वैदेशिक नीति की उलझन foreign policy india rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा

         

                                                                             


यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वोन ने हाल ही में अपनी भारत यात्रा के दौरान भारत को आगाह करते हुए कहा कि रूस और चीन के बीच दोस्ती की कोई सीमा नहीं हैयूक्रेन संकट में भारत की रूस के साथ स्थिर वैदेशिक नीति को लेकर पश्चिमी देश असहज हुए है और अमेरिकी राष्ट्रपति समेत कई राष्ट्राध्यक्ष

भारत को नसीहत दे रहे है जिसमें जिसमें चीन को लेकर भारत की सुरक्षा चुनौतियों को यथार्थवादी दृष्टिकोण  से देखने की सलाह दी जा रही है

 


यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामकता और मानवाधिकार के व्यापक हनन के बाद भी भारत का कूटनीतिक मोर्चे पर अपने शक्तिशाली मित्र रूस के साथ खड़ा दिखाई देना उसकी वैचारिक सहमति से ज्यादा सामरिक मजबूरी  समझा गया अमेरिका और यूरोप की नजर भारत के रुख पर थी और पश्चिम की यह अपेक्षा रही कि भारत रूस के प्रभाव से मुक्त होकर राजनयिक व्यवहार करें लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की चिन्ताओं और चुनौतियों के लिए भारत ने वहीं किया जो किसी जिम्मेदार सम्प्रभु देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए करना चाहिएइन सबके बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शानदार तरीके से न केवल भारत की नीति का बचाव किया बल्कि यूरोप को बहुउद्देश्यीय राजनयिक व्यवहार से बाज़ आने की नसीहत भी दीपश्चिमी देश भारत की सामरिक और भौगोलिक चुनौतियों से वाकिफ है और वे भारत से सामरिक साझेदारी मजबूत करने  के प्रति संकल्प व्यक्त कर रहे है


भारत की इस समय सामरिक सुरक्षा की चिंताओं में सबसे ऊपर चीन से लगती हुई सीमा हैइस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चीन ने भारत और चीन को बाँटने वाली मैकमोहन रेखा को कभी स्वीकार ही नही किया है पिछलें दो सालों से भारत चीन सीमा पर गहरा तनाव है और यह विवाद थमता भी नजर नहीं आ रहा है चीन से किसी भी अप्रत्याशित हमलें से निपटने के लिए भारत को आधुनिक हथियारों की जरूरत है और इसके लिए हमारी सबसे ज्यादा निर्भरता रूस पर है1971 में भारत और रूस के बीच हुई सुरक्षा संधि कुछ बदलावों के साथ ही लेकिन मजबूत साझेदारी का प्रतिबिम्ब रही है


वहीं बदलते समय के साथ भारत के परम्परागत शत्रु चीन के प्रति रूस का व्यवहार नियंत्रण और संतुलन से कहीं आगे बढ़ गया हैचीन एक साम्यवादी देश होने के साथ सुरक्षा परिषद का सदस्य हैवह दुनिया की बड़ी आर्थिक और सामरिक महाशक्ति हैतकनीकी स्तर पर भी चीन बेहद समृद्द राष्ट्र के रूप में उभरा हैयूक्रेन पर रूस के हमलें के बाद पश्चिमी देशों ने रूस को आर्थिक प्रतिबंधों से लाद दिया है किंतु पुतिन इन प्रतिबंधों से कभी प्रभावित या विचलित नहीं हुए इसका एक प्रमुख कारण रूस चीन के व्यापक साझा हित है


भारत और पाकिस्तान में विवाद के बीच रूस भारत का विश्वसनीय साझेदार रहा है जबकि चीन को लेकर विवाद के समय रूस का व्यवहार बदल जाता है। चीन और भारत के बीच सीमा पर हिंसक संघर्ष के बाद युद्द जैसी स्थितियों में भी रूस  का मौन भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाता रहा है। रूस की चीन को लेकर असल हकीकत 1962 के भारत चीन युद्द में सामने आई जब रूस के सर्वोच्च नेता खुश्चेव ने भारत को लड़ाकू विमानों की खेप भेजने में देरी करके अप्रत्यक्ष रूप से चीन की मदद की थी। वह  भी उस दौर में  जब चीन और तत्कालीन सोवियत संघ के सम्बन्ध बेहद खराब हुआ करते थे और सीमा पर इन दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे से भीड़ जाया करती थी। भारत से युद्द के बाद चीन  का 1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर रूस से युद्द हुआ था और रूस की परमाणु हमलें की धमकी के बाद चीन को वहां से कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा था


1991 में सोवियत संघ के विघटन और वैश्वीकरण की नीति के बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलने के साथ चीन का आर्थिक दबदबा बढ़ा और आगे चलकर  रूस पर बढ़त हासिल हो गई इसी का प्रभाव है कि चीन का रूस से सीमा विवाद लगभग समाप्त हो चूका है2004 में  रूस और चीन के बीच हुए समझौते में सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था इस समय चीन और रूस आर्थिक साझेदारी को लगातार बढ़ा रहे है,चीन रूस से गैस और हथियार खरीद रहा है तथा चीन की कई कम्पनियां रूस में बड़े पैमाने पर निर्माण में मदद कर रही है दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गलियारे वन बेल्ट-वन रोड परियोजना को लेकर 2017 में चीन में  द्वारा आयोजित शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन शामिल हुए जबकि  भारत ने इसके मार्ग को विवादित बताकर इस सम्मेलन का बहिष्कार किया था। इस दौरान चीन ने कश्मीर को लेकर भारत के हितों की अनदेखी की तो पुतिन इससे अप्रभावित नजर आएं।


