शनिवार, 15 अगस्त 2020

आज़ादी के दिन महात्मा गांधी का संघर्ष,aazadi,gandhi

 

नया इंडिया 

 

                     आज़ादी के दिन महात्मा गांधी का संघर्ष

                                                                           डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                        [लेखक द्वारा लिखित गांधी है तो भारत है का अंश..]



महात्मा गांधी ने एक बार प्रार्थना सभा में कहा था कि “मैं जन्म से ही संघर्ष करने वाला हूँ और असफलता को नहीं जानता” दरअसल देश के विभाजन का घाव गांधी के लिए असहनीय था लेकिन इसके बाद भी उनके सर्वधर्म समभाव को लेकर प्रयासों में कोई कमी नहीं थीउन्होंने लंबे संघर्ष के बाद मिल रही आज़ादी के जश्न में शामिल होने से इंकार करते हुए कहा कि वे बंगाल में ही ठीक है और उनकी पहली प्राथमिकता यहाँ जनता के बीच शांति और सद्भाव कायम करना है

भारत को आज़ादी मिली लेकिन गांधी परेशान और बेचैन थे। सांप्रदायिक हिंसा की घृणा और अविश्वास को वे देश के भविष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे थे। उन्होंने कहा कि”मैंने इस विश्वास में अपने को धोखा  दिया कि जनता अहिंसा के साथ बंधी हुई है।”



महात्मा गांधी ने लोगों को चेताया कि उन्हें इस आजादी का बुद्धिमानी और संयम के साथ इस्तेमाल करना है। विभाजन के घोषणा के बाद साम्प्रदायिक हिंसा से जलते हुए बिहार और बंगाल में गांधी का जाना और अति संवेदनशील इलाकों में रुकना भारतीय इतिहास की ऐसी दु:साहसिक यात्रा है जिसकी और कोई मिसाल नहीं मिलती।

बंगाल पहुंच कर गांधीजी ने घोषणा की कि “जब तक कलकत्ते में शांति स्थापित न होगी,वह अपना उपवास नहीं तोड़ेंगे। जो मेरे कहने से न हुआ,वह शायद मेरे उपवास से हो जाये।“ भयावह हिंसा के बीच वे कलकत्ता की गलियों में जा जा कर लोगों से मिल रहे थे,संवेदनाएं व्यक्त कर रहे थे और हिंसा को रोकने के गुहार लगा रहे थे।

गांधी के उपवास का व्यापक असर हुआ। समाज के सभी वर्गों में यह संदेश गया कि यदि साम्प्रदायिक दंगे नहीं रुके तो बापू की जान जा सकती है। लोग गाँधी जी मिलकर मिन्नते करने लगे की वे उपवास छोड़ दे लेकिन गांधी लोगों के सदबुद्धि आने तक आमरण उपवास पर रहने की अपनी प्रतिज्ञा से नहीं डिगे। कई व्यापारी,हिन्दू मुसलमान और अन्य धर्मों के प्रतिनिधियों ने बापू को भरोसा दिलाया कि कलकत्ता में कोई भी हिंसा या तनाव नहीं होगा। उपद्रवियों ने बापू को विश्वास दिलाने के लिए अपने हथियार उनके सामने जमा कर दिए। पुलिस और जनता भी बापू के उपवास में शामिल हो गई। यह उपवास तब तक चला जब तक बंगाल के इलाकों में पूर्ण शांति स्थापित नहीं हो गई। गांधी के लिए अहिंसा का अर्थ पृथ्वी पर किसी को भी मन ,कर्म और वचन से हानि न पहुंचाना था। उन्होंने कहा,”हिंसा में किसी भी प्राणी को कटु शब्दों,तीखे निर्णयों, द्वेष भावना,क्रोध,घृणा,निर्दयता या निर्बल प्राणी को जान बूझ कर सताना,उसका आत्मसम्मान नष्ट करना आदि सम्मिलित है।“



15 अगस्त 1947 का दिन भी उनके लिए सामान्य दिन जैसा ही था,वे उपवास और प्रार्थना से शांति स्थापित करने की कोशिशें कर रहे थे। बंगाल में आज़ादी के दिनका जश्न कई इलाकों में हिन्दू और मुसलमानों ने मिलजुल कर मनाया। इसके बाद बापू दिल्ली होकर पंजाब जाने के लिए रवाना हो गए। दिल्ली में भी विभाजन से प्रभावित हजारों लोगों की भीड़ थी जिनकी रहने,खाने पीने और रुकने की व्यवस्था करने की सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती जा रही थी। गांधी दिल्ली में जिस हरिजन बस्ती में रुकते थे वहां भी लोगों का जमावड़ा बढ़ गया था। वे बिड़ला भवन रुके लेकिन वहां भी वे बरामदें में सोये और शेष जगह शरणार्थियों के लिए सुरक्षित कर दी।

