भारतीय सियासत की असाधारण इंदिरा INDIRA GANDHI

 

 


                                                                                           

1965 में भारत पाकिस्तान की भीषण लड़ाई चल रही थी, तोपों के गोले सरहद पर गूँज रहे थे, और इन सबके बीच तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी श्रीनगर सीमा क्षेत्र में बेखौफ अपने काम को अंजाम दे रही थी । सेना की उन्हें दिल्ली वापस लौटने की सलाह को उन्होनें दरकिनार कर दिया,युद्धग्रस्त इलाकों में सैनिकों के बीच रहकर उनके मनोबल को ऊँचा किया और संवाद माध्यम से देश में ऐसा जज़्बा भरा कि पाकिस्तान की करारी पराजय हुई।



        अपने असाधारण फैसलों के लिए पहचाने जानें वाली इंदिरा गांधी अपने नफा-नुकसान का बेहतर मुल्यांकन करने में माहिर थी, यहीं कारण था की राजनीतिक धरातल पर गुंगी गुडि़या के रूप में अवतरित इंदिरा ने राजनीति की बिसात पर  कई  स्वयंभू सिपहसालारों को मात दी थी। राजा-महाराजा जब नेताओं जैसे पेश आने लगें तो उन्हें लोकतांत्रिक राष्ट्र का आम नागरिक बना दिया,पाकिस्तान के बढ़ते हौसला के जवाब में उसके दो टुकडे़ कर दिये और अमेरिकी चौधराहट को उंगली दिखाते हुए सोवियत संघ को अपना हमराह बना लिया।


इंदिरा गांधी भारत की एक ऐसी नेता थी जिनके कार्यकाल में अनेक अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाएं हुई। इंदिरा हटाओं के नारे ने उन्हें सत्ता से बेदखल किया तो गरीबी हटाओं से वे वापस लौट आयी । तमाम विरोधाभासों के बावजूद वे ऐसी नेता के रूप में पहचान बनाने में कामयाब रही जिनका सतत नेतृत्व देश के लिए अपरिहार्य माना गया । जब-जब उनकी अपनी पार्टी के नेता और विरोधी स्वयंभू होने का प्रयास करते थे,इंदिरा जनता के बीच जाकर तालियों की गड़गड़ाहट से इसका जवाब देती थी। वे साहसी नेतृत्वकर्ता और राजनीति की एक कुशल रणनीतिकार थी। 1957 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी का कांग्रेस के उम्मीदवार चयन में गहरा दखल था और उम्मीदवारों की विजय ने इस बात के संकेत दे दिये थे कि आने वाला समय इंदिरा गांधी का है, इसका एहसास पंडित नेहरू को तो था ही।


        लाल बहादुर शास्त्री की अकस्मात मृत्यु के बाद भारतीय सियासत के सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाली इंदिरा गांधी को देश के दबंग राजनीतिज्ञों से दो चार होना पड़ा, इसमें उनकी अपनी ही पार्टी के नेता भी थे। इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाते वक्त अनेक कांग्रेसी नेताओं को लगता था कि ये कठपुतली है और डोर हमें थामना है लेकिन मोरारजी देसाई, निजलिंगप्पा और कामराज को वार करने से पहले ही धराशायी होना पड़ा।1966 में अमेरिकी यात्रा में इंदिरा गांधी ने अपनी आक्रामक कूटनीतिक छवि का उदाहरण पेश किया। भारत में अनाज की कमी की समस्या से जूझती जनता को राहत पहुँचाने का मंसूबा लिए


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब अमेरिका पहुँची तो अमेरिका ने भारत को लाखों टन गेहूँ और एक हजार मिलियन डालर की आर्थिक सहायता की पेशकश रखी बदले में भारत को अमेरिका के वियतनाम नीति को यथोचित ठहराना था । लेकिन इंदिरा कहां रूकने और झूकने वाली थी उन्होनें अमेरिकी जमीन पर अमेरिका की ऐसी भर्त्सना की कि दूनिया के कई राजनीतिज्ञ दंग रह गए। अमेरिकी मदद को ठोकर मारकर उन्होनें सोवियत संघ को हाथ थामा
, गुट निरपेक्षता के नाम पर राष्ट्रीय हितों की बलि की परंपरा को दरकिनार कर एक नया रास्ता चुना । यह दुस्साहस इंदिरा गांधी ही कर सकती थी।

