एक #खालिस्तानी नेता की संसद में दस्तक khalistani neta simran sansad swdesh

 स्वदेश

           


    

                                                                   

पृथकतावाद और अतिवाद के समर्थक देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था का एक अहम हिस्सा बनने में सफल हो जाएं तो निश्चित ही यह राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकतेदरअसल पंजाब की संगरूर लोक सभा क्षेत्र से हुए आम चुनावों में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सिमरनजीत सिंह मान  की जीत से खालिस्तान की समस्या के फिर से उभरने की समस्या पुनः गहरा गई हैसिमरनजीत सिंह मान पंजाबी अस्मिता को खालिस्तान से जोड़कर सिख अतिवाद को बढ़ावा देते रहे हैमान की राजनीति का आधार ही खालिस्तान की बुनियाद पर टिका हुआ है और उन्होंने अपनी जीत पर इसका खुलकर इजहार करते हुए इस जीत  को भिंडरावाले की जीत बताया भिंडरावाले खालिस्तान समर्थक एक ऐसा चरमपंथी था जिसे ऑपरेशन ब्लू स्टार की कार्रवाई में सेना ने मार गिराया था सिमरन जीत सिंह मान भिंडरावाले को अपना हीरो मानते हैसंगरूर लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद जनता का शुक्रिया अदा करते हुए सिमरनजीत सिंह मान ने खालिस्तान का भी ज़िक्र कियाउन्होंने साफ कहा कि इस जीत का असर विश्व राजनीति पर पड़ेगा,लोगों का साहस ऊंचा है और वे चुप नहीं बैठेंगे। जाहिर है मान वैश्विक स्तर पर भारत विरोधी उन संस्थाओं को संकेत दे रहे थे जो पाकिस्तान,ब्रिटेन और कनाडा से खालिस्तान की मुहिम को लगातार हवा दे रही है। 


यह भी दिलचस्प है कि खालिस्तान की मांग को लेकर पंजाब का आम सिख सहमत नहीं हैखालिस्तानी चाहते हैं कि राजकाज और धार्मिक नेतृत्व ये दोनों काम गुरुद्वारे ही करें। जबकि आम सिख इससे इत्तेफाक नहीं रखते उनके लिए गुरुद्वारे श्रद्धा,भक्ति और आस्था का प्रतीक है तथा वे मानते है कि राजनीति के लिए धार्मिक स्थल का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इस साल 6 जून को ऑपरेशन ब्लू स्टार के 37 वें साल पूरे होने के मौके पर अकाल तख़्त साहिब में खालिस्तानियों ने हमेशा कि तरह प्रदर्शन किए,इस दौरान उन्होंने  खालिस्तान समर्थक बैनर थामकर खालिस्तान हमारा अधिकार जैसे नारे लगाएं। दरअसल भारत में तकरीबन तीन करोड़ आबादी सिखों की है और देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की उनकी त्याग और बलिदान की परंपरा का कोई मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। सिख मूलत: पंजाब में रहते है और पंजाब की सीमा पाकिस्तान से लगी हुई है। भारत से आमने सामने की लड़ाई में बुरी तरह मात खाने वाले पाकिस्तान ने भारत से लड़ने के लिए मनौवैज्ञानिक युद्द का सहारा लिया। इस दौरान पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक ने भारत के खिलाफ अलगाववाद को भड़काने की कोशिशें  के तहत् खालिस्तान का मुद्दा उभारा था जो बाद में हिंसक बन गया था।

 


पिछलें तीन दशकों से पंजाब शांत है लेकिन खालिस्तान को उभार देने की वैश्विक कोशिशों में कभी कमी नहीं आई अब सिमरनजीत सिंह मान के तेवर और अकाली दल की अतिवादी राजनीति का असर पंजाब की विविधता पर पड़ सकता है और इसके संकेत भी मिलने लगे हैखासकर पंजाब की सत्ता में इस साल आम आदमी पार्टी के आने के बाद वर्ग संघर्ष और खालिस्तान समर्थन की कई घटनाएं लगातार सामने आई है यहां पर सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त के तीखे तेवर भी समस्या को बढ़ाने वाले दिख रहे हैअकाल तख़्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह सिखों को लायसेंसी हथियार रखने,ख़ालिस्तान का समर्थन करने और सिखों को खुले आम हथियारों की ट्रेनिंग जैसे विवादास्पद बयान दे चूके है मान के सांसद बनने के बाद खालिस्तानी समर्थकों के हौसले बुलंद होंगे और यह भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौती को बढ़ा सकता है


