नेपाल में अग्निपथ भर्ती योजना का विरोध nepal bharat virodh agnipath yojna

 सांध्य प्रकाश

        


          

                                                            

      

भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं का स्थान इतना उच्च है कि पाकिस्तान और चीन से लड़ाई में गोरखा रेजिमेंट के बलिदान को सदैव याद किया जाता है। भारतीय आर्मी के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल  सैम मानेकशा ने एक बार प्रख्यात रूप से कहा था यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता,वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है। गोरखा रेजिमेंट को युद्धों में अनेक पदको़ व सम्मानों से अलंकृत किया गया,जिनमें महावीर चक्र और परमवीर चक्र भी शामिल हैं।

 

बीरगंज नेपाल का एक दक्षिणी सीमावर्ती शहर है जिसकी सीमा बिहार में पूर्वी चंपारण के रक्सौल शहर से लगती है। नेपाल में सड़क मार्ग से प्रवेश करने का यह एक प्रमुख रास्ता है। रक्सौल से बीरगंज की दूरी मात्र 11 किलोमीटर है।  रक्सौल के बाज़ार में 90 फीसदी नेपाली लोग होते है जो यहां खरीदी करने रोज आते है। मान लीजिये बीरगंज में रहने वाले गोरखा युवक भारतीय सेना में आने के स्थान पर चीन या पाकिस्तान की सेना में शामिल होने लगे और यह बड़ी संख्या में हो तो क्या रक्सौल के बाज़ार में नेपालियों को इसी प्रकार आने दिया जायेगा। इस समय यह सवाल इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि अग्निपथ भर्ती योजना से नाराज नेपाल के गोरखा अब पाकिस्तान या चीन की सेना में शामिल होने की बात कह रहे है। उनका कहना है कि अग्निपथ भर्ती योजना उनके पूरे जीवन की नौकरी की गारंटी नहीं देता है,ऐसे में जहां से उन्हें बेहतर प्रस्ताव मिलेगा,वे जाएंगे और मौका मिला तो भारत के खिलाफ लड़ेंगे भी।


 

दरअसल नेपाल में भारतीय सेना में शामिल अग्निपथ भर्ती योजना का व्यापक विरोध हो रहा है,इसे देखते हुए वहां की देउबा सरकार ने भर्ती की कोई अनुमति नहीं दी हैकाठमांडू में भारतीय दूतावास के बाहर अच्छी खबर,अग्निपथ भर्ती  योजना के शीर्षक से एक पोस्टर लगा हुआ है जिसमें यह जानकारी साझा की गई है कि भारत सरकार ने भारतीय सशस्त्र बलों के लिए नई अग्निपथ भर्ती योजना की शुरुआत को स्वीकृति प्रदान कर दी है युवाओं के लिए भारतीय सशस्त्र बलों में सेवा करने और इसके साथ ही आकर्षक आर्थिक पैकेज का फ़ायदा उठाने का सुनहरा मौक़ा है पोस्टर में इस बात पर जोर दिया गया है कि इस योजना में नेपाल में रह रहे आकांक्षी युवाओं के हितों का ख़याल रखा गया है अंत में यह लिखा गया है कि योजना के कार्यान्वयन और नेपाल में भर्ती रैलियां शुरू करने के बारे में अगली जानकारी बहुत ही जल्द दी जाएगीबुटवल में 25 अगस्त से सात सितंबर तक नेपाली गोरखाओं के लिए भर्ती रैली और धरान में 19 से 28 सितंबर तक होनी थीभारत ने नेपाल की सरकार से इन तारीख़ों पर अनुमति मांगी थी,लेकिन नेपाल सरकार ने समय रहते जवाब नहीं दिया है। ऐसे में भर्ती रैली न हो पाने की आशंका है। भारत और नेपाल के सैन्य इतिहास की दुखद परिस्थिति बनती हुई दिखाई दे रही है


 

भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं का स्थान इतना उच्च है कि पाकिस्तान और चीन से लड़ाई में गोरखा रेजिमेंट के बलिदान को सदैव याद किया जाता है। भारतीय आर्मी के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल  सैम मानेकशा ने एक बार प्रख्यात रूप से कहा था यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता,वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है। गोरखा रेजिमेंट को युद्धों में अनेक पदको़ व सम्मानों से अलंकृत किया गया,जिनमें महावीर चक्र और परमवीर चक्र भी शामिल हैं। वर्तमान में हर वर्ष लगभग  बारह सौ से तेरह सौ नेपाली गोरखे भारतीय सेना में शामिल होते है। गोरखा राइफल्स में लगभग 80 हजार नेपाली गोरखा सैनिक हैं,जो कुल संख्या का लगभग 70 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त रिटायर्ड गोरखा जवानों और असम राइफल्स में गोरखों की संख्या करीब एक लाख हैभारतीय सेना से रिटायर्ड नेपाली गोरखाओं की तादाद तकरीबन एक लाख पैतीस हजार हैइनकी सैलरी और पेंशन मिला दें तो यह रक़म 62 करोड़ डॉलर हैयह नेपाल की जीडीपी का तीन फ़ीसदी हैदूसरी तरफ़ नेपाल का रक्षा बजट महज़ 43 करोड़ डॉलर हैयानी नेपाल के रक्षा बजट से ज़्यादा भारत से नेपाली गोरखाओं को हर साल सैलरी और पेंशन मिल रही हैऐसे में अग्निपथ न केवल भारतीय फौज की ताकत को बल्कि नेपाल की अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है


 

भारतीय सेना की इन्फ़ेंट्री में सिख,गढ़वाल,कुमाऊं,जाट,महार,गोरखा,राजपूत समेत 31 रेजिमेंट हैंगोरखा रेजिमेंट से चीन भी डरता है क्योंकि भारत चीन तनाव में गोरखा चीन को भौगोलिक रूप से ज्यादा चुनौती देते है। पहाड़ी और पर्वती इलाकों में गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना की ताकत में इजाफा करती है खासतौर पर गोरखा सैनिकों का शौर्य,समर्पण और लड़ने का जज्बा कमाल का होता है और उसका कोई मुकाबला नही हो सकता पिछले कुछ सालों में चीन ने यह जानने में दिलचस्पी दिखाई है कि आखिर नेपाली गोरखा भारतीय सेना में जाना क्यों पसंद करते है अब अग्निपथ योजना के कारण नेपाली गोरखाओं के चीन की ओर आकर्षित होने का संकट गहरा सकता है


 

भारत और नेपाल के बीच क़रीब अठारह सौ किलोमीटर लम्बी सीमा है जो बिहार,उत्तरप्रदेश,उत्तराखंड,सिक्किम और पश्चिम बंगाल राज्यों से भी लगती हैंभारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैंदोनों देशों के बीच की वो अनूठी व्यवस्था मशहूर है जो अपने नागरिकों को बिना वीज़ा के दूसरे देश की यात्रा करने की अनुमति देती हैभारत में क़रीब अस्सी लाख नेपाली नागरिक भारत में रहते हैं और काम करते हैं,वहीं क़रीब छह लाख भारतीय नेपाल में रहते हैंजब से भारत ने अग्निपथ योजना की घोषणा की है तब से लोग बहुत निराश हैं यदि यही हाल रहा तो अब शायद ही कोई नेपाली गोरखा भारतीय सेना में जाना चाहेगा। गोरखा भारतीय सेना में भर्ती को लेकर कड़ी मेहनत करते है क्योंकि उनकी दृष्टि में यह रोजगार और बेहतर भविष्य की गारंटी है लेकिन अग्निपथ योजना को वे अपने सपनों पर पानी फेरने जैसा बता रहे है। चीन इस मौके का फायदा उठाकर नेपाली गोरखाओं को अपनी फौज में भर्ती करने की कोशिश कर सकता है

 


नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल मुखर होकर अग्निपथ योजना का विरोध कर रही है वहीं  नेपाल की वर्तमान सरकार समझती है कि चार साल बाद सेना की ट्रेनिंग लेने के बाद युवा वापस नेपाल लौटेंगे तो उनका दुरुपयोग किया जा सकता हैउनका कहना है कि नेपाल के अतिवादी गुट इन युवाओं की ट्रेनिंग का दुरुपयोग कर सकते हैं। नेपाल में माओवाद के खतरें को देखते हुए उनका दावा बेबुनियाद नहीं लगता। इस साल जून में एक प्रेस कांफ्रेंस में लेफ़्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने कहा था कि कि सेना में जवानों की भर्ती की नई अग्निपथ योजना एक प्रगतिशील क़दम है और देश की रक्षा के लिए ऐसा करना बेहद ज़रूरी है


 

भारत के युवा सरकार की किसी भी शर्त को मान सकते है,यह बात नेपाल के गोरखाओं पर लागू नहीं होतीगोरखा सेना और युद्द को लेकर बेहद पेशेवर अंदाज रखते हैयदि वे चीन या पाकिस्तान की सेना में चले जाते है तो फिर भारत की नेपाल से लगी हुई सीमा असुरक्षित होगी बल्कि भारत के लिए यह बड़ा सामरिक झटका भी हो सकता है। अग्निपथ भर्ती योजना को लेकर गोरखा युवाओं की नाराजगी को नेपाल की भारत विरोधी ताकतें प्रश्रय दे सकती है। कालापानी को लेकर नेपाल और भारत के संबंध खराब दौर में पहुंच गए है और अब दोनों देशों के बीच अविश्वास को बढ़ने से किसी हाल में रोका जाना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सियासी दुष्चक्र में दलित राष्ट्रीय सहारा rajsthan dalit siyasat

 राष्ट्रीय सहारा

                       


 

                                                                     

भारत में जनतंत्र कामयाब नहीं हो सकता क्योंकि यहां की सामाजिक व्यवस्था संसदीय लोकतंत्र के प्रारूप से मेल नहीं खातीस्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार रहे डॉ.भीमराव आंबेडकर का यह कथन वंचित वर्गों के हितों के संरक्षण को लेकर था1951 में वे जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में कानून मंत्री भी बने लेकिन उन्होंने यह कहकर अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था की नेहरू ने वंचित समुदायों के लिए पर्याप्त कोशिशें नहीं की


 

भारत आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है मतलब आज़ाद भारत ने 75 साल का सफर तय कर लिया है  एक बेहतर समतावादी व्यवस्था की स्थापना के लिये सार्वजनिक स्वास्थ्य,शिक्षा और पोषण को मज़बूत करने के साथ ही लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना बहुत आवश्यक है। भारत में जातीय भेदभाव  की चुनौती इसमें शामिल है लेकिन हकीकत यह है कि भारत मानव विकास के तमाम मानकों पर दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में एक हैभारतीय लोकतंत्र से ऐसी अपेक्षा संविधान निर्माताओं ने नहीं की थी डॉ.अंबेडकर असमानता के प्रभावों को लेकर इतने आशंकित थे कि उन्होंने संविधान सभा को चेतावनी देते हैं कहा था कि,अगर हमने इस ग़ैरबराबरी को ख़त्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे,जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है


 

