खनिज और वन्य संसाधनों से भरपूर राज्यों में बदहाल आदिवासी, tribal

हम समवेत    

           खनिज और वन्य संसाधनों से भरपूर राज्यों में बदहाल आदिवासी

                                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

https://www.humsamvet.com/opinion-feature/adivasi-struggle-for-life-tools-in-india-3406

मेदिनीनगर की तटवर्ती नदी कोयल पर बंधे पुल की छांव में बैठकर आराम कर रहे मजदूरों के एक समूह पर लॉकडाउन के दौरान झारखंड पुलिस की नजर पड़ी और जब उनसे पूछा गया कि वे कौन है और कहाँ से आए है तो जवाब सुनकर पुलिस भी अवाक रह गई। दरअसल उन मजदूरों ने बताया कि वे हैदराबाद से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर पैदल सफर तय करते हुए 1 महीने में अपने गृह प्रदेश झारखंड लौटे है। हैदराबाद की एक निर्माण कंपनी में काम करने वाले इन मजदूरों को लॉकडाउन कि घोषणा के बाद मालिक ने अपने हाल पर छोड़ दिया तो वे भूखे प्यासे पैदल ही अपने घर कि और निकल पड़े। ये सभी पलामू के रहने वाले है और यह स्थान खनिज संसाधनों से भरपूर माना जाता है। आदिवासी बाहुल्य यह इलाका खूबसूरत वन,घाटियों और पहाड़ियों के लिए विख्यात है जहां सैकड़ों प्रजाति के वन्य प्राणी रहते है और यह स्थान पर्यटकों को बहुत आकर्षित  करता रहा है। यहाँ कि कोयले कि खदानें 9 सालों से बंद पड़ी है,यदि यह चालू हो जाए तो हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है। यही नहीं पर्यटन केंद्र के रूप में इसका विकास होने से भी बड़ी संख्या में रोजगार मिल सकता है लेकिन यहाँ के बदनसीब गरीब मजदूरी करने के लिए दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर है। यही  स्थिति पूरे झारखंड की है।  झारखंड में आदिवासियों की आबादी 26.2 फीसदी है। इसमें से अधिकांश मजदूरी करते है और अपनी जीने की मूलभूत सुविधाओं को भी नहीं जुटा पाते है।


साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला झारखंड पूरे देश के भौगोलिक क्षेत्र का 2.62 फीसदी है और पूरे देश का 40 फीसदी खनिज इस भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। घने वन,जंगल और झाड़ के कारण इस राज्य का नाम झारखंड पड़ा है। राज्य का पूरा प्रदेश पठारी है और यहाँ का छोटा नागपुर  पठार पर खनिज और ऊर्जा का विपुल भंडार है। खनिज की दृष्टि से सबसे संपन्न इस राज्य में देश का 57 फीसदी अभ्रक,34 फीसदी कोयला,33 फीसदी ग्रेफ़ाइट,18 फीसदी लौह अयस्क,48 फीसदी कायनाइट,26 फीसदी तांबा,32 फीसदी  बॉक्साइट तथा 95 से 100 फीसदी पाइराइट का उत्पादन होता है। राज्य के दक्षिणी छोटा नागपुर की तुलना जर्मनी की रूर घाटी से की जाती है। यूरोप के प्रमुख औद्योगिक केन्द्रों में रूर घाटी को शुमार किया जाता है,इस क्षेत्र में कई विशाल औद्योगिक नगर हैं। यहाँ यूरोप का सबसे बड़ा एवं विश्वविख्यात कोयला क्षेत्र है। जर्मनी का  80 फीसदी कोयला इसी क्षेत्र से निकाला जाता है। रूर घाटी को जर्मनी के विकास का केंद्र माना जाता है और यहां रहने वाले लोग बेहद संपन्न माने जाते है। वहीं खनिज संसाधन की उपलब्धता में रूर घाटी से कहीं बेहतर झारखंड को देश के सबसे गरीब,पिछड़े और अशिक्षित राज्यों में शुमार किया जाता है। इस क्षेत्र से स्वर्णरेखा,करकरी,कोयल दामोदरऔर सोन जैसी नदिया निकलती है जिसमें  स्वर्णरेखा नदी में सोने के कण मिलते है और यहां के कई इलाकों के आदिवासियों के रोजगार का यह प्रमुख साधन है। झारखण्ड में कई ऐसी जगह है जो अलग अलग वजहो से लोगों को आकर्षित करती हैं। एक तरफ जहां नेतरहाट वर्ष भर ठंडा रहता है और पर्यटको को गर्मी से बचने का मौका देता हैं वहीं देवघर में सावन के महीने में लाखों श्रद्धालू आते है।  झारखण्ड के बेतला और हजारीबाग के राष्ट्रीय उद्यान अपनी अप्रतिम  सुंदरता और जीव जन्तुओ में विभिन्नता के लिए प्रसिद्ध हैं।


राज्य में विपुल खनिज और वन्य संपदा होने के बाद भी नीतिगत खामियों के चलते यहाँ के लगभग 35 फीसदी दलित आदिवासी परिवार एक कमरे के कच्चे घरों में रहने को मजबूर है। 80 फीसदी परिवार महीने का मुश्किल से 5000 रुपया कमा पाते है,देश की औसत बेरोजगारी दर जहां 6.1 फीसदी है वहीं झारखंड के गांवों में बेरोजगारी दर 7.1 फीसदी और शहरों में बेरोजगारी दर 10.5 फीसदी है।  झारखंड में 38 लाख हेक्टेयर जमीन खेती योग्य है। राज्य में स्वर्णरेखा,करकरी  कोयल,दामोदर,और सोन जैसी कई बड़ी नदियां होने के बाद भी 29 फीसदी इलाके में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। जाहिर है राज्य के प्राकृतिक रूप से सम्पन्न होने के बाद भी व्यवस्थागत कमियों और बेहतर योजनाओं को  लागू न करने कि नाकामी के चलते यहाँ के लाखों दलित आदिवासी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर है। प्रति व्यक्ति आय में देश के 28 प्रमुख राज्यों की रैंकिंग में झारखंड 25वें नंबर पर है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में लगभग एक हजार स्वास्थ्य केंद्रों के अपने भवन नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में जरूरत के हिसाब से 41 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। 63.6 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के कमरे नहीं हैं,42 फीसदी रूरल हेल्थ सेंटर में बिजली नहीं है और 35.8 फीसदी स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है।



