यूक्रेन संकट,भारत की रणनीतिक चुनौती bharat yukren sahara

 

राष्ट्रीय सहारा


सामरिक महत्वाकांक्षाएं अक्सर रणनीतिक होती है जबकि आर्थिक और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में यथार्थवाद हावी होता है। यूक्रेन के वैश्विक संकट के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का रूस का सफर असमंजस बढ़ा गया। दरअसल दक्षिण एशिया का भूराजनीतिक वातावरण पाकिस्तान की कुटिल नीतियों से बूरी तरह प्रभावित रहा है और इससे अनिश्चिताओं में वृद्धि हुई है।



भारत रूस और पाकिस्तान के किसी भी प्रकार के सम्बन्धों को लेकर इतना सजग रहा है कि किसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को रूस जाने के लिए 23 साल तक इंतजार करना पड़ा।यह भी बेहद दिलचस्प है कि यूक्रेन संकट पर भारत की बेहद सधी हुई प्रतिक्रिया रही और इसे रूस की और झूका हुआ देखा गया।इन सबके बीच बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को रूस की भी जरूरत है और अमेरिका भी उसका बढ़ा सामरिक और आर्थिक साझेदार है।खासकर सीमा पर चीन की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत को रूस,अमेरिका और यूरोपियन देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्धों की समान जरूरत है,ऐसे में यूक्रेन संकट ने भारत की राजनैतिक चुनौतियां बढ़ा दी है।यूक्रेन को लेकर रूस और पश्चिम के देश आमने-सामने हैं।  इस समय भारत के लिए चुप रहना मुश्किल है लेकिन राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए रुको और देखों की नीति ही भारत के लिए अंतिम विकल्प नजर आती है।


दरअसल भारत अपनी कुल रक्षा ज़रूरतों का 70 फ़ीसदी हथियार रूस से आयात करता है,दुनिया के किसी भी दूसरे देश के साथ भारत का इतने विशाल स्तर पर सामरिक सहयोग नहीं है।1974 में भारत द्वारा किया गया परमाणु परीक्षण हो या युद्धपोत पनडुब्बी,आधुनिकतम टैंक,मिसाइल तकनीकी,स्पेस तकनीकी या पंचवर्षीय योजनाएं रुस ने एक अच्छे मित्र की तरह सदैव भारत के पक्ष में आवाज बुलन्द की है।सीमा पर चीन की आक्रामता को देखते हुए भारत को न केवल रूस की ज़रूरत है बल्कि अमेरिका और यूरोप की भी ज़रूरत है। सीमा पर चीनी आक्रामकता को लेकर अमेरिका भारत के समर्थन में बोलता रहा है। चीन को नियंत्रित करने के लिए भारत ने अमेरिका और अन्य देशों के साथ समुद्री सहयोग के जरिये क्वाड का हिस्सा बनकर बड़ा दांव खेला है।दूसरी तरफ़ यूरोप और अमेरिका भी भारत के अहम साझेदार हैं। भारत-चीन सीमा पर निगरानी रखने में भारतीय सेना को अमेरिकी एयरक्राफ़्ट से मदद मिलती है। सैनिकों के लिए विंटर क्लोथिंग भारत अमेरिका और यूरोप से ख़रीदता है। ऐसे में भारत न तो रूस को छोड़ सकता है और न ही पश्चिम को।