इतिहास गवाह रहा है कि चीन की चुनौती से निपटने में अमेरिका और पश्चिमी देश भारत के साथ उस समय भी खड़े थे जब भारत के राजनयिक संबंध उनसे बहुत खराब थे और सहायता पाने की संभावना दूर दूर तक नहीं थी। 1962 के युद्द में अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत को युद्दक विमान समेत हथियार भेजने में बिल्कुल  देरी नहीं की थी और इसी दबाव के कारण चीन को एकतरफा युद्द विराम की घोषणा कर वापस पीछे हटने को मजबूर होना पड़ा था। गलवान घाटी विवाद पर भी अमेरिका का रुख भारत के पक्ष में साफ नजर आया था।


इस समय हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए भारत को अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के सामरिक सहयोग की जरूरत है। सैनिकों के लिए विंटर क्लोथिंग भारत अमेरिका और यूरोप से ख़रीदता है। भारत,जापान,अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया  के समूह क्वाड के साझा उद्देश्य को लेकर चीन के साथ रूस भी इसकी आलोचना करता रहा है। इस क्षेत्र में चीन ने कई देशों को चुनौती देकर विवादों को बढ़ाया है। भारत-चीन सीमा पर निगरानी रखने में भारतीय सेना को अमेरिकी एयरक्राफ़्ट से मदद मिलती है। इस समय सीमा पर चीन से बेहद तनाव पूर्ण संबंध है और युद्द की आशंका बनी रहती है। चीन पर दबाव बनाने के लिए रूस से ज्यादा अमेरिका और पश्चिमी देश मददगार हो सकते है और  उनसे मिलने वाली सामरिक सहायता की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।


1950 के दशक में भारत के ख्यात राजनयिक कृष्ण मेनन ने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा था कि हमें गले लगाने की कोशिश न करें,हम अपना दोस्त खुद चुनते है1962 के चीन से युद्द में कृष्ण मेनन ही भारत के लिए खलनायक बन गए थे। चीन से युद्द के छह दशक होने को आएं है लेकिन चुनौतियां वहीं की वहीं है। भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर के तेवर अमेरिका और पश्चिमी देशों को लेकर बेहद सख्त है वहीं ये देश चीन और रूस की जिस भागीदारी के प्रति भारत को आगाह कर रहे है,उसे भी नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता। अंततः अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है और न ही कोई स्थाई शत्रु होता है।

दक्षिण एशियाई का संकट,जनसत्ता south asia janstta

जनसत्ता


 

            

 भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण,राजनीतिक अस्थायित्व और आतंकवाद से प्रभावित अति संवेदनशील क्षेत्रों में शुमार दक्षिण एशिया विश्व शांति के लिए चुनौती बढ़ाता रहा है सबसे अधिक और सबसे घनी आबादी वाले इस भौगोलिक क्षेत्र में तक़रीबन दो अरब लोग बसते है और यह दुनिया की कुल आबादी का एक चौथाई है किसी भी वैश्विक आर्थिक संकट का सामना इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा पड़ता है और भुखमरी का संकट गहरा जाता है पिछले दशक में दक्षिण  एशिया में यूनिसेफ ने दस करोड़ लोगों के भूखा रहने को मजबूर होने की आशंका जताई थी और इस समय इस संख्या में भारी इजाफा हो गया है


 

वैश्विक भुखमरी सूचकांक की हालिया रिपोर्ट में पाकिस्तान,बांग्लादेश,नेपाल और श्रीलंका की स्थिति बेहद निम्नतम बताई गई है जलवायु परिवर्तन और कोविड महामारी से भुखमरी का संकट तो बढ़ा ही है साथ ही शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार की समस्याएं भी विकराल हो गई है  दक्षिण एशिया के कई देश राजनीतिक उथल पुथल के शिकार रहे है और भारत को छोड़कर अन्य देशों में अस्थिरता का अंदेशा बना रहता है  दक्षिण एशिया के देशों में आपसी सहयोग के लिए  दक्षेस की स्थापना 1985 को गई थी और इस संगठन का उद्देश्य दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग से शांति और प्रगति हासिल करना बताया गया था लेकिन विभिन्न देशों के बीच विवाद इस पर पूरी तरह हावी रहे और इसी का परिणाम है कि दुनिया की बड़ी आबादी वाला यह संगठन आर्थिक समस्याओं का समाधान करने में विफल रहा है


 

नेपाल,श्रीलंका और मालद्वीप जैसे देश पर्यटन पर निर्भर रहे है और कोविड के प्रभाव के कारण इनकी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है रूस युक्रेन युद्द के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमत से महंगाई आसमान पर है और लोगों का जीना मुश्किल हो गया है विदेशी मुद्रा की कमी किसी देश की अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावित कर सकती है,यह खतरा पाकिस्तान पर भी मंडरा रहा है पारंपरिक तौर पर माना जाता है कि किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार कम से कम 7 महीने के आयात के लिए पर्याप्त होना चाहिए लेकिन दक्षिण एशिया के कई देश दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गए है


 

नेपाल के पास अभी जितनी विदेशी मुद्रा बची है उससे सिर्फ़ छह महीनों का आयात बिल ही भरा जा सकता है श्रीलंका ने विदेशी क़र्ज़ों के भुगतान को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है श्रीलंका अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद से क़र्ज़ों के भुगतान करने की कोशिश कर रहा है इसके अलावा श्रीलंका भारत और चीन जैसे देशों से भी मदद लेने की कोशिश कर रहा है क़रीब  तीन सौ अरब डॉलर की पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट का सामना कर रही है  श्रीलंका में अफरा तफरी का माहौल है,नेपाल के लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है वहीं मालद्वीप मदद के लिए भारत की ओर देख रहा है


 