बिहार से अलग करके झारखंड को एक अलग राज्य इसीलिए बनाया गया था कि आदिवासी बाहुल्य इस इलाके का विकास हो। इसका फायदा निर्माण कंपनियों को तो मिला लेकिन आदिवासियों कि स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। हथकरघा उद्योग को लेकर राज्य में बहुत संभावनाएं है,झारक्राफ्ट राज्य की पहचान है और मिट्टी की सुंदर मूर्तियां बनाना यहाँ की प्रमुख कला है। आदिवासी चित्रकला बेंत और बांस के सामान को सरकार यदि बड़ा बाज़ार दे तो यहाँ लाखों लोगों का जीवन स्तर सुधर सकता है और  इन सभी कलाओं में आदिवासी पारंपरिक तरीके से पारंगत है।  वन्य इलाकों को पर्यटन केंद्र के रूप में उन्नत करके और खनिज संसाधनों से लाखों आदिवासियों को रोजगार मिल सकता है,लेकिन यह योजनाएँ महज चुनावी नारा बनकर रह जाती है।

मध्यप्रदेश में आदिवासियों कि आबादी 21 फीसदी से ज्यादा है और उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब है। मनरेगा के लिए पंजीयन कराने वाले मजदूरों में एक तिहाई से ज्यादा आदिवासी है।  शहडोल और उमरिया के जो मजदूर काम के सिलसिले में महाराष्ट्र गए थे,उन्हें इतनी दूर जाना ही नहीं पड़ता यदि इस इलाके को लेकर हमारी बेहतर योजनाएँ होती। शहडोल और उमरिया दोनों जिले वन्य संपदा से भरपूर है,पर्यटन केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाला यह पूरा क्षेत्र हजारों रोजगार पैदा कर सकता है लेकिन व्यवस्थागत खामियों और विकास की कार्य योजना के अभाव में बदनसीब आदिवासी दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए जाने को मजबूर है। औरंगाबाद के पास पटरियों पर अपनी जान खोने वाले 16 मजदूर इसी इलाकों से थे।



नक्सल प्रभावित मध्यप्रदेश के बालाघाट के हजारों मजदूर हैदराबाद और चेन्नई से इन दिनों पैदल लौट रहे है। इन आदिवासी क्षेत्रों में वनोपज से रोजगार की असंख्य संभावनाएं है। बालाघाट का बांस तो लाखों आदिवासियों को रोजगार के साथ खुशहाली और बेहतर जिंदगी दे सकता है लेकिन इस और नीतियाँ सही तरीके से लागू ही नहीं की गई। बांस की कटाई के लिए आदिवासियों का उपयोग किया जाता है जबकि बांस से महंगे फर्नीचर,होटलें को सजाने और बेशकीमती घर बनते है। बांस से बने खिलौने न केवल पर्यावरण के संरक्षण  लिए बहुत उपयोगी हो सकते है बल्कि इससे आदिवासियों को बड़ा रोजगार भी मिल सकता है। जरूरत है बांस से बनी वस्तुओं के प्रशिक्षण को लेकर कौशल विकास केन्द्रों की। सरकार के ऐसे प्रयास इस क्षेत्र के आदिवासियों का जीवन बदल सकते है।  मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ और अलीराजपुर जिले मे पलायन बड़ी  समस्या रहा है। झाबुआ की आबादी करीब 11 लाख है जिसमें से 4 लाख मजदूर हर साल पड़ोसी राज्य गुजरात,महाराष्ट्र और राजस्थान में रोजगार की तलाश में पलायन कर जाते है। यह जिला आदिवासी हस्तशिल्प खासकर बांस से बनी वस्तुओं, गुडियों, आभूषणों और अन्य बहुत सारी वस्तुओं के लिए पहचाना जाता है,लेकिन इसे रोजगार का साधन बनाएँ जाने की कमी  के चलते इसका लाभ आदिवासियों को नहीं मिल पाता। यह बाघ प्रिंट का बड़ा सेंटर हैं,लेकिन इसे हथकरघा उद्योग को बढ़ावा न मिल पाने से कारीगरों की कमाई बहुत ज्यादा नहीं होती। आलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में डोलोमाइट के पत्थर बड़ी मात्रा में हैं लेकिन  मजदूर की मजबूरियां बदस्तूर जारी है। झाबुआ-आलीराजपुर इलाके में बनने वाली महुआ की शराब और ताड़ी बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक मानी जाती है। इन क्षेत्रों में अंग्रेजी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध का बड़ा आर्थिक लाभ इस इलाके में रहने वाले आदिवासियों को मिल सकता है।


