इस्लामिक देशों में महिलाओं पर अत्याचार,स्वदेश islamic woman swdesh

 

 स्वदेश                      पाकिस्तान की मदरसा शिक्षा का प्रभाव


                                                                             

किसी दौर में धार्मिक कट्टरता को लेकर पूरी दुनिया में पहचाने जाने वाला सऊदी अरब बदलाव की  राह पर है।  महिलाएं अकेली यात्रा कर सकती हैं,कार चला सकती हैंअब यहां सिनेमा हॉल भी खुल रहे है और चेहरा ढंकने की सख्ती को भी शिथिल कर दिया गया हैमहिला शिक्षा को लेकर सऊदी अरब में उदारता देखी जा रही है। 

 


इस्लामिक शिक्षा के हिमायती इस देश का विश्वास है कि पैगंबर मोहम्मद साहब  की पत्नी आईशा बीबी इस्लामिक नियमों की सबसे बड़ी ज्ञाता थी और मोहम्मद साहब के गुजर जाने के बाद पांच दशक तक इस्लाम के नियमों का प्रचार प्रसार और लोगों की शंकाओं का निवारण किया था। पैगम्बर मोहम्मद साहब की शिक्षाओं में गैर बराबरी को खत्म कर सभी के लिए शिक्षा को अनिवार्य बताया गया है। इस्लाम को मानने वालो के लिए मोहम्मद साहब की शिक्षाएं सही मार्गदर्शक है लेकिन कई इस्लामिक देशों में मुस्लिम धर्मगुरुओं की इस्लामिक नियमों को लेकर भिन्न भिन्न व्याख्याएं असमानता को बढ़ाने वाली है और इसका खामियाजा इस्लाम को मानने वाली करोड़ों महिलाओं को भोगना पड़ रहा है। सऊदी अरब के पड़ोसी देश  शिया बाहुल्य ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद आए परिवर्तनों को लेकर महिलाओं में बड़ी बैचेनी है। महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभावों के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन 1979 को जब 189 देशों द्वारा अनुमोदित किया गया उसी समय ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और महिला अधिकारों को कुचल दिया गयायह वह समय था जब ईरान वैश्विक मंच पर संयुक्तराष्ट्र संघ के उन प्रावधानों के पक्ष में हामी भर रहा था जिसमें संपूर्ण विश्व में महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने में सहायता की बात कहीं गई थी। जबकि इस्लामिक क्रांति के बाद मध्यपूर्व का यह इस्लामिक देश पूरी तरह बदल गयामहिलाओं के हिजाब पहने का तरीका सुनिश्चित कर दिया गया,फुटबाल के लिए जूनून से भरे इस देश में महिलाओं के स्टेडियम जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गयाईरान में,शादी से पहले कौमार्य कई लड़कियों और उनके परिवारों के लिए बेहद अहम है कई बार पुरुष वर्जिनिटी सर्टिफ़िकेट (कौमार्य का प्रमाण पत्र) मांगते हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वर्जिनिटी टेस्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है ये अनैतिक है। फिर भी दुनिया के कई देशों में ये प्रचलित है,इनमें इंडोनेशिया,इराक़ और तुर्की भी शामिल हैंईरान में घरेलू हिंसा को पारिवारिक मामला समझा जाता है,लिहाजा अधिकांश महिलाएं घरेलू हिंसा को चुपचाप सहने को मजबूर है ऑनर किलिंग को लेकर कोई पुलिस कार्रवाई नहीं की जातीयहां तक की ईरान में धार्मिक पुलिस को व्यापक अधिकार दे दिए गए है,इसी का नतीजा है ईरान में महिलाओं और युवाओं का हालिया प्रदर्शन22 साल की महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैंमहसा को कथित तौर पर हिजाब पहनने के नियम के उल्लंघन के लिए पुलिस हिरासत में लिया गया था बाद में उनकी मौत हो गईमहसा को तेहरान में हिजाब से जुड़े नियमों का कथित तौर पर पालन नहीं करने के लिए गिरफ़्तार किया गया था

 


इसे लेकर देशभर में धार्मिक पुलिस की सख्ती के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैंप्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर आज उन्होंने विरोध नहीं किया तो कल कोई और इसका शिकार हो सकता है1979 की क्रांति के बाद से ही ईरान में सामाजिक मुद्दों से निपटने के लिए धार्मिक मामलों पर नजर रखने वाली पुलिस कई स्वरूपों में मौजूद रही है इनके अधिकार क्षेत्र में महिलाओं के हिजाब से लेकर पुरुषों और औरतों के आपस में घुलने-मिलने का मुद्दा भी शामिल रहा हैयह भी दिलचस्प है कि ईरान में महिला अधिकारों के लिए जो प्रदर्शन हो रहे है उसमें पढ़े लिखे पुरुषों की भागीदारी भी है। वे बढ़चढ़ कर इसमें हिस्सा लेते है और महिलाओं को लेकर असमान नियमों का विरोध करते रहे हैहालांकि ईरान में धर्म गुरु की सर्वोच्चता देश के लोकतंत्रीकरण में बड़ी बाधक है और संयुक्तराष्ट्र की कमजोरियां समस्या को बढ़ाती है


 

