जनसत्ता -मध्यपूर्व में रणनीतिक बदलाव

जनसत्ता


 


                                                                                

ब्लैंक चेक पॉलिसी से हटकर #सौदेबाज़ी की कूटनीति अमेरिकी हितों के लिए मददगार नहीं हो सकती। अमेरिकी राष्ट्रपति #बाइडन उन्हीं नीतियों पर चलने को मजबूर हो गए है जो उन्हें विरासत में मिली है। #अमेरिका #इजराइल का सबसे बड़ा आर्थिक मददगार है वहीं बाइडन ने फिलिस्तीन को दी जाने वाली सहायता पुनः बहाल कर दी है। मूल्यों और मानवाधिकारों की बात करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन अपने पूर्ववर्ती अमेरिकी राष्ट्रपतियों की उन्हीं नीतियों पर चल रहे है जिससे अमेरिकी की सुरक्षा और हित सुनिश्चित हो सके #चीन की वैश्विक स्तर पर खुले हाथों से ऋण बांटने की नीति से अमेरिका के लिए सुरक्षा संकट और ज्यादा गहरा रहा है। #रूस,चीन और #ईरान की बढ़ती साझेदारी को प्रभावित करने के लिए बेताब बाइडन ने #मध्यपूर्व की यात्रा में यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि आने वाले समय में रूस और चीन को रोकने तथा ईरान में अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन उनके मुख्य लक्ष्य होंगेइसके लिए किसी भी हद तक जाने से अमेरिका को कोई परहेज नहीं होगा 


दरअसल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मानवाधिकार पर काफ़ी ज़ोर देने की बात करने वाले और अपने चुनावी प्रचार के दौरान सऊदी अरब को ख़राब मानवाधिकार रिकॉर्ड के चलते अलग-थलग कर देंने का दावा करने वाले बाइडन ने मध्यपूर्व की यात्रा पर मूल्यों आधारित नीतियों को दरकिनार कर अमेरिकी हितों को सामने रखाअमेरिका की विदेश नीति में मूल्यों और आदर्शों से कहीं अधिक शक्ति की नीति को प्राथमिकता दी जाती हैअमेरिकी लोगों का यह मानना है कि विदेश नीति को सैनिक कार्यक्रम के द्वारा मदद मिलनी ही चाहिए,जिससे राष्ट्र को सुरक्षित रखा जा सकेअमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन की इस यात्रा पर उनके देश में एक समूह ने उन्हें सऊदी अरब न जाने की नसीहत देते हुए मानवाधिकार का मुद्दा उठाया,जिसमें #जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या में सऊदी अरब की भूमिका की बात कहीं गई थी। वे राष्ट्रपति बाइडन की #सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात का भी विरोध कर रहे थे क्योंकि अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने क्राउन प्रिंस पर जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या होने का आरोप लगाया थालेकिन अमेरिका के सऊदी अरब को लेकर गहरे आर्थिक और रणनीतिक हित रहे हैबाइडन ने फिलिस्तीन और इजराइल के बाद सऊदी अरब की यात्रा भी की तथा अपने सैन्य हितों को ऊपर रखकर मानवाधिकार जैसे मुद्दों को कहीं पीछे छोड़ दियाख़ाशोज्जी की हत्या एक विषय तो था लेकिन राष्ट्रपति जो बाइडन ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से ऊर्जा पर बात की और यह उम्मीद जताई कि प्रमुख तेल उत्पादक सऊदी अरब आने वाले हफ़्तों में बाज़ार को स्थिर करने के लिए क़दम उठाएगाइसके साथ ही जो बाइडन सऊदी अरब को अपने हवाई क्षेत्र को इजराइल से आने जाने वाले विमानों के लिए खोल देने के  लिए राजी करने पर कामयाब हो गए बाइडन ने इस यात्रा के पूर्व ही इसके उद्देश्यों को साफ करते हुए कहा था कि,अमेरिका को रूस की आक्रामकता का मुकाबला करने और खुद को चीन को चीन से बेहतर स्थिति में रखने के लिए उन देशों से सीधे संबंध बनाने होंगे जो इन नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं,सऊदी अरब उनमें से एक है


अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी से मध्य पूर्व में अमेरिकी साख बेहद प्रभावित हुई है,वहीं रूस यूक्रेन संघर्ष के चलते अमेरिका और #यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर कई प्रतिबन्ध लगाने के बाद भी #पुतिन का आक्रामक व्यवहार बड़ी चुनौती बन गया हैइस साल नवम्बर में अमेरिका में उप चुनाव है और ईरान की परमाणु महत्वकांक्षाएं बदस्तूर जारी हैइन चुनौतियों से निपटने के लिए बाइडन ने मध्य पूर्व की यात्रा को बहुआयामी बनाया सऊदी अरब अगर तेल उत्पादन बढ़ाता है तो रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण बढ़ी तेल की कीमतें घट सकती हैं और बाइडन को इसका फ़ायदा नवंबर में होने वाले मध्यावधि उप-चुनावों में मिल सकता है