        1967 के आम चुनाव में उड़ीसा की एक आमसभा में इंदिरा गांधी पर पत्थर बरसायें गयें, उनकी नाक की हडडी टुट गयी लेकिन यह मजबूत महिला दुर्गा का रूप बनकर विजय श्री को धारण करती रहीं । इंदिरा गांधी के राजनीतिक कौशल की पराकाष्ठा 1971 के पाकिस्तान से युद्ध में देखने को मिली । 3 दिसम्बर 1971 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कलकत्ता के एक विशाल मैदान में भाषण दे रही थी और उसी समय उन्हें खबर मिली की अचानक पाकिस्तानी विमानों ने उत्तर में श्रीनगर से लेकर दक्षिण में उत्तरलार्इ के सीमा के आधे दर्जन हवाई अडडों पर एक साथ हमला किया है । हवार्इ हमलों की चेतावनी समस्त उत्तर भारत के नगरों-कस्बों में गूँज उठी । 3दिसम्बर की चांदनी रात पाकिस्तान के इतिहास की सबसे अंधरी रात बन गयी । दृढ़ निश्चयी इंदिरा गांधी की मजबूत कूटनीतिक, रणनीतिक और राजनीतिक जुगलबंदी ने पाकिस्तानी शासकों के सभी मंसूबों  पर पानी फेर दिया और एक हजार वर्ष तक भारत से लड़ते रहने का दम भरने वाले पाकिस्तानी 14 दिनों में ही युद्धक्षेत्र से भाग खड़े हुए । अमेरिका और चीन को धता बताते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दुश्मन देश के तिरानवें हजार सैनिकों को बंदी बनाकर पूरी दुनिया में भारत की ताकत का एहसास कराने का श्रेय इस महान नेता को जाता है।


        एक प्रधानमंत्री के रूप में विभिन्न चूनौतियों से मुकाबला करने में इंदिरा गांधी ने महारथ हासिल कर ली थी। बैंको का राष्ट्रीयकरण हो या राजा-महाराजाओं को विशेष अधिकार,इंदिरा गांधी ने कभी भी अपने इरादों को कमजोर नहीं होने दिया।


1980 में कई राज्यों के चुनावों में इंदिरा गांधी ने आपातकाल के प्रति अपनी शर्मिंदगी का एहसास लोगों के सामने किया तो जनता ने पुन: गले लगा लिया और 22 राज्यों में से तकरीबन 15 राज्यों में कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली । इसके बाद इंदिरा गांधी लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत के साथ वापस लौटी और  पुन: अपने दुस्साहसिक फैसलों में मशगूल हो गयी। 


पंजाब समस्या के समाधान के लिए उनके प्रयास और ऑपरेशन ब्लू स्टार ने उनकी आतंकवाद के प्रति मजबूत राजनीतिक इच्छा शकित को उभारा । स्वर्ण मंदिर में घुसकर आतंकवादियों को मारने का राजनीतिक निर्णय एक महान निर्णय था । तथाकथित राजनीतिक पार्टीयां भले ही अपने क्षुद्र स्वार्थो के लिए इंदिरा गांधी के इस फैसले की आलोचना करती हो लेकिन आतंकवाद के खात्में और राष्ट्रहित के लिए उनका ये निर्णय स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा । सिक्खों की दिलेरी को सलाम करने वाली एवं उनपर सबसे ज्यादा भरोसा करने वाली इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक एवं निजी नफे-नुकसान से अलग आतंक को जवाब दिया था। सिक्खों में स्वर्ण मंदिर में सैनिक कार्रवार्इ के बाद नाराजगी से उपजे हालातों के बीच  इंदिरा गांधी ने अपने सलाहकारों की सिक्ख अंगरक्षकों को हटाने की सलाह उन्होंने नजरअंदाज कर यह बताया था कि राष्ट्रहित में किसी एक जाति या धर्म का योगदान नही हो सकता,उन्हें अपने देशवासियों पर पूरा भरोसा है । हालांकि धर्म के नाम पर अफीम का नशा देने वाले कामयाब हो गए और 31 अक्टुबर 1984 को इस महान नेता को अपने सिक्ख अंगरक्षकों की गोली का शिकार होना पड़ा। लेकिन आतंक के खिलाफ  शहीद हुई  इस महान नेता के जज़्बे को राष्ट्र सदैव सलाम करता रहेगा। अपने राजनीतिक जीवन में तमाम विवादों एवं असामान्य निर्णयों के बावजूद आज भी वे भारत की सबसे लोकप्रिय नेता है ।

 

 

 

ब्रिटिश राजनीति के अंतर्द्वंद british pm janstta

 जनसत्ता


                          

                                                                    

 

आधुनिक उदारवादी लोकतंत्र में परम्परावादी राजनीतिक दलों के अंतर्द्वंद कितने चुनौतीपूर्ण हो सकते है,इसका ब्रिटेन सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैदरअसल कुछ महीनों पहले ही ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनी लिज़ ट्रस ने आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्थिरता के दौर में देश की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की आशंका जाहिर करके अपने पद से इस्तीफा दे दियापिछले कुछ वर्षों में ब्रिटिश राजनीति अप्रवासन और महंगाई जैसे मुद्दों पर अनिर्णय की स्थिति में रही है,यही कारण है कि देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है तथा राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है


 

