चीन पर अमेरिका का नया दांव indo pecific china amerika janstta

 जनसत्ता


                          

स्वतंत्र,खुले और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र की परिकल्पना अब चीन के भू रणनीतिक और भू आर्थिक प्रतिरोध का पर्याय बन गई हैअंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सामूहिक सुरक्षा का सैद्धांतिक सम्बन्ध सैन्य सहयोग और शस्त्रीकरण पर आधारित रहा है,जहां आक्रमण,आक्रमण का प्रतिकार और अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष को रोकने की प्रतिबद्धताएं अहम रही है अब चीन के आर्थिक उभार ने रणनीतिक प्रतिद्वंदिता के प्रचलित सिद्धांतों को पूरी तरह से बदल दिया है। अमेरिका चीन के वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए मजबूत आर्थिक और कारोबारी नीतियों पर आधारित व्यवस्था को तरज़ीह दे रहा है। इसके केंद्र में हिन्द प्रशांत महासागर का क्षेत्र है जो व्यापारिक,आर्थिक,प्राकृतिक और मानव संसाधन  की दृष्टि से बेहद प्रभावकारी है।


 

भौगोलिक तौर पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिलाकर समुद्र का जो हिस्सा बनता है उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह व्यापारिक आवागमन का प्रमुख क्षेत्र है तथा इस मार्ग के बन्दरगाह सर्वाधिक व्यस्त बन्दरगाहों में शामिल है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लगे 38 देशों में दुनिया की करीब 65 फीसदी आबादी रहती है।   आसियान की आर्थिक महत्वाकांक्षी भागीदारियां,असीम खनिज संसाधनों पर चीन की नजर,कई देशों के बन्दरगाहों पर कब्जा करने की चीन की सामरिक नीति तथा क्वाड की रणनीतिक साझेदारी इस क्षेत्र के प्रमुख राजनैतिक और सामरिक प्रतिद्वंदिता से जुड़े मुद्दे रहे है।


 

इन सबके बीच दुनिया के बाज़ार में चीनी उत्पादों की आपूर्ति अबाध तरीके से हो रही है,एशिया,अफ्रीका और यूरोप के कई देश चीन की ब्रेड और बटर की नीति का भाग बन गए है।  वैश्वीकरण की दीर्घकालीन और प्रभावकारी आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर चीन ने अपनी सामरिक क्षमता का भी अभूतपूर्व विकास कर लिया है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने यूरोप के कई देशों को व्यापारिक और सहायता कूटनीति के जरिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावित किया है। इस समय दक्षिण पूर्वी यूरोप में चीन ने अपना आर्थिक प्रभाव तेजी से स्थापित किया है,यह क्षेत्र अमेरिका और यूरोप के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। बाल्कन प्रायद्वीप यहीं स्थित है जो पश्चिम में एड्रियाटिक सागर,भूमध्य सागर और दक्षिण में मरमरा सागर और काला सागर से घिरा हुआ है। चीन नए सिल्क रोड के जरिए इस क्षेत्र के देशों में न केवल अपना रुतबा बढ़ा रहा है बल्कि कर्ज कूटनीति से उसने कई देशों पर अपना प्रभाव भी जमा लिया है। कई देशों के बंदरगाह निर्माण में चीनी कम्पनियों की बड़ी भूमिका है।  कर्ज के नाम पर चीन इन देशों में अपने सैन्य अड्डे बना सकता है और यह यूरोप की सुरक्षा की एक बड़ी चुनौती के रूप में भी सामने आ सकता है।


चीनी प्रभाव के अभूतपूर्व वैश्विक खतरों से निपटने के लिए अमेरिका हिन्द प्रशांत क्षेत्र में संभावनाएं निरंतर तलाश रहा है। इस क्षेत्र में चीन को घेर कर वह उसकी आर्थिक और सामरिक क्षमता को कमजोर करना चाहता है। अमेरिका को लगता है कि चीन को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए एशिया को कूटनीति के केंद्र में रखना होगा और इस नीति पर बराक ओबामा,ट्रम्प के बाद अब बाइडेन भी आगे बढ़ रहे हैअमेरिका रणनीतिक भागीदारी के साथ आर्थिक और कारोबारी नीतियों पर आगे बढ़ना चाहता है। इसीलिए क्वाड के बाद अब अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क की रणनीति पर आगे बढ़ने की बात कहीं है जिसमें व्यापारिक सुविधाओं के साथ आपसी सहयोग को बढ़ाना है।


 

