कतर और भारत का इस्लाम katar bharat islam nupur shrama rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा


                           

                                                                     

खाड़ी के अधिकांश देशों में जन विरोध,प्रदर्शन और हड़ताल प्रतिबंधित हैइस जुमे की नमाज़ के बाद कुवैत में जिन 40-50 प्रवासियों ने भारत में पैगम्बर मोहम्मद पर कथित विवादित टिप्पणी को लेकर प्रदर्शन और नारेबाज़ी की थी उन्हें देश से निकाला जा रहा है और इस बात की पूरी संभावना है कि वे अब भविष्य में भी उनका इस देश में आना पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा ये वहीं देश है जो भारत को इस्लामिक मूल्य सीखा रहे है, यहां के मुसलमानों को भड़काने के लिए लगातार बयानबाज़ी कर रहे है, इससे हिंसक प्रदर्शन भी हुए है और भारत में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी हद तक प्रभावित हुई है दरअसल पैगम्बर मोहम्मद पर नुपुर शर्मा की एक टीवी डिबेट के दौरान एक कथित टिप्पणी के बाद इस्लामिक देशों की जो प्रतिक्रिया सामने आई है,वह हैरान करने वाली है धार्मिक आज़ादी को लेकर भारत पर कभी सवाल खड़े नहीं किये जा सकते और किसी एक शख्स के विचार किसी भी सूरत में राष्ट्रीय विचारों या नीतियों को प्रतिबिम्बित नहीं कर सकते 


लोकतांत्रिक भारत में इस्लाम के मूल्यों और परम्पराओं की तुलना राजशाही से अभिशिप्त खाड़ी के देशों से तो की ही नहीं जा सकती। पैगम्बर मोहम्मद साहब की शिक्षाओं को सामने रखकर भारत के बहिष्कार की अपील करने वाले इस्लामिक देश कतर के बारे में जानना बेहद जरूरी है  इस्लामिक दुनिया में शिया सुन्नी विवाद को हवा देकर आतंक फ़ैलाने के लिए खाड़ी के देशों में कतर बेहद बदनाम रहा है पैगम्बर मोहम्मद की समावेशी विचारधारा के अनुरूप कतर को लोकतांत्रिक देश होना चाहिए लेकिन कतर अल-थानी खानदान की विरासत समझा जाता है,जहां इस खानदान का कतर पर पूरी तरह से कब्ज़ा है मोहम्मद साहब की सादगी पूर्ण जीवन से इतर कतर की मूल आबादी बेहद आधुनिक जीवन जीती है लंदन में अल-थानी खानदान के पास महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से ज्यादा दौलत है 


दुनिया में दहशत फ़ैलाने वाले हमास,मुस्लिम ब्रदरहुड,अलकायदा,इस्लामिक स्टेट से लेकर कई आतंकी समूहों को मदद देने के लिए कतर इतना बदनाम रहा है कि इस देश से सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,मिस्र और बहरीन जैसे देश अपने राजनयिक संबंध तोड़  चूके है कतर से संचालित अल-जजीरा चैनल इस्लामिक चरमपंथी हमलों को लाइव दिखाने को लेकर चर्चित रहा है ऐसा माना जाता है कि अमेरिका की शह पर संचालित इस चैनल ने इस्लाम की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है कतर की अपनी कोई सेना नहीं है और यहां पर अमेरिका के सैन्य अड्डे है अमेरिका इस्लामिक दुनिया को रक्तरंजित करने के लिए क़तर का खूब इस्तेमाल करता है। अफगानिस्तान को तालिबान के हवाले कर अमेरिका के वहां से लौट जाने के पीछे भी कतर की भूमिका अहम मानी जाती है। 


इस्लाम धर्म की मान्यताओं में मानवता की रक्षा और समानता का प्रमुख स्थान है।  ऐसे में कतर में काम करने वाले अन्य देशों से आने वाले मुस्लिम कामगारों के बारे में जानना भी बेहद जरूरी है इस साल कतर में फीफा फुटबाल विश्व कप का आयोजन किया जा रहा है  इसकी तैयारी कतर में लगभग डेढ़ दशक से की जा रही है कतर के आधुनिकीकरण के लिए काम करने वाले अधिकांश मजदूर भारत से है और इसमें सबसे ज्यादा मुस्लिम ही है मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का आरोप है कि कतर में निर्माण कार्यों में लगे मज़दूरों को अक्सर मज़दूरी न दिए जाने,ख़तरनाक स्थितियों में काम कराए जाने और घटिया आवास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है इसे जानवरों जैसी जिंदगी कहा जाता है गुलामों जैसी बदतर स्थिति में रहने और काम करने के कारण हजारों मज़दूरों की मौत हो रही है मजदूरों को क़तर की गर्मी की बेहद तपते दिनों मे भी सप्ताह में एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती 2014 में एक रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार उस दौरान महज 1000 दिनों में 500 भारतीय मजदूरों की मौत हो गई थी,जिसमें अधिकांश मुसलमान थे 