फिलिस्तीन के प्रति उदार रवैया दिखाकर वे इस्लामिक दुनिया को अपने हक में कर सकते थे और बाइडन ने ऐसा किया भीइजराइल अमेरिकी हितों का प्रमुख रक्षक है,इसलिए अमेरिका लगातार इजराइल के खाड़ी के अन्य देशों सऊदी अरब,सऊदी अरब अमीरात,बहरीन,क़तर आदि से सम्बन्ध मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा हैकुछ महीने पहले इजराइल में चार अरब देशों का बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें शामिल होने के लिए अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी पहुंचे  थे।  इस सम्मेलन में संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन,मोरक्को और मिस्र के विदेश मंत्री ने भाग लिया था। यह पहली बार था कि इजराइल ने इतने सारे अरब देशों के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक आयोजित की। इसकी नींव ट्रम्प प्रशासन ने 2020 में रखी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में हुए #अब्राहम एकॉर्ड शांति समझौते के तहत यूएई और बहरीन ने इजराइल में अपने दूतावास स्थापित करने के साथ ही साथ पर्यटन,व्यापार,स्वास्थ्य और सुरक्षा सहित कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ाने का संकल्प लिया था।


अमेरिका लगातार ईरान पर दबाव बनाने की नीति पर भी आगे बढ़ रहा है। ईरान और इजराइल की शत्रुता बहुत पुरानी है तथा सुन्नी मुस्लिम देशों की नजरों में भी ईरान चुभता रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भी ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ कर इतना यूरेनियम जमा कर लिया है आगे आने वाले समय में वो ख़ुद परमाणु उपकरण बनाने में सक्षम होगा ईरान की बढ़ती ताकत खाड़ी के कई देशों के साथ अमेरिका के लिए भी समस्या बढ़ाने वाली रही है अमेरिका ईरान और उसके सहयोगियों से मिसाइल और ड्रोन हमले के ख़तरे को देखते हुए एक समन्वित वायु सुरक्षा प्रणाली बनाने की कोशिश कर रहा है।  अमेरिका की आर्थिक मदद लेकर इजराइल की सरकार सैन्य उपकरणों और ट्रेनिंग में काफ़ी पैसे खर्च करती है वहीं ईरान खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और अन्य पश्चिमी नौसेनाओं की उपस्थिति का कड़ा विरोधी रहा है। 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान खाड़ी के अरब देशों से अमेरिकी सेनाओं को इस इलाक़े से निकालने के लिए कहता रहा है। सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ईरान और उसके इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर को लेकर हमेशा ये देश ईरान को लेकर सतर्क रहते हैं क्योंकि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए मध्य पूर्व के कई देशों में  ताक़तवर शिया मिलिशिया गुटों का बड़ा नेटवर्क तैयार किया है,जो अमेरिका और सुन्नी हितों को नुकसान पहुंचाते रहे है।


 

ईरान ने सीरिया में राष्ट्रपति #बशर अल-असद को मान्यता देने के साथ  यमन में हूती विद्रोहियों तथा लेबनान में हिज़्बुल्लाह को पैसा,हथियार और अपनी सेना भेजकर इन देशों में अपनी स्थिति को मज़बूत कर लिया है। मध्य-पूर्व में ईरान की गतिविधियों की आलोचना में सऊदी अरब सबसे ज़्यादा मुखर रहा है। सऊदी अरब के बड़े तेल संयंत्रों पर ईरान समर्थित विद्रोहियों के द्वारा ड्रोन और मिसाइलों से हमले का असर तेल उत्पादन पर पड़ा था और पूरी दुनिया में तेल की क़ीमतों में उछाल आ गया था। इस हमले का संदेश साफ़ था कि ईरान अगर चाहे तो सऊदी अरब और उसके सहयोगियों को बुरी तरह नुक़सान पहुंचा                     सकता है तथा उनकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दे सकता है।

 


पिछले कुछ समय में सऊदी अरब और अमीरात ने रूस और चीन से अपने संबंध मजबूत किए हैं।  अमेरिका का उद्देश्य साफ़ है कि वो सऊदी अरब को कम कीमतों पर अपना तेल बेचने के लिए  तैयार करें क्योंकि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के तेल और गैस राजस्व पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है।  अमेरिका जानता है कि सऊदी के समर्थन के बिना रूस की अर्थव्यवस्था पर चोट करना मुश्किल है। यूक्रेन पर आक्रमण से पहले संयुक्त अरब अमीरात आने वाले पर्यटकों का चौथा सबसे बड़ा समूह रूसी लोगों का थायूक्रेन पर आक्रमण के बाद अमेरिका,यूरोपीय संघ और अन्य देशों ने रूस पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाएजिससे ये दुनिया के सबसे अधिक प्रतिबंधों से ग्रस्त देशों में से एक बन गया,लेकिन संयुक्त अरब अमीरात ने अब तक रूस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया हैसंयुक्त अरब अमीरात जैसे अमीर देशों के साथ रूस की साझेदारी से अमेरिका परेशान है और इसे खत्म करना चाहता है

 