2019 में तत्कालीन प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने ब्रेक्सिट को लेकर यूरोपीय संघ के साथ समझौते को संसद से पास न कराने की वजह से इस्तीफा दिया था और इसके बाद देश के नए प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन बने थेजॉनसन के प्रधानमंत्री बनने के बाद कोरोना तथा  रूस और यूक्रेन युद्द से उपजी समस्याओं का सामना ब्रिटेन की जनता को करना पड़ाउनकी नीतियों को लेकर कंजरवेटिव पार्टी में ही सवाल खड़े हुए और अंततः उन्हें इस वर्ष जुलाई में पद से हटना पड़ा था बोरिस जॉनसन के बाद कंजर्वेटिव पार्टी ने अपना नेता लिज़ ट्रस को चुना जिनकी प्राथमिकता राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना,अप्रवासन और महंगाई को लेकर देश में बनी उहापोह की स्थिति को दूर करना थाराष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत 66 लाख से ज्यादा लोग आ रहे है लेकिन उनका मुफ़्त इलाज सुनिश्चित नहीं हो रहा है और इससे लोग नाराज हैदेश में सरकारी टैक्स को बढ़ाने की आशंकाओं के बाद लोगों में सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी का विरोध बढ़ा हैट्रस ने वादा किया था की वह देश में सुस्त होती अर्थव्यवस्था की दिक्कतों को खत्म कर कंजर्वेटिव पार्टी की आने वाले आम चुनावों में दावेदारी को मजबूत करेगी लेकिन ऐसा हो न सकाइसका एक प्रमुख कारण कंजर्वेटिव पार्टी के भीतर आपसी विवाद रहे है जो राजनीतिक अदूरदर्शिता के रूप में सामने आते है

 


ईयू से अलग होने के बाद ब्रिटेन को अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक था की वह भारत से व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेंपार्टी के दिग्गज नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भारत से व्यापारिक और सामरिक संबंध बढ़ाने में गहरी दिलचस्पी दिखाई थी ऐसे में इस बात की पूर्ण संभावना थी की ब्रिटेन के हितों को देखते हुए लिज़ ट्रस भारत से होने वाले मुक्त बाज़ार समझौते को तुरंत हरी झंडी दे  देती लेकिन हुआ इसके विपरीत ब्रेग्ज़िट के बाद ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारत से संबंधों को लेकर कंजरवेटिव पार्टी के भीतर ही गहरे मतभेद सामने आ गयेलिज़ ट्रस के मंत्रीमंडल में गृहमंत्री रही सुएला ब्रेवरमैन ने भारत के साथ हो रहे व्यापार समझौते को लेकर चिंताएं ज़ाहिर कर ब्रिटेन में आने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ने की बात  कह दीउन्होंने यह भी कहा कि इससे ब्रेग्ज़िट के मक़सद को भी नुक़सान पहुँच सकता हैसुएला ब्रेवरमैन का यह कथन बोरिस जानसन की भारत से संबंध मजबूत करने की नीति के ही खिलाफ था


यहां यह बताना बेहद जरूरी है कि ब्रिटेन की मजबूती के लिए भारत से उसके मजबूत सम्बन्ध कितने जरूरी है। यूरोप में व्यापार करने के लिए भारतीय ब्रिटेन को द्वार समझते है और इसी कारण अधिकांश भारतीय व्यापारियों ने ब्रिटेन को ही ठिकाना बनाया हुआ हैब्रेग्सिट के पीछे ब्रिटेन के आम जनमानस की मुक्त बाज़ार को लेकर बहुत महत्वाकांक्षाएं रही है और उसी नीति पर लिज़ ट्रस के आगे बढ़ने की उम्मीद थीभारत के लिए ब्रिटेन एक महत्वपूर्ण आयातक देश है ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में भारत की कंपनियों की अहम भूमिका है। भारत की कई कम्पनियां ब्रिटेन में काम कर रही है और इससे लाखों रोजगार जुड़े हुए है।  उच्च शिक्षा की दृष्टि से भारतीय छात्रों के लिए ब्रिटेन पसंदीदा देश है। दोनों देशों के आपसी संबंधों को मज़बूत रखने में ब्रिटेन में रहने वाले करीब 15 लाख प्रवासी भारतीयों की अहम भूमिका में है ये प्रवासी भारतीय न केवल ब्रिटेन और भारत के बीच एक पुल का काम कर रहे हैं ये लोग ब्रिटेन की प्रगति में भी अहम रोल अदा कर रहे है। जाहिर है ब्रिटिश प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं थी लेकिन उनकी गृहमंत्री की अदूरदर्शिता का परिणाम यह हुआ कि भारतीय समुदाय में कंजरवेटिव पार्टी के  प्रति नाराजगी बढ़ गई और इससे आने वाले आम चुनावों में कंजरवेटिव पार्टी की सत्ता में वापसी की उम्मीदों को झटका लगा सकता है


 

