चेलाराम के सहारे पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों को खत्म करने की तैयारी,pak minorities

       नया इंडिया

      चेलाराम के सहारे पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों को खत्म करने की तैयारी

                                                               डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

भारत में एक कार्यक्रम के दौरान सलमान रूश्दी ने कहा था कि पूर्व क्रिकेटर और पाकिस्तान के राजनीतिक दल तहरीके इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान ने "फौज और मुल्लाओं से सांठ-गांठ कर रखी है। इमरान खान अल्पसंख्यकों को लेकर जिस नीति पर आगे बढ़ रहे है,उससे इसकी एक बार फिर पुष्टि होती है। दरअसल इस समय पाकिस्तान में सर्वाधिकारवादी राष्ट्रवाद कि उस परिकल्पना को साकार किया जा रहा है जिसके अनुसार माना जाता है कि बलिष्ठ व्यक्ति को दुर्बल पर शासन करने का अधिकार है। धार्मिक अल्पसंख्यकों को खत्म करने की प्रधानमंत्री की योजना में मददगार बने है उनकी पार्टी के एक सिपहसालार चेलाराम केवलानी।

वास्तव में संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को कुचलते हुए पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों कि भयावह स्थिति दुनिया के सामने बार बार आती रही है। साल 2014 में पाकिस्तान कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन कि घटनाओं को रोकने,ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग रोकने और अल्पसंख्यकों कि सुरक्षा के लिए देश में एक संवैधानिक निकाय का गठन होना चाहिए,जो स्वतंत्रता पूर्वक काम कर सके और सरकार को सलाह दे सके, जिससे देश के अल्पसंख्यकों कि सुरक्षा सुनिश्चित हो और उनकी बेहतरी के कार्य हो सके। इसके लिए एक आयोग बनाया गया था और उसकी अनुशंसा पर बिल पेश किया जाना था।


अदालत के आदेश के छह साल के बाद पाकिस्तान में एक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को मंजूरी मिली है। दिलचस्प यह है कि सरकार ने इस बिल को असेंबली से मंज़ूर कराने के बजाए कैबिनेट के एक फ़ैसले के तहत इस आयोग का बिल मंज़ूर कर लिया,जिसके बाद अध्यक्ष के रूप में चेला राम केवलानी को नामित करने का ऐलान किया गया। पाकिस्तान हिंदू परिषद के पूर्व अध्यक्ष और सिंध प्रांत में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता चेला राम केवलानी मूलत: चावल के बड़े व्यापारी है।  वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों कि स्थिति को बेहतर बताते रहे है और अत्याचार कि खबरों को पड़ोसी देश भारत और विश्व की मीडिया का प्रपोगंडा बताते रहे है।

आयोग में हिन्दू के अलावा ईसाई,पारसी,सिख को तो प्रतिनिधित्व दिया गया है लेकिन दलितों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। हालांकि इसमें काउंसिल ऑफ़ इस्लामिक आइडियोलॉजी के अध्यक्ष समेत दो मुस्लिम सदस्य भी इसका हिस्सा हैं। पाकिस्तान में सिंध प्रांत में दलितों का बाहुल्य है और इस समुदाय कि बेटियों के अपहरण कि बड़ी घटनाएँ होती है। जाहिर है इस आयोग में दलितों को कोई प्रतिनिधित्व न देकर इमरान खान ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इस समुदाय का धर्मांतरण होता रहेगा और उनकी आवाज चेलाराम भी नहीं उठाएंगे।



इमरान खान कि पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ कट्टरपंथियों कि पार्टी मानी जाती है और इसके सबसे ज्यादा प्रभाव वाले खैबर पख्तून क्षेत्र में यह देखा भी गया है। पिछले साल तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी से खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बारीकोट, स्वात इलाके से विधायक रह चुके बलदेव सिंह भारत आ गए हैं और उन्होंने मोदी सरकार से भारत में राजनैतिक शरण  की मांग कीबलदेव ने साफ कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत लगातार खराब होती जा रही है और वहां रह रहे अल्पसंख्यकों के लिए लंबी लड़ाई लड़े जाने की ज़रूरत है और यह पाकिस्तान में रहकर संभव नहीं था इसलिए मैं यहां आया हूं और अब साहस से वहां के लोगों की आवाज़ उठाउंगा।“

यदि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालात की बात की जाए तो स्थिति बेहद खतरनाक रही है। पाकिस्तान बनने के बाद जब पहली बार जनगणना की गई थी तो उस समय पाकिस्तान की तीन करोड़ चालीस लाख आबादी में से पांच प्रतिशत गैर-मुसलमान थे उपमहाद्वीप के बंटवारे के समय, पश्चिमी पाकिस्तान या मौजूदा पाकिस्तान में, 15 प्रतिशत हिंदू रहते थे इस समय उनकी संख्या मात्र 1.6 प्रतिशत रह गई और देश छोड़ने की एक बड़ी वजह असुरक्षा थीमानवाधिकार संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान से पलायन कर गई हिंदुओं की नब्बे प्रतिशत आबादी का कारण बढ़ती असहिष्णुता और सरकार की उदासीनता हैहिन्दुओं के साथ ही पाक में  अन्य अल्पसंख्यकों की स्थिति भी बहुत खराब है पाकिस्तान में हिंदुओं के बाद ईसाई दूसरा सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह हैं,पाकिस्तान में लगभग 18 करोड़ की आबादी में 1.6 प्रतिशत ईसाई हैं कई ईसाइयों को क़ुरान का अपमान करने और पैगंबर की निंदा करने के आरोपों में दोषी ठहराया जा चुका है,वास्तव में  ईसाइयों के ख़िलाफ़ ज़्यादातर आरोप व्यक्तिगत नफ़रत और विवादों से प्रेरित होते है जहां भारत का कानून बिना धार्मिक भेदभाव किये सभी को समान अधिकार देता है वहीं पाकिस्तान में ऐसा बिलकुल नहीं है। 