ओडिशा में करीब 22 फीसदी से ज्यादा आबादी आदिवासियों की है और यहाँ के करीब 15 लाख मजदूर अन्य राज्यों में रोजगार के लिए पलायन कर जाते है। इसमें अधिकांश आदिवासी ही है जो गुजरात की फैक्ट्रियों में काम करते है। ओडिशा भारत के महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है, जो कई प्रकार के खनिज स्रोतों से पूरी तरह संपन्न है। उद्योगों के लिए ओडिशा के खनिज स्रोत उच्च स्तरीय हैं। यहाँ लौह अयस्क, क्रोमाइट,मैगनीशियम-अयस्क,बॉक्साइट,गैरकोकिंग कोयला,चीनी मिट्टी और टिन के भंडार है। यही वजह है कि यहां राउरकेला स्टील प्लांट,राष्ट्रीय एलुमिनियम कंपनी,नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन की स्थापना की गई है,जो न केवल देश में बल्कि विश्वभर के बाजारों में अपनी अलग पहचान रखते हैं। ओडिशा में नियमगिरि,कलिंगनगर,पोस्को जैसे इलाकों में जल,जंगल,जमीन चुनावी मुद्दा तो बनते है लेकिन यहाँ के संसाधनों पर पहला अधिकार इसी क्षेत्र के आदिवासियों का है। खनिज और वन्य संसाधनों का  फायदा बड़ी कंपनियाँ उठा रही है जबकि यहाँ का आदिवासी अन्य राज्यों में रोटी की तलाश में जाने को मजबूर है। यहां खैर या कत्था के वृक्ष बहुतायत में पाये जाते है,कत्था पान में लगाया जाता है।  मधुका इंडिका एक और उपयोगी वृक्ष है जिसके फल से अच्छा खाद्य तेल बनता है।  टर्मिनाला अर्जुना नामक वृक्ष की पत्तियों का अच्छा चारा बनता है। पेड़ों पर टसर के रेशमी कीड़े पाले जाते हैं और इससे देहातों में लाभकारी रोजगार मिलता है।  उड़ीसा का टस्सर, उत्कृष्ट सिल्क माना जाता है। सरकार सुविधाएं और कौशल विकास के जरिए न केवल लाखों लोगों को रोजगार दे सकती है बल्कि एक अच्छा बाज़ार भी मिल सकता है। 


तकरीबन 32 फीसदी आदिवासी आबादी वाला छत्तीसगढ़ राज्य साल और सागोन के वन के लिए पहचाना जाता है। कोयला,लौह अयस्क, बॉक्साइट, चुना पत्थर और टिनकी खनिज संपदा से भरा यह राज्य भारत में विशिष्ट स्थान रखता है। देश के कुल खनिज उत्पादन मूल्य का लगभग 16 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में संचालित हो रहे खनन प्रक्रिया से प्राप्त होता है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में खनिज क्षेत्र का 11 प्रतिशत से अधिक का योगदान है और प्रदेश में 80 प्रतिशत से अधिक खनिज आधारित उद्योगों का संचालन हो रहा है। लेकिन यहाँ का आदिवासी नक्सलवादियों और सरकार के बीच बुरी तरह फंसा हुआ है।  देश की जनसंख्या जहां उतरोत्तर बढ़ी है वहीं छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी में कमी आई है। 2011 में हुई जनगणना में राज्य में कुल 78 लाख 22 हजार आदिवासी थी। यह राज्य की कुल आबादी का 30.62  फीसदी है, जबकि 2001 में हुई  जनगणना में आदिवासी कुल आबादी का 31.8 फीसदी थे। जाहिर है तुलनात्मक रूप से अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या में  सवा फीसदी की कमी आई है। इसका प्रमुख कारण राज्य से आदिवासियों का पलायन है जो रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर है।  बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिकों का मूलभूत अधिकार है लेकिन रोजगार के लिए दर दर भटकते आदिवासियों को कैसे सुकून मिलेगा,इसकी कोई योजना दूर दूर तक नहीं दिखाई पड़ती।


 

छत्तीसगढ़ मे साल और सागोन के घने वन पाये जाते है,जिसका लकड़ी का उपयोग रेलवे के स्लीपर के साथ घरों के निर्माण में किया जाता है। तेंदुपत्ता,शहद,मोम, रेशम,हर्रा,आंवला और बांस जैसे बेशकीमती वनोपज़ पर आदिवासियों का पहला अधिकार है और इससे वे बेहतर जीवन अर्जन भी कर सकते है।

आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए आदिवासियों के लिए व्यापक कौशल केंद्र खोलने की जरूरत है। इससे न केवल आदिवासियों को रोजगार मिल सकता है बल्कि देश के पिछड़े इलाकों की तस्वीर भी बदल सकती है। स्थानीय स्तर पर वन्य और खनिज संपदा का उपयोग करने से पलायन को रोकने में बड़ी मदद मिल सकती है। बहरहाल जल,जंगल और जमीन के रखवालों  को लेकर कब सरकारें स्थानीयता पर आधारित योजनाओं को अंजाम देगी,यह कह पाना मुश्किल है।



चाबहार पर चीनी दांव chhabhar china india

राष्ट्रीय सहारा

चाबहार पर चीनी दांव

                डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

अरब सागर के तट पर कराची बंदरगाह,ग्वादर बंदरगाह,कांडला बंदरगाह,मुंबई बंदरगाह और चाबहार भी हैभारतीय उपमहाद्वीप और अरब क्षेत्र के बीच हिन्द महासागर का हिस्सा है और भारत की कई नदियों का पानी फारस की खाड़ी में जाकर मिलता हैभारत के ईरान के साथ राजनीतिक,सांस्कृतिक,ऐतिहासिक और आर्थिक संबंधों के बाद  साल 2016 में  रणनीतिक क्षेत्र में अहम भागीदारी चाबहार के रूप में सामने आई थी जब ओमान की खाड़ी में स्थित चाबहार बंदरगाह पर भारत और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ थाइसे ईरान के दक्षिण समुद्र तट को भारत के पश्चिमी समुद्र तट से जोड़ने का रणनीतिक दांव माना गया था।  इस परियोजना से पाकिस्तान और चीन को न केवल सामरिक और आर्थिक तौर पर बेहतर जवाब दिए जाने की सम्भावना बढ़ी थी बल्कि अफगानिस्तान में भारत की स्थिति भी मजबूत हुई थी।