महात्मा गांधी कहा करते थे कि वे सवा सौ वर्षों तक जीवित रहना चाहते है लेकिन कलकत्ता के दंगों से वे बह दुखी थे। एक बार उन्होंने कहा कि,”भाई भाई की इस सत्यानाशी लड़ाई को देखते हुए जीवित रहने की अब जरा भी इच्छा नहीं होती।” अपने जन्मदिवस पर बधाई देने वालों से उन्होंने कहा,”बधाई कैसी मातमपुर्सी होना चाहिए।“


आज़ादी के बीच विभाजन से उत्पन्न हुई स्थितियां बेहद बेकाबू थी। घर,जमीन,रोजी,रोटी के साथ लोगों के परिवार भी उजड़ गए थे। दंगों से प्रभावित लोगों के मन में एक दूसरे सम्प्रदाय के प्रति गुस्सा और रोष था। जो लोग पाकिस्तान से लौट रहे थे वे असहनीय पीड़ा और हिंसा का सामना कर बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भारत आ पाए थे। ऐसे लोग मुसलमानों के प्रति गुस्से से भरे हुए थे।

लोगों के दिलों से गुस्सा मिटाना और घृणा दूर करना बड़ा कठिन कार्य था। साम्प्रदायिक विद्वेष में  महात्मा गांधी पर जान का खतरा बना हुआ था लेकिन इसके बाद भी वे शरणार्थी शिविरों में जाकर लोगों से मिल रहे थे और उनकी समस्याओं को सुनने के साथ समाधान का भी प्रयास कर रहे थे। दिल्ली में कुछ कैम्प में हिंसा को झेलते हुए पश्चिमी पाकिस्तान से भाग कर आए हिंदू और सिख शरणार्थी भरे हुए थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान सीमा के पार जाने के इंतजार में थे।


13 जनवरी 1948 को उन्होंने दिल्ली में शांति की स्थापना के लिए उपवास प्रारम्भ किया और कहा कि जब तक दिल्ली में शांति की स्थापना नहीं हो जाती वे उपवास नहीं तोड़ेंगे। महात्मा गांधी नई चुनौतियों और परिस्थितियों के बीच रचनात्मक कार्य करना चाहते थे। सामाजिक संगठनों को एकताबद्ध करने की संभावनाओं पर वे चर्चा कर रहे थे जिससे अहिंसक समाज रचना के कार्य का सुचारू ढंग से संचालन किया जा सके।

राजनीतिक स्वाधीनता को हासिल करने के बाद देश के सर्वांगीण विकास के लिए साम्प्रदायिक विद्वेष को दूर कर सामाजिक और आर्थिक सुधारों को लागू करना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी,गांधी अहिंसक ढंग से इसे क्रियांवित  करने को संकल्पित रहे।  वे इस बात पर जोर देते रहे कि “जिस प्रकार पशुओं के लिए हिंसा का नियम और नीति है उसी प्रकार अहिंसा का नियम और नीति हम मानवों के लिए है।“


महात्मा गांधी भारत को दिशा दिखाते अकेले चलते रहे और इस विश्वास के साथ इस दुनिया से गए होंगे की भारत उनके बताएं रास्ते पर चलेगा। गांधी को जरूरत समझे या मजबूरी लेकिन वे हमेशा प्रासंगिक है। भारत के अतीत,वर्तमान और भविष्य को लेकर गांधी की समझ का और कोई विकल्प नहीं हो सकता। समय का पहिया घूमकर वहीं आ गया है और आसन्न संकट में गांधी की आत्मनिर्भरता की सीख सामने है। 

 

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

श्रीलंका में भारत की चुनौतियां ,shrilanka,rajpkshe,india

 

जनसत्ता

                             श्रीलंका में भारत की चुनौतियां                                                                                                        ब्रह्मदीप अलूने


हिन्द महासागर के सिंहली द्वीप में सिंहली राष्ट्रवाद की राजनीति राजपक्षे परिवार को खूब रास आ रही हैउनका राजनीतिक दल प्रतिद्वंदी दलों को बहुत पीछे छोड़ते हुए अब श्रीलंका की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज हो गया हैक़रीब एक दशक तक देश के राष्ट्रपति रह चुके महिंदा राजपक्षे चौथी बार देश के प्रधानमंत्री बने है जबकि उनके छोटे भाई गोटाभाया राजपक्षे इस समय श्रीलंका के राष्ट्रपति हैदरअसल भारत के इस पड़ोसी देश ने गृहयुद्द और आंतरिक असुरक्षा का सामना लंबे समय तक किया है,लेकिन इस देश से तमिल पृथकतावादी आंदोलन के खत्म होने के बाद यहां की राजनीति की दिशा ही बदल गई हैपिछले कुछ सालों से श्रीलंका में राष्ट्रवाद की लहर चल पड़ी है और बहुसंख्यक सिंहलियों का विश्वास राजपक्षे बंधुओं पर गहरा हुआ है,जिनकी कड़ी नीतियों से तमिल पृथकतावादी आंदोलन को खत्म कर देश को गृहयुद्द की कगार से उबार लिया गया था। इस समय भी वहां की जनता यह मानती है की कोरोना काल के संकट से देश को उबारने के लिए  महेंदा राजपक्षे का राजनीतिक दल श्रीलंका पीपुल्स फ़्रंट सबसे बेहतर विकल्प है और इसीलिए आम चुनावों में उसे ऐतिहासिक विजय मिली है