यह देखा गया है कि चीन रणनीतिक रूप से जहां भी मजबूत होता है,अमेरिका के लिए वह चुनौतीपूर्ण समझा जाता है और इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। ओबामा काल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया थाओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को जोड़ने की नीति पर भी काम किया जो चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान है इन देशों में भारत समेत इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओस और वियतनाम जैसे देश शामिल है इनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है। चीन को  रोकने के लिए क्वाड का एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी के तौर पर विकास तो हुआ लेकिन इसके परिणाम अभी तक प्रभावकारी नहीं रहे है। क्वाड को लेकर चीन सख्त रहा है और वह इसे एशियाई नाटो कहता रहा है। वहीं चीन एशिया में अमेरिका के प्रभाव को कम करने के लिए आर्थिक मोर्चे पर मजबूत नजर आता है। अमेरिका की इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क की नई रणनीति प्रभावकारी तो लगती है लेकिन इसमें विरोधाभास भी कम नहीं है। एशिया के विभिन्न देशों को लामबंद करके आर्थिक सहयोग को लेकर अमेरिका के प्रमुख सहयोगी ऑस्ट्रेलिया,जापान और दक्षिण कोरिया चीन के साथ पहले से ही मिलकर काम कर रहे है।

 


इसमें से एक है आरसीईपी आसियान देशों के मुक्त व्यापार समझौते आरसीईपी यानी रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप को विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता कहा जाता  हैविश्व की 30 फ़ीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच एशियाई देशों के बीच निवेश बढ़ाने,आयात करों में कमी कर और सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था को साथ लाने को कृतसंकल्पित होकर लगातार सहयोग पर आधरित व्यवस्था को पुख्ता कर रहा है आरसीईपी चीन का पहला बहुपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता है जिसमें दक्षिण कोरिया और जापान शामिल हैं। इन दोनों देशों से सामरिक तौर पर चीन के गहरे विवाद है। पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू आइलैंड को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है,चीन ने इस आइलैंड में 2012  से अपने जहाज और विमान  भेजना शुरू किया और तब से ही जापान और चीन के बीच विवाद बढ़ गया है चीन जापान विवाद के बीच अमेरिका जापान को खुला और मुखर समर्थन दे रहा है,जापान और अमेरिका के बीच साल 2004 में प्रक्षेपात्र रक्षा प्रणाली के संबंध में समझौता भी हुआ था  जापान की नई रक्षा नीति में दक्षिणी द्वीपों को प्राथमिकता देते हुए वहां  सैनिकों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी की गई है,यह दक्षिणी द्वीप चीन के निकट है  अमेरिका के द्वारा जापान को भारत तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ बेहतर संबंध रखने को प्रेरित किया जा रहा है जिससे चीन को नियंत्रित किया जा सके चीन के उत्तर पूर्व में उत्तर कोरिया है तथा पूर्व में जापान है। कोरियाई प्रायद्वीप में चीन और उत्तर कोरिया को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैदक्षिण कोरिया की 1953 से अमरीका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अठ्ठाइस हजार से ज्यादा अमरीकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं मिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार हैआरसीईपी में अमेरिका के मित्र देश न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है


अमेरिका की चुनौतियां कम नहीं है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप नाम का आर्थिक गठबंधन चीन का मुकाबला करने के लिए एशिया में शुरू किया गया था। 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को बेकार बताकर अमेरिका को बाहर निकाल लिया था। जिसके बाद जापान के नेतृत्व में इसे सीपीटीपीपी  का नाम दिया गया। इस व्यापक और प्रगतिशील ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप में चीन शामिल होना चाहता हैव्यापारिक मुद्दों पर अमेरिका और जापान में  गहरें मतभेद सामने आते रहे हैचीन सीपीटीपीपी के सभी सदस्यों के साथ गहरे व्यापारिक संबंध साझा करता है और कई देशों के साथ उसके मुक्त व्यापार समझौते भी हैं। अधिकांश सदस्य आरसीईपी के माध्यम से भी चीन से जुड़े हुए हैं। 

 


अब अमेरिका यह विश्वास दिला रहा है कि एशिया के दो कारोबारी ब्लॉक सीपीटीपीपी और आरसीईपी के उलट आईपीईएफ़ में टैरिफ की दरें कम होंगी इस फ्रेमवर्क के तहत अमेरिका सप्लाई चेन की मज़बूती और डिजिटल इकोनॉमी पर रणनीतिक सहयोग चाहता है यह भी दिलचस्प है कि आईपीईएफ़ में सहयोग के खुलेपन को लेकर अमेरिका ने कोई स्पष्ट योजना नहीं रखी है  जबकि चीन मुक्त हस्त से सहयोग की नीति पर निरंतर काम कर रहा हैआईपीईएफ़ में कुल 13 देश है,जिसमे अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया,ब्रूनेई,भारत, इंडोनेशिया,जापान,दक्षिण कोरिया,मलेशिया,न्यूज़ीलैंड,फिलीपींस,सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। इसमें से अधिकांश देशों के बाज़ार पर चीन का गहरा प्रभाव है। 

 