भारत में रहने वाले  मुसलमानों से तुलना की जाएं तो क़तर में रहने वाले मुसलमान महज उसका 1 फीसदी भी नहीं हैगैस संसाधनों से समृद्द इस देश में इस्लामिक मूल्यों को बेहतर तरीके से सहजा जा सकता हैक़तर दुनिया का सबसे धनी देश है,इसकी औसत प्रति व्यक्ति आय एक लाख डॉलर है जो दुनिया में सर्वाधिक है इस्लाम में सामूहिक परिवारों की मान्यता से अलग कतर के माता पिता अपने बच्चों का ख्याल रखने के लिए भी नौकर का  इंतजाम करते है क़तर में अब क़रीब 40 फ़ीसदी शादियों का अंत तलाक में हो जाता है,काम न करने और आधुनिक जीवन शैली अपनाने के कारण यहां के दो तिहाई वयस्क और बच्चे मोटापे की चपेट में हैमोहम्मद साहब की मान्यताओं के अनुसार बिना मेहनत के रोटी खाना हराम हैवहीं क़तर के लोगों को मुफ़्त शिक्षा,मुफ़्त स्वास्थ्य,नौकरी की गारंटी,घर बनाने के लिए अनुदान और यहां तक कि पानी और बिजली भी मुफ़्त हैक़तर के परिवार बिखर रहे हैंयहां के बच्चों की परवरिश फिलीपींस,नेपाल और इंडोनेशिया आदि देशों से आने वाली आया कर रही हैं। इससे यहां की संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। कतर,सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में राजशाही निजाम है जिसके खिलाफ प्रदर्शन करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती और न ही किसी राजनीतिक दल का गठन किया जा सकता है


 

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक माने जाते है लेकिन इस्लामिक संस्कृति और मूल्यों को यहां बेहतर तरीके से सहेजा जाता है। प्रजातंत्र में राजनीतिक सौदेबाज़ी की ताकत को मुस्लिमों ने भी खूब आजमाया है राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर देश में मुस्लिम नेताओं की कमी नहीं है असम में बदरूद्दीन अजमल की असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट,उत्तरप्रदेश  में पीस पार्टी,केरल में मुस्लिम लीग और आंध्र प्रदेश में ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन जैसी पार्टियां आज़ादी के बाद से सक्रिय हैं कतर,सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात में कोई सामान्य मुस्लिम उच्च पद की कल्पना भी नहीं कर सकता वहीं भारत में सामान्य परिवारों से निकलने वाले मुस्लिम राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश जैसे कई संविधानिक पदों पर काम करके देश का गौरव बढ़ा चूके है

 


भारत में स्थित दारुल उलूम देवबंद को इस्लामिक शिक्षा का विश्व में बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। वह भारत में अब भी वैसे ही काम करता है जैसा सौ साल पहले करता था भारत की किसी भी सरकार ने उसे कभी बंद करने की बात नहीं की आज देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है भारत में सरकारों ने इस संस्था को फलने फूलने में बड़ी मदद की है दारुल उलूम देवबन्द में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा,भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है दुनिया की सबसे  बड़ी और भव्य जामा मस्ज़िद भारत में है भारत की सभी सरकारों ने इसके विकास और लोगों की सुख सुविधाओं का हमेशा ध्यान रखा है और यहां पर आने वाले नमाजियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाती है 

 


इस्लामिक मूल्यों और आदर्शों को लेकर भारत का लोकतांत्रिक समाज ज्यादा सजग है। राजशाही वाले देश क़तर,सऊदी अरब और अमीरात जैसे अमीर देश विकासशील और गरीब देशों में रहने वाले मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं भड़काकर अपनी धार्मिक और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं  की पूर्ति करते है। भला इन देशों में मुसलमानों को भी विरोध या प्रदर्शन की इजाजत क्यों नहीं दी जाती। 


 

भारत के विभिन्नताओं वाले समाज में किसी एक शख्स की वैचारिक असहमति का मतलब व्यापक और बहुसंख्यक समाज द्वारा इस्लामिक विरोध कभी नहीं हो सकता। जाहिर है भारत की छवि खराब करने वाली वैदेशिक ताकतों का सभी के द्वारा मिलजुल कर मुकाबला किया जाना चाहिए। 

 

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