ताइवान पर आक्रामक नीति,जनसत्ता taivan china janstaa

 जनसत्ता


                      

                                                         


प्रशांत महासागर के पूर्व में अमेरिका तथा पश्चिम में रूस,चीन,जापान,कोरिया  और ताइवान हैमहासागर की प्रचंड व्यापारिक हवाएं बिना किसी अवरोध के पूर्व से पश्चिम की और चलती है,लेकिन चीन ने भौगोलिक परिस्थितियों को चुनौती देकर हवा का रुख बदलने की कोशिश की है। इन्हीं कारणों से शुरू हुई अमेरिका और चीन की व्यापारिक और सामरिक प्रतिद्वंदिता ने दुनिया का संकट बढ़ा दिया है


 

दरअसल अमेरिका के निचले सदन की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने चीन के कड़े विरोध को दरकिनार करते हुए ताइवान की यात्रा करके अमेरिकी श्रेष्ठता को बनाएं रखने की भावना का आक्रामक इजहार किया हैइस पूरे घटनाक्रम से ऐसा प्रतीत होता है कि डॉलर कूटनीति और युआन कूटनीति की प्रतिद्वंदिता को यूरोप से खींचकर वापस पूर्वी एशिया में लाने में अमेरिका ने आंशिक सफलता हासिल कर ही ली हैचीन की यूरोप के कई देशों में अपनाई गई ब्रेड और बटर की नीति से लगातार असहज और असुरक्षित महसूस करने वाले अमेरिका ने रणनीतिक महत्व के ताइवान पर अपना ध्यान केंद्रित करके चीन को सामरिक दुष्चक्र में उलझा दिया हैअब इसके दूरगामी परिणाम हिन्द प्रशांत क्षेत्र में कड़ी सैन्य प्रतिद्वंदिता के रूप में सामने आ सकते है

 


अमेरिका इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि वन चाइना पॉलिसी की वृहत अवधारणा को नजरअंदाज करके चीन को कभी भी असहज किया जा सकता हैट्रम्प ने भी यह दांव खेला था2016 में उन्होंने सीधे ताइवान की राष्ट्रपति साई यिंग वेन से बात  करके 1979 में तय अमरीकी की उस नीति को भंग कर दी थी जिसके अनुसार अमरीका ने ताइवान से औपचारिक रिश्ते ख़त्म कर दिए गए थेचीन के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप और ताइवान की सीधी बातचीत पर विरोध दर्ज  कराते हुए इसे वन चाइना पॉलिसी का उल्लंघन बताया थालेकिन अमेरिकी स्पीकर नैंसी पेलोसी ने ढाई दशक बाद किसी अमेरिकी नेता के रूप में ताइवान की यात्रा करने का असाधारण कदम उठाकर माओ के किसी स्पष्ट मानचित्र को न मानने की चीनी उग्र राष्ट्रवादी महत्वाकांक्षा को ध्वस्त कर दिया


मध्यपूर्व,अफगानिस्तान और यूक्रेन के युद्द से दूर रहने की बाइडेन की नीति को अमेरिकी सुरक्षा के लिए संकट पैदा करने वाला बताया जा रहा था और इस कारण घरेलू मोर्चे पर भी बाइडेन आलोचकों की लगातार कड़ी प्रतिक्रिया झेल रहे थेअब बाइडेन ने अपने वैदेशिक नीति के अनुभवों के आधार पर अपने मुख्य प्रतिद्वंदी चीन को पूर्वी एशिया में ही उलझा दिया है

 


ताइवान पूर्वी एशिया का एक देश है,जो हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का महत्वपूर्ण आर्थिक और सामरिक भागीदार है। ताइवान द्वीपों का समूह है। इसके पश्चिम में चीन,उत्तर-पूर्व में जापान तथा दक्षिण में फिलीपींस है1949 से चीन से अलग ताइवान को चीन अपना हिस्सा बताता रहा हैचीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कई बार कह चूके है कि ताइवान का एकीकरण ज़रूर पूरा होना चाहिए,वहीं ताइवान खुद को एक स्वतंत्र देश बताता है और उसे चीन का आधिपत्य किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं हैताइवान की वर्तमान राष्ट्रपति  साइ इंग वेन 2016 में जब से सत्ता में आई है,वे ताइवान की स्वतंत्रता और चीन के विरोध की  प्रतीक बन गई हैचीन,ताइवान को अपने से अलग हुए प्रांत के रूप में देखता है और उसने चेतावनी दी है कि ज़रूरत पड़ने पर,उसे बल प्रयोग से वापस चीन में मिलाया जा सकता हैवहीं साइ इंग वेन ने कहा है कि वो चीन के साथ मौजूदा रिश्तों को बरकरार रखेंगी,लेकिन चीन को भी ताइवान के लोकतंत्र का सम्मान करना चाहिए