बाइडन प्रशासन यह स्वीकार कर चूका है कि चीन ही आर्थिक,राजनयिक,सैन्य और तकनीकी दृष्टिकोण से उसका संभावित प्रतिद्वंद्वी है जो स्थिर और खुली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की निरंतर चुनौती से पार पाने में सक्षम है। चीन रूस के मुकाबलें कही बेहतर प्रतिद्वंदी बनकर अमेरिका के सामने आ रहा है और  बाइडन इससे निपटने के लिए मुख्य रूप से यूरोप  के बाद हिंद प्रशांत क्षेत्र से जुड़े देशों की ओर देख रहे हैचीन को रोकने के लिए बनाया गया क्वाड में यूक्रेन को लेकर मतभेद सामने आ चूके है,यहां भारत रूस को लेकर क्वाड के अन्य सदस्यों से प्रभावित नहीं रहाभारत के इस रुख पर अमेरिका असहज रहा हैअब  बाइडन भारत को साथ रखकर आईपीईएफ़ में भागीदारी बढ़ाना चाहते हैयहां पर पर्यावरण और सब्सिडी जैसे मुद्दों पर भारत और अमेरिका के बीच सामंजस्य मुश्किल नजर आता है वहीं आईपीईएफ़ के सदस्य देश इंडोनेशिया,ऑस्ट्रेलिया,दक्षिण कोरिया और जापान सामरिक चुनौतियों के बाद भी चीन से आर्थिक सम्बन्ध खत्म कर दे यह न तो व्यावहारिक रूप से संभव है और न ही आर्थिक हितों की दृष्टि से मुमकिन है

 


जाहिर है चीन को रोकने के लिए दीर्घकालीन आर्थिक और सामरिक रणनीति पर काम करने की जरूरत है,इसके लिए अमेरिका को न केवल अपने मित्र और सहयोगी देशों का भरोसा जीतना होगा बल्कि समान हितों पर आधारित व्यवस्थाओं पर आगे बढना होगा। भारत अपनी सामरिक और भौगोलिक चुनौतियों के चलते न तो रूस का विरोध कर सकता है और न ही जापान अपने आर्थिक हितों को बलि चढ़ाकर चीन से आर्थिक संबंधों को खत्म कर सकता है। वैश्विक व्यवस्थाओं की जटिलता के बीच नाटो और अमेरिका चीन को यूरोप में नहीं रोक पा रहे है,ऐसे में एशिया में चीन को कमजोर करना एक दिवास्वप्न ही नजर आता है।

पैंगोंग पर पेंच pangong china bharat sahara

 

राष्ट्रीय सहारा

                         


      

                                                                      

तैशीगोंग एक गांव है जो 1962 तक लद्दाख में आता था भारत की सेना यहां तक गश्त करने जाया करती थी इस समय यह चीन अधिग्रहित तिब्बत में है और भारत की सीमा से करीब 55 किलोमीटर दूर है जाहिर है चीन वास्तविक नियन्त्रण रेखा का उल्लंघन करते हुए लगातार भारत के इलाकों पर कब्जा करता जा रहा है लेह से पैंगोंग झील पूर्वी दिशा में तकरीबन 120 किलोमीटर दूर हैयह झील सामरिक,ऐतिहासिक और राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से भारत के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती हैभारत के लेह का बहुत सामरिक महत्व हैइसके पूर्व में अक्साई चीन तथा तिब्बत और उत्तर में चीन का शिनजियांग प्रांत है1962 तक भारतीय सेना पैंगोंग झील में फिंगर 8 तक गश्त किया करती थीभारत चीन युद्द के बाद सेना की गश्त इस इलाके में अनियमित हो गई और यहीं से सुरक्षा का बड़ा संकट खड़ा हो गयाइस समय भारत का प्रभाव फिंगर 3 तक है और यहां धनसिंह थापा चौकी स्थापित है जहां से सेना फिंगर 4 तक जाती है यहां 25 से 30 सैनिक ही बैठते है और ऐसा चीन से दबाव के कारण होता है


पैंगोंग के दक्षिण में बोतल नेक एरिया है,इस पर भी चीन ने अधिकार जमा लिया है यह इलाका बाईकर्स के लिए स्वर्ग माना जाता है लेकिन यहां किसी को जाने की अनुमति नहीं है  भारत पाकिस्तान के बीच वाघा सीमा जहां पर्यटकों की पसंदीदा जगह मानी जाती है,भारत चीन सीमा रेखा पर ऐसे कई सुंदर प्राकृतिक स्थान है,लेकिन वहां जाने की अनुमति मिलना मुश्किल होता है या जाने ही नही दिया जाता है,यह सब चीन के दबाव का नतीजा हैबोतल नेक एरिया एक वैली है जो पैट्रोल पाईंट 16 के पास है इन इलाकों में सुरक्षा चिंताओं को लेकर आईबी ने एक रिपोर्ट भी गृह मंत्रालय को सौंपी थी


इस समय पैंगोंग के आसपास चीन द्वारा  नये पुल के निर्माण की खबरें आई है। यह दोनों पुल चीन की सेना की स्थिति को बहुत मजबूत कर सकते है। खासकर पैंगोंग झील पर चीन लगातार आगे बढ़ता जा रहा है और इसका पता फिंगर की स्थिति से चलता है पैंगोंग से सटी पर्वतमालाओं के बीच एक फिंगर से दूसरे की दूरी सामान्यतया 2 से 3 किलोमीटर होती है,हालांकि यह इससे कम या ज्यादा भी हो सकती हैरणनीतिक तौर पर भी इस झील का काफ़ी महत्व है,क्योंकि ये झील चुशूल घाटी के रास्ते में आती हैचीन इस रास्ते का इस्तेमाल पर हमले के लिए कर सकता है1962 के युद्ध के दौरान यही इसी जगह से चीन ने भारत पर आक्रमण की शुरुआत की थी


