शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय संकल्प की दरकार rashtriya ekta

 

सुबह सवेरे

              


            http://epaper.subahsavere.news/c/56035144                                                 

जे.ई.वेल्डन कलकत्ता के पूर्व बिशप थे। भारत की आज़ादी के प्रश्न पर 1915 में उन्होने कहा था की,भारत से ब्रिटिश साम्राज्य का अंत एक अकल्पनीय घटना होगी। जैसे ही अंतिम ब्रिटिश सिपाही बंबई या कराची के बंदरगाह से रवाना होगा,हिंदुस्तान परस्पर धार्मिक और नस्लीय समूह के लोगों का अखाड़ा बन जाएगा। इसके साथ ही ग्रेट ब्रिटेन से जिस ठोस रूप में यहां एक शांतिप्रिय और प्रगतिशील सभ्यता की नींव रखी है वह रातों रात खत्म हो जाएगी।”

इसका जवाब 14 अगस्त 1947  की मध्य रात्रि को मिला। दिल्ली में जब आज़ाद भारत का पहली बार झण्डा फहराने का महा आयोजन किया गया,वंदे मातरम और ध्वज प्रस्तुतीकरण का दौर चला,उस रात उसमें बोलने वाले तीन प्रमुख वक्ता थे। सबसे पहले चौधरी ख़ालिक़ज्जमा ने मुसलमानों  की नुमाइंदगी करते  हुए कहा की यहां के अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इस नए आज़ाद मुल्क के प्रति अपनी वफादारी निभाने से पीछे नहीं हटेंगे। इसके बाद देश के महान शिक्षाविद डॉ.राधाकृष्णन का भाषण हुआ और अंत में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा की यह एक ऐसा क्षण है जो इतिहास में बहुत कम ही प्रगट होता है,जब हम पुराने युग से नए युग में प्रवेश करते है। जब एक युग खत्म होता है और जब एक देश की बहुत दिनों से दबाई गई आत्मा अचानक अपनी अभिव्यक्ति पा लेती है।”

आज़ादी के बाद भारत की राष्ट्रीय एकता की परीक्षा की घड़ी थी और दुनिया इस और देख रही थी की भारत इस विभिन्नता का सामना करते हुए क्या एकता कायम रख पाएगा। इसका जवाब मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर से मिला। कश्मीर की राजशाही को चुनौती देने वाले शेख अब्दुल्ला थे, जो गांधी के जन आंदोलन के बड़े समर्थक भी थे लोकतंत्र की स्थापना के लिए वे लगातार संघर्ष कर रहे थे और इसी कारण उन्हें महाराजा हरिसिंह ने जेल में डाल दिया था भारत की आज़ादी,विभाजन की तारीख तय होने और रियासतों के भारत या पाकिस्तान में मिलने की कवायदों के बीच महात्मा गांधी ने खराब स्वास्थ्य के बाद भी कश्मीर की यात्रा की थी

आज़ादी के महज कुछ दिनों पहले की गई इस यात्रा का ऐतिहासिक महत्व है और कश्मीर के भारत में विलय की संभावनाओं के द्वार भी इसी यात्रा से खुले पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना जब कश्मीर गए थे तो उन्हें वहां की जनता ने जमीदारों का पिट्ठू कहकर अपमानित किया था,लेकिन महात्मा गांधी का स्वागत करने के लिए समूचा कश्मीर उमड़ पड़ा। उनके दर्शन कर कश्मीरी लोग कह रहे थे कि पीर के दर्शन हो गए।

गांधी वहां से लौट आये और भारत का विभाजन होकर पाकिस्तान भी बन गया विभाजन के दंश झेलने वाले भारत और उसके टुकड़े पाकिस्तान के बीच अविश्वास की रेखा खींची जा चुकी थी इसका असर कश्मीर पर पड़ना स्वभाविक ही थाहिंदू,मुस्लिम और बौद्ध संस्कृति से आबाद इस रियासत का आज़ाद रहना पाकिस्तान को गंवारा नहीं हुआ द्विराष्ट्र को लेकर मुखर पाकिस्तानी सियासतदानों का यह मानना था कि उनकी सीमा से लगे कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य है,अत:उसका स्वभाविक विलय पाकिस्तान में होना चाहिए लेकिन शेख अब्दुल्ला और कश्मीर के लोगों ने गांधी के सर्वधर्म समभाव,भारत के लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता को पसंद किया इस प्रकार कश्मीर भारत का अंग बन गया।

दरअसल भारत की एकता और अखंडता बनायें रखने के लिए सबसे सुरक्षित लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता को माना गया, इसीलिए इसकी मजबूती को लेकर आज़ादी के आंदोलन और उसके बाद भी सभी के साझा प्रयास चलते रहे। यह इस बात की गारंटी देता था की जब जनता स्वयं अपने भाग्य का फैसला करेगी तो देश में सामंजस्य कायम होगा और राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। भारत की सार्वभौमिकता और लोकतंत्र पर इसी विश्वास के बूते सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देशी राज्यों के एकीकरण की समस्या को बिना खून खराबे के बड़ी खूबी से हल किया।



