विश्व के बड़े सेनापतियों ने स्वीकार किया है और भारतीय सेना के रणकौशल की तुलना जर्मन सेना द्वारा पूरे फ्रांस को परास्त करने के अभियान से की है।

जून 1972 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बातचीत के लिए शिमला आए। इस दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ उनकी युवा बेटी बेनजीर भी थी,जो बाद में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री भी बनी। बेनजीर भुट्टो में अपनी जीवनी में इंदिरा गांधी को याद करते हुए लिखा है,“वह बेहद खामोश थी। एक तनाव भरा ठंडा दुराव वहां पसरा हुआ था,जो उनके मुस्कुराने से,जरा सा टूट जाता था। मैं तो बस इंदिरा गांधी का चेहरा पढ़ती रही,जो एकदम बंद किताब जैसा था।”

यकीनन इंदिरा गांधी को पढ़ पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था। भारतीय सीमा पर करोड़ों शरणार्थियों का जमावड़ा,पाकिस्तान की युद्ध करने की मंशा, अमेरिका की पाकिस्तानी परस्त नीति और चीन का गहरा दबाव जैसी परिस्थिति में  बांग्लादेश का जन्म अभूतपूर्व था। इस समूचे घटनाक्रम के दौरान इंदिरा गांधी ने अपनी कूटनीति और दूरदर्शिता से चीन के ब्लैकमेल को रूस की सुरक्षा संधि से खामोश कर दिया,हिंद महासागर में पाक की मदद करने आने वाले अमेरिकी बेड़े को रूसी नौसेना के सामने लाकर बेबस कर दिया। वे यहीं नहीं रूकी पहले पूरी दुनिया से गुहार लगाई कि भारत की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए वह इस शरणार्थी समस्या से उबारे तो दूसरी तरफ अपनी सेना को यह आदेश दिया कि जितनी जल्दी हो पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद करवा लिया जाए जिससे संयुक्त राष्ट्र का कोई व्यवधान पैदा न हो।

राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति भारत शांति से ही नहीं शक्ति से भी कर सकता है। आधुनिक भारत की कूटनीति में शक्ति को साधन बनाकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में दबदबा बनाने का विचार बेहद अलहदा था लेकिन इंदिरा गांधी ने शक्ति को भारत की पहचान बनाते हुए शांति की स्थापित संकल्पना को बदलने में देर नहीं की थी। उनके कार्यकाल से यह प्रतिबिम्बित भी होता है।

1971 में बांग्लादेश के जन्म को भारत की युद्द नीति की दिशा बदलने के लिए याद किया जाता है। भारत ने अग्रगामी और आक्रामक नीति को सही तरीके से अंगीकार कर दक्षिण एशिया का नक्शा ही बदल दिया। उन्होंने पाकिस्तान के गृह युद्द की दशा और दिशा तय करने में बेहद संतुलित और चतुराई पूर्ण रवैया अपनाया।  इस प्रकार पाकिस्तान की सेना उनके बनाए रणनीतिक जाल में बूरी तरह फंस गई। 93 हजार पाकिस्तानी सैनिक भारत के बंदी बन गए और वहां के लेफ्टिनेंट जनरल ए.के.नियाजी ने नतमस्तक होकर भारत और बांग्लादेश फौजों की पूर्वी कमान के  जनरल आफिसर कमांडिंग-इन–चीफ़  जगजीतसिंह अरोड़ा के सामने आत्म समर्पण किया।

बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा,डॉटर ऑफ़ दी ईस्ट में अपने दर्द को इन शब्दों में बयां किया है,“बांग्लादेश का हाथ से निकल जाना एक बहुत बड़ा धक्का था,जो कई कई मायनों में समझा जा सकता है। हमारा संयुक्त धर्म इस्लाम,जिसे हम सोचते थे कि हिंदुस्तान के हजार मील तक फैलेगा,जिसने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को अलग किया और हमें एक बनाकर रखने में नाकामयाब हो गया। हमारा विश्वास कि हम एक देश के रूप में बने रह पाएंगे,टूट गया। पश्चिमी पाकिस्तान के चार सूबों के बीच का जुडाव कमजोर पड़ गया। हमने इतनी नैतिक हताशा कभी नहीं महसूस की थी,जितनी भारत के आगे पाकिस्तान की इस हार से।”