ईरान से लगे अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी ने महिलाओं का जीवन नारकीय बना दिया हैयहां महिलाओं का भविष्य गर्भ धारण से ही तय हो जाता है और गर्भ से यदि बेटी हुई तो उसका विवाह के लिए उसे किसी भी उम्र के आदमी को बेच दिया जाता है मतलब इस देश में 10 से 12 साल की उम्र लडकियों के यौन संबंध के लिए आदर्श मान ली गई हैअफगानिस्तान की अधिकांश आबादी  ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है,यहां  गरीबी,अशिक्षा और पिछड़ापन है2001 से 2021 तक महिलाओं को तालिबान शासन से मुक्ति मिली थी और उनके लिए शिक्षा और उन्नति की जो उम्मीदें जागी थी,वे भी अब खत्म हो गई है शिक्षा और रोजगार से दूर करने के बाद भी तालिबान ने महिलाओं को कड़े नियमों से प्रभवित किया हैइनमें घर की दहलीज़ लांघने से पहले ख़ुद को हिजाब से  ढकना और पति या किसी महरम के साथ ही बाहर निकलना शामिल है

 


देश में सहशिक्षा यानी लड़के-लड़कियों को साथ पढ़ने की अनुमति नहीं हैमानवाधिकारों के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी ने महिलाओं और बच्चों पर अत्याचारों को लेकर तालिबान की कड़ी आलोचना की है। पिछलें दो दशकों में तालीम हसी करके नौकरी पाई महिलाओं से कहा जा रहा है कि वे अपनी नौकरी अपने पुरुष परिजन को दे दे। इस्लामिक कानूनों के नाम पर महिलाओं को सरेआम कोड़े मारना या भरे बाज़ार पत्थरों से मारना यहां आम बात है। 8 साल की उम्र से ही लड़कियों को बुरखे से ढंक दिया जाता है। 1990 के दशक में मुजाहिदीन गुटों की क्रूरता जैसे हत्या,बलात्कार,अंगों को काटने और अन्य तरह की हिंसक घटनाओं की कहानियां रोज़ आती थी। बलात्कार और जबरन विवाह से बचने के लिए लड़कियां आत्महत्याएं तक कर रही थी। अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा तालिबान को सत्ता से बेदखल करने के बाद 2004 में  देश का नया संविधान बना था। वहां महिलाओं को समान अधिकार का प्रावधान रखा गया। महिलाओं को कई क्षेत्रों में आरक्षण दिया गया। संसद में 27 प्रतिशत आरक्षण था। औरत,अल्पसंख्यक और पिछड़ों को आगे बढ़ाने की जागरुकता भी साफ़ दिखाई देती थी। महिलाएं आगे आईं और देश का माहौल बदलने लगा था। लेकिन एक बार तालिबान शासन से महिलाओं का जीवन अंधकार में धकेल दिया है

 


दरअसल इस्लामिक कानून का लागू होना इस बात पर पूरी तरह से निर्भर करता है कि जानकारों के गुण और उनकी शिक्षा कैसी हैअधिकांश धार्मिक गुरु पाकिस्तान के कट्टरपंथी मदरसों में शिक्षा पाते है और वे समावेशी विचारधारा को छोड़कर असमानता को पोषित करते हैयही कारण है कि पाकिस्तान के मदरसों से प्रभावित इस्लामिक धर्म गुरु जिस भी देश में जाते है वहां महिलाओं पर अत्याचार बढ़ जाते हैमहिलाओं की जिंदगी नर्क बना दी जाती है और उनकी बेबसी,लाचारी और मजबूरियां बंद दरवाजे के पीछे कराहने की आशंका भी बढ़ जाती है। इन महिलाओं में दमन का विरोध करने का सामर्थ्य नहीं होता और जो आवाज उठाते है उन्हें युसूफ मलालाजई जैसे गोली मार दी जाती है या 20 साल की हदीस नफाजी की तरह हत्या कर दी जाती है। पाकिस्तान के  आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों और मदरसों का प्रभाव एशिया से निकलकर अफ्रीका के कई देशों को भी अपनी जद में ले रहा है,इसका असर महिलाओं पर हिंसा के रूप में सामने आ रहा है।

 

 

संयुक्त राष्ट्रसंघ का संकट UN FAILED

जनसत्ता

                  


             

                                                                            

विश्व राजनीति का असली स्वरूप सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों का कूटनीतिक व्यवहार है,जहां शक्ति के लिए संघर्ष को चरम सीमा पर ले जाकर                               संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना के मूल उद्देश्यों पर लगातार प्रहार किया जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्द के बाद संयुक्तराष्ट्र संघ की स्थापना का आधार ही युद्द या उसके लिए उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों को रोकना था,लेकिन दुनिया भर में युद्द के कई मोर्चे खुले हुए है और रूस जैसे देश आणविक हमलों की धमकी से संयुक्त राष्ट्रसंघ की प्रासंगिकता को ही चुनौती दे रहे है। वहीं भारत संयुक्तराष्ट्र संघ के चार्टर के उद्देश्यों को व्यवहार में सुनिश्चित करने वाला देश है। जो उपनिवेशवाद,रंगभेद का विरोध,निःशस्त्रीकरण,लोकतंत्र,मानवाधिकारों का समर्थन तथा दुनिया के शांति अभियानों में कई दशकों से अग्रणी भूमिका निभा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा स्थापित करने में भारत की लगातार भागीदारी रही हैभारत संयुक्त राष्ट्र  के शांति अभियानों में सर्वाधिक योगदान देने वाला देश है। वर्तमान में विश्व भर में हजारों शांति सैनिक भारत के तैनात हैं,जो संयुक्त राष्ट्र की  पांच बड़ी महाशक्तियों के सैनिकों की कुल संख्या के कही अधिक हैं दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत की भूमिका संयुक्तराष्ट्र संघ में निर्णायक होना चाहिए लेकिन अधिकार सम्पन्न होने के लिए सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता बेहद जरूरी है,जिससे भारत को अभी तक दूर है।