वास्तव में ब्रिटेन की राजनीतिक उथल पुथल का प्रमुख कारण अप्रवासन से जुड़ी हुई आशंकाएं है और उनका राजनीतिक समाधान करना आसान काम नहीं है। करीब पौने सात  करोड़ आबादी वाले इस देश में प्रवासियों की संख्या अच्छी खासी है,वहीं ब्रिटिश नागरिक बाहर से आयें नागरिकों को लेकर आशंकित रहने लगे है। यूरोपियन यूनियन से अलग होने का एक कारण यह भी था की ब्रिटेन के लोग अप्रवासन से उपजी परिस्थितियों को लेकर बैचेन हो रहे थे। ब्रेक्जिट से जनता खुश तो है लेकिन आर्थिक समस्याओं में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। वहीं अप्रवासन को लेकर ब्रिटेन का राजनीतिक रुख उसकी अर्थव्यवस्था को तबाह करने का कारण भी बन गया है2011 में ब्रिटेन में जनगणना करने वाले विभाग ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स ने जब ब्रिटेन की जनसंख्या के आंकड़े जारी किया तो उसकी भी यहां के परम्परावादी समाज में कड़ी प्रतिक्रिया देखी गई थीइसके अनुसार ब्रिटेन की जनसंख्या को 6 करोड़ 32 लाख बताया गया था जिसमें ब्रिटेन के स्थानीय निवासियों का अनुपात 2001 की जनगणना के 87 फीसदी के मुकाबले घटकर 80 फीसदी बताया गया था। इन आंकड़ों के अनुसार ब्रिटेन के मुख्य प्रांतों इंग्लैंड और वेल्स में हर आठवां व्यक्ति विदेश में जन्मा व्यक्ति हैब्रिटेन के जनसंख्या अनुपात में पिछले 10 सालों में आए बदलाव के लिए मुख्य कारण आप्रवासियों का ब्रिटेन आना बताया गया


 

दुनिया में अप्रवासन को लेकर चिंताएं बढ़ी है वहीं ब्रिटिश समाज भी इससे प्रभावित रहा है। विशेषकर परम्परावादी समाज के लिए ईयू के साथ रहना ब्रिटेन की संस्कृति, पहचान और राष्ट्रीयता से लिए चुनौतीपूर्ण समझा जाने लगा ईयू के समझौते को दबाव की तरह मानकर उससे अलग होने की भावना का एक प्रमुख कारण अप्रवासन की समस्या को भी बताया जाता हैदूसरे देशों से ब्रिटेन में आकर बसने वालों की बढ़ती संख्या से स्थानीय लोग प्रसन्न नहीं हैं ब्रिटिश समाज मुक्त व्यापार के फायदों और अपने देश की आर्थिक प्रगति से ज्यादा अप्रवासन की उन चुनौतियों से ज्यादा आशंकित हो गया है जो पूर्वी यूरोप और गृहयुद्द से जूझ रहे अरब और अफ़्रीकी देशों से आ रही है।  यहां के निवासियों को लगता  है कि यूरोपीय यूनियन में ज्यादा समय तक बने रहने से न केवल उनका सांस्कृतिक और सामाजिक परिदृश्य बदल जाएगा बल्कि स्थानीय नागरिकों के सामने रोजगार और सुरक्षा का संकट भी गहरा सकता है। अब भारत को लेकर भी उनका यह व्यवहार सामने आ रहा है।  ब्रिटेन के राजकीय अर्थशास्त्रियों ने ही उदारवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धांत का निर्माण किया था। इनमें एडम स्मिथ,रिकार्डों तथा माल्थस उल्लेखनीय है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति सदैव अपने हितों के लिए कार्य करता है। इन विद्वानों ने बाजारवादी अर्थव्यवस्था को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहा कि बाज़ार में मांग और पूर्ति के द्वारा एक स्वाभाविक सामंजस्य उत्पन्न हो जाता है तथा मुक्त व्यापार सभी के लिए लाभकारी है। इसके बाद यूरोपीय यूनियन की नींव  राज्यों में आपसी व्यापार बढ़ाने के लिए  रखी गई थी।  लेकिन ब्रिटेन स्वयं उससे अलग हो गया।


गौरतलब है कि ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी के भीतर भी ईयू से अलग होने या न होने को लेकर गहरें मतभेद रहे 2016 से ईयू से अलग होने का ब्रिटेन  का आंतरिक राजनीतिक अंतर्द्वंद बढ़ता गया,इसके साथ ही  देश में बहुमत ईयू के साथ बने रहने से ज्यादा अलग होने की और बढ़ता गया। इसका प्रभाव जनता पर पड़ना स्वाभाविक ही था यूरोपीय यूनियन में एकल बाज़ार सिद्धांत अर्थात् किसी भी तरह का सामान और व्यक्ति बिना किसी टैक्स या बिना किसी रुकावट के कहीं भी आ-जा सकते,बिना रोक टोक के नौकरी,व्यवसाय तथा स्थायी तौर पर निवास कर सकने की आज़ादी के फायदें बहुत  सारे थे। फ्री मूवमेंट ऑफ़ पीपल एंड गुड्स यूरोपीय संघ की खासियत है। ब्रिटेन के नागरिकों के लिए यह स्थिति अच्छी थी जो राजनीतिक फायदों के लिए असहनीय बना दी गई दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अव्वल स्थान पर रहने वाली यूरोपीय यूनियन को ब्रिटिश अलगाव के बाद नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है वहीं ईयू से अलग होने से ब्रिटेन को व्यापारिक रियायतें मिलने का मार्ग अवरुद्द हो गया।

 