खालिस्तान समर्थित आतंकवादी गुट बब्बर खालसा इंटर नेशनल यानि बीकेआई सिख अलगाव को बढ़ावा देने के लिए पूरी दुनिया में प्रभावशील है। इस आतंकी गुट का कनाडा पर गहरा प्रभाव है और वे इस देश में राजनीतिक तौर पर भी ताकतवर माने जाते है। यहीं नहीं अपने रसूख का इस्तेमाल कर बीकेआई खालिस्तान का  समर्थन देने वाली ताकतें को यहां से संचालित भी करती है। उत्तरी अमेरिकी देश कनाडा पृथकतावादी सिख होमलैंड खालिस्तान के समर्थकों के लिए महफूज ठिकाना रहा है। कनाडा में लिबरल पार्टी की सत्ता में देश का रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन को बनाया जा चुका है। उनके पिता खालिस्तान के कथित समर्थक वर्ल्ड सिख ऑर्गेनाइजेशन के सदस्य थे। कनाडा के सिख खालिस्तानी आतंकवादी गुट बब्बर खालसा इंटर नेशनल  को 1985 में एयर इंडिया की फ्लाइट 182 कनिष्क में विस्फोट सहित भारत में हुए कुछ  बड़े आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। कनिष्क विमान हमलें में 329 लोग मारे गये थे। इसके बाद इस संगठन ने पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या समेत कई राजनेताओं और निर्दोष लोगों को निशाना बनाया है। इसके समर्थक उत्तरी अमेरिका,यूरोप,दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक फैले है।


कनाडा में हर साल बैसाखी जैसे मौकों पर आयोजित समारोहों में सिख चरमपंथियों को शहीद का दर्जा देकर उन्हें याद किया जाता है। यहां पर कई आयोजनों में खालिस्तान के नारे लगते हैं। पाकिस्तानी प्रभाव से दिग्भ्रमित खालिस्तान के चरमपंथी दुनियाभर में सिख होमलैंड के पक्ष में प्रदर्शन करते रहे है। कनाडा में काम करने वाली पृथकतावादी ताकतें ऐसे प्रयास कर रही है कि वे कनाडा में ख़ालिस्तान समर्थन सुनिश्चित करने के लिए  स्वतंत्र पंजाब के पक्ष में एक जनमत संग्रह कराएं। अगस्त महीने में दुनिया भर में बसने वाला भारतीय समुदाय अपना स्वतंत्रता दिवस उत्साहपूर्ण तरीके से मनाता है वहीं खालिस्तानी समर्थक इस मौके पर भारत विरोध का झंडा बुलंद करते है। खालिस्तान समर्थको ने  इसके पहले 2020 के लिए खालिस्तान के पक्ष में जनमत संग्रह को लेकर एक रैली भी निकाली थी जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए थे। लंदन में करीब60  फीसदी विदेशी मूल के है और इन्हें पाकिस्तान गुमराह करता रहा है। 


