इमरान की बढ़ती मुश्किलें,imran pak janstta

जनसत्ता


अतिवाद,सत्ता की अधिनायकवादी प्रवृति,धार्मिक कट्टरता और सैन्य हस्तक्षेप  के साथ लोकतंत्र का संचालन संभव नहीं हो सकता,यही कारण है कि पाकिस्तान में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता का संकट गहरा गया हैअगले साल पाकिस्तान में आम चुनाव होने वाले है,उसके पहले पाकिस्तान के कई विपक्षी दल लामबंद होकर इमरान खान की सरकार को हटाने के लिए कृतसंकल्पित नजर आ रहे हैदेश में बढती महंगाई,बेतहाशा कर्ज,कट्टरवादी ताकतों की मोर्चाबंदी,महिलाओं पर  अत्याचार,देश के कई इलाकों में पृथकतावादी और चरमपंथी आन्दोलन तथा तालिबान की अफगानिस्तान में वापसी के बाद पाकिस्तान में आने वाले शरणार्थी संकट  ने इमरान सरकार की मुश्किलों को बढ़ा दिया हैवैसे इमरान खान को सेना के राजनीतिक मोहरे के तौर पर राजनीतिक पार्टियां प्रचारित करती रही है और उनकी सत्ता की वैधानिकता पर भी सवाल  उठाती रही है


 

गौरतलब है कि पाकिस्तान के जन्म से अब तक के समय के लगभग आधे वक़्त तक सेना ने सीधे तौर पर शासन किया हैयह भी माना जाता है कि लोकतांत्रिक सरकार में भी सेना का सुरक्षा और विदेशी मामलों में हस्तक्षेप रहता है  यदि कोई राजनीतिक दल सेना के हितों को प्रभावित करने की कोशिश करता है तो उसका पाकिस्तान की सत्ता में बने रहना मुश्किल रहा है।  पाकिस्तान में कोई भी राजनीतिक दल इतना मजबूत न हो कि वह सेना को चुनौती दे सके,इसे लेकर पाकिस्तान का सैन्य तन्त्र अक्सर सावधान रहता है और इस बार भी सेना की भूमिका संदिग्ध है। पाकिस्तान में इस समय कोई भी नेता सर्वमान्य नहीं है और ऐसा लगता है कि सेना इमरान खान को भी सीमित रखना चाहती है। अब तक सेना पाकिस्तान मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को एक-दूसरे ख़िलाफ़ अक्सर खड़ा करती रही है,उनकी राजनीतिक कमजोरियों को उजागर करके और दबाव बढ़ाकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी सरकार अपना कार्यकाल को पूरा न कर सके


 

इमरान खान को नेशनल असेम्बली में व्यापक समर्थन हासिल नहीं है और ऐसे में उनकी सरकार  के बने रहने पर असमंजस बना रहता हैइस बार जिस प्रकार तमाम राजनीतिक दल इमरान खान का विरोध कर रहे है,उसके बाद सत्ता में बना रहना इमरान खान के लिए आसान नहीं होगाअविश्वास प्रस्ताव पेश करने का फ़ैसला विपक्षी पार्टियों के साझा सम्मेलन में लिया गया  हैविपक्षी गठबंधन की पार्टियों का दावा है कि उनके पास अविश्वास प्रस्ताव को लेकर नेशनल असेंबली के 200 सदस्यों का समर्थन हासिल हैअविश्वास प्रस्ताव की सफलता के लिए 172 वोटों की ज़रूरत हैअभी तक सत्तारुढ़ पार्टी पीटीआई के पास सहयोगी दलों के साथ 178 सदस्यों का समर्थन हासिल है यह भी बेहद दिलचस्प है कि राजनीतिक रूप से धुर विरोधी मानी जाने वाली आसिफ़ अली ज़रदारी,मौलाना फ़ज़लुर्रहमान और  शहबाज़ शरीफ़ इमरान खान की सरकार को हटाने के लिए साझा प्रयास कर रहे है


इन सबके बीच इमरान खान का अभी तक का कार्यकाल पाकिस्तान की जनता के लिए कठिनाई बढ़ाने वाला ही रहा है।  एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान के ऊपर इस समय करीब इक्यावन लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये का क़र्ज़ और देनदारियां हैं,जिसमें से करीब इक्कीस लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये का क़र्ज़ सिर्फ़ वर्तमान सरकार के ऊपर है इमरान ख़ान सरकार बनने के बाद पाकिस्तान का सार्वजनिक क़र्ज़ काफ़ी बढ़ा है देश की जीडीपी और क़र्ज़ के बीच के अनुपात पर बात की जाए तो यह लगभग तीस फीसदी है

पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान ख़ान विदेशी क़र्ज़ों की रिकॉर्ड अदायगी का दावा तो करते है लेकिन हकीकत में लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान देश का कुल विदेशी क़र्ज़ अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया हैसरकार क़र्ज़ तो चूका रही है लेकिन इस विदेशी क़र्ज़ को अदा करने के लिए नया क़र्ज़ लेकर देश पर क़र्ज़ का और बोझ डाल रही है  पाकिस्तान में महंगाई भी बेतहाशा बढ़ी है जिससे लोगों का जीना दूभर हो गया है। विश्व बाज़ार में वस्तुओं की क़ीमतों में वृद्धि,पाकिस्तानी रुपए की क़ीमत में कमी और सरकार की तरफ़ से लागू की गई टैक्स नीतियां आम जनता के लिए संकट का कारण बन गई है  इमरान खान की सरकार राजस्व प्राप्त करने के लिए ईंधन जैसी वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाती है,जिससे उनकी क़ीमत में वृद्धि होती हैसरकार के ईंधन,बिजली और गैस पर टैक्स लगाने से रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों के भाव आसमान छूने लगे है


नए पाकिस्तान का ख्वाब दिखाकर सत्ता में आएं इमरान खान की कट्टरपंथी ताकतों को समर्थन देने की नीतियां भी आम जनमानस की परेशानी को बढ़ा रहा हैइमरान खान के लिए पाकिस्तान को आतंकवादियों के हिमायती देशों की सूची से बाहर निकालने की चुनौती बरकरार है। फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट में बने रहना देश की अर्थव्यवस्था को तोड़ने वाला है। इससे पाकिस्तान को हर साल करीब 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है। एफएटीएफ़ पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करता है तो पहले से ही लचर चल रही अर्थव्यवस्था पर ख़तरा और बढ़ जाएगा,क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मदद नहीं मिल पाएगी।


इमरान खान,बेनजीर भुट्टों की हत्या के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान के प्रति उदार व्यवहार के लिए भी अपने खुद के देश में आलोचना झेलते रहे है। यह आतंकी संगठन पाकिस्तान में शरिया पर आधारित एक कट्टरपंथी इस्लामी शासन कायम करना है। पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर मौजूद इलाक़ों में टीटीपी का ख़ासा प्रभाव है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पर पाकिस्तान में चरमपंथ की कई घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद अफगानिस्तान -पाकिस्तान सरहदी इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान का प्रभाव और ज्यादा बढ़ गया है। इमरान खान ने तहरीक-ए-तालिबान से कडाई से निपटने की अपेक्षा यह अपील की थी कि टीटीपी से जुड़े ये लोग अपने हथियार डाल देंगे तो उन्हें माफ़ कर दिया जाएगा और वो आम लोगों की तरह जीवन बिता सकेंगे।


इमरान ख़ान की पार्टी तहरीके इंसाफ का जनाधार ज़्यादातर पठानों में हैं और उनके वोटरों की बड़ी तादाद ख़ैबर-पख्तूनख़्वाह में है। यह इलाका  अफगानिस्तान से लगता हुआ है। इमरान खान के समर्थन से अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी तो हो गई है लेकिन इससे पाकिस्तान को ही जूझना पड रहा है। लाखों अफगान शरणार्थी पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में रह रहे है। पाकिस्तान में बेरोजगारी चरम पर है और शरणार्थियों के आने से बेरोजगारी संकट गहरा गया है। डूरंड रेखा को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान में पहले ही तनातनी रहती है,तालिबान के आने से सीमा पर झड़पें बढ़ गई है। इमरान खान की नीतियों के उलटा पड़ने से पाकिस्तान का आम नागरिक तो गुस्से में है ही,सेना में भी असंतोष बढ़ा है।


इन सबके बीच पाकिस्तान की वर्तमान परिस्थितियां सैन्य शासन के उत्साह को बढ़ाने वाली है। 2018 में सेना की एकमात्र पसंद बनकर उभरे इमरान खान,सैन्य प्रशासन की उसी नीति का शिकार होते नजर आ रहे है जिसकी बदौलत इस देश में लोकतंत्र को कमजोर कर दिया जाता है2014 में इमरान ख़ान ने नवाज़ शरीफ़ पर मतदान में छेड़छाड़ करने के आरोप लगते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग के साथ मार्च किया था। इमरान खान की पार्टी पीटीआई पाकिस्तान को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे के साथ आगे बढ़ी और सामाजिक बदलाव लाने का वादा भी किया