खाड़ी के देशों से तेल ख़रीदने में चीन बड़ा ग्राहक है। मध्य-पूर्व से अमेरिका की कम होती दिलचस्पी की धारणा के बीच सऊदी अरब भी नए विकल्पों की ओर बढ़  रहा है।  अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद स्थिति,इसका फायदा चीन ने उठाया तथा गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल और चीन के बीच मुक्त बाज़ार व्यवस्था की बात आगे बढ़ गई। इस साल जननवरी में सऊदी अरब,कुवैत,ओमान और बहरीन के विदेश मंत्री चीन की यात्रा पर भी गएचीन ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना बन बेल्ट वन रोड के तहत एशिया,मध्य-पूर्व और अफ़्रीका में भारी निवेश का वादा कर रखा हैचीन और जीसीसी में रणनीतिक साझेदारी को लेकर सहमति बनी है। अमेरिका को इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का अंदाज़ा है। अब अमेरिका खाड़ी देशों में अपनी स्थिति को पुनः मजबूत करने के लिए नई साझेदारियों को आगे बढ़ा रहा है।  बाइडन भारत,अमेरिका,यूएई और इजरायल के साथ मिलकर #आई2यू2 समूह पर आगे बढ़े है,जो इन देशों के बीच के व्यापारिक संबंधों को मजबूती देगाअमेरिका चाहता है कि इन नए ग्रुप में चारों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग भी हो


 

 

अमेरिका मध्य पूर्व में नेटो की तर्ज़ पर एक संगठन बनाने की भी चर्चा हो रही है,इसमें इजराइल और अरब राज्य शामिल होंगे और ये अमेरिका के अनुकूल होगा। जाहिर है बाइडन यह बेहतर समझ चूके है कि अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को बनाएं रखने के लिए किसी कीमत पर चीन,रूस और ईरान जैसे देशों के प्रभाव को सीमित करना होगा। इसीलिए वे नियन्त्रण और संतुलन  पर आधारित नई  साझेदारियों को आगे बढ़ा रहे है,जिससे अमेरिका के सामरिक और राजनीतिक हित सुरक्षित हो सके।

 

महामहिम मुर्मू...अब आदिवासियों का मर्म समझने की जरूरत politics

महामहिम #मुर्मू...
अब #आदिवासियों का मर्म समझने की जरूरत
(#सुकमा ग्राउंड जीरो...किताब से)




छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से जब #सुकमा की ओर आगे बढ़ते है तो घने जंगल और पहाड़ियां स्वागत करने के लिए तैयार रहती है। बस में बैठी सवारियों में अधिकांश #आदिवासी होते है,जो गरीबी और संघर्ष का प्रतिरूप नजर आते है। इनके बीच कभी कभार #सीआरपीएफ के जवान भी सादी ड्रेस में मिल जाते है। नक्सली आईइडी से बस को निशाना नहीं बनाते क्योंकि इससे स्थानीय आदिवासियों के मारे जाने और उनके नाराज होने का खतरा बना रहता है,अत: सीआरपीएफ को इसका फायदा मिल जाता है।




जगदलपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर #झीरम घाटी को पार करना होता है,जहां 2013 में छत्तीसगढ़ के कई नेताओं की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। इसमें #महेंद्र कर्मा भी शामिल थे। वे एक आदिवासी राजनीतिक नेता थे जो 2004 से 2008 तक छत्तीसगढ़ विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे थे। 2005 में उन्होंने छत्तीसगढ़ में माओवादी समूह नक्सलियों के खिलाफ #सलवा जुडूम आंदोलन के आयोजन में एक शीर्ष भूमिका निभाई थी। नक्सलियों के निशानें पर वे सलवा जुडूम के कारण ही थे। झीरम घाटी के ठीक ऊपर नक्सलियों की याद में दो बड़े बड़े स्मारक बने है और किसी की हिम्मत नहीं की कोई उन्हें नष्ट कर दे। यह भी बेहद दिलचस्प है कि इन स्मारकों के दूसरी तरफ स्कूल भी है और थाना भी। सड़क के इस और नक्सली स्मारक और दूसरी और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ के दावे का पोस्टर।



राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर सुकमा स्थित है और यहीं रोड़ छत्तीसगढ़ को तेंलगाना और आंध्रप्रदेश से जोड़ता है। झीरम घाटी अब भी वैसी ही है और यहां नक्सली हमला किसी भी समय हो सकता है। कांगेर घाटी,दरभा घाटी,कटे कल्याण की पहाड़ियां और उड़ीसा की मलकानगिरी की पहाड़ियां सब एक दूसरे से जुडी हुई है। नक्सली हमला करके कहीं पर भी भाग सकते है और उन्हें पकड़ना बिलकुल आसान नहीं है। 2011 और 2012 में सुकमा और #मलकानगिरी के कलेक्टर का नक्सलियों द्वारा अपहरण कोई संयोग नहीं था। आज भी बिना सीआरपीएफ की सुरक्षा के किसी अधिकारी की हिम्मत नहीं है की इन इलाकों में चले जाएं।



