पाकिस्तान में सेना कैसे हावी हुई, pak sena democrecy prajatntra

 प्रजातंत्र                               


पाकिस्तान के जन्म के बाद अगले 15 सालों में वहां की राजनीतिक परिस्थितियां इतनी तेजी से बदली की भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के बारे में यह किस्सा मशहूर  हो गया कि, वे तो इतनी जल्दी धोतियां भी नहीं बदलते जितनी जल्दी पाकिस्तान अपने प्रधानमंत्री बदल लेता है


दरअसल पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या 1951 में कर दी गईपाकिस्तान का पहला संविधान 1956 में लागू किया गया,लेकिन महज दो सालों में संसदीय प्रणाली ध्वस्त हो गई देश के पहले राष्ट्रपति सैयद इस्कंदर अली मिर्ज़ा को खुद के ही बनाएं गणतान्त्रिक संविधान से इतनी चिढ़ थी कि उन्होंने अगले दो सालों में पांच प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा,चौधरी मोहम्मद अली,हुसैन शहीद सोहरावर्दी,इब्राहिम इस्माइल चुंद्रीगर और फ़िरोज़ ख़ान नून को पद से हटा दियावे यहीं नहीं रुके,1958 में पाकिस्तान के संविधान को निलंबित कर दिया,असेंबली भंग कर दी और राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबंधित करके पाकिस्तान के इतिहास का पहला मार्शल लॉ लगा दिया इसके साथ ही उस वक़्त के सेना प्रमुख जनरल अयूब ख़ान को मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बना दियामतलब पाकिस्तान के जन्म के महज 11 साल में ही सैन्य ताकतों को पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का वह अवसर दिया गया जिससे इस इस्लामिक गणराज्य में लोकतंत्र स्थापित होने की संभावना ही धूमिल हो गई


राष्ट्रपति जनरल इस्कंदर मिर्ज़ा ने पाकिस्तान के लोगों को समझाते हुए अपने फैसले को सही ठहराया कि राजनीतिक रस्साकशी और भ्रष्टाचार से जनता परेशान है,राजनीतिक पार्टियों ने  लोकतंत्र का मजाक बना दिया है और इससे देश संकट में पड़ गया हैइतिहास गवाह है की इसके बाद पाकिस्तान में लोकतांत्रिक चुनी हुई सरकारों को भंग करने का सिलसिला चल पड़ा और हर बार उन पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक अक्षमता के आरोप गढ़कर सैन्य शासन सत्ता में काबिज हो गया


1965 में भारत से युद्द के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान सेना प्रमुख भी थे बाद में उन्होंने सत्ता अपने आर्मी चीफ जनरल याह्या खान को सौंपीयाह्या खान की सनक और अत्याचार से ही पाकिस्तान 1971 में टूट गया और बंगलादेश बनाविभाजन के बाद करीब 16 साल पाकिस्तान में लोकतंत्र को स्थापित करने के प्रयास किए गए लेकिन 1977 में सैन्य प्रमुख जिया-उल-हक ने जुल्फिकार अली भुट्टों सरकार को अक्षम बताकर बर्खास्त कर दिया और स्वयं देश के राष्ट्रपति बन गएबाद में वे करीब 11 साल तक देश के राष्ट्रपति रहे,उन्होंने लोकप्रिय होने के लिए देश में व्यापक इस्लामीकरण को बढ़ावा दियाअमेरिका की शह पर पाकिस्तान में आतंकी केंद्र बनाएं और अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना को बाहर निकालने के लिए जिहाद को राजनीतिक हथियार बनायाबाद में यह पाकिस्तान और पूरी दुनिया के लिए आतंक का नासूर बन गयाउनके नक्शें कदम पर जनरल परवेज मुशर्रफ भी चले और  उन्होंने अपनी राजनीतिक हसरतें पूरी करने के लिए बेनजीर भुट्टों की हत्या करवा दी


यह माना जाता है कि 2018 के आम चुनावों में इमरान खान को पाकिस्तान की फौज का बड़ा समर्थन हासिल थाफौज ने समूची चुनावी व्यवस्था का मनमाना संचालन कियान्यायपालिका पर दबाव बनाकर नवाज शरीफ के चुनाव पड़ने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया इमरान खान सत्ता में आएं तो उन्हें विपक्षी दलों ने इलेक्टेड नहीं बल्कि सेलेक्टेड कहा इमरान खान सेना के दबाव में इस प्रकार काम करते रहे की आंतरिक के साथ विदेशीं मामलों में भी वे नाकाम साबित हुएपिछले साल तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्ज़े के बाद जब उसके मंत्रिमंडल की कवायद चल रही थी उस दौरान दुनिया भर में पाकिस्तान के आईएसआई प्रमुख  लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद का काबुल जाना चर्चा का विषय बन गया था इससे इमरान खान की वैश्विक छवि ही धूमिल हुई 


यह भी बेहद दिलचस्प है कि अमेरिका जैसे देशों ने पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही को प्रश्रय देते हुए  अय्यूब ख़ान,जनरल याह्या खान,जनरल ज़िया-उल-हक़ और जनरल परवेज मुशर्रफ को भरपूर समर्थन दियासेना ने अमेरिका की आर्थिक मदद को देश के विकास से ज्यादा सैन्य सुविधाओं के लिए खर्च किए पाकिस्तान के आर्थिक हितों और विभिन्न व्यवसायों में सैन्य अधिकारियों की बड़ी भागीदारी और निजी हित रहे है। पाकिस्तान की आम जनता महंगाई से भले ही त्रस्त हो लेकिन सैनिकों की सुविधाओं से कभी समझौता नहीं किया जा सकता। सरकारें सेना के दबाव में ही देश का आर्थिक बजट तय करती है।  देश में सेना और आईएसआई की आलोचना को अपराध माना जाता है। कुल मिलाकर दुनिया भर में पाकिस्तान की छवि एक ऐसे देश की बन गई है जहां सेना के समर्थन के बिना कुछ भी नहीं हो सकता


पाकिस्तान में राजनीतिक पार्टियों को व्यवस्था में पूरी तरह से हावी न होने देने को लेकर सेना सतर्क रही हैयही कारण है कि कोई भी सरकार मुश्किल से ही अपना कार्यकाल पूरा कर पाती हैचुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने के लिए सेना विपक्षी दलों  का सहारा भी ले लेती है,देश में व्यापक विरोध प्रदर्शन होते है और सेना देश की आंतरिक शांति भंग होने का खतरा बताकर सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार को अपदस्थ कर देती है


इस समय इमरान खान की सरकार संकट में हैउनके राजनीतिक प्रभाव को खत्म करने के लिए सेना ने विपक्षी दलों से हाथ मिला लिया हैइसीलिए इमरान खान ने पाकिस्तान की सेना पर निशाना साधते हुए और भारत की सेना की तारीफ करते हुए कहा है कि भारतीय सेना ईमानदार है और वे कभी देश की राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करतीयकीनन भारत के लिए यह अक्षरस: सही है लेकिन किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का यह कहना दुर्लभ है और उनकी हताशा का प्रतीक भी है


 

 

 

 

 

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