 

मानवाधिकारों पर गांधी की धर्म को चुनौती,manvadhikar,gandhi

 

सुबह सवेरे 

10 दिसम्बर 2020     

                                                                                     

                               

                             

महात्मा गांधी से एक प्रार्थना सभा में यह पूछा गया कि क्या इस्लाम और ईसाई प्रगतिशील धर्म है जबकि हिन्दू धर्म स्थिर या प्रतिगामी। इस पर गांधी ने कहा कि,”नहीं मुझे किसी धर्म में स्पष्ट प्रगति देखने को नहीं मिली,अगर संसार के धर्म प्रगतिशील होते तो आज विश्व जो लड़खड़ा रहा है वह नहीं होता।“ दरअसल धर्म को लेकर क्या दृष्टि होना चाहिए और इसे दिशा कौन दे,इसे लेकर आधुनिक समाज अंतर्द्वंद से घिरा नजर आता है और इस विरोधाभास में राजनीतिक हित मानवीय संकट को व्यापक स्तर तक बढ़ा रहे है। धर्म यदि व्यक्तिगत आस्था तक सीमित है और इसकी सुरक्षा को लेकर व्यक्तिगत चिंताएं व्यक्ति महसूस करता है तो इससे धार्मिक विद्वेष बढ्ने की आशंका बनी रहती है। दुनिया के सामने व्यक्तिगत आस्था से उठा यह मानवीय संकट यूरोप के प्रगतिशील समाज से लेकर भारत,पाकिस्तान,श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे पिछड़े देशों तक दिखाई भी देता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा अंगीकार कर मानव अस्मिता और सम्मान को सुनिश्चित करने का प्रयास किया था,इसके साथ ही वैश्विक समुदाय से यह अपेक्षा भी की गई थी की वह मानव अधिकारों का पालन व्यवस्था की दृष्टि से भी करेंगे। इस घोषणा में समाहित किया गया की जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई  फर्क न रखा जाएगा।”

मानव अधिकारों की गरिमा को लेकर संयुक्त राष्ट्र की अपेक्षाओं के विपरीत समाज,सरकारों और राष्ट्रों में राजनीतिक हितों को लेकर विरोधाभास है,इसके परिणाम दुनिया भर में दिखाई पड़ रहे है। अभिव्यक्ति को लेकर फ्रांसीसी समाज में मत विभिन्नता आई और अंतत: एक धर्मांध नवयुवक द्वारा एक शिक्षक का गला रेत कर हत्या कर दी गई। इसकी प्रतिक्रिया जिस प्रकार से सामने आई वह मानवीय अस्तित्व के लिए संकट पैदा करने वाली है। आरोप था कि टीचर ने अपनी क्लास में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने इस  हत्या को न्यायोचित ठहराते हुए कहा की, मुस्लिमों को गुस्सा करने का और लाखों फ्रांसीसी लोगों को मारने का पूरा हक है। फ्रांस में पैंगबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर छिड़ी बहस के बीच ही नाइस शहर में एक और हमला हुआ। जहां हमलावर ने अल्लाह हू अकबर के नारे लगाते हुए स्थानीय चर्च पर हमला किया, इसमें तीन लोगों की मौत हो गई एक महिला का गला काट कर निर्मम हत्या कर दी गई।

2019 में श्रीलंका में ईस्टर पर एक मुस्लिम अतिवादी संगठन द्वारा भयंकर आतंकवादी हमला हुआ और इसमे सैंकड़ों लोग मारे गए थे। इसकी कड़ी प्रतिक्रिया वहां के मुसलमानों ने झेली।