इसी राजमार्ग पर सुकमा जिला केंद्र से पहले तोंग्पाल आता है. यह कस्बा बेहद खतरनाक माना जाता था और यहां नक्सलियों के बड़े बड़े पोस्टर आसानी से रोड़ पर नजर आ जाते थे। #तोंग्पाल में लड़कियों का एक हॉस्टल है। मैं आते जाते इस हॉस्टल को अक्सर देखा करता था। सीआरपीएफ की बहुत सारी योजनाएं शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर चलती रहती है,यहां की अन्य समस्याओं पर उनकी भी नजर होती है। मुझे भी इस इलाकें की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत का पता चला तो मैं एक सुबह इस प्री मैट्रिक होस्टल के मुख्य द्वार पर खड़ा था। हॉस्टल की अधीक्षिका से बात हुई और मैंने इस हॉस्टल को देखने की इच्छा जताई। हॉस्टल के रूम साफ सुथरे थे और सब कुछ बेहतर दिख रहा था।



लेकिन वहां रहने वाली लड़कियों में एक समानता दिख रही थी। स्कूल में पड़ने वाली दस ग्यारह साल की लडकियां बेहद कमजोर नजर आ रही थी। उनकी ऊंचाई भी अपेक्षाकृत कम थी और ग्रोथ की संभावना भी दिखाई नहीं दे रही थी। मैंने अधीक्षिका से इसका कारण जानना चाहा तो पता चला की लड़कियों के विकास के लिए जो पोषण आहार मिलना चाहिए,वह मिल ही नहीं पाता है। गरीब #आदिवासी लड़कियां कमजोर होने के कारण मासिक धर्म की अनियमिता से जूझती है। अस्पतालों से भी प्रोटीन,विटामिन की कमी को दूर करने की सुविधाएं मिल नहीं पाती। कुपोषण से स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के कारण लड़कियों का न तो बेहतर शैक्षणिक विकास हो पाता है और न ही शारीरिक विकास।



सुकमा आदिवासी बाहुल्य जिला है और आदिवासी समाज में लड़कियों को बेहद सम्मानित समझा जाता है। घने जंगल में बेखौफ #महुआ बीनते हुई महिलाएं आसानी से देखी जा सकती है,#तेंदुपत्ता या ताड़ी बेचते हुए भी महिलाएं ही अधिकांश दिखती है।



वनवासी समाज में महिलाओं को आगे बढ़ाने की जिजीविषा तो बहुत दिखती है लेकिन हकीकत यह है कि उन्हें उपयुक्त वातावरण देने में सरकारें नाकाम रही है। इसमें भ्रष्टाचार की भी बड़ी भूमिका है। लड़कियों के पिछड़ने का प्रभाव आदिवासी इलाकों के वातावरण पर पड़ता है। नक्सली हमलों में शामिल अधिकांश महिलाएं होती है और सुकमा,दंतेवाडा,बीजापुर या नारायणपुर के कई घरों की आदिवासी लडकियां नक्सली आंदोलन का हिस्सा है।



सुकमा से लगा हुआ #ओड़िशा है और ओड़िशा के #मयूरभंज जिले के #बैदापोसी गांव में देश की नई राष्ट्रपति #द्रोपदी मुर्मू का जन्म एक जनजातीय संथाल परिवार में हुआ था। मयूरभंज उड़ीसा के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित है इसलिए इसके पश्चिमी और उत्तरी भाग की सीमाएं झारखण्ड के जिलों को स्पर्श करती है और उत्तर पूर्व में पश्चिम बंगाल के जिले है। मयूरभंज के उत्तर में पश्चिम बंगाल का मिदनापुर जिला,दक्षिण में झारखंड का सिंहभूम जिला,पश्चिम में बालासोर जिला और पूर्व में केंदुझार जिला है।  मयूरभंज जिले के मध्य भाग में सिमिलिपल रेंज के नाम से जानी जाने वाली पहाड़ियों का समूह है। यह अनुसूचित जनजाति बहुल जिला है।


पश्चिम बंगाल या झारखंड से जब भी नक्सली भागते है या छुपने की जगह ढूंढते है तो मयुरभंज उनके लिए सबसे मुफीद रास्ता होता है। हालांकि 2018 में सरकार ने मयुरभंज को नक्सल मुक्त जिला घोषित किया था लेकिन यहां की भौगोलिक स्थिति नक्सलियों के लिए छुपने के अवसर उपलब्ध कराती है। ओडिशा के मलकानगिरी,कोरापूत,रायगढ़,बालनगीर,बारगढ़,नबरंगपुर,कालाहांडी, सुंदरगढ़,कंधमाल और नौपदा जैसे जिले नक्सल प्रभावित है और मयुरभंज इनसे ज्यादा दूर नहीं है। खासकर सिमलीपाल राष्ट्रीय उद्यान यहीं है और नक्सलियों की मनपसन्द जगह भी है यह।





सुकमा में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है,वहीं मयुरभंज से लोहा और अभ्रक बड़ी मात्रा में निकाला जाता है। पर्यटक इन जिलों में आते है या रुकते है तो वे होटल या आरामगाह कम से कम आदिवासियों के तो नहीं होते। आम आदिवासी भूमिहीनता,गरीबी और शोषण से जूझने को मजबूर है। इसी का फायदा नक्सली उठाते है और आम आदिवासी सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच बुरी तरीके से पिसता रहता है।