पाकिस्तान खालिस्तान को जिन्दा रखने के लिए अपनी जमीन का बेजा इस्तेमाल करने से कभी परहेज नहीं करता। वह विदेशों में रहने वाले खालिस्तानी समर्थकों को भारत विरोध के लिए उकसाने की नीति पर चलता रहा है। लाहौर में सिख अतिवादी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का सरगना वधवा सिंह बब्बर लम्बे समय तक पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई  की सरपरस्ती में रहा था। इस दौरान उसने लश्कर तैयबा के साथ मिलकर सिख आतंकवाद को फिर से जिंदा करने की कोशिशें भी की। पाकिस्तान में सिख अतिवादियों को जेहादी भाई कहा जाता है और उन्हें तमाम सुख सुविधाओं के साथ पाक सेना के अधिकारियों,आईएसआई  और कुख्यात आतंकी संगठन के आकाओं से मिलने की खुली छुट भी मिली होती है। पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस सिख आतंकवादी संगठनों में फिर से जान डालने के लिए कनाडा,अमेरिका समेत दुनियाभर में बसे सिखों को भड़काने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती। आईएसआई खालिस्तानी अलगाववादी और कश्मीर के आतंकवादियों को एक जुट करने की योजना पर लगातार काम कर रही है। पाकिस्तान समर्थित एक पृथकतावादी सिख जगजीत सिंह चौहान  ने 1980 के दशक में अलग खालिस्तानी राष्ट्र की घोषणा कर दी थी जब पंजाब में चरमपंथ अपने शीर्ष पर थावे 1980 के दशक के मध्य में भारत से ब्रिटेन चले गए थे और बाद में चौहान ने लंदन से खालिस्तान राष्ट्र के करेंसी नोट जारी करके सनसनी फैला दी थी


पाकिस्तान ने कई गुरूद्वारे है जहां सिख हर साल जाते है। पाक सिखों को पाकिस्तान आने के लिए न केवल उच्च कोटि की सुरक्षा देता है बल्कि वहां खालिस्तान के समर्थन में पोस्टर भी लगाता रहा है। आईएसआई खालिस्तान के नाम पर सिख युवाओं को भडकाकर स्लीपर सेल बनाने को आमादा है। इसके लिए वह स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने के लिए की गई कार्रवाई और  सिख विरोधी दंगों के नाम पर विष वमन करती है। इन्टरनेट पर सिख आतंकवादियों की शहादत जैसा महिमामंडन और एनजीओ द्वारा पैसा भेजकर आईएसआई खालिस्तान के दानव को पुनः जीवित करने की कोशिशों में लगी रही है।


अब एक खालिस्तानी समर्थक नेता के सांसद बनने से खालिस्तान को लेकर केंद्र सरकार की चुनौतियां बढ़ सकती है। पंजाब की मौजूदा आप सरकार का खालिस्तानियों को लेकर रुकों और देखों का रुख अलगाववादी ताकतों को पुनः मजबूत कर रहा है।   किसान आंदोलन को कनाडा से भारी समर्थन मिलना और उसमें हुई हिंसक घटनाएं सामान्य नहीं थी,इसे भारत की सुरक्षा एजेंसियों से खतरें के तौर पर देखा था। पिछले कुछ समय में पंजाब में पाकिस्तान से ड्रोन,पैसे और विस्फोटक आए हैं,खालिस्तान समर्थकों की सामाजिक टकराव बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैअकाल तख्त से भडकाऊ बयानबाज़ी के बाद अब मान का सांसद चुना जाना खालिस्तान की समस्या के पुनःपैर पसारने की ओर गंभीर संकेत है

 

लद्दाख पर अमेरिकी चिंता laddakh china amerika janstta

 

जनसत्ता


                            


 

दुर्गम हिमालयीन क्षेत्र में स्पष्ट सीमा रेखा का प्रश्न उठाकर वास्तविक नियंत्रण रेखा के अस्तित्व को ख़ारिज करने की चीनी रणनीति कई दशक पुरानी है एलएसी पर यथास्थिति बनाएं रखने को लेकर भारत के कूटनीतिक नजरिए से अलग चीन की सैन्य रणनीति रही है 1962 के बाद भारत और चीन में युद्ध भले ही नहीं हुआ हो लेकिन चीन की सैन्य महत्वकांक्षाओं में कोई कमी नहीं आईचीन ने उच्च स्तर पर भारत से राजनयिक और आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करने में दिलचस्पी दिखाई वहीं हिमालयी की दुर्गम वादियों में सड़के,रेल,हवाई पट्टियों का निर्माण,सैन्य बंकर और आधारभूत ढांचे को मजबूत कर भारत की सामरिक चुनौतियों को बढ़ा दिया हाल ही में अमेरिकी सेना के पैसिफिक कमांडिंग जनरल चार्ल्स ए फ़्लिन ने लद्दाख में चीनी गतिविधि पर जो चिंता जाहिर की है,उसे  ख़ारिज इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि पूर्वी लद्दाख में चीन का सैन्य व्यवहार बेहद असामान्य रहा है पिछलें दो तीन वर्षों में लद्दाख में भारत के रक्षामंत्री की मौजूदगी तथा सेना अध्यक्ष का दुर्गम सैन्य स्थलों पर निरीक्षण करना महज संयोग नहीं है चीन की इस क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को भारत ने अब राजनयिक और सैन्य स्तर पर स्वीकार भी किया है 


