मंगलवार, 4 अगस्त 2020

रोम रोम में राम,rom rom me ram

    नया इंडिया                        

                                 रोम रोम में राम

 

                                                                      डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


इस देश के सर्वमान्य इष्ट पुरुष राम है,अनादिकाल से भारत का जनमानस राम को अपना पूर्वज,निर्माणकर्ता,पालनहार और मार्गदर्शक मानता रहा है राम नाम का प्रभाव हमारी आदिम संस्कृति पर इतना गहरा रहा है कि आदिवासी इलाकों के घटाटोप जंगल और घुप्प अंधेरे में राम राम से अभिवादन करने पर इसे स्नेह और मित्रता का प्रतीक मानकर डकैत भी लूटने का मन बदल देते है

राम के चरित्र की उच्चता में राजधर्म सदैव लोककल्याणकारी और परोपकारी नजर आता है और यह भावना भारतीय मूल्यों और आदर्शों में भी परिलक्षित होती रहीराजा हरिश्चंद्र का राज पाट छोड़कर जंगल में जाना हो या भीष्म का कर्तव्यपथ में शपथ लेकर आजीवन विवाह न करने की घोषणा में रामराज्य के आदर्शों की उद्घोषणा होती हैभारतीय संस्कृति और सभ्यता के घट घट में राम बसे है और यहां का जनमानस यह बखूबी जानता है कि  राम की अभिलाषा में लोक कल्याण है और उनका उद्देश्य मानवता की रक्षा करना रहारामायणकालीन  कैकयी को भी यह एहसास जल्दी ही हो गया था कि राजसुख  की भावना राम  में दूर दूर नहीं थीराम के चरित्र में भी यह देखने को मिला जब उन्होंने सोने की जीती हुई लंका बेहद सहजता से विभीषण को सौंप दी थी


राम के चरित्र की उच्चता और मानवीय  श्रेष्ठता अब भले ही  किताबों में हो लेकिन वे हर दौर और हर समय मानव समाज को मार्ग दिखलाती हैसदाचार से भटकते लंका नरेश और अपने भाई रावण को समझाने का सारा प्रयास निष्फल हो जाता है तो विभीषण भगवान श्री राम की शरण में जाते हैधर्म के मार्ग पर चलने वाले  विभीषण रावण से अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते है कि तुम्हारी सभा पर काल का वास है, मैं अब प्रभु श्री राम की शरण लूंगाइसके बाद विभीषण लंका छोड़ देते हैचलते-चलते विभीषण प्रभु श्री राम के बारे में ही सोचते हैं कि जिनकी चरण पादुकाओं तक को भरत ने अपने मन से लगाया हुआ हैं आज उनके दर्शन पाने का मौका मिलेगा विभीषण मन ही मन ये विचार करते हुए चल रहे थे कि वानरों की नजर उन पर पड़ी उन्होंनें तुरंत वानरराज सुग्रीव को सूचना दी, सुग्रीव ने प्रभु श्री राम को बताया की रावण के भाई विभीषण हमारी ओर आ रहे हैंप्रभु श्री राम ने सुग्रीव की राय जानी तो उन्होंने बताया की ये इच्छानुसार रुप धारण कर सकते हैं जरुर इसमें इनकी कोई माया होगी ये जरुर हमारा भेद लेने के लिये आये होंगे इसलिये इन्हें बंदी बना लिया जाना चाहियेलेकिन प्रभु श्री राम ने कहा मेरा धर्म तो शरण में आये हुए के भय को दूर करना हैप्रभु के मुख से ये वचन सुनकर हनुमान को भी बहुत खुशी मिलीश्री राम आगे कहते हैं जब मनुष्य का मन निर्मल हो, कपट से दूर हो तभी वह उनके सामने आ सकता है अन्यथा उनके दर्शन नहीं कर सकता विभीषण ज्यों-ज्यों प्रभु के निकट आते त्यों त्यों उनमें प्रभु श्री राम के प्रति भक्ति और प्रेम की भावना बलवती होती जाती है


भगवान राम विभीषण की अंतरात्मा की उच्चता और शुद्धता को जानते थेवे विभीषण को गले लगाते है और रावण का सर्वनाश भी करते है। भारतीय जनमानस का जीवन दर्शन राम के बिना पूरा नहीं हो सकता,उसका जन्म मरण राम की आस्था में ही केंद्रित है। भारत भूमि पर जन्म लेने वाले जनमानस के लिए राजा तो एक मात्र राम ही है,राम नाम के बिना तो अंतिम शांति भी नहीं मिल सकती।