पांच साल पहले देश के राष्ट्रपति #रामनाथ कोविंद बने तो यह कहा गया था कि अब देश में दलितों के हाल बेहतर होंगे। आंकड़े गवाह है कि देशभर में दलितों के खिलाफ अपराध ही बढ़े। यहां तक की जिस रोज रामनाथ कोविंद का बतौर राष्ट्रपति अंतिम दिन था,उसी रोज देश के सबसे बड़े सूबे #उत्तरप्रदेश के एक #दलित मंत्री ने यह कह कर अपने पद से इस्तीफा दे दिया की उनका कोई सम्मान नहीं है और उन्हें बैठकों में भी नहीं बुलाया जाता।



अब देश की महामहिम द्रोपदी मुर्मू बनी है। उनके देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होने से उम्मीदें तो बहुत जागी है। आने वाले पांच सालों में देश का आदिवासी समाज गरीबी और असमानता के भंवर से मुक्त हो गया तो #नक्सलवाद भी खत्म हो जायेगा और महामहिम का आदिवासी समाज से होना भी सार्थक हो जायेगा। महामहिम का जिस इलाके में जन्म हुआ है,वह बेहद पिछड़ा हुआ आदिवासी बाहुल्य इलाका है। जाहिर है महामहिम की दृष्टि में आदिवासी समाज की मूलभूत समस्याएं रही होगी और अब उन्हें समाप्त करने का मुफीद समय है।

#ब्रह्मदीप अलूने

फांसी के फंदे के करीब यासीन मलिक,स्वदेश

 

   स्वदेश                     फांसी के फंदे के करीब यासीन मलिक


                                                                                                   

न्याय यदि बहुरुपिया हो जाये तो समाज में अराजकता फ़ैल जाएगी और यह स्थिति किसी राज्य की संप्रभुता को खत्म करने के लिए पर्याप्त है न्याय प्रणाली में लंबे समय से राजनीतिक़ हस्तक्षेप के कारण कश्मीर की समस्या नासूर बन गई थी अब जांच एजेंसियां कश्मीर के अलगाववादी ताकतों पर जिस प्रकार शिकंजा कस रही है,उससे गुनहगारों को सजा मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। दरअसल जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का नेता यासीन मलिक कुछ आतंकियों के साथ 8 दिसंबर 1989 को तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया का श्रीनगर से अपहरण करता हैउसे करीब 122 घंटे कैद में रखा जाता हैइस दौरान सरकार से आतंकियों की रिहाई की मांग की जाती हैअंततः केंद्र की वीपी सिंह सरकार यासीन मलिक की मांग के आगे झुक जाती है और रुबिया की रिहाई के बदले पांच कुख्यात आतंकियों को छोड़ देती है। यहीं से कश्मीर में आतंक का नया दौर शुरू हो जाता हैलाखों कश्मीरियों को घर बार छोड़कर भागना पड़ता है,कईयों की हत्या कर दी जाती है

 


इन सब घटनाओं में यासीन मलिक शामिल रहता हैअपहरण की घटना के बाद कश्मीर की आबो हवा में आतंक घुल जाता है। अलगाववादी और आतंकियों का आम जनता हीरो की तरह स्वागत करती है। आतंकी इस बात को प्रचारित करते है कि उन्होंने सरकार को झुका दिया। अलगाववाद के नारे घाटी में सुनाई देने लगते है। आतंकियों की रिहाई के बाद घाटी की सड़कों पर आतंकियों के स्वागत के लिए लोग उमड़ पड़ते है। इस प्रकार उस दिन पहली बार घाटी में खुलेआम आजादी के नारे सुनाई दिए और यहीं से भारत विरोध का नया हिंसक  दौर शुरू हो जाता है

 


1989 के बाद कई सरकारें आई,उनके मुखिया बदले,नीतियां बदली और आतंकवाद से निपटने के कड़े कानून भी बने इन सबके बीच यासीन मलिक आतंकवादी से अलगाववादी नेता बन गया भारत के कई प्रधानमंत्री उससे बात भी करते रहे लेकिन कभी उसके द्वारा किए गए अपहरण पर सवाल नहीं किया गया। अब करीब 32 साल बाद घाटी में आतंकवाद के बदतरीन होने के सबसे बड़े कारण पर अदालत में सुनवाई हो रही है  

 


जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद हाल ही स्‍पेशल सीबीआई कोर्ट के सामने में पेश हुईं। अदालत में रुबैया सईद ने 1989 के अपहरण से संबंधित एक मामले में जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक और तीन अन्य आतंकियों की पहचान की। भारत की न्याय व्यवस्था पर राजनीति किस कदर भारी पड़ सकती है,इसी का प्रमाण है कि इतने सालों बाद पहली बार रुबैया सईद को इस मामले में पेश होने के लिए कहा गया। वास्तव में रुबैया के अपहरण का मास्टर माईंड यासीन मलिक ही था,जिस कार से रुबैया को सुनसान इलाके में ले जाया गया,उसमें  अशफाक माजिद वानी,ग़ुलाम हसन और अली मोहम्मद मीर के साथ यासीन मलिक भी बैठा था इसकी पुष्टि कश्मीर के एक अलगाववादी नेता हिलाल वार ने अपनी किताब ग्रेट डिस्क्लोजरः सीक्रेट अनमास्क्डमें भी की। हिलाल ने रूबिया सईद अपहरण को लेकर खुलासा करते हुए आरोप लगाया था कि यह सिर्फ एक ड्रामा था जो तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जेकेएलएफ के कमांडर यासीन मलिक के साथ मिलकर रचा था। हालांकि आने वाले समय में इस अपहरण से संबंधित कई राज बाहर आने की संभावना बढ़ गई है।  

