दक्षिण एशियाई का संकट,जनसत्ता south asia janstta

जनसत्ता


 

            

 भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण,राजनीतिक अस्थायित्व और आतंकवाद से प्रभावित अति संवेदनशील क्षेत्रों में शुमार दक्षिण एशिया विश्व शांति के लिए चुनौती बढ़ाता रहा है सबसे अधिक और सबसे घनी आबादी वाले इस भौगोलिक क्षेत्र में तक़रीबन दो अरब लोग बसते है और यह दुनिया की कुल आबादी का एक चौथाई है किसी भी वैश्विक आर्थिक संकट का सामना इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा पड़ता है और भुखमरी का संकट गहरा जाता है पिछले दशक में दक्षिण  एशिया में यूनिसेफ ने दस करोड़ लोगों के भूखा रहने को मजबूर होने की आशंका जताई थी और इस समय इस संख्या में भारी इजाफा हो गया है


 

वैश्विक भुखमरी सूचकांक की हालिया रिपोर्ट में पाकिस्तान,बांग्लादेश,नेपाल और श्रीलंका की स्थिति बेहद निम्नतम बताई गई है जलवायु परिवर्तन और कोविड महामारी से भुखमरी का संकट तो बढ़ा ही है साथ ही शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार की समस्याएं भी विकराल हो गई है  दक्षिण एशिया के कई देश राजनीतिक उथल पुथल के शिकार रहे है और भारत को छोड़कर अन्य देशों में अस्थिरता का अंदेशा बना रहता है  दक्षिण एशिया के देशों में आपसी सहयोग के लिए  दक्षेस की स्थापना 1985 को गई थी और इस संगठन का उद्देश्य दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग से शांति और प्रगति हासिल करना बताया गया था लेकिन विभिन्न देशों के बीच विवाद इस पर पूरी तरह हावी रहे और इसी का परिणाम है कि दुनिया की बड़ी आबादी वाला यह संगठन आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में विफल रहा है


 

नेपाल,श्रीलंका और मालद्वीप जैसे देश पर्यटन पर निर्भर रहे है और कोविड के प्रभाव के कारण इनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है रूस युक्रेन युद्द के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमत से महंगाई आसमान पर है और लोगों का जीना मुश्किल हो गया है विदेशी मुद्रा की कमी किसी देश की अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावित कर सकती है,यह खतरा पाकिस्तान पर भी मंडरा रहा है पारंपरिक तौर पर माना जाता है कि किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम से कम 7 महीने के आयात के लिए पर्याप्त होना चाहिए लेकिन दक्षिण एशिया के कई देश दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गए है


 

नेपाल के पास अभी जितनी विदेशी मुद्रा बची है उससे सिर्फ़ छह महीनों का आयात बिल ही भरा जा सकता है श्रीलंका ने विदेशी क़र्ज़ों के भुगतान को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है श्रीलंका अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद से क़र्ज़ों के भुगतान करने की कोशिश कर रहा है इसके अलावा श्रीलंका भारत और चीन जैसे देशों से भी मदद लेने की कोशिश कर रहा है क़रीब  तीन सौ अरब डॉलर की पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट का सामना कर रही है  श्रीलंका में अफरा तफरी का माहौल है,नेपाल के लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है वहीं मालद्वीप मदद के लिए भारत की ओर देख रहा है


 

नेपाल करीब 62 फीसदी विदेशी व्यापार भारत से करता है और करीब 14 फीसदी चीन से नेपाल की सबसे बड़ी समस्या वहां राजनीतिक अस्थायित्व है और चीन इसका फायदा उठाकर उसे कर्ज के जंजाल में फंसा चूका है विकास के नाम पर चीन द्वारा दिया जा रहा कर्ज और उसकी जटिलताओं के जाल में नेपाल के साथ पाकिस्तान,श्रीलंका और मालद्वीप भी उलझते जा रहे है दक्षिण एशिया में श्रीलंका,नेपाल और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भारी व्यापार घाटे से जूझ रही है इसके साथ ही तेल की बढ़ती क़ीमतें और मज़बूत होता डॉलर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भारी पड़ रहा है श्रीलंका की मुद्रा रुपये भी डॉलर की तुलना में हर दिन नई गिरावट की तरफ बढ़ रही है पाकिस्तान को लगातार चालू खाते और बजटीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है,विदेशी कर्ज़ लगातर बढ़ रहा है,मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है,निवेशकों के आत्मविश्वास में तेज़ी से कमी आ रही है और देश बेहद ग़रीबी की स्थिति में है