भारत के जनमानस पर राम की झलक देश के विभिन्न राज्यों में होने वाली राम लीला में हर काल में देखी जाती है और इससे मुगलकाल भी अछूता नहीं रहा।  कई क्षेत्रों में रामलीला के पात्रों की वेशभूषा में मुगलकाल की झलक दिखती हैहनुमान और अन्य वानरों के घाघरे राजस्थान और गुजरात से जोड़ते हैरामलीला में राक्षसों की रूप सज्जा में केरल शैली दिखती है,पारसी नाटकों का प्रभाव में इसमें दिख जाता है। इस प्रकार रामलीला में भारत के साथ दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों के जीवंत दर्शन होते है। रामलीला के कागज तथा बांस से बने रावण,मेघनाथ,जटायु,सुरसा,पर्वत,चारों फाटक,शेष नाग आदि की बनावट और कारीगरी में अनेक सभ्यताओं और संस्कृतियों का सुंदर समन्वय है और मोहर्रम के ताजियों की सजावट से भी इसकी  साम्यता गहरे संदेश देती है


बहरहाल मानवीय सम्बन्धों के आदर्श रूप राम युगों युगों से भारतीय संस्कृति की विशेषताओं को अभिव्यक्त करते रहे है,जनमानस को आनन्द और शांति प्रदान करते रहे हैभारत का हर नागरिक इस राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता पर राम के प्रभाव को भलीभांति जानता है और उस परम सत्ता को स्वीकार भी करता है


अलौकिक अयोध्या में अद्वितीय अभिनंदन, ayodhya abhinndann

दबंग दुनिया

                         अलौकिक अयोध्या में अद्वितीय अभिनंदन

                                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                  

अयोध्या का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि अनादिकाल से जब भी भारत के तीर्थों का उल्लेख होता है तब उसमें सर्वप्रथम अयोध्या का ही नाम आता है। दरअसल अयोध्या भारतीय सभ्यता और संस्कृति की वह धरोहर और पहचान है से जिसमें  भारतवर्ष और यहां के निवासियों का जीवन दर्शन प्रतिबिम्बित होता है। सुख शांति और ऐश्वर्य की इस भूमि के बारे में कहा जाता है कि जहां कभी युद्द न होता उस भूमि को अयोध्या कहते हैभारतीय सभ्यता के विकास में सप्तपुरी का बड़ा योगदान माना जाता है और अयोध्या उन सप्तपुरियों में शामिल है जहां मोक्ष प्राप्त होने का प्राचीन भारतीय ग्रंथों में उल्लेख है वेदों में अयोध्या को ईश्वर की नगरी बताया गया है और इसीलिए जनमानस के लिए  यह समूची नगरी आस्था का केंद्र रही है 

युगों युगों से भारत का जनमानस राम राज्य को अपने जीवन और न्याय का आधार मानता है और इसे साकार करने  वाले अयोध्या के राजा श्रीराम लोकाचार के आदर्श माने जाते है। राम के चरित्र की विशेषता धैर्य है,जिसके कारण उनका नाम जन जन की जिह्वा पर विद्यमान हैमानवीय सम्बन्धों के आदर्श रूप राम युगों युगों से भारतीय संस्कृति की विशेषताओं को अभिव्यक्त करते रहे है


धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से अयोध्या की महत्ता अब भव्यता में भी दिखाई देगी और यह राम में विश्वास रखने वाले करोड़ों भक्तों के लिए अद्भुत अनुभव होगा,जिसका इंतजार युगों युगों से भारतीय समाज कर रहा था भारत भूमि के आराध्य राम की जन्मस्थली अयोध्या को पीले रंग से सजाया गया है,घर घर और सभी दीवारों पर यह रंग चढ़ गया है,आप जहां भी जाएंगे,पीले रंग सभी दूर दिखाई देगा  भारतीय समाज में पीले रंग को भक्ति,आराधना,वैभव,प्रसन्नता और शौर्य का प्रतीक माना जाता है और इसीलिए अयोध्या के सब दरवाजे भगवा कर दिए गए हैंपीला रंग सूर्य का है जिसे अंधकार मिटाने के लिए माना जाता है,ऐसा लगता है कि अयोध्या नगरी समूचे राष्ट्र में अंधकार को मिटाने और प्रकाशमय होने का संदेश दे रही है शरीर को मजबूत करने में पीले रंग की किरणों का अहम योगदान है,अत: इस दृष्टि से भी राष्ट्र की नवचेतना और सामर्थ्य यहां दिखाई रहा है पीला रंग बुद्धि वर्धक माना जाता है,पीला रंग ज्ञान और विद्वत्ता का प्रतीक है। भारतीय ज्ञान की वैश्विक पहचान के रूप में भी अयोध्या को विकसित किया जा रहा है,अंततः लोकतंत्र का आदर्श रूप राम राज्य से ही माना जाता है,अयोध्या से राम राज्य की कल्पना हुई थी और यह विद्वत राजधर्म का सुचारू संचालन सुनिश्चित करता है पीला रंग सूर्यदेव,मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है स्पष्ट है कि अयोध्या को जिस प्रकार सभी लोको में सर्वश्रेष्ठ नगरी माना जाता है,उसके दर्शन भी यहां हो,इसके बेहतरीन प्रयास किये गये है। आने वाले समय में अयोध्या सर्व सुविधायुक्त ऐसा नगर होगा,जो न केवल धार्मिक दृष्टि से आकर्षण का केंद्र होगा,बल्कि दुनिया के आकर्षक स्थानों में भी शुमार किया जायेगा, सरकार की उत्कृष्ट और बहुआयामी योजना से इसकी उज्ज्वल संभावना बन गई है।


पीले रंग से  सजी अयोध्या राम की जन्मस्थली है और राम को सर्व समर्थ,सर्वत्र विद्यमान रहने वाली सर्वोच्च शक्ति माना जाता है। राम उच्च मानवीय मूल्यों और आदर्शों के प्रति सदैव प्रतिबद्द और समर्पित रहे,इसलिए भारत भूमि पर एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में  उन्हें पूजा जाता है,राम के प्रति अनंत आस्था भारत वर्ष की पहचान रही हैमाना जाता है कि राम के प्रति भक्ति भाव से जीवन बल,बुद्धि ज्ञान,योग को सिद्धि प्राप्त होती है। अपने भक्तों के प्रति राम की आसक्ति का वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है जब राम अपने भक्त वीर हनुमान से प्रसन्न होकर कहते है कि,जब तक मेरी कथा संसार में होगी,तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी। भगवान राम की जन्मस्थली पर उनके अनन्य भक्त हनुमान की पूजा का विशेष महत्व है। अयोध्या,राम भक्तों के लिए प्रमुख धाम है और हनुमान गढ़ी की पूजा अनिवार्य मानी जाती है। अयोध्या में परंपरा के मुताबिक, राम जन्मभूमि स्थल की हर पूजा से पहले हनुमान निशान राम जन्मभूमि स्थल में जाता है अगर कोई शुभ कार्य होता है, तो हनुमान निशान की पूजा पहले की जाती हैभारत में जन जब भी राम का स्मरण किया जाता है,हनुमान द्वारा की गई राम भक्ति में उच्च मानवीयता के भाव और समर्पण की मिसाल अवश्य भावों में होती है अद्भुत रामायण में एक जगह उल्लेख मिलता है की एक सुबह हनुमान जी को भूख लगी तो वे माता जानकी के पास पहुंचे। माता की मांग में सिंदूर देखकर हनुमान ने आश्चर्य चकित होकर पूछा,माता आपने यह क्या और क्यों लगा रखा है। इस पर माता जानकी ने उन्हें बताया कि,पुत्र,यह सुहागिन स्त्रियों का प्रतीक,मंगल सूचक,सौभाग्य वर्धक सिंदूर है,जो स्वामी की दीर्घ आयु के लिए जीवन पर्यन्त लगाया जाता है।”हनुमान थे तो स्वामी भक्त,उन्होंने अपने स्वामी श्री राम को अजर अमर करने के लिए सारे शरीर पर ही सिंदूर लगा लिया। वास्तव में भगवान राम के आदर्शों को हनुमान अजर अमर रखना चाहते थे और उनकी गुरु की प्रति प्रतिबद्धता दिखाई भी पड़ती है।

 

