म्यांमार की अस्थिरता पूर्वोत्तर के लिए चुनौतीपूर्ण myanmar bharat dainik jagran rashtriya

 

दैनिक जागरण        


                                                          

म्यांमार में सेना ने सत्ता संभाली है,तब से भारत का पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम म्यांमार से भाग कर आने वाले शरणार्थियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है। म्यांमार और भारत की सीमा की भौगोलिक स्थिति  बेहद जटिल है। कई जनजातीय समूह भारत और म्यांमार दोनों देशों में रहते है और उन्हें एक दूसरे के कबीलों में जाने से रोकना कठिन होता है। सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से भारत के म्यांमार से बेहतर संबंध जरूरी है और यही कारण है कि म्यांमार के सैन्य शासन की आलोचना से भारत परहेज करता रहा है।


 

इन सबके बीच म्यांमार की स्थिति बद से बदतर हो रही है और लोगों का गुस्सा सेना पर बढ़ता जा रहा है,यह गृहयुद्द के संकेत है। दरअसल मानव अधिकार या न्याय के बुनियादी सिद्धांतों से म्यांमार के सैन्य शासन का कोई सरोकार नहीं हैम्यांमार की सेना को दायित्व-शून्य सेना कहा जाता है जिसके सैन्य अधिकारी अभिजात्यवादी होकर देश के प्राकृतिक,जैव और खनिज संसाधनों की लूट खसोट में लिप्त है तथा देश की अर्थव्यवस्था उन्हीं पर निर्भर हैसेना के जनरलों का देश के प्राकृतिक और खनिज संसाधनों पर नियन्त्रण हैचीन की नजर म्यांमार के गैस और कोयले के प्राकृतिक स्रोत है और इनका संचालन सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर किया जाता है सेना बैंकिंग से लेकर बीयर और पर्यटन तक हर चीज़ में निवेश का प्रबंधन करती हैअर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रहने का मतलब है कि सेना का विरोध आसान नहीं होता म्यांमार में सेना के प्रति लोगों का गहरा सम्मान होता था लेकिन पिछले साल आंग सान सू ची को जेल में डालकर लोकतांत्रिक सरकार की बर्खास्तगी और सैन्य शासन की स्थापना से लोग बहुत नाराज हैइसका प्रभाव सेना समर्थित कई जातीय समूहों पर भी पड़ा है


 

म्यांमार की अतिराष्ट्रवादी सेना खुद को अभिजात्य वर्ग की तरह पेश करती है,उसे युद्द और बर्बरता पसंद है ये सेना ख़ुद को श्रेष्ठ समझती है और इसकी जवबादेही ख़ुद के प्रति हैदुनिया उनके बारे में क्या सोचती है,सेना को इसकी कोई परवाह नहीं हैम्यांमार में 130 से ज़्यादा जातीय समूह हैंइनमें बमार्स बौद्ध बहुसंख्यक हैं देश के अभिजात्यों में बमार्स का ही दबदबा हैजातीय अल्पसंख्यकों में रोहिंग्या मुसलमान सेना की बर्बरता के शिकार लंबे समय से रहे हैंअब सैकड़ों प्रदर्शनकारी जिनमें बमार्स बौद्ध भी शामिल हैं,उन्हें अपनी ही सेना मार रही है। पहले बमार्स रोहिंग्या विरोधी और सेना समर्थक समझे जाते थे लेकिन अब सेना विरोध करने वालों को ग़द्दार के तौर पर देख रही है। इस प्रकार सेना का संघर्ष अब अपने जैसे अभिजात्यवादी जातीय समूहों से भी हो रहा है।  


 

म्यांमार में सरकारी सेना के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले लोगों को सामूहिक तौर पर पीपल्स डिफेंस फोर्स  या कहा जा रहा है,जो सशस्त्र नागरिक समूह का एक नेटवर्क हैजिसमें मुख्य तौर पर युवा शामिल हैंपीपल्स डिफ़ेंस फ़ोर्स में किसान,महिलाएं,डॉक्टर्स,नर्से और मजदूर शामिल हैये पहले शांतिपूर्ण आंदोलनों से सैन्य सरकार का विरोध कर रहे थे लेकिन सैन्य प्रशासन ने इन आंदोलनों को सख्ती से कुचला जिसके बाद लोगों ने हथियार उठा लिए है म्यांमार के लोगों को लगता है कि अंतराष्ट्रीय समुदाय उनके देश को लेकर निष्क्रिय रहा है,ऐसे में वे सेना को खत्म कर ही अपने अधिकार प्राप्त कर सकते हैयह सशस्त्र विद्रोह अब शहरों तक फ़ैल गया है


 