 

चीन जैसी विदेशी संस्थाओं पर बहुत अधिक निर्भरता ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमज़ोर बना दिया है इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान के पास अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए कोई विदेशी जमा पूंजी शेष नहीं बची है। नेपाल और श्रीलंका की भी कुछ यही स्थिति है। दक्षिण एशिया में अफ़ग़ानिस्तान का मानवीय संकट बेहद गंभीर अवस्था में पहुंच गया है तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश में गरीबी,सूखा और बिजली की कमी की लोग बेहाल है यहां दो करोड़ से ज्यादा लोगों पर भुखमरी का संकट गहरा रहा है और बिना तनख्वाह के सरकारी नौकरी करने को मजबूर लोगों की ज़िंदगी मुश्किल होती जा रही हैतालिबान के सत्ता में काबिज होने के पहले जब तक अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व वाली सरकार थी,तब तक अफगानिस्तान की जीडीपी का 43 फीसदी हिस्सा विदेशी मदद से आता था तालिबान के आने के बाद वैश्विक आर्थिक मदद तो बंद हुई है बल्कि अमेरिका ने उस पर कई प्रतिबंध भी लगा दिए हैं अफ़ग़ान सरकार की संपत्ति,केंद्रीय बैंक का रिज़र्व सब फ्रीज़ कर दिया गया है प्रतिबंधों के कारण वहां की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है


आर्थिक तंगी का असर देश में दिखने लगा है और लोगों में तालिबान का विरोध बढ़ रहा है। तालिबान इससे बचने और उबरने के लिए तस्करी को बढ़ावा दे सकता है। अफगानिस्तान अफीम के उत्पादन के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता हैतालिबान पैसा बनाने के लिए अफीम की खेती को बढ़ावा दे सकता है जिससे नशीले पदार्थों का कारोबार फलने फूलने की आशंका गहराने लगी है। इसका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। तालिबान की सत्ता हेरोइन के अवैध कारोबार को बढ़ावा देती है तो भारत उसके लिए बड़ा बाज़ार है। भारत में संगठित अपराधियों के साथ आतंकवादियों का मजबूत  गठजोड़ है। मादक पदार्थों की तस्करी,हथियारों की तस्करी,मानव तस्करी,जाली मुद्रा,साइबर अपराध,मनी लांड्रिंग से लेकर दंगे भड़काना,साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाना और सामरिक सूचनाओं को लीक करने जैसे संवेदनशील मामलों में अपराधी आतंकियों के मददगार होते है। मादक द्रव्यों का चलन तो बहुत पुराना है लेकिन इसमें अथाह और आसान धन की सुलभता से माफिया ने इसका जाल विश्वव्यापी बना दियाइसे सरकारी मान्यता न मिलने के बाद भी माफिया के साथ,पुलिस,प्रशासन,गुप्तचर एजेंसियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाते हैमादक द्रव्यों के तस्करों के साथ अपराधियों का गठजोड़ पनपता है और इसके बाद,अवैध मुद्रा,मानव तस्करी और अवैध हथियारों का कारोबार इन्हें आतंकवाद से जोड़ देता हैमादक पदार्थों की तस्करी के साथ,केमिकल निर्माण और आतंकियों से संबंधों का त्रिकोण व्यापक तबाही का सबब बन सकता है


भारत की भौगोलिक स्थिति इस त्रिकोण के बेहद मुफीद हैबर्मा,थाईलैंड और लाओस इसके कारोबार को दुनिया में फैलाते है और माफिया के लिए यह गोल्डन ट्रेंगल माना जाता है। देश के उत्तर पूर्वी राज्यों की सीमा बिलकुल सुरक्षित नहीं है बंगाल के कई इलाके तस्करी के केंद्र के रूप में कुख्यात हैपाकिस्तान-अफगानिस्तान और ईरान के गोल्डन क्रिसेंट से भारत जुड़ा हुआ हैपाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई ने इसी इलाके का फायदा उठाकर अवैध पैसों से आतंकवाद  को  खूब बढ़ाया है। पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता से वहां की फौज को बढ़ावा मिलता है और यह भारत की सुरक्षा के लिए संकट बढ़ने के संकेत होते है।