 


संयुक्त राष्ट्रसंघ के सबसे महत्वपूर्ण निकाय सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के लिए भारत ने एक बार फिर अपना दावा जताया है  तथा अमेरिका और रूस ने इसका समर्थन भी किया है। सुरक्षा परिषद की संरचना में किसी भी बदलाव के लिये संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन की आवश्यकता होगी जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा की सदस्यता के दो-तिहाई बहुमत से हस्ताक्षरित और समर्थन प्रदान करना होगा और इसके लिये वर्तमान पांचों स्थायी सदस्यों की सहमति की आवश्यकता होगीभारत को चार स्थायी सदस्यों और अफ्रीकन यूनियन,लैटिन अमेरिका,मध्य-पूर्वी देशों और दुनिया के विभिन्न हिस्सों के अन्य कम विकसित देशों सहित प्रमुख शक्तियों का समर्थन प्राप्त है लेकिन सुरक्षा परिषद के एक स्थायी सदस्य का वीटो भारत की स्थायी सदस्यता के सपने को खत्म कर सकता है और वह चीन है स्पष्ट है कि चीन की मंशा भारत को स्थायी सदस्य बनने देने से रोकने की है और वह किसी भी स्थिति में यह न होने देने को कृतसंकल्पित नजर आता है


 

सुरक्षा परिषद की प्राथमिक ज़िम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम रखना है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का संकट यही है कि इसके सिद्धांतों के उल्लंघन में सबसे आगे सुरक्षा परिषद के कथित पांच सदस्य ही है,जो बारी बारी से अपने हितों के अनुसार अपने अधिकार का उपयोग करके शांति की उम्मीदों को धराशायी करते रहे है। इस साल युक्रेन पर रूस के हमले के बाद  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के निंदा प्रस्ताव का 15 में से 11 सदस्यों ने समर्थन किया लेकिन परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में रूस की वीटो शक्ति के कारण यह निंदा प्रस्ताव पास नहीं हो सकासंयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत लिंडा थॉमस ने रूस की आलोचना करते हुए कहा था कि,रूस इस प्रस्ताव को वीटो कर सकता है,हमारी आवाज़ और सिद्धांतों को वीटो नहीं कर सकता है। अमेरिकी राजदूत की मानवीय अपील का प्रभाव रूस पर वैधानिक रोक लगाने में सक्षम नहीं था।  जाहिर है युक्रेन रूस के आक्रमण को कई महीनों से लगातार झेल रहा है और संयुक्तराष्ट्र संघ यूरोप के इस सबसे बड़े देश को विध्वंस से बचाने में अब तक नाकाम रहा है। अपार खनिज संसाधनों से भरपूर और खुशहाल लोकतांत्रिक देश युक्रेन कुछ ही महीनों में रूस की सनक से इस कदर प्रभावित हुआ की लाखों लोग यूरोप भाग  गए है,हजारों मार दिए गए है और बचे हुए लोग युद्द के मोर्चों पर रुसी सेना का मुकाबला करने को मजबूर है।


सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य  हैं,अमेरिका,ब्रिटेन,फ़्रांस,रूस और चीनसुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता हैसुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यपालिका के रूप में कार्य करती हैसंघ के चार्टर के 24 वें अनुच्छेद के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखना सुरक्षा परिषद् का प्रमुख कार्य है। यह परिषद पहले समस्या को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयत्न करती है,बाद में अपने अधिकारों का प्रयोग करती है। रूस ने सुरक्षा परिषद के किसी कार्रवाई के अधिकार को निषेध के अधिकार से बाधित करके युक्रेन को युद्द से बचाने की संभावना को ही खत्म कर दिया और अब यह बिना दबाव के युक्रेन को घातक हथियारों से निशाना बना रहा है

 


सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के अधिकारों का दुरूपयोग करने में चीन भी पीछे नहीं है। इस साल जून में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी आतंकवादी अब्दुल रहमान मक्की को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी के रूप में नामित करने के भारत और अमेरिका के प्रस्ताव पर चीन ने वीटो के जरिए ही रोक लगा दी थीभारत ने चीन के इस हरकत को लेकर काफी नाराजगी तो जताई लेकिन उसे रोक पाने में भारत असफल रहा। इसके पहले चीन कई आतंकियों को लेकर यह नीति अपनाता आया है और इससे भारत के आतंक पर लगाम लगाने के प्रयासों को धक्का पहुंचा है भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में सेना ने 1 फरवरी 2021 को  देश में तख्तापलट करते हुए आंग सान सू ची के नेतृत्व वाली निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया था। इसके बाद से सेना लगातार  लोगों को निशाना बना रही है। लोकतंत्र के समर्थक कई लोगों को सेना मार चूकी है और वे देश से भाग रहे है। सेना मानवाधिकारों का लगातार उल्लंघन कर रही है,इसके बाद भी चीन उसे हथियार दे रहा है। म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद से लगातार सड़कों पर विद्रोह हो रहा है एक तरफ म्यांमार में चुनी हुई सरकार कैद में है तो दूसरी तरफ इस तख्तापलट का सीधा आरोप चीन पर लग रहा हैम्यांमार की सड़कों पर चीन के खिलाफ वहां की जनता प्रदर्शन कर रही हैसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में म्यांमार में हुए तख्तापलट के खिलाफ निंदा प्रस्ताव अमेरिका-ब्रिटेन समेत सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्यों ने मिलकर प्रस्ताव पेश किया था लेकिन चीन ने वीटो पावर इस्तेमाल कर इसे रोक दिया। प्रस्ताव के पारित होने से म्यांमार की सैन्य सरकार पर भारी दबाव डाला जा सकता था लेकिन चीन ने अपने आर्थिक और सामरिक हितों की पूर्ति के लिए म्यांमार में लोकतंत्र की बलि चढ़वा दी। म्यांमार चीन की महत्वकांक्षी परियोजना वन रोड वन बेल्ट का सदस्य है। म्यांमार की चुनी हुई लोकतांत्रिक आंग सूची की नेतृत्व वाली सरकार  चीन के प्रोजेक्ट को लेकर उत्सुक नहीं थी  चीन ने म्यांमार के सैन्य अधिकारियों से मिलकर षड्यंत्रपूर्वक चुनी हुई सरकार को नजरबंद करवा दिया और वहां अधिनायकवादी सत्ता स्थापित करवा दी  हथियारों की तस्करी के लिए कुख्यात उत्तर कोरिया पर संयुक्तराष्ट्र संघ के कई प्रतिबन्ध है लेकिन चीन उसकी मदद करने में भी सबसे आगे है। 

 


संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी स्थापना के बाद आठ दशकों का लंबा रास्ता तय कर लिया है और इस दौरान दुनिया की भू राजनीति में गहरे परिवर्तन हो गए है।  यूरोप जहां दुनिया की कुल आबादी का मात्र पांच फीसदी जनसंख्या ही निवास करती है,उसका स्थायी सदस्य के तौर पर सर्वाधिक प्रतिनिधित्व है। जबकि अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप का सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है। रूस की कठिन भौगोलिक स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए एशिया से एकमात्र प्रतिनिधित्व चीन का ही है जो लोकतांत्रिक देश ही नहीं है 

 


संयुक्तराष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 6 में कहा गया है की यदि कोई सदस्य चार्टर के सिद्धांतों का निरंतर उल्लंघन करे तो सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर महासभा उसे निष्कासित कर सकती है। विश्व शांति के लिए संयुक्तराष्ट्र महासभा के प्रस्तावों को बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए। विडम्बना है की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव या सुझाव तो महासभा के लिए बाध्यकारी है,किन्तु महासभा यदि कोई प्रस्ताव पारित करती है तो इसे लागू करने या न कराने का अधिकार सुरक्षा परिषद पर निर्भर करता है। महासभा में दुनिया के 193 देशों का प्रतिनिधित्व है लेकिन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक देश अपने निहित स्वार्थों के चलते वीटो की शक्ति का इस्तेमाल कर महासभा के बहुमत द्वारा पारित प्रस्तावों की अनदेखी कर देता है और दुनिया यह सब देखने और मानने को मजबूर हो जाती है। दरअसल स्थायी सदस्यों की अधिकार संपन्नता संयुक्त राष्ट्र संघ की गले की हड्डी बन गया है और इन देशों की ब्लैकमेलिंग से कई देश गृहयुद्द की आग में झोंक दिए गये है।  दुनिया के कई भागों में युद्द और हिंसक स्थितियों का सामना करने को करोड़ों लोग मजबूर है,अधिनायकवादी शक्तियां शीर्ष सत्ताओं पर काबिज हो रही है तथा लोकतंत्र लगातार खत्म होता जा रहा है।  


  

म्यांमार के लोगों की गुहार संयुक्तराष्ट्र संघ में सुनी नहीं जा रही है,युक्रेन की तबाही को देखने के बाद भी विश्व की यह सबसे बड़ी संस्था खामोश है। चीन में वीगर मुसलमानों  का दमन हो रहा है,पुतिन के सर्वसत्तावादी व्यवहार से रूस के लोग पस्त है। आर्दोआन की मुस्लिम दुनिया की नेतृत्व करने की सनक का प्रभाव आर्मेनिया और अजरबैजान युद्द में देखा जा रहा है।  पाकिस्तान में आतंकी प्रशिक्षण शिविर खत्म नहीं हो रहे है,उत्तर कोरिया में  तानाशाही के चलते करोड़ों लोग गुलामों जैसा जीवन जीने को मजबूर है।  यमन,सूडान,इराक,सीरिया गहरे मानवीय संकट में है।    अफगानिस्तान में चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करके तालिबान की सत्ता को काबिज होते दुनिया ने देखा है।   

 