बहरहाल अयोध्या जगमगा रहा है, यह राम भक्तों के लिए अनुपम और अद्वितीय धरोहर की तरह होगा जहां राम भक्त हनुमान जी की आराधना भी भव्य राम मंदिर के भूमि पूजन के महोत्सव के दौरान होगी। दुनिया भर में रहने वाले करोड़ो राम भक्तों को सहस्त्रों वर्षों से  इस दिन का इंतजार था और पूरे देश में इसे लेकर उत्सव का माहौल है। राम कीर्तन और रामधुन की प्रतिध्वनि गाँव में गाँव में सुनाई दे रही है। अंततः राम मानवीय समाज की वह अनुपम विरासत है जिसे सहेजने,संवारने और बनाये रखने में कई संस्कृतियों और सभ्यताओं का योगदान रहा है यह देश अन्तर्निहित सहिष्णुता की वह जमीन है जहां राम सर्वप्रिय हैअयोध्या में राम मंदिर की भव्यता से निश्चित ही भारतीयों के आत्मविश्वास में असीम वृद्धि होगी और इससे देश का गौरव बढ़ेगा

 


बुधवार, 29 जुलाई 2020

चीन की सामरिक घेराबंदी, Strategic siege of china

जनसत्ता 

                     चीन की सामरिक घेराबंदी                                                     

                                                         ब्रह्मदीप अलूने


साम्यवादी चीन का अपने देश की राष्ट्रीय सीमा का कोई स्पष्ट मानचित्र नहीं है। वह संयुक्तराष्ट्र में भरोसा नहीं रखता और इस देश की कम्युनिस्ट पार्टी उग्र राष्ट्रवाद की नीति से पोषित होकर प्राचीन चीनी सभ्यता,उसके राजवंश और इतिहास के आधार पर वृहत चीन साम्राज्य स्थापित करने की संकल्पना  के साथ संचालित है पड़ोसी देशों की संप्रभुता और समुद्र की स्वायत्ता को चुनौती देने की चीन की यह विस्तारवादी नीति अंतर्राष्ट्रीय शांति को लगातार खतरे में डाल रही हैद्वितीय विश्व युद्द के बाद संयुक्तराष्ट्र की स्थापना उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को खत्म करने तथा विश्व शांति की स्थापना के लिए की गई थी संयुक्तराष्ट्र में पांच महाशक्तियों के साथ  सुरक्षा परिषद का गठन इसीलिए किया गया था जिससे विश्व में सामूहिक सुरक्षा की भावना को बढ़ावा मिलेइसके साथ ही ऐसे राष्ट्रों के खिलाफ निरोधात्मक और दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सके जो अपनी तानाशाही और  आक्रामक प्रवृत्ति से अंतर्राष्ट्रीय शांति को भंग करते है तथा  अपनी विस्तारवादी नीति से छोटे और शांतिप्रिय राष्ट्रों की अखंडता को समाप्त करना चाहते है


चीन सुरक्षा परिषद का अहम सदस्य है और इसके बाद भी वह अपने वैश्विक दायित्व के प्रतिकूल व्यवहार कर संयुक्तराष्ट्र की शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की भावना को लगातार चुनौती दे रहा हैसंयुक्तराष्ट्र पर चीन आर्थिक और राजनीतिक रूप से हावी है अत: चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए अब दुनिया के कई देश लामबंद हो रहे है, इस समय अमेरिका भी एशिया की क्षेत्रीय ताकतों के बूते चीन की सामरिक घेराबंदी करने के लिए प्रयासरत है


अमेरिकी विदेश नीति में एशिया प्रशांत क्षेत्र को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है,चीन के उभार को रोकने के लिए कूटनीति और सामरिक रूप से अमेरिका एशिया के कई इलाकों में अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ा रहा हैओबामा काल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया थाओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को जोड़ने की नीति पर भी काम किया जो चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान है इन देशों में भारत समेत इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओ स और वियतनाम जैसे देश शामिल है इनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है कजाकिस्तान,कम्बोडिया और दक्षिण कोरिया की सम्प्रभुता को चुनौती  देते हुए चीन इन्हें ऐतिहासिक रूप से अपना बताता है,नेपाल और भारत के कई इलाकों पर तथा दक्षिण चीनी समुद्र पर भी चीन का इसी प्रकार का दावा है