इमरान खान सेना,आतंकियों,आईएसआई और धार्मिक समूहों की एक मात्र पसंद है और उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से चुने जाने की हर संभव परिस्थितियां इसीलिए उपलब्ध कराई गई है जिससे वे देशमें निर्णायक बदलाव कर सके। इमरान खान ने कभी कुख्यात आतंकी हाफिज सईद की आलोचना नहीं कीआतंकियों से इसी प्रेम के कारण जब वह साल 2015 में पेशावर के तालिबान के हमले का निशाना बने आर्मी पब्लिक स्कूल पहुंचे तो हमले में मरने वाले बच्चों के परिजनों ने उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था और 'गो इमरान गो' के नारे लगाए थे

इमरान खान उस पार्टी का नेतृत्व करते है जो अल्पसंख्यकों की हितैषी नहीं हो सकती। वहीं वे देश के प्रधानमंत्री के रूप में भी अपनी पार्टी के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे है। जाहिर है इमरान खान ने बेहद चतुराई से एक व्यापारी और अपनी पार्टी के नेता चेलाराम को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाकर सेना,आतंकियों,आईएसआई और धार्मिक समूहों की उस योजना को साकार करने की और कदम बढ़ा दिये है जिसके अनुसार सभी अल्पसंख्यकों का धर्मांतरण हो जाए और देश में इसका प्रतिरोध भी खत्म हो जाए।

 

 


क्या मजदूरों की क्रांति से बदलेगा हिंदुस्तान, majdur kranti

सांध्य प्रकाश

                      क्या मजदूरों की क्रांति से बदलेगा हिंदुस्तान

                                                                                डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


मशहूर विद्वान मैक्स मूलर ने 1882 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में दिये अपने व्याख्यान में कहा था कि,“अगर हम सारी दुनिया कि खोज करें,ऐसे मुल्क का पता लगाने के लिए जिसे प्रकृति ने सबसे संपन्न,शक्तिवाला और सुंदर बनाया हो,जो कुछ हिस्सों में धरती पर स्वर्ग कि तरह है,तो मैं हिंदुस्तान की तरफ इशारा करूंगा।  अगर मुझसे  कोई पूछे कि किस आकाश के तले इंसान के दिमाग ने अपने कुछ सबसे चुने हुए गुणों का विकास किया है,जिंदगी के सबसे अहम मसलों पर सबसे ज्यादा गहराई के साथ सोच विचार किया है और उनमें से कुछ के ऐसे हल हासिल किए है जिन पर उन्हें भी ध्यान देना चाहिए,जिन्होंने अफलातून और कांट को पढ़ा है तो मैं हिंदुस्तान  की तरफ इशारा करूंगा।

हिंदुस्तान कोई देश या मुल्क न होकर दुनिया की सभ्यताओं और संस्कृतियों के साथ चलने वाली एक महान परंपरा है जिसने आदिकाल,प्राचीन काल और आधुनिक काल के बदलते प्रतिमानों को स्वीकार और अंगीकार करने का निरंतर विनम्रतापूर्वक साहस दिखाया है। पंडित जवाहर लाल नेहरू भारतीय संस्कृति को उस प्रवाह के समान समझते थे जो तमाम चुनौतियों से लड़ते और जूझते हुए मंजिल की तरफ बढ़ता रहता है और उसे तब्दीलियों से भी गुरेज नहीं होता।

यकीनन मैक्स मूलर और पंडित नेहरू कि बातों से इत्तेफाक हम रख सकते है। आखिर जिस भारत को हम देखते और जीते है वह ऐसा ही तो है। कभी यह बदलता भारत नजर आता है तो कभी संभलता भारत दिखाई देता है। लेकिन ज्ञान कि इस भूमि पर एक ऐसा वर्ग भी है जो चिंतन,मनन और स्पंदन में कही दूर ठिठका और स्थिर नजर आता है। दरअसल संस्कृति और सभ्यता की महान यात्रा के इस पड़ाव में मजदूर भी है, वह यह सच है कि धर्म और आस्था के सामने नतमस्तक इस भूमि पर मजदूर के घर में जन्म लेने वाले किसी ईश्वर या अवतारी पुरुष के बारे में कभी पढ़ाया नहीं गया। ऐसे में यह जान पाने की जिज्ञासा सदैव बनी रहती है कि किसी अवतार ने कभी मजदूर के यहाँ जन्म लिया भी था या नहीं। मैक्समूलर ने भारत के ज्ञान और संसाधनों कि जो दुनिया भर में पताका फहराई उसमें मजदूर नदारद है। वे शिक्षा से दूर होकर न तो ज्ञानी बन सके और न ही प्राकृतिक संसाधनों से उन्हें कुछ हासिल हो सका। जिस समय मैक्स मूलर कैम्ब्रिज में भारत की महानता को बता रहे थे ठीक उसके एक साल बाद 1883 में ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की थी कि वह यूरोपीय बाज़ारों से केवल उन वस्तुओं को ही खरीदेगी जो भारत में उपलब्ध नहीं होगी।  परंतु उन वस्तुओं कि संख्या में वृद्धि करने के कोई उपाय नहीं किए गए जिन्हें भारत में प्राप्त किया जा सकता था। वस्तुओं के क्रय विक्रय कि इस प्रक्रिया में मजदूर ही है क्योंकि वे निर्माण करने वाले सबसे बड़े स्रोत रहे है। ब्रिटिश कालीन भारत से लोकतांत्रिक भारत के सफर से मजदूरों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया। और न ही प्राकृतिक संपदा के उपयोग को लेकर औपनिवेशिक भारत से लेकर वर्तमान भारत कि नीतियों में कोई परिवर्तन हुआ।