मस्जिदों पर हमले हुए। मुसलमानों की दुकानों का बहिष्कार किया गया, इस प्रकार मुसलमानों के प्रति घृणा का वातावरण तैयार हो गया। सोशल मीडिया पर उन दुकानों और व्यापारों का नाम शेयर किया गया जिनके मालिक मुसलमान थे। लोगों से यह अपील की गई की वो उनका बॉयकॉट करें। श्रीलंका में 10 फ़ीसदी आबादी मुसलमानों की है। बौद्ध बाहुल्य इस देश में इससे राजनीतिक तनाव भी बढ़ा। एक प्रभावशाली बौद्ध भिक्षु ने एक मुस्लिम सरकारी मंत्री और दो प्रांतीय राज्यपालों को हटाए जाने तक उपवास करने की धमकी दी,इसके बाद सभी मुस्लिम मंत्रियों ने इस्तीफ़ा दिया और आठ अन्य मंत्रियों को भी कैबिनेट से हटा दिया गया।



कुछ चरमपंथियों के हमलों की क़ीमत यहां के उस मुस्लिम समुदाय को  चुकानी पड़ी जो हाशिए पर  होकर दो जून रोटी की चुनौती से रोज जूझता है। यहां के मुसलमानों ने कई स्थानों पर श्रीलंका के प्रति अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए अपनी मस्जिदों को गिरा दिया। विकासशील समाज में देश भक्ति को साबित करने के लिए अपने धार्मिक स्थल को तोड़ने को मजबूर होना शर्मसार करता है।

ब्रिटेन  के डर्बी शहर का  अर्जन देव गुरुद्वारा सेवा भाव को लेकर विख्यात है। इस साल यह गुरुद्वारा जब लॉकडाउन से प्रभावित लोगों के लिए खाना बनाने मे जुटा था,तब इस पर हमला किया गया। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले आम है। लेकिन भारत भी जातीय और धार्मिक विद्वेष से बुरी तरह प्रभावित है। यहां धार्मिक आतंकवाद से ज्यादा एक अलग और कही खतरनाक किस्म का जातीय आतंकवाद है जो मंदिरों में जाने से किसी को रोक देता है और उस पर ईश्वर को अशुद्ध करने का आरोप लगाकर निशाना भी बना देता है,यहां तक की इस कारण कई लोगों को मार भी डाला जाता है। 


 ऐसी घटनाएँ सभ्य समाज की धार्मिक समझ को कलंकित करती रही है। द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह अपेक्षा की गई थी की आधुनिक दुनिया मध्यकालीन धार्मिक द्वंद को पीछे छोड़कर समूची मानव जाति के विकास पर ध्यान देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दुनिया भर में आस्था को अंधविश्वास से तथा धार्मिक हितों को व्यक्तिगत सम्मान से जोड़ने की राजनीतिक विचारधाराएँ बढ़ गई,इसके साथ ही सत्ता प्राप्त करने का इसे साधन भी बना लिया गया। महात्मा गांधी इसे लेकर आशंकित तो थे ही।  

गांधी मानवता की रक्षा और विश्व शांति के ऐसे महान पथ प्रदर्शक है जिनके विचारों और कार्यों में प्रेम,त्याग,सहिष्णुता,शांति,सर्वधर्म समभाव और सहअस्तित्व के असंख्य संदेश है इस समय दुनिया भर में जातीय,धर्म और सभ्यताओं  का द्वंद बढ़ता जा रहा है ऐसे में  गांधी के सार्वभौमिक विचारों पर चलकर आपसी संघर्ष और घृणा को  समाप्त किया जा सकता है असमानता के खिलाफ प्यार से संघर्ष करने और निराश हुए बिना संघर्ष करने की महात्मा गांधी की समूची मानव जाति को दिखाई गई राह से दुनिया के कई देशों में सामाजिक न्याय की स्थापना करने में बड़ी मदद मिलीमहात्मा  गांधी के लिए धर्म पथप्रदर्शक था लेकिन वह कभी भेद का कारण नहीं बना। उनका भजन ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,सार्वभौमिक धार्मिक समभाव को प्रतिबिम्बित करता है। दक्षिण अफ्रीका के फिनिक्स आश्रम में बहुधर्मी प्रार्थना सभाओं का आयोजन कर बापू ने मानवता के लक्ष्यों को समन्वयकारी तरीके से हासिल करने के संदेश दिए।

