नाटो की प्रासंगिकता का संकट nato ukrine russia china janstta

 जनसत्ता


                                   


                            

नाटो की यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप को संतुलित और नियंत्रित रखने की नीति चीन की आर्थिक रणनीति और रूस की सामरिक आक्रामकता के आगे बूरी तरह पस्त पड़ चुकी है। लातिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों में चीन सहायता कूटनीति का एक आक्रामक अभियान चला रहा है जिसे वह लिबेरो अमेरिका या अमेरिका से आज़ादी के तौर पर प्रचारित करता है। ब्राज़ील,मेक्सिको और कोलंबिया  चीन से आर्थिक साझेदारी को लेकर दीर्घयोजना को आगे बढ़ा है वहीं क्यूबा, निकारागुआ और वेनेज़ुएला जैसे देश अमेरिका को ठेंगा दिखाकर चीन से व्यापक आर्थिक समझौते को लेकर आगे बढ़ चूके है। चीन इन देशों के क्षेत्रीय संगठन सीईएलएसी के साथ अपने रिश्तों को उंचाई पर ले जा रहा है और यह अर्जेंटीना के नेतृत्व में हो रहा है।


लातिन अमेरिका और कैरिबियाई देश चीन की बेल्ट रोड योजना का अहम हिस्सा बन चुके है। वेनेज़ुएला और क्यूबा अमेरिका विरोध के चलते चीन के समर्थन में खड़े है। अल साल्वाडोर और होन्डुरास जैसे देशों में भी चीन अपना प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पश्चिम यूरोप में भी चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है,चीन का नया सिल्क रोड  पांच महाद्वीपों में फैला बुनियादी परियोजनाओं का एक महत्वाकांक्षी नेटवर्क है जिसके सहारे वह  अमेरिकी महाद्वीप और नाटो के सहयोगी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ा रहा है।


चीन मध्य-पूर्वी यूरोपीय देशों के सदात व्यापक रणनीति के तौर पर काम कर रहा है उनमें अल्बानिया,बोस्निया एवं हर्जेगोविना,बुल्गारिया,क्रोएशिया,चेक गणराज्य,एस्टोनिया,ग्रीस,हंगरी,लात्विया,उत्तरी मेसिडोनिया,मॉन्टेनिग्रो, पोलैंड,रोमानिया,सर्बिया,स्लोवाकिया और स्लोवेनिया शामिल हैं। इसमें कई देश नाटो सैन्य संगठन का हिस्सा है जिसकी स्थापना ही साम्यवाद को रोकने के लिए हुई थी। यूरोप के चारो और से घेर लेने की नीति की तहत चीन बाल्कन देशों के साथ सहयोग को लेकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। ये देश रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिका चीन को एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए खतरनाक बताता है जबकि चीन पश्चिमी बाल्कन  देशों के  उन महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर प्रभाव  बढ़ा रहा है जो पश्चिमी यूरोप,उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया से क़रीब हैं। चीन आर्थिक समझौतों के साथ ही यूरोप के कई बंदरगाहों में रूचि दिखा रहा है। वह ग्रीस के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह पिरेयस की व्यवस्थाओं का संचालन करता है,तुर्की के तीसरे बड़े पोर्ट कुम्पोर्ट पर भी चीन का ही नियंत्रण है। इसके साथ-साथ दक्षिण यूरोप के कई बंदरगाहों में चीन की भागीदारी है। पश्चिमी बाल्कन देशों में चीन का निवेश दोगुना हो गया है,इन देशों पर चीन का कर्ज बढ़ता जा रहा है और यह स्थिति अमेरिका और यूरोप को चिंता में डालने वाली है। यूरोपीय संघ के करीबी  अल्बानिया,नॉर्थ मेसिडोनिया,मॉन्टिनेग्रो,सर्बिया,बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना चीन के कर्ज के जाल में फंसे हुए देश है।  चीन लातिन अमेरिका,कैरिबियाई और बाल्कन देशों के साथ सांस्कृतिक सम्बन्धों को भी आगे बढ़ा रहा है। इन देशों से बड़ी संख्या में छात्र चीन के विश्वविद्यालयों में जा रहे हैं,सर्बिया और मॉन्टिनेग्रो में तो कई स्कूलों में कंफ्यूशियस क्लासरूम तक खोले गए हैं।


चीन के आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग का असर कूटनीतिक रूप से भी दिखने लगा है। अमेरिका वीगर मुसलमानों के अधिकारों को लेकर मुखर है वहीं बाल्कन के देश चीन की आलोचना के किसी भी प्रस्ताव में कोई दिलचस्पी नही दिखाना चाहते। बाल्कन प्रायद्वीप दक्षिण-पूर्वी यूरोप का एक बड़ा क्षेत्र है  और यहां इस क्षेत्र में चीन की कूटनीतिक बढ़त रणनीतिक बढ़त नहीं बन जाएं,इसे लेकर अमेरिका और नाटो आशंकित है। बाल्कन दक्षिणी यूरोप का सबसे पूर्वी प्रायद्वीप है और यह तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। इसके पूर्व में काला सागर, ईजियन सागर,मरमरा सागर,दक्षिण में भूमध्यसागर,पश्चिम में इयोनियन सागर तथा एड्रियाटिक सागर हैं। चीन का इस क्षेत्र में बढ़ा रुतबा अमेरिका और नाटो पर रणनीतिक बढ़त लेता हुआ दिखाई देता है।


लातिन अमेरिका में रूस की नीति भी बेहद प्रभावशाली रही है।  पुतिन ने 2000 के दशक की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाया है और यह चुनौतीपूर्ण है। ऐसा माना जाता है कि रूस और चीन ने मिलकर दुनिया में एक नया ब्लोंक बनाने की कोशिश की है और वे इसमें काफी हद तक सफल भी हो रहे है।


यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामकता और इस पर वैश्विक दबाव का काम न करना भी दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रहा है। अन्तराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप को एक तानाशाही दखलंदाजी माना जाता है जो एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के मामलों को पलटने के लिए करता है। पूर्वी यूरोप के इस्टोनिया,लातविया,लिथुआनिया,पोलैंड और रोमानिया में अमेरिका के  नेतृत्व में नाटो के सैनिक तैनात है। इसके साथ ही नाटो ने बाल्टिक देशों और पूर्वी यूरोप में हवाई निगरानी भी बढ़ाई है जिससे आकाश से भी रूस पर नजर रखी जा सके।  यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यह साफ हो गया कि रूस पर दबाव बनाने की नाटो और अमेरिका की यह योजना कारगर नहीं हो सकी। यह स्थिति नाटो और अमेरिका को परेशान करने वाली है। 