इसका असर ब्रिटेन  की अर्थव्यवस्था के साथ राजनीतिक रूप से भी देखने को मिल रहा है  देश में रोजगार के अवसर सीमित होने के साथ महंगाई बढ़ गई हैसरकार को मांग और आपूर्ति में पैदा हुए असंतुलन को दूर कर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें नियंत्रित करना है यूक्रेन पर रूस के आक्रमण से तेल की कीमतों और खाद्य पदार्थों की लागत में वृद्धि हुई है टैक्स वृद्धि को लेकर लोग कंजर्वेटिव पार्टी की नीतियों से नाराज है और बोरिस जॉनसन के इस्तीफे का एक प्रमुख कारण यह भी रहा है उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय बीमा में योगदान को सवा फीसदी तक बढ़ाकर कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार ने दावा किया था कि टैक्स में वृद्धि स्वास्थ्य और सामाजिक देखरेख के क्षेत्र में लगाई जाएगी  उनके इस कदम से कामकाजी लोगों में टैक्स को लेकर भारी नाराजगी बढ़ी और विपक्षी लेबर पार्टी ने कहा कि कंजर्वेटिव सरकार द्वारा कामकाजी लोगों पर कर लागत बढ़ाया जाना,दशकों में जीवन-यापन की चुनौतियों के बीच सबसे बुरा दौर है  लिज़ भी इस ख़राब दौर से देश को उबारने में नाकामयाब रही है

 


वैश्विक सहयोग और विविधता को स्वीकार न कर पाने के चलते उदारवादी लोकतंत्र ब्रिटेन गहरे संकट में फंसता दिखाई दे रहा है  कंजरवेटिव पार्टी की  वैश्विक बदलावों के साथ सामंजस्य न बिठा पाने की नाकामी अब देश में राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आ रही है महंगाई और मंदी से परेशान ब्रिटिश जनता देश में मध्यावधि चुनाव भी नहीं चाहती लेकिन सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के अंतर्द्वंद से देश की समस्याओं में इजाफा ही हो रहा है

 

 

 

 

 

बिखर जाएगा ईरान iran destroy sahara

राष्ट्रीय सहारा


                              

                                                                         

धार्मिक मान्यताओं में आम जन की आस्था के बरकरार रहने के लिए शासन व्यवस्थाओं की उदार प्रकृति अपरिहार्य है। आधुनिक विभिन्नताओं को भांपते हुए यूरोपियन देशों ने इसे तकरीबन पांच सौ साल पहले समझ लिया था,इसलिए वहां धर्म और सभ्यताएं फलते फूलते आगे बढ़ी। जबकि एशिया और अफ्रीका के कई देशों की कई शासन व्यवस्थाओं ने धर्म को आधार बनाकर आस्था को थोपने की कोशिश की। लिहाजा कुछ देश टूट कर बिखर गए और अधिकांश देश गृहयुद्द की कगार पर पहुंच गए है।


 

दरअसल 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में धर्म को सत्ता के परिसंचलन का साधन बना दिया गया। यह भी दिलचस्प है कि  ईरान की जनता ने इस्लामिक क्रांति को राजतन्त्र की समाप्ति और लोकतंत्र की शुरुआत के तौर पर देखा था। लेकिन ईरान में सत्ता के शिखर पर धर्म गुरु की ताजपोशी से लोकतंत्र के उद्दात्त  चरित्र  पर भारी चोट पहुंची और धर्मतन्त्र की सर्वोच्चता  को  थोपने की ताकतवर कोशिशें की गई। खास कर इस्लामिक देशों में जनता का यह दुर्भाग्य रहा है कि वहां की स्थापित सत्ताएं वैधानिक नियमों को कुचलने को बेकरार रहती है और येन केन कर सत्ता के शीर्ष पर काबिज रहने की उनकी कोशिशें ही जनता में हताशा और निराशा का कारण बन जाती है। मुसलमान कई पंथों में बंटे है और उनकी मान्यताएं एक दूसरे से टकराती रहती है। सत्ता से उपजी निराशा का फायदा कबीलों के सरदारों को मिलता है। ईरान,इराक,सीरिया,पाकिस्तान,अफगानिस्तान,लीबिया,लेबनान,सूडान से लेकर तुर्की जैसे देशों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।


शिया बहुल ईरान अपनी नीतियों रीतियों को लेकर वैसे ही पश्चिम के निशाने पपर रहा है। अनेक वैश्विक प्रतिबंधों से जूझते इस देश में गरीबी और बेरोजगारी चरम पर है। शिया सुन्नी की प्रतिद्वंदिता का असर इस देश पर खूब नजर आता है। इराक,सीरिया जैसे देशों में शिया समूहों को हथियारों की आपूर्ति ईरान की नीति रही है। सऊदी अरब से पारम्परिक प्रतिद्वंदिता के चलते अमेरिका से इस देश के सम्बन्ध बेहद खराब है। इजराइल को अपना सबसे बड़ा शत्रु बताने वाला ईरान मोसाद की आक्रामकता को बुरी तरह से भोगता रहा है। ईरान में खु़फ़िया विभाग के अधिकारी यह स्वीकार करते है कि उनके देश के अंदर मोसाद का इतना असर है कि ईरानी नेतृत्व का हर सदस्य अपनी ज़िंदगी और इसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता हैदो साल पहले ईरान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या जिस प्रकार से की गई थी,उससे दुनिया अचंभित रह गईमोसाद ने ईरान के सैन्य अधिकारियों और परमाणु वैज्ञानिकों को चुन चुन कर निशाना बनाया है  इजराएल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद का साथ देने के आरोप ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य अधिकारियों और धर्म गुरुओं पर लग चूके है