अब चाबहार बंदरगाह को लेकर 2016 में हुए भारत से समझौते को ईरान ने रद्द कर दिया है उसने हाल ही में चीन पर भरोसा जताते हुए उससे चार सौ अरब डॉलर के रणनीतिक निवेश को लेकर समझौता  किया है जिसके अनुसार ईरान भारत के साथ चाबहार से अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर ज़ाहेदान तक रेल लाइन बिछाने को लेकर काम नहीं करेगा बल्कि अब इस प्रोजेक्ट को चीन के सहयोग से पूरा किया जायेगा

दरअसल मध्यपूर्व स्थित मेसोपोटामिया और फारस की खाई जैसी मरुभूमि  अपनी तेल संपदा के चलते वहां के नागरिकों के लिए वरदान भले ही हो लेकिन मध्य पूर्व  की शांति के लिए अभिशाप से कम नहीं हैयदि हम कहे कि इस क्षेत्र का तेल सारी समस्याओं का कारण और सारे तर्कों का जवाब है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं हो सकती ब्रिटेन के औपनिवेशिक प्रशासक सर औलेफ़ कैरो ने तेल के कुँओं को ‘शक्ति कूप या वेल्स ऑफ पावर’ का नाम दिया था। वास्तव में मध्य एशिया की राजनीति को तेल की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति से अलग कर देखना असंभव है वहीं मध्य पूर्व को लेकर भारत की विदेश नीति एक उलझी हुई गुत्थी के समान है जिस पर सम्भावनाएं तो अनन्त नजर आती है लेकिन यह सदैव आशंकित रहती हैइसका  प्रमुख कारण भौगोलिक,ऐतिहासिक,सामाजिक,धार्मिक,सामरिक और आर्थिक  तो है ही साथ ही इस समूचे परिक्षेत्र पर अमेरिका और पाकिस्तान  का प्रभाव भी है। ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक राजनीति में भारी बदलाव आये है और उससे भारत ईरान संबंधों को प्रभावित होना ही थाईरान के तेल बेचने पर अमेरिकी प्रतिबन्ध और सऊदी अरब की कड़ी सुन्नी प्रतिद्वंदिता के चलते यह देश बदहाल हैवह अपने आर्थिक जीवन के प्रमुख आधार तेल को बेचना चाहता है और उसकी अपेक्षा अपने पारम्परिक मित्र  भारत से बढ़ जाती है। साल 2016 में अमेरिकी सत्ता ट्रम्प के हाथों में आने के बाद ट्रंप ने दुनिया के देशों को धमकी देते हुए कहा था कि ईरान से व्यापार जो करेगा वो अमरीका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा। वैश्वीकरण के युग में भारत के विश्वस्त  सहयोगी बन चूके अमेरिकी  नीति का असर भारत पर पड़ना ही था। ईरान से सबसे ज्यादा  तेल खरीदने वाला देश भारत को न चाहते हुए भी वैश्विक मजबूरियों में इसका परिपालन करना पड़ा।  करीब आठ महीने पहले ईरान के  विदेशमंत्री ने भारत के पत्रकारों  के सामने ईरान को लेकर भारत की अमेरिका प्रभावित नीति को रणनीतिक भूल बताते हुए चाबहार के भविष्य पर चिंता जताई थी


भारत के लिए शिया बाहुल्य ईरान से मजबूत सम्बन्ध और इसकी स्थिरता सामरिक और आर्थिक रूप से बेहद जरूरी मानी जाती  है। ईरान न केवल भारत को तेल उपलब्ध कराता रहा है बल्कि पाकिस्तान को रोकने की भारत की सामरिक नीति का बढ़ा अहम सदस्य माना जाता है। देखा गया है कि चीन और पाकिस्तान की सामरिक प्रतिबद्धताएं भारत,ईरान और अफगानिस्तान के लिए संकट पैदा कर रही है। इसके जवाब में भारत ने आगे बढ़कर  अपने विश्वसनीय इस्लामिक देश ईरान का सहारा लिया था। 500 मिलियन डॉलर की भारी भरकम रकम खर्च कर भारत ने चाबहार पत्तन  से पाकिस्तान-चीन के महत्वाकांक्षी ग्वादर बंदरगाह के बहुत करीब पहुँच कर चीन की वन बेल्ट वन परियोजना को चुनौती देने की संभावना जगाई थी ईरान,यूरेशिया और हिन्द महासागर के मध्य एक प्राकृतिक प्रवेश द्वार है,जिससें भारत रूस और यूरोप के बाजारों तक आसानी से पहुंच सकता हैभारत,ईरान और रूस के मध्य 16 मई 2002 को इस सम्बन्ध में एक समझौता हुआ था जिसके द्वारा ईरान होकर मध्य एशियाई राज्यों तक निर्यात करने के लिए एक उत्तर दक्षिण कॉरिडोर का निर्माण किया जा सके भारत से यूरोप होते हुए सेंट पीट्सबर्ग और रूस जाने वाले पारंपरिक मार्ग के बजाय इस मार्ग से समय में लगभग 40 प्रतिशत और खर्च में 30 प्रतिशत की बचत होती।


यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राजनीतिक अर्थव्यवस्था का आधिपत्यवादी स्थायित्व का सिद्धांत है,जिसके अंतर्गत एक प्रभुत्वकारी राष्ट्र व्यापारिक जहाजों के आवागमन के लिए अबाधित मार्ग उत्पन्न करता है तथा अन्य राज्यों की संरक्षणवादी नीतियों को परिवर्तित करने की क्षमता रखता है एशिया महाद्वीप की दो महाशक्तियां भारत और चीन की सामरिक प्रतिस्पर्धा समुद्री परिवहन और पारगमन की रणनीति पर देखी जा सकती है। चीन की पर्ल ऑफ स्प्रिंग के जाल को भेदने के तौर पर चाबहार बंदरगाह के रूप में भारत ने बेहद सामरिक दांव खेला था। चीन से चुनौती के बीच चाबहार  बंदरगाह भारत की आर्थिक ताकत बनने की आशा के प्रतीक कब तौर पर भी देखा जा रहा था गुजरात के कांडला बंदरगाह से केवल छह दिनों में चाबहार पहुंचना और वहां से रेल या सड़क के माध्यम से सामान आगे पहुंचाया जा सकने की संभावना भारत के लिए बहुत ही लाभदायक हो सकती थीभारत को ईरान से तेल,गैस और मध्य-एशिया के लिए कनेक्टिविटी चाहिए थी जिससे ताकि पाइपलाइन के ज़रिए गैस भारत लाई जा सके और इसके बदले में भारत का ईरान में निवेश बढने की संभावना भी मजबूत होतीभारत के लिए ईरान और अमेरिका से सम्बन्धों में नियन्त्रण और संतुलन कायम रखना मुश्किल था,अत: चीन को ईरान में बढ़त हासिल करने में कोई मुश्किल नहीं हुई और चाबहार का बदला घटनाक्रम इसी का परिणाम है।



बहरहाल भारत के लिए चाबहार पत्तन पर आधिपत्य का अवसर खोना रणनीतिक रूप से नुकसानदायक है तथा मध्यपूर्व में चीन की उपस्थिति से ईरान की मुश्किलें बढ़ सकती है। वहीं आने वाले समय में इजराइल और अमेरिका के साथ भारत का सामरिक सहयोग भी बढ़ सकता है और यह विविधता वाले भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।


नेपाल में देव पर दानव भारी nepal china oli

दबंग दुनिया

                            नेपाल में देव पर दानव भारी

                                                                           डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


                                                                   

साम्यवादी धर्म को मानते ही नहीं है इसलिए वे हर धर्म की निंदा करते हैं,साम्यवादी नेता अपनी राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने के लिए धर्म पर आधारित चिंतन,अवधारणाओं,संकल्पनाओं तथा सिद्धांतों को चुनौती देते है और मौका पड़ने पर वे हिंसा से जनता पर अपनी नास्तिक विचारधारा थोप देते है दरअसल नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की  भगवान राम के जन्मस्थान को लेकर विवाद उत्पन्न करने की उनकी कोशिश कम्युनिस्ट पार्टी की वह नीति ही है जिसके अनुसार धर्म के अस्तित्व को चुनौती देकर ही राजनीतिक सत्ता की इमारत को मजबूत किया जा सकता है

नेपाल में राजवंश की राजनैतिक सत्ता की समाप्ति के बाद लोकतंत्र का आगाज बेहद दिलचस्प लेकिन विवादास्पद रहा है लोकतंत्र को सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रमुख साधन माना जाता है,वहीं नेपाल के राजनीतिक संगठनों ने इसे येन-केन कर सर्वोच्च सत्ता पर बने रहने का माध्यम बना लिया है और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली इस अभियान के प्रमुख प्रणेता बनकर उभरे है

लंबे समय तक दक्षिण एशिया में भारत के प्रभुत्व रहते तक तो नेपाल ने साझा हितों का खूब प्रदर्शन किया लेकिन इस क्षेत्र में चीन के मजबूत होते ही नेपाल ने अपना रुख बेहद चालाकी से बदल लिया हैअब तक नेपाल और चीन का व्यापारिक सहयोग भारत के लिए चिंताजनक रहा है लेकिन अब नेपाल का चीन से वैचारिक समन्वय भारत के लिए चुनौती बनता जा रहा है

भारत और नेपाल के वैदिक काल से ही ऐतिहासिक सम्बन्ध रहे है और नेपाल को लेकर भारत ने सदा नैतिकता और  उदारता का परिचय दिया है। भारत से मजबूत सम्बन्ध नेपाल की सामरिक जरूरत और मजबूरी रही है,इसके बाद भी भारत ने लगातार अपनी विदेश नीति में अत्यधिक लचीलापन दिखाया मोदी जब पहली बार नेपाल की यात्रा पर गए तो उन्होंने इसे आस्था और भावनाओं से जोड़ा।  उन्होंने पशुपतिनाथ की आगन्तुक पुस्तिका में लिखा,“बागमती तट पर स्थित पशुपतिनाथ का मन्दिर आस्था एवं विश्वास का अद्वितीय केन्द्र है, स्कन्दपुराण में कहा गया है कि काशी विश्वनाथ और पशुपतिनाथ एक ही रूप है, श्रावण मास,शुक्ल पक्ष,अष्टमी पर यहाँ आकर मैं भाव-विभोर हूँ। नेपाल और भारत को जोड़ने वाले पशुपतिनाथ की कृपा दोनों देशों पर बनी रहे। यही मेरी कामना है।” इसके बाद मोदी जब फिर नेपाल गए और उन्होंने देव नीति से नेपाल का दिल जीतने की कोशिश की। अपनी नेपाल यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कूटनीति पर देवनीति को तरजीह देकर दोनों देशों के संबंध प्रगाढ़ रखने के लिए रचनात्मक दांव खेला। इस अवसर पर  जनकपुर से अयोध्या के बीच सीधी बस सेवा की भी शुरुआत कर जहां मोदी ने त्रेता युग से सम्बन्धों की गहराई का एहसास कराया, वहीं नेपाल में स्थित हिमालय की 3 हजार 700 मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर मुक्तिनाथ मन्दिर जाकर पूजा अर्चना कर यह सन्देश भी देने की कोशिश की की भारत और नेपाल के संबंध हिमालय से भी ऊँचे है।


वास्तव में व्यापार संरक्षणवाद से वैश्विक वर्चस्व बनाने के चीन के खतरनाक मंसूबों को रोकने के लिए पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने देवनीति का सहारा लिया है। यह सही है की भाषा,धर्म और देवी देवताओं के क्षेत्र में भारत और नेपाल के बीच युगों युगों से ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,भौगोलिक और धार्मिक समानता रही हैं,लेकिन बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में चीन की आक्रामक महत्वकांक्षी नीतियों का सामना देव नीति से नहीं किया जा सकता,इसे समझने की जरूरत है।

नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता और माओवादी ताकतों के प्रभाव से चीन के लिए स्थितियां माकूल बनी है और इसका फायदा चीन लगातार उठा रहा है। उसने हिमालय भेदकर भारत के राजनीतिक,आर्थिक और सामरिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण नेपाल को आर्थिक रूप से अपनी जद में ले लिया है और उसका निवेश बढ़कर 68 प्रतिशत तक पहुँच गया है। नेपाल में भारत विरोध के पीछे चीन की वृहद रणनीति रही है। चीन हमेशा से ही नेपाल के साथ विशेष सम्बन्धों का पक्षधर रहा है,तिब्बत पर कब्जे के बाद उसकी सीमाएं सीधे नेपाल से जुड़ गयी है। चीन की नेपाल नीति का मुख्य आधार था की नेपाल में बाह्य शक्तियां अपना प्रभाव न जमा सके  जिससे टी.ए.आर. अर्थात तिब्बती आटोनामस रीजन की सुरक्षा हो सके। दूसरा नेपाल में भारत के प्रभाव को कम किया जाये। उसने नेपाल में अनेक परियोजनाएं आक्रामक ढंग से शुरू कर तिब्बत से सीधी सड़क भारत के तराई क्षेत्रों तक बनाया,रेल मार्ग नेपाल की कुदारी सीमा तक बनाया,नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक और सैनिक मदद से चीन का समर्थन और आम नेपालियों में उनके द्वारा भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशें रची गयी। इसके साथ ही  चीनी सामानों की नेपाल के रास्ते भारत में डम्पिंग,माओवादी हिंसा के जरिये नेपाल से आंध्र तमिलनाडू तक रेड कॉरिडोर में भारत को उलझाएं रखना,पाक की आई.एस.आई का नेपाल में लगातार गतिविधियां,तस्करी और आतंकवादियों का भारत में प्रवेश सुलभ हुआ है।


अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप का प्रयोग किया जाता है। दक्षिण एशिया में भारत के प्रभुत्व को कम करने के लिए चीन ने हस्तक्षेप के बूते नेपाल और चीन  के बीच तिब्बत के केरुंग से ले कर काठमांडू तक रेलवे लाइन बिछाने के समझौते पर हस्ताक्षर करके भारत की उत्तरी पूर्व की सीमा के और नजदीक तक आ जाने की स्थिति में आ गया है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि भारत की विदेश नीति अहस्तक्षेप पर आधारित है। कूटनीतिज्ञ मार्गेनथाऊ कहते है कि राष्ट्र के उद्देश्यों को सदैव विवेक से संचालित किया जाता है,न की किसी सार्वभौमिक नैतिकता का पालन किया जाता है। भारत ने नेपाल को हमेशा सार्वभौमिक विचारधारा से जोड़ कर देखा वहीं साम्यवादी चीन के लिए विचारधारा एक मिथ्या चेतना है,उसने अहस्तक्षेप को दरकिनार कर भारत को नेपाल में भी घेर लिया है।


नेपाल से करीबी सम्बन्धों के बाद भी वहां की जनता में भारत विरोध बढ़ता जा रहा है, चीन के प्रभाव के चलते यह भारत की सीमाओं को भी असुरक्षित कर सकता है। जाहिर है ओली जैसी साम्यवादी राजनीतिक सत्ताओं को मजबूत होने से रोकने के लिए और नेपाल में मजबूत बने रहने के लिए भारत को देवनीति से ज्यादा कूटनीति की जरूरत है। भारतीय नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि नेपाल के साथ सांस्कृतिक,आर्थिक और राजनीतिक हितों का संरक्षण और उनके बीच बेहतर समन्वय कायम हो सके

 

 


भारत की सामरिक नीति में परिवर्तन की जरूरत indian diplomacy

   प्रजातंत्र      

          भारत की सामरिक नीति में परिवर्तन की जरूरत

                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


                                                                 

शक्ति संतुलन की व्यवस्था अस्थाई और अस्थिर होती है,वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को शांति और स्थिरता बनाये रखने का एक साधन माना जाता है,इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वैदेशिक नीति में आवश्यकता के अनुसार बदलाव करना और उसकी गतिशीलता को बनाये रखना। भारत के महान कूटनीतिज्ञ कौटिल्य ने कहा था कि शत्रुओं के प्रयत्नों की समीक्षा करते रहना चाहिए। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि मध्यकाल में जिस महान अर्थशास्त्री ने अपनी कूटनीति की बदौलत तत्कालीन समय के सबसे सशक्त राजघराने को नष्ट कर दिया था]उस महान कूटनीतिज्ञ को समझने का दावा करने वाले भारतीय वर्तमान में अपने सामरिक हितों की रक्षा करने के लिए संघर्षरत है और इसका प्रमुख कारण यथार्थवादी वैदेशिक नीति का अभाव रहा है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी सिद्धांत यह कहता है कि किसी सम्प्रभु राष्ट्र के लिए शक्ति,शक्ति संतुलन,राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी संकल्पनाएं महत्वपूर्ण है और राष्ट्र की सुरक्षा उसका स्वयं का दायित्व है।



दरअसल सीमा पर चीन की लगातार चुनौतियों से उत्पन्न हुई परिस्थितियां भारत के वैदेशिक सम्बन्धों को नये सिरे से परिभाषित कर रही है और इसका प्रभाव आने वाले समय में देखने को मिल सकता है। विश्व राजनीति में पिछले कुछ दशकों में तेजी से परिवर्तन आया है तथा इन परिवर्तनों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रतिमानों को भी बदल दिया है। बदलती विश्व व्यवस्था ने नए वैश्विक किरदारों को जन्म दिया है और सोवियत संघ के विघटन के बाद तो पूरा वैश्विक परिदृश्य ही बदल गया है। 1962 में चीन युद्ध के बाद भारत चीन युद्ध और भारत की नाकामी ने यह एहसास कराया था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति स्वप्नलोक से नहीं बल्कि सतर्क नीतियों से चलती है तथा किसी भी देश की विश्व राजनीति में भूमिका उसके आर्थिक] राजनीतिक व सैनिक शक्ति के रुप में विकास व स्थिति पर निर्भर करती है। खासकर 1962 के युद्ध ने भारत के आर्थिक और सामरिक कमजोरी को उजागर किया तथा यह स्पष्ट हो गया कि ऐसी कमियों के चलते विश्व राजनीति में स्थान बनाना नामुमकिन है।

70 का दशक भारत की विदेशनीति में बदलाव लेकर आया जब 1971 में इंदिरा गांधी ने एक रणनीतिक रक्षा संधि कर भारत की पारम्परिक गुटनिरपेक्ष नीति को बदल दिया। इस दौर में यह कहा जाने लगा कि भारतीय विदेश नीति यथार्थवाद की ओर बढ़ रही है। सोवियत संघ से मैत्री संधि तथा बंगलादेश के स्वतंत्र राज्य के रुप में उदय में उसकी निर्णायक भूमिका ने अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर भारत के कद को बढाया। यह सोवियत संघ से मित्रता ही थी कि अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा हिन्द महासागर से ही लौट गया और चीन को खामोशी से अपने मित्र राष्ट्र पाकिस्तान के टुकड़े होते देखना पडा। संयुक्त राष्ट्र संघ में अनेक मौकों पर भारत का रुस ने सहयोग कर अप्रिय स्थिति से बचाएं रखा। यहां तक कि सुरक्षा परिषद में सदस्यता को लेकर भारत के दावे को रुस पुरजोर तरीके से उठाता रहा है और कश्मीर को लेकर अमेरिका ने कई बार भारत को घेरने की कोशिश की लेकिन रुस के कारण उसे नाकाम होना पडा।



वर्तमान में रुस भारत का एक प्रमुख सामरिक सहयोगी देश है। भारतीय नौसेना लगभग पूरी तरीके से रुसी उपकरणों तथा रुसी हथियारों से लैस है और भारतीय वायुसेना में भी 70 प्रतिशत हथियार और उपकरण रुस में उत्पादित है। दुनिया के किसी भी दूसरे देश के साथ भारत का इतने विशाल स्तर पर सामरिक सहयोग नहीं है।1974 में भारत द्वारा किया गया परमाणु परीक्षण हो या युद्धपोत पनडुब्बी,आधुनिकतम टैंक]मिसाइल तकनीकी]स्पेस तकनीकी या पंचवर्षीय योजनाएं रुस ने एक अच्छे मित्र की तरह सदैव भारत के पक्ष में आवाज बुलन्द की है। पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा भी था कि रुस एक भरोसेमंद विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार है और हमारी विदेश नीति का स्तम्भ है। वास्तव में रुस ने लगातार भारत से मित्रता को साबित भी किया।

लेकिन इन सबके बीच इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि विश्व मंच पर भारत के पारम्परिक मित्र रूस की भूमिका चीन को लेकर अलग रही है और भारत के लिए इसके घातक परिणाम हुए है। चीन और भारत के बीच सीमा पर हाल में हिंसक संघर्ष के बाद युद्द जैसी स्थितियों में भारत के परम्परागत मित्र रूस ने ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं की जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। 2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी और रुस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की मुलाकात हुई थी तो नरेन्द्र मोदी की वह बात सबसे ज्यादा चर्चित हुई थी की,भारत में बच्चा भी जानता है कि रुस भारत का सबसे अच्छा दोस्त है।

भारत के सबसे बड़े सामरिक दोस्त रूस पर भारत का भरोसा संकटकाल में बहुत ज्यादा बढ़ जाता है लेकिन चीन को लेकर स्थितियां भयानक रूप से विपरीत देखी गई है। 1962 के भारत चीन युद्द में रूस के सर्वोच्च नेता खुश्चेव ने भारत को लड़ाकू विमानों की खेप भेजने में देरी करके अप्रत्यक्ष रूप से चीन की मदद की थी। इस समय यह माना गया कि रूस यह मानता है कि भारत उसका दोस्त है लेकिन चीन उसका छोटा भाई है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि यह वह दौर था जब चीन,तत्कालीन सोवियत संघ को अपना पारम्परिक शत्रु बताता रहता था और यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी की रूस भारत की कीमत पर चीन को मदद दे सकता है। भारत से युद्द के बाद चीन  का 1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर रूस से युद्द हुआ था और रूस की परमाणु हमलें की धमकी के बाद चीन ने वहां से कदम पीछे खींच लिए थेलेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन और वैश्वीकरण की नीति के बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलने के साथ चीन का आर्थिक दबदबा बढ़ा और उसे रूस पर बढ़त हासिल हो गई इसी का प्रभाव है कि चीन का रूस से सीमा विवाद लगभग समाप्त हो चूका है2004 में  रूस और चीन के बीच हुए समझौते में सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था इस समय चीन और रूस आर्थिक साझेदारी को लगातार बढ़ा रहे है,चीन रूस से गैस और हथियार खरीद रहा है,वहीं चीन की कई कम्पनियां रूस में बड़े पैमाने पर निर्माण में मदद कर रही है



दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गलियारे ‘वन बेल्ट-वन रोड’ परियोजना को लेकर 2017 में चीन में  द्वारा आयोजित शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन शामिल हुए थे जबकि भारत ने इसके मार्ग को विवादित बताकर इस सम्मेलन का बहिष्कार किया गौरतलब है कि पाकिस्तान और चीन के बीच सीपीईसी और काराकोरम हाइवे का जो संबंध है उसमें भारत का विरोध हैभारत का विरोध इसलिए है कि चीन ने बिना भारत की अनुमति के पीओके से रास्ता निकाल दिया,जबकि यह इलाका भारत के अंतर्गत आता है। भारत चीन के बीच सीमा विवाद में यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और भारत ने अब अपने नक्शे में अक्साई चीन को अपना इलाका बताकर चीन की विस्तारवादी नीति को कड़ा संदेश भी दिया है।

पिछले एक दशक में चीन ने दक्षिण चीन सागर में चीन ने अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए आक्रामक नीति का सहारा लिया है,अमेरिका समेत हिन्द महासागर के तटीय देशों से चीन के सम्बन्ध बेहद खराब है,अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर हो या अन्य विवादित मुद्दे,रूस को कभी भी चीन  का  विरोध करते नहीं देखा गया। उत्तर कोरिया और ईरान जैसे मुद्दों पर भी रूस और चीन के एक सुर देखने को मिले। यहाँ तक कि कोविड-19 को लेकर चीन पर वैश्विक शिकंजे के बीच रूस ने अमेरिका को नसीहत दे डाली की वह बिना सबूत के चीन पर दबाव बनाने की कोशिश न करें।

 

बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव रूस और भारत के सम्बन्धों पर भी पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लडाकू विमान खरीदने में फ्रांस,अमेरिका और इजराईल से समझौते किए है। भारत का रूस सबसे बड़ा सामरिक साझेदार है अत: भारत के अन्य देशों से रक्षा समझौतों को उसके लिए  बड़ा नुकसान माना गया। इस बीच रूस ने चीन के साथ ही पाकिस्तान से सामरिक सहयोग करने में दिलचस्पी दिखाई और पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष और नेताओं ने रुस की लगातार  यात्राएं भी की। इस प्रकार रूस का हथियारों की बिक्री को लेकर व्यवसायिक दृष्टिकोण सामने आ रहा है। रुस हमारा पुराना मित्र और बड़ा सहयोगी रहा है लेकिन चीन और पाकिस्तान ने रूस से मजबूत सम्बन्ध करके भारत-रूस सम्बन्धों की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है।

इस समय भारत की सबसे बड़ी चुनौती चीन का सामना करने को लेकर है और इसके लिए भारत को सामरिक,आर्थिक और वैश्विक मोर्चे पर एक मजबूत मित्र की जरूरत है।  भारत-चीन की प्रतिद्वंदिता में रूस का रुख जहां भारत के अनुकूल नहीं माना जा सकता वहीं इस मामलें में अमेरिका ने मजबूती से भारत का साथ दिया है।1962 के युद्द में भी अमेरिका ने अपने युद्दक विमानों को भारत की मदद के लिए भेजने का विश्वास दिलाकर चीन पर ऐसा मनौवैज्ञानिक दबाव डाला कि वह युद्द से पीछे हटने  को मजबूर हो गया था। हाल के भारत चीन सीमा तनाव के बीच अमेरिकी प्रशासन ने भारत के कदमों की सराहना करते हुए चीन की आलोचना की थी।

वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है और न ही कोई स्थाई शत्रु होता है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और उदारीकरण की शुरुआत ने विश्व को एक ध्रुवीय किया तथा एक बाजार के रुप में भारत की पहचान बनी। अपने आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अमेरिका का भारत को गले लगाना लाजमी था और आज वह भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र कहा जाता है,इतना विश्वसनीय कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा को दुनिया मिस्टर ओबामा कहती थी जबकि भारतीय प्रधानमंत्री ने उन्हें बराक कहने में भी संकोच नहीं  किया।


तिब्बत,हांगकांग,ताईवान और दक्षिण चीन सागर पर चीन के आक्रामक नीतियों को लेकर अमेरिका मुखर रहा है और उसकी यह नीति भारत के अनुकूल है। चीन वन चाईना नीति को लेकर सजग रहा है और भारत उसे इसी आधार पर चुनौती दे सकता है।  कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन की अलग वीजा देने की नीति भारत के लिए असहज रही है। यही वह मौका है जब भारत को हांगकांग में लोकतंत्र की बहाली की मांग करना चाहिए,ताईवान को अलग से वीजा और तिब्बत की स्वायतता का समर्थन करना चाहिए। जाहिर है इन मुद्दों पर भारत और अमेरिका मिलकर चीन को घेर सकते है,चीन पर दबाव डालने के लिए भारत की विदेश नीति में यथार्थवादी बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है।

बहरहाल दक्षिण एशिया और हिमालय में मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारत को मजबूत सामरिक भागीदारी की जरूरत है। अमेरिका इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन के लिए न केवल एक बेहतर विकल्प बन सकता है बल्कि चीन और पाकिस्तान को रोकने के लिए अमेरिकी आक्रामकता भारत की थल और जल सीमा के लिए भी बेहद मददगार और कारगर हो सकती है। राष्ट्रहित सर्वोपरी होते है और भारत को सीमा की सुरक्षा के लिए अपनी सामरिक नीति में परिवर्तन करने की और मजबूती से आगे बढ़ना  चाहिए।

 

 


brahmadeep alune

ताइवान पर आक्रामक नीति,जनसत्ता taivan china janstaa

  जनसत्ता                                                                                  प्रशांत महासागर के पूर्व में अमेरिका तथ...