नेपाल करीब 62 फीसदी विदेशी व्यापार भारत से करता है और करीब 14 फीसदी चीन से नेपाल की सबसे बड़ी समस्या वहां राजनीतिक अस्थायित्व है और चीन इसका फायदा उठाकर उसे कर्ज के जंजाल में फंसा चूका है विकास के नाम पर चीन द्वारा दिया जा रहा कर्ज और उसकी जटिलताओं के जाल में नेपाल के साथ पाकिस्तान,श्रीलंका और मालद्वीप भी उलझते जा रहे है दक्षिण एशिया में श्रीलंका,नेपाल और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भारी व्यापार घाटे से जूझ रही है इसके साथ ही तेल की बढ़ती क़ीमतें और मज़बूत होता डॉलर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भारी पड़ रहा है श्रीलंका की मुद्रा रुपये भी डॉलर की तुलना में हर दिन नई गिरावट की तरफ बढ़ रही है पाकिस्तान को लगातार चालू खाते और बजटीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है,विदेशी कर्ज़ लगातर बढ़ रहा है,मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा है,निवेशकों के आत्मविश्वास में तेज़ी से कमी आ रही है और देश बेहद ग़रीबी की स्थिति में है


 

चीन जैसी विदेशी संस्थाओं पर बहुत अधिक निर्भरता ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमज़ोर बना दिया है इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान के पास अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए कोई विदेशी जमा पूंजी शेष नहीं बची है। नेपाल और श्रीलंका की भी कुछ यही स्थिति है। दक्षिण एशिया में अफ़ग़ानिस्तान का मानवीय संकट बेहद गंभीर अवस्था में पहुंच गया है तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश में गरीबी,सूखा और बिजली की कमी की लोग बेहाल है यहां दो करोड़ से ज्यादा लोगों पर भुखमरी का संकट गहरा रहा है और बिना तनख्वाह के सरकारी नौकरी करने को मजबूर लोगों की ज़िंदगी मुश्किल होती जा रही हैतालिबान के सत्ता में काबिज होने के पहले जब तक अशरफ़ ग़नी के नेतृत्व वाली सरकार थी,तब तक अफगानिस्तान की जीडीपी का 43 फीसदी हिस्सा विदेशी मदद से आता था तालिबान के आने के बाद वैश्विक आर्थिक मदद तो बंद हुई है बल्कि अमेरिका ने उस पर कई प्रतिबंध भी लगा दिए हैं अफ़ग़ान सरकार की संपत्ति,केंद्रीय बैंक का रिज़र्व सब फ्रीज़ कर दिया गया है प्रतिबंधों के कारण वहां की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है


आर्थिक तंगी का असर देश में दिखने लगा है और लोगों में तालिबान का विरोध बढ़ रहा है। तालिबान इससे बचने और उबरने के लिए तस्करी को बढ़ावा दे सकता है। अफगानिस्तान अफीम के उत्पादन के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता हैतालिबान पैसा बनाने के लिए अफीम की खेती को बढ़ावा दे सकता है जिससे नशीले पदार्थों का कारोबार फलने फूलने की आशंका गहराने लगी है। इसका सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। तालिबान की सत्ता हेरोइन के अवैध कारोबार को बढ़ावा देती है तो भारत उसके लिए बड़ा बाज़ार है। भारत में संगठित अपराधियों के साथ आतंकवादियों का मजबूत  गठजोड़ है। मादक पदार्थों की तस्करी,हथियारों की तस्करी,मानव तस्करी,जाली मुद्रा,साइबर अपराध,मनी लांड्रिंग से लेकर दंगे भड़काना,साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाना और सामरिक सूचनाओं को लीक करने जैसे संवेदनशील मामलों में अपराधी आतंकियों के मददगार होते है। मादक द्रव्यों का चलन तो बहुत पुराना है लेकिन इसमें अथाह और आसान धन की सुलभता से माफिया ने इसका जाल विश्वव्यापी बना दियाइसे सरकारी मान्यता न मिलने के बाद भी माफिया के साथ,पुलिस,प्रशासन,गुप्तचर एजेंसियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाते हैमादक द्रव्यों के तस्करों के साथ अपराधियों का गठजोड़ पनपता है और इसके बाद,अवैध मुद्रा,मानव तस्करी और अवैध हथियारों का कारोबार इन्हें आतंकवाद से जोड़ देता हैमादक पदार्थों की तस्करी के साथ,केमिकल निर्माण और आतंकियों से संबंधों का त्रिकोण व्यापक तबाही का सबब बन सकता है


भारत की भौगोलिक स्थिति इस त्रिकोण के बेहद मुफीद हैबर्मा,थाईलैंड और लाओस इसके कारोबार को दुनिया में फैलाते है और माफिया के लिए यह गोल्डन ट्रेंगल माना जाता है। देश के उत्तर पूर्वी राज्यों की सीमा बिलकुल सुरक्षित नहीं है बंगाल के कई इलाके तस्करी के केंद्र के रूप में कुख्यात हैपाकिस्तान-अफगानिस्तान और ईरान के गोल्डन क्रिसेंट से भारत जुड़ा हुआ हैपाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई ने इसी इलाके का फायदा उठाकर अवैध पैसों से आतंकवाद  को  खूब बढ़ाया है। पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता से वहां की फौज को बढ़ावा मिलता है और यह भारत की सुरक्षा के लिए संकट बढ़ने के संकेत होते है।


श्रीलंका में सरकार के कमजोर होने से तमिल समस्या एक बार फिर उभर सकती है।  लिट्टे की समाप्ति के एक दशक बाद वहां रहने वाले तमिल भारत के तमिलनाडु राज्य की ओर रुख कर सकते है। तमिल समस्या का किसी भी स्थिति में बढ़ना भारत की सामरिक और आंतरिक सुरक्षा के इए संकट बढ़ा सकता है। हिन्द महासागर से जुड़े मालद्वीप में भारत विरोधी प्रदर्शन बड़े पैमाने पर हो रहे है इसके बाद भी भारत सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अपने इस पड़ोसी देश को करोडो डॉलर की वित्तीय सहायता दे रहा है। भूटान को लेकर भी भारत ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाएं है। भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम इस देश का प्रबन्धन भारत सम्हालता रहा है और उसकी पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की प्रभावी भूमिका होती है। अभी तक भूटान भारत के लिए अन्य देशों से बेहतर सहयोगी साबित हुआ है।   