इस समय दुनिया भर में तनाव चरम पर है और शांति स्थापित करने वाली सबसे बड़ी संस्था संयुक्तराष्ट्र संघ की और से तनाव शिथिल करने के कोई भी निर्णायक प्रयास नहीं किये जा रहे है,जिससे इस संस्था के अस्तित्व में होने के उद्धेश्य को लेकर ही विश्व जनमानस में भारी नकारात्मकता आ  गई है।  इसका एक प्रमुख कारण वीटो पावर को माना जा रहा हैस्थायी सदस्य युद्ध अपराध एवं मानवता के खिलाफ अपराधों में संलिप्त है और इससे भी अंतर्राष्ट्रीय निष्क्रियता बढ़ गई है  अत: संयुक्त राष्ट्र संघ के मूल उद्देश्यों को  लागू करने और प्रभावी बनाने के लिए इसमें सुधारों के साथ वैश्विक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने तथा सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्त्वपूर्ण और न्यायसंगत बनाने की आवश्यकता है

 

 


सीआरपीएफ के जांबाजों के पैसों पर डीजीपी का जश्न CRPF DGP RETIRMENT

 नवभारत टाइम्स

    


         

आंतरिक सुरक्षा के सबसे बड़े प्रहरी सीआरपीएफ के अधिकारियों की तनख्वाह में से हर महीने एक निश्चित रकम सेंट्रल वेलफेयर फण्ड के लिए काट ली जाती हैजम्मू कश्मीर,पूर्वोत्तर हो या छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाके में तैनात ये अधिकारी यह अपेक्षा करते है कि सेंट्रल वेलफेयर फण्ड में जमा उस पैसे का उपयोग कल्याणकारी कार्यो में खर्च होगायुद्द जैसे मोर्चो पर तैनात सीआरपीएफ  के लिए मिट्टी भरी थैलियां सुरक्षा कवच का काम करती हैकभी कभी इस अर्द्धसैनिक बल को उन मिट्टी की थैलियों के लिए भी बजट का इंतजार करना होता है


लेकिन सबसे बड़े साहब यानि महानिदेशक के बिदाई समारोह में फण्ड की कोई कमी नहीं आती30 सितम्बर को सीआरपीएफ के डीजीपी कुलदीप सिंह रिटायर्ड हो रहे है। सीआरपीएफ के सेंट्रल वेलफेयर फण्ड में से करोड़ों रुपया साहब के बिदाई समारोह में खर्च कर दिया जाएगा दिल्ली से सटे गुरुग्राम में सीआरपीएफ के सेंटर में इस मौके पर भव्य पार्टी का आयोजन किया जा रहा है देशभर के विभिन्न इलाकों में तैनात नामचीन अधिकारियों और जवानों का चयन इस परेड में शामिल होने के लिए किया गया है

 


पिछले कई दिनों से महानिदेशक की बिदाई पर होने वाले कार्यक्रमों और परेड की रिहर्सल कई बार की जा चूकी है इसमें कमांड किसके जिम्मे होगी,ड्रिल किसे करवाना है,फ्लैग बियरर से लेकर कार्यक्रम के संचालन तक के लिए देश के कोने कोने से अधिकारियों और जवानों को बुलाया गया हैसाहब का बिदाई समारोह जो है,खाने से लेकर मेहमानों के रुकने तक,स्वागत सत्कार और सुख सुविधाओं के अम्बार तक भरपूर व्यवस्थाएं की गई है

 

यह समूचा आयोजन गुलामी काल से अंग्रेजों द्वारा बनाई गई परिपाटी का हिस्सा है जिसमें राजसी ठाट बाट से सेना के सर्वोच्च अधिकारी को बिदा किया जाता था। गौरतलब है कि  केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल क्राउन प्रतिनिधि पुलिस के रूप में 27 जुलाई 1939 को अस्तित्व में आया था। आज़ादी के बाद इसे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल कहा जाने लगा। यह देश ही नहीं दुनिया का यह सबसे बड़ा अर्द्धसैनिक बल है। सीआरपीएफ़ की इस समय देश भर में लगभग 242 बटालियन है। जिसमें से 204 विशेष बटालियन,6 महिला बटालियन,15 आरएएफ बटालियन,10 कोबरा बटालियन,5 सिग्नल बटालियन और 1 विशेष ड्यूटी


ग्रुप और 1 पार्लियामेंट्री ग्रुप हैं
इसकी एक बटालियन में करीब 1100 जवान होते हैं इसमें प्रतिनियुक्ति पर आये महानिदेशक के अलावा तीन-तीन अतिरिक्त महानिदेशक और सात इंस्पेक्टर जनरल हैंसीमा पर तैनाती से लेकर देश के भीतर तमाम तरह के ऑपरेशन में जुटे रहने के साथ संयुक्तराष्ट्र के शांति मिशन में भी सीआरपीएफ़ के जवान शामिल है इसमें से चुनिंदा जांबाज़ अधिकारी और जवानों का चयन कोबरा बटालियन के लिए  किया जाता है जो नक्सली इलाकों में तैनाती के लिए खास तौर पर बनाई गई है।

 

भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को सीआरपीऍफ़ से गहरा लगाव रहा। इसका एक प्रमुख कारण यह भी था कि देश में जब रियासतों का विलय हो रहा था,तब कुछ विद्रोही राजाओं को डंडे के बल पर समझाने का काम सीआरपीएफ ने ही किया था। आजादी के तुरंत बाद कच्‍छ,राजस्‍थान और सिंध सीमाओं में घुसपैठ रोकना हो या जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठियों के घुसने की कोशिश,सीआरपीएफ ने ही दुश्मन के इरादों को नाकाम किया था पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन को खत्म करना हो या उत्तर पूर्व में पृथकतावादी चरमपंथी ताकतों को रोकना,जम्मू कश्मीर में आतंकवाद हो या रेड कोरिडोर की चुनौती सीआरपीएफ की बिना आंतरिक सुरक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।


आंतरिक सुरक्षा  की दृष्टि से संवेदनशील स्थानों,चुनाव,दंगे,साम्प्रदायिक तनाव,आपदा से लेकर युद्द जैसी परिस्थितियों में लगातार काम करने वाले सीआरपीएफ के जवानों को अल्प सूचना पर और अक्सर बिना किसी पूर्व तैयारी के देश के किसी भी इलाके में भेज दिया जाता है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में नक्सलियों से जानलेवा संघर्ष में अपनी जान गंवा देने का जोखिम,उत्तर पूर्व के गहरें बियाबानों में अलगाववाद  हो या दक्षिण कश्मीर में आतंकियों से सामना,सीआरपीएफ़ ने चुनौतियों का लगातार सामना किया है और वे डटे भी हुए है आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन,चरमपंथ और नक्सलवाद से निपटना,मतदान के समय तनावग्रस्त इलाकों में बड़े स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था करना,भीड़ नियंत्रण,दंगा नियंत्रण,अति विशिष्ठ लोगों तथा स्थलों की सुरक्षा,पर्यावरण एवं जीवों का संरक्षण,युद्ध काल में आक्रमण से बचाव,प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत एवं बचाव कार्य करना जैसी जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक सीआरपीएफ ने निभाया है और लगातार प्रभाव में भी हैपिछले दशकों में इसने अपने कौशल और दक्षता का परिचय देते हुए घरेलू मोर्चे पर शत्रु को कड़ी चुनौती दी है

 


सीआरपीएफ के जवान साथियों की शहादत से अविचलित साहस और जोश के साथ अपने कर्तव्य को मुस्तैदी से निभा रहे है। देश के कई इलाकों में अलग अलग परिस्थितियों में काम करने वाले इस अर्द्धसैनिक बल के जवानों के बड़ी संख्या में मारे जाने का प्रमुख कारण बेहतर योजना का क्रियान्वयन रहा है और इसके समस्याग्रस्त होने के अनेक कारण भी है। भारतीय सेना से किसी भी मामले में कमतर न होने वाला यह अर्द्धसैनिक बल सुविधाओं के लिए भी मोहताज है और उन्हें पुलिस जैसा ही समझा जाता है।

पिछलें दिनों डीजीपी कुलदीप सिंह की एक प्रेस वार्ता बड़ी चर्चा में रही। इस साल 25 फरवरी को बिहार के जहानाबाद  के घने जंगलों में  नक्सलियों के साथ एक मुठभेड़ में सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट विभोर कुमार सिंह अपने दोनों पैर गंवा बैठे और गंभीर रूप से घायल हो गएइस दौरान उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपनी टीम की रक्षा की और घायल होते हुए भी नक्सलियों पर फायर करते रहेइससे अंततः नक्सली भाग खड़े हुए और सीआरपीएफ के जवानों की रक्षा  हो सकी लेकिन 30 सितंबर को रिटायर हो रहे महानिदेशक ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि विभोर सिंह का बलिदान वीरता की श्रेणी में नहीं आता है। अत: उन्होंने वीरता पदक जैसे दावे को ही ख़ारिज कर दिया यह भी दिलचस्प है कि जिस वक्त जंगल में सीआरपीएफ का ऑपरेशन चल रहा था,वहां आसपास के किसी भी बेस पर हेलीकॉप्टर मौजूद नहीं थागया तक पहुंचने के लिए घायलों को एंबुलेंस में चार घंटे का सफर करना पड़ाजब ये एंबुलेंस गया पहुंची तो रात को हेलीकॉप्टर उड़ाने की मंजूरी नहीं मिली। ऐसे में घायलों को 19 घंटे बाद दिल्ली एम्स में लाया गयानतीजा,सहायक कमांडेंट विभोर ने अपनी दोनों टांगें खो दी और उनके एक हाथ की दो अंगुलियां भी काटनी पड़ी थी।

 


देश के इस सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बल का मुखिया किसी आईपीएस को बनाया जाता है जबकि इन्हें युद्द जैसी परिस्थितियों में काम करने का कोई अनुभव नहीं होता है। यह आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर केंद्र सरकार की और से भेजे जाते है और इनका कार्यकाल अमूमन 1 या दो साल का होता है। इतने कम समय में सीआरपीएफ की रीति नीति को समझना मुश्किल होता है और यही प्रमुख कारण रहा है कि दुश्मनों से सबसे ज्यादा जूझने वाला यह संगठन व्यवस्थागत कमियों से भी बेहाल है जिसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकाना पड़ रही है। आईपीएस अपने सेवाकाल के अंतिम एक दो साल में प्रतिनियुक्ति पर सीआरपीएफ में आते है,लिहाजा ऐसे बिदाई समारोह भी सीआरपीएफ में होते रहते है। विभोर सिंह को लेकर नियमों का हवाला दे दिया जाता है लेकिन बिदाई समारोह को लेकर सारे नियम तोड़ दिए जाते है। बहरहाल गरिमामय सादगी से दूर खर्चीली भव्यता का कार्यक्रम गुरु ग्राम में होने जा रहा है जहां सीआरपीएफ के जांबाजों के पैसों पर डीजीपी की बिदाई का जश्न मनाया जाएगा।