पूर्वी लद्दाख़ की पैंगोंग त्सो झील शीत काल में जम जाती है और गर्मी में यह पिघल जाती है 134 किलोमीटर लम्बी और 5 किलोमीटर चौड़ी हिमालय की इस झील में ग्रीष्म काल में भारत और चीन के नौका गश्ती दल अक्सर आमने सामने होते है और अधिकांश झड़पें इसी समय होने की संभावना बढ़ जाती हैपैंगोंग त्सो झील  के दूसरी और चीन का सीपेक हाइवे का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है जो उसे पाकिस्तान से जोड़ता हैभारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यदि चीन का आधिपत्य फिंगर 8 से बढ़कर फिंगर 3 तक हो गया तो भारत की पूर्वोत्तर की सप्लाई लाईन पूरी तरह से कट जाएगीचीन आसानी से दौलत बेग ओल्डी,मार्समिक पास,गलवान नाला,छांग छेन्मो,रेस्लांग लॉ से डेमजोंग,दक्षिण चुशूल न्योमा पर कब्जा करने के लिए मजबूत स्थिति में होगा और वहां से लेह बहुत पास होगा। यह समूचा क्षेत्र भारत के लिए कितना अहम है इसका पता इसी से चलता है कि श्योक तथा काराकोरम दर्रे के बीच दौलत बेग ओल्डी सोलह हजार फीट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक पठार है। यहाँ दुनिया की सबसे ऊँची हवाई पट्टी भी है जो चीन और पाकिस्तान पर नजर रखने के लिए सामरिक रूप से भारत को बढ़त देती हैदौलत बेग ओल्डी के पश्चिम में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा का निर्माण कार्य किया जा रहा है। रेजांग दर्रा,लद्दाख क्षेत्र में चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक पहाड़ी दर्रा है चुशूल घाटी रेज़ांग दर्रा और पांगोंग त्सो झील के पास स्थित है यह झील चुशूल घाटी के मार्ग में आती है,यह एक मुख्य मार्ग है जिसका चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र में आक्रमण के लिये उपयोग किया जा सकता है1962 के युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेज़ांग दर्रा में चीनी सेना को रौंद दिया था। इसके कई सालों बाद 2017 में पैंगोंग झील के किनारे कुछ भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी


भारत के ऐतिहासिक सिल्क रोड के केंद्र में कभी लेह हुआ करता था और चीन पर उसकी नजर बनी हुई है भारत इस इलाके में आधारभूत संरचना का निर्माण इस समय तेजी से कर रहा है और यह चीन को चुनौतीपूर्ण नजर आता है जिसके कारण वह सीमा पर तनाव बढ़ाएं हुए है  इस समय दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड पर तेजी से काम कर रहा है यह सड़क  वास्तविक नियन्त्रण रेखा के समांतर है और इसकी ऊँचाई  तेरह हजार से सोलह हजार फुट है। यह सड़क लेह को काराकोरम दर्रे से जोड़ती है तथा चीन के शिनजियांग प्रांत से लद्दाख को अलग करती है।  


पैंगोंग पर आगे बढ़कर चीन गालवन घाटी को नियन्त्रण में लेना चाहता है  गालवन घाटी लद्दाख़ और अक्साई चीन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा अक्साई चीन को भारत से अलग करती है ये घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख़ तक फैली है

दरअसल ग्लेशियर,पहाड़,नदियां,बर्फ़ के रेगिस्तान और दूर दूर तक किसी का नामोनिशान नहीं,प्राकृतिक और भौगोलिक जटिलता ऐसी की दोनों देशों के बीच कई स्थान ऐसे है जहां सीमांकन हो ही नहीं पाया है,यही हकीकत है भारत और चीन को अलग करने वाली वास्तविक नियन्त्रण रेखा कीभारत चीन के साथ तकरीबन साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सीमा रेखा साझा करता है,चीन इस रेखा को तकरीबन  दो हजार किलोमीटर की बताता है और भारत के कई इलाकों पर अवैधानिक दावा जताता रहता है।

2017 में पैंगोंग में भारतीय सेना और चीनी सेना आमने सामने हुई थी और इसके बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच कई स्तर की बातचीत हो चूकी है जो बेनतीजा रही है  चीन जहां इन क्षेत्रों में नये निर्माण करते जा रहा है वहीं भारत के नये निर्माण पर वह कड़ा विरोध जताता रहा है   चीन ने पैंगोंग झील के पार एक दूसरे पुल का निर्माण कथित रूप से शुरू कर दिया है जो भारी बख्तरबंद वाहनों को आवाजाही के लिए इस्तेमाल किया जाएगा 