दक्षिणी चीन सागर,प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच स्थित समुदी मार्ग से व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण इलाक़ा है। इंडोनेशिया और वियतनाम के बीच पड़ने वाला समंदर का ये हिस्सा,क़रीब 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का 20 फ़ीसदी हिस्सा यहां से गुज़रता है।  सात देशों से घिरे दक्षिणी चीन सागर  को लेकर चीन और अन्य  देशों के बीच गहरा तनाव रहा है और कई बार युद्द जैसी स्थितियां भी निर्मित हुई है। फिलीपींस के पास स्कारबरो शोल एक छोटा सा द्वीप है,जिसका अपना रणनीतिक महत्व है चीन से यह 500 किलोमीटर दूर है लेकिन इसके बाद भी साल 2012 में चीन ने अपना लड़ाकू जहाज़ भेजकर उस पर कब्जा कर लिया था  इसे लेकर फिलीपींस से चीन की कई महीने तक तनातनी रही और हालात जंग जैसे बन गए थे यह विवाद अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में गया और फैसला जब फिलीपींस के पक्ष में हुआ तो चीन ने उसे मानने से इंकार कर संयुक्तराष्ट्र के नियमों की अनदेखी कर दी दक्षिण चीन सागर के मलक्का जल संधि और ताइवान जल संधि के मध्य लगभग 200 छोटे छोटे द्वीप है,जिनमें पारासेल और स्प्रेटले द्वीप प्रमुख है जिसका बेहद सामरिक महत्व है  जापान के तेल आयात का 75 फीसदी भाग इस क्षेत्र से होकर गुजरता है  तेल और प्राकृतिक गैस से भरपूर इस इलाके पर चीन और फिलीपींस दोनों दावा करते है अमेरिका फिलीपींस के दावे का समर्थन करता है जबकि पारसेल्स पर चीन का नियन्त्रण है जिस पर ताइवान और वियतनाम भी अपना दावा जा चूके है इसी क्षेत्र में वूडी द्वीप में चीन ने हवाई पट्टी का निर्माण किया है इस इलाके में चीन को लेकर भारी तनाव है और इसका असर दुनिया में हथियारों की खरीददारी पर भी पड़ा है पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के दस सबसे बड़े भारी हथियार खरीदने वाले देशों में से अग्रणी 6 एशिया और पैसेफिक इलाके के देश हैं जिसमें चीन,ऑस्ट्रेलिया,भारत,पाकिस्तान,दक्षिण कोरिया और वियतनाम शामिल है  यदि पाकिस्तान को छोड़ दे तो बाकी देशों ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम से चीन का दक्षिण चीन सागर पर आधिपत्य को लेकर विवाद है  चीन के दक्षिण में वियतनाम,लाओस तथा म्यांमार है तथा वियतनाम  के साथ उसका युद्ध भी हो चुका है। चीन के मुताबिक वियतनाम पर भी उसका हक है,चीन इसका आधार 14 वी सदी में मिंग राजवंश के यहाँ स्थापित शासन को बताता है। भारत और वियतनाम के बीच दक्षिण चीन सागर में प्राकृतिक गैस उत्खनन को लेकर समझौता हुआ था और इसका चीन ने विरोध भी किया था पिछले साल पेंटागन ने मलेशिया, इंडोनेशिया,फिलीपींस और वियतनाम को 34 स्कैन ईगल ड्रोन बेचने की घोषणा कर यह साफ  कर दिया था कि 4.7 करोड़ डॉलर का यह सौदा ड्रोन खुफिया जानकारी जुटाने में मददगार बनेगा जिससे दक्षिण चीन सागर पर चीन की बढ़ती दखलंदाजी को दबावपूर्वक रोका जा सके


पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू आइलैंड को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है,चीन ने इस आइलैंड में साल 2012  से अपने जहाज और विमान  भेजना शुरू किया और तब से ही जापान और चीन के बीच विवाद बढ़ गया है  चीन का कहना है कि वह इसी का द्वीप है जिसे जापान ने उससे 1895 के युद्द में चीन लिया था  चीन जापान विवाद के बीच अमेरिका जापान को खुला और मुखर समर्थन दे रहा है,जापान और अमेरिका के बीच साल 2004 में प्रक्षेपात्र रक्षा प्रणाली के संबंध में समझौता भी हुआ था  जापान की नई रक्षा नीति में दक्षिणी द्वीपों को प्राथमिकता देते हुए वहां  सैनिकों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी की गई है,यह दक्षिणी द्वीप चीन के निकट है  जापान अब चीन को बड़े खतरे की तरह देख रहा है और इसका प्रभाव उसकी सामरिक नीति पर भी देखा जा सकता है  अमेरिका के द्वारा जापान को भारत तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ बेहतर संबंध रखने को प्रेरित किया जा रहा है जिससे चीन को नियंत्रित किया जा सके इसके सामरिक प्रभाव भी देखे जा रहे है  इस वर्ष के अंत में भारतीय नौसेना,ऑस्ट्रेलियाई,अमरीकी और जापानी नौसेना के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में अभ्यास करेगी। 2007 से ही इन देशों के बीच समुद्री सामरिक सहयोग बढ़ाया गया है और इस पर चीन नकारात्मक प्रतिक्रिया देता रहा है।