छापामार युद्द,कड़ी प्रतिद्वंदिता और पराजय की गारंटी, राष्ट्रीय सहारा chapamar yudda

 

राष्ट्रीय सहारा

   


                                                                                                    

                                                                         

 

उज्बेकिस्तान की राजधानी समरकंद इस समय मोदी की पुतिन को युद्द न करने   की नसीहत के लिए चर्चा में है,लेकिन समरकंद का संबंध एक विशेष प्रकार की युद्द नीति तुलुगमा से भी हैउज्बेकों की यह खास युद्द नीति सीमित सेना के बाद भी मजबूत और ज्यादा संख्या वाले सैनिकों को हराने और पस्त करने पर आधारित है। माना जाता है कि बाबर ने दिल्ली के अतिशक्तिशाली सुल्तान  इब्राहीम लोदी को हराने के लिए इसी युद्द नीति का सहारा लिया था और यहीं से भारत में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी बाद में शिवाजी ने भी इस युद्द नीति के बूतें अपने से कहीं मजबूत मुगल साम्राज्य को कड़ी चुनौती पेश की थी अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जायें तो वियतनाम,अफगानिस्तान के बाद अब यूक्रेन में दुनिया की एक अति शक्तिशाली सेना के जमीदोंज होने का एक प्रमुख कारण प्रतिद्वंदियों की सहायता की रणनीति के साथ युद्द की यहीं छापामार नीति को माना जा रहा है


दरअसल इस साल फरवरी में युक्रेन को नियंत्रित करने की कोशिश करने वाली दुनिया की सबसे ताक़तवर सेनाओं में शुमार रूस के लिए युक्रेन एक कब्रगाह साबित हुआ हैपुतिन को लगता था कि युक्रेन को सबक सिखाने के लिए दो या तीन सप्ताह काफी होंगे,जिसमे युक्रेन पर कब्जा करके और वहां के वर्तमान राष्ट्रपति जेलेंसकी को सत्ता से हटाकर रूस समर्थित सरकार का निर्माण कर लिया जाएगाकरीब छह माह बीतने को आए हैरूस की सेना पूर्वी यूरोप के इस देश में बूरी तरह उलझ गई हैरूस के हजारों सैनिक मारे जा चूके है और अब पुतिन तीन लाख रिजर्व सैनिक भेजने का ऐलान कर चूके है। पुतिन परमाणु ब्लैक मेल का सहारा लेकर यूरोप को आगाह कर रहे है कि वे किसी भी हद तक जा सकते है। लेकिन अफ़सोस वे न तो युक्रेन की पराजय को स्वीकार करना चाहते है और न ही अपने देश के पूर्व के सैन्य दुस्साहस और नाकामियों से सबक सीखनें को तैयार है।


शीत युद्द के दौर में अमेरिका ने वियतनाम में आधिपत्य कायम करने और वहां से साम्यवादी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए सैन्य ताकत पर आधारित इसी तरीके पर भरोसा किया था1955 से लेकर 1975 का यह दौर अमेरिका के लिए बुरा सपना साबित हुआउसके हजारों सैनिक वियतनाम में मारे गएअमेरिका ने अत्याधुनिक हथियारों और बमों की बारिश करके यह सोचा था की छोटा सा देश वियतनाम कभी इससे उबर नहीं पाएगालेकिन वियतनाम के लोगों और सैनिकों ने छापामार युद्द की बदौलत अमेरिकी की सेना को वियतनाम से भागने को मजबूर कर दिया थाइसका एक प्रमुख कारण यह भी था की वियतनाम की कम्युनिस्ट सेना को सोवियत संघ ने अमेरिका के खिलाफ भरपूर मदद की थी संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ की परमाणु सैन्य क्षमता ऐसी थी कि दोनों सीधे एक-दूसरे का सामना नहीं कर सकते थे,इसलिए उनके पास ऐसे राज्य थे जिन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। सोवियत संघ ने चीन के कम्युनिस्ट राज्य का गठन किया जिसने उत्तरी वियतनामी को अमेरिकियों से लड़ने के लिए सुसज्जित किया।


युक्रेन और रूस के बीच युद्द में पश्चिम और अमेरिका युद्द में भले ही शामिल न हो लेकिन उन्होंने युक्रेन को अत्याधुनिक हथियार उपलब्ध कराने में कोई कमी नहीं रखी है। यह हथियार उन स्टिंगर मिसाइल से बिल्कुल कम नहीं है जिनसे सोवियत सेना हार गई थी। गौरतलब है कि सोवियत संघ की सेना 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण करके साम्यवादी सरकार को बचाने की कोशिश की थी लेकिन अमेरिका मदद के बूते मुजाहिदीनों के सोवियत सेना को दस साल में भागने को मजबूर कर दिया था। इसमें सबसे प्रमुख हथियार स्टिंगर थास्टिंगर कंधे पर रख कर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है,जिसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है यह अमेरिकी रक्षा उद्योग का एक उत्पाद थाअफ़ग़ान युद्ध के दौरान इस मिसाइल के उपयोग से रूसी वायु सेना के परखच्चे उड़ गए थेस्टिंगर के आने से पहले,मुजाहिदीन के सैन्य अभियानों का बहुत कम प्रभाव पड़ रहा था। लेकिन स्टिंगर  के उपयोग से रुसी सेना में भगदड़ मच गई और यह अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सेना की हार का मुख्य कारण  भी बनी