शक्ति संतुलन की व्यवस्था अस्थाई और अस्थिर होती है,वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को शांति और स्थिरता बनाये रखने का एक साधन माना जाता है। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वैदेशिक नीति में आवश्यकता के अनुसार बदलाव करना और उसकी गतिशीलता को बनाये रखना। भारत की हिन्द महासागर को लेकर वर्तमान नीति शक्ति संतुलन पर आधारित है।हिन्द महासागर की सुरक्षा को लेकर भारत मुखर रहा है और उस पर चीन का प्रभाव उसे आशंकित भी करता रहा है।2007 में स्थापित क्वाड भारत, जापान,संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का समूह है जो स्वतंत्र,खुले और समृद्धहिंद-प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित करने की बात कहते रहे है। हालांकि इन चार देशों के साझा उद्देश्य को लेकर चीन के साथ रूस इसकी आलोचना करता रहा है।अमेरिका की नजर हिन्द प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक और आर्थिक महत्व पर भी है। इस क्षेत्र में चीन ने कई देशों को चुनौती देकर विवादों को बढ़ाया है। चीन वन बेल्ट वन रोड परियोजना को साकार कर दुनिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और उसके केंद्र में हिन्द प्रशांत क्षेत्र की अहम भागीदारी है। चीन पाकिस्तान की बढ़ती साझेदारी ने भी समस्याओं को बढ़ाया है। चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का प्रमुख भागीदार है। श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट,बांग्लादेश का चिटगाँव पोर्ट,म्यांमार की सितवे परियोजना समेत मालद्वीप के कई निर्जन द्वीपों को चीनी कब्ज़े से भारत की सामरिक और समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ गई है। दक्षिण चीन सागर का इलाक़ा हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच है और चीन,ताइवान,वियतनाम,मलेशिया,इंडोनेशिया,ब्रुनेई और फिलीपींस से घिरा हुआ है। यहाँ आसियान के कई  देशों के साथ चीन विवाद चलता रहता है। अभी तक चीन पर आर्थिक निर्भरता के चलते अधिकांश देश चीन को चुनौती देने में नाकामयाब रहे थे।अब क्वाड के बाद कई देश खुलकर चीन का विरोध करने लगे है और यह भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए सकारात्मक सन्देश है।इन सबके बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के पृथकतावादी विद्रोही इलाक़े को स्वतंत्र राज्य की मान्यता  देकर संकट को बढ़ा दिया है।पूर्वी यूक्रेन में स्वघोषित पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ दोनेत्स्क और लुहांस्क रूस समर्थित विद्रोहियों का घर है,ये विद्रोही 2014 से ही यूक्रेन से लड़ रहे हैं।2014 में रूस ने यूक्रेन के क्राइमिया को अपने में मिला था तो भारत ने रूस के पक्ष में अपना समर्थन दिया था लेकिन अब स्थितियां बदल गई है।ताजा यूक्रेन संकट में क्वॉड में भारत एकमात्र देश है जो रूसी आक्रामकता की अनदेखी कर रहा है,लेकिन उसका रूस का खुलकर पक्ष लेना अमेरिका समेत यूरोपीय सहयोगियों को नाराज कर सकता है।


वहीं पश्चिम के देश रूस पर प्रतिबंध लगा रहे है और इसका फायदा चीन को मिल सकता है,ऐसी स्थिति में चीन-रूस की क़रीबी और बढ़ेगी।  यह स्थिति पाकिस्तान और रूस की नजदीकियां बढने के लिए भी मुफीद हो सकती है।पाकिस्तान ऊर्जा की किल्लत से जूझ रहा है और रूस के लिए गैस बेचने का यह बढ़ा अवसर हो सकता है।पिछले कुछ वर्षों में रूस के साथ पाकिस्तान के सामरिक सम्बन्ध भी बढ़े है।2014 में राष्ट्रपति पुतिन ने पाकिस्तान से हथियारों को लेकर प्रतिबंध हटा लिया था।रूसी मिग-35M कॉम्बैट हेलिकॉप्टर को लेकर पाकिस्तान से एक समझौता भी हुआ था।2018 में रूस-पाकिस्तान सैन्य सहयोग समझौते के बाद पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को रूसी सेना ने ट्रेनिंग दीथी तथा दोनों देशों के बीच कई बार आतंकवाद विरोधी सैन्य अभ्यास भी हो चुका है।अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी नेतृत्व वाला सैन्य गठबंधन वापस जाने से पाकिस्तान और रूस के बीच रक्षा सहयोग बढ़ा है और यह भारत की चिंता बढ़ाने वाला है।


दूसरी ओर यूक्रेन संकट बढ़ने से भारत में तेल की कीमतों में इजाफा हो सकता है और कोरोनाकाल से अर्थव्यवस्था को उबारने का संकट फ़िलहाल बढ़ सकता है।रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से भारत का वह अहम सैन्य सौदा प्रभावित होगा जिसे लेकर अभी तक अमेरिका खामोश रहा है।अमेरिका ने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम ख़रीदने के लिए भारत के ख़िलाफ़ अभी तक कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है,लेकिन अब अमेरिका इस पर विचार कर सकता है।एस-400 रूस का बेहद आधुनिक मिसाइल सिस्टम है।इसकी तुलना अमेरिका के बेहतरीन एयर डिफ़ेंस सिस्टम पैट्रिअट मिसाइल से होती है। यह सिस्टम मिलने से भारत को चीन और पाकिस्तान पर सामरिक बढ़त हासिल हो सकती है और इसकी वर्तमान में जरूरत भी है।


अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी सिद्धांत यह कहता है कि किसी सम्प्रभु राष्ट्र के लिए शक्ति,शक्ति संतुलन,राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी संकल्पनाएं महत्वपूर्ण है और राष्ट्र की सुरक्षा उसका स्वयं का दायित्व है।यूक्रेन-रूस संकट भारत की विदेश नीति के लिए परीक्षा की घड़ी है। 