 

हिमालयीन क्षेत्र में भारत का केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है,जहां से भारत के परम्परागत शत्रु चीन और पाकिस्तान पर नजर रखी जाती है। लद्दाख उत्तर में काराकोरम पर्वत और दक्षिण में हिमालय पर्वत के बीच में है। भारत लद्दाख की उस जमीन को वापस प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्धता जताता रहा है जो इस समय चीन और पाकिस्तान के कब्जें में है लद्दाख के अन्तर्गत पाक अधिकृत गिलगित बलतिस्तान,चीन अधिकृत अक्साई चीन और शक्सगम घाटी का क्षेत्र शामिल है 1963 में पाकिस्तान  ने एक समझौते के तहत् 5180 वर्ग किलोमीटर का शक्सगम घाटी क्षेत्र चीन को उपहार में दिया  था यह लद्दाख का ही हिस्सा है 


 

सामरिक दृष्टि से अहम होने के कारण पूर्वी लद्दाख से सटी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर चीन अपनी सैन्य गतिविधियों को अप्रत्याशित विस्तार कर भारत और चीन के बीच हुए शांति बनाएं रखने के समझौतों की लगातार अनदेखी कर रहा है1962 के भारत चीन के बाद लंबे समय तक शांत रहा यह क्षेत्र अब सैन्यीकरण की ओर तेजी से बढ़ा हैचीन वास्तविक नियन्त्रण रेखा या एलएसी को विवादित मानता रहा है और उसने पूर्वी लद्दाख और अन्य इलाकों में बड़ी संख्या में सैनिकों और हथियारों के साथ मोर्चाबंदी की है  इसी के कारण गलवान घाटी,पैंगोंग त्सो और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे इलाकों में दोनों देशों की  सेनाएं कई बार आमने-सामने आ गईं है और युद्द जैसे हालात अभी भी बने हुए है 


 

भारत ने भी इन इलाकों युद्द जैसी तैयारियों के लिए सेना की संख्या में अच्छा खासा इजाफा किया है जिससे सेना को अग्रिम मोर्चों पर तेजी से मदद मिल सके। इसके लिए पुल,हवाई पट्टियों तथा रोड़ का निर्माण करने में तेजी दिखाई है। भारत का पूर्वी लद्दाख में सैन्यीकरण की जरूरत को चीन की असामान्य गतिविधियों ने पुख्ता किया है। चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की  पश्चिमी कमांड का मुख्यालय तिब्बत में स्थित है। चीनी सेना की यही कमांड भारत के लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैले वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर तैनात हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस कमांड के उच्च सैन्य अधिकारी को बदलने में चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग ने अभूतपूर्व तेजी दिखाई है पिछले साल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बिना किसी पूर्व घोषणा के तिब्बत की यात्रा करके सबको हैरान कर दिया था इस यात्रा के दौरान वे न्यिंग्ची रेलवे स्टेशन गए थे  ये इलाका सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है,क्योंकि यहां से कुछ दूर पर ही अरुणाचल प्रदेश की सीमा लगती है  जिनपिंग चीन के पहले बड़े नेता हैं जिन्होंने कई दशकों के दौरान भारत और चीन की सीमा के पास बसे इस शहर का दौरा किया था 