यह बेहद दिलचस्प है कि भारत में गैर बराबरी बनाएं रखने के लिए वंचित वर्ग से ज्यादा तत्पर राजनीतिक दलों का प्रभावी सामंती वर्ग रहा है और वह किसी भी तरीके से जातीय व्यवस्था को बनाएं रखने के लिए प्रतिबद्द नजर आता हैशिक्षा भी जातीय व्यवस्था के संकुचित दायरे से पूरी तरीके से बाहर नहीं आ सकी है और इसके प्रभाव से स्कूल,यूनिवर्सिटीज,बड़े संस्थान,कॉर्पोरेट जगत, मीडिया,नौकरशाही और सामाजिक संगठन ग्रस्त रहे हैराजनीतिक दलों के लिए गैर बराबरी खत्म करने को मुद्दा है ही नहीं। क्योंकि गैर बराबरी उन्हें अलग अलग अवसरों पर सत्ता तक पहुंचने का अवसर उपलब्ध कराती है। संविधान सभा में अंतिम बार सवालों का जवाब देने का जिम्मा उन्हें ही सौंपा गया था डॉ.आंबेडकर की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जातियों में बंटा भारतीय समाज एक राष्ट्र की शक्ल कैसे लेगा और आर्थिक और सामाजिक ग़ैरबराबरी के रहते वह राष्ट्र के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे कर पाएगा? आज़ादी के इतने सालों का अनुभव यह बताता है कि असानता के रहते न तो वास्तविक स्वतंत्रता कायम हो सकती है और न ही समता,स्वतंत्रता,समानता के बिना किसी सामाजिक भाईचारे की कल्पना ही की जा सकती हैअर्थात् जातिवाद के खात्मे के बिना लोकतांत्रिक समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते

 


तो क्या भारत में लोकतंत्र विफल हो गया है ? नहीं,लेकिन संसदीय लोकतंत्र में आरक्षित वर्ग से चुने गए प्रतिनिधियों के निक्कमेपन ने करोड़ों दलित आदिवासियों के हितों को निराश अवश्य किया है अनुच्छेद 334 के संविधानिक प्रावधान के मुताबिक हर दस साल पर,संसद एक संविधान संशोधन विधेयक पारित करती है,जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसुचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और फिर राष्ट्रपति इस विधेयक को अनुमोदित करते हैं इस समय लोकसभा में 543 सदस्यों में एससी के लिए 84 और एसटी के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं जबकि देश के विधानसभाओं में 4120 सीटों में 1168 सीटें एससी-एसटी के लिए हैं। लोकसभा और विधानसभाओं में आज़ादी के समय से ही अनुसूचित जाति और जनजाति का उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहा है


 

सवाल यह उठता है कि इतने सारे दलित और आदिवासी सांसद और विधायक अपने समुदाय के लिए करते क्या हैं? नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो आंकड़ों के मुताबिक इन समुदायों के उत्पीड़न के मामलों से साल दर साल वृद्धि हुई है  जाहिर है कि इन आंकड़ों के पीछे एक और आंकड़ा उन मामलों का होगा,जो कभी दर्ज ही नहीं होते हैं क्या दलित उत्पीड़न की इन घटनाओं के ख़िलाफ़ दलित सांसदों या विधायकों ने कोई बड़ा,याद रहने वाला आंदोलन किया है? ऐसे सवालों पर,संसद कितने बार ठप्प की गई है और ऐसा आरक्षित वर्ग के सांसदों ने कितनी बार किया है?


जालोन की घटना को ही लीजिये इसके विरोध में एक दलित विधायक ने इस्तीफा दिया,लेकिन यह भी बड़ी बात है क्योंकि आरक्षित वर्ग के विधायक अकेले तो आवाज उठा ही नहीं पाते और न ही कभी एकजुट होकर अपने समुदायों के हितों के लिए मुखर होकर बोलते है  संविधान की व्यवस्था के मुताबिक,अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं,लेकिन वोटर सभी वर्गों के होते है किसी भी आरक्षित लोकसभा सीट 20 से 50 फीसदी एससी या एसटी के लोग होते है और बाकि अन्य वर्गों के मतदाता होते है अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी नेता का सांसद चुना जाना इस बात से तय नहीं होगा कि  उसके वर्ग के कितने लोगों ने उसे वोट दिया है ज़्यादातर आरक्षित सीटों की यही कहानी है इन सीटों पर चुना वह जाएगा जो आरक्षित समूह से बाहर के ज़्यादातर वोट हासिल करेगा


 