दक्षिण एशिया के कई देशों की आंतरिक स्थिति इस समय बेहद चिंताजनक हैमहंगाई और गरीबी बढ़ने से असमानता का स्तर लगातार बढ़ रहा है,स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होकर आम जनता से दूर हैभारत जैसी लोक कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए न तो सरकारों के पास पैसा है और न ही कोई दीर्घकालीन योजनाबच्चें लगातार स्कूल से दूर हो रहे हैदक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में ई-लर्निंग के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं है और इसके कारण शिक्षा अपने निम्नतर स्तर तक जा सकती है। इससे अपराध बढ़ सकते है और धार्मिक उन्माद को भी बढ़ावा मिल सकता है। दक्षिण एशिया की बहुसांस्कृतिक पहचान है और सभी देशों को अप्रिय स्थिति उत्पन्न न होने देने के लिए सतर्क रहने की जरूरत होती है। इस समय आवश्यकता इस बात की है कि दक्षेस के देश आपसी व्यापार और सम्बन्धों को बेहतर करके आपसी सहयोग को बढ़ाएंहालांकि वापसी विवाद के चलते यह संभव होता नहीं दिखाई पड़ता। चीन जैसे देश का हस्तक्षेप दक्षिण एशिया के देशों के लिए घातक साबित हो रहा है। चीन  इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कर्ज की कूटनीति को अपना रहा है। उसने अपने सामरिक हितों को पूरा करने के लिए कई देशों में सैन्य अड्डे भी बना लिए है।  भारत का व्यवहार दक्षिण एशिया के देशों से बड़ा मित्रवत रहा है और भारत की तरफ से पड़ोसी देशों को  वित्तीय सहायता सर्वाधिक अनुकूल शर्तों पर  दी जाती है। जबकि चीन की कर्ज की कठिन शर्तों के प्रकोप को श्रीलंका बूरी तरह भोग रहा है। पाकिस्तान और श्रीलंका के पास चीन के कर्ज का सूद देने के पैसे नहीं है।    


बहरहाल दक्षिण एशिया के देशों को यह समझने की जरूरत है कि उसकी जरूरत हथियार नहीं बल्कि  करोड़ों लोगों की रोजी रोटी है। इस क्षेत्र से महाशक्तियों को दूर रखने और मानवीय संकट से उबरने के लिए साझा प्रयासों की जरूरत है, यह धार्मिक.सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर समन्वयकारी हो सकते है। दक्षिण एशिया में लोगों की एक दूसरे देशों में आवाजाही बढने से रोजगार के अवसर बढ़ेगे और यह इस क्षेत्र की शांति स्थापना की उम्मीदों को भी मजबूत करेगा। दक्षेस की भावना को मजबूत करने और आपसी सहयोग बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है नहीं तो मानवीय संकट विकराल रूप धारण कर लेगा।    

 

बस्तर को बदलता सीआरपीएफ,राष्ट्रीय सहारा 227 Bn Crpf sukma bastar

 राष्ट्रीय सहारा


                    

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से 60 किलोमीटर दूर नक्सलवाद घटनाओं के लिए अतिसंवेदनशील माना जाने वाले सुकमा जिले के तोंगपाल में बाज़ार रोशन है। हर गुरुवार को यहां हाट लगता है जिसमें दूर दराज के आदिवासी आते है। छत्तीसगढ़ को तेलांगना और आंध्रप्रदेश से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर स्थित तोंगपाल में कुछ सालों पहले नक्सली खुले आम घूमते थे। लाल झंडा और नक्सली राज को यहां देखा जाता था।  लेकिन जब से सीआरपीएफ की 227 बटालियन यहां तैनात की गई है,बस्तर का यह दक्षिणी अंचल पूरा बदल गया है।


तोंगपाल में कन्या और बालक हॉस्टल समेत तेंदुपत्ता की मंडी लगती है। यहां कॉलेज भी खुल गया है।  सीआरपीएफ का एक बेस कैम्प कोयला भट्टी में भी है। इसके पूर्व में नजदीक की चंदामेटा की पहाड़िया है जो नक्सलियों की शरण स्थली मानी  जाती थी। इसके पास ही कटे कल्याण की  पहाड़ियां है,जहां हिडमा समेत कई नक्सली के आने का अंदेशा बना रहता है।

नक्सली हमलों के कारण अतिसंवेदनशील समझे जाने वाले दक्षिणी बस्तर के कई इलाकों में सीआरपीएफ सुरक्षा के साथ जनकल्याण को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। लोगों का डर दूर करने और खेलों की और आदिवासी युवाओं को आकर्षित करने के लिए तोंगपाल के खेल मैदान में सीआरपीएफ की टीमें क्रिकेट मैच खेल रही है,जहां उप कमांडेंट बृज मोहन राठौर,बबन कुमार सिंह और दुष्यंत गोस्वामी उनका हौसला बढ़ाते नजर आते है। यह इलाका बेहद खतरनाक माना जाता था। 2014 में यहीं से महज एक किलोमीटर दूर नक्सलियों ने आईइडी ब्लास्ट करके 15 सैन्य कर्मियों की हत्या कर दी थी।