हिन्द महासागर में समुद्री संचार मार्गों पर इंडोनेशिया का प्रभाव है। मलक्का,सुंडा, और लौम्बोक संधि इंडोनेशिया के निकट है तथा इन्ही मार्गों से होकर चीन और जापान के लिए जाने वाले समुद्री जहाज गुजरते है। इंडोनेशिया के गश्ती जहाज़ों ने चीन के एक जहाज़ को पकड़ लिया था जिसके बाद  चीन ने बड़े जंगी जहाज़ इलाक़े में भेजकर इंडोनेशिया पर दबाव बनाया था और आख़िर में इंडोनेशिया को चीन के जहाज़ को छोड़ना पड़ा था। इस साल की शुरुआत में चीन और मलेशिया के जहाजों को लेकर भी दोनों देशों के बीच एक महीने तक स्टैंड ऑफ़ रहा था तथा अमरीका,ऑस्ट्रेलिया और जापान ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत चीन को चेतावनी भी दी थी

एशिया में चीन जमीन और समुद्र में लगातार आक्रामक नीतियां अपनाएं हुए है उसके बाद यह संभावना बढ़ गई है की जिस प्रकार अमेरिका ने रूस को घेरने के लिए नाटो का विस्तार कर रूस के पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा संधि की थी उसी तर्ज पर चीन को घेरने की नीति अपनाई जा सकती है। भारत,ऑस्ट्रेलिया,जापान और अमेरिका लगातार एशिया प्रशांत के समुद्र में अपनी शक्ति बढ़ा रहे है,अमेरिका के नेतृत्व में दि क्वाड्रिलैटरल सिक्युरिटी डायलॉग या क्वॉड की रणनीति पर काम किया जा रहा हैहाल ही में इसमें न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया और वियतनाम को जोड़कर इसे क्वॉड प्लस नाम दिया गया हैअमरीका के आधुनिक युद्धपोत  चीन के सामने तैनात है यूएसएस निमित्स के कमांडर रियर एडमिरल जेम्स कर्क ने दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और चीन के जहाजों के आमने सामने आने की बात भी स्वीकारी है


चीन के उत्तर पूर्व में उत्तर कोरिया है तथा पूर्व में जापान है। कोरियाई प्रायद्वीप में चीन और उत्तर कोरिया को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैदक्षिण कोरिया की 1953 से अमरीका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अठ्ठाइस हजार से ज्यादा अमरीकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं मिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार है

चीन के दक्षिण में वियतनाम,लाओस तथा म्यांमार है तथा दक्षिण पश्चिम में नेपाल,भूटान तथा भारत है। इन सभी देशों से चीन का विवाद है,वियतनाम ने पिछलें कुछ सालों में हथियारों की संख्या में भारी इजाफा करके चीन को जवाब देने की तैयारी की है वहीं भारत गलवान के बाद ज्यादा मुखरता से सामने आया है। चीन के पश्चिम में ताजीकिस्तान तथा किर्गिस्तान है वहीं उत्तर पश्चिम में कजाकिस्तान है। ये सभी देश अमेरिका के सामरिक सहयोगी है और चीन से इनका सीमाई विवाद बना हुआ है। 


चीन के उत्तर में मंगोलिया है जिस पर चीन अपना अधिकार बताता रहा है,वहीं चीन के दक्षिण पूर्व में हांगकांग,ताइवान और मकाऊ है। हांगकांग को लेकर चीन पूरी दुनिया के निशाने पर है तथा ताइवान चीन के खिलाफ कोई भी कदम उठाने से गुरेज नहीं करता। अमेरिका से हथियार खरीदने की ताइवान की नीति चीन का प्रतिरोध कर रही है। चीन के दक्षिण पूर्व में इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया भी चीन के खिलाफ है,वहीं आसियान के देश में चीन की चुनौती को देख रहे है


आने वाले समय में इस बात की भरपूर संभावना है कि चीन की जमीनी सीमा से लगे अधिकांश देश और दक्षिण चीन सागर से लगे सभी देश अमेरिका,जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर सामूहिक रूप से किसी स्पष्ट सामरिक रणनीति के तहत् काम कर सकते है चीन से सीमाई विवादों में उलझे देश यह समझ गये है कि द्विपक्षीय सम्बन्धों और वार्ताओं से चीन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता,सामूहिक सुरक्षा की नीति पर चलकर और चीन की सामरिक  घेराबंदी करने  से ही चीन की विस्तारवादी नीति को रोका जा सकता है