1980 के दशक में पंजाब जब आतंकबाद से जल रहा था और इस बीच स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ तो इसे पाकिस्तान ने सिख धर्म के अपमान की तरह  कुप्रचारित किया। उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सुरक्षा एजेंसियों ने सतर्क करते हुए कहा की ऐसे हालत में उन्हें अपने सिख अंगरक्षकों को हटा देना चाहिए। इंदिरा गांधी ने इस सलाह को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया की सिखों ने इस देश के लिए सदैव बलिदान दिये है और वे ऐसा कोई काम नही कर सकती जिससे सिखों का भरोसा कम हो। बाद में 31 अक्तूबर 1984 को उनके सिख अंगरक्षकों ने ही इंदिरा गांधी की गोली मार कर हत्या कर दी। लेकिन अपने जीवन काल में इंदिरा गांधी ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे देश की एकता और अखंडता प्रभावित हो।



लोकतंत्र की मजबूती के लिए गांधी असहमति के सम्मान को सर्वोपरि रखते थे,यहां तक की महात्मा गांधी को खुद की आलोचना बहुत पसंद थी। उनका यही साहस उन्हें लोगों से जोड़ देता था और वे सभी के प्रश्नों का जवाब देने के लिए सदैव तैयार रहते थे। इसी कारण गांधी बुद्धिजीवियों और आम लोगों के बीच संवाद के सेतु बने और स्वराज की भावना को घर घर तक पहुंचाने में कामयाब रहे। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था की मै जो चीज़ जनता के साथ बांट नहीं सकता,वह मेरे लिए निशिद्द है। यह भी बेहद दिलचस्प है की आज़ाद भारत में राजनेता सर्वोच्च पदों पर रहकर जनमानस से आधिकांश बातें छूपा लेते है।

इस दौर में भारत में जाति और धर्म के नाम पर हिंसा बेहद आम है। धर्म भारत के लिए कितना जरूरी है इसका जवाब स्वामी विवेकानंद ने दिया था,उन्होने कहा था की भारत के लाखों पीड़ित जनता अपने सूखे हुए गले से जिस चीज के लिए बार-बार गुहार लगा रही है वो रोटी है। वो हमसे रोटी मांगते है,लेकिन हम उन्हें पत्थर पकड़ा देते हैं। भूख से मरती जनता को धर्म का उपदेश देना उसका अपमान है।

आज़ाद भारत का जैसा जैसा समय बीतता जा रहा है,भारत की एकता दरकती जा रही है। इस समय भारत में रोटी से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न जाति और धर्म है,यह समस्या आधुनिक भारत में इतनी गहरा गयी है की देश की एकता और अखंडता के प्रश्न कहीं पीछे छूट गए है। इस समय राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में सेना के अलावा और कोई संस्था या निकाय नहीं है,जिस पर  पूर्ण भरोसा किया जा सके।

कम से कम राजनीतिक दलों पर तो भरोसा किया ही नहीं जा सकता,जिनके व्यवहार देश की एकता और अखंडता को प्रभावित कर रहे है। बलिया में एक व्यक्ति की सरेआम हत्या के बाद वहां के विधायक ने सिर्फ अपनी जाति का होने के कारण हत्यारे के पक्ष में बयान दे दिया। यहां तक की उन्मादी भीड़ हत्यारे शख्स को जेल तक फूल मालाओं से लाद कर छोड़ने गई। इससे यह साफ हो गया की भारत अपने राष्ट्रीय मूल्यों से इतर आगे बढ़ रहा है और यह राष्ट्रीय एकता के लिए शुभ संकेत नहीं है।

डॉ.आंबेडकर ने कहा था की,संवैधानिक नैतिकता एक स्वाभाविक भावना नहीं है। हमें यह सोचना चाहिए की हमारे लोगों को अभी यह सीखना है। हिंदुस्तान की जमीन पर लोकतंत्र अभी भी ऊपरी सतह पर है,जो अपने आप में अलोकतांत्रिक बात है।” इतने सालों बाद भी डॉ.आंबेडकर की आशंका सही साबित हो रही है। बदलते भारत में बदलाव के अनगिनत ख्वाब तो है लेकिन लोकतंत्र में असहमति,सार्वभौमिकता और राष्ट्रीय एकता को लेकर वह पारदर्शी और सकारात्मक नजरिया नहीं जिसके बूते मजबूत भारत का ख्वाब साकार हो सके।