सुकमा के नक्सली प्रभाव से ग्रस्त और अतिसंवेदनशील माने जाने  वाली दरभा घाटी,झीरम घाटी,तोंगपाल,कोयला भट्टी और सुदूरवर्ती कुमा कोलेंग में सीआरपीएफ तैनात है। झीरम घाटी में 25 मई 2013 को नक्सलियों ने सलवा जुडूम के संस्थापक महेंद्र कर्मा,पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल,कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी।  इस वीभत्स घटना के बाद सीआरपीएफ की 227 बटालियन  को यहां भेजा गया था। 22 अप्रैल 2013 को भोपाल में स्थापित इस बटालियन ने सुकमा में साल 2014 के अंतिम महीने से काम करना शुरू किया। इसके बाद नक्सलियों पर इसका ऐसा खौफ है कि वे पिछले आठ सालों में बटालियन के एक भी जवान पर एक भी हमला करने में न तो कामयाब हो पाए है और न ही सीआरपीएफ ने उन्हें ऐसा कोई अवसर दिया है।


नक्सलियों ने कई बार आईइडी तो लगायें लेकिन चौकस और सतर्क बटालियन के जांबाजों ने समय रहते उन्हें निष्प्रभावी कर दिया।  इस साल जनवरी में एक लाख की इनामी नक्सली मुन्नी समेत कई नक्सलियों को सीआरपीएफ ने मार गिराया था,यही नहीं नक्सली बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण करने को मजबूर भी हो रहे है। पिछले महीने 10  नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था जिसमे पांच हजार से लेकर एक लाख तक के नक्सली थे,जिनसे भारी और विध्वंसक हथियार बरामद किए गये। कमान्डेंट पी.मनोज कुमार इसका श्रेय जवानों को देते है। वे कहते है कि केंद्र और राज्य सरकार का इन इलाकों में विकास को लेकर बेहद अच्छा समन्वय है और सीआरपीएफ को इसका खूब फायदा मिल रहा है। वे बताते है कि हमारा साफ सन्देश है सुरक्षा भी,शांति भी और विकास भी।




हालांकि यह ऐसे इलाके है जहां हर समय नक्सली हमले का खौफ बना रहता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने जिन 405 कुख्यात नक्सलियों की पहचान की है,उसमे से अधिकांश इन्हीं इलाकों में प्रभावशील माने जाते है और उन पर 5 हजार से लेकर 25 लाख तक के इनाम घोषित किए गए है। सीआरपीएफ का एक बेस कैम्प सुकमा के सुदूरवर्ती इलाके कुमा कोलेंग में है जिसके दक्षिण पश्चिम दिशा में उड़ीसा के नक्सल प्रभावित मलकानगिरी की  कुख्यात पहाड़ियां है। इन इलाकों में नक्सल की कुख्यात बस्तर डिविजन प्रभावशील रही है। मलकानगिरी के कलेक्टर आरवी कृष्णा का नक्सलियों ने अपहरण फरवरी 2011 में किया था और सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का अपहरण 2012 में नक्सलियों ने किया था।  राष्ट्रीय राजमार्ग 30 की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सीआरपीएफ के पास है। जब से सीआरपीएफ की  227 बटालियन को यहां तैनात किया गया है,कोई भी नक्सली हमला कामयाब नहीं हो सका है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग को छत्तीसगढ़ के विकास की जीवन रेखा माना जाता है और नक्सली इसे बाधित करने की फ़िराक में रहते है। 


सीआरपीएफ दुर्गम और खतरनाक नक्सली प्रभाव वाले इलाकों में रोड निर्माण में सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन इलाकों में  मोबाईल की सुविधा उपलब्ध कराना नामुमकिन समझा जाता था क्योंकि टावर को नक्सली उड़ाने की धमकी दे चूके थे,लेकिन             सीआरपीएफ  की मुस्तैदी से नक्सली कामयाब नहीं हो सके और कई टावर लगे जिससे विकास को नई दिशा मिली। यह समूचा इलाका बिजली की सुविधा से महरूम था लेकिन अब यह रोशन हो गया है। सीआरपीएफ ने इस क्षेत्र के बच्चों को पुलिस और सेना में भर्ती होने के लिए जरूरी प्रशिक्षण सुविधा भी उपलब्ध करा रही है,इसके परिणाम सामने आ रहे है और नक्सली इससे परेशान है।


सीआरपीएफ आगे रहकर जनता से मिलती है और उनका सहयोग भी करती है। केंद्र और राज्य सरकार की सहायता से और उनकी योजनाओं को सामान्य जन तक पहुँचाने का काम सीआरपीएफ बखूबी कर रही है। आम ग्रामीण आदिवासियों को चिकित्सा सुविधाएँ,शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हेतु वाटर प्यूरी फायर,मनोरंजन और जागरूकता के लिए रेडियो,घर को रोशन करने हेतु सोलर लालटेन,महिलाओं को किचन हेतु कडाई,स्टील के घड़े,मलेरिया जैसी घातक बीमारी से बचाव हेतु मच्छरदानियां आदि सामग्री का वितरण,आम आदिवासी और गरीब बच्चों को कुपोषण से बचाव हेतु विटामिन समेत कई दवाइयों का नियमित वितरण किया जाता है।  


सीआरपीएफ इस क्षेत्र के बच्चों को पुलिस और सेना में भर्ती होने के लिए जरूरी प्रशिक्षण सुविधा भी उपलब्ध करा रही है,इसके परिणाम सामने आ रहे है और नक्सली इससे परेशान है। इस इलाके में पिछले 8 सालों में इस क्षेत्र में कोई अप्रिय घटना घटित नहीं हुई। सीआरपीएफ के जनकल्याण जुड़े  कार्यो के कारण लोगों का विश्वास उन पर बढ़ा है।

