सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

आधी रात को गांधी के दलितोत्थान की अंत्येष्टि,gandhi hathras dalit

 

हम समवेत         

                        आधी रात को गांधी के दलितोत्थान की अंत्येष्टि                                                                       

                                                                            -डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                             


https://www.humsamvet.com/opinion-feature/funeral-at-midnight-of-mahatma-gandhis-dalit-uplift-6842

बापू के भारत में मानवीय गरिमा और समता मूलक समाज की स्थापना को लेकर संविधानिक प्रावधानों में कोई कमी नहीं है लेकिन इसे लागू करने का अधिकार राज्य को दिया गया है महात्मा गांधी की सबसे बड़ी चिंता यही तो थी,उन्हें अंदेशा था कि राज्य शोषण का सबसे बड़ा स्रोत बनकर सामन्तवाद को स्थापित कर देगा और सामान्य और वंचित व्यक्ति के सम्मान को तार तार कर देगा।


हाथरस में आधी रात को एक दलित नवयुवती का अंतिम संस्कार पुलिस द्वारा किया गया तो गांधी के राज्य को लेकर यह विचार सच साबित हुए की राज्य हिंसा का धनीभूत और संगठित रूप है। यह हिंसा पर जीवित रहता है और इसे हिंसा से कभी अलग नहीं किया जा सकता।” भारत के संविधान में अंतिम संस्कार को लेकर स्पष्ट उल्लेखित है की यह मानवीय गरिमा से जुड़ा अधिकार है,वही हाथरस में मजबूर माँ अपनी बेटी के अंतिम संस्कार को सही तरीके से करने को लेकर गिड़गिड़ाती रही।

पीड़िता की माँ कहती रही हैं उन्हें एक बार अपनी बेटी के पार्थिव शरीर को घर ले जाने दिया जाए,वह अपने रस्म-ओ-रिवाज से हल्दी चंदन लगाकर बेटी को अंतिम विदाई देना चाहती हैंलेकिन मृतका का अंतिम संस्कार घर वालों की ओर से बताए गए रीति रिवाजों के बग़ैर हो गया परिवार की आवाज के उलट अंतिम संस्कार के सही तरीके से होने को लेकर जिले के कलेक्टर और पुलिस के मुखिया बयान दे रहे थे। संविधान में उल्लेखित मौलिक अधिकारों को दरकिनार कर प्रशासनिक अमले से जुड़े अधिकारी या पुलिस आधी रात में अंतिम संस्कार को जबर्दस्ती करके उसे न्यायोचित ठहराने लगे, तो शासन तंत्र और सरकार पर आम जन का भरोसा कैसे कायम रह सकेगा। हाथरस की घटना के 15 दिनों तक चर्चा में रहने और विरोध प्रदर्शन की गूंज पूरे भारत में होने पर भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के द्वारा कार्रवाई तब की गई जब उन्हें देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा फोन किया गया जाहिर है देश के प्रधानमंत्री की संवेदनाएं जाग गई,लेकिन राज्य के मुखिया की मानवीय अस्मिता से जुड़े प्रश्न पर कई दिनों तक मौन परेशान करने वाला है 

दरअसल भारत में लोकतंत्र के उच्च प्रतिमानों के बाद भी मध्ययुगीन सामन्तवाद ने अपनी जड़ों को मजबूत बनाये रखा है। इन सबके बीच समाज का वंचित वर्ग हैरान,परेशान,बेहाल और अभिशिप्त है। देश की कुल जनसंख्या का एक चौथाई अनुसूचित जाति–जनजातीय समाज सदियों से प्रचलित असमानता और सामजिक विषमता से बेहाल है। वह स्वतंत्र भारत में अपने लिए संवैधानिक विशेषाधिकारों के बूते  अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है।