यूक्रेन का वैश्विक संकट,ukren janstta

 जनसत्ता


                                  

 

इतिहास को फिर से गढ़ने की महत्वाकांक्षाएं अक्सर विध्वंसक परिणामों से आशंकित रहती है। चीन और रूस जैसे देश अपने स्वर्णिम इतिहास को दोहराने की कोशिशों में भौगोलिक और सांस्कृतिक विखंडन को दरकिनार करना चाहते है जो असम्भव होकर अस्थिरता को बढ़ाता है। इसके बाद भी इन राष्ट्रों की शक्ति की अतिप्रबलता से सब कुछ हासिल करने की कोशिशें बदस्तूर जारी है और यह विश्व शांति के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।


 

दरअसल पूर्वी यूरोप का  यूक्रेन संकट करीब एक हजार साल पहले कीवयाई रूस की उस ऐतिहासिक पहचान से प्रभावित है,जिसे रुसी राष्ट्रपति पुतिन किसी भी स्थिति में बनाएं और बचाएं रखने के लिए दृढ संकल्पित नजर आते हैकीवयाई रूस मध्यकालीन यूरोप का एक राज्य थाआधुनिक रूस,बेलारूस और  यूक्रेन राष्ट्र तीनों अपनी पहचान कीवयाई रूस राज्य से लेते हैंअब यह राज्य अलग अलग है लेकिन जहां यूक्रेन रुसी पहचान से अलग होने को बेताब है वहीं रूस और बेलारूस साथ साथ खड़े नजर आते है। यूक्रेन पर दबाव बनाने के लिए रूस ने बेलारूस में अपने सैनिकों के साथ अत्याधुनिक और विध्वंसक हथियार जमा कर दिए है रूस यूक्रेन को केवल एक अन्य देश के रूप में नहीं देखता है। उसका दृष्टिकोण यूक्रेन को बहुस्लाविक राष्ट्र मानता है। रूस सामरिक सुरक्षा के लिए भी यूक्रेन पर निर्भर रहा है और उसे  कूटनीतिक और सैन्य रणनीति की धुरी के तौर पर देखता है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर है,जब उस पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पश्चिम से हमला हुआ था तब ये यूक्रेन का ही क्षेत्र था जहां से उसने अपनी रक्षा की थी। यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोपीय देशों और पूर्व में रूस के साथ लगती है।


 

पिछले तीन दशक में मध्य और पूर्वी यूरोप की राजनैतिक स्थिति में बड़े बदलाव हुए है और इससे सामरिक प्रतिद्वंदिता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई हैइस क्षेत्र में दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच भू-राजनीतिक मुक़ाबला चरम पर है  यूक्रेन पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करने की लगातार कोशिश कर रहा है1991 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद यूक्रेन एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरा था यूक्रेन का भौगोलिक जुड़ाव यूरोप से है और इसे  सामरिक रूप से एक शक्तिशाली देश माना जाता है। इसका  एक कारण यह भी है कि अविभाजित सोवियत संघ के अधिकांश आणविक केंद्र यूक्रेन में रहे थे अत: यह न केवल रूस के लिए अहम बना रहा बल्कि यूरोपियन देशों की नजर भी इस पर बनी रही। 2002 में जब युक्रेन ने नाटो में शामिल होने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान किया तो पुतिन को यह नागवार गुजरा कुख्यात ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी का मानना  है कि पश्चिमी  देशों के गोपनीय अभियानों के कारण सोवियत संघ का विघटन हुआ थापुतिन केजीबी के अधिकारी रहे है और उनके कार्यों में बदला और पुराना गौरव लौटाने की चेष्टा अक्सर दिखाई देती हैउन्होंने  यूक्रेन को कमजोर करने के लिए उसके एक क्षेत्र क्रीमिया में अलगाव उत्पन्न करके 2014 में उसका रूस में विलय कर दिया थाइसकी वैश्विक  हलकों में कड़ी आलोचना हुई इसके बाद रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाए गए थे और पश्चिम के साथ इसके अलगाव को और बल मिला थाक्राइमियाई शहर सेवास्तोपोल का बंदरगाह प्रमुख नौसैनिक अड्डा है और 1783 से काला सागर बड़े पोतों का ठिकाना रहा हैसेवास्तोपोल में रूसी पोतों की मौजूदगी रूस और यूक्रेन में तनाव का केंद्र है

 