राजनीतिक सीटों पर चुने जाने की विवशता और राजनीतिक दल के हित साधने के लिए आरक्षित वर्ग के प्रतिनिधि निष्क्रियता बनाएं रखते है और यही अनुसूचित जाति और जनजाति के करोड़ों लोगों के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। सामान्य मुद्दों पर कई कई दिनों तक विधानसभाएं और संसद के कार्य को बाधित कर दिया जाता है लेकिन आरक्षित वर्ग के हितों के लिए यदि एससी के 84 और एसटी के 47  सांसद संसद में हंगामा कर दे या एक साथ विरोध कर दे तो इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन इन सांसदों में कभी ऐसा साहस देखा ही नहीं गया। बाबा साहेब का मॉडल वंचितों को समर्थ और सक्षम बनाकर उन्हें इस काबिल बनाने का है कि वे जातिवाद को चुनौती दे सकेंराजनीतिक परिदृश्य और खासकर संसदीय लोकतंत्र में आरक्षित वर्ग के प्रतिनिधियों की निष्क्रियता के चलते तो जातिवाद और गैर बराबरी को खत्म करना मुश्किल दिखाई पड़ता हैअपने ऐतिहासिक भाषण एनिहिलेशन ऑफ कास्ट में  डॉ.आम्बेडकर हिंदुओं से आह्वान करते हैं कि अगर वे अपने धर्म को बचाना चाहते हैं तो उन्हें जाति का विनाश करना होगा। लेकिन हकीकत इससे अलग है। भारत के राजनीतिक दल जाति आधारित हो गए है और ये पार्टियां परिस्थितियों और फायदों के अनुसार  समाज में इंसाफ और अधिकारों के लिए लड़ने की बजाय अपने अपने जातीय समूहों के हित में विशेष लाभ और रियायतें लेने की फिराक में रहती हैं। इन समस्याओं के चलते न तो समाज के वास्तविक सवाल हल हो रहे है और न ही दलितों के वास्तविक सवाल का कोई समाधान हो पाया हैडॉ.आम्बेडकर को दलितों की दावेदारी का प्रतीक बताया जाता है लेकिन आरक्षित वर्ग के विधायक और सांसद उस दावेदारी का प्रतिनिधित्व करते कभी नजर ही नहीं आते


बाबा साहेब चाहते थे कि सेपरेट इलेक्टोरेट यानी सिर्फ़ दलित और आदिवासी वोटर ही अपने प्रतिनिधि चुनें,उन सीटों पर दूसरा प्रतिनिधि भी हो,जिनका चुनाव बाकी लोग करें। तब ही वंचित वर्ग की आवाज संसद और विधानसभा में बुलंद हो पायेगी।  वर्तमान संसदीय व्यवस्था से आएं आरक्षित वर्ग के निष्क्रिय और निक्कमें प्रतिनिधियों से बेहतरी की अपेक्षा करना बेकार है।

 

 

हम्बनटोटा के सामरिक संकेत जनसत्ता Hambantota port china

 

                                                                                             

                                                                   

चीन के चमत्कारिक आर्थिक सामरिक विकास के साथ ही उसके मूल हितों का दायरा बढ़ता जा रहा है हिन्द महासागर को लेकर चीन ने किसी आधिकारिक नीति की घोषणा तो नहीं की है लेकिन एशिया में चीन की कोशिश अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समुद्री व्यवस्था विकसित करने और उसके संचालन में अग्रणी भूमिका निभाने की है श्रीलंका के हम्बनटोटा बन्दरगाह में चीनी बैलिस्टिक मिसाइल और उपग्रह ट्रैकिंग जहाज युआन वांग 5 का कथित शोध अभियान के नाम पर रुकना,चीन की सामरिक महत्वकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करता है चीन का दावा है कि यह एक अनुसंधान और सर्वेक्षण पोत है। लेकिन युआन वांग 5 जिन अत्याधुनिक उपकरणों से लैंस है,उससे चीन के इरादों पर संदेह होता है भारत ने श्रीलंका के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि जहाज पर लगे ट्रैकिंग सिस्टम इस क्षेत्र में भारतीय अवसंरचनाओं के तटीय बनावट की जानकारी जुटा सकते हैं। इसका इस्तेमाल चीन की सैन्य पनडुब्बियों व पोतों के लिए भी किया जा सकता है।