इन सबके बीच राजपक्षे परिवार की नीतियाँ अल्पसंख्यक तमिलों के प्रति असामान्य और चीन के पक्ष में झुकती नजर आती है,इससे भारत के लिए चुनौतियां बढ़ सकती है। श्रीलंका की आबादी का लगभग 20 फीसदी तमिल है और वे भारतीय मूल के है। भारत के दक्षिणी तमिलनाडु राज्य से इन तमिलों के रोटी और बेटी के संबंध है। श्रीलंका कई सालों से तमिलों की राष्ट्रीयता और उनके अधिकारों के प्रति दुर्भावना का इजहार करता रहा है और वह भारत को लेकर भी आशंकित रहता है,जबकि भारत की नीति उसके प्रति ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से बेहद मित्रवत रही है दोनों देशों को आज़ादी लगभग साथ साथ ही प्राप्त हुई लेकिन श्रीलंका की राजनीतिक और वैदेशिक नीति में भारत विरोध प्रारम्भ से ही दिखाई दिया भारत दक्षिण एशिया में साझी संस्कृति का सम्मान करते हुए उसके अनुरूप पड़ोसी देशों से व्यवहार करता है और इस समूचे क्षेत्र को सैनिक गठबंधनों से दूर रखने को कृतसंकल्पित रहा है,वहीं श्रीलंका की सामरिक नीति पश्चिमी देशों की और झुकती हुई और पूरे क्षेत्र को संकट में डालने वाली रही है1947 में ब्रिटेन से श्रीलंका की सैन्य संधि को लेकर भारत में बेहद असमंजस का माहौल बना तो कुछ वर्षों बाद  श्रीलंका के प्रधानमंत्री कोटलेवाल ने मुखरता से यह कहने से गुरेज नहीं किया की पड़ोसी भारत उनके देश को हथिया न ले इसलिए बेहतर है यहां ब्रिटिश सैन्य अड्डा बना रहे। श्रीलंका का भारत के प्रति यह अविश्वास बाद में भी बदस्तूर जारी रहा। पाकिस्तान से नाभिकीय सहयोग और चीन से सबसे ज्यादा हथियार खरीदने की श्रीलंकाई नीति में भारत को चुनौती देने की भावना ही प्रतिबिम्बित होती है।


ऐसा भी नहीं है कि श्रीलंका में सत्तारूढ़ सभी नेता भारत विरोधी रहे लेकिन उनकी तमिल विरोधी नीतियों को लेकर भारत की मुखरता दोनों देशों के आपसी संबंधों को प्रभावित करती रही इस समय श्रीलंका में सत्तारूढ़ पार्टी पर राजपक्षे परिवार का प्रभाव है और वे उनके देश में भारत के प्रभाव को सीमित करने तथा चीन और पाकिस्तान से सम्बन्ध मजबूत करने के प्रति लगातार प्रतिबद्धता दिखाते रहे हैकुछ सालों पहले तक श्रीलंका विकास और पुनर्निर्माण के लिए भारत पर निर्भर था लेकिन महिंदा राजपक्षे और उनके भाई गोटाभाया राजपक्षे ने अपने देश की निर्भरता को भारत से कम करने की नीति पर लगातार काम किया है और भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए यह चुनौतिपूर्ण बन गया है श्रीलंका द्वीप का उत्तरी भाग भारत के दक्षिण पूर्वी समुद्र तट से मात्र कुछ किलोमीटर दूर है और तमिलनाडू प्रदेश के रामनाथ पुरम जिले से जाफना प्रायद्वीप तक का समुदी सफर  छोटी छोटी नौकाओं में आसानी से प्रतिदिन लोग करते है मध्य कोलम्बो से तूती कोरिन और तेलई मन्नार से रामेश्वरम के मध्य समुद्री नाव सेवा प्राचीन समय से रही है,लेकिन अब श्रीलंका भारत से ज्यादा महत्व चीन को दे रहा है और इस समय चीन का प्रभाव इस क्षेत्र में बढ़ गया हैभारत और श्रीलंका की समुद्री सीमा बहुत करीब है और इसलिए मछुआरे एक दूसरे की सीमा में गलती से प्रवेश कर जाते है,भारत जहां इसे आजीविका से सम्बन्धित समझता है,वहीं श्रीलंका तमिल पृथकतावाद से इसे जोडकर भारतीय मछुवारों को निशाना भी बनाता रहा है