 


साइ इंग वेन ने सत्ता में आने के बाद सामरिक तौर पर ताइवान की मजबूती के लिए अमेरिका से न केवल घातक और अत्याधुनिक हथियार खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है बल्कि वह देश के सभी युवाओं को युद्द जैसे हालात से निपटने और युद्द में लड़ने के लिए तैयार रहने का आह्वान करती रही है  चीन के विरोध के चलते ताइवान की वैश्विक चुनौतियां कम नहीं हैताइवान लंबे समय से आर्थिक सहयोग और मदद के बूते अपने चंद राजनयिक साझीदारों को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश कर रहा हैउसका प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देश चीन आर्थिक सुपर पॉवर बन चुका है और वो अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसके साझीदारों को एक एक कर अलग कर रहा हैजहां ताइवान ख़ुद को स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र मानता है,वहीं चीन का मानना है कि ताइवान को चीन में शामिल होना चाहिए और फिर इसके लिए चाहे बल प्रयोग ही क्यों न करना पड़े चीन दुनिया पर दबाव डालने के लिए किसी भी उस देश के साथ राजनयिक संबंध नहीं रखता जो ताइवान को एक स्वतंत्र देश की मान्यता देता है

 


हालांकि ताइवानी राष्ट्रपति वेन चीन की वैश्विक तौर पर आलोचना का कोई अवसर नहीं छोड़ती हैवे हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों और रैलियों का समर्थन करते हुए यह कह चूकी है कि, जो भी ताइवान की संप्रभुता और लोकतंत्र को कमज़ोर करने या राजनीतिक सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा,वो असफल हो जाएगावेन ताइवान पर आधिपत्य के चीन के किसी भी दावे को ख़ारिज करते हुए हॉन्ग-कॉन्ग की तरह एक देश दो सिस्टम की राजनीतिक व्यवस्था को भी ख़ारिज करती है,उनका कहना है कि ये अब बेकार है वेन ताइवान को लोगों को  हांगकांग से सबक लेते हुए यह हिदायत भी  देती रही है कि यदि वे आज़ाद ताइवान पर जोर नहीं देंगे तो जो कुछ भी हमारे पास है,उसे खो देंगेराष्ट्रपति साई ताइवान की डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी का नेतृत्व करने वाली पहली नेता हैडीपीपी चीन से आज़ादी की पक्षधर पार्टी है। वेन के राष्ट्रपति बनने के बाद चीन ज्यादा आक्रामक हुआ है और उसने ताइवान की तरफ़ सैकड़ों मिसाइलें तान रखीं हैचीन ने ताइवान की आज़ादी चाहने पर सेना का इस्तेमाल करने की धमकी दी है


 

ताइवान की चीन में न मिलने की प्रतिबद्धता और कोशिशों के बीच शी जिनपिंग इसे चीन में मिलाकर हिन्द प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकते हैचीन की आक्रामकता को लेकर अमेरिका और उसके नैटों समेत अन्य सहयोगी देश सतर्क हैहाल ही में बाइडन में अपनी मध्यपूर्व की यात्रा को अमेरिकी सुरक्षा और चीन को चुनौती देने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण बताया थावहीं चीन अमेरिका ने अमेरिका पर आरोप लगाया था कि वह मध्यपूर्व में भी नैटों जैसा संगठन स्थापित करना चाहता हैबाइडन,बराक ओबामा की एशिया प्रशांत नीति को आगे बढ़ाते हुए मध्यपूर्व में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के प्रभाव को कम करने की दिशा में मध्यपूर्व देशों से अपने संबंध बेहतर करना चाहते हैं


 