आज़ादी के बाद से ही भारत का चीन और पाकिस्तान से सीमा विवाद को लेकर अलग अलग रुख रहा है  भारत ने पाकिस्तान को  लेकर अक्सर जहां आक्रामकता दिखाई है वैसी प्रतिबद्धता चीन को लेकर नहीं देखी गई है  यहीं कारण है कि चीन सामरिक रूप से भारत पर निर्णायक बढ़त लेने में कामयाब रहा है बहरहाल वास्तविक नियन्त्रण रेखा का लगातार उल्लंघन करने से रोकने के लिए चीन  के खिलाफ भारत को सख्ती से पेश आने की जरूरत है  

 

म्यांमार की अस्थिरता पूर्वोत्तर के लिए चुनौतीपूर्ण myanmar bharat dainik jagran rashtriya

 

दैनिक जागरण        


                                                          

म्यांमार में सेना ने सत्ता संभाली है,तब से भारत का पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम म्यांमार से भाग कर आने वाले शरणार्थियों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है। म्यांमार और भारत की सीमा की भौगोलिक स्थिति  बेहद जटिल है। कई जनजातीय समूह भारत और म्यांमार दोनों देशों में रहते है और उन्हें एक दूसरे के कबीलों में जाने से रोकना कठिन होता है। सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से भारत के म्यांमार से बेहतर संबंध जरूरी है और यही कारण है कि म्यांमार के सैन्य शासन की आलोचना से भारत परहेज करता रहा है।


 

इन सबके बीच म्यांमार की स्थिति बद से बदतर हो रही है और लोगों का गुस्सा सेना पर बढ़ता जा रहा है,यह गृहयुद्द के संकेत है। दरअसल मानव अधिकार या न्याय के बुनियादी सिद्धांतों से म्यांमार के सैन्य शासन का कोई सरोकार नहीं हैम्यांमार की सेना को दायित्व-शून्य सेना कहा जाता है जिसके सैन्य अधिकारी अभिजात्यवादी होकर देश के प्राकृतिक,जैव और खनिज संसाधनों की लूट खसोट में लिप्त है तथा देश की अर्थव्यवस्था उन्हीं पर निर्भर हैसेना के जनरलों का देश के प्राकृतिक और खनिज संसाधनों पर नियन्त्रण हैचीन की नजर म्यांमार के गैस और कोयले के प्राकृतिक स्रोत है और इनका संचालन सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर किया जाता है सेना बैंकिंग से लेकर बीयर और पर्यटन तक हर चीज़ में निवेश का प्रबंधन करती हैअर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रहने का मतलब है कि सेना का विरोध आसान नहीं होता म्यांमार में सेना के प्रति लोगों का गहरा सम्मान होता था लेकिन पिछले साल आंग सान सू ची को जेल में डालकर लोकतांत्रिक सरकार की बर्खास्तगी और सैन्य शासन की स्थापना से लोग बहुत नाराज हैइसका प्रभाव सेना समर्थित कई जातीय समूहों पर भी पड़ा है


 

म्यांमार की अतिराष्ट्रवादी सेना खुद को अभिजात्य वर्ग की तरह पेश करती है,उसे युद्द और बर्बरता पसंद है ये सेना ख़ुद को श्रेष्ठ समझती है और इसकी जवबादेही ख़ुद के प्रति हैदुनिया उनके बारे में क्या सोचती है,सेना को इसकी कोई परवाह नहीं हैम्यांमार में 130 से ज़्यादा जातीय समूह हैंइनमें बमार्स बौद्ध बहुसंख्यक हैं देश के अभिजात्यों में बमार्स का ही दबदबा हैजातीय अल्पसंख्यकों में रोहिंग्या मुसलमान सेना की बर्बरता के शिकार लंबे समय से रहे हैंअब सैकड़ों प्रदर्शनकारी जिनमें बमार्स बौद्ध भी शामिल हैं,उन्हें अपनी ही सेना मार रही है। पहले बमार्स रोहिंग्या विरोधी और सेना समर्थक समझे जाते थे लेकिन अब सेना विरोध करने वालों को ग़द्दार के तौर पर देख रही है। इस प्रकार सेना का संघर्ष अब अपने जैसे अभिजात्यवादी जातीय समूहों से भी हो रहा है।  


 

म्यांमार में सरकारी सेना के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले लोगों को सामूहिक तौर पर पीपल्स डिफेंस फोर्स  या कहा जा रहा है,जो सशस्त्र नागरिक समूह का एक नेटवर्क हैजिसमें मुख्य तौर पर युवा शामिल हैंपीपल्स डिफ़ेंस फ़ोर्स में किसान,महिलाएं,डॉक्टर्स,नर्से और मजदूर शामिल हैये पहले शांतिपूर्ण आंदोलनों से सैन्य सरकार का विरोध कर रहे थे लेकिन सैन्य प्रशासन ने इन आंदोलनों को सख्ती से कुचला जिसके बाद लोगों ने हथियार उठा लिए है म्यांमार के लोगों को लगता है कि अंतराष्ट्रीय समुदाय उनके देश को लेकर निष्क्रिय रहा है,ऐसे में वे सेना को खत्म कर ही अपने अधिकार प्राप्त कर सकते हैयह सशस्त्र विद्रोह अब शहरों तक फ़ैल गया है