 

2009 मे श्रीलंका में एलटीटीई  के खात्मे के साथ 26 साल तक चलने वाला गृह युद्ध समाप्त हुआ तो चीन पहला देश था जो उसके पुनर्निर्माण में खुलकर सामने आया था चीन ने श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट का निर्माण कर हिंद महासागर में भारत की चुनौती को बढ़ा दिया हैश्रीलंका ने चीन को लीज़ पर समुद्र में जो इलाक़ा सौंपा है वह भारत से महज़ 100 मील की दूरी पर है हंबनटोटा बंदरगाह दुनिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक है और महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में बने इस बंदरगाह में चीन से आने वाले माल को उतारकर देश के अन्य भागों तक पहुंचाने की योजना थी चीन भारत का सामरिक प्रतिद्वंदी है और स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स से समुद्र में भारत को उसकी घेरने की सामरिक  महत्वाकांक्षा साफ  नजर आती है,चीन भारत को हिन्द महासागर में स्थित पड़ोसी देशों के बन्दरगाहों का विकास कर चारो और से घेरना चाहता है हम्बनटोटा पोर्ट पर उसके अधिकार से भारत की समुद्र में चिंताएं बढ़ी है


दक्षिण एशिया में श्रीलंका ऐसा पहला देश था जहां भारतीय तेल कंपनियों ने पेट्रोल पम्प खोले थे लेकिन अब यहां हावी हो गया है चीन ने करोड़ो डॉलर की मदद देकर श्रीलंका में कई सड़क निर्माण परियोजनाएं चला रखी है, श्रीलंका के दूरदराज़ के हिस्सों में स्कूलों में बच्चों को चीनी भाषा सिखाई जा रही है और मुफ्त में किताबें भी बंटवाई जा रहीं है भारत से परम्परागत रूप से जुड़े श्रीलंका के नौनिहालों पर चीनी संस्कृति का प्रभाव बढ़ाने का यह प्रयास बड़े पैमाने पर किया जा रहा हैइस समय चीन श्रीलंका का केवल सबसे बड़ा आर्थिक और सामरिक साझेदार बन गया है

भारत की चिंता यह भी है कि श्रीलंका के आम चुनाव में प्रचण्ड बहुमत मिलने के बाद महिंदा राजपक्षे श्रीलंका का संविधान बदलने,अल्पसंख्यक तमिलों के संविधानिक अधिकारों के साथ छेड़छाड़ करने और अपने भाई के साथ मिलकर राष्ट्रपति की शक्तियों को बढ़ाने का प्रयास कर सकते है यदि ऐसा होता है तो इससे न केवल श्रीलंका के तमिल प्रभावित होंगे बल्कि भारत की आंतरिक और बाह्य राजनीति भी इससे प्रभावित हुए बिना नही रह सकती श्रीलंका में बसने वाले तमिलों का संबंध भारत के दक्षिणी तमिलनाडु राज्य से है अल्पसंख्यक और गरीब होने के कारण श्रीलंका की सरकारे इनके मौलिक अधिकारों की अनदेखी करती रही है,इस प्रकार इस देश में  बसने वाले लाखों तमिलों में असुरक्षा,अविश्वास और आतंक की भावना विद्यमान है श्रीलंका के 13 वे संविधान संशोधन में यह कहा गया है कि हम तमिलों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए कई तरह के अधिकार प्रदान करेंगे,श्रीलंका सरकार का रुख इसे लेकर सकारात्मक नहीं हैतमिलों के हितों को देखते हुए भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि वह श्रीलंका की सरकार से इन्हें लागू करवाएं। राजपक्षे जिस प्रकार संकीर्ण राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहे है,उससे लगता नहीं की वे तमिलों की बेहतरी के लिए काम करेंगे बल्कि तमिलों पर अत्याचार बढ़ सकता है।


ऐसे में यदि श्रीलंका में तमिलों का कोई आंदोलन पुन: शुरू होता है तो उससे भारत प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता श्रीलंका में गृहयुद्द के समय तमिलों पर अत्याचारों को लेकर श्रीलंका की वैश्विक आलोचना होती रही है और वहां से विस्थापित हजारों तमिल परिवार तमिलनाडु में शरण लिए हुए है भारत श्रीलंका की तमिल विरोधी नीति का मुखर विरोध करता रहा है और संयुक्तराष्ट्र मानव अधिकार परिषद में उसके खिलाफ अनेक बार मतदान भी किया है। जबकि चीन और पाकिस्तान ने संयुक्तराष्ट्र में श्रीलंका के पक्ष में मतदान करके भारत के खिलाफ कूटयुद्द को बढ़ावा दिया है हिन्द महासागर में अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए भारत को श्रीलंका से संबंध भी मधुर रखना है और तमिलों के अधिकारों की रक्षा भी करना है