इन सबके बीच यह प्रश्न पुनः उठ खड़ा हुआ है कि संसद और विधायिका में विशेष सीटों से चुने गए दलित सांसद और विधायक अपने समुदाय के पक्ष में आवाज उठाने में नाकाम क्यों रहते है। इसे लेकर डॉ.आंबेडकर आशंकित थे। वे लंदन में हुए राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में दलितों के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट के समर्थन में अभियान चला रहे थे,जिससे इस वर्ग के प्रतिनिधि मुखरता से अपनी बात कह सके1932  में अंग्रेजी सरकार ने दलित जातियों को आम हिन्दू निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का अधिकार देने के साथ ही साथ अपने पृथक निर्वाचन क्षेत्र में भी मत देने का अधिकार दे दियादलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में महात्मा गांधी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन का रास्ता चुना। महात्मा गांधी ने कहा कि दलित जातियों के प्रति अन्याय हिन्दू धर्म का पाप है और उन्हें इसका प्रायश्चित भी करना चाहिए। बाद में पूना पैक्ट बना और दलितों को हिंदू धर्म से जोड़कर विशेष अधिकार दिए गए जिसमें संसद और विधानसभाओं में विशेष प्रतिनिधित्व भी शामिल है। इसी प्रावधान की वजह से लोकतान्त्रिक सदन की लगभग 1200 सीटें अनुसूचित जाति -जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं। लेकिन देखा यह गया है कि इन सीटों से चुनकर आने वाले अधिकांश प्रतिनिधियों ने अपने समुदाय को लगातार निराश किया हैदलित और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि अधिकांश मामलों में बेहद निकम्मे साबित हुए हैं। उत्तरप्रदेश दलितों पर अत्याचार के लिए कुख्यात है और यहां की 80 लोकसभा सीटों में से 17 आरक्षित है। अफ़सोस इस बात का है कि हाथरस जैसी घटनाओं पर भी आरक्षित सीटों पर से चुन कर आने वाले सांसद,विधायक  दलित अधिकारों के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करने का साहस नहीं दिखा पाते। यह बात डॉ.आंबेडकर जानते थे और उन्होंने 1955  में शेड्यूलड कास्ट सम्मेलन में सुरक्षित सीटों को समाप्त करने की मांग की थी

देश के सबसे बड़े लोकतंत्र की हकीकत भयावह है महात्मा गांधी  के भारत में सामाजिक और आर्थिक ग़ैरबराबरी को ख़त्म करने का सपना पूरा नहीं हो सका है। अभी भी लोग नारकीय और दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर है। समावेशी विकास और सभी की गरिमा की लड़ाई भारत के पुनः विभाजन का कारण न बन जाये इसीलिए संविधान में मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता दी गई। लेकिन सामन्तवाद सत्ता पर इस तरह हावी हो गया कि वंचित वर्ग के मानवीय और संविधानिक अधिकारों को वह रोज कुचलता है। समाज पर वह पूरी तरह से हावी है और सरकारें उन्हीं के अनुसार चलती है। हाथरस और बलरामपुर की घटना इसी का आईना दिखाती है।



महात्मा गांधी के राम राज्य में वैष्णव जन से यह अपेक्षा की गई है कि वह उच्च मानवीय आदर्शों के साथ वंचित वर्ग के विकास की परिस्थितियां निर्मित करेगा। लेकिन आधी रात को जब अंतिम संस्कार किया गया तो भारतीय समाज के स्थापित धर्म गुरुओं ने इसे लेकर राज्य का विरोध नहीं किया। इस घटना के बाद जिस प्रकार दलितों की नाराजगी सामने आ रही है,उससे यह भी आशंका गहरा गई है की आने वाले समय में दलितों के यहां अंतिम संस्कार आधी रात में करके दलितों पर अत्याचार के समय अक्सर खामोश रहने वाले कथित धर्मगुरुओं और परम्परवादियों को आईना दिखाने की प्रतिकात्मक कोशिशें न शुरू हो जाए। 1932 में पूना पैक्ट के जरिए हिन्दू धर्म के संभावित विभाजन को महात्मा गांधी ने टाल दिया था। इस समय न तो गांधी है जिन पर सभी वर्ग विश्वास करते हो और न ही आंबेडकर जिन पर दलितों की स्वीकार्यता हो।