दरअसल चीन युआन वांग 5 श्रेणी के पोतों का उपयोग उपग्रह,राकेट और बैलिस्टिक मिसाइलों के प्रक्षेपण को ट्रैक करने के लिए करता है। चीन के पास इस तरह के पोतों की संख्‍या करीब आधा दर्जन है। ये पोत प्रशांत महासागर,अटलांटिक और हिंद महासागर से संचालित होने में सक्षम हैं। भारत के साथ अमेरिका भी इस पर संदेह जता चुका है। चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की देखरेख में एसएसएफ द्वारा इन पोतों का संचालन किया जाता है। यह पीएलए की रणनीति,साइबर इलेक्ट्रानिक,सूचना,संचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध मिशन को देखती है। यहां यह जानना बेहद जरूरी है कि चीन की स्ट्रैटिजिक सपोर्ट फोर्स (एसएसएफ) का स्पेस सिस्टम डिपार्टमेंट चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लगभग सभी अंतरिक्ष संचालन के लिए जिम्‍मेदार हैं। इन अंतरिक्ष अभियानों में अंतरिक्ष प्रक्षेपण,निगरानी और अंतरिक्ष युद्ध शामिल हैं। चीन की यह फोर्स उपग्रहों और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) के लांच को ट्रैक करने के लिए युआन वांग पोत का संचालन करती है। भारत ने युआन वांग 5 के हम्बनटोटा बन्दरगाह पर प्रवेश को लेकर जो विरोध  और चिंता जताई थी, उसका प्रमुख कारण समुद्र से लगे हुए भारत के प्रमुख अंतरिक्ष और सैन्य अनुसंधान केंद्र है जिन पर चीन की गहरी नजर है


इन सबके बीच श्रीलंका ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को दरकिनार कर तथा चीनी पोत को हम्बनटोटा में प्रवेश की इजाजत देकर नया सामरिक संकट  पैदा कर दिया है और यह आने वाले समय में भारत की सुरक्षा रणनीति को बदलने पर मजबूर कर सकता है श्रीलंका की सरकार पर चीन का कर्ज़ करीब साढ़े छह बिलियन डॉलर है चीन से मोटा कर्ज़ लेकर श्रीलंका ने हंबनटोटा पोर्ट और मताला एयरपोर्ट का निर्माण किया था लेकिन कर्ज़ न लौटा पाने की वजह से श्रीलंका,बीजिंग को ये दोनों ही जगहें 99 साल की लीज़ पर देने को विवश हो गयाश्रीलंका चीन के कर्ज जाल में उलझकर गहरे दबाव में है और भारत की चिंताओं को समझकर भी चीन के हितों को मानने के अलावा उसके पास कोई विकल्प भी नहीं है


चीन की अति महत्वकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड़ में  हम्बनटोटा के साथ ही दक्षिण एशिया के कई देशों के बंदरगाह हैजाहिर है अन्य देश भी भविष्य में  किसी चीनी पोत को अपने यहां आने से रोक पाएंगे,इसमें संदेह है और इससे भारत की सामरिक चुनौती बढ़ गई है वन बेल्ट वन रोड़ के सहारे चीन की व्यापक योजनाएं है और इसे रोक पाना भारत के लिए बेहद कठिन हैवन बेल्ट वन रोड़ जिसे ओबीओआर भी कहा जाता है,वह  व्यापारिक रास्तों के समानांतर बंदरगाहों,रेलवे और सड़कों का व्यापक नेटवर्क तैयार करने की चीनी संभावनाओं के द्वार खोलता हैचीन व्यापक पैमाने पर अफ़्रीका,मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में रेल और सड़क नेटवर्कों का निर्माण कर रहा हैइस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य चीन को अफ़्रीका,मध्य एशिया और रूस से होते हुए यूरोप से जोड़ना है। इसके प्रभाव में भारत को छोड़कर दक्षिण एशिया के सभी देश है।