भारत के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि श्रीलंका आर्थिक रूप से पराधीन देश है और चीन इसका लगातार फायदा उठा रहा हैकोरोना काल में श्रीलंका की अर्थव्यवस्था टूट चुकी है और संकट में है श्रीलंका पर कुल विदेशी क़र्ज़ क़रीब 55 अरब डॉलर है और यह श्रीलंका की जीडीपी का 80 फ़ीसदी है इस क़र्ज़ में चीन और एशियन डिवेलपमेंट बैंक का 14 फ़ीसदी हिस्सा है,जापान का 12 फ़ीसदी, विश्व बैंक का 11 फ़ीसदी और भारत का दो फ़ीसदी हिस्सा है ऐसे माहौल में भी श्रीलंका का व्यवहार आशंकित करने वाला हैकोरोना की मार से बेहाल और पस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए इस साल जून में श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने यूरोपीय यूनियन के राजदूतों के एक समूह से कहा था कि श्रीलंका को नए निवेश की ज़रूरत है न कि नए क़र्ज़ की गोटाभाया चीन के कर्ज की कीमत तो समझ रहे है लेकिन उसके गहरे दबाव में भी निर्णय ले रहे है


2019 में श्रीलंका की सरकार ने भारत और जापान के साथ कोलंबो में ईस्ट कॉन्टेनर टर्मिनल बनाने को लेकर समझौता किया था,इस समझौते को श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बताकर इसके भविष्य पर कुछ समय पहले महिंदा राजपक्षे ने सवालिया निशान खड़ा किया था और अब उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद तो यह पूरी योजना खटाई में पड़ सकती है भारत और जापान से चीन की कड़ी प्रतिद्वंदिता है और चीन श्रीलंका में इन देशों की मौजूदगी को खत्म करना चाहता है,ऐसा लगता है कि चीन के समर्थक महिंदा राजपक्षे ने इसके भविष्य पर चीन के दबाव में ही सवाल उठाये है


श्रीलंका की भारत से सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता सामरिक दृष्टि से ज्यादा असरदार साबित होती है। शांति की अस्पष्ट विचारधारा दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती रही है,कई देश अपनी बुनियादी नीति को छुपाकर शांति का मुखौटे की तरह प्रयोग करते है। इस समय राजपक्षे बंधु अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाकर तथा न्याय,शांति और औचित्य को भ्रामक धारणा मानकर उसे ख़ारिज कर रहे है। वह तमिलों के अधिकारों की रक्षा को लेकर अस्पष्ट है और चीन जैसे आक्रामक देश से सम्बन्ध मजबूत कर भारत की समुद्री सुरक्षा को भी संकट में डाल रहे है।

बहरहाल भारत को श्रीलंका के साथ भू-अर्थशास्त्र और भू-राजनीति में बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए ज्यादा कूटनीतिक प्रयास करने की जरूरत है,जिससे चीन की सौदेबाजी की शक्ति को प्रभावित कर प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और उनके भाई राष्ट्रपति  गोटाभाया राजपक्षे को भारतीय हितों के प्रतिकूल कार्य करने से रोका जा सके।

 

सोमवार, 10 अगस्त 2020

केमिकल विस्फोट से बढ़ी पर्यावरणीय और आतंकी चुनौती,chamical terrorism lebnan

 

पत्रिका 

          केमिकल विस्फोट से बढ़ी पर्यावरणीय और आतंकी चुनौती

                                                                              डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


https://www.patrika.com/opinion/chemical-attack-hazards-6330574/

अशांत समन्दर कब तबाही का मंजर पैदा कर दे यह अकल्पनीय होता है,ऐसा ही कुछ रासायनिक भंडार से उत्पन्न अकस्मात खतरों की भयावहता को लेकर भी है जिसके प्रभावों का अंदाजा लगाना मुश्किल है दरअसल भूमध्यसागर के पूर्वी तट पर स्थित लेबनान ने करीब 7 सालों से राजधानी बेरुत के पोर्ट पर एक गोदाम में अवैध रूप से पकड़े गए साढ़े सत्ताईस हजार टन अमोनियम नाइट्रेट का भंडार जमा कर रखा था