भारत में दलितों पर भयावह अत्याचार की घटनाएं और परम्परावादी लोगों की मूक सहमति बापू की उस अपेक्षा को गलत ठहरा रही है जिसमें उनके द्वारा प्रायश्चित की अपेक्षा की गई थी। वहीं डॉ.आंबेडकर की संविधान सभा में चेतावनी को याद रखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि,अगर हमने इस ग़ैरबराबरी को ख़त्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे,जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है। जाहिर है देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए वंचित वर्गों के अधिकारों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत है।

 

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

गांधी,ग्राम स्वराज और आत्म निर्भर भारत,gandhi gram swraj

 

 प्रजातंत्र                

          गांवों के पूर्ण गणराज्य बनने तक सही मायनों में देश में लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता         

                        गांधी,ग्राम स्वराज और आत्म निर्भर भारत



                                                           

ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में व्यापार के लिए आई थी और उसका फौजी अमल व्यापार की सुरक्षा  करना था हिंदुस्तानी बेहद हुनरमंद लोग थे और उनका व्यापार प्राचीन काल से ही सुदूर एशिया तक फैला था यूरोप की औद्योगिक क्रांति के पहले ही भारत व्यापारिक क्षेत्र में स्थापित और उन्नत राष्ट्र बन चूका था डच,पुर्तगाली और अंग्रेज भारतीय व्यापार को बड़ी आशाओं की दृष्टि से देखते थे और यहां पर प्रभाव बनाएं रखने के लिए ये आपस में लड़े भी नौसेना की मजबूती अंग्रेजों के लिए निर्णायक हुई और हिंदुस्तान पर उनका एकाधिकार हो गया  

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव से ब्रिटिश साम्राज्य को भारत का भविष्य हस्तांतरित करने के पीछे आर्थिक महत्वकांक्षी उद्देश्य थे जो सामने भी आये   औद्योगिक क्रांति के नाम पर विकास को भारत पर भी थोपा गया और इस प्रकार भारत के कुटीर उद्योग बड़ी ही  चतुराई से खत्म करा दिए गए भारत के व्यापारी व्यापार के तौर तरीकों में तो माहिर थे लेकिन उनमें राजनीतिक एकता जैसी कोई बात नहीं थी अत: ब्रिटिश कम्पनियां बाज़ार पर हावी हो गई और भारत के व्यापारियों को कच्चा मॉल उपलब्ध कराने वाला सेवक बना दिया गया   भारत में जमींदार और अमीर थे या यहाँ के लोग गरीब थे,अत:मध्यमवर्ग का न होना भारतीय समाज के लिए अभिशाप बन गया इसका परिणाम यह हुआ कि गरीबी तेजी से बढ़ी और लोग ब्रिटिश शासन की नीतियों पर निर्भर हो गए   कुटीर उद्योग समाप्त होने का असर गांवों पर खूब पड़ा और इससे भारत में बदहाली और बेरोजगारी बढ़ी व्यापार करने वाले लोग अंग्रेजी शासन में रोजगार को पाकर सुरक्षित महसूस करते तो जमीदार कमाई का एक भाग अंग्रेजों को सौंपकर प्रभाव में बने रहे  





ब्रिटिश शासन की इन आर्थिक नीतियों से भारत का आर्थिक ढांचा अस्त व्यस्त हो गया और देश में बेकारी फ़ैल गई महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई को जब सामाजिक न्याय स्थापित करने के संघर्ष के तौर पर निरुपित किया तब एक बार फिर भारतीय चेतना अपने घर की अर्थव्यवस्था को ठीक करने और रोजी रोटी के समुचित प्रबंधन की और प्रवृत हुई  बापू ने अर्थव्यवस्था को सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित करके स्वावलंबी और आत्मनिर्भर भारत की और कदम बढ़ाएं  