चीन इस समय प्राथमिकता से अपने पूर्वी और पश्चिमी इलाकों को आपस में बेहतर तरीक़े से जोड़ने के लिए वृहद योजनाएं बना रहा है चीन नेपाल से सम्बन्ध और मजबूत करने के लिए  लहासा न्यिंग्ची-रेलमार्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है लहासा से न्यिंग्ची रेलमार्ग सिचुवान-तिब्बत रेल खंड का सामरिक रूप से  अतिमहत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है  भारत की सीमा से लगती हुई ये रेल योजना एक हजार सात सौ चालीस किलोमीटर की है जाहिर है भारत से लगी सीमा के इलाकों में चीन जिस तरह आधारभूत सुविधाएं विकसित कर रहा है,वह सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण है 


 

पिछले साल जून में भारत के विदेशमंत्री एस.जयशंकर ने क़तर इकनॉमिक फोरम में यह साफ कहा था कि चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव में दो सबसे अहम मुद्दे हैं पहला सीमा पर सेना की लगातार आमने-सामने तैनाती और दूसरा चीन बड़ी संख्या में सेना की तैनाती नहीं करने के लिखित वादे पर कायम रहेगा या नहीं  इससे साफ होता है कि भारत और चीन के बीच अविश्वास की खाई बहुत बढ़ गई है। दरअसल भारत का चीन की सैन्य गतिविधियों को लेकर यह अविश्वास उस यथास्थिति को बदलने की चीन की कोशिशों से बढ़ा है जिसने दोनों देशों के बीच तनाव को लगातार बढ़ाया है


 

चीन ने पश्चिमी थियेटर कमांड में आधारभूत ढांचे को बहुत मजबूत किया है जो भारत को सतर्क करने वाले और समस्या बढ़ाने वाले है इन क्षेत्रों में शांति की कोशिशें भी बेहतर परिणाम देती हुई नहीं दिख रही है। फरवरी 2021 में दोनों देशों ने पैंगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारे पर चरणबद्ध और समन्वित तरीके से तनाव को कम करने की घोषणा की थी लेकिन ऐसा जमीन पर होता हुआ बिल्कुल भी नहीं दिखाई देता गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स,डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाकों को लेकर चल रहा विवाद जारी है और इसका समाधान करने के लिए कई स्तर की बातचीत बेनतीजा रही है चीन पूर्वी लद्दाख से सटे इलाकों में में दूसरा पुल बना रहा है,इस पुल से चीन के सैनिकों को लद्दाख में जल्दी पहुँचने में मदद मिलेगीभारत से लगी सीमा पर चीन रोड के अलावा रहने के लिए घर भी बना रहा है 

 


अमेरिकी साइबर सिक्योरिटी फर्म की उस रिपोर्ट को भी भारत ने स्वीकार किया है जिसमें चीन के हैकर्स ने सितंबर 2021 में लद्दाख के पास बिजली वितरण केंद्रों पर कम से कम दो बार हमले की कोशिश की थीये सेंटर्स लद्दाख में भारत-चीन की सीमा के पास हैंइन सेंटर्स पर ग्रिड कंट्रोल और बिजली वितरण का काम होता हैचीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के शिन्जियांग मिलिट्री कमान ने टाइप 15 श्रेणी के लाइट टैंक,हाउविटज़र,दूर तक मारक क्षमता रखने वाले रॉकेट लाँचर और एयर डिफेंस सिस्टम को,भारत से लगी सीमा पर तैनात करना किया है और इससे चीन के आक्रामक इरादों का पता चलता है


 

चीन अमेरिका के बीच व्यापारिक और सामरिक स्तर पर वैश्विक प्रतिद्वंदिता चल रही है,उसमें भारत से मजबूत सम्बन्धों को लेकर अमेरिका अपनी राय जाहिर करता रहा है इन सबके बीच अमेरिका के इस दावें में  दम नजर आता है कि भारत से चीन वार्ता भले ही करें पर उसका वास्तविक नियंत्रण सीमा पर जिस तरह का व्यवहार रहा है वो चिंताजनक है और इससे सबको चिंतित होना चाहिए

 