2008 में नाटो के बुखारेस्ट सम्मेलन में नाटो सहयोगियों ने सदस्यता हेतु यूक्रेन और जॉर्जिया की यूरो-अटलांटिक आकांक्षाओं का समर्थन किया था तथा इस बात पर सहमति व्यक्त जताई थी की ये देश नाटो के सदस्य बन जाएंगे। लेकिन  रूस ने अमेरिका के पूर्व की ओर नाटो क्षेत्र के विस्तार के विकल्प को खारिज कर दिया और नाटो की असल चुनौती यही से बढ़ गई। दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो का एक प्रमुख लक्ष्य साम्यवादी सोवियत संघ के कूटनीतिक,राजनीतिक और सामरिक प्रभाव  को सीमित  करना था जिसमें उसने सफलता भी पाई। लेकिन पिछले दो दशक में रूस में पुतिन के प्रभाव तथा चीन की आक्रामक सहायता कूटनीति  से वैश्विक परिदृश्य पूरी बदल गया है।


2008 में जॉर्जिया और यूक्रेन को अपने गठबंधन में शामिल करने के नाटो के इरादे की घोषणा के बाद रूस ने जॉर्जिया पर आक्रमण किया तथा उसके कई क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद 2014 में रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्ज़ा कर लिया। इस समय भी यूक्रेन रूस के हमलों के बाद तबाह होने की कगार पर है।


नाटो की हर किसी के लिए दरवाजे खुले रखने की नीति कमजोर हो चूकी है और वह यूक्रेन के मामलें में चाह कर भी कुछ न कर सका है। यूक्रेन नाटो में शामिल होने को लेकर एक तय समयसीमा और संभावना स्पष्ट करने की मांग करता रहा है।  जबकि नाटो रूस के दबाव के आगे बेबस हो गया और अब तो यूक्रेन के राष्ट्रपति जेंलेंसकी भी यह साफ कह चूके है कि नाटो रूस से डर गया।


नाटो और अमेरिका के खिलाफ रूस और चीन का रणनीतिक सहयोग खुले रूप से उभर कर सामने आ रहा है। इस साल  बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों के आयोजन का अमेरिका ने राजनयिक बहिष्कार किया था। वहीं रूस और अमेरिकी विरोधी देशों ने इसे अवसर की तरह लिया। अर्जेंटीना और इक्वाडोर के राष्ट्रपतियों ने अमेरिका के कूटनीतिक बहिष्कार को नज़रअंदाज़ कर शीतकालीन ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात की। यूक्रेन पर रूस के हमलों की आशंकाओं के बीच बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों के समापन हुआ। इसके बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। ऐसा लगता है कि चीन यूक्रेन हमलें से अपने आयोजन के प्रभावित होने को लेकर आशंकित था और इसीलिए रूस ने इस आयोजन के खत्म होने का इंतजार किया।


यूक्रेन को लेकर अमेरिकी और नाटो की नीति का असर दुनिया के कई क्षेत्रों में रणनीतिक रूप से पड़ सकता है। नाटो और अमेरिका के विरोध को नजरअंदाज कर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के पृथकतावादी विद्रोही इलाक़े दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र राज्य की मान्यता दे दी। रूस आधिकारिक से रूप  यहां दाख़िल  हो गया और आश्चर्य नहीं इसके रूस में विलय की जल्द घोषणा कर दी जाएं। ऐसा भी नहीं है कि पुतिन यूक्रेन तक ही सीमित रहेंगे। हो सकता है पुतिन आगे चलकर पोलैंड,बुल्गारिया और हंगरी में भी यूक्रेन जैसी ही सैन्य कार्रवाई कर सकते है। एशिया के कई देश यूक्रेन संकट में रूस का विरोध करने से बचे है और यह स्थिति अमेरिका और नाटो को असहज  करने वाली है। अफगानिस्तान में तालिबान का सत्ता में लौटना और नाटो सेनाओं द्वारा उसे अस्थिर छोड़ जाने से इस सैन्य संगठन की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है।


लातिन अमेरिकी की ब्राज़ील,चिली,अर्जेंटीना जैसी कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में चीन पहले ही द्विपक्षीय व्यापार में अमेरिका से आगे बढ़ चुका है। पेरू,वेनेज़ुएला,कोलंबिया,इक्वाडोर  जैसे देश चीन के प्रभाव में है। इन देशों का चीन से सहयोग बढने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में चीन का सैन्य खतरा अमेरिका और यूरोप के मुहाने पर होगा तथा रूस की भूमिका खतरनाक स्थिति पैदा कर सकती है। ताइवान को लेकर चीन की आक्रामक नीति को अभी तक अमेरिका रोकने में कामयाब रहा था लेकिन आने वाले समय में भी यह दबाव काम करें,इसकी संभावना कम हो गई है।


शक्ति संतुलन को लेकर कोई भी स्पष्ट विचार नहीं हो सकता क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र केवल ऐसे संतुलन में  विश्वास रखता है जो उसके पक्ष में हो और यहीं से दूसरे पक्ष में असंतुलन स्थापित हो जाता है। अभी तक नाटो और अमेरिका सैन्य संतुलन कायम करने के लिए दुनिया के किसी भी हिस्से पर सैन्य कार्रवाइयों को अंजाम देते रहे है। लेकिन यूक्रेन पर हमले के बाद रूस की परमाणु युद्द की धमकी के आगे नाटो बेबस नजर आया है। यूक्रेन में नाटो के रणनीतिक प्रतिकार से बचने की नीति से वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर असमंजस बढ़ गया है।


चीन और रूस को रोकने के लिए नाटो और अमेरिका  के सामने आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर कई चुनौतियां है। चीन का यूरोप और अमेरिका महाद्वीप में आर्थिक रूप से बढ़ता प्रभाव कैसे कम किया जाएं इसे लेकर कोई प्रभावी योजना नाटो के पास फ़िलहाल नहीं है,वहीं रूस के परमाणु हमलों से बचने का यूरोप के पास कोई सुरक्षा कवच भी फ़िलहाल नहीं है। यह पहले से कहीं आक्रामक,नई साम्यवादी,आर्थिक और सामरिक चुनौती है जिसका सामना करने का सामर्थ्य अमेरिका और नाटो के पास फ़िलहाल तो नहीं है।