 

इन सबके बीच ईरान की सत्ता का ध्यान अपने देश की जनता की बेहतरी से ज्यादा जनता को दबाएं रखने पर रहा है1979 से पहले ईरान एक साम्यवादी देश होकर आधुनिकता के साथ आगे बढ़ रहा था। लेकिन देश में इस्लामिक क्रांति के बाद महिलाओं से कई अधिकार छीन लिए गएधर्मगुरुओं का राजनीति पर प्रभाव बढ़ा और इसका खामियाजा सबसे ज्यादा महिलाओं को भोगने को मजबूर होना पड़ा ईरान में महिलाओं के लिए यह कहा जाता है कि एक दुल्हन शादी के जोड़े में अपने पति के घर जाती है और सफ़ेद कफ़न में उसके घर से निकलती है। इस देश में महिलाओं पर घरेलू हिंसा को सामान्य माना जाता है तथा इसे पारिवारिक मामला कह कर पुलिस के द्वारा भी नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसी वजह से घरेलू हिंसा किसी महामारी की तरह फैल गई है ईरान में महिलाएं क़ानून की नज़र में भेदभाव का सामना करती हैं वो शादी और तलाक़,पारिवारिक संपत्ति पर हक़,बच्चों पर हक़,राष्ट्रीयता और अन्य देशों की यात्रा में भी भेदभाव झेलती हैं धार्मिक मामलों पर सख्ती का असर यह हुआ है कि देश के लोगों का आस्था पर विश्वास कम हुआ हैइससे डरे हुए शिया धार्मिक गुरुओं ने देश में नैतिकता के नाम पर लोगों पर बेतहाशा अत्याचार शुरू कर दिए है


इस समय ईरान में जो सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे है वह दरअसल धार्मिक सत्ता का ही विरोध है। इस्लामिक सत्ता लोक कल्याणकारी कार्यों को नजरअंदाज कर धार्मिक कार्यों पर बेतहाशा पूंजी को खर्च करती है। इसका विरोध करने वालों को ईरान विरोधी बताकर जेल में डाल दिया जाता है। देश में मानवाधिकार संगठनों को चुन चुन कर निशाना बनाया गया है जिससे यहां काम करने वाले गैर सरकारी संगठन खत्म हो गए है। ईरान के कुर्दिस्तान प्रांत की 22 वर्षीया महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत का कारण ईरान में सामाजिक मुद्दों से निपटने के लिए मोरैलिटी पुलिस के अत्याचारों को माना जा  रहा है मोरैलिटी पुलिस ईरान में सार्वजनिक तौर पर इस्लामी आचार संहिता को लागू  करने के नाम पर महिलाओं को निशाना बनती रही है। ईरान में धार्मिक सत्ता का रुझान इस बार पर है कि जो लोग इस्लामिक कड़े कानूनों के तहत् बर्ताव न करे,नास्तिकता की और बढ़े या अन्य धर्मों की और रुझान बढ़ाएं तो इसके लिए मौत की सजा दी जा सकती है।

 

इस समय सरकार का विरोध देश की नौजवान पीढ़ी कर रही है। ये युवा दुनिया की तरह ईरान में स्वतन्त्रता चाहते है और धार्मिक नेताओं के आतंक से मुक्ति चाहते है।  करीब नौ करोड़ की आबादी वाले देश में अधिकांश लोग ईरान की इस्लामी व्यवस्था,उसके अलोकतांत्रिक चरित्र और विचारधारा से जुड़ी नीतियों में बुनियादी बदलाव चाहते हैं। सरकार विरोधी आंदोलन कुर्दिस्तान से लेकर तेहरान और पूरे देश में जोर पकड़ चूका है। ईरान के उत्तर पश्चिम में कुर्द है जिनकी आबादी 7 से 10 फ़ीसदी है,यह हिंसक आंदोलन कुर्दिस्तान से ही शुरू हुआ है। गौरतलब है कि पुलिस अत्याचारों से मरने वाली महसा अमीनी कुर्दिस्तान की ही रहने वाली थी अलग कुर्दिस्तान की मांग मध्य पूर्व में सौ साल से रही है और इससे प्रभावित कई देश है1920 में इराक़ में कुर्दिस्तान की लड़ाई के लिए बने हथियारबंद संगठन पेशमेगा से ईरान के कुर्द जुड़े हुए हैइराक़ के कुर्द सबसे ताक़तवर हैं क्योंकि उनके पास बहुत पैसा है और साथ ही उनको इराक़ी सरकार ने स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दिया हुआ है। कुर्द सुन्नी मुसलमान है लेकिन उनकी अपनी संस्कृति है और ईरान की सरकार ने कुर्दों को लगातार निशाना बनाया हुआ है। ईरान के सुन्नी मुसलमानों से जुड़े अन्य पंथ भी वहां की शिया सत्ता के विरोधी रहे है।