भारत के  थलसेना अध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने साफ कहा है कि भारत और चीन कजे बीच सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अप्रैल-मई 2020 से चली आ रही सीमाओं की स्थितियों का समाधान करना और यहां अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति को बहाल करना है गौरतलब है कि 1 मई 2020 को दोनों देशों के सौनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के पैगोन्ग त्सो झील के नॉर्थ बैंक में झड़प हुई थीइस झड़प में दोनों ही पक्षों के दर्जनों सैनिक घायल हो गए थेइसके बाद 15 जून 2020 को गलवान घाटी में एक बार फिर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुईइसमें दोनों तरफ के कई सैनिकों की मौत हुई थी पैंगोंग झील सामरिक,ऐतिहासिक और राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से भारत के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती है1962 तक भारतीय सेना पैंगोंग झील में फिंगर 8 तक गश्त किया करती थीभारत चीन युद्द के बाद सेना की गश्त इस इलाके में अनियमित हो गई और यहीं से सुरक्षा का बड़ा संकट खड़ा हो गयाइस समय भारत की सेना फिंगर 4 तक गश्त के लिए जाती है यहां चीन की सेना का भारी दबाव  बना हुआ है पैंगोंग से सटी पर्वतमालाओं के बीच एक फिंगर से दूसरे की दूरी सामान्यतया 2 से 3 किलोमीटर होती है,हालांकि यह इससे कम या ज्यादा भी हो सकती हैरणनीतिक तौर पर भी इस झील का काफ़ी महत्व है,क्योंकि ये झील चुशूल घाटी के रास्ते में आती हैचीन इस रास्ते का इस्तेमाल पर हमले के लिए कर सकता है1962 के युद्ध के दौरान यही इसी जगह से चीन ने भारत पर आक्रमण की शुरुआत की थीगालवन घाटी लद्दाख़ और अक्साई चीन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा अक्साई चीन को भारत से अलग करती है ये घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख़ तक फैली हैभारत चीन के साथ तकरीबन साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सीमा रेखा साझा करता है,चीन इस रेखा को तकरीबन  दो हजार किलोमीटर की बताता है और भारत के कई इलाकों पर अवैधानिक दावा जताता रहता है।

 


बदलती वैश्विक परिस्थितियों में चीन का सीमा पर व्यवहार बेहद आक्रामक रहा हो गया है। भारत पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा पर सैन्य गतिविधियों और घुसपैठ का सामना कई दशकों से करता रहा है और अब यह स्थिति चीन से लगने वाली वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर भी बन गई है। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत का रूस जैसे देश से अलग होकर अमेरिका के साथ पूर्ण सामरिक  साझेदार बन जाना आसान तो नहीं है लेकिन भारत की चीन से मिलने वाली सुरक्षा चुनौतियों में अमेरिका की उपयोगिता को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। चीन की सैन्य और साम्राज्यवादी रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं हिन्द प्रशांत क्षेत्र में वैश्विक सुरक्षा संकट बढ़ा रही है,ऐसे में भारत के यथार्थवादी हित अमेरिका के साथ ज्यादा सुरक्षित दिखाई पड़ते है।

 

 

 

कतर और भारत का इस्लाम katar bharat islam nupur shrama rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा


                           

                                                                     

खाड़ी के अधिकांश देशों में जन विरोध,प्रदर्शन और हड़ताल प्रतिबंधित हैइस जुमे की नमाज़ के बाद कुवैत में जिन 40-50 प्रवासियों ने भारत में पैगम्बर मोहम्मद पर कथित विवादित टिप्पणी को लेकर प्रदर्शन और नारेबाज़ी की थी उन्हें देश से निकाला जा रहा है और इस बात की पूरी संभावना है कि वे अब भविष्य में भी उनका इस देश में आना पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा ये वहीं देश है जो भारत को इस्लामिक मूल्य सीखा रहे है, यहां के मुसलमानों को भड़काने के लिए लगातार बयानबाज़ी कर रहे है, इससे हिंसक प्रदर्शन भी हुए है और भारत में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी हद तक प्रभावित हुई है दरअसल पैगम्बर मोहम्मद पर नुपुर शर्मा की एक टीवी डिबेट के दौरान एक कथित टिप्पणी के बाद इस्लामिक देशों की जो प्रतिक्रिया सामने आई है,वह हैरान करने वाली है धार्मिक आज़ादी को लेकर भारत पर कभी सवाल खड़े नहीं किये जा सकते और किसी एक शख्स के विचार किसी भी सूरत में राष्ट्रीय विचारों या नीतियों को प्रतिबिम्बित नहीं कर सकते 