 


यह भी बेहद दिलचस्प है कि रूबिया अपहरण का मामला राजनीतिक कारणों और अलगाववादी नेताओं को लेकर लचीली नीतियों के कारण ठंडे बस्ते में चला गया था लेकिन 2019 में टेरर फंडिंग के आरोप में राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा यासीन मलिक को पकड़े जाने के बाद यह फिर से सुर्खियों में आ गया। सीबीआई ने रूबिया अपहरण मामले में मलिक सहित 10 लोगों के खिलाफ आरोप तय किए तथा रूबिया सईद को सीबीआई ने अभियोजन पक्ष के गवाह के रूप में सूचीबद्ध कर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इस महत्वपूर्ण केस को नये सिरे से सामने लाने की कवायद की,जो अब सफल होती दिख रही हैरूबिया सईद आजकल चेन्नई में रहती है और वह एक अस्पताल  में डॉक्टर  है और उनके परिवार को बाकायदा सरकारी सुरक्षा दी गई है।

 


यासीन मालिक के गुनाहों की फेहरिस्त लंबी है और उसे घाटी का सबसे बड़ा षडयंत्रकारी माना जाता है1988 में  कई युवकों के साथ उसने पाकिस्तान जाकर  सशस्त्र प्रशिक्षण लिया था और उसे  बाद में भारत विरोधी सशस्त्र समूह जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट  का प्रमुख  बना दिया गया थाजम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ही कश्मीर में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाला पहला आतंकी ग्रुप था  गौरतलब है कि पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक़ 80 के दशक में भारत को तोड़ने की एक सुनियोजित रणनीति पर काम कर रहे थे। ऑपरेशन टोपैक के अनुसार कट्टरपंथी मौलवियों को कश्मीर घाटी में भेज कर बहुसंख्यक मुसलमानों को भड़काया गया। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में हमला करने वाले अधिकांश आतंकी विदेशी ही होते थे। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने वाले कई आतंकियों को कश्मीर में भेजा। इन आतंकियों ने भारतीय सेना,पुलिस अधिकारी,प्रशासन के लोग और कश्मीरी पंडितों पर व्यापक हमले किए थे। पाकिस्तान की शह पर भारत समर्थित लोगों पर हिंसक हमले किए गए और उनकी हत्याएं की गई। पाकिस्तान की इस हिंसक योजना को अंजाम जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की सहायता से ही दिया गया था।  इस आतंकी संगठन से खुले तौर पर घोषणा की थी की कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर चले जाएं।

 


यासीन मलिक आतंकवाद को बढ़ाने के साथ घाटी का राजनीतिक चेहरा भी बनना चाहता था जिससे वह वैश्विक स्तर भारत के खिलाफ विष वमन कर सके उसने 1994 में सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ कर शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष का नारा दिया और लिबरेशन फ्रंट को एक राजनीतिक दल के रूप में पेश किया वह पाकिस्तान का एजेण्डा कश्मीर घाटी में चलाता रहायासीन मलिक ने पाकिस्तान की एक  लड़की से विवाह कर अपने रिश्तों को दुश्मन देश से मजबूत रखा। वह पाकिस्तान के इशारों पर चलने वाला एक ऐसा अलगाववादी नेता बन गया जो अपनी कड़ी शर्तों से कश्मीर में शांति की उम्मीदों को चोट पहुंचाता रहा।  2013 में अफजल गुरु की फांसी के बाद यासीन मालिक ने पाकिस्तान जाकर इस्लामाबाद में कुख्यात आतंकी हाफिज सईद के साथ भूख हड़ताल की थी

 


एनआईए की स्पेशल कोर्ट ने अभी टेरर फंडिंग मामलें में यासीन मलिक को उम्र कैद की सजा सुनाई है यासीन मलिक को यूएपीए यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की धारा 16,17,18 और धारा 20 के तहत दोषी पाया था इस कानून का मुख्य उद्देश्य आतंकी गतिविधियों को रोकना होता है इन धाराओं में आतंकवादी गतिविधि,आतंकवादी गतिविधि के लिए धन जुटाना,आतंकवादी कृत्य की साज़िश रचना और आतंकवादी समूह की या संगठन का सदस्य होने जैसे अपराध शामिल होना हैमलिक के विरुद्ध आरोप ये भी था कि  उसने आज़ादी के नाम पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी और अन्य गैरक़ानूनी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के मक़सद से दुनिया भर में एक विस्तृत संरचना और तंत्र स्थापित किया था

 