 उन्होंने आटा पिसने को स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर बताकर अपने आश्रम में इसे सेवा भाव से जोड़ दिया चरखा चलाकर स्वदेशी का ऐसा मंत्र दिया कि ब्रिटिश कपड़ा उद्योग को पस्त कर दिया वे सेवा ग्राम में आकर रहने लगे  कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का काम शुरू हुआ खादी उद्योग फलने फूलने लगा  बुनियादी शिक्षा का महत्व गांधी के सहयोगी गांव गांव समझाने लगे 


 

शहर के लोगों द्वारा ग्रामीणों के शोषण को गांधी हिंसा का ही अंग मानते थे  उन्होंने कहा, नगरवासियों के लिए गांव अछूत है  नगर में रहने वाला गांव को जानता भी नहीं  वह वहां रहना भी नहीं चाहता,जबकि गांवों का पुनरुथान करके ही विदेशी शासन से मुक्ति पाई जा सकती है  उन्होंने स्वदेशी का मतलब समझाते हुए कहा कि इसका मतलब यह नहीं की वस्तु सिर्फ देश में बनी हो,बल्कि वह  गांव की बनी हुई होनी चाहिए  गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए गांधी का यह सकारात्मक विचार था  बापू के आश्रम आत्मनिर्भरता का संदेश देने लगे  सभी आश्रमवासी अपने काम खुद करते थे और सभी गतिविधियों में भाग लेते थे वे ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक जीवन जीते थे और अपने कपड़े,जरूरत का सामान, फल सब्जियां और अनाज का उत्पादन खुद करते थे   

महात्मा गांधी ने व्यापार उद्योग की भारतीय पद्धति को अहिंसक और मानवीय बताया   उन्होंने कहा, कारखानों की सभ्यता पर अहिंसात्मक समाज का निर्माण नहीं हो सकता  केवल आत्मनिर्भर गांवों पर ही उसका निर्माण हो सकता है  बापू की अर्थव्यवस्था के केंद्र में भारत के आदर्श गांव रहे,जो अपनी आवश्यकताओं के लिए आत्म निर्भर हो, अपना खाद्यान्न स्वयं उत्पन्न करता हो और जिनकी गतिविधियाँ सहकारिता पर आधारित हो पाठशाला और नाट्यगृह ग्राम के द्वारा ही संचालित हो,जिससें धन संपत्ति का अर्जन और प्रवाह समाज के सभी वर्गों में होता रहे गांधीजी खेतो में जैव उर्वरकों के उपयोग के लिए किसानों को जागरूक करते थे और उन्हें बनाने की विधियां भी बताते थे

उनकी अर्थव्यवस्था की कल्पना उनके स्वदेशी आंदोलन में साकार होती है यह आंदोलन समुदाय में उपलब्ध संसाधनों और समुदाय के कौशल और हुनर का उपयोग करके रोजमर्रा के उपयोग की चीजों के उत्पादन और लोगों को आत्म निर्भर बनाने पर आधारित थाप्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा करना उसका प्रमुख उदेश्य था। शोषण रहित समाज का निर्माण और अहिंसक विकास की भावना इसमें निहित थी।