मसलन काला सोना या कोयले के करोड़ों के काले कारोबार में मजदूर की स्थिति और अवस्था को ही देखे। वे मौत  की गुफा में घुसने और वहां से काला सोना पूँजीपतियों को सौंपने तक कभी खबर नहीं बन पाते,गुफा के धंस जाने से मरने पर कभी कभी वे खबरों में आ जाते है,अक्सर उनकी मौत की खबर छुपा ली जाती है।  अंग्रेजों के दौर में कोयला खानों में काम करने वाले अधिकांश आदिवासी होते थे। मजदूरी  बहुत कम होती थी और परिस्थितियाँ बेहद कष्टप्रद होती थी। महिलाएं और  बच्चे भी जमीन पर काम करते थे और उनका जीवन ऐसे ही बोझ ढोते ढोते खत्म हो जाता था। यह साम्राज्यवादी औपनिवेशिक गुलामी थी,जिसे झेलना आदिवासियों कि मजबूरी मानी गई होगी। लेकिन आज़ादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी धनबाद कि कोयला खदानों में चले जाइये,आदिवासियों कि अंग्रेजों कि दौर कि कहानी दुहराते हुए इस समय भी मिल जाएंगे।


महात्मा गांधी कहते थे कि भारत कि आत्मा गांवों में बसती है,गांवों का विकास कीजिये,देश का विकास होगा। बापू आज़ादी के आंदोलन कि जरूरत थे,अत: उनके साथ चलना सबकी मजबूरी थी। उनके जाते ही नजरों की शर्म का संकट खत्म हो गया। पंचायती राज के बहाने उन्हें याद किया जाता रहा लेकिन ऐसा किसी भी सरकार ने अपने व्यवहार और नीतियों से यह नहीं बताया कि बापू भारत की जरूरत है। महामारी के चलते आर्थिक संकट बढ़ा तो हमें स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की अचानक याद आ गई। इसे बहुत ही रचनात्मक विचार बताया गया। लेकिन यह अफसोस किसी के द्वारा नहीं जताया गया कि काश गांधी के रास्ते पर चले होते। 

दरभंगा की 13 साल की ज्योति ने अपने विकलांग पिता को साईकिल पर बैठाकर 12 सौ किलोमीटर का सफलतापूर्वक सफर तय करके अपने घर पहुँच गई तो उसकी जिंदगी बदल गई। ट्रंप की बेटी को ज्योति में महान भारत का मेहनती नागरिक नजर आया तो भारत की सरकार ने उसमें एक होनहार एथलीट को देखा। लेकिन ज्योति कोई अकेली नहीं है वह भारत के उन करोड़ों लोगो का प्रतिनिधित्व करती है जो बेबस और लाचार जिंदगी लिए गाँव की डगर डगर से शहर की गंदी बस्तियों में आम तौर पर अक्सर दिखता है। आने वाले समय में और कोई ज्योति अपने पिता को साईकिल पर सैकड़ों किलोमीटर ले जाने को मजबूर न होगी,इसकी कोई गारंटी नहीं है।

राघौगढ़ के मोहन बंजारा को ही ले लीजिये। वह बैलगाड़ी में अपनी बीवी और डेढ़ साल की बेटी के साथ कच्चे घरों को पोतने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी बेचता था। एक रोज वह अपनी बैलगाड़ी से सामान बेचने गुना जिले के जामनेर जा रहा था,तभी रास्ते में उसके बैल ने दम तोड़ दिया। रात काफी  हो चुकी थी। पत्नी राधोबाई और डेढ़ साल के बेटे पप्पू के साथ मोहन को समझ नहीं आया कि वह सड़क पर रात कैसे गुजारे,न जाए तो सुबह खाने का इंतजाम होना मुश्किल था।


ऐसे में मोहन ने नम आंखों से अपने मरे बैल को वहीं छोड़ा और बैलगाड़ी में दूसरे बैल के साथ खुद ही जुतने का फैसला किया। उसने 12 किलोमीटर गाड़ी खींची। इस दौरान उसकी पत्नी अपने डेढ़ साल के बेटे को साड़ी में कंधे में लटकाकर गाड़ी में धक्का लगाती रही। उसने पत्नी को बैलगाड़ी में बैठने को कहा,लेकिन उसे यह बात मंजूर नहीं थी कि पति गाड़ी अकेले खींचे। ऐसे में उसने अपने बेटे को साड़ी के पल्लू की झोली बनाकर उसमें कंधे से लटकाया और खुद भी गाड़ी में धक्का लगाने लगी।  दोनों ने मिलकर 12 किलोमीटर तक गाड़ी खींची और जामनेर पहुंच गए। समाचार पत्रों में यह खबर छपी तो कलेक्टर ने तुरंत मोहन को एक बैल दिला दिया।  यह घटना 2017 की है लेकिन 2020 में एक बार फिर ऐसी ही घटना सामने आ गई।  पलायन की भयावह और मार्मिक तस्वीरों के बीच राहुल अपने भैया भाभी के साथ इंदौर मुंबई हाइवे पर इसी तरह जा रहा था। एक तरफ बैल और दूसरी तरफ राहुल और बारी बारी से उसके भैया भाभी।

भारत में मजदूरों का जीवन इसलिए भी नहीं बदलता क्योंकि भारत की ज्ञान और विकास परंपरा में मजदूर अक्सर पीछे छुट जाते है। वे भगवान या राजाओं पर निर्मित परिकथाओं के जरिए टीवी या कॉमिक्स में कभी कभी सामने लाने का प्रयास किए जाते है। जैसे अकबर जनता का हाल जानने को निकले तो उन्हें पता चला कि लोग कितने परेशान है।