जम्मू कश्मीर में आतंक का निर्माता निदेशक यासीन मलिक अभी शांति की बात करता हो लेकिन वह कश्मीर में कई निर्मम हत्याओं का जिम्मेदार माना जाता है1990 में एक आतंकी हमले में भारतीय वायु सेना के स्क्वैड्रन लीडर रवि खन्ना सहित चार जवानों की  हत्या कर दी गई थी  यासीन मलिक ने इस गुनाह को कुबूल किया है कि वह इस हमले में शामिल था  इसी प्रकार सेवानिवृत्त जज नीलकंठ गंजू की 4 नवंबर 1989 को आतंकियों ने हत्या कर दी। यह हत्या आतंकी मकबूल भट को फांसी की सजा सुनाए जाने के बदले में की गई थी क्योंकि जस्टिस गंजू ने ही उसे एक इंस्पेक्टर की हत्या मामले में सजा सुनाई थी। मलिक ने एक टीवी इंटरव्यू में हत्या की बात कबूल भी की थी। अभी कश्मीर के इस कुख्यात अलगाववादी को टेरर फंडिंग केस में उम्रकैद की सजा मिली है,लेकिन अभी कई गुनाहों का हिसाब बाकी है। जाहिर है यासीन मलिक का फांसी पर चढ़ना तय है और यह सजा देर सबेर उसे मिलना ही है।

 

रॉ को पहले भी मिलते रहे है धोखे,प्रजातंत्र raw dhokhe ansari,moraraji,gujral

 प्रजातंत्र 

                 


                                     

90 के दशक में भारत के विदेश मंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल का गुजराल सिद्धांत को पाकिस्तान में बहुत सराहा गया था गुजराल सिद्धांत के अनुसार पड़ोसी देशों का विश्वास जीतने के लिए अप्रत्याशित कदम उठाये गये थेइन कदमों में दुश्मन देश पाकिस्तान में रॉ की गतिविधियों को विराम दे देना भी शामिल था। दरअसल इंद्रकुमार गुजराल के पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम कर चूके थे,अत: उन्होंने दुश्मन देश के प्रति बेहद सदाशयता दिखाई और इसके दूरगामी परिणाम भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हुए। इसमें कश्मीर में आतंकवाद का बढना शामिल था। रॉ पूरे दक्षिण एशिया में कमज़ोर हुई और इसका खामियाजा राष्ट्रीय सुरक्षा को अब तक भोगना पड़ रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान का मजबूत होना पाकिस्तान के लिए बेहद फायदेमंद रहा और यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए जानलेवा बन गया। कश्मीर के अधिकांश आतंकवादी अफगानिस्तान,ईरान और पाकिस्तान में प्रशिक्षित होते थे और एक दौर तो ऐसा भी आया जब भारत तालिबान के सामने इतना असहाय हो गया कि उसे कंधार में पाकिस्तान के आतंकियों को छोड़कर अपना अपह्रत विमान छुड़वाना पड़ा।


90 का दशक भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था और पाकिस्तान अफगानिस्तान,ईरान और सऊदी अरब जैसे इस्लामिक देशों के साथ भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिशों में संलग्न था। इस समय रॉ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। संयोग से इस समय  हामिद अंसारी अफगानिस्तान में 1989 से 1990 तक भारत के राजदूत थे। वे बाद में ईरान में 1990 से 1992 तक तथा सऊदी अरब में 1995 से 2000 तक भारत के राजदूत रहे।

 


ईरान में हामिद अंसारी के कार्यकाल के दौरान वहीं पर कार्यरत रॉ के एक अधिकारी एन.के.सूद के जो खुलासे किए वह हैरान और परेशान करने वे थे। एन. के.सूद ने कहा कि हमीद अंसारी ईरान की ख़ुफ़िया एजेंसी को रॉ की गोपनीय मिशन की जानकारी देते थे और जब रॉ के लोगों को ईरान में पकड़ा गया तो हामिद अंसारी ने भारत की सरकार को गुमराह किया। रॉ कश्मीरी युवकों के ईरान में आतंकी प्रशिक्षण करने पर नजर रख रही थी और यह जानकारी भी हामिद अंसारी ने ईरान की ख़ुफ़िया एजेंसी को दे दी थी। अंसारी ने ईरान में रॉ के ठिकानों को बंद करने तक की सिफारिशें भी की थीं2017 में रॉ की कई अधिकारियों का एक समूह प्रधानमंत्री मोदी से मिला और उन्होंने दावा किया की हमीद अंसारी ईरान में रहकर रॉ के कई ऑपरेशनों को नुकसान पहुंचाया और कई गोपनीय जानकारी ईरान की ख़ुफ़िया एजेंसी को देकर भारत के हितों को प्रभावित कियासूद ने बताया कि जब अंसारी का ईरान से तबादला हुआ तो भारतीय दूतावास में खुशियां मनाई गईं


रॉ को सबसे ज्यादा नुकसान भारत के एक प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पहुंचाया थादरअसल पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे पहले पता रॉ ने ही लगाया था। रॉ एजेंट ने कहूटा में नाई की दुकान के फ़र्श से पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों के बालों के सैंपल जमा किएउनको भारत लाकर जब उनका परीक्षण किया गया तो पता चला कि उसमें रेडिएशन के कुछ अंश मौजूद हैं,जिससे पाक की परमाणु तैयारी का पता चलारॉ के एक एजेंट को 1977 में पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र का डिज़ाइन प्राप्त हो गया थालेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने न सिर्फ़ इसे दस हज़ार डॉलर में खरीदने की पेशकश ठुकरा दी,बल्कि ये बात पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल-हक़ को बता भी दीइस घटना का जिक्र मेजर जनरल वी.के.सिंह ने अपनी किताब,सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग में किया है. वी.के.सिंह रॉ में कई सालों तक सेवाएं दी थी