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अहस्तक्षेप को अंतर्राष्ट्रीय विधि का आधार माना गया है लेकिन महाशक्तियों के हस्तक्षेप शक्ति संतुलन का माध्यम रहा है रुसी राष्ट्रपति पुतिन का प्रभुत्ववादी व्यक्तित्व वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक आशंकाओं को बढ़ाता रहा हैनाटो और अमेरिका को स्वयं की शक्ति का आभास तो है लेकिन वे पुतिन के अप्रत्याशित और अविश्वसनीय कदमों से विचलित रहे है नाटो के विस्तार को लेकर रूस और अमेरिका के बीच मतभेद होते रहे है,वहीं  यूक्रेन का विवाद पुतिन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता हैयूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामक नीतियों में पुतिन की अधिकनायकवादी विचारधारा प्रभावी रही है,जिसके अनुसार रूस के पड़ोसियों की नीतियां रूस के हितों से अलग नहीं हो सकती और जब भी कोई देश ऐसा करने की मंशा दर्शाता है,पुतिन आक्रामक हो जाते है। इस समय रूस यूरोप से लगे अपने पड़ोसी यूक्रेन की सीमा पर रूस का पूरा दबाव है और यह युद्द की पूर्व स्थितियों को दर्शा रहा है रूस का आरोप है कि नाटो यूक्रेन को लगातार हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं और अमेरिका दोनों देशों के बीच के तनाव को भड़का रहा हैरूस चाहता है कि नाटो की सेनाएं 1997 के पहले की तरह सीमाओं पर लौट जाए तथा नाटो गठबंधन पूर्व में अब अपनी सेना का और विस्तार न करे और पूर्वी यूरोप में अपनी सै​न्य ​गति​विधियां बंद कर दे इसका मतलब ये होगा कि नेटो को पोलैंड और बाल्टिक देशों एस्टोनिया,लातविया और लिथुआनिया से अपनी सेनाएं वापस बुलानी होगी 

यूक्रेन को लेकर रूस का अविश्वास उसे किसी हद तक ले जा सकता है  रूस को यह लगता है कि  यूक्रेन को नाटो का समर्थन यूरोपियन देशों की बड़ी साजिश का हिस्सा है रूस पर सामरिक दबाव बनाने के लिए नाटो और अमेरिका के लिए यूक्रेन निर्णायक भूमिका में नजर आता है।  नाटो की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक समुद्री सुरक्षा है। जिसके लिये नाटो ने अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर को केंद्र में रखा है,यहीं नहीं उसके लिए काला सागर सामरिक रूप से बहुत  अहम है जो रूस और यूक्रेन से भी जुड़ा है। नाटो जमीन,आसमान,स्पेस और साइबर चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सेना को अत्याधुनिक बनाने की ओर अग्रसर है,इसमें उसकी सीधी प्रतिद्वंदिता रूस और चीन से है।  काला सागर उत्तर-पूर्व में  रूस  और  यूक्रेन तथा  दक्षिण में तुर्की के बीच स्थित है।

वहीं यूक्रेन का आरोप है कि रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी यूक्रेन को तोड़ने के लिए वहां रह रहे रूसी मूल के लोगों को भड़काने की योजना पर लगातार काम कर रही है। अमेरिका ने इसकी पुष्टि भी की है। इस समय जब यूक्रेन की सीमा पर भारी तनाव है,उसका असर अमेरिका और रूस के सम्बन्धों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है।  

गौरतलब है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के नेतृत्व में सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक हितों के प्रति एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ाने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र  संगठन सीआईएस  का गठन 8 दिसम्बर 1991 को किया गया था जिसे मिंस्क समझौता कहा जाता है। सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये राज्यों की  सीआईएस के अंतर्गत सामूहिक नीतियां बनाई गई। यह संगठन मुख्य रूप से व्यापार,वित्त,कानून निर्माण,सुरक्षा तथा सदस्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने जैसे कार्य करता है। इस संगठन की स्थापना में यूक्रेन का भी अहम योगदान माना जाता था। लेकिन रूस को लेकर  यूक्रेन के हस्तक्षेप से अब स्थितियां बदल गई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने रूस को चेतावनी दी है कि रूस ने यदि यूक्रेन पर हमला किया तो उस पर कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा  कूटनीतिक रूप से यह माना जा रहा है कि रूस के लिए सबसे बड़ा आर्थिक झटका ये हो सकता है कि रूस के बैंकिंग सिस्टम को अंतरराष्ट्रीय स्विफ़्ट पेमेंट सिस्टम से काट दिया जाए