लेकिन गरीब न तो तब अपनी परेशानी किसी को बता पाते थे और न ही अब बता पाते है। राजतंत्र में उनकी गिनती होती नहीं थी और लोकतंत्र में उन्हें थोड़े से पैसे और रोटी के पैकेट से खुश होने वाला वर्ग माना जाता है। ऐसे में वह दबंगों या पुलिस के द्वारा पीट भी दिये जाए तो किसी को कोई फर्क न पड़ता। वह सिकंदर के भगौड़े सैनिक भी न बन पाये जो गरीबी से अपनी जान बचा ले। यह कहानी तो आपने सुनी ही होगी। सिकन्दर महान ने अपने दो भगोड़े सैनिकों को मौत की सजा सुनाई।  उनमें से एक यह जानता था कि घोड़े सिकन्दर को बहुत पसंद हैं। वह अपने घोड़ों से बहुत प्रेम करता था। उसने सिकन्दर से कहा- अगर आप मेरी जान बख्श दें तो मैं आपके घोड़े को एक साल में उड़ने की कला सिखा सकता हूँ। ऐसा होने पर आप दुनिया के इकलौते  उड़ने वाले घोड़े पर सवारी कर सकेंगे।


यह बात उसने कुछ इस प्रकार कही कि सिकन्दर सहित वहाँ उपस्थित लोगों को भी लगा कि वह घोड़े को उड़ना सिखा सकता है। सिकन्दर उसकी बात मान गया और उसने एक साल का समय उसे घोड़े को उड़ने की कला सिखाने के लिये दे दिया।  साथ ही उसने यह शर्त भी रख दी कि यदि वह घोड़े को उड़ना नहीं सिखा पाया तो उसका सर उसके धड़ से अलग कर दिया जाएगा। उस सैनिक ने सिकन्दर की बात को स्वीकार कर लिया।

उसका दूसरा साथी यह जानता था कि यह कार्य असंभव है और उसके साथी ने मात्र एक साल का समय लेने के लिये यह सब किया है।

उसने उससे कहा- तुम जानते हो कि तुम घोड़े को उड़ना नहीं सिखा सकते तब तुमने इस प्रकार की बात कैसे की और कैसे सिकन्दर ने इस शर्त को मान लिया ? जबकि तुम केवल अपनी मृत्यु को एक साल के लिये टाल रहे हो।

ऐसी बात नहीं है। मैंने अपनी जान बचाने के लिये तीन मौके लिये हैं। पहली बात यह कि सिकन्दर महान एक साल के भीतर मर सकता है।  दूसरा यह कि एक साल के भीतर मैं मर सकता हूँ।  तीसरी बात यह कि यह घोड़ा मर सकता है।

फिर ऐसा हुआ कि एक साल के भीतर सिकन्दर की मौत हो गई और वह कैदी हमेशा के लिये आजाद हो गया।

वास्तव में भगौड़ा सैनिक पढ़ा  लिखा और चतुर था,सो उसे बच निकलने का विचार आया और वह संयोगवश सफल भी हो गया। लेकिन भारत के मजदूर तो रेल कि पटरी पर इसलिए सो जाते है कि उन्हें पता होता है कि रेलगाडियाँ लॉक डाउन में बंद है अत: कोई खतरा नहीं है। मजदूर इस बात से अनभिज्ञ होते है कि रेल गाड़ियों में माल गाडियाँ और इंजन भी होते है,और ऐसा ही एक इंजन मजदूरों को मौत की नींद सुलाकर आगे बढ़  गया।


यह भी बेहद दिलचस्प है कि ब्रिटेन जैसे औपनिवेशिक देश में अधिकांश सत्ता में रहना वाला दल लेबर या मजदूर पार्टी है। इस महामारी काल में विभिन्न राज्यों से पैदल गुजरते हुए मजदूरों कि बदहाली से यह तो साफ हो ही गया कि मजदूरों  के प्रति गंभीर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कोई दल नहीं है। भारत में किसान आंदोलन,दलित आंदोलन,पिछड़ा वर्ग के आंदोलन,आरक्षण कि मांग को लेकर आंदोलन,क्षेत्र और भाषा को लेकर बहुत आंदोलन हुए है। इन सबसे बड़ा वर्ग तो मजदूरों का है,उनका आंदोलन आज तक क्यों न हुआ। मजदूरों मौन आंदोलन ही कर ले,विश्वास कीजिये इस देश कि साँसे थम जाएगी। आखिर मजदूर देश और समाज  के ज़िंदा रहने के लिए जरूरी ऑक्सीजन है, कुछ समय के लिए यह ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाए,स्थितियाँ बेशक सुधर जाएगी। हिंदुस्तान के बदलने और मजदूरों की समस्या को समझने के लिए मजदूरों को मौन होने का बलिदान देना ही होगा।


ऑपरेशन ब्लू स्टार -स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ना क्यों जरूरी था,operation blue star

सांध्य प्रकाश

     ऑपरेशन ब्लू स्टार -स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ना क्यों जरूरी था

                                                                              डॉ.ब्रह्मदीप अलूने 


इतिहास को दबाओं और पूर्वाग्रह से मुक्त कर यदि सभी भारतीय एक स्वर में आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान करने के किसी अवसर की तलाश कर रहे हो तो उनके लिए आज का दिन नजीर पेश करता है। 6 जून 1984  को भारतीय सेना ने आतंक के खिलाफ़ बिगुल बजाते हुए पवित्र स्वर्ण मंदिर में कब्ज़ा जमाएँ खालिस्तान समर्थक  चरमपंथियों को मार गिराया था।