उनकी धर्म को लेकर स्पष्ट दृष्टि रही जिसमें मानवता का कल्याण समाहित है। महात्मा गांधी का धर्म अहिंसा,शांति,सहिष्णुता और सदाचार से प्रगति को प्राप्त करना चाहता है, उसमें विद्वेष,अशांति,कटुता और हिंसा का विरोध हैधार्मिक विद्वेष और कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव से वैश्विक शांति संकट में है,और ऐसे समय में धर्म के प्रगतिशील होने के दावे पस्त  दिखाई पड़ते है।

गांधी के सहयोगी विनोबा भावे ने कहा था कि गांधी के विचारों में सदैव ऐसा मनुष्य और समाज रहा जहां वह करुणा मूलक,साम्य पर आश्रित स्वतंत्र लोक शक्ति के रूप में वह आगे बढ़े। यदि हम उसके योग्य नहीं बनते तो आज ही नष्ट हो जाने की नौबत है।

हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि,कोई भी मुल्क तभी एक राष्ट्र माना जाएगा जब उसमे दूसरे धर्मों के समावेश करने का गुण आना चाहिएएक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्मों में दखल नहीं देते,अगर देते है तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है

दुनिया को धर्म से ज्यादा गांधी की जरूरत है। अंतत: धर्म का अर्थ सदाचार,शांति,सहिष्णुता और संयम है। गांधी के विचारों में भटकाव नहीं है जबकि धर्म को लेकर भटकाव फैलाने को राजनीतिक बना दिये गए है। बेहतर है गांधी को चुने,गांधी को जाने और गांधी को माने,मानव अस्मिता की भी रक्षा होगी और मानव अस्तित्व पर मँडराते संकट भी दूर होंगे।

 

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

गांधी के बहाने किसान आंदोलन को याद किया जाएँ,mahatma gandhi,kisan,champaran

 हम समवेत

          

https://www.humsamvet.com/opinion-feature/remembering-farmers-movement-through-gandhi-8999                                                    

कभी कभी परिस्थितियां ऐसी बन जाती है और ऐसा लगता है जैसे वर्तमान अतीत से आगे निकलने की होड़ में सब कुछ सरेआम कर देना चाहता है वह जो हमारी पीढ़ियों के न तो जेहन में है और न ही जुबां पर और सब कुछ काल चक्र के धुंधलके में खो चूका हो दरअसल किसान आंदोलन की आहें लोकतांत्रिक भारत में चीखों में बदलने को मजबूर हो तब बरबस ही हमारी निगाहें चंपारण आंदोलन के उस मोहनदास को तलाशने लगती है जो यहीं की किसान पाठशाला से सीखकर महात्मा गांधी बन सके

हिंदुस्तान की तारीख के चंपारण आंदोलन के इन 103 सालों में बहुत कुछ बदला है। अब अंग्रेज नहीं है और इसे यूँ समझिये की हम उपनिवेश भी नहीं है गैर बराबरी को खत्म करने की आशा लिए संविधानिक प्रावधान कसमसाते रहते है अपने अस्तित्व को लेकर इनकी चर्चा चुनावी रैलियों में अक्सर जनता जनार्दन को उद्देलित और उत्साहित करने के लिए होती रहती हैयह इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि भारत में एक व्यक्ति एक मत का सिद्धांत है और अधिकतम वोट पाने की होड़ में जन अस्मिता को अल्प समय के लिए उभारना होता है