बस्तर के इलाके में शांति,सद्भावना और विकास की सीआरपीएफ की कोशिशों के बीच धार्मिक आयोजन से यहां रहने वाले लोग अभिभूत है। इस साल नवरात्र पर सुकमा के तोंगपाल  में स्थित सीआरपीएफ ने एक अनोखा आयोजन कर बेटियों की पूजा की,उन्हें उपहार दिए और एक भंडारे का आयोजन किया जिसमें दूर दराज के कई आदिवासी शामिल हुए। नक्सल से प्रभावित  माने जाने वाले छत्तीसगढ़ के अति संवेदनशील बस्तर में लोगों के सर्वांगीण विकास के लिए सीआरपीएफ लगातार कार्य कर रही है। इसके उजले परिणाम सामने आ रहे है। स्कूलों में शिक्षा बिना बाधित चल रही है,लोग बेखौफ होकर अपने काम में जुटे है। आदिवासी आसानी से बाज़ार पहुंचकर तेंदुपत्ता,शहद और महुआ बेचकर आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे है। इन इलाकों में सीआरपीएफ के सफल होने का एक प्रमुख कारण इस अर्द्धसैनिक बल का भ्रष्टाचार मुक्त होना भी है। जबकि नक्सल ग्रस्त इलाकों में अन्य संस्थाओं पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगते रहे है। जाहिर है सीआरपीएफ के कार्यो और योजनाओं से सीख कर अन्य अर्द्धसैनिक बल और संस्थाएं नक्सली क्षेत्रों में काम करें तो निश्चित ही आंतरिक सुरक्षा की इस बड़ी चुनौती से पार पाया जा सकता है।

मेरी आने वाली किताब,"सुकमा ग्राउंड जीरो" से....

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अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था और युद्द अपराध international court and war crime, prajatrntra

 प्रजातंत्र

                                                                   

युद्द में अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के अनुरूप व्यवहार पेचीदा प्रश्न रहा है।युद्द,संघर्ष या युद्द जैसे हालत में भी मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए 1949 में जेनेवा कन्वेंशन बनाया गया था और दुनिया के देशों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे इसके मापदन्डों के अनुसार व्यवहार सुनिश्चित करेंगे लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट और भयावह नजर आती है।दरअसल रुस के हमलें को झेलते यूक्रेन के लोगों पर बेतहाशा अत्याचार की कई घटनाएं सामने आ रही है।महिलाओं से बलात्कार करके उनकी हत्याएं की गई है,अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों को रूस की सेना लगातार निशाना बना रही है। लोगों के घरों को जलाया गया है और घायल लोगों को भी कोई भी  रियायत नहीं दी जा रही है।कुछ दिनों पहले  नीदरलैंड्स के द हेग में 38 देशों के प्रतिनिधियों की मुलाक़ात हुई।इन देशों ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट से रूस के ख़िलाफ़ कथित युद्ध अपराधों की जांच करने की गुज़ारिश की थी।


यह बेहद दिलचस्प है कि संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक समस्याओं के लिए अंतराष्ट्रीय न्यायालय तो बनाया लेकिन कोई जेल नहीं बनाई।ऐसे में अंतराष्ट्रीय न्यायालय किसी को युद्द अपराधी घोषित भी कर दे तब उस अपराधी को उसके स्वयं के देश में ही जेल में डालना होगा।सवाल यह उठता है कि पुतिन को क्या रूस की जेल में डाला जा सकता है।यूक्रेन युद्द में मानवीय गरिमा को तार तार करने वाले सैनिक भी तो पुतिन की योजना पर काम कर रहे है,जाहिर है उन्हें भी रूस की किसी जेल में नहीं डाला जा सकता।इंटरनेशनल कोर्ट में जिस व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला चलाया जाता है उसे कोर्ट में पेश करना बेहद ज़रूरी होता है, सवाल यह है कि पुतिन या उनके सैन्य अधिकारियों को कौन इंटरनेशनल कोर्ट में आने के लिए मजबूर कर सकता है।


श्रीलंका के वर्तमान राष्टपति गोताभाये राजपक्षे पर उनके देश में तमिल संघर्ष को दबाने को लेकर कई गंभीर आरोप लगे हुए है।राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे बहुसंख्यक सिंहली जनता के नायक बन माने जाते है। उनका संबंध परम्परावादी दल श्रीलंका पोदुजन पेरामुना से है जो आमतौर पर बहुसंख्यक सिंहलियों के हितों के प्रति उदार और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के लिए अपेक्षाकृत कठोर माना जाता है। गोटाभाया राजपक्षे पूर्व में देश के रक्षामंत्री रहे है। इनके कार्यकाल और आक्रामक नीतियों से तमिल पृथकतावादी संगठन एलटीटीई का खात्मा हुआ था।करीब एक दशक पहले ब्रिटेन के चैनल-फ़ोरने श्रीलंकास किलिंग फ़ील्डनामक एक डॉक्युमेंट्री  फिल्म के जरिए इसकी पुष्टि भी की थी कि श्रीलंकाई सेना ने तमिल छापामारों को 2009 में पूरी तरह तबाह कर दिया था और इस तरह 25 साल से लड़ा जा रहा युद्घ समाप्त हुआ था।फ़िल्म में तमिल पुरूषों की हत्या करते हुए और तमिल महिलाओं की नग्न लाशों को दिखाया गया है।वीडियो देखने से लगता है कि तमिल महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न भी हुआ था।संयुक्त राष्ट्र ने एक विशेष जांच में यह पाया कि तमिल नागरिकों की हत्या करते हुए श्रीलंकाई सेना के वीडियो प्रामाणिक हैं।


श्रीलंका में कई तमिलों को बंदी बनाया गया था जिन पर बाद में श्रीलंका की सेना ने खूब अय्ताचार किए गये थे।जेनेवा कन्वेंशन में युद्धबंदियों को अमानवीय हालात में नहीं रखा जा सकता और युद्धबंदियों पर अत्याचार पर मनाही है लेकिन ऐसा करने पर क्या होगा ये स्पष्ट ही नहीं है।