फ्रांस में बिखरता बहुलतावाद , france bahultavad islam

 फ्रांस में बिखरता बहुलतावाद  


                                                                          https://epaper.jansatta.com/c/56033327                                                           बहुलवादी देशों में एकीकृत समाज का निर्माण कैसे किया जाए,यह चुनौती आधुनिक विश्व के सामने बड़ा संकट बन कर उभरेगी,यह कल्पना सभ्य समाज ने कभी नहीं की होगी। दरअसल यूरोप के सबसे बड़े बहुलवादी देश फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अंतर्द्वंद सभ्यता और सांस्कृतिक संघर्ष का कारण बन गया है,इसके परिणाम बेहद भयावह होकर वहां के बहुलवादी परिवेश को प्रभावित कर  रहे है,यह संकट आने वाले समय में बेहद हिंसक और विध्वंसक हो सकता है।



इस दिनों फ्रांस का समाज एक शिक्षक की हत्या को लेकर बेहद आक्रोशित है जिन्हें एक इस्लामिक कट्टरपंथी द्वारा गला काटकर इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह एक पत्रिका में प्रकाशित उन कार्टूनों की चर्चा कर रहे थे जिसे फ्रांस में रहने वाला इस्लामिक समुदाय अपनी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ मानता रहा है।  फ्रांस की आबादी का दस फीसद मुसलमान है और इन्हें आमतौर पर पिछड़े और अशिक्षित माना जाता है। एक शिक्षक की हत्या के बाद फ्रांस में धर्म निरपेक्षता को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है और इसका नतीजा इस्लामिक शिक्षा और समाज को प्रतिबंधित करने जैसा भी हो सकता है। हालांकि ऐसा भी नहीं है की विवादित शार्ली एब्दो पत्रिका ने इस्लाम धर्म को विशेष रूप से निशाना बनाया हो,यह पत्रिका इसके पहले भी अति दक्षिणपंथी ईसाई,यहूदी और इस्लामिक मान्यताओं पर प्रहार करने को लेकर विवादों में रही है। लेकिन साल 2015 में मोहम्मद साहब को लेकर बनाये गए कार्टूनों की कड़ी प्रतिक्रिया हुई और इसके कार्यालय पर हमला कर कई लोगों को मार डाला गया था। इस घटना के बाद फ्रांस की सरकार कड़ाई से ऐसे नियमों को लागू कर रही है जिससे देश में धार्मिक तनाव बढ़ रहा है।  फ्रांस में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का पहनने पर पाबंदी लगा दी गई है,जबकि मुस्लिम समुदाय धार्मिक सिद्धांतों के साथ राज्य के हस्तक्षेप की तरह इसे देख रहा है। मुसलमानों का कहना है कि हिजाब लड़कियों की सांस्कृतिक पहचान है और यह क़ुरआन में बताए गए नियमों के दायरे में आता है। इस बीच यह विचार भी उभरने लगा है कि क्या यूरोप के समाज को दो तलवारों के सिद्धान्त पर चलाने कि कोशिशें फिर शुरू हो रही है। यूरोप के मध्यकालीन इतिहास में दो तलवारों का सिद्धान्त बेहद कुख्यात माना जाता है। इस सिद्धान्त के प्रवर्तक संत ऑगस्टीन मे माना था की पहला ईश्वर का राज्य और दूसरा धरती का राज्य। आधुनिक विश्व में ऐसी कोई मान्यता नहीं मानी जाती लेकिन फ्रांस कि सरकार अपने देश में बाहर से आने वाले मौलवियों को इस आधार पर रोक देना चाहती है कि वे फ्रांस के नियमों को प्रभावित कर अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को धर्म के आधार पर संचालित कर समांतर और धार्मिक शासन  व्यवस्था स्थापित करना चाहते है।

फ्रांस के भ्रातृत्व के सिद्धांत को दुनिया में बड़ा आदर्श माना जाता है जिसके अनुसार वर्ग-विभेद होते हुए भी सभी के मध्य समतामूलक तथा मानवतावादी विचारों का प्रसार किया जाना चाहिये। लेकिन इस्लामिक अलगाव के खतरों से फ्रांस कि राजनीतिक सत्ता इतनी बैचेन है कि वह बहुलवादी सिद्धांतों के साथ समझौता करने को तैयार नजर आ रही है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर छिड़ी बहस के बीच फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने देश में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बचाने के लिए सख़्त क़ानून लाने की  बात कही है। इसके पहले वे इस्लामिक समुदाय के रहन सहन पर निशाना साधते हुए काउंटर-सोसाइटी पैदा होने की बात भी कह चूके है। काउंटर सोसाइटी या काउंटर कल्चर का मतलब एक ऐसा समाज तैयार करना है जो कि उस देश के समाज की मूल संस्कृति से अलग होता है। दुनिया को स्वतन्त्रता,समानता और बंधुत्व का संदेश देने वाले फ्रांस में बहुलवाद को लेकर सत्ता जिस प्रकार दबाव में है,इससे यूरोप भी अलग नहीं है।