भारत में दो समुदाय रहते है एक किसान जो बहुसंख्यक है और दूसरे जो किसान नहीं हैउनकी संख्या बहुत कम है लेकिन सत्ता,शासन,प्रशासन में उन्हीं का दम है,इन्हें पूंजीपति हितों का संवर्धन करने वाला प्रभावी समूह भी कहा जा सकता है



चंपारण में जाने के लिए मोहनदास ने गुजरात से रेल के तीसरे दर्जे में बैठकर  तकरीबन  दौ हजार किलोमीटर का सफर तय किया था चम्पारण में किसान नील की खेती का विरोध करने के लिए जमा थे मोहनदास दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के हितों के लिए इतना संघर्ष कर चुके थे की भारत के लोग भी इस दुबले पतले व्यक्ति से अपरिचित नहीं रहे थेअंग्रेजों के उपनिवेशिक और अमानुषिक शासन में भी आचार्य कृपलानी का यह मन था की वे मोहनदास का स्वागत आरती उतार कर करें और आचार्य ने ऐसा किया भी

नील की खेती नकदी फसल थी और उसे आकर्षक फायदों से जोड़ा भी गया था, अंग्रेज सरकार को मिल रहे मुनाफे ने नये भूमि कानूनों के निर्माण को मजबूर कर दिया जो कि नील की खेती को अधिकतम करने पर केंद्रित थाअंग्रेज सरकार को लगता था की किसान बहुत खुश होंगे जबकि भारत के किसानों को लगता था की इसमें किसानों के कल्याण पर कोई विचार नहीं किया गया था।

मोहनदास के द्वारा भारत में सत्याग्रह का यह पहला प्रयोग था हजारों किसान चम्पारण में जमा थे और उनका मोहनदास पर पूरा भरोसा थाअंग्रेज भी यह सब देख रहे थे और वे जानते थे की किसान अलगाववादी या पृथकतावादी नहीं होतेअत: नाम मात्र के लिए एक दरोगा वहां तैनात कर दिया था। हजारों किसानों से घिरे हुए मोहनदास ने सभा के पास ही उनकी कुर्सी लगा दी थी

इस आंदोलन में मोहनदास ने अपने प्रथम सत्याग्रह आंदोलन का सफल नेतृत्त्व किया अब उनका पहला उदेश्य लोगों को 'सत्याग्रह' के मूल सिद्धातों से परिचय कराना था। सरकार ने मजबूर होकर एक जाँच आयोग नियुक्त किया एवं मोहनदास को भी इसका सदस्य बनाया गया। परिणाम सामने था। कानून बनाकर सभी गलत प्रथाओं को समाप्त कर दिया गया। जमींदारों  के लाभ के लिए नील की खेती करने वाले किसान अब अपने जमीन के मालिक बन गए।  इस प्रकार मोहनदास ने भारत में सत्याग्रह की पहली विजय का शंख फूँका। चम्पारण ही भारत में सत्याग्रह की जन्म स्थली बना। 

उनका सत्याग्रह का उद्देश्य भी यही था की अपने निष्क्रिय प्रतिरोध से विरोधी का  हृदय परिवर्तन किया जा सके,यह प्रयोग उपनिवेशिक काल में भी सफल रहा ब्रिटिश सरकार ने गांधी और किसान नेताओं का मार्गदर्शन स्वीकार किया,इस क्षेत्र के गरीब किसानों के लिए खेती पर अधिक मुआवजा और नियंत्रण प्रदान करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए और अकाल समाप्त होने तक राजस्व वृद्धि और संग्रह रद्द कर दिया। 

भारत में हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था है,किसानों की मेहनत से ही यह देश आबाद है और किसान यदि संतुष्ट और खुशहाल है तो देश के खुशहाल होने की संभावना बढ़ जाती है।  किसानों के लिए कोई कानून बने तो किसानों से बात तो की ही जानी चाहिए। किसानों को विश्वास में लिए बिना कोई कानून बहुमत के बल पर कैसे लागू किया जा सकता है।