मोरारजी देसाई की यह गलती भारत को बहुत भारी पड़ी और यहीं से जिया-उल-हक ने भारत को तोड़ने के लिए भाषावाद,क्षेत्रीयतावाद और साम्प्रदायिकता पर आधारित ऑपरेशन शुरू किये। यह पंजाब,जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर में हिंसक तरीके से भारत के सामने आये और यह समस्या बदस्तूर जारी है। यह भी माना जाता है कि मोरारजी देसाई ने यदि रॉ को लेकर जिया-उल-हक से बातचीत नहीं की होती तो बलूचिस्तान भी पाकिस्तान से अलग हो गया होता।


रॉ के एक पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमन ने अपनी किताब,द काऊ बॉयज़ ऑफ़ रॉ में लिखा है कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत के ऊपर हमला करने जा रहा है। पाकिस्तान की सेना और लोगों में रॉ ने बड़ी पैठ बना रखी थी। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान को यह कहते हुए रॉ प्रमुख से मिलवाया था कि आप चाहे तो हमारे  काव साहब से आपके देश के बारे में कोई भी जानकारी ले सकते है,वे बांग्लादेश के बारे में जितना जानते है,शायद हम भी नहीं जानते। 1982 में जब फ़्रांस की ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख काउंट एलेक्ज़ांद्रे द मरेंचे से पूछा गया कि 70 के दशक के पाँच सर्वश्रेष्ठ ख़ुफ़िया प्रमुखों के नाम बताएं,तो उन्होंने रॉ प्रमुख रामेश्वरनाथ काव को इस सूची में शामिल किया था।1975 में चीन और वैश्विक के दबाव के बाद भी सिक्किम का भारत में विलय भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी और इसमें रॉ की अहम  भूमिका थी।


रॉ का प्रभाव पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र में भी रहा है। नबी एहमद शाकिर कराची युनिवर्सिटी में पढ़े,बाद में वे पाकिस्तानी सेना में शामिल हुए और बड़े ओहदे तक भी  पहुंचे। पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी की बेटी से उनका विवाह हुआ और बच्चें भी हुए। करीब 25 साल पाकिस्तान में बिताने वाले इस शख्स के बारे में बहुत बाद में पता चला की वे राजस्थान के रविंद्र कौशिक थे जो रॉ के एजेंट के रूप में पाकिस्तान गए थे। बाद में उन्हें पाकिस्तान की जेल में डाल दिया गया जहां उनकी साल 2001 में मौत हो गई।


मोरारजी देसाई की गलतियों के बाद रॉ को नये सिरे से काम स्थापित करना पड़ा। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक कर यह सुनिश्चित किया की पाकिस्तान की आतंकी नीतियों का  जवाब उसके अंदाज में ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत के नये सीक्रेट प्लान सीआईटी एक्स का आगाज हुआ और उसने पड़ोसी देशों को ध्यान में रखकर अपनी आक्रामक रणनीति को अंजाम देना शुरू कर दिया।


2010 में पाकिस्तान में स्थित भारतीय उच्चायोग में पदस्थ एक महिला अधिकारी माधुरी गुप्ता को गिरफ्तार किया गया था। उन पर पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय गतिविधियों से जुड़ी बहुत सी संवेदनशील  जानकारियां पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी के लोगों को देने के आरोप भी साबित हुए


पाकिस्तान के एक पत्रकार नुसरत मिर्जा ने हाल ही में एक साक्षात्कार में यह दावा किया कि वह 2005 से 2011 के बीच कई बार भारत आए और सूचनाएं इकट्ठी कर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई तक पहुंचाईइस विवाद में हामिद अंसारी का नाम एक बार फिर उभर कर आया है। हालांकि हामिद अंसारी इन आरोपों से इंकार किया है लेकिन उनके सेवाकाल में  किए गए कई कार्य न केवल जांच एजेंसियों के निशाने पर है पर उनकी पुष्टि भी हुई हैहामिद अंसारी देश के बड़े शिक्षाविदों में शुमार किए जाते है,वे संयुक्तराष्ट्र की स्थायी सभा में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर चूके हैवे जम्मू कश्मीर में शांति स्थापना की उच्च समितियों में रहे हैभारत के सम्मानित पद्मश्री सम्मान के साथ ही उन्हें दो बार भारत के उप राष्ट्रपति रहने का गौरव मिला हैदेश के द्वारा सम्मानित तथा निर्णायक और प्रभावी पदों पर बैठे लोग ही यदि देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने लगे तो इससे बढ़कर कोई अपराध नहीं हो सकता

 

 

 

 

 

brahmadeep alune

संयुक्त राष्ट्रसंघ का संकट UN FAILED

जनसत्ता                                                                                                               विश्व राजनीत...