दुनिया भर में उदारवादी लोकतंत्र को मार्ग दिखलाने  वाले ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने के फैसले के पीछे मुस्लिमों के अप्रवासन को बड़ी समस्या को माना गया। मध्यपूर्व और अफ्रीका के गृहयुद्द से पनपे संकट में शरणार्थियों के लिए जर्मनी ने उदारता से अपने द्वार खोले। जर्मनी भी यूरोपीय यूनियन का सबसे बड़ा और प्रभावी देश माना जाता है,जर्मनी की इस उदारता की कड़ी प्रतिक्रिया ब्रिटेन में हुई। मुक्त आवाजाही के कारण यूरोप के अन्य देशों के नागरिक ब्रिटेन में आकर रोजगार तलाशने लगे और स्थानीय लोगों में प्रवासियों के प्रति असंतोष उत्पन्न हुआ। इससे यूरोपीय यूनियन के मुक्त अर्थव्यवस्था के इतर फ्रीडम ऑफ मूवमेंट का विरोध  ब्रिटेन में बढ़ गया और दुनिया की साझा संस्कृति वाले समाज की पहचान धराशायी होते देर नही लगीइस समस्या का उभार साल 2011 में हुआ जब ब्रिटेन में जनगणना करने वाले विभाग ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स द्वारा जनसंख्या के आंकड़े जारी किए गए। इसके अनुसार ब्रिटेन की जनसंख्या को 6 करोड़ 32 लाख बताया गया था जिसमें ब्रिटेन के स्थानीय निवासियों का अनुपात 2001 की जनगणना के 87 फीसदी के मुकाबले घटकर 80 फीसदी बताया गया था आँकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के मुख्य प्रांतों इंग्लैंड और वेल्स में हर आठवाँ व्यक्ति विदेश में जन्मा व्यक्ति है ब्रिटेन के जनसंख्या अनुपात में पिछले 10 सालों में आए बदलाव के लिए मुख्य कारण आप्रवासियों का ब्रिटेन आना बताया गया

पिछले कुछ सालों में मुस्लिम शरणार्थी यूरोप का रुख करने लगे है और इससे यूरोप का समाज आशंकित है। सीरिया के उत्तर पश्चिम के युद्दग्रस्त इलाके से प्रभावित लाखों लोग विस्थापित होकर तुर्की सीमा की और भाग रहे है,वहीं तुर्की ने यूरोपीय यूनियन को चेतावनी दी है कि यदि इस संकट से सही ढंग से नहीं निपटा गया तो वह शरणार्थियों के लिए यूरोप के द्वार खोल देगा। मध्यपूर्व में अस्थिरता बढ्ने से लाखों प्रवासी तुर्की के रास्ते यूरोप की तरफ रुख करते है। इस समय तुर्की में करीब 40 लाख से ज्यादा सीरियाई शरणार्थी हैं।  यूरोप में ये प्रवासी अवैध घुसपैठ न करें इसलिए यूरोपीय यूनियन ने साल 2016 में एक समझौता कर तुर्की को 6 अरब यूरो दिया था। यूरोप का एकमात्र मुस्लिम राष्ट्र तुर्की की भूमिका भी परेशान करने वाली है और वे अपने देश में इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहे है।

यूरोपीय यूनियन के विकास को लोकतंत्र का विकास माना गया क्योंकि इसका सदस्य वहीं देश बन सकता है जो लोकतांत्रिक होकर जिसका मानवाधिकारों का भी बेहतर रिकार्ड हो। दुनिया में धर्म को लेकर यूरोप का समाज जो दो भागों में बंट रहा है उससे लोकतंत्र और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता  पर भी  संकट गहरा गया है इस सबके बीच फ्रांस कि चिंता में अपनी राष्ट्रीय पहचान भी है। राष्ट्रीयता लोगों की एक आत्मिक और सांस्कृतिक भावना है जिससे वे लोग एक सूत्र मे बंधे रहते है और स्वयं को दूसरों से पृथक मानते है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशिष्टता होती है जो अपने भूभाग की सर्वोच्चता के लिए संघर्षशील होता है।  लेकिन इस्लामिक उभार को फ्रांस के आम नागरिक संदेह कि दृष्टि से देखने लगे है। उनका यह मानना है कि इस्लामिक धर्मवाद राष्ट्रवाद को पीछे छोड़ कर फ्रांस पर लगातार  हावी हो रहा है। यह बेहद खतरनाक है और इससे राष्ट्र की मूल संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता की भावना के खत्म होने का संकट  बढ़ता जा रहा है।  इसके पहले फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ज़्याक शिराक ने कहा था कि देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है कि धार्मिक चिन्हों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जाए ताकि राजनीति और धर्म को अलग-अलग रखा जा सके। 