ग्वादर पोर्ट पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित एक गहरे समुद्र का बन्दरगाह है। इस बन्दरगाह को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) योजना में मुख्य माना जाता है और इसे महत्वाकांक्षी वन बेल्ट,वन रोड और समुद्री सिल्क रोड परियोजनाओं के बीच एक लिंक माना जाता है। पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह और म्यांमार के क्याउकफियू बंदरगाह को चीन ने विकसित किया है और बांग्लादेश के साथ तो चीन की बड़ी सामरिक और आर्थिक भागीदारी है बांग्लादेश ने 2019 में चीन के दक्षिण-पश्चिम प्रांतों को चटगांव और मोंगला बंदरगाहों का इस्तेमाल करने के लिए दिया थाचटगांव बंदरगाह बांग्लादेश का प्रमुख समुद्री बंदरगाह हैये बंगाल की खाड़ी के समुद्री किनारे पर सबसे व्यस्त बंदरगाह हैभू-राजनीतिक रूप से बांग्लादेश भारत का एक  महत्वपूर्ण सहयोगी है और अपनी जगह की वजह से चटगांव बंदरगाह बांग्लादेश का एक सामरिक हिस्सा हैभारत और चीन के लिए चटगांव बंदरगाह का बड़ा महत्व है बांग्लादेश 2040 तक विकसित राष्ट्र बनना चाहता हैवह 2055 तक बंदरगाह की कार्गो संभालने की क्षमता तीन गुना बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है और इसमें उसे चीन की भारी आर्थिक मदद मिल रही है चीन,बांग्लादेश के लिए हथियारों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। चीन 2015 में भारत को पीछे छोड़कर बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया थावर्तमान में चीन की पहुंच चटगांव बंदरगाह तक है और वो बांग्लादेश में कई निर्माण परियोजनाओं में भागीदार हैबांग्लादेश के बन्दरगाह चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं,क्योंकि वे एक आकर्षक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराते हैं,जिससे ऊर्जा की आपूर्ति के लिए मलक्का जलडमरूमध्य पर उसकी निर्भरता कम हो सकती है। चीन के यूनान प्रान्त से बांग्लादेश की भौगोलिक निकटता के मद्देनजर ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति के लिए इन बन्दरगाहों तक आसानी से पहुंच बनाई जा सकती है। चीन,बांग्लादेश की विकास सम्बन्धी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में उदार रहा है। बांग्लादेश चीन की बीआरआई परियोजना में शामिल है और इसके तहत उसने चार अरब डॉलर का क़र्ज़ लिया है यह बांग्लादेश के कुल विदेशी क़र्ज़ का छह फ़ीसदी है इससे साफ हो जाता है कि युआन वांग 5 जैसे पोत चटगांव बंदरगाह भी आ सकते है और भारत इसे रोक पाएगा,इसकी संभावना बिल्कुल नहीं होगी


भारत के पड़ोसी देशों के बंदरगाहों में चीन का निवेश हिंद महासागर के क्षेत्र में समुद्री ऊर्जा के रास्तों पर नियंत्रण करने और दक्षिण एशिया के देशों में बंदरगाहों को विकसित करके अपनी ताक़त का विस्तार करने की उसकी योजना का एक हिस्सा है चीन को समुद्री व्यापार की मौजूदा विश्व व्यवस्था और उसके नियम स्वीकार्य नहीं है अत: चीन का समुद्र में हावी होना भारत समेत विश्व के कई देशों के लिए संकटकारक है