कोरोना काल के असहनीय और अकस्मात प्रहार से मजदूर किसान हताश और निराश है इस समय वह अपने हितों को लेकर ज्यादा प्रतिबद्ध नजर आ रहा है,उसे अपना अस्तित्व बनाएं और बचाएं रखने के लिए कोशिश तो करना ही होगीदिल्ली में किसानों का आंदोलन भावावेश में उठाया गया या राजनीतिक षड्यंत्र से ग्रस्त नहीं माना जाना चाहिए  इसमें पंजाब और हरियाणा के किसानों का बहुतायत में होना संयोग नहीं है बल्कि उनकी जागरूकता का प्रमाण है किसान सबसे ज्यादा चिंतित इस बात से है की वे बाज़ार में पूंजीपतियों के एकाधिकार का शिकार न हो जाएँ किसानों का चिंतित होना लाजिमी है देश ने निजीकरण और विकास के नाम पर बीएसएनएल की बलि और उसकी लाश पर जिओ के महल को बनते और बढ़ते देखा है कोरोना काल में जब लोग भूखे मरने को मजबूर हो गये हो, रोजगार का बड़ा संकट हो तब कुछेक नामी पूंजीपतियों की सम्पत्ति में बेतहाशा वृद्धि भी देखी है  यह संयोग नहीं  अंततः शीर्ष सत्ता के प्रयोग से ही तो संभव हुआ है 

चंपारण के किसान औपनिवेशिक कानून के कारण अपनी जमीन पर नील उगाने के लिए मजबूर थे। यह नील उनसे अंग्रेज ले लिया करते थे। इस समय भारत के किसान यह सोचकर आशंकित है की उनकी जमीन पर क्या उत्पादन करें इसके लिए आने वाले समय में कहीं निजी कम्पनियां उन्हें मजबूर न करने लगे और ऐसे में इसका फायदा भी उन कम्पनियों को ज्यादा न मिलने लगे 

चंपारण आंदोलन के 100 साल पूरे होने पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चम्पारण गये थे और उन्होंने  सफाई के लिए सत्याग्रह का आह्वान किया था प्रधानमंत्री के आह्वान पर देश में जनता ने स्वच्छता अभियान खूब चलाये हैं  लेकिन अब जनता के मांगने की बारी है किसान और आम जनता पूंजीपतियों के प्रभाव की सत्ता से सफाई चाहती है  किसान पूंजीपतियों से ही तो आशंकित है और यह आशंका समाजवादी भारत में पहले कभी नहीं देखी गई 

मोहनदास कहा करते थे की,हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता है,हम अपने वर्तमान को स्वयं ही सुधार या बिगाड़ सकते है.उस पर हमारा भविष्य निर्भर है  उन्होंने किसान आंदोलन के सफर को देश के भविष्य से जोड़कर आज़ादी की मंजिल तक पहुँचाने में सफलता पाई थी,इसीलिए वे जन नायक कहलाते है  आखिर जन नायक बनने के लिए स्वहित और राजनीतिक हितों को बलिदान करना होता है  मोहनदास के बहाने ही उनकी इस सीख को याद रखने की जरूरत जो उन्होंने बंगाल में 15 अगस्त 1947 को उनसे मिलने आये नेताओं से कही थी मोहनदास करमचंद गांधी ने उनसे कहा था,विनम्र बनो,सत्ता से सावधान रहो  सत्ता भ्रष्ट करती है याद रखिए,आप  भारत  के गरीब गांवों की सेवा करने के लिए पदासीन हैं।” 

brahmadeep alune

गणतंत्र बनने को बेताब भारत,gantnatra bharat

  मृदुभाषी                             महान दार्शनिक जान स्टुअर्ट मिल ने लगभग 200 साल पहले अपनी आत्मकथा में लिखा था की मुझे अब पक्का यकी...