धर्म निरपेक्ष देशों में यह विश्वास किया जाता है कि सभी नागरिकों को चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय के हो,उन्हें आस्था कि स्वतन्त्रता के साथ को विकास के समान अवसर राज्य द्वारा उपलब्ध कराएं जाएं। ऐसे में कोई राज्य जब किसी धर्म विशेष को लेकर मुखरता से कानून लागू करता है तो इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते है।

फ्रांस कि सरकार इस्लामिक मूल्यों को लेकर लगातार मुखर हो रही है लेकिन दुनिया के कई इस्लामिक देशों की नीतियां भी कम खतरनाक नहीं है। अन्य देशों के मुक़ाबले इस्लामिक देशों में धर्म को लेकर अभिव्यक्ति को कड़े प्रतिबंधों से जूझना पड़ता है। दुनिया के 49 मुस्लिम बहुल देशों में से 32 में ईशनिंदा के क़ानून के तहत लोगों को दंडित किया जाता है। इनमें से छह देशों में ईशनिंदा की सज़ा मौत है। पाकिस्तान जैसे देशों मे ईशनिंदा कानून के दुरुपयोग कि शिकायतें मिलती रही है और आम तौर पर यह सामने आया है कि कट्टरपंथी इन क़ानूनों के जरिए गैर इस्लामिक धर्मावलम्बियों को निशाना बनाते है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ के ख़िलाफ़ ईश-निंदा की शिक़ायत इसलिए दर्ज कि गई क्योंकि उन्होंने संसद में भाषण देते हुए सभी धर्मों को समान बताया था। शिकायत कर्ता का कहना था कि उनका धर्म सबसे श्रेष्ठ है,ऐसे में ख़्वाजा आसिफ़ का बराबरी का कथन ईश निंदा के अंतर्गत आता है।

मध्ययुग के महान राजनीतिक विचारक और दार्शनिक सेण्ट थॉमस एक्विनास ने कहा था की किसी भी राज्य में सरकार वहां के नागरिकों की भौतिक,ईश्वर और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। ऐसे में फ्रांस समेत दुनिया की अन्य सरकारों को भी यह समझना होगा की वे अल्पसंख्यक आबादी को देश की मुख्यधारा में पूरी तरह से जोड़ने की कोशिश  करे। इसमें कोई संदेह नहीं की किसी भी देश की अपनी सांस्कृतिक पहचान होती है और उसमें काउंटर-सोसाइटी का उभरना बहुलवादी समाज की चुनौतियों को बढ़ाता है। इससे निपटने के लिए आधुनिक शिक्षा और रोजगार  बड़े महत्वपूर्ण परिणाम दे सकते है। फ़्रांस में रहने वाले मुसलमान मूलत: मोरक्को,अल्जीरिया,माली और ट्यूनीशिया जैसे  पिछड़े देशों से है। कई पीढ़ियों से फ्रांस में रहने वाले यह मुसलमान गरीबी और पिछड़ेपन से अभिशिप्त  है। ऐसे समाज में अभिव्यक्ति को लेकर सजग रहने की जरूरत से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

फ्रांस में अभिव्यक्ति की  स्वतन्त्रता को लेकर बहस तो हो रही है,वहीं इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता की अभिव्यक्ति के अंतर्द्वंद को समालोचना,आलोचना और असहमति के आधार पर अपने अपने अनुसार परिभाषित किया जा सकता हैअभिव्यक्ति की अंगड़ाई से ही सर्वकालीन मानव इतिहास गढ़े गए है लेकिन यह भी यथार्थ है कि वैचारिक प्रतिबद्धताओं  का रुख देशकाल समय और परिस्थितियों की प्रासंगिकताओं के अनुसार तय होता रहा है विशेषकर बहुलवादी समाज में अभिव्यक्ति से उत्पन्न वैचारिक विरोधाभास जनमानस में व्यापक असहमति न पैदा करेइसे लेकर लोकतांत्रिक देशों   को सजग रहने की जरूरत है



बहरहाल अभिव्यक्ति के अंतर्द्वंद से बहुलवाद को चुनौती न मिले,इसे लेकर सतर्क रहना राज्य की ज़िम्मेदारी है,वर्तमान में दुनिया की कई देशों की सरकारें इसकी गंभीरता को  नजरअंदाज कर  मानवीय संकट और संघर्ष को बढ़ा रही है।

 

 

शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

सांध्य प्रकाश                                सर सैयद अहमद खां की जयंती -17 अक्टूबर

                सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है

                                                                                       - डॉ.ब्रह्मदीप अलूने



हिंदुस्तान यदि मिथक है तो वह सहस्त्रों वर्षों से आबाद कैसे है और यदि वह  यथार्थ है तो समूची संस्कृतियों को सहेजने की उसकी कला पर गर्व होना चाहिएयहां कुछ भी अंदाजा लगाना आसान नहीं हैसंस्कृतिवादी शिवाजी को अपना आदर्श बताते है और पूजते है जबकि वे स्वयं सभी धर्मों का सम्मान करते थेशिवाजी ने अपने प्रशासन में धर्मनिरपेक्षता का पालन किया था और उनका राजधर्म किसी एक किसी धर्म पर आधारित नहीं थाउनकी सेना में सैनिकों की नियुक्ति के लिए धर्म कोई मानदंड नहीं था और इनमें एक तिहाई मुस्लिम सैनिक शामिल थेहिन्दू  राजशाही के तौर पर पहचाने जाने वाले शिवाजी का जीवन बेहद दिलचस्प रहाशिवाजी के दादा मालोजीराव भोसले ने सूफी संत शाह शरीफ के सम्मान में अपने बेटों को नाम शाहजी और शरीफजी रखा थाउनकी नौसेना की कमान सिद्दी संबल के हाथों में थी और सिद्दी मुसलमान उनके नौसेना में बड़ी संख्या में थेजब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब मुगलों की कैद से निकल भागने में जिन दो व्‍यक्तियों ने उनकी मदद की थी उनमें से एक मुसलमान था।यहीं नहीं शिवाजी ने अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए एक मस्जिद का ठीक उसी तरह निर्माण करवाया था जिस तरह से उन्होंने अपनी पूजा के लिए जगदीश्वर मंदिर बनवाया थाहिंदुस्तान में शिवाजी को हिन्दू भावनाओं का प्रतीक बताने की लगातार कोशिश होती रही है,लेकिन स्वयं शिवाजी अपनी नीतियों से हिंदुस्तान की बहुसांस्कृतिक शक्ति के प्रतीक थे



शौर्य को लेकर जैसी पहचान हिन्दुओं में शिवाजी की है शिक्षा को लेकर कुछ वैसी ही सर सैयद अहमद खां की मुसलमानों में।19 वी सदी में युद्द और हिंसा से अभिशिप्त भारतीय मुसलमानों की समस्याओं को दूर करने के लिए सैयद अहमद खां ने शिक्षा का रास्ता चुनादर दर और पग पग नापते हुए उन्होंने दान से शिक्षा की इमारत खड़ी करने की ठानी और उनका जूनून उन्हें सफलता की और ले गयाअशिक्षा और पिछड़ेपन से गरीबी की मार झेलते हुए मुसलमानों  के लिए आधुनिक शिक्षा की परिकल्पना की दुर्लभ थी,जिसे अहमद खां ने अपनी नेक नियति और कड़ी मशक्कत से साकार कर दियागुलाम भारत में मुस्लिम शिक्षा का आगाज करने वाले मोहम्मद एंग्लों इंडियन कॉलेज जिसे अब अलीगढ़ विश्वविद्यालय कहते हैउसके दरवाजे पर लिखे इस वाक्य से सबका स्वागत होता है,”इल्म हासिल कीजिये,माँ की गोद से मौत तक।“19 वी सदी के पिछड़े भारत में जन्म लेने वाले  अहमद खां जैसे भारतीय शख्स में समाज के प्रति निष्ठा और राष्ट्र के प्रति जिजीविषा ही थी कि उत्तर भारत के एक बड़े परिक्षेत्र में बिना सरकारी मदद के शिक्षा की ऐसी बुलंद इमारत खड़ी कर दी गई,जिसका स्वर्णिम इतिहास गवाह हैकहने को इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम शिक्षा का केंद्र कहा जाता है लेकिन इसकी शिक्षा तो सच्ची  भारतीयता को ही बयां करती है

यह विश्वविद्यालय अपनी मुस्लिम छाप के लिए देश ही नहीं  दुनिया में विख्यात हैजबकि इसकी स्थापना सन्  1877 में भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय भावनाओं को मज़बूत आधार एवं स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए  सर सैय्यद अहमद ख़ान ने की थीपहले दिन से ही  अरबी फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ  संस्कृत  कि शिक्षा की भी व्यवस्था की गईसर सैयद अहमद खां निश्चित तौर पर इस विश्वविद्यालय के जरिए मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना चाहते थेदेश की सर्वोत्तम सुविधाओं से शुमार इस विश्वविद्यालय में तकरीबन 25 फ़ीसदी विद्यार्थी गैर मुसलमान पढ़ते हैयहाँ संस्कृत का विभाग बेहद ख्यात माना जाता हैपूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण की राजनीति, धर्म,कर्म,विज्ञान,गणित,समाज,अर्थ,मेडिकल,इंजीनियरिंग जैसे सैकड़ों विभाग विद्यार्थियों के लिए पूरी गुणवत्ता के साथ उपलब्ध होते हैयहां की सेंट्रल लायब्रेरी दुनिया की अहम लायब्रेरी मानी जाती हैयहाँ पर महाभारत  का फारसी अनुवाद भी है तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता से संबंधित कई पांडुलिपियां भी उपलब्ध हैयहाँ अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता है तो तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र भी सहेज कर रखे गए है