श्रीलंका में सरकार के कमजोर होने से तमिल समस्या एक बार फिर उभर सकती है।  लिट्टे की समाप्ति के एक दशक बाद वहां रहने वाले तमिल भारत के तमिलनाडु राज्य की ओर रुख कर सकते है। तमिल समस्या का किसी भी स्थिति में बढ़ना भारत की सामरिक और आंतरिक सुरक्षा के इए संकट बढ़ा सकता है। हिन्द महासागर से जुड़े मालद्वीप में भारत विरोधी प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हो रहे है इसके बाद भी भारत सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अपने इस पड़ोसी देश को करोडो डॉलर की वित्तीय सहायता दे रहा है। भूटान को लेकर भी भारत ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाएं है। भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम इस देश का प्रबन्धन भारत सम्हालता रहा है और उसकी पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की प्रभावी भूमिका होती है। अभी तक भूटान भारत के लिए अन्य देशों से बेहतर सहयोगी साबित हुआ है।   



दक्षिण एशिया के कई देशों की आंतरिक स्थिति इस समय बेहद चिंताजनक हैमहंगाई और गरीबी बढ़ने से असमानता का स्तर लगातार बढ़ रहा है,स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होकर आम जनता से दूर हैभारत जैसी लोक कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए न तो सरकारों के पास पैसा है और न ही कोई दीर्घकालीन योजनाबच्चें लगातार स्कूल से दूर हो रहे हैदक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में ई-लर्निंग के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं है और इसके कारण शिक्षा अपने निम्नतर स्तर तक जा सकती है। इससे अपराध बढ़ सकते है और धार्मिक उन्माद को भी बढ़ावा मिल सकता है। दक्षिण एशिया की बहुसांस्कृतिक पहचान है और सभी देशों को अप्रिय स्थिति उत्पन्न न होने देने के लिए सतर्क रहने की जरूरत होती है। इस समय आवश्यकता इस बात की है कि दक्षेस के देश आपसी व्यापार और सम्बन्धों को बेहतर करके आपसी सहयोग को बढ़ाएंहालांकि वापसी विवाद के चलते यह संभव होता नहीं दिखाई पड़ता। चीन जैसे देश का हस्तक्षेप दक्षिण एशिया के देशों के लिए घातक साबित हो रहा है। चीन  इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कर्ज की कूटनीति को अपना रहा है। उसने अपने सामरिक हितों को पूरा करने के लिए कई देशों में सैन्य अड्डे भी बना लिए है।  भारत का व्यवहार दक्षिण एशिया के देशों से बड़ा मित्रवत रहा है और भारत की तरफ से पड़ोसी देशों को  वित्तीय सहायता सर्वाधिक अनुकूल शर्तों पर  दी जाती है। जबकि चीन की कर्ज की कठिन शर्तों के प्रकोप को श्रीलंका बूरी तरह भोग रहा है। पाकिस्तान और श्रीलंका के पास चीन के कर्ज का सूद देने के पैसे नहीं है।    


बहरहाल दक्षिण एशिया के देशों को यह समझने की जरूरत है कि उसकी जरूरत हथियार नहीं बल्कि  करोड़ों लोगों की रोजी रोटी है। इस क्षेत्र से महाशक्तियों को दूर रखने और मानवीय संकट से उबरने के लिए साझा प्रयासों की जरूरत है, यह धार्मिक.सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर समन्वयकारी हो सकते है। दक्षिण एशिया में लोगों की एक दूसरे देशों में आवाजाही बढने से रोजगार के अवसर बढ़ेगे और यह इस क्षेत्र की शांति स्थापना की उम्मीदों को भी मजबूत करेगा। दक्षेस की भावना को मजबूत करने और आपसी सहयोग बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है नहीं तो मानवीय संकट विकराल रूप धारण कर लेगा।    

 

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