यह वह दौर था जब पाकिस्तान की शह पर पंजाब आतंकवाद से जल रहा था और पृथकतावादी ताकतें खालिस्तान के नाम पर निरंतर सिर उठा रही थी।1984 में सिक्ख चरमपंथी जरनैलसिंह और उसके समर्थकों ने सिक्खों के सबसे पवित्र स्थान अमृतसर स्थित विश्वप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर पर कब्ज़ा कर भारतीय एकता,अखंडता और संप्रभुता को चुनौती दे डाली। पंजाब के ऐतिहासिक शहर अमृतसर को सिक्ख धर्म का पवित्र शहर माना जाता है। सिक्ख धर्मावलंबियों का पावनतम धार्मिक स्थल या सबसे प्रमुख गुरुद्वारा श्री हरिमंदिर साहिब जिसे दरबार साहिब या स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है, यहीं स्थित है। इसकी स्थापना दिसंबर 1585 में सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुनदेव ने की थी। सिक्ख गुरु को ईश्वर तुल्य मानते हैं.,स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सिर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं।

खालिस्तान समर्थकों को यह विश्वास था की वे सिक्खों के सबसे बड़े धार्मिक स्थल पर कब्ज़ा जमा कर सरकार से मनचाही मांगे मनवा लेंगे। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी इतिहास में अपने सख्त फैसलों के लिए ही पहचानी जाती है। उन्होनें चरमपंथियों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ने का फ़ैसला कर स्वर्ण मंदिर को उनसे मुक्त करने का आदेश सेना को दे दिया और इस प्रकार 5 जून 1984 को शाम 7 बजे ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हुआ।



जनरल के.एस.बरार के नेतृत्व में सेना का यह अभियान आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक कड़ा सन्देश था। हालांकि सेना स्वर्णमंदिर और अकाल तख्त की पवित्रता और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थी और उन्हें किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती थी,लेकिन आतंकी सरगना भिंडरावाला इसकी आड़ में सेना को भारी नुकसान पहुंचा रहा था। ऐसी परिस्थितियों में सेना को अंततः टैंक का सहारा लेना पड़ा। चरमपंथियों के जबरदस्त प्रतिरोध के बावजूद सेना भारी पड़ी और भिंडरावाले को समर्थकों समेत मार गिराया गया। 6  जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार आतंक के खात्में के कड़े सन्देश के साथ समाप्त हो गया। न्याय के महान पथप्रदर्शक गुरु अर्जन देव द्वारा स्थापित ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों को खदेड़ कर उसकी पवित्रता की रक्षा की गयी,और राष्ट्रहित के लिए ये आवश्यक भी था।लेकिन इस कार्रवाई से सिखों के आस्था के केंद्र की इमारत को भारी नुकसान हुआ।

ऑपरेशन ब्लू स्टार तो समाप्त हो गया लेकिन स्वर्ण मंदिर के आधार पर सिक्खों की धर्मिक भावनाएं भड़काने की पुरजोर कोशिश पाकिस्तान द्वारा लगातार की गयी। वास्तव में 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके इंदिरा गाँधी ने दुश्मन देश को जो घाव दिया था ,वह उनके लिए नासूर बन गया था। जुल्फिकार अली भुट्टों को फांसी पर चढ़ाकर भी पाक हुक्मरानों की आग ठंडी नहीं हुई तो उन्होंने खालिस्तान के नाम पर सिख आतंकवाद को बढ़ावा देना प्रारंभ किया। पाकिस्तान की यह चाल कामयाब रही और पंजाब आतंकवाद की आग में जलने लगा। लेकिन इंदिरा गाँधी राष्ट्र हित के लिए किसी भी कदम को उठाने से कभी पीछे हटती नहीं थी। उन्होनें स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ कर पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया को यह सन्देश दिया की भारत की एकता और अखंडता को तोड़ने की किसी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।


हालांकि ऑपरेशन ब्लू स्टार का सहारा लेकर सिक्खों को प्रभावित करने की पाकिस्तानी कोशिशें जारी रही जिससे कई युवा सरदार आतंकी गतिविधियों से जुड़ गये,उन्हें बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद,सामरिक और आतंकी प्रशिक्षण सीमा पार से दिए गये। इस बीच सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को चेतावनी दी गयी की वे सिक्खों से सावधान रहे और अपने सिक्ख अंगरक्षकों को बदल ले। इस देश की आन बान और शान की रक्षा के लिए सिक्खों ने कई बलिदान दिए है और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को यह मंजूर नहीं था की वे उन पर भरोसा न करें। धर्म अफ़ीम के नशे से ज्यादा मदहोश कर देता है और अंततः पाकिस्तान अपनी साजिश में कामयाब रहा। 31 अक्तूबर 1984 को भारत की महान नेता इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही अपने सिक्ख अंगरक्षकों द्वारा कर दी गयी। स्वर्ण मंदिर को धार्मिक अपमान से जोड़कर पाकिस्तानी कुप्रचार के प्रभाव से इंदिराजी के अंगरक्षक भी बच नहीं पायें और उन्होनें देश की एक जांबाज नेता को गोलियों से भून दिया। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उन्होंने बहादुरी, दिलेरी और साहस की जो मिसाल कायम की है उसे शायद ही कोई छू पाए।


इतिहास कितना निर्मम हो सकता है जब उसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाये। स्वर्ण मंदिर को आतंकियों से मुक्त करवानें की कार्रवाई को इंदिराजी के गलत निर्णयों में शुमार कर विष वमन करने की  कोशिशें कभी थमी नहीं। लेकिन देश को यह एहसास है की  भारत की सर्वप्रिय और कभी न झूकने वाले देशभक्तिपूर्ण जज्बें की प्रतीक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने एक उदार धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संकल्प और शक्ति के साथ स्वर्ण मंदिर को खालिस्तानी आतंकवादियों से आज़ाद करवाने का यह कड़ा और दूरगामी फ़ैसला किया था।


हांगकांग में लोकतंत्र खत्म करने को आमादा चीन,hankang mei loktantr khtam karne ko aamada china

दैनिक जागरण,राष्ट्रीय                

                हांगकांग में लोकतंत्र खत्म करने को आमादा चीन

                                                                        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


                                                                      

उदारवादी संवैधानिक लोकतंत्र की अवधारणा को ही खारिज करने वाले साम्यवादी चीन के लिए हांगकांग की स्वायत्ता किसी शूल की तरह चुभती रही है। ब्रिटेन के उदार लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा रहे हांगकांग पर 1997 में चीन का आधिपत्य हो गया था लेकिन इस देश की जनता साम्यवादी व्यवस्था और अनचाहे नियंत्रण को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। इस समय हांगकांग में चीन विरोधी कड़े प्रदर्शन हो रहे है,वहीं लोकतांत्रिक विरोध को कुचलने को तैयार चीन ने इसे राष्ट्र विरोधी ताकतों की करतूत बताकर एक नया कानून लागू करने की तैयारी कर ली है। इस कानून के आने से अभिव्यक्ति की आज़ादी,सत्ता का विरोध और प्रदर्शन का अधिकार खत्म हो जाएगा। चीन ने हांगकांग में एक सुरक्षा एजेंसी स्थापित करने की बात भी कही है। हांगकांग के लोगों को डर है कि चीन मनमाने तरीके से इन क़ानूनों का दुरुपयोग करके उनकी आज़ादी को खत्म कर देगा।

1997 में जब ब्रिटेन से हांगकांग को चीन के हवाले किया गया था तब दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ था जिसके अनुसार बीजिंग ने 'एक देश-दो व्यवस्था' की अवधारणा के तहत कम से कम 2047 तक लोगों की स्वतंत्रता और उनकी क़ानून-व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी दी थी। अब चीन हांगकांग में जो कानून  लागू करने  जा रहा है वह लोगों की आज़ादी को प्रभावित करने वाला है और इसीलिए दुनिया भर के करीब 200 नेताओं ने एक साझा बयान जारी कर चीन की  आलोचना की है। इस साझा बयान में चीन की योजना को ऐतिहासिक जॉइंट डिक्लेरेशन का खुला उल्लंघन बताया गया है।

हांगकांग दुनियाभर कि व्यापारिक कंपनियों का बड़ा और सुरक्षित केंद्र माना जाता है,लेकिन अमेरिका ने अब हांगकांग को दी जाने वाली सुविधाओं और सहूलियतों को बंद करने कि बात कही है। कोरोना संकट को लेकर चीन से पहले से ही नाराज अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि हांगकांग में जो कुछ भी चीन की ओर से किया जा रहा है उससे साफ़ हो जाता है कि यहां स्वायतत्ता जैसी अब कोई बात नहीं रही। पॉम्पियो ने कहा कि अमरीकी क़ानून के तहत हांगकांग जो दर्जा मिला था अब वो नहीं रहेगा और चीन की तरह ही उसके लिए भी सामान्य नियम होंगे। जाहिर है आने वाले समय में हांगकांग कि व्यापार को लेकर वैश्विक पहचान खत्म होने का संकट भी गहरा गया है।


हालांकि हांगकांग को लेकर चीन कि नियत पर पिछले कई सालों से सवाल उठ रहे है। साल 2014 में बीजिंग ने कहा था कि वो मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष के सीधे चुनाव की इजाज़त देगा,लेकिन केवल पहले से अधिकृत उम्मीदवारों की सूची से ही इनका चुनाव होगा। चीन का यह हांगकांग की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पहला बड़ा हमला था। जिसके अनुसार चीन ने अपने समर्थन करने  वाले उम्मीदवारों को अधिकृत कर हांगकांग की स्वायत्ता को प्रभावित कर दिया। इसके बाद ज़्यादा लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के साथ 'ऑक्यूपाई सेंट्रल प्रोटेस्ट' हुआ था। जहां छाते हाथों में लिए प्रदर्शनकारियों ने विरोध किया था और इसे अंब्रेला मूवमेंट कहा गया।

व्यापक विरोध के  बावजूद चीन ने बेहद रणनीतिक तरीके से हांगकांग के लोकतन्त्र का अधिग्रहण कर लिया है,वहां  की नागरिक असेंबली में बैठे 50 फ़ीसदी सदस्य बिजनेसमेन है और वे अपने व्यापारिक हितों के लिए बीजिंग पर भरोसा करते है। यहां चुनाव समिति में 1200 सदस्य हैं और ज़्यादातर का झुकाव बीजिंग की नीतियों की ओर होता है।  ऐसे में  हांगकांग का चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव वहीं बनता है जिसे बीजिंग का समर्थन प्राप्त हो और वो भी उसकी नीतियों से सहमत हो। संकट यह भी है की हांगकांग की सरकार अपनी जनता से ज्यादा चीन के समर्थन में  खड़ी नजर आती है और इसीलिए आम जनता का भरोसा सरकार और प्रशासन से टूट रहा है। आंदोलनकारी न तो पुलिस पर भरोसा करते है और न ही अपने देश मे प्रशासक पर। इसलिए यह प्रदर्शन हिंसक हो गया है। बीजिंग यहां पूर्ण नियंत्रण को बनाए रखना चाहता है और इसलिए अर्ध-स्वायतत्ता वाले इस क्षेत्र में पूर्ण लोकतंत्र की अनुमति नहीं देना चाहता है।