बापू का स्पष्ट कहना था कि ग्राम विकास का रास्ता ग्राम स्वराज से निकलता है। दरअसल ग्राम स्वराज्य हमारी प्राचीन शासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण भाग है, इसकी अवधारणा समाज को शासन और प्रशासनिक व्यवस्था में सहभागी बनाने पर जोर देती है। ग्राम स्वराज्य परिकल्पना एक ऐसी व्यवस्था है जो आदर्श लोकतंत्र को परिभाषित करती है तथा ग्रामीणों की आत्म निर्भरता और भागीदारी  का मार्ग प्रशस्त करती है आदर्श लोकतंत्र की स्थापना के लिए जनता का शासन व्यवस्था में सहभागी होना अनिवार्य होना चाहिए। शासन व्यवस्था में समाज की सहभागिता जनमानस के अंदर विकासपरक जिम्मेदारी लेकर आती है। जब आमजन शासन व्यवस्था में सहभागी होकर स्वविकास के निर्णय स्वयं करने लगता है उस स्थिति में राजनैतिक व्यवस्था उच्च प्रतिमान स्थापित करने की ओर अग्रसर होने लगती है। ग्राम स्वराज गांव के सामाजिक,आर्थिक विकास के साथ सम्पूर्ण विकास को सुनिश्चित करता है।

महात्मा गांधी चाहते थे कि प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में स्वावलंबी हो तभी वहां सच्चा ग्राम-स्वराज्य कायम हो सकता है। इसके लिए उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि जमीन पर अधिकार जमींदारों का नहीं होगा,बल्कि जो उसे जोतेगा वही उसका मालिक होगा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ग्रामोद्योग की उन्नति के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ाने पर बल दिया जिसमें उनके द्वारा चरखा तथा खादी का प्रचार शामिल था। गांधी का मानना था कि चरखे के जरिये ग्रामवासी अपने खाली समय का सदुपयोग कर वस्त्र के मामले में स्वावलंबी हो सकते हैं। ग्रामोद्योगों की प्रगति के लिए ही उन्होंने मशीनों के बजाय हाथ-पैर के श्रम पर आधारित उद्योगों को बढ़ाने पर जोर दिया।  बापू द्वारा ग्रामों के विकास व ग्राम स्वराज्य की स्थापना के लिये प्रस्तुत कार्यक्रमों में प्रमुख थे- चरखा व करघा, ग्रामीण व कुटीर उद्योग, सहकारी खेती,ग्राम पंचायतें व सहकारी संस्थाएं, राजनीति व आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण,अस्पृश्यता निवारण,मद्य निषेध, बुनियादी शिक्षा आदि। महात्मा गांधी का पूर्ण विश्वास सत्याग्रह में था। वे सत्याग्रह में जिस साहस को आवश्यक मानते थे, वह उन्हें शहरी लोगों में नहीं, बल्कि किसानों के जीवन में मूर्तिमान रूप में दिखाई पड़ता था। हिंद स्वराजमें वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- मैं आपसे यकीनन कहता हूं कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जबकि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे। किसान किसी के तलवार-बल के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे।“  बापू ने ग्राम स्वराज को सही मायने में साकार करने का सपना देखा था और इसीलिए देश में 1959 में पंचायती राज की आधारशिला रखी गई। इसे 1993 के संविधान संशोधन द्वारा और मजबूत बनाया गया।



बापू का सदा यह सपना रहा था कि वे ऐसा आधुनिक भारत बनाएंगे जो दुनिया के सामने सामाजिक आदर्शों की जीती जागती मिसाल हो  उन्होंने भारत के प्रत्येक नागरिक को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाना चाहते थेउनकी सर्वोदय की कल्पना में जाति,धर्म,संप्रदाय और रंग भेद से के बिना सबका हित था सर्वोदय से समाज के सभी वर्गों का उत्थान, विकास और सामूहिक कल्याण पर बल देता था वे ग्राम स्वराज को स्थापित करने  के पक्षधर थे  गांधी के सपनों का भारत ऐसा राम राज्य था जिसका लक्ष्य भारत में प्रेम,सत्य और अहिंसा पर आधारित एक ऐसे नवीन सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना था,जिसमें संघर्ष के स्थान पर सहयोग हो,विषमता के स्थान पर समानता हो,और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण न हो