 

कश्मीरी पंडितों के पलायन का अफगानिस्तान कनेक्शन kshmir pandit afganistan minorties peoples samachar

 

पीपुल्स समाचार

                                                                    

बेनजीर भुट्टों अपनी आत्मकथा 'द डॉटर ऑफ द ईस्ट' में लिखती हैं कि,मेरे पास 1990 में आईएसआई के दफ्तर से यह संदेश आया कि सऊदी अरब,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के एक लाख से ज्यादा मुजाहिदीन इस बात के लिये तैयार है की वह कश्मीर में घुसकर कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई में मदद करें। वह सारे बहादुर और प्रशिक्षित है और हिंदुस्तान की फौजों से बड़ी आसानी से लोहा ले सकते है। बेनजीर आगे लिखती है,यह जानते हुए कि इस तरह की हस्तक्षेप पूर्ण गतिविधि से कश्मीर के लोगों को नुकसान ही होगा,मैंने इस योजना पर अपना विरोध जता दिया। मैंने फौज और आईएसआई दोनों को आदेश दिया कि वह नियंत्रण रेखा पर फौजे तैनात करें और इस बात का ध्यान रखें कि कोई भी अफगानी मुजाहिदीन पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर में न दाखिल हो पाए।


बेनजीर भुट्टों अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उन्होंने पाकिस्तान में आतंक की पौद पर खुलकर चिंता जताई थी। दरअसल अफगानिस्तान में सोवियत सेना के विरुद्द लड़ चूके मुजाहिदीनों के कश्मीर में इस्तेमाल करने की व्यापक योजना जिया-उल-हक बहुत पहले तैयार कर चूके थे। 1980 के दशक की शुरुआत में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सीआईए के नेतृत्व में सोवियत संघ को अफगानिस्तान से बाहर निकालने का अभियान शुरू किया गया था। इस दौर में ही पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह जिया-उल-हक ने भारत को तोड़ने के लिए एक रणनीतिक अभियान ऑपरेशन टोपैक शुरू किया था। वहीं साम्यवाद के खिलाफ सीआईए के अभियान में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सऊदी अरब को सक्रिय साझीदार बनाया गया था। तीनों ने मिलकर मुस्लिम देशों से स्वयंसेवकों का चयन,प्रशिक्षण और उन्हें हथियार देकर अफगानिस्तान भेजना शुरू किया। इसे जिहाद का नाम दिया गया और समूचे मुस्लिम संसार से कट्टरपंथी ताकतों को इस जिहाद में शामिल होने का आह्वान किया गया। यह जिहाद पूरे एक दशक तक चला और इस दौरान अमेरिका पूरी ताकत के साथ पाकिस्तान के पीछे खड़ा रहा। सोवियत रूस अंतत: इस युद्ध में टिक नहीं पाया और उसे 1989 में अफगानिस्तान छोडऩा पड़ा। अमेरिकी मदद से मुजाहिदीनों ने एक अजेय समझी जाने वाली महाशक्ति को करारी शिकस्त दे दी थी। इन आतंकियों को तैयार करने के लिए पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में व्यापक प्रशिक्षण केंद्र बनाएं गए थे। पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। इन्हीं केन्द्रों से हरकत-उल अंसार,हरकत उल मुजाहिदीन,हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन निकले जिन्होंने कश्मीर में आतंक का जाल बिछाया था।


पाकिस्तान की ऑपरेशन टोपैक की छाया युद्द की योजना के अनुसार कट्टरपंथी मौलवियों को कश्मीर घाटी में भेज कर बहुसंख्यक मुसलमानों को भड़काया गया। 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में हमला करने वाले अधिकांश आतंकी विदेशी ही होते थे। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने वाले कई आतंकियों को कश्मीर में भेजा। इन आतंकियों ने भारतीय सेना,पुलिस अधिकारी,प्रशासन के लोग और कश्मीरी पंडितों पर व्यापक हमले किए थे। पाकिस्तान की शह पर भारत समर्थित लोगों पर हिंसक हमले किए गए और उनकी हत्याएं की गई।  


कश्मीरी पंडितों के पलायन की योजना अफगानिस्तान-सोवियत संघ युद्द के बाद की परिस्थितियों का फायदा लेने के लिए पाकिस्तान ने तैयार की थी।  इस दौरान अफगानिस्तान में रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों पर भी बेतहाशा अत्याचार किए गए। इसमें अफगानिस्तान के मुजाहिदीनों का पाकिस्तान ने भरपूर उपयोग किया।


हिन्दू सिख अल्पसंख्यकों में से अधिकांश काबुल, ग़ज़नी, हेलमंद, ख़ोस्त और नंगरहार सूबों में रहते थे। पाकिस्तान के इशारे पर जिस प्रकार  कश्मीर में पंडितों को निशाना बनाया उसी प्रकार तालिबान ने अफगानिस्तान में रह रहे हिंदू और सिखों को जानबूझ कर निशाना बनाया। 90 के दशक की शुरुआत तक अफगानिस्तान में दो लाख से ज्यादा हिंदू और सिख थे। अब यहां इनकी संख्या एक से दो हजार ही रह गई है। 90 के दशक में तालिबान के शासन में इस देश की व्यवस्था अंधकार युग में जाना प्रारम्भ हुई,जब यहां कड़े इस्लामिक कानून लागू किए गए


हिंदू और सिखों को पीले रंग वाले कपड़े होते थे ताकि लोगों के बीच उनकी पहचान हो सकेउनकी जमीन प्रभावशाली लोगों ने छीन ली और यहीं से अल्पसंख्यकों का जीवन नारकीय बनना शुरू हो गया1999 में भारतीय विमान का अपहरण और उसके बाद आतंकियों को अफगानिस्तान की जमीन पर सुरक्षित छोड़ा जाना तालिबान और कश्मीर के आतंकवादियों के मजबूत गठजोड़ के कारण ही संभव हुआ था शीत युद्द के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ की परम्परागत शत्रुता से अफगनिस्तान में आतंकवाद फला फूला और बाद में पाकिस्तान के षड्यंत्र के कारण यह कश्मीर और आफ्गानिस्तान के अल्पसंख्यकों के लिए भी नासूर बन गया।