साल 2017 में चीन ने हांगकांग को लेकर और ज्यादा मुखर होते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि हांगकांग में निर्धारित निर्वाचन में भाग लेने वाले प्रत्याशियों के नाम का चयन चीन के साम्यवादी दल के द्वारा किया जाएगा।  हांगकांग के लोगों ने चीन की इस नीति को अपने मौलिक और पारम्परिक अधिकारों पर अवैध अतिक्रमण माना और यही से विरोध शुरू हुआ।  हांगकांग के लोगों का मानना है कि उनके प्रतिनिधि के चयन का अधिकार उन्हें होना चाहिए।

चीन जहां वैश्विक विरोध को दरकिनार करके हांगकांग कि स्वायत्ता को खत्म करने कि और बढ़ रहा है वहीं हांगकांग के समर्थन में डोनाल्ड ट्रंप ने अग्रगामी कदम उठाएँ है। अमरीका ने पिछले साल  हांगकांग मानवाधिकार और लोकतंत्र विधेयक पास किया था। इसके तहत अमरीका उन लोगों को प्रतिबंधित कर सकता है जो अधिकारी हांगकांग में मानवाधिकारों के उल्लंघन के ज़िम्मेदार होंगे। अमरीका वीज़ा पाबंदी लगा सकता है या संपत्ति जब्त कर सकता है।


हांगकांग में ब्रिटेन समेत अन्य देशों के लाखों लोग रहते है और इसी कारण हांगकांग का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। हांगकांग को लेकर चीन की नीतियों के विरोध में लंदन,मेलबर्न और सिडनी में भी प्रदर्शन हुए है और चीन ने इसे अपने आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप करार दिया है। इस समय चीन हांगकांग में जो कानून लागू करने जा रहा है उसके  हांगकांग के मामलों में दखलंदाज़ी करने वाली विदेशी ताक़तों की गतिविधियां भी अपराध की श्रेणी में आएंगी। जाहिर है इस समय विदेशी मूल के लाखो लोग हांगकांग में रहते है,उन्हें रोकने के लिए भी इस कानून का प्रयोग किया  जा सकेगा।

अमेरिका ने अपने देश में हांगकांग मानवाधिकार एवं लोकतंत्र अधिनियम,2019 बिल को कानून का रूप दे दिया है। यह कानून मानवाधिकारों के  उल्लंघन पर प्रतिबंधों का उपबंध करता है। इसके बाद हांगकांग की पुलिस को ऐसा सामान निर्यात नहीं हो सकेगा जिससे प्रदर्शनकारियों को नुकसान पहुंचाया जा सके। इससे हांगकांग के लोग उत्साहित है।

हांगकांग में चीन का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकारी दफ्तरों,चीन की सेना के स्थानीय मुख्यालय और शहर की संसद के बाहर जमा होकर चीनी नीतियों के विरोध में व्यापक प्रदर्शन  हो रहे है। पिछले साल चीन के साम्यवादी पार्टी के आयोजनों का हांगकांग में बहिष्कार किया गया था और चीनी राष्ट्रगीत के प्रति असम्मान दिखाया। हांगकांग की संसद में घुसकर यहाँ के युवा ब्रिटिश कालीन झण्डा फहराकर चीन के प्रति अपना गुस्सा जता चुके है।

माओ का कहना था कि समस्त सिद्धांत को प्रयोग कि कसौटी पर कसना चाहिए,और जहां वह खरा न उतरे उसे अस्वीकार कर देना चाहिए। वन चाइना की नीति  पर भरोसा करने वाले चीन ने माओ के विचारों पर चलते हुए हांगकांग को लेकर एक देश-दो व्यवस्थ” की अवधारणा को खत्म करने की और मजबूती से कदम बढ़ा लिए है। वहीं वैश्विक विरोध से चीन को रोका जा सके इसकी संभावना कम ही नजर आती है।

 


नाकाम ट्रम्प का अतिराष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी दांव,nakam trump ka atirashtrvadi aur dkshinpanthi danv


नया इंडिया

             नाकाम ट्रम्प का अतिराष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी दांव

                                                                        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

दक्षिणपंथी राजनीति के केंद्र में राष्ट्रवाद को रखकर जनमानस को मूल समस्याओं से गुमराह करने के रास्ते पर दुनिया की कई सरकारें है। कोरोना से पूरी दुनिया प्रभावित है लेकिन दक्षिणपंथी सरकारें इसमें ऐसे अवसर खोज रही है जिससे सत्ता पर उनकी दावेदारी मजबूत हो सके। आने वाले सालों में कई देशों की सत्ताएं जातीय,नस्ल और धर्म का सहारा लेकर अपनी नीतिगत नाकामियों को छुपाने का प्रयास कर सकती है और समाज के लिए यह हिंसक और घातक हो सकता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ट्रम्प की राजनीति पर तंज कसते हुए इस खतरे की और दुनिया को आगाह किया है,उन्होंने कहा “कोई बहुत अच्छी सरकार होती तो उसके साथ भी बुरा हो सकता था लेकिन अगर कोई ये धारणा रखे कि 'इसमें मेरे लिए क्या अवसर है' तो बर्बादी का रास्ता है