 

भारत के आज़ाद होने के कुछ माह बाद ही बर्मा भी आज़ाद हो गया था और उस समय वह दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे धनी देशों में से शुमार था यह विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक होने के साथ लकड़ी,टिन,चांदी,सीसा तेल आदि के उत्पादन के लिए पहचाना जाता थाबाद में लोकतंत्र को कमजोर करके सैन्य प्रशासन की स्थापना से यह देश कंगाल हो गया और अब यहां के लोग गरीबी का जीवन जीने को मजबूर हो गए घने जंगलों से घिरा म्यांमार में जनजातियों की जटिल संकल्पना के कारण इसका प्रशासन बड़ी चुनौती रही है  देश के कई जातीय समूह रहते है और वह अपनी मान्यताओं को लेकर बेहद सख्त रहे है,कई इलाके अर्द्धस्वायत्त शासी है। बौद्द बाहुल्य इस देश में  बामर,शान,राखीन,सोम,करेन और चीनी बर्मी समाज के पहचान है कचिन जनजाति के लोग ईसाई धर्म को मानते है जबकि मुस्लिम और हिन्दू भी यहां रहते है  

 


अभी तक बर्मी समाज के जातीय समूह सेना के साथ होते थे  रोहिंग्या के व्यापक जनसंहार में भी वे सेना का समर्थन करते दिखे थे  अब ऐसा नहीं है  करीब 16 जातीय समूहों ने मिलकर पीपल्स डिफेंस फ़ोर्स के जरिए सेना के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया हैशहरों के आम नागरिक पीपल्स डिफेंस फ़ोर्स में शामिल हो रहे हैंपीडीएफ़ की शुरुआत में लोगों के पास कोई हथियार नहीं थे लेकिन अब वे सेना से हथियार लूट रहे है और विस्फोटक भी बना रहे है संयुक्त राष्ट्र अपील कर चूका है कि म्यांमार की सेना को हथियार नहीं बेचे जाएं क्योंकि वह आम नागरिकों को निशाना बना रहा है वहीं रूस और चीन सेना को भारी हथियारों की खेप भेज रहे है म्यांमार की सेना ने पिछले दिनों विद्रोह पर अंकुश के लिए कई हवाई हमले किए हैं

 

लोगों का गुस्सा चीन पर फूट रहा है और चीन का बड़े पैमाने पर विरोध भी हो रहा है म्यांमार के विद्रोहियों ने देश के उत्तर-पश्चिम में स्थित चीन समर्थित खदानों पर हमले की चेतावनी जारी की है इन विद्रोहियों का कहना है कि ऐसी परियोजनाओं का मुनाफ़ा सीधा सैन्य शासन की जेब में जाता है और अगर ये परियोजनाएं रोकी नहीं गईं तो खदानों पर हमला किया जाएगा

 

पीडीएफ की असली ताक़त ज़मीनी स्तर पर स्थानीय समुदाय का समर्थन है ज़मीनी स्तर पर होने वाले विरोध प्रदर्शन कहीं ज़्यादा संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं  निर्वासित नेशनल यूनिटी सरकार की सरकार भी इस संघर्ष में मदद कर रही है और वे पीडीएफ़ की कुछ यूनिटों को संचालित कर रही है पीडीएफ  सैन्य सरकार के दूर दराज वाले पुलिस स्टेशनों और सरकारी दफ़्तरों को निशाना बना रहा है वे उस पर हमला करके हथियार और बम पर कब्जा कर लेते हैं इसके अलावा टेलिकॉम टॉवर और बैंकों को भी निशाना बना रहे हैं। लोगों का कहना है सेना आम लोगों की जीविका को छीन रही है और यह स्वीकार योग्य नहीं है।  सेना पीडीएफ़ के लड़ाकों को चरमपंथी मानती है और इससे संघर्ष बढ़ गया हैसीमावर्ती इलाकों में सक्रिय सशस्त्र समूह युद्धविराम को खत्म करके पीडीएफ़ को प्रशिक्षण और हथियार दे रहे हैम्यांमार में स्कूल बंद है और शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्थाएं अस्त व्यस्त हो गई हैमहिलाएं गर्भपात करा रही है क्योंकि उन्हें अपने बच्चों को कोई भविष्य फ़िलहाल नहीं दिखाई पड़ रहा है


 