दुनिया भर में कृषि उर्वरक और विस्फोटक के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला अमोनियम नाइट्रेट इतना खतरनाक होता है कि 100 से 150  किलो की इसकी मात्रा से ही विस्फोट हो जाये तो कम से कम तीन किलोमीटर का पूरा इलाका तबाह हो सकता है। अमोनियम नाइट्रेट एक गंधहीन रसायन है,यह साधारण ताप व दाब पर सफेद रंग का क्रिस्टलीय ठोस है। कृषि में इसका उपयोग उच्च-नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक के रूप में तथा विस्फोटकों में आक्सीकारक के रूप में होता है। यह खतरनाक होने के बाद भी सर्व सुलभ है,क्योंकि इसका उपयोग कई कार्यो में किया जाता है। रासायनिक उद्योग कच्चे माल को औद्योगिक रसायनों में बदल देते है और इसके बहुआयामी जरूरत के कारण इसे अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।

लेबनान की सरकार ने देश में दो सप्ताह का आपातकाल घोषित किया है लेकिन इसका खतरा और प्रभाव कितना होगा,यह किसी को पता नहीं। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि अमोनियम नाइट्रेट का प्रभाव दीर्घकालीन हो सकता है और इसकी मात्रा इतनी ज्यादा थी की पर्यावरण की दृष्टि से आनेवाले समय में इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते है इसमें ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने की क्षमता है,अत: दुनिया का तापमान बढ़ सकता हैविस्फोट के बाद इससे निकलने वाली गैस एसिड वर्षा का कारण बन सकती है और यह दुनिया के किसी भी इलाके में हो सकती है। लेबनान,भूमध्य सागर के तट पर है और इस महासागर को दुनिया का मध्यबिंदु कहा जाता है,पूर्वी एशिया का यह देश,भूमध्यसागर के कारण एशिया के साथ अफ्रीका और यूरोप से भी जुड़ा है।  इसके विस्फोट से रासायनिक जहरीले तत्व निकले है और हवा में मिल गये है,हवा का रुख किस और होगा यह कहा नहीं जा सकता है यदि एसिड वर्षा से मनुष्य प्रभावित होते है तो साँस लेने में तकलीफ और त्वचा के कैंसर जैसे खतरे हो सकते है इससे प्रभावित वर्षा समुद्र में होती है तब समुद्री जीवों के लिए यह बेहद घातक हो सकती है और हजारों समुद्री जीव मर सकते है  मैदानी इलाकों में होने पर इससे मिट्टी में खतरनाक रसायन शामिल होंगे जिसके परिणाम अंततः प्राणियों और पर्यावरण के लिए ही खतरनाक होंगे



इस घटना के सामने आने के बाद एक बार फिर यह अंदेशा भी गहरा गया है कि आतंकी इस रसायन का दुरूपयोग करने की और प्रवृत्त होंगे और ऐसा करके वे दुनिया की किसी भी भाग में भारी तबाही मचा सकते है। 

आधुनिक युग में औद्योगिक विकास की धुन में खतरनाक रासायनिक पदार्थों का भंडार जमा किया जा रहा है और इससे अन्य खतरे भी उत्पन्न हो गये है। नार्को टेररिस्म के साथ अमोनियम नाइट्रेट  की तस्करी के मामलें भी लगातार सामने आये है और भारत में कुछ आतंकियों हमलों में जांच एजेंसियों ने अमोनियम नाइट्रेट के इस्तेमाल की बात स्वीकार की है,इसमें वाराणसी,मालेगांव,दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर, हैदराबाद,पुणे और बोधगया ब्लास्ट शामिल है इस समय भारत में अमोनियम नाइट्रेट की मुक्त आवाजाही प्रतिबंधित है2011 में मुंबई के झावेरी बाजार में हुए बम धमाकों में अमोनियम नाइट्रेट के इस्तेमाल के बाद केन्द्र सरकार ने अमोनियम नाइट्रेट को विस्फोटक अधिनियम-1884 के तहत विस्फोटकपदार्थ घोषित कर दिया था। इसके साथ ही इसे बेचने पर भी पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। 2011 में सरकार ने आतंकी हमलों में इसके  उपयोग की आशंकाओं के चलते इसे लेकर व्यापक दिशा निर्देश जारी किये थे इसके बाद भी देश के कई इलाकों में अमोनियम नाइट्रेट की तस्करी करने वाले लगातार पकड़े जाते रहे है