 

 


रॉ की मजबूती जरूरी,raw and mission

राष्ट्रीय सहारा

                             रॉ की मजबूती जरूरी

                                                                       डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

http://rashtriyasahara.com/imageview_18866_142680622_4_71_30-07-2020_6_i_1_sf.html

मनोवैज्ञानिक युद्दकला का कूटनीति से गहरा संबंध होता है,वैदेशिक संबंधों और खासकर प्रतिद्वंदी राष्ट्रों की नीतियों का पता लगाने,पहचानने और अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि के लिए उन्हें प्रभावित करने का काम ख़ुफ़िया तंत्र बखूबी करता है अंतराष्ट्रीय राजनीति में जहां कूटनीति राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख तत्व है,वहीं खुफियां तंत्र को कूटनीति का मस्तिष्क माना जाता है। 1968 में स्थापित भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के तेज तर्रार कार्यो से देश को सामरिक और राजनीतिक सफलताओं में बड़ी मदद मिली है,वर्तमान में पड़ोसियों की चुनौतियों के बीच रॉ के मजबूत होने की जरूरत महसूस की जा रही है।



दरअसल राष्ट्रीय हितों की प्रगति के लिए शक्ति के विभिन्न तत्वों को अधिक प्रभावी बनाना कूटनीति से ही संभव हो सकता है और कूटनीति की सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है वह गोपनीय सूचनाएं जिससे राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके भारतीय कूटनीति पर भौगोलिक और सांस्कृतिक तत्व हावी रहे है और इसीलिए यह आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच अधिकांश अनिर्णय की स्थिति में ही रही वैश्विक टकरावों के बीच राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए भारत ने 1968 में रॉ के गठन के साथ आक्रामक रणनीतिक कार्यों को अंजाम देना शुरू किया था पाकिस्तान में आंतरिक अशांति के बाद बांग्लादेश का उदय भारत की आक्रामक कूटनीति का परिणाम था और इसमें रॉ की अहम भूमिका को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से स्वीकार भी किया था। बांग्लादेश बनने के बाद  श्रीमती गांधी ने वहां के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान को यह कहते हुए रॉ प्रमुख से मिलवाया था कि आप चाहे तो हमारे  काव साहब से आपके देश के बारे में कोई भी जानकारी ले सकते है,वे बांग्लादेश के बारे में जितना जानते है शायद हम भी नहीं जानते। वास्तव में रॉ का ख़ुफ़िया तंत्र इतना मजबूत था कि रॉ के एक पूर्व अतिरिक्त सचिव बी.रमन ने अपनी किताब 'द काऊ बॉयज़ ऑफ़ रॉ' में लिखा है कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत के ऊपर हमला करने जा रहा है। 1975 में चीन और वैश्विक के दबाव के बाद भी सिक्किम का भारत में विलय भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी और इसमें रॉ की अहम  भूमिका थी।



इन सबके बीच रॉ के लिए भारतीय राजनीति में परिवर्तन से मुश्किलें भी आई। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे पहले रॉ ने ही पता लगाया था। रॉ एजेंट ने कहूटा में नाई की दुकान के फ़र्श से पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों के बालों के सैंपल जमा किएउनको भारत लाकर जब उनका परीक्षण किया गया तो पता चला कि उसमें रेडिएशन के कुछ अंश मौजूद हैं,जिससे पाक की परमाणु तैयारी का पता चलारॉ के एक एजेंट को 1977 में पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र का डिज़ाइन प्राप्त हो गया थालेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने न सिर्फ़ इसे दस हज़ार डॉलर में खरीदने की पेशकश ठुकरा दी,बल्कि ये बात पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल-हक़ को भी बता दीइस घटना का जिक्र मेजर जनरल वी.के.सिंह ने अपनी किताब ‘सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’में भी किया है वी.के.सिंह रॉ में कई सालों तक काम कर चुके है। 