जाहिर है चीन के चमत्कारिक आर्थिक सामरिक विकास के साथ ही उसके मूल हितों का दायरा बढ़ता जा रहा है चीन ने हमेशा ही अपने मूल हितों को बहुत व्यापक रूप से परिभाषित किया हैइससे चीन को ये लाभ होता है कि जैसे जैसे बात आगे बढ़ती है,वो ख़ास क्षेत्रों में अपने अधिकार क्षेत्र को और लचीला बनाते हुए बढ़ाता जाता हैचीन की विदेश नीति का सबसे मौलिक उद्देश्य प्रचंड सैन्य शक्ति के साथ आर्थिक महाशक्ति बनकर एशिया पर प्रभुत्व स्थापित करना हैअपनी विदेश नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए चीन अनेक प्रकार के साधनों का प्रयोग करता हैइसमें प्रमुख है आर्थिक सहायता,सैनिक शक्ति का दबाव,राजनीतिक कार्य,अमेरिकी विरोध,कूटनीति,सैन्य और अधिनायकवादी सत्ताओं का संरक्षण,प्रचारात्मक मनोवैज्ञानिक युद्ध और आर्थिक प्रतियोगिताइसमें सभी साधनों का उपयोग एक साथ संभव नहीं है,विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार इन साधनों का प्रयोग किया जाता है चीन ने देश के मूल हितों की रक्षा की ज़िम्मेदारी को बड़ी मज़बूती से अपनी सेनाओं के हवाले कर दिया हैचीन ने ये घोषणा भी की है कि वो एक असरदार सैन्य बल विकसित करेगाख़ासतौर से मध्यम अवधि के युद्ध में जीत हासिल करने वाली समुद्री ताक़त का विस्तार करने पर उसका बहुत ज़ोर हैचीन की नौसेना क्षेत्रीय स्तर पर भीषण युद्ध के लिए ख़ुद को तैयार कर रही हैइससे यह आशंका गहरा गई है कि चीन,हिंद महासागरीय क्षेत्र से होकर जाने वाले महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों के संरक्षण को अपने लक्ष्यों में शामिल करेगाविश्व के कच्चे तेल के व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत परिवहन हिंद महासागर के चोक पॉइंट के रूप में जाने जाने वाले जल के तीन संकरे मार्गों से होकर जाता है। इसमें फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज का जलडमरूमध्य शामिल है,जो फारस की खाड़ी से हिंद महासागर तक एकमात्र समुद्री मार्ग प्रदान करता है।चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के हिस्से के रूप में पूरे क्षेत्र में बुनियादी ढाँचागत  परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। इस निवेश के माध्यम से चीन हिंद महासागर के सीमावर्ती देशों में अपनी सामरिक बढ़त को बनाना चाहता है।


हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत के मुक्त रूप से नौसैनिक गतिविधियों के संचालन पर व्यापक प्रभाव पड़ना तय है चीन के नौसैनिक,उन समुद्री ठिकानों पर अन्य देशों के नौसैनिकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं,जहां पर चीन की नौसेना ने हाल ही में अड्डे बनाए हैं इनमें बांग्लादेश और पाकिस्तान शामिल है. वहीं म्यांमार और श्रीलंका से भी चीन के सामरिक संबंध मजबूत है

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2013 में यह साफ किया था कि चीनकभी भी अपने वाजिब समुद्री अधिकारों और हितों की रक्षा से पीछे नहीं हटेगा. हिंद महासागर पर उसका बढ़ता प्रभाव चीन की व्यापक आर्थिक और सामरिक हितों को प्रदर्शित करता हैचीन अपनी  मोतियों की माला की नीति के अनुसार,भारत को घेरते हुए हिंद महासागर में स्थित देशों में अपने नौसैन्य अड्डे स्थापित कर भारत पर सामरिक बढ़त हासिल करने के बहुत करीब पहुंच गया है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी हिंद महासागर क्षेत्र में अपना विस्तार करती जा रही है,जिससे भारतीय नौसेना के हितों के साथ टकराव होने की संभावना है।


चीन की चुनौतियां निरंतर बढ़ रही है और इससे निपटने के लिए भारत को दीर्घकालीन नीतियों पर काम करने तथा आर्थिक और सामरिक साझेदारियां बढ़ाने की जरूरत है। 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री ने मॉरीशस यात्रा के दौरान सागर विज़न की शुरुआत की थी,यह समुद्री सुरक्षा,साझेदारी एवं सहयोग के महत्त्व में वृद्धि  पर आधारित है।  भारत को सागर विजन पर मजबूती से आगे बढ़ना ही होगा अन्यथा जमीन के साथ समुद्र में भी चीन से सैन्य टकराव बढ़ सकता है

 

 

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