ताइवान,दक्षिण चीन सागर से लगा हुआ है और यह क्षेत्र चीन के अवैध कब्ज़े की आशंकाओं से बुरी तरह ग्रस्त रहा हैदक्षिणी चीन सागर दक्षिण पूर्वी एशिया में पश्चिम प्रशांत महासागर का एक महत्त्वपूर्ण भाग हैयह चीन के दक्षिणी भाग, वियतनाम के दक्षिणी एवं पूर्वी भाग,फिलीपींस के पश्चिम और र्बोनियो द्वीपसमूह के उत्तरी भाग में स्थित है। नैंसी पेलोसी ने ताइवान के साथ ही जिन देशों की यात्रा की,वे चीन की आक्रामक नीतियों से प्रभावित रहे है।  दक्षिण चीन सागर सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है,वहीं हिन्द प्रशांत क्षेत्र का भी बहुत रणनीतिक महत्व है।  वर्तमान में विश्व व्यापार की 75 प्रतिशत वस्तुओं का आयात-निर्यात इसी क्षेत्र से होता है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े हुए बंदरगाह विश्व के सर्वाधिक व्यस्त बंदरगाहों में शामिल हैं। विश्व की जीडीपी में इसका साठ फीसदी से ज्यादा का योगदान है,इस क्षेत्र में कुल 38 देश शामिल हैं,जो विश्व की कुल आबादी का 65 प्रतिशत हिस्सा है।


 

ताइवान अमेरिका के लिए वह आधार है जिससे हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीन को चुनौती दे सकता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त एवं स्वतंत्र क्षेत्र बनाने के लिये अमेरिका भारत,ताइवान,ऑस्ट्रेलिया,जापान और दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य  भागीदारी बढ़ाकर चीन को संतुलित और नियंत्रित करना चाहता हैप्रशांत क्षेत्र से जुड़ी चीन की महत्वाकांक्षाएं पश्चिम को परेशान करती रही हैइस साल  जून में चीन के विदेश मंत्री वांग ने प्रशांत द्वीप समूह के कई देशों की यात्रा की थी,इन सबका मुख्य लक्ष्य इस इलाक़े के साथ चीन के संबंधों को और गहरा बनाने का था। लेकिन अमेरिकी प्रभाव में ही कई देशों ने चीन से व्यापारिक समझौतों पर असहमति जताई जिससे चीन अपनी कोशिशों में असफल हो गया

 


एक अनुमान के अनुसार,चीन अगले पांच वर्षों में अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा,यह स्थिति अमेरिका के लिये चिंता  बढ़ाने वाली है।  प्रशांत द्वीप समूह पर चीन की लंबे समय से निगाहें हैंचीन 2006 से इस इलाक़े में अपने व्यापार,आर्थिक मदद,कूटनीतिक और व्यावसायिक गतिविधियों को लगातार बढ़ा रहा हैचीन प्रशांत क्षेत्र के देशों को अनुदान और कर्ज़ देकर अपने प्रभाव में लेने की नीति पर भी लगातार काम कर रहा हैप्रशांत द्वीप समूह के देशों पर पकड़ बनाने की चीन की महत्वाकांक्षा की एक वजह ताइवान भी हैप्रशांत द्वीप समूहों के संसाधनों का चीन मुख्य ग्राहक है,ये संसाधन चीन के विकास के लिए अहम हैंइसलिए इन संसाधनों तक बेहतर पहुंच बनाना भी चीन की प्राथमिकता है


 

चीन दीर्घकालीन रणनीति पर कार्य करते हुए यूरोप,अफ्रीका और एशिया में लगातार अपना व्यापारिक प्रभाव कायम करने में सफल रहा है। ऐसे में अमेरिका और नैटो देशों के सामने साम्यवाद का प्रभाव रोकने की बड़ी चुनौती खड़ी हुई है। रूस के यूक्रेन युद्द में उलझने के बाद चीन को ताइवान में उलझाकर अमेरिका और नैटो अपना वैश्विक प्रभाव मजबूत कर सकते है। नैंसी  पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद उत्पन्न विवाद चीन को रोकने की वही कवायद नजर आती है। 2018 में ऑस्ट्रेलिया ने अपने प्रशांत परिवार के साथ अपना जुड़ाव फिर से मज़बूत करने के लिए पैसिफिक स्टेप-अप की नीति शुरू कीजापान भारत के साथ सहयोग बढ़ा रहा है वहीं क्वाड को लेकर भी अमेरिका की चीन पर दबाव डालने की नीति ही है। हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मजबूत होकर चीन की दीर्घकालिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ने से रोक सकता है और ताइवान संकट को बढ़ाकर अमेरिकी ने चीन को रणनीतिक जाल में फ़िलहाल उलझा दिया है। अमेरिका की सीधी चुनौती से चीन के वैश्विक रुतबे को क्षति पहुंची है और इससे चीन के साथ सीमा विवाद में उलझे भारत जैसे देशों के खुलकर अमेरिका  के साथ खड़े होने की उम्मीद भी बढ़ गई है।

 

 

 

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