म्यांमार आसियान का एकमात्र सदस्य देश है जिससे भारत की समुद्री और भू भागीय दोनों सीमा मिलती है। भारत की पूर्व की और देखों नीति अपनाने से म्यांमार का महत्व ज्यादा बढ़ गया है। चीन म्यांमार में एक सैन्य सरकार चाहता है जिससे वह अपने आर्थिक और सामरिक हितों को बिना किसी दबाव के पूरा कर सकेभारत के लिए म्यांमार की अस्थिरता बहुत चुनौतीपूर्ण है  भारत और म्यांमार के बीच करीब सोलह सौ चालीस किलोमीटर की सीमा है और इसकी जद में पूर्वोत्तर का बड़ा क्षेत्र आता है इस सीमा पर ऐसे कई कबाइली समूह हैं जो कि अलगाववादी हैं और वे पूर्वोत्तर में सुरक्षा संकट बढ़ाते रहते है इनमें से कुछ गुटों को चीन का समर्थन भी हासिल है। भारत म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना तो चाहता है लेकिन वहां की सैन्य सरकार से सम्बन्ध खराब नहीं किए जा सकते।  बहरहाल म्यांमार की अस्थिरता से शरणार्थी भारत का रुख कर रहे है और यह पूर्वोत्तर की सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण है।

 

खालिस्तान का खेल khalistan panjab rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा


                        

                                                                              

रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड एक विध्वंसक हथियार है,इसे टैंकरोधी ग्रेनेड लांचर भी कहा जाता है जो आसानी से कंधे पर रखकर चलाया जा सकता हैयह बख्तरबंद वाहनों और इमारतों के खिलाफ व्यापक क्षति का कारण बन सकता है अफगानिस्तान,सीरिया और इराक में चरमपन्थी इसका उपयोग सेना के खिलाफ करते रहे हैअब भारत में इसका उपयोग सुरक्षा के लिहाज से अतिसंवेदनशील हैमोहाली में पुलिस इंटेलिजेंस हेडक्वॉर्टर पर हमले में रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड का इस्तेमाल और इसमें खालिस्तानी पृथकतावादियों का जुड़ा होना देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नए खतरे के संकेत है

 


खालिस्तान आंदोलन के भारत में उभरने की संभावनाएं करीब दो दशक पहले ही खत्म हो चूकी है लेकिन भारत से बाहर इसे जिंदा रखने की धार्मिक और राजनीतिक कोशिशें बदस्तूर जारी रही हैकिसान आंदोलन में सुरक्षा एजेंसियों ने खालिस्तानी चरमपंथियों की भागीदारी को लेकर आशंका जताई थी वहीं पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की चिंता भी इससे मिलीजुली थीकिसान आंदोलन की समाप्ति के बाद खालिस्तान के समर्थकों की गतिविधियों में अचानक तेजी आई हैहिमाचल प्रदेश में विधानसभा के मुख्य गेट पर खालिस्तान समर्थक झंडे,पटियाला और मोहाली  की घटनाएं इस बात की ओर इशारा कर रही है कि खालिस्तानी एक बार फिर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए धार्मिक और सुरक्षा का संकट बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैभारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित एक संगठन सिख फॉर जस्टिस द्वारा खालिस्तान समर्थक झंडे फहराने की अपील को इन घटनाओं से जोड़कर ही देखा जाना चाहिएयह भी बेहद दिलचस्प है कि भारत में रहने वाले सिखों का खालिस्तानी आंदोलन को न तो समर्थन है और न ही वे इसमें किसी प्रकार की भागीदारी रखना चाहते है,वहीं पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई ऑपरेशन के-2 के जरिए भारत के धार्मिक सद्भाव को भंग करने के प्रयासों में कई सालों से जुटी हुई है


 

पाकिस्तान खालिस्तान को जिन्दा रखने के लिए अपनी जमीन का बेजा इस्तेमाल करने से कभी परहेज नहीं करता। वह विदेशों में रहने वाले खालिस्तानी समर्थकों को भारत विरोध के लिए उकसाने की नीति पर चलता रहा है। लाहौर में सिख अतिवादी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल का सरगना वधवा सिंह बब्बर लम्बे समय तक पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई  की सरपरस्ती में रहा था। इस दौरान उसने लश्कर तैयबा के साथ मिलकर सिख आतंकवाद को फिर से जिंदा करने की कोशिशें भी की। पाकिस्तान में सिख अतिवादियों को जेहादी भाई कहा जाता है और उन्हें तमाम सुख सुविधाओं के साथ पाक सेना के अधिकारियों,आईएसआई  और कुख्यात आतंकी संगठन के आकाओं से मिलने की खुली  छूट भी मिली होती है। दूसरी और यह तथ्य किसी से छुपे नहीं है की पंजाब के कुछ राजनीतिक दल पृथकतावादियों को राजनीतिक समर्थन देते रहे है। वे पंजाब की स्वायतता के हिमायती रहे है और उनकी भूमिका संदिग्ध रही है। पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस सिख आतंकवादी संगठनों में फिर से जान डालने के लिए कनाडा,अमेरिका समेत दुनियाभर में बसे सिखों को भड़काने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती। आईएसआई खालिस्तानी अलगाववादी और कश्मीर के आतंकवादियों को एकजुट करने की योजना पर लगातार काम कर रही है।

 