लोकतांत्रिक भारत में इस्लाम के मूल्यों और परम्पराओं की तुलना राजशाही से अभिशिप्त खाड़ी के देशों से तो की ही नहीं जा सकती। पैगम्बर मोहम्मद साहब की शिक्षाओं को सामने रखकर भारत के बहिष्कार की अपील करने वाले इस्लामिक देश कतर के बारे में जानना बेहद जरूरी है  इस्लामिक दुनिया में शिया सुन्नी विवाद को हवा देकर आतंक फ़ैलाने के लिए खाड़ी के देशों में कतर बेहद बदनाम रहा है पैगम्बर मोहम्मद की समावेशी विचारधारा के अनुरूप कतर को लोकतांत्रिक देश होना चाहिए लेकिन कतर अल-थानी खानदान की विरासत समझा जाता है,जहां इस खानदान का कतर पर पूरी तरह से कब्ज़ा है मोहम्मद साहब की सादगी पूर्ण जीवन से इतर कतर की मूल आबादी बेहद आधुनिक जीवन जीती है लंदन में अल-थानी खानदान के पास महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से ज्यादा दौलत है 


दुनिया में दहशत फ़ैलाने वाले हमास,मुस्लिम ब्रदरहुड,अलकायदा,इस्लामिक स्टेट से लेकर कई आतंकी समूहों को मदद देने के लिए कतर इतना बदनाम रहा है कि इस देश से सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,मिस्र और बहरीन जैसे देश अपने राजनयिक संबंध तोड़  चूके है कतर से संचालित अल-जजीरा चैनल इस्लामिक चरमपंथी हमलों को लाइव दिखाने को लेकर चर्चित रहा है ऐसा माना जाता है कि अमेरिका की शह पर संचालित इस चैनल ने इस्लाम की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है कतर की अपनी कोई सेना नहीं है और यहां पर अमेरिका के सैन्य अड्डे है अमेरिका इस्लामिक दुनिया को रक्तरंजित करने के लिए क़तर का खूब इस्तेमाल करता है। अफगानिस्तान को तालिबान के हवाले कर अमेरिका के वहां से लौट जाने के पीछे भी कतर की भूमिका अहम मानी जाती है। 


इस्लाम धर्म की मान्यताओं में मानवता की रक्षा और समानता का प्रमुख स्थान है।  ऐसे में कतर में काम करने वाले अन्य देशों से आने वाले मुस्लिम कामगारों के बारे में जानना भी बेहद जरूरी है इस साल कतर में फीफा फुटबाल विश्व कप का आयोजन किया जा रहा है  इसकी तैयारी कतर में लगभग डेढ़ दशक से की जा रही है कतर के आधुनिकीकरण के लिए काम करने वाले अधिकांश मजदूर भारत से है और इसमें सबसे ज्यादा मुस्लिम ही है मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का आरोप है कि कतर में निर्माण कार्यों में लगे मज़दूरों को अक्सर मज़दूरी न दिए जाने,ख़तरनाक स्थितियों में काम कराए जाने और घटिया आवास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है इसे जानवरों जैसी जिंदगी कहा जाता है गुलामों जैसी बदतर स्थिति में रहने और काम करने के कारण हजारों मज़दूरों की मौत हो रही है मजदूरों को क़तर की गर्मी की बेहद तपते दिनों मे भी सप्ताह में एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती 2014 में एक रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार उस दौरान महज 1000 दिनों में 500 भारतीय मजदूरों की मौत हो गई थी,जिसमें अधिकांश मुसलमान थे 