बापू ने लोकतांत्रिक समाज की जो कल्पना की थी वह स्वतंत्रता,समानता और नागरिक अधिकारों पर आधारित था। इस समाज  में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने तथा समुदायों का निर्माण करने की आज़ादी थी। इस लोकतांत्रिक समाज के अंतर्गत जाति,धर्म भाषा,वर्ण और लिंग आदि के भेदभाव के बिना सभी  व्यक्तियों को समान सामाजिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे।  गांधीजी प्रत्येक ग्राम को पूर्ण गणराज्य के रूप में देखना चाहते थे जो अपनी आवश्यकताओं के लिए पड़ोसियों पर निर्भर न हो,वह स्वावलंबी हो गांधी ने ग्राम गणतंत्रों के संघ का सपना देखा था जो समाज की अनिवार्य आवश्यकताओं की व्यवस्था करेगायह आर्थिक और राजनीतिक संगठनात्मक दृष्टि से पूर्णत: विकेन्द्रित होगा और आंतरिक शोषण तथा बाह्य आक्रमण की संभावनाओं को कम करेगाआर्थिक विषमता को दूर करने के लिए गांधी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत दिया जिसमें सम्पत्ति को समाज कल्याण के लिए उपयोग करने का संदेश दिया गया है बापू इस सिद्धांत के माध्यम से धन संचय के दुष्प्रभावों को समझाना चाहते थे जो अंततः हिंसा और शोषण का कारण बन जाता है उन्होंने पूंजीपतियों को यह सीख दी की वे उतना ही धन संचय करें जो उनकी सेवाओं के लिए उपयुक्त हो और शेष धन समाज को लौटा दे

 बापू यह मानते थे कि मनुष्य और समाज के सुख और विकास के लिए आर्थिक सम्पन्नता और स्वतंत्रता के साथ आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य भी जरूरी है इसलिए राजनीतिक सत्ता हो या आर्थिक शक्ति,इसका विकेन्द्रीकरण होना चाहिएकेंद्रीकृत व्यवस्थाएं अंततः हिंसा का कारण बन जाती है कुटीर और ग्रामोद्योग को गांधी इसीलिए बढ़ावा देने के पक्षधर थे क्योकि यह आर्थिक शक्ति को समान बनाएं रखते था और इस प्रकार शोषण युक्त समाज की संभावनाओं को खत्म करता थापश्चिमी देशों का औद्योगिकीकरण अंततः शोषण और हिंसा का बढ़ावा देने वाला सिद्ध हुआ था अत: विकेंद्रीकृत व्यवस्था को गांधी लोकतंत्र के मजबूत होने का कारण मानते थे उन्होंने बड़े उद्योगों के स्थान पर छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति का इसीलिए समर्थन किया


बापू की स्वदेशी विचारधारा में भी आत्मनिर्भरता और भारतीयता के मूल्य रहे है उन्होंने कहा,” स्वदेशी में स्वार्थ के लिए कोई स्थान नहीं हैअपने विशुद्ध रूप में स्वदेशी  सबकी सेवा का सर्वोत्तम रूप है स्वदेशी का सच्चा समर्थक कभी भी किसी के भी प्रति विरोधी भावनाओं से प्रेरित नहीं होगास्वदेशी घृणा का सिद्धांत नहीं है यह नि:स्वार्थ सेवा का सिद्धांत है जिसकी जड़े विशुद्ध अहिंसा या प्रेम में है