तकरीबन ढाई सौ साल पहले अफगानिस्तान से लेकर कश्मीर तक महाराजा रणजीत सिंह का शासन था। एक बार की बात है कि महाराजा रणजीतसिंह ने एक कुरान को महंगे दाम देकर खरीदा और उसे श्रद्धापूर्वक चूमा तो उनके विश्वसनीय सलाहकार फकीर अजीजुद्दीन ने कहा कि महाराज आप जो ऊँचे दामों में खरीद रहे है उसका आपके लिए कोई उपयोग नहीं है।  इस पर रणजीतसिंह बोले की, ईश्वर ने मुझे सिर्फ एक आँख ही इसीलिए दी है कि मै सभी को समान नजरों से देख सकूँ। पाकिस्तान ने ऑपरेशन टोपैक की नीति से भारतीय उपमहाद्वीप की उस विविधता पर ही करारी चोट की जिससे कश्मीरी पंडित कराह रहे है

 

बापू को बिसराने के मायने mahatma gandhi aam aadmi party rashtriy sahara

 राष्ट्रीय सहारा

                                                                      

नशामुक्त पंजाब,महात्मा गांधी चाहते थे,शहीद-ए-आजम भगतसिंह और डॉ.भीमराव आम्बेडकर भी नशामुक्त समाज को बेहतर जीवन जरूरत बताते रहे। विचारों के साथ कार्यो और जागरूकता की दृष्टि से नशामुक्ति के खिलाफ देश का अबसे बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है,जिन्होंने लोगों  की व्यापक जागरूकता के लिए देशव्यापी अभियान चलाया था और इसे सामाजिक न्याय की स्थापना की लिए एक जरूरत भी बताया थागांधी जयंती पर पूरे देश में नशा मुक्ति की शपथ दिलवाई जाती हैआम आदमी पार्टी अब पंजाब में सत्तारूढ़ है,वह राज्य को नशामुक्त बनाना चाहती है और यह उसके घोषणापत्र का प्रमुख भाग भी थापंजाब देश का ऐसा राज्य है जो कि शराब,ड्रग्स और अलग अलग तरह के नशों को लेकर बदनाम है पंजाब के कई परिवार इससे बर्बाद हो रहे है और राज्य को इस संकट से उबारना बेहद जरूरी माना जा रहा है नशे की रोकथाम और नियंत्रण के लिए अब सत्तारूढ़ आप पार्टी पर लोगों की नजरें और आशाएं टिकी हुई है


ऐसा प्रतीत होता है कि पंजाब में नशामुक्त के खिलाफ सरकारी अभियान में भी भगतसिंह और डॉ.आम्बेडकर के पोस्टर का उपयोग होता रहेगा और बापू को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल न करने की आम आदमी पार्टी की हालिया नीति यहां पर भी नजर आ सकती है इन सबके बीच बापू को बिसराने की कोशिश  महज संयोग तो नहीं हो  सकती क्योंकि अरविंद केजरीवाल राजनीतिक प्रयोगधर्मिता के पर्याय माने जाते है


गौरतलब है कि गांधीवादी अन्ना हजारे के जन आंदोलन में अहम भागीदार रहे और बाद में आम आदमी पार्टी से राजनीति के मैदान में विकल्प बने अरविंद केजरीवाल महात्मा गांधी को अपना आदर्श बताते रहे है। केजरीवाल भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से उभरे एक ऐसे राजनेता है जिन्होंने नई पार्टी के गठन के बाद पहचान की राजनीति के लंबे संघर्ष और इंतजार की स्थापित धारणाओं को बदलते हुए अपनी बहुआयामी रणनीति से सफलतापूर्वक कड़ी चुनौती पेश की है। दिल्ली की सत्ता में एक दशक से ज्यादा बने रहने का उनका करिश्मा लोक कल्याण के उस मॉडल से ही संभव हुआ जिसकी बापू कल्पना किया करते थे। लेकिन दिल्ली से पंजाब आते आते केजरीवाल ने बापू को बिसरा दिया और पंजाब की सत्ता को भी प्राप्त करने में अविश्वसनीय सफलता अर्जित कर ली।


अरविंद केजरीवाल पंजाब में भगतसिंह और डॉ.भीमराव आम्बेडकर को प्रतीक की तरह इस्तेमाल कर सुशासन की स्थापना का दावा कर रहे है। यहां पर बापू को भूलाने की कोशिश साफ नजर आती है। इन सबके बीच यह देखा गया है कि आज़ादी के नायकों का यह इस्तेमाल देश में नया नहीं हैभारत एक विशाल लोकतंत्र है और इसकी विविधता भी कमाल की हैयहां अलग अलग राजनीतिक टोपियां और राजनीतिक चश्में अपनी सुविधा के अनुसार चित्र तय करते है,उसे दिखाते है,उस पर हक जताते है और फिर उस आधार पर वोट भी भुनाते है इस हक की लड़ाई में गांधी अब तक सबके साथ नजर आते रहे है क्योंकि गांधी किसी से अलग कभी रहे ही नहींयह उनके चरित्र और विचारों की पारदर्शिता थी कि वे मानवता के सभी प्रयासों में सभी के साथ खड़े नजर आते रहे


जहां तक आम आदमी पार्टी के प्रतीक बना दिए गए भगतसिंह और डॉ.आम्बेडकर का सवाल है तो बापू के लिए यह दोनों व्यक्तित्व सम्मान और सहयोग का प्रतीक रहे आधुनिक भारतीय राजनीति की आशंकाओं और कुशंकाओं को उभारने की सतत कोशिशों के बाद भी इतिहास को कभी  भूलाया नहीं जा सकता महात्मा गांधी और भगतसिंह के रास्ते अलग अलग थे लेकिन दोनों का अंतिम उद्देश्य स्वराज प्राप्ति ही थीबापू भगतसिंह की लोकप्रियता के कायल थे और वे उन्हें देश के युवाओं का नायक समझते थेभगतसिंह और उनके साथियों को फांसी की सजा दिए जाने से  गांधी बहुत दुखी थेयहां तक की उन्होंने अंग्रेजी सरकार को चेताया भी की देश में इसका बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ेगाजब अंग्रेजी सरकार पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो  गांधी ने फांसी टालने के लिए इस सजा को आजीवन कारावास में बदलने की मांग भी रखीलेकिन लार्ड इरविन और विलिग्टन टस के मस नहीं हुएवे आज़ादी के इन मतवालों के सरकार के मुखर विरोध और  हिंसात्मक कामों से गुस्से में थे और क्रांतिकारियों को कड़ा सबक देना चाहते थेइसलिए उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के महान नायक  गांधी के सुझाव को दरकिनार कर दिया। भगतसिंह की जेल डायरी के पन्ने यह बखूबी बयान करते है कि भगतसिंह का महात्मा गांधी के प्रति कितना गहरा सम्मान था और वे  गांधी के योगदान के कितने बड़े प्रशंसक थे जाहिर है आज़ादी के इन मतवालों के आपसी संबंध भी मूल्यों और आदर्शों की शुचिता से परिपूर्ण रहे 


दूसरी और सामाजिक न्याय की स्थापना को लेकर गांधी और डॉ.आम्बेडकर के सामूहिक प्रयास भारत के संविधान में प्रतिबिंबित होते है डॉ.आम्बेडकर के भारत की संविधान समिति के अहम किरदार बनने के पीछे महात्मा गांधी की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है,जिन्होंने राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए डॉ.आम्बेडकर के ज्ञान को ज्यादा तरजीह दीपूना पैक्ट,देश में दलित पिछड़ों को आरक्षण,सामाजिक व्यवस्था,असमानता,भेद-भाव को लेकर गांधी आम्बेडकर के सतत सामूहिक प्रयासों का प्रभाव देश और लोकतंत्र को मजबूत करने वाले रहे


इतिहास की इस विवेचना से यह तो साफ हो ही जाता है कि भगतसिंह और डॉ.आम्बेडकर के साथ गांधी का होना अव्यवहारिक या असंगत नहीं हो सकता। अब सवाल यह उठता है कि लोक कल्याण की वैकल्पिक राजनीति के खेवनहार बनने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल भी राजनीतिक संकीर्णता को उभार देकर भारत की राजनीति में आगे बढना चाहता है। भारत का लोकतंत्र बदलावों को पसंद करता है लेकिन इन बदलावों में उसने सदैव सामाजिक कल्याण को ही ढूंढा है। इस सामाजिक कल्याण की सम्पूर्ण मार्गदर्शिका तो बापू ही है। केजरीवाल भी जनता को मुफ्त देने की घोषणाओं के उस जाल में जनता को अक्सर उलझाते नजर आते है जिसको वोट पाने के हथियार की तरह सभी दल आजमाते है।  गांधी के विचार इससे उलट थे।    गांधी ने रोटी के लिए शारीरिक श्रम का सिद्धांत दिया था,बापू मानते थे कि बगैर श्रम के भोजन लेना पाप है।  वे कहते थे कि शारीरिक श्रम प्रत्येक के लिए अनिवार्य होना चाहिए। वहीं बापू स्वराज की स्थापना के लिए गांवों की आत्मनिर्भरता को अनिवार्य बताते थे। संकट यही है कि महात्मा गांधी के चित्र के साथ अरविंद केजरीवाल यदि उनके विचारों को भी भूलाने लगे तो न तो पंजाब आत्मनिर्भर होगा और न ही लोगों को रोजगार मिलेंगे।


गांधी जयंती पर दिल्ली सरकार का अख़बारों में छपा एक विज्ञापन सभी के जेहन में है जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बापू के उस कथन की याद दिला रहे थे कि खुद में वो बदलाव लाइए,जो आप दुनिया में देखना चाहते हो  यकीनन केजरीवाल को संकीर्ण राजनीति के भंवरजाल में उलझने से ज्यादा बापू के  कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर ही आगे बढ़ना चाहिए। बहरहाल यह सभी को समझना होगा कि बापू को भूलाकर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना और सत्ता में दीर्घकालीन समय तक बने रहना न तो आम आदमी पार्टी के लिए संभव है और न ही अन्य राजनीतिक दलों के लिए।

 

                       

पाकिस्तान में सेना कैसे हावी हुई, pak sena democrecy prajatntra

 प्रजातंत्र                               


पाकिस्तान के जन्म के बाद अगले 15 सालों में वहां की राजनीतिक परिस्थितियां इतनी तेजी से बदली की भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के बारे में यह किस्सा मशहूर  हो गया कि, वे तो इतनी जल्दी धोतियां भी नहीं बदलते जितनी जल्दी पाकिस्तान अपने प्रधानमंत्री बदल लेता है


दरअसल पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या 1951 में कर दी गईपाकिस्तान का पहला संविधान 1956 में लागू किया गया,लेकिन महज दो सालों में संसदीय प्रणाली ध्वस्त हो गई देश के पहले राष्ट्रपति सैयद इस्कंदर अली मिर्ज़ा को खुद के ही बनाएं गणतान्त्रिक संविधान से इतनी चिढ़ थी कि उन्होंने अगले दो सालों में पांच प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा,चौधरी मोहम्मद अली,हुसैन शहीद सोहरावर्दी,इब्राहिम इस्माइल चुंद्रीगर और फ़िरोज़ ख़ान नून को पद से हटा दियावे यहीं नहीं रुके,1958 में पाकिस्तान के संविधान को निलंबित कर दिया,असेंबली भंग कर दी और राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबंधित करके पाकिस्तान के इतिहास का पहला मार्शल लॉ लगा दिया इसके साथ ही उस वक़्त के सेना प्रमुख जनरल अयूब ख़ान को मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बना दियामतलब पाकिस्तान के जन्म के महज 11 साल में ही सैन्य ताकतों को पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का वह अवसर दिया गया जिससे इस इस्लामिक गणराज्य में लोकतंत्र स्थापित होने की संभावना ही धूमिल हो गई


राष्ट्रपति जनरल इस्कंदर मिर्ज़ा ने पाकिस्तान के लोगों को समझाते हुए अपने फैसले को सही ठहराया कि राजनीतिक रस्साकशी और भ्रष्टाचार से जनता परेशान है,राजनीतिक पार्टियों ने  लोकतंत्र का मजाक बना दिया है और इससे देश संकट में पड़ गया हैइतिहास गवाह है की इसके बाद पाकिस्तान में लोकतांत्रिक चुनी हुई सरकारों को भंग करने का सिलसिला चल पड़ा और हर बार उन पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक अक्षमता के आरोप गढ़कर सैन्य शासन सत्ता में काबिज हो गया


1965 में भारत से युद्द के दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान सेना प्रमुख भी थे बाद में उन्होंने सत्ता अपने आर्मी चीफ जनरल याह्या खान को सौंपीयाह्या खान की सनक और अत्याचार से ही पाकिस्तान 1971 में टूट गया और बंगलादेश बनाविभाजन के बाद करीब 16 साल पाकिस्तान में लोकतंत्र को स्थापित करने के प्रयास किए गए लेकिन 1977 में सैन्य प्रमुख जिया-उल-हक ने जुल्फिकार अली भुट्टों सरकार को अक्षम बताकर बर्खास्त कर दिया और स्वयं देश के राष्ट्रपति बन गएबाद में वे करीब 11 साल तक देश के राष्ट्रपति रहे,उन्होंने लोकप्रिय होने के लिए देश में व्यापक इस्लामीकरण को बढ़ावा दियाअमेरिका की शह पर पाकिस्तान में आतंकी केंद्र बनाएं और अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना को बाहर निकालने के लिए जिहाद को राजनीतिक हथियार बनायाबाद में यह पाकिस्तान और पूरी दुनिया के लिए आतंक का नासूर बन गयाउनके नक्शें कदम पर जनरल परवेज मुशर्रफ भी चले और  उन्होंने अपनी राजनीतिक हसरतें पूरी करने के लिए बेनजीर भुट्टों की हत्या करवा दी


यह माना जाता है कि 2018 के आम चुनावों में इमरान खान को पाकिस्तान की फौज का बड़ा समर्थन हासिल थाफौज ने समूची चुनावी व्यवस्था का मनमाना संचालन कियान्यायपालिका पर दबाव बनाकर नवाज शरीफ के चुनाव पड़ने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया इमरान खान सत्ता में आएं तो उन्हें विपक्षी दलों ने इलेक्टेड नहीं बल्कि सेलेक्टेड कहा इमरान खान सेना के दबाव में इस प्रकार काम करते रहे की आंतरिक के साथ विदेशीं मामलों में भी वे नाकाम साबित हुएपिछले साल तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्ज़े के बाद जब उसके मंत्रिमंडल की कवायद चल रही थी उस दौरान दुनिया भर में पाकिस्तान के आईएसआई प्रमुख  लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद का काबुल जाना चर्चा का विषय बन गया था इससे इमरान खान की वैश्विक छवि ही धूमिल हुई 


यह भी बेहद दिलचस्प है कि अमेरिका जैसे देशों ने पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही को प्रश्रय देते हुए  अय्यूब ख़ान,जनरल याह्या खान,जनरल ज़िया-उल-हक़ और जनरल परवेज मुशर्रफ को भरपूर समर्थन दियासेना ने अमेरिका की आर्थिक मदद को देश के विकास से ज्यादा सैन्य सुविधाओं के लिए खर्च किए पाकिस्तान के आर्थिक हितों और विभिन्न व्यवसायों में सैन्य अधिकारियों की बड़ी भागीदारी और निजी हित रहे है। पाकिस्तान की आम जनता महंगाई से भले ही त्रस्त हो लेकिन सैनिकों की सुविधाओं से कभी समझौता नहीं किया जा सकता। सरकारें सेना के दबाव में ही देश का आर्थिक बजट तय करती है।  देश में सेना और आईएसआई की आलोचना को अपराध माना जाता है। कुल मिलाकर दुनिया भर में पाकिस्तान की छवि एक ऐसे देश की बन गई है जहां सेना के समर्थन के बिना कुछ भी नहीं हो सकता


पाकिस्तान में राजनीतिक पार्टियों को व्यवस्था में पूरी तरह से हावी न होने देने को लेकर सेना सतर्क रही हैयही कारण है कि कोई भी सरकार मुश्किल से ही अपना कार्यकाल पूरा कर पाती हैचुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने के लिए सेना विपक्षी दलों  का सहारा भी ले लेती है,देश में व्यापक विरोध प्रदर्शन होते है और सेना देश की आंतरिक शांति भंग होने का खतरा बताकर सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार को अपदस्थ कर देती है


इस समय इमरान खान की सरकार संकट में हैउनके राजनीतिक प्रभाव को खत्म करने के लिए सेना ने विपक्षी दलों से हाथ मिला लिया हैइसीलिए इमरान खान ने पाकिस्तान की सेना पर निशाना साधते हुए और भारत की सेना की तारीफ करते हुए कहा है कि भारतीय सेना ईमानदार है और वे कभी देश की राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करतीयकीनन भारत के लिए यह अक्षरस: सही है लेकिन किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का यह कहना दुर्लभ है और उनकी हताशा का प्रतीक भी है


 

 

 

 

 

आसान नहीं है कश्मीरी पंडितों की घर वापसी, kshmiri pandit ghar vapsi swdesh

 स्वदेश

       


                                       

जवाहर टनल पार करते ही कश्मीरी पंडितों के लिए एक कॉलोनी बसाने का काम जारी है,यह सब सीआरपीएफ की देखरेख में हो रहा है लेकिन यहां रहने के लिए कश्मीरी  पंडितों को राजी करना,आसान काम नहीं होगा। इसके क्षेत्रीय,सामाजिक,राजनीतिक और सम्पत्ति के पहलू भी है। अनुच्छेद 370 के हटने के बाद वैधानिक कारण तो मजबूत हुए है पर घाटी की फिजां में घुला हुआ साम्प्रदायिक जहर खत्म करने के लिए अभी लंबा सफर बाकी है।


करीब तीन दशक पहले कश्मीर घाटी कश्मीरी पंडितों से आबाद थीमन्दिरों की घंटियां गूंजती रहती थीबारामूला का सोपोर शहर सेब की मंडी के लिए विख्यात है,यहां बहुत सारे कश्मीर पंडित रहा करते थे1990 के बाद यहां से घर बार छोड़कर सब जा चूके हैमंदिर तो अभी भी है लेकिन जीर्ण शीर्ण हालात में है,वे लगभग खंडहर बन चूके हैकश्मीरी पंडितों के लिए इस इलाके में आना बेहद मुश्किल हो गया है,इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब 23 साल बाद 2014 में सोपोर के एक मंदिर में पूजा हुई  तो इसने पूरे देश का ध्यान खींचा था


दक्षिण कश्मीर में शायद ही कोई ऐसा गांव हो जहां मन्दिरों की घंटियां सुनाई देश्रीनगर से थोड़ी दूर पहाड़ी पर शंकराचार्य का मन्दिर है जिसकी घंटियों की  गूंज कभी कभी सीआरपीएफ के कैम्प में सुनाई पड़ती हैआतंकवाद से प्रभावित अनन्तनाग जिले में एक गांव है मट्टनयहां लगभग एक हजार सिख रहते है,इन सिखों के बीच मुश्किल से कोई पंडित परिवार मिल जाएंवैसे कई इलाकों में जो कश्मीरी पंडित रहते है उन्हें सिखों का आसरा और सहारा है और सुरक्षा भी उन्हीं की है


पुलवामा के पास ज्वालादेवी मन्दिर है,कश्मीरी पंडितों की यह इष्टदेवी मानी जाती हैकभी यह मन्दिर पूजा-पाठ,हवन और धार्मिक कार्यक्रमों की पहचान हुआ करता था,अब यह मन्दिर खंडहर है और यहां सीआरपीएफ के जवान सिर झुकाते नजर आते है विख्यात त्रिपुरसुन्दरी का मन्दिर भी तोड़ दिया गया है, कुलगाम के पास देवसर गांव में स्थित इस मन्दिर को कट्टरपंथियों  ने तोड़ दिया थाअनन्तनाग के पास लकड़ीपोरा गांव का भवानीमंदिर भी वीरान है श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में शीतलेश्वर मन्दिर करीब दो हजार साल पुराना है,यहां पिछले साल एक पूजा रखी गई थीकरीब तीन दशक बाद इस मंदिर में पूजा का कार्यक्रम रखा गया था1990 के बाद घाटी में हालात इतने बद से बदतर हो गए की कश्मीरी पंडितों को अपना सब कुछ छोड़कर यहां से जाना पड़ा था,इसके बाद मन्दिर भी सुनसान हो गए




तीन दशक बाद कश्मीर घाटी का माहौल बिल्कुल बदल चूका है। विस्थापित कश्मीरी पंडितों की नई पीढ़ी दिल्ली और लखनऊ जैसे शहरों में पली बड़ी है और वे बेहतर भविष्य के लिए बेहतर माहौल चाहते है। बहुत सारे मजबूर परिवार भी है लेकिन कश्मीर घाटी में जिस प्रकार के हालात है,ऐसे में कोई भी जान को जोखिम में डालकर बिल्कुल लौटना नहीं चाहेगा


कश्मीरी पंडितों के पलायन का 1980 के दशक में अफगानिस्तान की बदलती राजनीतिक स्थिति से भी गहरा सम्बन्ध है1979 में अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ की सेना ने प्रवेश किया था,यह अफगान की साम्यवादी सरकार को बचाने की कोशिश थीइस दौरान अफगानिस्तान से सोवियत सेना को बाहर करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान का उपयोग फ्रंट लाईन राष्ट्र के रूप में किया था। इसके बदले पाकिस्तान को व्यापक आर्थिक और सामरिक सहायता हासिल हुई।1988 में जिनेवा समझौते के बाद सोवियत सेना तो लौट गई लेकिन अफगानिस्तान में शांति कभी स्थापित नहीं हो सकी। पाकिस्तान ने सोवियत सेना के खिलाफ जिन मुजाहिदीनों को प्रशिक्षित किया था,वे आगे चलकर तालिबान के रूप में सामने आये और उन्होंने हिंसात्मक तरीके से अफगानिस्तान की समूची व्यवस्था को नष्ट कर दिया


अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में सीआईए के नेतृत्व में सोवियत संघ को अफगानिस्तान से बाहर निकालने का अभियान शुरू किया गया था। सीआईए ने इस अभियान में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और सऊदी अरब को सक्रिय साझीदार बनाया था। तीनों ने मिलकर मुस्लिम देशों से स्वयंसेवकों का चयन, प्रशिक्षण और उन्हें हथियार देकर अफगानिस्तान भेजना शुरू किया था। इसे जिहाद का नाम दिया गया और समूचे मुस्लिम संसार से कट्टरपंथी ताकतों को इस जिहाद में शामिल होने का आह्वान किया गया। यह जिहाद पूरे एक दशक तक चला और इस दौरान अमेरिका पूरी ताकत के साथ पाकिस्तान के पीछे खड़ा रहा। सोवियत रूस अंतत: इस युद्ध में टिक नहीं पाया और उसे 1989 में अफगानिस्तान छोडऩा पड़ा। अमेरिकी मदद से मुजाहिदीनों ने एक अजेय समझी जाने वाली महाशक्ति को करारी शिकस्त दे दी थी। तत्कालीन समय में साम्यवाद को गहरी चोट देने की अमेरिकी नीति कारगर तो रही लेकिन उसके बीज पूरी दुनिया में रक्तपात करेंगे इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी।


सीआईए की शह पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई  ने पूरी दुनिया से जिहादियों को साथ लाना,फौजी प्रशिक्षण देना और नियमित तनख्वाह पर अत्याधुनिक हथियारों से लैंस कर अफगानिस्तान भेजने का सिलसिला शुरू किया था। बदलते दौर में भी यहीं भाड़े के जिहादी आज पूरी मुस्लिम दुनिया और खासकर दक्षिण और मध्य एशिया में आतंकवादी गतिविधियों की असली बागडोर संभाले हुए है।


पाकिस्तान ने उन आतंकियों की फौज को तैयार करने के लिए पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर का सहारा लिया था और यहां कई आतंकी प्रशिक्षण केंद्र बनाएं थे।  कश्मीर घाटी में आतंक फ़ैलाने वाले लश्कर-ए-तैयबा,हिजबुल मुजाहिदीन और हरकत-उल-अंसार जैसे आतंकी संगठन यहीं से पनपे।


समय के साथ पाकिस्तान जेहादियों का ऐसा समूह बन गया  है जिसे अलकायदा,तालिबान,हरकत उल अंसार और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे कुख्यात आतंकी संगठनों का समर्थन प्राप्त है। मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। 1993 पाकिस्तान  में बने आतंकी संगठन हरकत-उल अंसार का मुख्यालय मुजफ्फराबाद में है। इसके साथ की इसका एक केंद्र अफगानिस्तान के खोस्त में है। यह कश्मीर के अलावा बोस्निया और म्यांमार में भी सक्रिय है। कुख्यात आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन का मुख्यालय पाकिस्तान के सेहसाणा में है। करगिल युद्ध में पाक सेना के साथ इस आतंकी संगठन के आतंकी भी शामिल थे। हिजबुल मुजाहिदीन का केंद्र मुजफ्फराबाद में है। इन आतंकी प्रशिक्षण केंद्र  में भर्ती के लिए जिहाद को केंद्र में रखकर नए रंगरूटों के लिए अख़बारों में विज्ञापन सामान्य बात है।


पाकिस्तान के इन कुख्यात आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों में मसूद अजहर की खास भूमिका है। जैश-ए-मोहम्मद यानि अल्लाह की फ़ौज का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाक का एक प्रमुख आतंकी है। अजहर छह लाख आतंकियों की भर्ती का दावा करता है जिसमें से हजारों कश्मीर में जिहाद के लिए भर्ती किये गये है।इस आतंकी संगठन का तन्त्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। कश्मीर का यह आतंकी भारत में आत्मघाती हमलों को अंजाम देने लिए दुनियाभर में कुख्यात है। कट्टरपंथी विचारों वाले ऑडियो कैसेट कश्मीर घाटी में भेज कर युवा वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करता है।


इन सबके बीच कश्मीर घाटी को कश्मीरी पंडितों के लिए मुश्किल बनाने में पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जिया-उल-हक की प्रमुख भूमिका रही है जिन्होंने 1980 के दशक में ऑपरेशन टोपैक के जरिए कश्मीर घाटी को रक्त रंजित करने की व्यापक योजना को अंजाम दिया थाजिया उल हक का आमने सामने के युद्द में भारत से नहीं जीता जा सकता अत: छद्म युद्द का सहारा लेना चाहिए इसी योजना के अनुसार कश्मीर घाटी में धार्मिक कट्टरपंथ को भड़काया गयाजिया उल हक ने अफगानिस्तान के आतंकियों की घाटी में व्यापक घुसपैठ कराकर कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने का षड्यंत्र रचा इस दौरान कट्टरपंथी ताकतों को भी बढ़ावा दिया गयाघाटी की मस्जिदों में पाकिस्तान से आएं मौलवी की तकरीरों ने जहर घोलने का काम किया और इस प्रकार देखते ही देखते घाटी की फिजां में साम्प्रदायिक जहर घोल दिया गया 


कश्मीर घाटी में रहने वाली नयी पीढ़ी उसी साम्प्रदायिक माहौल में पली बड़ी है और उनके लिए कश्मीरी पंडितों के प्रति सहिष्णुता का भाव लाना इतना आसान नहीं हैकश्मीर की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां भी कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव में है अत: वे भी कश्मीरी पंडितों की घर वापसी को लेकर कभी संवेदनशील नहीं दिखाई पड़ती


इन सबके साथ कश्मीरी पंडितों की सम्पत्ति पर हुए कब्ज़े को खत्म करना आसान नहीं होगायह समस्या कश्मीर ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले हिन्दुओं की भी हैतकरीबन पचहत्तर साल पहले 1946 में लक्ष्मी पूजन के दिन नोआखाली में भीषण साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए थे उस समय जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे से सबसे ज्यादा प्रभावित इस क्षेत्र में हजारों हिन्दुओं का कत्लेआम कर दिया गया था1946 में नोआखाली मुस्लिम बहुल था,लेकिन ज़मींदारों में हिंदुओं की संख्या अधिक थी उस समय यह माना गया था कि नोआखाली में एक सुनियोजित दंगा था,जिसका लक्ष्य  हिंदुओं को भगाकर उनकी संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करना था इस समय भी बांग्लादेश में हालात मिले जुले और समान नजर आते है

बंग्लादेश के नोआखाली समेत जेसोर,देबीगंज,राजशाही,मोईदनारहाट,शांतिपुर,प्रोधनपारा,आलमनगर,खुलना,राजशाही,रंगपुर और चटगांव जैसे अहम इलाकों से हिंदू पलायन अब भी जारी हैढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ.अबुल बरकत का एक शोध 2016 में सामने आया था जिसके अनुसार यह दावा किया गया है कि  करीब तीन दशक में बांग्लादेश से हिंदुओं का नामोनिशान मिट जाएगा। इस शोध के मुताबिक हर दिन अल्पसंख्यक समुदाय के औसतन 632 लोग बांग्लादेश छोड़कर जा रहे हैंदेश छोड़ने की यह दर बीते 49 सालों से चल रहा है और यदि यही दर आगे भी जारी रही तो अगले 30 सालों में देश से करीब-करीब सभी हिंदू चले जाएंगे पाकिस्तान और बांग्लादेश से हिन्दुओं के पलायन का प्रमुख कारण सम्पत्ति रही है,जिस पर कब्जा करने के लिए मुस्लिमों द्वारा अक्सर और सुनियोजित रूप से उन्हें निशाना बनाया जाता है


इन देशों में हालात इतने खराब है कि अदालत के निर्णय के बाद भी हिंदुओं का सम्पत्ति को शांतिपूर्ण हस्तान्तरण मुमकिन नहीं होता। कश्मीर घाटी में भी हालात बहुत अलग नहीं है यहां के दूरस्थ इलाकों में केंद्र की सरकार और प्रशासन यदि कश्मीरी पंडितों की सम्पत्ति वापस लौटाने के लिए व्यापक अभियान छेड़ भी दे। फिर भी चुनौतियां कम नहीं हो सकती। पाकिस्तान की शह पर घाटी में प्रभावी कट्टरपंथी ताकतें,आतंकवादी संगठन और क्षेत्रीय राजनीतिक दल कश्मीरी पंडितों के लिए स्थितियां अनुकूल होने देंगे,यह सपना ही नजर आता है

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