भारत में रहने वाले  मुसलमानों से तुलना की जाएं तो क़तर में रहने वाले मुसलमान महज उसका 1 फीसदी भी नहीं हैगैस संसाधनों से समृद्द इस देश में इस्लामिक मूल्यों को बेहतर तरीके से सहजा जा सकता हैक़तर दुनिया का सबसे धनी देश है,इसकी औसत प्रति व्यक्ति आय एक लाख डॉलर है जो दुनिया में सर्वाधिक है इस्लाम में सामूहिक परिवारों की मान्यता से अलग कतर के माता पिता अपने बच्चों का ख्याल रखने के लिए भी नौकर का  इंतजाम करते है क़तर में अब क़रीब 40 फ़ीसदी शादियों का अंत तलाक में हो जाता है,काम न करने और आधुनिक जीवन शैली अपनाने के कारण यहां के दो तिहाई वयस्क और बच्चे मोटापे की चपेट में हैमोहम्मद साहब की मान्यताओं के अनुसार बिना मेहनत के रोटी खाना हराम हैवहीं क़तर के लोगों को मुफ़्त शिक्षा,मुफ़्त स्वास्थ्य,नौकरी की गारंटी,घर बनाने के लिए अनुदान और यहां तक कि पानी और बिजली भी मुफ़्त हैक़तर के परिवार बिखर रहे हैंयहां के बच्चों की परवरिश फिलीपींस,नेपाल और इंडोनेशिया आदि देशों से आने वाली आया कर रही हैं। इससे यहां की संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। कतर,सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में राजशाही निजाम है जिसके खिलाफ प्रदर्शन करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती और न ही किसी राजनीतिक दल का गठन किया जा सकता है


 

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक माने जाते है लेकिन इस्लामिक संस्कृति और मूल्यों को यहां बेहतर तरीके से सहेजा जाता है। प्रजातंत्र में राजनीतिक सौदेबाज़ी की ताकत को मुस्लिमों ने भी खूब आजमाया है राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर देश में मुस्लिम नेताओं की कमी नहीं है असम में बदरूद्दीन अजमल की असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट,उत्तरप्रदेश  में पीस पार्टी,केरल में मुस्लिम लीग और आंध्र प्रदेश में ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन जैसी पार्टियां आज़ादी के बाद से सक्रिय हैं कतर,सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात में कोई सामान्य मुस्लिम उच्च पद की कल्पना भी नहीं कर सकता वहीं भारत में सामान्य परिवारों से निकलने वाले मुस्लिम राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश जैसे कई संविधानिक पदों पर काम करके देश का गौरव बढ़ा चूके है

 


भारत में स्थित दारुल उलूम देवबंद को इस्लामिक शिक्षा का विश्व में बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। वह भारत में अब भी वैसे ही काम करता है जैसा सौ साल पहले करता था भारत की किसी भी सरकार ने उसे कभी बंद करने की बात नहीं की आज देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है भारत में सरकारों ने इस संस्था को फलने फूलने में बड़ी मदद की है दारुल उलूम देवबन्द में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा,भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है दुनिया की सबसे  बड़ी और भव्य जामा मस्ज़िद भारत में है भारत की सभी सरकारों ने इसके विकास और लोगों की सुख सुविधाओं का हमेशा ध्यान रखा है और यहां पर आने वाले नमाजियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाती है 

 


इस्लामिक मूल्यों और आदर्शों को लेकर भारत का लोकतांत्रिक समाज ज्यादा सजग है। राजशाही वाले देश क़तर,सऊदी अरब और अमीरात जैसे अमीर देश विकासशील और गरीब देशों में रहने वाले मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं भड़काकर अपनी धार्मिक और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं  की पूर्ति करते है। भला इन देशों में मुसलमानों को भी विरोध या प्रदर्शन की इजाजत क्यों नहीं दी जाती। 


 

भारत के विभिन्नताओं वाले समाज में किसी एक शख्स की वैचारिक असहमति का मतलब व्यापक और बहुसंख्यक समाज द्वारा इस्लामिक विरोध कभी नहीं हो सकता। जाहिर है भारत की छवि खराब करने वाली वैदेशिक ताकतों का सभी के द्वारा मिलजुल कर मुकाबला किया जाना चाहिए। 

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...