शिक्षा का स्तर भी इतना जबरदस्त की देश के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन,कैफ़ी आजमी,न्यायविद आर.पी.सेठी,मशहूर इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद और इरफ़ान हबीब,भौतिक शास्त्री पियारा सिंह गिल जैसी अनेक नामी गिरामी हस्तियां यहां से निकली हैहॉकी के जादूगर  ध्यानचंद ने कलाइयों से कमाल करना इसी विश्वविद्यालय से सीखा था। खान अब्दुल गफ्फार खान की शिक्षा भी अलीगढ़ मुस्लिम  विश्वविद्यालय में ही हुई थी।उनके देश प्रेम के बारे में कहा जाता है कि  वह ऐसे हिन्दुस्तानी थे जिसकी हर साँस में एहले वतन डोलता था।अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुदाई खिदमतगार और लाल कुर्ती आंदोलन छेड़कर पठानों को लामबंद करने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शिखर नेता रहे।धर्म के नाम पर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान देश बनने का पूरी उम्र उन्होंने खूब विरोध किया।विभाजन के बाद भी पाकिस्तान का वे लगातार विरोध करते रहे,उन्हें पाकिस्तान की जेल में भी डाला गया लेकिन उनके भारत के प्रति प्रेम में कभी कमी नही आई।भारत के प्रति उनकी अपार श्रद्धा के कारण ही उन्हें 1969 में नेहरु शांति पुरस्कार और 14 अगस्त 1987 में भारत रत्न के सर्वोच्च सम्मान से विभूषित किया गया।लोग इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम इच्छा का केंद्र समझते है लेकिन सर सैयद अहमद खां से जिस नीव पर यह इमारत खड़ी की है उससे प्रतीत होता है कि भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने में इस संस्थान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।




देश में जब अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ रहे थे तब सैयद अहमद खांने असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द किताब लिखकर मुसलमानों को स्वतंत्रता की भारतीय चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीधर्म की कट्टरपंथी ताकतों पर सीधा प्रहार करते हुए सर सैयद ने लोगों से यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि कुरान के उपदेशों को तर्क के आधार पर समझने का प्रयत्न करें



विडम्बना ही है कि भारत में जिन्ना को बार बार जीवित किया जाता है,उसका उपयोग किया जाता है और उससे अलगाब पैदा करने की कोशिशें भी की जाती हैजबकि  भारत में सर सैयद अहमद खां के विचारों और उद्देश्य को प्रचारित करने की जरूरत हैसर सैयद अहमद खां 19 वी  सदी में मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर परेशान थेलेकिन हकीकत में मुसलमान की समस्या इस समय भी जस की तस है गरीबी,पिछड़ापन और अशिक्षा से मुसलमान तब भी मुक्ति चाहते थे और अब भी उनके जीवन में ज्यादा बदलाव नहीं आया है

भारत जैसे बहु सांस्कृतिक देश के लिए सर सैयद अहमद खां ऐसी अनमोल धरोहर रहे,जिनके आदर्शों और उद्देश्यों को हर युग में सहेजने की जरूरत है।अंततः शिक्षा ही सारी समस्याओं का समाधान है,इसी के जरिए सर सैयद अहमद खां  जीवन भर और उसके बाद भी सशक्त भारत के निर्माण का रास्ता दिखाते नजर आते है । 

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

अर्थव्यवस्था के अंधकार को दूर करने की चुनौती,arthvyvstha india

 

नया इंडिया

                                                                         

भारत जैसे विकासशील देश के करोड़ों लोग पिछले तीन दशकों में इस बात को भलीभांति समझने लगे है की जब अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन करती है तो कारोबारी और ज़्यादा पैसा निवेश करते हैं और उत्पादन को बढ़ाते हैं क्योंकि भविष्य को लेकर वे आशावादी होते हैंऐसे में करोड़ों लोगों को रोजगार मिलते है और खुशहाली की संभावनाएं बढ़ जाती है भारत की यही जरूरत भी है क्योंकि यहां करोड़ों लोगों के लिए खुशहाली का मतलब महंगी कारें या ऊंची इमारतें नहीं होता बल्कि दो जून रोटी का उपलब्ध होना होता हैअंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़, भारत में कम से कम नब्बे फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं ये लोग सिक्योरिटी गार्ड,सफाई करने वाले,रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं



भारत की अर्थव्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी और इसका असर देखने को भी मिला संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2016 के बीच रिकॉर्ड 27 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं2005-06 में भारत के करीब 64 करोड़ लोग गरीबी में थे2015-16 में यह संख्या घटकर 37 करोड़ आ गई जो देश की जनसंख्या का करीब 28 फीसदी है