पाकिस्तान ने खालिस्तान के लिए ननकाना साहिब में भी लगातार मुहिम चलाई है। दुनियाभर के सिख वहां गुरु नानक देव की जयंती पर जुटते हैं। पाक सिखों को ननकाना साहिब में आने के लिए न केवल उच्च कोटि की सुरक्षा देता है बल्कि वहां खालिस्तान के समर्थन में पोस्टर भी लगाता रहा है। आईएसआई खालिस्तान के नाम पर सिख युवाओं को भडकाकर स्लीपर सेल बनाने को आमादा है। इसके लिए वह स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने के लिए की गई कार्रवाई और  सिख विरोधी दंगों के नाम पर विष वमन करती है। इन्टरनेट पर सिख आतंकवादियों की शहादत जैसा महिमामंडन और एनजीओ द्वारा पैसा भेजकर आईएसआई खालिस्तान के दानव को पुनः जीवित करना चाहती है।


पाकिस्तानी प्रभाव से दिग्भ्रमित खालिस्तान के चरमपंथी दुनियाभर में सिख होमलैंड के पक्ष में प्रदर्शन करते रहे है। कनाडा में काम करने वाली पृथकतावादी ताकतें ऐसे प्रयास कर रही है कि वे कनाडा में ख़ालिस्तान समर्थन सुनिश्चित करने के लिए  स्वतंत्र पंजाब के पक्ष में एक जनमत संग्रह कराएं। अगस्त महीने में दुनिया भर में बसने वाला भारतीय समुदाय आज़ादी महोत्सव हर्ष और उल्लास अपना से मनाता है और इस दौरान कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते है। खालिस्तानी समर्थक इस मौके पर भारत विरोध का झंडा बुलंद करते है,लंदन में भी जनमत संग्रह के लिए प्रदर्शन किए जा चुके है। खालिस्तान समर्थको ने  इसके पहले 2020 के लिए खालिस्तान के पक्ष में जनमत संग्रह को लेकर एक रैली भी निकाली थी जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए गए थे। लंदन में करीब 60  फीसदी विदेशी मूल के है और इन्हें पाकिस्तान गुमराह करता रहा है। 


उत्तरी अमेरिकी देश कनाडा पृथकतावादी सिख होमलैंड खालिस्तान के समर्थकों के लिए महफूज ठिकाना रहा है। यह देश विदेशी अल्पसंख्यकों की पहली पसंद है और इसे सिखों का दूसरा घर भी कहा जाता है। भारत के बाद सबसे बड़ी सिख आबादी कनाडा में ही  बसती है। खालिस्तानी आतंकवादी गुट बब्बर खालसा इंटरनेशनल यानि बीकेआई सिख अलगाव को बढ़ावा देने के लिए पूरी दुनिया में प्रभावशील है। इस आतंकी गुट का कनाडा पर गहरा प्रभाव है और वे इस देश में राजनीतिक तौर पर भी ताकतवर माने जाते है। यहीं नहीं अपने रसूख का इस्तेमाल कर बीकेआई खालिस्तान का समर्थन देने वाली ताकतें को यहां से संचालित भी करती है। कनाडा अटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर और उत्तर  में आर्कटिक महासागर तक फैला हुआ है,यह क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। बब्बर खालसा इंटरनेशनल को कनिष्क विमान विस्फोट के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसमें भारत के करीब 329 लोग मारे गए थे।  यह आतंकी संगठन हर साल बैसाखी जैसे मौकों पर आयोजित समारोहों में सिख चरमपंथियों को शहीद का दर्जा देकर  उन्माद फैलाता है यहीं नहीं सार्वजनिक समारोह में खालिस्तान के नारे  लगाकर भारत विरोधी कार्यों को अंजाम दिया जाता है। पृथकतावादी सोच का यहाँ के गुरुद्वारों और कई गुटों पर इनका नियंत्रण है बैसाखी के आयोजन में कनाडा के कई प्रभावी राजनीतिज्ञ शामिल होते है,इससे बीकेआई जैसे भारत विरोधी संगठनों को मदद मिलती है। विदेशों में रहकर भारत विरोध का काम करने वाले कई चरमपंथी भारत ने काली सूची में डाल रखे है और उन्हें भारत आने की कोई इजाजत नहीं है। ऐसे लोग खालिस्तान की मांग को भारत में उभारने के लिए चरमपंथी ताकतों को आर्थिक मदद देते रहे है। इन सबके बीच खालिस्तानी आंदोलन को पंजाब में कोई समर्थन नहीं है किंतु भारत से बाहर यह विचार अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ,समस्या यहीं  है


खालिस्तानी अपने लिए अलग देश चाहते है,वे राजकाज को धार्मिक नेतृत्व से जोड़कर नई व्यवस्था कायम करना चाहते है,यह विचार भारत की संविधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाला है समावेशी विचार और लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले भारत में दोबारा खालिस्तानी आंदोलन के शुरू होने की कोई संभावना नहीं है वहीं कट्टरता,धार्मिक प्रदर्शन,सर्वोच्च धार्मिक संस्थाओं के क्रियाकलापों को नियंत्रित रखने और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के द्वारा पृथकतावादी ताकतों को संरक्षण न मिले इसके लिए सजग रहने की जरूरत अवश्य है

 

 

 

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...