बाद  में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर सर्विस इंटेलीजेंस की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई और रॉ को नये सिरे से अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ा इसके नतीजे घातक रहे,पंजाब में खालिस्तान की मांग का हिंसक रूप देश ने देखा और 1984 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी गई पाकिस्तान में रॉ के कमजोर होने का फायदा पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी को हुआ जिसने बिना युद्द लड़े भारत में जातीय और धार्मिक अशांति भड़काने की व्यापक योजना को अंजाम देते हुए ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू कर भारत में आतंकवाद बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक कर यह सुनिश्चित किया की पाकिस्तान की आतंकी नीतियों का  जवाब उसके अंदाज में ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत के नये सीक्रेट प्लान सीआईटी एक्स का आगाज हुआ और उसने पड़ोसी देशों को ध्यान में रखकर अपनी आक्रामक रणनीति को अंजाम देना शुरू कर दिया। 


यह वहीं दौर था जब चीन,पाकिस्तान,नेपाल,बांग्लादेश और श्रीलंका से हमारे सम्बन्ध बेहद असामान्य थे। बांग्लादेश में बढ़ती भारत विरोधी  गतिविधियों को रोकने के लिए 1985 में फरक्का को लेकर आपसी सहमति,नेपाल में भारत विरोध को खत्म कर मजबूत सम्बन्ध रखने के लिए नवम्बर 1986 में बंगलौर में सार्क सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सार्क का मुख्यालय काठमांडू में स्थापित करने का कूटनीतिक दांव और 1988 में मालद्वीप में भारतीय वायुसेना के 'ऑपरेशन कैक्टस' के अभियान के बाद भारत विरोधी ताकतों को करारा जवाब देने की कूटनीति के पीछे रॉ की ही अहम भूमिका थी। श्रीलंका भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है। भारतीय तमिलों की श्रीलंका में अच्छी खासी तादाद है और इस मामलें को लेकर दोनों देशों के सम्बन्ध अक्सर प्रभावित होते रहते है। 1986 में श्रीलंका के राष्ट्र प्रमुख जयवर्धने ने एक साल के भीतर तमिल आन्दोलन को कुचलने की घोषणा कर दी थीइस दौरान पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई और अमेरिका की सी.आई.. की श्रीलंका में मौजूदगी के संकेत से दक्षिण की और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी थी इस समय भारत ने श्रीलंका में शांति सेना भेजकर विरोधी देशों की भारत विरोधी रणनीति को खत्म कर दिया था

1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल में जंग चल रही थी,उस समय भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने जनरल मुशर्रफ की एक बातचीत टेप की थी और बाद में इसी से पाकिस्तान के बीजिंग से रणनीतिक संबंधों का खुलासा भी हुआ थायह रॉ की सफलता तो थी जिससे भारत को दुनिया में यह साबित करने में बड़ी मदद मिली की करगिल की घुसपैठ में पाकिस्तान की सेना का सीधा हाथ था लेकिन मलाल यह था कि आखिर पाकिस्तान के भारतीय सीमा में इतनी बड़ी घुसपैठ का सुराग रॉ को पहले क्यों नहीं मिला


इसके पीछे एक प्रमुख कारण 90 के दशक में भारत के विदेश मंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल का वह गुजराल सिद्धांत माना जाता है जिसके अंतर्गत पड़ोसी देशों का विश्वास जीतने के लिए अप्रत्याशित कदम भी उठाये गये थे और उसमें से एक था पाकिस्तान में रॉ की गतिविधियों को विराम दे देना। गुजराल के पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम कर चूके थे,अत: उन्होंने दुश्मन देश के प्रति बेहद सदाशयता दिखाई और इसके दूरगामी परिणाम भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हुए।

शक्ति संतुलन की नीति को विवेकपूर्ण ढंग से संचालित करने के लिए यह आवश्यक है कि नीति निर्धारक शत्रु राज्यों की भविष्य में होने वाली क्षमता और नियत के बारे में भविष्यवाणी कर सकें और यह काम अत्यंत कठिन है। ऐसे में कूटनीतिक सफलता के लिए ख़ुफ़िया एजेंसी निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है।


वर्तमान में नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियाँ चरम पर है,बंगलादेश और पाकिस्तान के संबंध अप्रत्याशित रूप से मजबूत हो रहे है,श्रीलंका,मालद्वीप और ईरान में चीन मजबूत हुआ है, वहीं गलवान घाटी में चीन द्वारा पक्का निर्माण कार्य कर लेने की खबर भी भारत को बहुत देर से मिली। कूटनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से यह चुनौतीपूर्ण है। बहरहाल ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ की मजबूती से भारत की पड़ोसियों पर श्रेष्ठता,महत्ता और कूटनीतिक सफलता सुनिश्चित हो सकती है,इस पर ध्यान देने की जरूरत है।


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