ईरान के कई इलाकों में ऐसे हथियारबंद कबीलें काम करते है जिनका ईरान की सेना से हिंसक संघर्ष चलता रहा है।  ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत में भी अशांति रही है और यहां ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स पर हमलें होते रहे है इस समय ईरान का आंदोलन नेतृत्व विहीन है लेकिन यदि इसमें सरकार विरोधी धड़े और अन्य लड़ाकू संगठन शामिल हो गए तो निश्चित ही ईरान में गृहयुद्द भडक उठेगाअमेरिका,सऊदी अरब और इजराइल को ईरान में अस्थिरता का लंबे समय से इंतजार हैईरान में जिस प्रकार सरकार विरोधी आंदोलन जोर पकड़ता जा रहा है,उससे लगता नहीं की यह अब जल्द थमेगा जाहिर है मध्यपूर्व का एक और देश अस्थिरता की और तेजी से बढ़ रहा है

 

महात्मा गांधी ने सिखाया mahatma gandhi char mandali

 Polticsvala Post


                                  

चार मण्डली में जो लोग मिले और जो वे काम कर रहे है उससे ही गांधी की बाकी आजादी मिल सकती है गांधी के आदर्शों पर काम करने वाले इन लोगों के प्रति समाज में सम्मान को देखा और महसूस भी कियाइस दौर में राजनीतिक नेतृत्व तो होता है लेकिन लोगों की निगाहों में सम्मान और विश्वास देखा नहीं जातादरअसल बापू ने यही सिखाया की बिना राजनीतिक पद के  भी जनप्रिय लोकनेता बना जा सकता हैलोक कल्याण के ईमानदार प्रयास तो कीजिए फिर आपको चकाचौंध,धन,बाहुबल,धर्म,जाति या सम्प्रदाय की वैसाखी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी

भोपाल से करीब 50 किलोमीटर दूर आबिदाबाद पंचायत  के गांव चार मण्डली में गांधी के ग्राम स्वराज पर आधारित एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो मैं भी वहां पहुंच गयागांव में एक स्थान पर बोर्ड लगा था ग्राम सेवा समिति चार मंडलीगेट को खोलकर अंदर घुसे तो चारो और खेत थेकार को कीचड़ में ही पार्क करना पड़ापानी गिरने से मिट्टी बह रही थीपास ही एक  हॉल था जहां मैंने पत्नी और बच्चों के साथ प्रवेश किया हॉल में दरी बिछी हुई थी और एक मात्र कुर्सी पर महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई थी कुर्ता पायजामा पहने एक शख्स सबसे परिचय कर रहे थेजो सज्जन यह काम कर रहे थे वे राकेश कुमार पालीवाल थे,जो कमिश्नरी के बाद कुछ दिनों पहले ही रिटायर्ड हुए थे


 

नीचे बैठे सामान्य लोगों का परिचय जाना तो चमत्कृत हुए बिना न रह सका पद्मश्री बाबुलाल दहिया बैठे थे उन्होंने धान की कई किस्मों को संभाल कर रखा है जो खत्म हो चुकी है मध्यप्रदेश के सतना जिले के किसान बाबूलाल दाहिया उम्र करीब 75 साल है। बाबूलाल दाहिया डाक विभाग में पोस्ट मास्टर के पद से रिटायर हो चुके हैं,उनके पास करीब 8 एकड़ जमीन है,जिसमें वह जैविक खेती करते हैं। बाबूलाल दाहिया के पास लगभग  दो सौ देसी धान की किस्म है। वह हर साल इन्हें अपने ही खेत में बुवाई करते हैं।दाहिया कहना है कि साल 1965 तक किसान देसी किस्मों से खेती करते थे। जब से हरित क्रांति आई है तब से किसान बाजार पर निर्भर हो गए हैं। इसके बाद धीरे-धीरे देसी बीज विलुप्त होने लगे,लेकिन अगर किसान को कृषि क्षेत्र में आगे बढ़ना है,तो उन्हें देसी बीजों का चयन करें। देसी बीज में कम लागत लगती है,साथ ही इन्हें हर मौसम को सहन करने की क्षमता होती हैं।


कुर्ता पायजामा पहने एक युवती बैठी थी,पता चला की यही माया सुकर्मा है  जो  पैड वुमन के नाम से जानी जाती है। अमेरिकी से पीएच.डी. करके लौटी माया  मूल रूप नरसिंहपुर के मेहरागांव की रहने वाली है और अब गांव की सरपंच है  माया पिछले  1 दशक से गृहनगर नरसिंहपुर में एक आत्मनिर्भर गांव पर काम कर रही हैं। उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई और गांवों के बारे में शिक्षा और जागरूकता के लिए स्वराज मुमकिन है नामक एक किताब लिखी। आदिवासी और ग्रामीण लड़कियों/महिलाओं के लिए नो टेंशन ब्रांड नाम से किफायती सैनिटरी नैपकिन तैयार की है। उन्होंने गांव में टेलीमेडिसिन प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर भी शुरू किया है जिससे ग्रामीण भारत के सुदूर गांव तक बेहतर डॉक्टर से उपचार और परामर्श मिल सके।