दरअसल अमेरिका में एक काले नवयुवक की एक गोरे पुलिस अधिकारी द्वारा निर्मम हत्या के बाद पूरा देश हिंसा की चपेट में आ गया है देश भर में हिंसक प्रदर्शन हो रहे है और कम से कम 40 शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है कोरोना के कहर से बुरी तरह प्रभावित अमेरिका में नस्लीय भेदभाव को लेकर जिस प्रकार विरोध प्रदर्शन हो रहे है,वह अभूतपूर्व हैइस समय अमेरिकी लोग चाहते है कि राष्ट्रपति उनसे बात करे या देश के नाम उनका सम्बोधन हो,लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने पद और दायित्व को दरकिनार कर अपनी परम्परावादी नीतियों का इजहार अपनी  बातों में भी किया है  उन्होंने विरोध प्रदर्शनों की आलोचना करते हुए इसे आतंकवादी और अमेरिकी विरोधी ताकतों द्वारा पोषित बताया है ट्रम्प यही नहीं रुके और उन्होंने देश में सेना तैनात करने की बात भी कह डाली अमेरिका में इस साल के अंत में राष्ट्रपति के चुनाव होने है और उनके इस बयान को देश के बिगड़े हालत को और बिगाड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है


यह भी बेहद दिलचस्प है कि अमेरिका के एक प्रमुख पुलिस अधिकारी ने ट्रम्प को मुंह बंद रखने की नसीहत देते हुए कहा कि आप लोगों को ख़तरे में डाल रहे हैं यह समय लोगों के दिल जीतने का है ना कि उन्हें धमकाने काहमें नेतृत्व की ज़रूरत है,लेकिन नेतृत्व हमें दुखी कर रहा है आप एक राष्ट्रपति हैं और उसके लिहाज़ से फ़ैसले लीजिए. यह हॉलीवुड नहीं है,यह असली जीवन है और यह ख़तरे में है

अमेरिका में ट्रम्प के उदय के बाद वहां की राजनीति जिस प्रकार व्यवहार कर रही है उससे यह तो साफ हो ही जाता है कि मध्ययुगीन विचारधारा के बूते आधुनिक समाज को चलाने की कोशिश से सत्ता तो हासिल की जा सकती है लेकिन राष्ट्र के लिए यह धीमे जहर से हो जाता है। अमेरिका का समाज मिश्रित और खुला माना जाता है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर लोग बेहद मुखर है। अमेरिका में दुनिया भर के धर्म और संस्कृतियां सालों से साथ रहती आई है अत: अमेरिकी समाज के आचरण और व्यवहार पर दुनिया भर की नजर होती है। ट्रम्प ने अपनी चुनावी रैलियों में अमेरिका की मूल पहचान बनाएं रखने के नाम पर लोगो का समर्थन माँगा था और 50 से अधिक उम्र के लोगों ने ट्रम्प की नीतियों का खुलकर समर्थन किया। ट्रम्प अपनी विभाजनकारी नीतियों से अमेरिका के राष्ट्रपति तो बन गए लेकिन दुनिया भर में इसका यह सन्देश गया कि अमेरिका भी उन देशों में तेजी से शामिल हो रहा है जो विविधता को समाप्त कर मध्ययुगीन काल की परम्पराओं को अपनाना बेहतर समझते है। ट्रम्प के आने के बाद देश में नस्लीय हमलें भी बढ़े और वैश्विक संगठनों को चुनौतियां भी दी गई।


 

राष्ट्रपति ट्रम्प की नीतियों और राजनीतिक व्यवहार में नस्लीय भेदभाव दिखता रहा है। अमेरिका में इस समय नस्लीय भेदभाव को लेकर जो विरोध प्रदर्शन हो रहे है उनके प्रति भी ट्रम्प का आक्रामक रवैया बरकरार है। कोरोना से निपटने में ट्रम्प की नाकामी के चलते बड़ी संख्या में अमेरिकी मारे जा रहे है और राष्ट्रपति अमेरिका समाज के निशाने पर है। इस बीच एक अश्वेत की मौत से उठे बवाल में ट्रम्प ने राष्ट्रवाद का पासा फेंककर अपने को उत्कृष्ट मानने वाले गोरे अमेरिकियों के समर्थन हासिल करने की कोशिश की है।  अमेरिका में नस्लवाद की हकीकत से बराक ओबामा भी बच नहीं पाए थे। उन्होंने यह स्वीकार किया था की नस्लभेद अमेरिका के डीएनए में है और लोग नस्लीय मानसिकता से नहीं उबर पाएं है। लेकिन नस्लवाद का फायदा लेकर अमेरिकी समाज को कोई राष्ट्रपति बांटने की कोशिश करें, यह अमेरिका के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है

अमेरिका के साझा समाज की वैश्विक छवि को धूमिल कर ट्रम्प पुनः सत्ता में आने की जो हिंसक राजनीति कर रहे है,वह पूरी दुनिया के लिए खतरे के संकेत है कोरोना काल में कई देशों के नागरिक अपनी सरकारों से नाराज है और सत्ता परिवर्तन की पूर्ण संभावनाएं बनी है ऐसे में दक्षिणपंथी सरकारें अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अति राष्ट्रवाद का सहारा ले सकती है। अतिराष्ट्रवाद  को हथियार बनाकर जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने के इतिहास में कई उदाहरण है। तानाशाहों के लिए सत्ता में बने रहने का यह प्रमुख अस्त्र माना जाता था। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में दक्षिणपंथी सरकारें तानाशाहों की तरह ही शासन करना पसंद करती है,जाहिर है ऐसे देशों के नागरिकों को सावधान हो जाना चाहिए,क्योंकि आने वाला दौर यदि दक्षिणपंथ को उभार देने वाला हुआ तो निश्चित ही यह समूची दुनिया को कबीलाई युग में पहुंचा देगा

 


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लद्दाख पर अमेरिकी चिंता laddakh china amerika janstta

  जनसत्ता                                दुर्गम हिमालयीन क्षेत्र में स्पष्ट सीमा रेखा का प्रश्न उठाकर वास्तविक नियंत्रण रेखा के अस्...