विकसित देशों और यहां तक कि कई विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में तकरीबन दो फीसदी लोग ही कृषि संबंधी उत्पादकता पर निर्भर हैं ग्रामीण क्षेत्र ज्यादातर प्राथमिक संसाधनों पर आधारित होते हैं अमेरिका, जापान जैसे देशों में महज दो फीसदी लोग ही कृषि पर आधारित हैं,जबकि भारत में तकरीबन 55 फीसदी लोग कृषि संबंधी कार्यो पर निर्भर हैं यह एक बहुत बड़ा गैप है एक बड़ी विषमता है,हमारे देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी तकनीकी शिक्षा का बेहद अभाव है, ताकि लोग गांवों में रह कर ही अपनी आजीविका चला सकेंखेती से लोगों को पर्याप्त आमदनी नहीं हो पा रही है हमारे देश में 85 फीसदी से ज्यादा किसान सीमांत कृषक हैं,इनकी आमदनी पर्याप्त नहीं हैइनके लिए आमदनी का कोई दूसरा  विकल्प होना जरूरी है तकनीकी शिक्षा के अभाव में यह कमी और भी ज्यादा महसूस की जा रही है किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिले,इसके लिए बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करने की जरूरत है खेती पर इसका व्यापक असर पड़ता है बिजली व्यवस्था ठीक होने से ग्रामीण विकास की  तस्वीर बदल सकती है नकदी फसलों पर कम ध्यान दिया जाता है,इस मामले में पर्याप्त सरकारी मदद मुहैया कराते हुए गांवों की  तस्वीर बदली जा सकती है

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अभी भी गांवों की हालात खराब है और लोग विषमता का जीवन जीने को मजबूर है। ग्रामीण जनता गरीबी,बेरोजगारी,अज्ञानता,अशिक्षा जैसी कई समस्याओं से ग्रस्त है। ग्रामीण विकास के लिए ग्राम स्वराज को मजबूत करना बेहद आवश्यक है और इस दिशा में अभी सशक्त प्रयासों की जरूरत है। 

महात्मा गांधी कहा करते थे कि,आर्थिक समानता अहिंसक स्‍वतंत्रता की असली चाबी है। शासन की अहिंसक प्रणाली कायम करना तब तक संभव नहीं है जब तक अमीरों और करोड़ों भूखे लोगों के बीच की खाई बनी रहेगी। महलों और श्रमिक एवं गरीबों की दयनीय झोंपडियों के बीच असमानता, स्‍वतंत्र भारत में एक दिन भी नहीं टिक पाएगी, क्‍योंकि स्‍वतंत्र भारत में गरीबों को भी वही अधिकार होंगे जो देश के सबसे अमीर आदमी को प्राप्‍त होंगे।

आज़ादी के आठवें दशक में भारत मजबूत तो दिखाई देता है लेकिन ग्राम्य स्वराज,जीवन और आत्मनिर्भरता को लेकर किए गए प्रयास आधे अधूरे नजर आते है। स्वतंत्र भारत की सरकारों के द्वारा गांधी के ग्राम गणराज्य और आत्मनिर्भरता की अवधारणा को समझा होता और वास्तव में प्रतिबद्धता से यदि उसे लागू  किया होता तो गांव के मजदूरों को रोजगार की तलाश में न तो दर दर भटकना पड़ता और न ही निढाल होकर कोई मजदूर रेल की पटरियों पर गिरकर अपनी जिंदगी को हारने को मजबूर होता।


यदि आज गांधी होते तो गांव गांव में संसद होती और भारत का लोकतंत्र सामंतवाद की परछाई से भी मुक्त हो गया होता।  भारत इस समय दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश तो है लेकिन गांवों के पूर्ण गणराज्य बनने तक सही मायनों में देश में लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता।  बापू जिस बात से डरते थे,वही हुआ,भारत के लोकतंत्र पर सामंतवादी शक्तियाँ हावी हो गई और सत्ता का केंद्रीयकरण हो गया। इसी कारण गांव का सामान्यजन,गरीब,किसान,मजदूर, मातृशक्ति तथा वंचित वर्ग आर्थिक और सामाजिक असमानता के अभिशाप से कभी नहीं उबर पाया और न ही देश गरीबी के जंजाल से मुक्त हो सका।

brahmadeep alune

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

सांध्य प्रकाश                                सर सैयद अहमद खां की जयंती -17 अक्टूबर                 सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों ...