चीन की शह पर उछलता नेपाल



नेपाली चुनौती का संकट

                                                                             ब्रह्मदीप अलूने

साम्यवाद की हिंसक और कुटिल विचारधारा का जियो और जीने दो की मानवीय विचारधारा से कोई सामीप्य नहीं हो सकता लेकिन भौगोलिक परिस्थितियों की विषमताओं और भिन्नताओं के अनुसार राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि करना किसी भी सम्प्रभू राष्ट्र की मजबूरी होती है। भारत के उत्तर पूर्व में स्थित नेपाल सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है,हिमालय से आने वाली अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करने और अपने पारंपरिक प्रतिद्वंदी चीन को रोकने के लिए भारत के लिए नेपाल से मजबूत संबंध और उसका सुरक्षित रहना अनिवार्य माना जाता है। भारत से सांस्कृतिक,भौगोलिक,आर्थिक और सामाजिक मजबूत सम्बन्धों के बाद भी यह देखा गया है कि नेपाल की वैदेशिक नीति लगातार भारत की सामरिक अनिवार्यता को नजरअंदाज करने को तत्पर रहती है।

दरअसल इस समय कालापानी की जमीन को लेकर नेपाल का आक्रामक रुख उसकी उन नीतियों की पुष्टि करता है जिसके अनुसार भारत विरोध उसकी राष्ट्रीय राजनीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। नेपाल के पश्चिमी छोर पर स्थित कालापानी उत्तराखंड में स्थित है,भारत,नेपाल और तिब्बत से लगा यह समूचा इलाका भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  372 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में फिलहाल भारत का नियंत्रण है लेकिन नेपाल ने इस पर दावा कर इसे विवादित बनाने की कोशिश की है। कैलाश पर्वत  मानसरोवर कि धार्मिक यात्रा के साथ प्राचीनकाल से व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के लिए यह आवागमन का मार्ग है जो भारत और तिब्बत को जोड़ता है।

भारत और नेपाल के बीच सामरिक रिश्तों का बड़ा आधार दोनों देशों के बीच 1950 में हुई शांति और मैत्री संधि है जिसके अनुसार तिब्बत,नेपाल और भूटान के मध्य दर्रों पर भारत और नेपाली सैनिक संयुक्त रूप से नियुक्त किए जाएंगे। यह भी बेहद दिलचस्प है कि इस संधि के अंतर्गत ही काठमांडू में एक भारतीय सैनिक मिशन स्थापित किया गया था जिसका कार्य नेपाली सेना को प्रशिक्षण देना था लेकिन अब वही नेपाली सेना भारत को चुनौती देने का साहस करती हुई दिखाई दे रही है।

ब्रिटिश साम्राज्य के लिए नेपाल जारशाही वाले रूस तथा मांचू साम्राज्य वाले चीन के बीच एक ऐसा बफर राष्ट्र रहा जो अंग्रेजों के लिए रक्षा कवच का काम करता था। आज़ादी के बाद भी साम्यवादी चीन और भारत के बीच फंसे  नेपाल की सामरिक महत्ता बरकरार रही है। गोरखा साम्राज्य के संस्थापक महाराज पृथ्वी नारायण शाह ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया था कि नेपाल कि स्थिति दो बड़ी चट्टानों के बीच स्थित जिमीकंद के समान है,जो फालना फूलना चाहता है तो उसे निरंतर ध्यान में रखना होगा। नेपाल इस सिद्धांत पर आज भी चलना चाहता है और वह भारत और चीन के साथ समदूरी बनाकर रखना चाहता है जबकि भारत को यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है।  भारत के नेपाल के साथ विशिष्ट संबंध है और भारत कि नीति उसे बरकरार रखने की है। तराई,जंगल,वन,नदियां भौगोलिक रूप से भारत और नेपाल को इस प्रकार जोड़ती है कि कई स्थानों पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि यह किस देश में है। यही कारण है कि दोनों देशों के नागरिक बेरोकटोक एक दूसरे के यहाँ आते जाते रहे है। रोटी बेटी के संबंध के साथ है दोनों देशों के सांस्कृतिक,भाषाई और आर्थिक संबंध भी एक दूसरे के साथ ताने बाने में गूँथे हुए है।  भारत में बहने वाली अधिकांश नदियों का उदगम स्थल नेपाल में है,अत: नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर है। भारत लगातार नेपाल के विकास में अपना अहम योगदान देता रहा है। नेपाल में भूकंप के बाद उसके पुनर्निर्माण के लिए भारत ने बड़ी सहायता की लेकिन नेपाल की वामपंथी सरकार ने इसके विपरीत परिणाम दिये।

भारत द्वारा चीन की महात्वकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड का व्यापक विरोध नजरअंदाज करके नेपाल इस परियोजना में शामिल हो गया। नेपाल भारत पर से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इसके पीछे उसकी स्पष्ट नीति रही की चीन नेपाल में सड़कों,रेलमार्गों,बंदरगाहों और औद्योगिक क्षेत्रों के निर्माण में भारी निवेश करेगा। इस समय नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है और इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा नेपाल स्थित चीन का दूतावास उठा रहा है। चीन और नेपाल के बीच रेल लाइन भी बिछाई गई ताकि दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़े। अपने पहले कार्यकाल में भी ओली ने चीन का दौरा किया था और उन्होंने ट्रांज़िट ट्रेड समझौते पर हस्ताक्षर किए थे,इसके पीछे नेपाल की रणनीति यह थी की चीन तिब्बत से लगते हुए सड़कों का जाल फैलाएँ और नेपाल को भी जोड़े,जिससे भारत पर से उसकी निर्भरता कम हो। नेपाल और चीन  के बीच तिब्बत के केरुंग से लेकर काठमांडू तक रेलवे लाइन बिछाने के समझौते के बाद चीन की स्थिति बेहद मजबूत हो गई है और वह भारत की उत्तरी पूर्व की सीमा के और नजदीक तक आ जाने की स्थिति में आ गया हैइस प्रकार नेपाल चीन की भारत को घेरने की नीति में मददगार बन गया है।

कालापानी समेत पूर्वोत्तर के सरहदी इलाके और भारत और तिब्बत के बीच स्थित नेपाल की सुरक्षा भारत के लिए संवेदनशील विषय रहा है। 40 के दशक में भारत की आज़ादी और चीन मे साम्यवाद के उभार के समय भारत और चीन के संबंध बेहद मधुर थे लेकिन इसके बाद भी भारत ने नेपाल के सामरिक महत्व को समझते हुए नेपाली सीमा पर अपने सैनिक तैनात किए और नेपाली सेना का आधुनिकीकरण भी कियाभारत के पहले राष्ट्रपति ने 1956 में अपनी नेपाल यात्रा के दौरान यह साफ कहा था कि नेपाल के मित्र हमारे मित्र है और नेपाल के शत्रु हमारे शत्रु।  

भारत ने लगातार नेपाल की बेहतरी के लिए अपने दरवाजें खुले रखे है और उसका रुख लगातार सकारात्मक रहा है। दोनों देशों के बीच 1950 में शांति और मित्रता कि संधि भारत के नेपाल को दिये जाने वाले प्राथमिक और सामरिक महत्व को प्रतिबिम्बित करती है। इस संधि के अंतर्गत दोनों देशों के बीच खुली सीमा का सिद्धांत लागू है। 1850 किलोमीटर लम्बी इस सीमा पर दोनों देशों के नागरिक बिना पासपोर्ट के एक दूसरे के देशों में आ जा सकते है। वास्तव में भारत ने लगातार नेपाल की बेहतरी के लिए अपने दरवाजें खुले रखे है और उसका रुख लगातार सकारात्मक रहा है। अभी तक नेपाल भारत के लिए एक ऐसा भूभाग से जुड़ा देश है जिसका लगभग सारा आयात और निर्यात भारत से होकर जाता है,भारत के कोलकाता और अन्य बंदरगाहों से नेपाल को व्यापार सुविधा तथा भारत होकर उस व्यापार के लिए पारगमन की सुविधा प्रदान की गयी है। नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योकि भारत में बहने वाली नदियों का उदगम भी इन क्षेत्रों में पड़ता है।

पिछलें कुछ सालों से नेपाल कि राजनीति में वामपंथी विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों का प्रभाव बढ्ने से इसका असर भारत नेपाल सम्बन्धों पर पड़ा है। इस समय नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.ओली जिस वामपंथी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे है उसमें  यूसीपीएन-माओवादी जैसे चीन समर्थित दल शामिल है। ओली पुराने मुद्दों को उभार कर नेपाल में भारत विरोध को बढ़ाने की अपनी राजनीतिक विचारधारा को हवा दे रहे है। नेपाल 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि को आधार बताता रहा है वहीं भारत 1950 की शांति और मैत्री संधि को प्राथमिकता देता है। सुगौली संधि जो अब पूरी तरह से अप्रासंगिक है, उसके अनुसार काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था जबकि 1962 में भारत और चीन में युद्ध हुआ तो भारतीय सेना ने कालापानी में चौकी बनाई, यह स्थिति इस समय भी बनी हुई है। प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने भारत के नए नक्शे का विरोध कर भी अप्रिय स्थिति उत्पन्न की है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद भारत ने नया नक्शा जारी किया था,इस नक्शे में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगितबाल्टिस्तान और कुछ हिस्सों को शामिल किया गया था। इस नक्शे में कालापानी को पहले की तरह ही भारत का भाग बताया गया है।

नेपाली सैनिकों को भी भारतीय सैनिकों के समान ही वन रैंक-वन पेंशन योजना का लाभ, नेपाल के विद्यार्थियों के लिए आईआईटी में प्रवेश के साथ कई सुविधाओं के बाद भी भारत विरोध नेपाल में लगातार बढ़ रहा है। चीन ने नेपाल में आक्रामक परियोजनाएं शुरू करके अपने प्रभाव को भारत के तराई क्षेत्रों तक बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है। इसके साथ ही वह नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक और सैनिक कर चीन का समर्थन और आम नेपालियों में उनके द्वारा भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशें रचने में कामयाब होता दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही नेपाल से भारत की खुली सीमा का भारी दुरुपयोग होकर अब यह समस्या का कारण भी बन गई है। चीनी सामानों की भारत में डम्पिंग,माओवाद की नेपाल से आंध्र तमिलनाडू तक रेड कॉरिडोर में  उपस्थिति और मजबूती,पाक की खुफियाँ एजेंसी आईएसआई की नेपाल में लगातार गतिविधियां तथा तस्करों और आतंकवादियों का प्रवेश नेपाल के रास्ते आसान माना जाता है।

पूर्वकाल से ही नेपाल के राजा महाराजाओं ने अपने देश कि पहचान को भारत से अलग रखने के लिए कई कोशिशें की है। यह  सब जानते हुए भी भारत ने नेपाल को लेकर लगातार बेहद उदार रवैया अपनाया,लेकिन इस समय भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए नेपाल को सख्त संदेश देने की यथार्थवादी नीति अपनाने पर विचार करना चाहिए। 

                                                                          

आत्मनिर्भरता का पहला पाठ गांधी जी का स्वदेशी था - डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


प्रजातन्त्र

            गांधी के आचरण और व्यवहार की आत्मनिर्भरता में समाधान है

                                                                           डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                      [गांधी है तो भारत है,पुस्तक के लेखक] 

केंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और इतिहासकार एफ.डब्ल्यू.मीटलैंड अपने छात्रों को अक्सर याद दिलाते रहते थे कि,“जो कुछ भी अतीत है,वह भी कभी भविष्य की बात होगी।” दरअसल आधुनिक भारत की प्रगति के भौतिकवाद के कई दशकों को भोगने के साथ वैश्विक आर्थिक महाशक्ति होने का राजनीतिक दंभ एक महामारी के सामने कुछ महीनों में ही चूर चूर हो गया।

महात्मा गांधी भविष्यवक्ता  नहीं थे लेकिन भारत को लेकर उनकी दृष्टि अन्यों के मुक़ाबले साफ और जमीनी थी। पुरानी पीढ़ी के लिए गांधी एक धुंधली याद है वहीं युवा और नव चेतन पीढ़ी के लिए गांधी कोई विवादित रहस्य की तरह प्रगट होते है। इस समय देश की डूबती हुई नैया को पार लगाने के लिए जैसे ही आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की जरूरत महसूस करते हुए इसकी अनुगूंज हुई,वैसे ही गांधी एक बार फिर जरूरत की तरह सामने आ गए। जब जब मानवीय संकट होते है तब तब गांधी अक्सर याद आ ही जाते है।

डोमिनीक लापिएर ने फ़्रीडम -एट-मिडनाइट में महात्मा गांधी को याद करते हुए लिखा है कि उन्होंने गंगा जमुना का जल पी-पीकर कोका कोला पीने वाले ब्रिटेन को घुटने टेकने पर विवश कर दिया था। भारत की आत्मनिर्भरता महात्मा गांधी के लिए कभी न रुकने देने का एहसास था और वे इसे सही रास्ते पर लाने के लिए आचरण और व्यवहार से शुद्ध ग्रामीण भारतीय बन गए थे। वे मिट्टी को छानकर एक थैली में भर लेते थे और फिर उसे गीला करके अपने पेट पर या अपने गंजे सिर पर रख लेते थे। गोबर से लीपे घरों में शरीर की आंतरिक और बाहय ठंडक बनाएँ रखने का यह उनका बेहतरीन देशी तरीका था। देशी खान पान और रहन सहन के कारण ही गांधी वृद्धा अवस्था में कड़ी धूप में भी तेजी से कई किलोमीटर चल लिया करते थे और कभी थकते भी नहीं थे। ऐसा उनसे आधी उम्र के लोग भी नहीं कर पाते थे। गांधी के आश्रम में कुछ नियम थे जिनका सख्ती से पालन किया जाता था। वहाँ पर सभी काम आश्रम में रहने वाले स्वयं करते थे। इन सबके साथ यह भी जरूरी था कि आश्रमवासी अपनी रोज की जरूरतों से जुड़े दस्तकारी के कई काम भी सीखते थे,जैसे अगरबत्ती बनाना,चप्पलें बनाना,कपड़ा बुनना आदि। गांधी जी ने खुद भी लकड़ी की खड़ाऊँ बनाना सीखा था। आश्रम पूरे समुदाय को एक परिवार की तरह एक साथ रहने की प्रेरणा देते थे जहां सभी लोग मिलजुल कर काम करते थे और आत्म निर्भर थे। गांधी जी श्रम का सम्मान करते थे और उस पर अमल भी करते थे। स्वदेशी होना और स्वदेशी के उपयोग पर गर्व करने की क्रांतिकारी विचारधारा गांधी की ही देन है।



यह भी बेहद  दिलचस्प है की 1917 में भारत ने महामारी और अकाल का संकट झेला था और इससे भारतीय समाज पूरी तरह से टूट गया था। उपनिवेशवाद का दबाव तो था ही।  महात्मा गांधी ने उपनिवेशवाद का प्रभाव खत्म करने और लोगों में आशा का भाव जगाने के लिए स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का मंत्र फूंका। ठीक 100 साल पहले 1920 में भारत में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था,गांधी ने बिखरे पड़े स्वतन्त्रता के आंदोलन को भारतीय राष्ट्रवाद की माला में पिरोकर सभी को साथ लाने का हैरतअंगेज और नामुमकिन कार्य कर दिखाया था। उपनिवेश के अभिशाप से बाहर निकालने के लिए गांधी ने असहयोग आंदोलन में जो उद्देश्य निर्धारित किए थे उसके अनुसार विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाये तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और उसका प्रसार किया जाये, बेरोजगारों और अर्द्ध बेरोजगारों में करीब 20 लाख चरखों का वितरण तथा जनता द्वारा सूत कातना और खादी का निर्माण करना जैसे कार्य शामिल किए गए। गांधी के आह्वान पर आज़ादी का क्रांतिकारी आंदोलन जन आंदोलन बन गया और उनकी रचनात्मक प्रेरणा से राष्ट्रवाद के प्रसार के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा,स्वदेशी वस्त्र,स्वदेशी संस्थाओं एवं हिन्दी की लोकप्रियता में वृद्धि हुई। इसने भारतीयों में आत्मसम्मान तथा निर्भीकता की भावना उत्पन्न की।

गांधी के बाद के भारत ने आठवें दशक में प्रवेश कर लिया है और इस समय वह गहरे आर्थिक संकट से निकलने के लिए गांधी के आत्मनिर्भरता को आत्मसात कर लेना चाहता है। लेकिन क्या भारत ऐसा कर पाएगा और यहाँ यह भी विचार करना आवश्यक है कि गांधी कि योजना पर यह भारत आगे क्यों न बढ़ाया गया। निश्चित ही यदि गांधी के स्वदेशी मंत्र को अपनाया होता तो देश में प्रवासी मजदूरों कि बेबसी,लाचारी और गरीबी से उपजा जो मानवीय संकट सामने आया है,उसके गवाह बनकर हम स्वयं को लज्जित महसूस न करते।

आज़ादी के बाद भारत के विकास की सबसे वृहत कार्य योजना जो तैयार की गई थी उसे पंचवर्षीय योजना कहा जाता है,मोटे तौर पर इसके उद्देश्य,लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए ऊंची संवृद्धि दर,सामाजिक न्याय तथा आर्थिक स्वावलंबन या आत्म निर्भरता रही। हमारी ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था होने और देश कि बड़ी आबादी की कृषि पर निर्भरता होने के बाद भी एक उन्नत औद्योगिक और नगरीकृत समाज का निर्माण कैसे किया जाए,यह हमारी सरकारों की प्राथमिकता रही। अंग्रेजों ने सामंती अर्थव्यवस्था को उपनिवेशी रूपान्तरण करने का प्रयास किया।  हमने निजी पूंजीवाद को बढ़ावा देकर सामंती अर्थव्यवस्था को औद्योगिक पूंजीवाद के नए कलेवर में स्वीकार कर लिया।

गांधी गाँव के व्यक्ति को गाँव में ही रोजगार देने के हिमायती थे जबकि हमारी सरकारों की नीतियाँ निरंतर कॉरपोरेट सेक्टर को बढ़ावा देती रही और उसे ही  उन्होंने विकास का पैमाना माना। इन सब कारणों से गाँव का विकास अवरुद्द हो गया और गरीबों का पलायन शहर की और तेजी से होने लगा। गांधी आदर्श गाँव की कल्पना कर सभी आधारभूत सुविधाएं गांवों में उपलब्ध करने के हिमायती थे,वहीं भारत की लोकतांत्रिक सरकारें शहरों को शिक्षा,स्वास्थ्य और विकास की सौगात देती रही जबकि गाँव में लोगों को रोजगार न मिला,शिक्षा,स्वास्थ्य, ग्रामीण इलाक़ों में पीने के पानी की समस्या,सिंचाई समस्या,दूर संचार,सड़कें न होने से गांवों से पलायन बढ़ गया।

किसानों को लेकर भी देश की नीतियाँ उपनिवेशवादी भारत की याद दिलाती है। ब्रिटिश शासन काल में कृषि ऋणग्रस्तता में अभूतपूर्व और सतत वृद्धि हुई। केंद्रीय बैंक अन्वेषण  समिति 1932 का अनुमान था की 1930 के आरंभ में यह ऋण बढ़ कर 900 करोड़ रुपए हो गया था। किसान इस समय भी गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। उस पर करीब 13-14 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है। किसान करीब 65 फीसदी कर्ज ही फसल ऋण के रूप में लेता है। बैंकों में ही 7.68 करोड़ कृषि ऋण खाते हैं, कुल 7.68 करोड़ खातों में से 3.87 करोड़ खाते छोटे और सीमांत किसानों के हैं। किसान से ज्यादा कॉरपोरेट को तरजीह देने से यह स्थिति बनी है।

कोरोना महामारी के बाद हम लगभग 40-50 साल पिछड़ जाएंगे,इसका अंदेशा बना हुआ है। आज़ादी के बाद शुरू के तीस सालों में  हमारी संवृद्धि दर औसतन 3.73 फीसदी प्रतिवर्ष रही, यह उपनिवेश काल  से बहुत बेहतर थी। इस समय हालात कुछ ऐसे ही हो गए है की हमारी संवृद्धि दर घटकर 4 फीसदी तक चली जाएगी। इसका गहरा असर सवा अरब वाले इस देश पर पड़ेगा। 4 फीसदी प्रतिवर्ष संवृद्धि दर के साथ इतनी बड़ी जनसंख्या की निर्धनता,बेरोजगारी,आवास,शिक्षा,स्वास्थ्य,पिछड़ापन,सुरक्षा,प्रदूषित पर्यावरण, अशुद्ध पानी  जैसी विशाल समस्याओं को कैसे सुलझायेंगे,इन चुनौतियों से जूझना पड़ेगा।

इस समय की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि कॉरपोरेट सेक्टर को ज़्यादा पैसे न देकर असंगठित क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाए,गांवों के साथ शहरों में भी सरकार को रोज़गार गारंटी की स्कीम शुरू की जाए। छोटे और कुटीर उद्योग गाँव और शहर दोनों में ही प्राथमिकता में हो इससे जिनके पास काम नहीं है उनको भी काम मिलना शुरू हो जाएगा।

जो लोग शहरों से गांवों की ओर पलायन कर गए हैं और उनके पास रोज़गार नहीं है तो उन्हें अपने घर और गाँव में ही काम मिले,इसके लिए गांवों में शिक्षा,स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल,सिंचाई सुविधा,दूरसंचार,सड़कें बनाने के  साथ ठोस कार्य योजना बनानी होगी। इन सब को बेहतर बनाने में ख़र्च बढ़ाया जाए तो वहां से हालात बेहतर होंगे और असंगठित क्षेत्र की वजह से अर्थव्यवस्था की हालत सुधरेगी। गांवों में कृषकों,दस्तकारों और छोटे मझोले उद्योगों को स्वत: प्रेरित करने के लिए संगठित और समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए जिससे वित्तीय आत्म निर्भरता  बढ़ेगी और देश की विदेशी निधियों पर निर्भरता को खत्म किया जा सकेगा।


फ़्रीडम एट मिडनाइट में गांधी से जुड़े एक दिलचस्प किस्से का जिक्र किया गया है,1947 में दंगा प्रभावित बंगाल के श्रीरामपूरा की कच्ची पगडंडियों के रास्ते 77 वर्षीय वृद्ध अपने खोये हुए सपने की खोज में बांस की एक लंबी लाठी लिए लंबे लंबे डग भरता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। जब गांधी जी की यह टोली कटे हुए धान के खेतों के पार आँख से ओझल होने लगी,तो गाँव वालों ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक महान कविता बड़ी लय के साथ उन्हें गाते हुए सुना। यह इस वृद्द नेता की प्रिय कविता थी और जब वह आँख से ओझल हो गए तब भी वे धान के खेतों के पास से आती हुई उनकी ऊंची बेसुरी आवाज सुनते रहे। वह गा रहे थे,जोदि तोर दक शुने केऊ ना ऐसे तबे एकला चलो रे,एकला चालो,एकला चालो,एकला चालो।” इस बंगाली कविता का हिंदी में अर्थ है कि, यदि आपकी बात का कोई उत्तर नहीं देता है, तब अपने ही तरीके से अकेले चलो।”

गांधी भारत को दिशा दिखाते अकेले चलते रहे और इस विश्वास के साथ इस दुनिया से गए होंगे की भारत उनके बताएं रास्ते पर चलेगा। गांधी को जरूरत समझे या मजबूरी लेकिन वे हमेशा प्रासंगिक है। भारत के अतीत,वर्तमान और भविष्य को लेकर गांधी की समझ का और कोई विकल्प नहीं हो सकता। समय का पहिया घूमकर वहीं आ गया है और आसन्न संकट में गांधी की आत्मनिर्भरता की सीख सामने है।  


मौत के मार्ग पर मौन मजदूर

दबंग दुनिया

                            मौत के मार्ग पर मौन मजदूर

                                                                         डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                                      विश्लेषक


गरीबी,बेबसी,लाचारी और मजबूरी के कठिन वास्तों से गुजर कर अपनी जिंदगी में दो जून रोटी जुटा पाने वाले मजदूरों के लिए टेढ़े मेढ़े रास्ते ही मुफीद होते है। काश,यह बात उन मजदूरों को भी याद होती जिन्होंने ट्रेन के सीधे और कम दूरी वाले रास्ते का चयन कर पटरियों को अपना हमराह बनाया था। दरअसल कोरोना संकट से उपजी जो हकीकत सामने आ रही है उससे यह साफ हो गया है कि आज़ादी के बाद सात दशक पार कर चुका दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और विकास की ऊंचाइयों के दावे करने वाला यह देश गरीबों के लिए कब्रगाह साबित हुआ है।  

दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था,चाँद पर मानव भेजने की कोशिशें,अंतरिक्ष शक्ति,परमाणु शक्ति जैसी ऊंचाइयों को छूकर वैश्विक शक्ति बनने की धून में आम आदमी का रोटी,कपड़ा और मकान का सपना निरंतर धराशायी होता रहा। लॉकडाउन के बाद विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चिंता में डूबने वाला भारत का पूंजीवादी समाज भारत की बाकी प्रभावित बड़ी आबादी के लोक कल्याण और जरूरतों पर पूरी तरह हावी हो गया। इसका गहरा असर सड़कों पर हाँफते,बेबस और जान गँवाते मजदूरों के रूप में भयावह तरीके से सामने आया। लॉकडाउन के बाद राज्य सरकारों से केंद्र द्वारा मजदूरों का ध्यान रखने की गुजारिश दम तोड़ गई,उद्योगपतियों ने मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया,ठेकेदारों और दलालों ने मोबाइल बंद कर लिए। अंतत: भूख से ज़िंदा बचने के लिए मजदूर अपने घरों की और लौट जाने को मजबूर हो गए। दिल्ली में एक निजी रेस्टोरेंट के लिए काम करने वाले तीन बच्चों के पिता और 39 वर्षीय फूड डिलीवरी बॉय रणवीर सिंह मध्यप्रदेश के मुरैना के एक गाँव के रहने वाले थे। उन्होने दिल्ली से 200 किलोमीटर पैदल सफर तय किया और आगरा के पास वे थके हारे गिर गए और उनकी मृत्यु हो गई। मुंबई-अहमदाबाद राजमार्ग पर 4 मजदूरों  को एक गाड़ी ने रौंद दिया जब वे पैदल अपने घरों की ओर जा रहे थे। इन सभी को गुजरात बॉर्डर पार करने से पुलिस ने रोक दिया था। ऐसी घटनाएँ देशभर में हुई और अनेक पैदल चलते हुए मजदूरों को जान से हाथ धोना पड़ा।

यहां विचारणीय यह है कि आज़ादी के बाद से ही भारत के नीति निर्माता और विभिन्न  सरकारों ने भारत के समाजवादी ढांचे और लोक कल्याण की मूल भावना को अपनी प्राथमिकताओं में शुमार किया होता तो गांवों के गरीब और मजदूरों को सैकड़ों किलोमीटर दूर रोजगार की तलाश में दर दर न भटकना पड़ता और न ही कोरोना संकट के बाद जो दृश्य सामने आए है वह स्थिति कभी उत्पन्न होती।

शहडोल और उमरिया के जो मजदूर काम के सिलसिले में महाराष्ट्र गए थे,उन्हें इतनी दूर जाना ही नहीं पड़ता यदि इस इलाके को लेकर हमारी बेहतर योजनाएँ होती। बालाघाट के हजारों मजदूर हैदराबाद और चेन्नई से इन दिनों पैदल लौट रहे है। इन आदिवासी क्षेत्रों में वनोपज से रोजगार की असंख्य संभावनाएं है। बालाघाट का बांस तो लाखों आदिवासियों को रोजगार के साथ खुशहाली और बेहतर जिंदगी दे सकता है लेकिन इस और नीतियाँ सही तरीके से लागू ही नहीं की गई। देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य हो जिसकी किसी सरकार ने इस बात की चिंता की हो की उसके यहाँ के जो मजदूर दूसरे राज्यों में काम कर रहे हो उन्हें वापस बुलाकर अपने राज्य और उनके गाँव के पास ही रोजगार दिया जा सके। आज भी यदि देश भर की राज्य सरकारों से यह आंकड़े मांगे जाए कि उनके यहाँ के कितने मजदूर  दूसरे राज्यों में है और उनका कौशल क्या है तो जवाब आने में कई वर्षों लग जाएँ।

इस प्रकार विभिन्न सरकारों का अपने राज्य के नागरिकों से व्यवहार भारत के लोक कल्याण के संवैधानिक ढांचे के ठीक विपरीत है। राज्य के नीति निदेशक तत्व नागरिकों की रोजगार की गारंटी देते है। अनुच्छेद 39 के अनुसार राज्य सभी नागरिकों को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन जुटाएगा। अनुच्छेद 43 के अनुसार राज्य कर्म कारों के लिए काम,निर्वाह,मजदूरी,शिष्ट जीवन स्तर तथा सामाजिक तथा सांस्कृतिक अवसर उपलब्ध कराएगा और ग्रामों में कुटीर उद्योगों को बढ़ाने के प्रयास करेगा। वहीं अनुच्छेद 46 राज्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि के प्रयास करेगा। लेकिन हकीकत में राज्यों द्वारा लोककल्याण की नीतियों को लेकर कोई दूरगामी दृष्टि नहीं रही और यही कारण है कि विकास के प्रतिमान बहुत कम जनसंख्या तक सीमित हो गए,जिसके कारण असमानता भी बढ़ गई।

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेना मानते हैं कि दो दशकों के तेज़ विकास के बाद भी भारत विश्व में अभी भी सबसे ग़रीब देश हैं। इस देश की यह बदतरीन सच्चाई है की करीब 37 करोड़ लोग आज भी गरीब हैं जो यूरोप के कई विकसित देशों से कही ज्यादा है। भारत में सबसे अमीर वर्ग की बढ़ती आर्थिक क्षमता पर नज़र डालें तो भारत के 1 फीसदी लोगों की आय साल 1980 से 2019 के बीच छह फीसदी से बढ़कर 21 फीसदी हुई है। जाहिर है भारत सवा अरब आबादी से नहीं बल्कि 10 फ़ीसदी यानी 8 करोड़ जनता के लिए चमक रहा है। इस देश की कुल जनसंख्या और एक फ़ीसदी लोगों के विकास में काफ़ी अंतर है और 60 फीसदी लोग बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी जुटा पाते है

बहरहाल देश के नीति निर्माताओं के लिए यह सुनिश्चित करने का समय है कि चुनिंदा पूँजीपतियों के बूते इस देश कि चमक दमक का प्रदर्शन बंद कर गरीबों कि बेहतरी को अपनी प्राथमिकता बनाया जायें जिससे मजदूरों के जीवन का सफर किसी रेल कि पटरी पर फिर कभी इस प्रकार दम तोड़ने को मजबूर न हो सके।


आतंक के रास्ते पर बढ़ता पाकिस्तान

जनसत्ता

                                     पाक का संकट

                                                                             ब्रह्मदीप अलूने


पाकिस्तान की मरहूम प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों ने अपनी आत्मकथा डॉटर ऑफ द ईस्ट में लिखा है कि,“जिया-उल हक के समय में पाकिस्तान के स्कूलों में आतंकवाद और कट्टरपंथ की शिक्षा का दौर बेहद योजनाबद्द तरीके से किया गया। इसके लिए चन्दा उगाहने का काम इस्लामिक देशों में किया गया। सारे मेहरबान लोग इस विश्वास पर पैसा देने लगे कि वह गरीब शरणार्थियों के लिए,पढ़ाई,बीमारी इलाज और उनकी भूख प्यास के लिए खर्च होगा। जबकि सारा पैसा अनाथ शरणार्थियों के पास न जाकर राजनीतिक मदरसों में जाता रहा,जहां आतंकवाद और जातीय घृणा के बीज़ बोए जाते रहे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर से आने वाली सब सहायता आईएसआई के मुख्यालय ही पहुँचती थी।”

दरअसल मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फ़ंडिंग की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय संगठन फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट में बरकरार पाकिस्तान के सामने यह चुनौती बनी हुई है कि वह आतंकियों को मदद की वैश्विक छवि से बाहर आने के लिए आतंकी समूहों पर कार्रवाई  करें और उसके सबूत भी पेश करे। लेकिन पाकिस्तान के लिए यह आसान नहीं है,पाकिस्तान पिछले कई दशकों से आतंकवाद का इस्तेमाल अपनी राजकीय नीति के तौर पर कर रहा है। राजकीय आतंकवाद में वह तमाम तरह की गतिविधियां शामिल है जो किसी देश की वैधानिक या मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन से संचालित की जाती है। इस प्रकार के आतंकवाद में कोई देश दुनिया को दिखाने के लिए वो स्वयं को आतंकी गतिविधियों से दूर रखता है पर उसे अपनी विदेश नीति और युद्द नीति का अंग बनाकर पैसा,हथियार,प्रशिक्षण आदि सुविधाओं से मदद  करता है।

फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है,जो मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग जैसे वित्तीय मामलों में दखल देते हुए तमाम देशों के लिए गाइडलाइन तय करती है और यह तय करती है कि वित्तीय अपराधों को बढ़ावा देने वाले देशों पर लगाम कसी जा सके। लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिक और सामाजिक ढांचा में आतंकवाद इतना घुलमिल गया है कि इमरान खान की सरकार आतंकियों के पहचान का संकट बताकर वैश्विक संस्था को धोखा देना चाहती है। पाकिस्तान ने वैश्विक दबाव के बाद कुछ आतंकी समूहों पर कार्रवाई का प्रदर्शन तो किया है लेकिन वहीं सरकार ने अपनी 'टेरर वॉच लिस्ट' से क़रीब चार हजार आतंकवादियो के नाम हटा दिए हैं। पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद् की मॉनिटरिंग टीम से कहा कि उन्हें इन आतंकवादियों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिली थी इसलिए वो इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने में असमर्थ रहा। यह पाकिस्तान  की स्वयं को बचाने की नाकाम कोशिश ही कही जाएगी। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि पिछले साल अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान स्वीकार किया था कि लगभग तीस हजार से चालीस हजार आतंकवादी,जिन्होंने 'अफगानिस्तान के किसी हिस्से या कश्मीर' में प्रशिक्षण लिया और लड़े,उनके मुल्क में मौजूद हैं।

इस सदी में दुनिया भर में हुए आतंकी हमलों में पाकिस्तान की भूमिका सामने आई है। विश्व भर की जांच एजेंसियों की पड़ताल में यह भी उजागर हुआ है कि पाकिस्तान में धार्मिक,राजनीतिक,सेना और आईएसआई के गठजोड़ से आतंकवाद फल फूल रहा है। विख्यात पत्रकार स्टीव कोल ने अपनी पुस्तक घोस्ट वार में लिखा है,“मुशर्रफ और उन जैसे कई पाकिस्तानी जनरलों के लिए जेहाद दिल की आवाज नहीं बल्कि पेशेगत हुक्म है,यह ऐसा काम है जिसे उन्होंने अपने दफ्तर से अंजाम दिया है।”

दुनिया के कुख्यात आतंकी और मुंबई हमलें के मास्टर माइंड माने जाने वाले हफीज सईद के संगठन जमात-उल-दावा वल इरशाद का कार्यालय लाहौर से करीब 30 मील दूर मुरीदके में स्थापित है। वह पाकिस्तान में शिक्षा के नाम पर कई स्कूलों का संचालन करता है और इसकी आतंकी शाखा को लश्कर-ए-तैयबा कहा जाता है। जमात-उल-दावा-वल-इरशाद के बारे में यह माना जाता है कि इसने 2002 में अफगानिस्तान में उत्तरी गठबंधन के खिलाफ लड़ाई में तालिबान और अल कायदा को मदद पहुंचाई थी। मुरीदके दावा का मुख्यालय होने के साथ ही कश्मीर,बोस्निया,चेचन्या और फिलीपींस में जाने वाले आतंकवादियों का प्रशिक्षण केंद्र भी है। कुख्यात आतंकी संगठन जमात इस्लामी लाहौर में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट नामक एक संस्थान चलाता है,यह मुख्य रूप से इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देता है। यहां पर सिंकियांग के उइगुर समेत उजबेक और तुर्क प्रशिक्षण लेते रहे है। चेचन्या में रुसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी यहीं से निकले है। इस्लामाबाद  स्थित इस्लामिक विश्वविद्यालय भी कट्टरपंथी ताकतों का बड़ा गढ़ है। कराची के जमायत -उल -उलूम -इल -इस्लामिया में दूसरे कई देशों से आये विद्यार्थी चरमपंथ और कट्टरपंथ का पाठ सीखते है,मुल्ला उमर समेत तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले है। मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। पाकिस्तान के आतंकी स्थल अफगानिस्तान के खोस्त तक है। कुख्यात आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन का मुख्यालय पाकिस्तान के सेहसाणा में है वहीं एक और आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का केंद्र मुजफ्फराबाद में है। इन आतंकी प्रशिक्षण केंद्र  में भर्ती के लिए जिहाद को केंद्र में रखकर नए रंगरूटों के लिए अख़बारों में विज्ञापन सामान्य बात है।

पाकिस्तान के इन कुख्यात आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों में मसूद अजहर की खास भूमिका है। जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाक का एक प्रमुख आतंकी है। इस आतंकी संगठन का तन्त्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मदरसों और आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों पर अक्सर प्रशिक्षु जिहादियों को मजहबी तकरीर सुनाने के लिए जाता है। अफगानिस्तान का आतंकवाद पाकिस्तान की गहरी रणनीति का हिस्सा रहा है। विकिलीक्स की एक बेहद खतरनाक रिपोर्ट में यह साफ बताया गया है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के आतंकियों के गहरे संबंध है और पाकिस्तान कि यहाँ दोहरी भूमिका रही है। अमेरिका की एक ख़ुफ़िया रिपोर्ट की पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के सामने एक रिपोर्ट को प्रस्तुत किया गया था जिसके कहा गया था कि, अल-कायदा नेटवर्क पाकिस्तान के निर्देशों के बाद तालिबान को दी गई सुरक्षित पनाहगाह के तहत विस्तार करने में सफल रहा।

अमेरिकी विदेश विभाग की कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म 2018’ के  अनुसार, पाकिस्तान अपनी जमीन पर आतंकियों को फंडिंग,भर्ती और उनकी ट्रेनिंग रोकने में नाकाम रहा है। इस रिपोर्ट में पाकिस्तान को अफगान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के लिए सुरक्षित पनाहगार भी बताया गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पाकिस्तान के जामियात उलेमा-ए-इस्लाम और जमात-ए-इस्लामी जैसे स्थापित राजनीतिक संगठन आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा,सिपह-ए-सहाबा,जैश-ए-मोहम्मद तथा तालिबान को समर्थन देकर उन्हें मजबूती देते है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व मुखिया हमीद गुल,पूर्व सेना प्रमुख असद दुर्रानी तथा मिर्जा असलम बेग ने स्वीकार किया था कि उन्होंने गैर धार्मिक दलों को हराने के लिए धार्मिक दलों को पैसे दिये थे। जुलाई 2018 में जमात-उद-दावा सरगना और मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद ने राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग बनाकर चुनाव लड़ा था। इस प्रकार लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और जमात-उद-दावा की फंडिंग में लगातार बढ़ोतरी हुई है तथा पाकिस्तान की सरकार इस पर लगाम लगाने में नाकाम रही है।

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग जैसे वित्तीय मामलों को लेकर पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दे रही है,इसके बाद भी आतंकवादियों को रोक पाने में पाकिस्तान की नाकामी बदस्तूर जारी है।  वास्तव में पाकिस्तान स्थित आतंकियों के वित्तीय लेनदेन पर नजर रखना मुश्किल है क्योंकि यह नगद पर आधारित होता है और इसमें मादक पदार्थों की तस्करी शामिल है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति इसके लिए मुफीद है। भारत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच गोल्डन क्रिसेंट या सुनहरे अर्द्ध चंद्रमा का इलाका है जो अफीम का स्वर्ग कहा जाता है और नार्को आतंकवाद की यह उपजाऊ जमीन मानी जाती है। पाक अफगान सीमा पर ऐसे कई गुप्त रास्ते है जिनका इस्तेमाल रूस के अफगान पर कब्जे के दौरान मुजाहिद किया करते थे। इन इलाकों में सीमा पर होने वाली आव्रजन और सीमा शुल्क जैसी औपचारिकताए भी नहीं होती। 1999 के कंधार विमान के यात्रियों को पाकिस्तान की सरहद तक इसी रास्ते से लाने की तालिबान की योजना थी हालांकि भारत से एक समझौते के बाद इन यात्रियों को छुड़वा लिया गया था।

भारत में सीमा सुरक्षा बल पाकिस्तान से लगी सीमा पर अनेक बार मादक द्रव्यों के जखीरे पकड़ चुकी है,जिनके अंदर आरडीएक्स और छोटे मोटे हथियार भी होते है। इसमें पाकिस्तान की सेना और गुप्तचर एजेंसियां भी शामिल रहती है जिससे मादक पदार्थों के अवैध व्यापार के साथ आतंकवाद को भी बढ़ावा मिलता है। इस प्रकार पाकिस्तान के सहयोग से बड़े स्तर पर मादक पदार्थों के इन तस्करों का उपयोग आतंकी गतिविधियों की मदद करने,पैसा जुटाने और हथियार मुहैया कराने में हो रहा है। पाकिस्तान के रेंजर,आईएसआई और प्रशासन को इससे पैसा मिलता है अत: पाकिस्तान में इसका खुलकर व्यापार होता है। इस प्रकार मादक पदार्थों का कारोबार और उनका विश्वव्यापी संगठन है जो आतंकवाद को बढ़ाने पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट से हटने के लिए पाकिस्तान,चीन,मलेशिया और तुर्की जैसे देशों की मदद ले रहा है और ब्लैक लिस्ट से बचने के लिए दिखावे के तौर पर उसने जमात-उद-दावा जैसे संगठनों पर नाममात्र की कार्रवाई भी की है,लेकिन आतंकवाद के देशव्यापी ढांचे को खत्म करने का मंसूबा न तो वहाँ की सरकार में है और न ही वहाँ के धार्मिक संगठन ऐसा होने देंगे। आईएसआई की भूमिका तो संदिग्ध साबित हो ही चुकी है।

भारत लगातार प्रयासरत है कि पाकिस्तान के ब्लैक लिस्ट में  जाने से समूचे क्षेत्र में शांति कायम करने में बड़ी मदद मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष,विश्व बैंक,एडीबी और यूरोपीय संघ से वित्तीय सहायता प्राप्त करने में कठिनाई आने से पाकिस्तान दबाव में आएगा और तब ही वह अपने देशव्यापी आतंकी ढांचे को खत्म करने का गंभीरता से प्रयास करेगा। बहरहाल विश्व समुदाय को यह समझना होगा की पाकिस्तान से आतंकवाद को खत्म करने के लिए उस पर आर्थिक प्रतिबंध की व्यापक कार्ययोजना कारगर हो सकती है। पाकिस्तान की सरकार और देश में समांतर सरकार चलाने वाले आईएसआई और सेना पर कड़े आर्थिक दबाव बनाने की जरूरत है।


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