गरीबी के कम होने से इन सालों में भारत के लोग यह सुनना भी पसंद नहीं करते की देश की जीडीपी कमजोर हो जायेक्योंकि इसका मतलब है कि निवेशक अपने पैसे बचाने में लग जायेंगे,आम लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं होगा,वे कम पैसा ख़र्च  करेंगे और इससे करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों और छोटे व्यापारियों की तो शामत आ जाएगी,इनकी संख्या भारत  में कई करोड़ है

दरअसल जीडीपी को महत्व को लेकर यह विचार इसलिए किया जा रहा है  क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की जीडीपी के इस साल माईनस दस दशमलव तीन फीसदी तक जाने की आशंका जताई है और यह भारत के करोड़ों लोगों के लिए किसी बूरे सपने जैसा है



अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दुनिया भर की उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत की स्थिति सबसे ख़राब बताई गई है एक अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा



पिछले कुछ वर्षों में जीडीपी कम तो हो रही थी लेकिन कोरोना काल में यह इतनी नीचे गिर जाएगी,इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी साल 2016-17 में जीडीपी आठ दशमलव तीन फीसदी से बढ़ी थीइसके बाद 2017-18 में ग्रोथ सात फ़ीसदी रही2018-19 में यह  छह दशमलव एक फ़ीसदी और 2019-20 में यह गिरकर चार दशमलव दो पर आ गई। अब  यह बहुत नीचे गिर गई है । पिछले साल देश के लगभग सवा तीन करोड़ नौकरियां देने वाले ऑटोमोबाइल सेक्टर की गिरती हालत से निराश मारुती सुजुकी के चेयरमेन आर सी भार्गव ने कहा था कि कोई सुधार के साफ संकेत नहीं है और उत्पादन क्षमता ठप हैभारत को 2020 तक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का प्रधानमंत्री का सपना वाहन उद्योग की बेहतरी के बिना साकार नहीं हो सकतायह निराशा इस बात से सामने आई थी क्योंकि देश में सैकड़ों डीलरशिप बंद हो रही थी या बंद होने की कगार पर थी साल 2018 में एक आर्थिक सर्वेक्षण में यह तथ्य उभर कर आया था कि भारत के 17 राज्यों के किसानों की मासिक औसत आय महज 1662 रूपये है और यदि इसके किसानों की आय के दूगुना होने के सपने को सही समझा जाये तो यह 2022 में 3332 रूपये हो सकती है8 नवम्बर 2016  को नोटबंदी के बाद कई भारतीय निवेशक देश छोड़कर चले गएइससे दैनिक वेतनभोगी और मजदूर वर्ग बेहद प्रभावित हुआ



वास्तव में देश में सवा करोड़ लोग हर साल रोजगार की तलाश में अग्रिम पंक्ति में होते है 1972-73 के बाद बेरोजगारी के दर सबसे निम्न स्तर तक जाने का दंश देश भोग रहा हैग्रामीण असंगठित मजदूर बेहाल है और शहरी असंगठित मजदूरों की कोरोना काल के एक साल पहले ही 18 लाख नौकरियां छूट गई हैभारत की अर्थ व्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी लेकिन फिर भी यह पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर सकीमाना जाता है कि भारत जैसे कम और मध्यम आमदनी वाले देश के लिए साल दर साल अधिक जीडीपी ग्रोथ हासिल करना ज़रूरी है जिससे देश की बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके



पिछले साल एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था की अब आगे तेज उन्नति के लिए उड़ान भरने का अवसर है,आगे की यात्रा बदलते सपनों की कहानी है,निराशा की स्थिति से आशा के शिखर तक पहुंचने की कहानी है,संकल्प से सिद्धि तक की कहानी हैगरीबी हटाओं की कठिन यात्रा वाले देश में उन्नति के ख्याल करोड़ो लोगों को रोमांचित करते रहे हैखासकर मध्यम और निम्न वर्ग के लिए उन्नति का मतलब घर,रोटी,कपड़ा,मकान और बच्चों की शिक्षा दिवास्वप्न रहे है और कोई भी आशा उनके घर को कुछ समय के लिए तो रोशन कर ही देती है



भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2021 में आठ दशमलव आठ फ़ीसदी विकास दर का अनुमान भी लगाया है। फ़िलहाल हम यही कामना कर सकते है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो देश को विश्वास दिलाया था,वह सही साबित हो। क्योंकि विकास दर के गिरने से बेरोजगारी,गरीबी,असमानता और अशांति को बढ़ावा मिलेगा और देश की एकता और अखंडता के लिए यह बड़ी चुनौती बन सकता है।

 

 

brahmadeep alune

aakashwani sanvidhan koumi ekta Aajkal- 23rd November