रूस युक्रेन युद्द में अमेरिका और पश्चिम युद्द के मोर्चे पर आकर भले ही नहीं लड़ रहे हो लेकिन  अमेरिका और यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को आर्थिक सहायता के साथ भरपूर सैन्य सहायता भी दी है अब अमेरिका ने यूक्रेन को HIMARS यानी M142 हाई मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम देने की बात कही है ये सिस्टम लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम हैं इस सहायता पैकेज में हेलीकॉप्टर्स,एंटी-टैंक हथियार,सामरिक हथियार और कल-पुर्जे़ शामिल हैं यह मदद युक्रेन को रूस पर निर्णायक बढ़त दे सकती है


2008 में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से अमेरिका के राष्ट्रपति के उम्मीदवार बनाए गए जॉन मैक्केन किसी समय अमरीकी नौसेना के बमवर्षक विमान के पायलट थे  मैक्केन के प्लेन को वियतनाम युद्द के दौरान हनोई में ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल से मार गिराया गया थावियतनाम युद्ध 1955 में शुरू हुआ था और यह 1975 तक चला थाजब वियतनाम ने प्लेन पर मिसाइल दागी थी तो उस वक़्त भी उन्हें शारीरिक नुक़सान हुआ था और युद्धबंदी बनने के बाद भी उन्हें जेल में मारा-पीटा गया था। बाद में जब मैक्केन वियतनाम से रिहा किये गए तो वे बैसाखी पर चलने को मजबूर थे वो जीवन भर अपने हाथ सिर से ऊपर ले जाने में असमर्थ रहे। दरअसल मैक्केन जीवनभर महाशक्तियों को यह संदेश देते रहे कि सिर से ऊपर हाथ उठाने की कोशिशें भारी पड़ सकती है लेकिन अफ़सोस न तो अमेरिका ने उनसे सबक लिया और न ही पुतिन इससे कुछ सीखने को तैयार है


इन सबके बीच वियतनाम,अफगानिस्तान और युक्रेन में यह देखा गया है कि शक्तिशाली दुश्मन का मुकाबला करने के लिए छोटे देशों में जन समूह का सेना को बड़ा सहयोग मिलता है। युक्रेन के सामान्य लोग हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेकर सेना के बड़े मददगार बने हुए है। वे छापामार युद्द की नीतियों चलकर रुसी सेना को शहर के नजदीक तक आने देते है और फिर अचानक हमला करके उन्हें चकित कर देते है। यहीं कारण है कि रूस की सेना पिछले कुछ दिनों से युक्रेन के शहरों के अंदर घुसने से डर गई है और इसी का नतीजा है कि युक्रेन के कई जीते हुए शहर रूस की सेना से छुड़ाने में युक्रेन की सेना कामयाबी हासिल कर रही है।


इसके पहले अफगानिस्तान के लोग 1970 और 1980 के दशक में रूस के खिलाफ मुजाहिद बनकर लड़े और लोगों का विरोध झेल पाना किसी भी विदेशी सेना के लिये आसान नहीं था।


इस समय ताइवान और चीन के बीच गहरा विवाद है। पिछले महीने अमेरिकी स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन ने ताइवान को लेकर आक्रामक रुख दिखाया है। चीन ने सैन्य अभ्यास के बाद भी अभी तक ताइवान पर हमला नहीं किया है। लगता है चीन को ताइवान में सेना के खिलाफ उस छापामार युद्द का डर सता रहा है जिसके माओ सबसे बड़े पैरोकार थे। सैन्य ताकत में ताइवान चीन से बहुत पीछे हैताइवान के टैंक,हथियार और फाइटर जेट पुराने हैं,उसके नौसेना के जहाजों में आधुनिक रडार और मिसाइल सिस्टम नहीं है और उसके पास आधुनिक पनडुब्बी भी नहीं हैइस बात पर बहुत कम संदेह है की आमने-सामने की लड़ाई में चीन ताइवान से नहीं जीत पाएगा। लेकिन ताइवान के लोग बंदूक चलाना तथा सड़क या गलियों में होने वाली लड़ाई के गुर सीख रहा है। लोगों के पास बॉडी आर्मर,हेलमेट और रेडियो कम्यूनिकेशन के उपकरण हैं। इन सबके साथ ताइवान को अमेरिका और पश्चिम का समर्थन प्राप्त है।

जाहिर है छोटे देशों के लोगों की जिजीविषा,प्रतिकार करने की ताकत और महाशक्तियों की प्रतिद्वंदिता से उपजे फायदे संजीवनी की तरह होते है और यहीं कारण है कि रूस और अमेरिका जैसे देशों को भी अंततः नाकामी ही मिलती है। 

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...