एक और बुजूर्ग बैठे हुए थे करीब 93 साल के छत्तीसगढ़ के गांधी धर्मपाल सैनी जो विनोबा भावे से पांच रूपये लेकर 1976 में बस्तर आये थे और फिर यही के होकर रह गएजब वे बस्तर आए तो देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से पैदल चल लेते हैं। बच्चों की इस  ऊर्जा को खेल  और  शिक्षा में लगाने की उन्होंने योजना बनाई। 1985 में पहली बार उनके आश्रम की छात्राओं को खेल प्रतियोगिता में उतारा। इसके बाद हजारों बच्चियों को उन्होंने खेल से जोड़ दिया।  महिला शिक्षा में बेहतर योगदान के लिए 1992 में सैनी को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। 2012 में द वीक मैगजीन ने सैनी को मैन ऑफ द ईयर चुना था।

 


खेत पर मेड़,मेड़ पर पेड़ की योजना से सूखे बुदेलखंड को हरा कर कई गांवों की तकदीर बदलने वाले उमा शंकर पांडे भी बैठे हुए थे। उनका भारत की जल प्राचीन जल पद्धति से विकसित किया गया जखनी गांव पूरे भारत में चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मन की बात में उमा शंकर पांडे की प्रशंसा करते हुए जल संरक्षण के लिए इस पद्धति पर काम करने की जरूरत बता चूके है। जखनी गाँव के किसानों नौजवानों द्वारा अपने श्रम से की गयी मेड़बन्दी के कारण गाँव का जलस्तर ऊपर आया। जल से गाँव में सिद्धि, प्रसिद्ध, समृद्धि आई आज सम्पूर्ण भारत में पानी - किसानी के सामुदायिक प्रयास के लिए जखनी का मेड़बंदी मॉडल चर्चित है जखनी के किसानों ने सरकार से किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद नहीं ली। मेड़बन्दी से उसर भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकता है। जहाँ - जहाँ जल संकट है,उसका एकमात्र उपाय है वर्षा जल को अधिक से अधिक खेत में मेडबन्दी के माध्यम से रोकना चाहिए। इससे पानी रोकने के साथ जैविक खेती में बड़ी मदद मिल सकती है


एक और बुजूर्ग डॉ.सुरेश गर्ग भी बैठे थेमूल रूप से विदिशा के रहने वाले डॉ. साहब गांधी सुमिरन समिति के माध्यम से आदर्श गांव बसा रहे है किसानों को जैविक खेती के तौर तरीके सिखाते है और नशा बंदी को लेकर अभियान चलाते है।

अब आपको राकेश कुमार पालीवाल के बारे में भी बताते है। वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी और मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ के आयकर महानिदेशक रह चुके राकेश पालीवाल रिटायर्ड होने के बाद फ़िलहाल भोपाल में रहते हैवे 1997 में स्थापित योगदान  संस्था से जुड़े हुए है। आज कल पालीवाल ग्राम सेवा समिति के साथ काम कर रहे है 2015 से स्थापित यह संस्था नशा बंदी,जैविक खेती आदि के बारे में लोगों को समझाती है तथा किसानों को जैविक खेती से आय बढ़ाने का प्रशिक्षण भी देती है।


इन सभी  गांधीवादियों के साथ पूरा दिन बिताया।  आसपास के गांवों से कई सरपंच और युवा आएं। उन्होंने ग्राम स्वराज और जैविक खेती पर बात की।  भोपाल से इतनी दूर यह कार्यक्रम आयोजित हुआ कि मीडिया की चकाचौंध से यह दूर था। सारे लोग मिले,खूब चर्चा हुई पर धर्म और राजनीति जैसे विषय गायब थे। यहां पर लोगों के बेहतर जीवन,जैविक खेती और पर्यावरण संरक्षण पर बात हुई।


बापू ने दक्षिण अफ्रीका में दो आश्रम स्थापित किए थे,डरबन के पास फीनिक्स आश्रम और जोहान्सबर्ग के पास टॉलस्टॉय आश्रम। इसी प्रकार भारत में भी उन्होने दो आश्रम स्थापित किए,अहमदाबाद के पास  साबरमती आश्रम और वर्धा के पास सेवाग्राम आश्रम। यह आश्रम जाति संप्रदाय के भेदभाव से दूर आत्मनिर्भरता,स्वावलम्बन और स्वच्छता पर बात करते थे और व्यवहार और आचरण में भी इसी का पालन करते थे।

बापू ने जीवन भर आदर्श गांव,ग्राम स्वराज,अपृश्यता निवारण,पर्यावरण संरक्षण,स्वच्छता और नशा बंदी की बात की। उनके आंदोलनों का मुख्य विषय यही था। बापू की इन्हीं समाज कार्यो ने पूरे भारत को जोड़ दिया। बापू फिंरंगियों से मिली आज़ादी को आधी अधूरी बताया करते थे। वे कहते थे,यह सिर्फ राजनीतिक आज़ादी है,सामाजिक,आर्थिक और आध्यात्मिक आज़ादी के लिए अभी और काम करने की जरूरत है। जब तक यह नहीं मिलेगी,तब तक देश को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं मिल सकती।

 

 

brahmadeep alune

यह गणतंत्र तो नहीं है...! republic india subah svere

  सुबह सवेरे                                                                                                        जनता के अधिकार...