मध्यपूर्व में यमन के हालात बद से बदतर हो गए है।यहां संयुक्त राष्ट्र की  ऐसी कोई भी एजेंसी नहीं है जो युद्द अपराध पर नजर रख सकें।हुती और यमन के अन्य जातीय समूहों के बीच हिंसक संघर्ष करीब एक दशक से चल रहा है जिससे इस देश की व्यवस्थाएं ही अस्त व्यस्त हो गई है।देश में युद्ध  के साथ भुखमरी से मौते हो रही है।यमन की 3 करोड़ की आबादी का क़रीब 80 फ़ीसदी हिस्सा जीने के लिए वैश्विक समुदाय द्वारा दी जा रही मदद पर निर्भर है।संयुक्त राष्ट्र  के अनुसार  अब तक देश में  करीब चार लाख लोग मारे जा चुके हैं,इस युद्ध में अब तक दस हज़ार से ज़्यादा बच्चे मारे जा चुके हैं या ज़ख्मी हो गए हैं।लड़ाई के चलते वहां अब तक 40 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं।देश के 3 करोड़ लोगों में से  पौने दो करोड़ लोगों को अभी पेट भरने के लिए मदद की ज़रूरत है।अनुमान है कि इस साल के अंत तक यह गिनती बढ़कर  करीब दो करोड़ हो जाएगी।यमन के 50 लाख लोग भुखमरी के कगार पर खड़े हैं,जबकि क़रीब 50 हज़ार लोग पहले से ही भुखमरी जैसे हालातों का सामना करने को मजबूर हो गए है।सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन  द्वारा यमन में लगातार हमले किए जा रहे है,अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न तो सऊदी अरब के किंग हाजिर होंगे और न ही उनके सहयोगी।ऐसे में यह मानवीय संकट बढ़ता ही जा रहा है और इसके फ़िलहाल रुकने की कोई संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आती।




वहीं मध्यपूर्व के एक और देश सीरिया का हालात भी बेहद खराब है।संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सीरिया के सुरक्षा बलों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों का दमन करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से मानवता के ख़िलाफ़ अपराध किए हैं।सीरिया में बच्चों समेत आम नागरिकों की हत्याएं की गईं,यातनाएं दी गई और उनका यौन शोषण तक किया गया।मानवाधिकार मामलों की संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख ने कहा है कि सीरिया में हुई एक जाँच से मिले सबूतों के मुताबिक़ देश में युद्ध अपराध उच्चतम स्तरसे अधिकृत थे।इसमें राष्ट्रपति बशर अल-असद का नाम भी शामिल है।सीरिया में संयुक्त राष्ट्र के जाँच आयोग को मानवता के विरुद्ध अपराध के और युद्ध अपराध के बेहद गंभीर सबूत मिले हैं लेकिन इस पर कार्रवाई की कोई संभावना दूर दूर तक नहीं नजर आती।


दक्षिण एशियाई देश म्यांमार की सैन्य सरकार वहां के नागरिकों को लगातार निशाना बना रही है।संयुक्त राष्ट्र में सेना द्वारा मानवता के खिलाफ व्यापक अपराध और सुनियोजित हमलों के साक्ष्य भी मौजूद है।जेनेवा कंन्वेंशन में कहा गया है कि युद्ध के समय आम नागरिकों के साथ किसी भी तरह का अमानवीय व्यवहार नहीं किया जाएगा। दुनिया भर की कई शीर्ष सत्ताएं अंदर और बाहर आम नागरिकों पर युद्द थोप रहे है,उन्हें यातनाएं दे रहे है,सामूहिक नरसंहार कर रहे है और मानवता को चुनौती भी दे रहे है।अफ़सोस,अंतर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था आधी अधूरी है और अधिनायकवादी ताकतों को इसका भरपूर फायदा मिल रहा है।

कश्मीर पर सवाल शरीफ की राजनीतिक मजबूरी kshmir shahbaz sharif pak rashtriy sahara

राष्ट्रीय सहारा

                                                

शहबाज़ शरीफ पाकिस्तान के कब तक प्रधानमंत्री रहेंगे,यह वे स्वयं भी नहीं जानते लेकिन वे यह जरुर जानते है कि 2018 के आम चुनावों में इमरान खान को पाकिस्तान की फौज का बड़ा समर्थन हासिल था। फौज ने समूची चुनावी व्यवस्था का मनमाना संचालन किया। न्यायपालिका पर दबाव बनाकर नवाज शरीफ के चुनाव पड़ने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इसके बाद इमरान खान सेना के प्रभाव से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए। जब इमरान खान से सेना पर हावी होने की कोशिश की तो सेना ने उन्हें बड़ी चालाकी से सत्ता से बेदखल कर दिया।


ऐसे में शहबाज़ शरीफ सेना और जनता को साथ लेने की कोशिशों में प्रधानमंत्री बनते ही जुट गए और उन्होंने पहला दांव कश्मीर का खेला। दरअसल  पाकिस्तान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के केंद्र में कश्मीर को रखना इस देश के राजनेताओं की ऐसी मजबूरी बन गया है जिससे वे बाहर निकल ही नहीं सकते। पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ ने पाकिस्तान की भारत को लेकर नीति के सम्बन्ध में कश्मीर पर वही नजरिया रखा जो उनके पूर्व के प्रधानमंत्री इमरान खान का हुआ करता था। जाहिर है सरकार बदलने के साथ पाकिस्तान की भारत को लेकर नीतियों में किसी बदलाव की गुंजाइश  को शहबाज़ शरीफ ने अपने पहले ही भाषण में खत्म कर दिया। डेढ़ साल के बाद पाकिस्तान में आम चुनाव है और शाहबाज़ शरीफ का कार्यकाल इतने  ही समय का हो सकता है,उनसे ज्यादा अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए। शरीफ यह भलीभांति जानते है कि कश्मीर को लेकर उनके दृढ़ता के दिखावे से न केवल पाक की जनता का उन्हें समर्थन हासिल होगा बल्कि वे सेना का समर्थन भी हासिल कर सकते है। इस समय कश्मीर पर जहां शहबाज़ विष वमन करते दिखाई देंगे वहीं अमेरिका पर उनकी नीति अलग हो सकती है और यह उनकी मजबूरी भी होगी। वे अपने पूर्ववर्ती इमरान खान से अलग हटकर अमेरिका के समर्थन की कोशिश भी कर सकते है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान की सेना लोकतंत्र के मुखौटे के रूप में शरीफ का इस्तेमाल कर अमेरिका से आर्थिक मदद हासिल करना चाहती है जो फ़िलहाल रुकी हुई है। 2018 में तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान की सैनिक सहायता और आर्थिक सहायता रोकने का ऐलान करते हुए कहा था कि,हमने पाकिस्तान को पिछले 15 सालों में बेवकूफों की तरह 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और उन्होंने इसके बदले में हमारे नेताओं को बेवकूफ समझकर झूठ और धोखे से अलावा कुछ नहीं दिया है। वे आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं जिनका हम अफगानिस्तान में शिकार कर रहे हैं,अब और नहीं। इन वैश्विक आलोचनाओं और ग्रे वॉच लिस्ट में होने के बाद भी पाकिस्तान ने साढ़े तीन हजार से ज्यादा संदिग्धों को आतंकवाद की वॉच लिस्ट से ही हटा  दिया था। जिसकी पश्चिमी देशों में खासतौर पर काफी आलोचना हुई।