भारत के आज़ाद होने के कुछ माह बाद ही बर्मा भी आज़ाद हो गया था और उस समय वह दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे धनी देशों में से शुमार था यह विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक होने के साथ लकड़ी,टिन,चांदी,सीसा तेल आदि के उत्पादन के लिए पहचाना जाता थाबाद में लोकतंत्र को कमजोर करके सैन्य प्रशासन की स्थापना से यह देश कंगाल हो गया और अब यहां के लोग गरीबी का जीवन जीने को मजबूर हो गए घने जंगलों से घिरा म्यांमार में जनजातियों की जटिल संकल्पना के कारण इसका प्रशासन बड़ी चुनौती रही है  देश के कई जातीय समूह रहते है और वह अपनी मान्यताओं को लेकर बेहद सख्त रहे है,कई इलाके अर्द्धस्वायत्त शासी है। बौद्द बाहुल्य इस देश में  बामर,शान,राखीन,सोम,करेन और चीनी बर्मी समाज के पहचान है कचिन जनजाति के लोग ईसाई धर्म को मानते है जबकि मुस्लिम और हिन्दू भी यहां रहते है  

 


अभी तक बर्मी समाज के जातीय समूह सेना के साथ होते थे  रोहिंग्या के व्यापक जनसंहार में भी वे सेना का समर्थन करते दिखे थे  अब ऐसा नहीं है  करीब 16 जातीय समूहों ने मिलकर पीपल्स डिफेंस फ़ोर्स के जरिए सेना के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया हैशहरों के आम नागरिक पीपल्स डिफेंस फ़ोर्स में शामिल हो रहे हैंपीडीएफ़ की शुरुआत में लोगों के पास कोई हथियार नहीं थे लेकिन अब वे सेना से हथियार लूट रहे है और विस्फोटक भी बना रहे है संयुक्त राष्ट्र अपील कर चूका है कि म्यांमार की सेना को हथियार नहीं बेचे जाएं क्योंकि वह आम नागरिकों को निशाना बना रहा है वहीं रूस और चीन सेना को भारी हथियारों की खेप भेज रहे है म्यांमार की सेना ने पिछले दिनों विद्रोह पर अंकुश के लिए कई हवाई हमले किए हैं

 

लोगों का गुस्सा चीन पर फूट रहा है और चीन का बड़े पैमाने पर विरोध भी हो रहा है म्यांमार के विद्रोहियों ने देश के उत्तर-पश्चिम में स्थित चीन समर्थित खदानों पर हमले की चेतावनी जारी की है इन विद्रोहियों का कहना है कि ऐसी परियोजनाओं का मुनाफ़ा सीधा सैन्य शासन की जेब में जाता है और अगर ये परियोजनाएं रोकी नहीं गईं तो खदानों पर हमला किया जाएगा

 

पीडीएफ की असली ताक़त ज़मीनी स्तर पर स्थानीय समुदाय का समर्थन है ज़मीनी स्तर पर होने वाले विरोध प्रदर्शन कहीं ज़्यादा संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं  निर्वासित नेशनल यूनिटी सरकार की सरकार भी इस संघर्ष में मदद कर रही है और वे पीडीएफ़ की कुछ यूनिटों को संचालित कर रही है पीडीएफ  सैन्य सरकार के दूर दराज वाले पुलिस स्टेशनों और सरकारी दफ़्तरों को निशाना बना रहा है वे उस पर हमला करके हथियार और बम पर कब्जा कर लेते हैं इसके अलावा टेलिकॉम टॉवर और बैंकों को भी निशाना बना रहे हैं। लोगों का कहना है सेना आम लोगों की जीविका को छीन रही है और यह स्वीकार योग्य नहीं है।  सेना पीडीएफ़ के लड़ाकों को चरमपंथी मानती है और इससे संघर्ष बढ़ गया हैसीमावर्ती इलाकों में सक्रिय सशस्त्र समूह युद्धविराम को खत्म करके पीडीएफ़ को प्रशिक्षण और हथियार दे रहे हैम्यांमार में स्कूल बंद है और शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्थाएं अस्त व्यस्त हो गई हैमहिलाएं गर्भपात करा रही है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों को कोई भविष्य फ़िलहाल नहीं दिखाई पड़ रहा है


 

म्यांमार आसियान का एकमात्र सदस्य देश है जिससे भारत की समुद्री और भू भागीय दोनों सीमा मिलती है। भारत की पूर्व की और देखों नीति अपनाने से म्यांमार का महत्व ज्यादा बढ़ गया है। चीन म्यांमार में एक सैन्य सरकार चाहता है जिससे वह अपने आर्थिक और सामरिक हितों को बिना किसी दबाव के पूरा कर सकेभारत के लिए म्यांमार की अस्थिरता बहुत चुनौतीपूर्ण है  भारत और म्यांमार के बीच करीब सोलह सौ चालीस किलोमीटर की सीमा है और इसकी जद में पूर्वोत्तर का बड़ा क्षेत्र आता है इस सीमा पर ऐसे कई कबाइली समूह हैं जो कि अलगाववादी हैं और वे पूर्वोत्तर में सुरक्षा संकट बढ़ाते रहते है इनमें से कुछ गुटों को चीन का समर्थन भी हासिल है। भारत म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना तो चाहता है लेकिन वहां की सैन्य सरकार से सम्बन्ध खराब नहीं किए जा सकते।  बहरहाल म्यांमार की अस्थिरता से शरणार्थी भारत का रुख कर रहे है और यह पूर्वोत्तर की सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण है।

 

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