केमिकल का उत्पादन,पहुँचाने की आसान प्रक्रिया,छुपाने में  आसान और रख रखाव में भी सहज होने से आतंकवादी इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना परेशानी के पहुंचा सकते है और इससे होने वाला विनाश भयावह हो सकता हैकेमिकल माड्यूल का उपयोग,उद्देश्य और इसकी पहचान करना भी आसान नही है। 2018 में इंदौर में डारेक्टरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस ने डीआरडीई के वैज्ञानिकों की मदद से एक अवैध फैक्ट्री से 9 किलोग्राम फेंटानिल केमिकल ज़ब्त किया थाइस जानलेवा केमिकल के साथ पकड़ा गया आरोपी एक युवा वैज्ञानिक था।इस  घटना से पूरी दुनिया सकते में आ गई और भारत की खुफियां एजेंसियों के लिए भी चुनौती बढ़ गई क्योंकि इसे रोकना,पहचान करना या काबू पाना आसान नहीं है। 2016 में अफगानिस्तान की सीमा सुरक्षा बल ने 9700 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट से लदी एक पाकिस्तानी ट्रक को बरामद किया  था अफगानिस्तान में कुख्यात आतंकी संगठनों की उपस्थिति से खतरा और भी बढ़ जाता है


केमिकल गैस के प्रभाव बेहद घातक होते है और यह सामूहिक विनाश का कारण बन सकती हैयह पर्यावरण के साथ स्नायु तंत्र को प्रभावित करती है और इसकी पहचान करना भी आसान काम नहीं हैइसी श्रृंखला में मस्टर्ड गैस,मस्टर्ड नाइट्रोजन और लिवि साईट जैसे रासायनिक तत्व भी आते हैइनका प्रभाव दीर्घकालीन और अत्यंत घातक होता हैसायनाइड का प्रयोग तो लिट्टे ने बखूबी किया भी था और वे सुरक्षा एजेंसियों के पकड़ में आने से बचने के लिए इसका उपयोग करते थेजिस प्रकार फेंटानिल को लेब या उद्योग में आसानी से बनाया जा सकता है उसी प्रकार फासजीन या डाई फासजीन गैस होती हैस्नायु तंत्र पर घातक प्रभाव डालने वाली इस गैस को भी सरल और सस्ते उपाय द्वारा छोटे उद्योगों में आसानी से उत्पादित किया जा सकता हैफॉसजेन को अब तक के सबसे घातक रासायनिक हथियारों में गिना जाता हैप्लास्टिक और कीटनाशक बनाने में इस्तेमाल होने वाली फॉसजेन गैस रंगहीन होती हैफॉसजेन से संपर्क में आते ही इंसान की सांस फूल जाती है, कफ बनने लगता है, नाक बहने लगती है। अमोनियम नाइट्रेट को लेकर भी यह आशंका बढ़ गई है। प्रथम विश्व युद्द में भी केमिकल हमलों के कारण ही लाखों लोग मारे गए थे


बहरहाल लेबनान की भयावह घटना के बाद जरूरत इस बात की है कि दुनिया भर में स्थापित केमिकल उद्योग को लेकर मजबूत वैश्विक नीति बने और इस पर कड़ाई से काम किया जाये। अधिकांश देशों में केमिकल विस्फोट या केमिकल हमलों से बचने के संसाधन नाकाफी है। लेबनान में अमोनियम नाइट्रेट के विस्फोट से प्रभावितों की मदद के लिए दुनिया भर के देश सामने आये है जबकि लेबनान की सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अपनी असमर्थता जताने में देर नहीं की।  जाहिर है इस प्रकार की घटनाएं सामूहिक विनाश का  कारण बन सकती है, इसको रोकने के लिए रासायनिक उद्योगों की संख्या को सीमित करने की जरूरत है। इसके साथ ही रासायनिक पदार्थों का उपयोग करने वाले लोगों,संस्थानों और शोध केंद्र की गतिविधियों के साथ उससे जुड़े कर्मियों पर कड़ी नजर,इसके व्यापार पर कड़ा सरकारी नियंत्रण और वैश्विक स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों में बेहतर समन्वय कायम करना समय की मांग की है।

 

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

रोम रोम में राम,rom rom me ram

    नया इंडिया                        

                                 रोम रोम में राम

 

                                                                      डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


इस देश के सर्वमान्य इष्ट पुरुष राम है,अनादिकाल से भारत का जनमानस राम को अपना पूर्वज,निर्माणकर्ता,पालनहार और मार्गदर्शक मानता रहा है राम नाम का प्रभाव हमारी आदिम संस्कृति पर इतना गहरा रहा है कि आदिवासी इलाकों के घटाटोप जंगल और घुप्प अंधेरे में राम राम से अभिवादन करने पर इसे स्नेह और मित्रता का प्रतीक मानकर डकैत भी लूटने का मन बदल देते है

राम के चरित्र की उच्चता में राजधर्म सदैव लोककल्याणकारी और परोपकारी नजर आता है और यह भावना भारतीय मूल्यों और आदर्शों में भी परिलक्षित होती रहीराजा हरिश्चंद्र का राज पाट छोड़कर जंगल में जाना हो या भीष्म का कर्तव्यपथ में शपथ लेकर आजीवन विवाह न करने की घोषणा में रामराज्य के आदर्शों की उद्घोषणा होती हैभारतीय संस्कृति और सभ्यता के घट घट में राम बसे है और यहां का जनमानस यह बखूबी जानता है कि  राम की अभिलाषा में लोक कल्याण है और उनका उद्देश्य मानवता की रक्षा करना रहारामायणकालीन  कैकयी को भी यह एहसास जल्दी ही हो गया था कि राजसुख  की भावना राम  में दूर दूर नहीं थीराम के चरित्र में भी यह देखने को मिला जब उन्होंने सोने की जीती हुई लंका बेहद सहजता से विभीषण को सौंप दी थी