शहबाज़ शरीफ को अमेरिका को विश्वास में लेकर आगे बढना है और कश्मीर पर विष वमन करके जनता और सेना का विश्वास भी मजबूत करना है। वैसे भी अमेरिका के हित पाकिस्तान के लोकतंत्र में पूरे होते नहीं  दिखाई देते। गौरतलब है कि अमेरिका ने पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही को प्रश्रय देते हुए  अय्यूब ख़ान,जनरल याह्या खान,जनरल ज़िया-उल-हक़ और जनरल परवेज मुशर्रफ को भरपूर समर्थन दिया। सेना ने अमेरिका की आर्थिक मदद को देश के विकास से ज्यादा सैन्य सुविधाओं के लिए खर्च किए। 


शरीफ स्वयं व्यवसायी है और सेना इसका बड़ा लाभ ले सकती है। पाकिस्तान के आर्थिक हितों और विभिन्न व्यवसायों में सैन्य अधिकारियों की बड़ी भागीदारी और निजी हित रहे है। पाकिस्तान की आम जनता महंगाई से भले ही त्रस्त हो लेकिन सैनिकों की सुविधाओं से कभी समझौता नहीं किया जा सकता। सरकारें सेना के दबाव में ही देश का आर्थिक बजट तय करती है।  शरीफ अपने व्यवसायी हितों के साथ राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए कश्मीर के नेताओं को राजनीतिक समर्थन बढ़ाते दिख सकते है।  वैसे भी कश्मीर के नेताओं से का रुख पाकिस्तान की सत्ता से सम्बन्ध गांठे रखने का रहा है और महबूबा मुफ़्ती  इस प्रकार की राजनीति में माहिर समझी  जाती है। महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद अपने राजनीतिक  भविष्य को लेकर गहरे असमंजस में है। उनकी राजनीतिक जमीन खिसक गई है। महबूबा अनुच्छेद 370 के पक्ष में बेहद मुखर रही है और उसे पुन: बहाल करवाने के लिए वह तालिबान का सहारा लेकर कश्मीर को आतंक के जंजाल में फिर से धकेलने के कुत्सित प्रयास कर रही है। कश्मीर में चरमपंथ को सामाजिक स्वीकार्यता के साथ राजनीतिक समर्थन देने का काम महबूबा मुफ़्ती कई सालों से करती रही है। वह राजनीतिक सभाओं में राजनीतिक कैदियों को रिहा करने,सभी उग्रवादियों से वार्ता करने और आतंकवादियों के लिए कहर बने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को बंद करने की वकालत करती रही है। अपने स्वायत्तता प्रेम के कारण घाटी के अलगाववादियों एकमात्र पसंद महबूबा ही मानी जाती है। पाकिस्तान,आईएसआई,तालिबान और कश्मीर में आतंकवाद का गहरा संबंध रहा है। आतंकी संगठनों को लेकर महबूबा आमतौर पर खामोश रहती है।  महबूबा वहीं भाषा बोलती रही है जो पाकिस्तान को पसंद हो। अब शहबाज़ शरीफ और महबूबा दोनों अपनी राजनीतिक हसरतों को पूरा करने के लिए एक दूसरे का सहारा ले सकते है। 


इमरान खान की लोकप्रियता को कम करके उन्हें आने वाले आम चुनावों में किसी राजनीतिक लाभ न लेने देने से रोकना शाहबाज़ शरीफ का प्रमुख लक्ष्य होगा  ऐसे में वे भारत विरोध और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में पाकिस्तान के अलगाववादी और कट्टरपंथी समूहों की लामबंद करने के प्रयास में और तेजी से ला सकते है। वे भारत के विरुद्ध भ्रामक प्रचार को बढ़ावा देते दिख सकते है।  प्रचार आधुनिक समय में एक प्रभावशाली साधन है जिसका उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनीति में विदेश नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आर्थिक और सैनिक शक्ति के साथ किया जा रहा है। शरीफ कम समय में ज्यादा राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिशों में पाकिस्तान विदेशों में बसे अपने नागरिकों के जरिए कुप्रचार के कूटनीतिक हथियार से दुनियाभर में भारत की छवि को खराब करने का अभियान बढ़ा सकते है।   लेकिन उनके इन प्रयासों से न कश्मीर का भला होगा,न ही पाकिस्तान का। यह बात और है की शहबाज़ शरीफ के राजनीतिक हित पूरे हो सकते है।  बहरहाल अल्पकालीन प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के दौर में भारत से अच्छे संबंधों की बात बेमानी ही होगी। 

brahmadeep alune

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