इमरान खान के नवाज शरीफ सरकार के खिलाफ इस मार्च को सेना का भी समर्थन हासिल था। 2018 में हुए आम चुनावों में इमरान खान की पार्टी को समर्थन देकर सेना ने पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक संस्था पर पूर्ण तरीके से कब्जा कर लेना की योजना को बखूबी अंजाम दिया,जिससे उसकी आतंकी और भारत विरोधी गतिविधियों को पूरा समर्थन हासिल हो सके देश की सबसे बड़ी पार्टी मुस्लिम लीग एन के नेता नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया गया और चुनाव परिणाम के पहले ही तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान को मीडिया ने जीत का सेहरा बांध दियाभारत विरोधी जमात-उद-दावा के समर्थक चुनावों में सक्रिय   रहे हाफ़िज़ सईद के बेटे तलहा हाफ़िज़ ने अल्लाह-हू-अकबर तहरीक के टिकट पर चुनाव  लड़ा वहीं  अहल-ए-सुन्नत वल जमात को भी चुनाव लड़ने की अनुमति मिल गयी जिसने पाकिस्तान के पंजाब में कई  शियाओं की हत्या की थी। इन सबके बीच नवाज शरीफ का दल सेना के निशाने पर रहा सेना के प्रभाव से नवाज शरीफ के दल के नेताओं को डराया,धमकाया और मारा  गया। अनेक उम्मीदवार अपना टिकट निरस्त कर दूसरी पार्टी में शामिल  होने को मजबूर कर दिए गये पाकिस्तान चुनाव आयोग ने सेना के इशारे पर अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पहली बार पोलिंग बूथ के अंदर भी सेना को तैनात करने का फैसला किया,इसके अलावा मतपत्रों की छपाई करने वाले सरकारी छापेखानों को भी सेना के हवाले किया गया हैमतपत्रों एवं चुनाव से संबंधित अन्य सामग्रियों की हिफाजत करने के लिए भी सेना की सेवाएं ली ली गई। बूथ के अंदर सेना ने कर्मचारियों और मतदाताओं पर कड़ी नजर रखते हुए इमरान खान की विजय सुनिश्चित कर दी थी।


पाकिस्तान में सेना,आतंकियों,आईएसआई और धार्मिक समूहों का ऐसा गठजोड़ है जो लोकतंत्र को इस देश में पनपने ही नहीं देना चाहता,यहां तक की न्यायपालिका को भी सेना के आदेश मानने को मजबूर कर दिया जाता है। आईएसआई कोर्ट के मामले को प्रभावित करने में पूरी तरह शामिल है आईएसआई के लोग विभिन्न जगहों पर पहुंचकर अपनी मर्ज़ी की कोर्ट की बेंच बनवाते हैं और केसों को चिन्हित किया जाता है


 

पाकिस्तान में लोकतांत्रिक बहाली के प्रयासों में अपनी जान गंवाने वाली बेनजीर भुट्टों सेना,आईएसआई और आतंकी गठजोड़ से लड़ती रही जिसे उन्होंने अपनी आत्मकथा में साझा भी किया है। उन्होंने लिखा कि, फौजी हुकूमत छल कपट और षडयंत्र के खतरनाक खेल खेलती है। जबकि लोकतांत्रिक सत्ता को इस बात का डर हमेशा रहता है कि कही गद्दी हाथ से निकल जाए,इसलिए वह हमेशा दुविधा भरी घबराहट में रहते हुए,आधुनिक फौजी ताकतों से अपने बचाव का इंतजाम करती रहती है


जाहिर है पाकिस्तान में एक बार फिर सेना लोकतंत्र का गला घोंटने की ओर अग्रसर है। अब  सेना के निशाने पर इमरान खान है और उनका जाना लगभग तय नजर आ रहा है। हो सकता है सेना इमरान खान को दबाव में लाकर उनकी सत्ता तो बचा लेंगी लेकिन इसके नतीजें कट्टरपंथ,आतंकवाद को बढ़ाने वाले और लोकतंत्र के लिए आत्मघाती ही होंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

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