राम के चरित्र की उच्चता और मानवीय  श्रेष्ठता अब भले ही  किताबों में हो लेकिन वे हर दौर और हर समय मानव समाज को मार्ग दिखलाती हैसदाचार से भटकते लंका नरेश और अपने भाई रावण को समझाने का सारा प्रयास निष्फल हो जाता है तो विभीषण भगवान श्री राम की शरण में जाते हैधर्म के मार्ग पर चलने वाले  विभीषण रावण से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते है कि तुम्हारी सभा पर काल का वास है, मैं अब प्रभु श्री राम की शरण लूंगाइसके बाद विभीषण लंका छोड़ देते हैचलते-चलते विभीषण प्रभु श्री राम के बारे में ही सोचते हैं कि जिनकी चरण पादुकाओं तक को भरत ने अपने मन से लगाया हुआ हैं आज उनके दर्शन पाने का मौका मिलेगा विभीषण मन ही मन ये विचार करते हुए चल रहे थे कि वानरों की नजर उन पर पड़ी उन्होंनें तुरंत वानरराज सुग्रीव को सूचना दी, सुग्रीव ने प्रभु श्री राम को बताया की रावण के भाई विभीषण हमारी ओर आ रहे हैंप्रभु श्री राम ने सुग्रीव की राय जानी तो उन्होंने बताया की ये इच्छानुसार रुप धारण कर सकते हैं जरुर इसमें इनकी कोई माया होगी ये जरुर हमारा भेद लेने के लिये आये होंगे इसलिये इन्हें बंदी बना लिया जाना चाहियेलेकिन प्रभु श्री राम ने कहा मेरा धर्म तो शरण में आये हुए के भय को दूर करना हैप्रभु के मुख से ये वचन सुनकर हनुमान को भी बहुत खुशी मिलीश्री राम आगे कहते हैं जब मनुष्य का मन निर्मल हो, कपट से दूर हो तभी वह उनके सामने आ सकता है अन्यथा उनके दर्शन नहीं कर सकता विभीषण ज्यों-ज्यों प्रभु के निकट आते त्यों त्यों उनमें प्रभु श्री राम के प्रति भक्ति और प्रेम की भावना बलवती होती जाती है


भगवान राम विभीषण की अंतरात्मा की उच्चता और शुद्धता को जानते थेवे विभीषण को गले लगाते है और रावण का सर्वनाश भी करते है। भारतीय जनमानस का जीवन दर्शन राम के बिना पूरा नहीं हो सकता,उसका जन्म मरण राम की आस्था में ही केंद्रित है। भारत भूमि पर जन्म लेने वाले जनमानस के लिए राजा तो एक मात्र राम ही है,राम नाम के बिना तो अंतिम शांति भी नहीं मिल सकती।

भारत के जनमानस पर राम की झलक देश के विभिन्न राज्यों में होने वाली राम लीला में हर काल में देखी जाती है और इससे मुगलकाल भी अछूता नहीं रहा।  कई क्षेत्रों में रामलीला के पात्रों की वेशभूषा में मुगलकाल की झलक दिखती हैहनुमान और अन्य वानरों के घाघरे राजस्थान और गुजरात से जोड़ते हैरामलीला में राक्षसों की रूप सज्जा में केरल शैली दिखती है,पारसी नाटकों का प्रभाव में इसमें दिख जाता है। इस प्रकार रामलीला में भारत के साथ दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों के जीवंत दर्शन होते है। रामलीला के कागज तथा बांस से बने रावण,मेघनाथ,जटायु,सुरसा,पर्वत,चारों फाटक,शेष नाग आदि की बनावट और कारीगरी में अनेक सभ्यताओं और संस्कृतियों का सुंदर समन्वय है और मोहर्रम के ताजियों की सजावट से भी इसकी  साम्यता गहरे संदेश देती है


बहरहाल मानवीय सम्बन्धों के आदर्श रूप राम युगों युगों से भारतीय संस्कृति की विशेषताओं को अभिव्यक्त करते रहे है,जनमानस को आनन्द और शांति प्रदान करते रहे हैभारत का हर नागरिक इस राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता पर राम के प्रभाव को भलीभांति जानता है और उस परम सत्ता को स्वीकार भी करता है


brahmadeep alune

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति, nepal vampanth

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