वहीं यूक्रेन संकट में रूस के साथ चीन  का आना नई  आर्थिक और सामरिक व्यवस्था की संभावनाओं को बढ़ा सकता है। यूक्रेन में संकट बढ़ने पर चीन अगर रूस का खुले रूप से समर्थन करता है तो यूरोपियन यूनियन इसका विरोध कर सकता हैयूरोपियन यूनियन,चीन का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर हैयूक्रेन संकट के बढ़ने पर पश्चिम के देश रूस पर भी प्रतिबंध लगा सकते हैं,ऐसे में चीन,रूस को बड़ी आर्थिक मदद दे सकता हैइस मदद में वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था तैयार करना,रूस के बैंकों और फ़र्म को लोन देना और रूस से तेल की ख़रीद जैसी चीज़ें चीन कर सकता है1991 में सोवियत संघ के विघटन और वैश्वीकरण की नीति के बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलने के साथ चीन का आर्थिक दबदबा बढ़ा और उसे रूस पर बढ़त हासिल हो गई इसी का प्रभाव है कि चीन का रूस से सीमा विवाद लगभग समाप्त हो चूका है2004 में  रूस और चीन के बीच हुए समझौते में सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था इस समय चीन और रूस आर्थिक साझेदारी को लगातार बढ़ा रहे है,चीन रूस से गैस और हथियार खरीद रहा है,वहीं चीन की कई कम्पनियां रूस में बड़े पैमाने पर निर्माण में मदद कर रही है दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गलियारे ‘वन बेल्ट-वन रोड’ परियोजना को लेकर 2017 में चीन में  द्वारा आयोजित शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन शामिल हुए थे चीन रूस का बढ़ता सहयोग अमेरिका और नाटो की चिंता को बढ़ा सकता है  चीन रूस के मुकाबले कही बेहतर प्रतिद्वंदी बनकर अमेरिका के सामने आ रहा है और  बाइडन इससे निपटने के लिए मुख्य रूप से यूरोप की ओर देख रहे है नाटो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों के मध्य एक सैन्य गठबंधन है जिसका उद्देश्य साम्यवाद और रूस का प्रभाव कम करना रहा है। अब चीन की बढती ताकत से साम्यवाद के मजबूत होने की आशंका नाटो को परेशान कर रही है। अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर पर भी रूस का रुख साम्यवाद को मजबूत करता नजर आया जो वैश्विक तौर पर चीन रूस की भागीदारी को प्रतिबिम्बित करता है

जाहिर है यूक्रेन को लेकर जो युद्द की आशंकाएं गहरा रही है,उसका वैश्विक असर बेहद खतरनाक हो सकता है। यह नए शीत युद्द के उभरने के स्पष्ट संकेत है जो पहले से ज्यादा विनाशकारी हो सकते है। वैश्विक समुदाय को इस  संघर्ष को किसी भी हाल भी बढ़ने से रोकना होगा   

 

कर्ज का जंजाल,karj ka janjal shrilanka rashtriy sahara

 

राष्ट्रीय सहारा



                                 

                                                                    

युक्तिमूलक सौदेबाज़ी में कूटनीतिक दांवपेंचों का सहारा लेते हुए सारपूर्ण तथ्य प्राप्त करने की इच्छा रहती है और इसके पीछे शक्ति के प्रबल तत्व रहते हैभारत का पड़ोसी देश श्रीलंका चीन की युक्तिमूलक सौदेबाज़ी के कुचक्र में बूरी तरह फंस गया है दक्षिण एशिया का यह सबसे खूबसूरत देश अपने पर्यटन बाज़ार और चाय के बूते कभी खुशहाल माना जाता था लेकिन राजपक्षे परिवार का चीन के प्रति अतिशय और अदूरदर्शी प्रेम कर्ज के जंजाल का कारण बन गया हैइस समय यहां पर महंगाई दर में 12 फीसदी से ज्यादा की अभूतपूर्व वृद्धि  हो गई है बढ़ते बजट घाटे के बीच श्रीलंका ने कम ब्याज दर बनाए रखने की कोशिश में ढेर सारी मुद्रा छापी है रोजमर्रा की चीजों के भाव आसमान को छू रहे हैदेश के पास विदेशी मुद्रा के भण्डार तेज़ी से ख़त्म भी हो रहे हैंश्रीलंका के पास महज डेढ़ अरब डालर की विदेशी मुद्रा बची है जो तीन साल  पहले करीब साढ़े सात डालर हुआ करती थी श्रीलंका के केंद्रीय बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ़ श्रीलंका ने अपने पास रखे आधे से अधिक गोल्ड रिज़र्व को बेच दिया है। लेकिन इन सबसे लोगों को कोई राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही है।


अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग संस्था फिच ने भी अपनी रेटिंग में श्रीलंका को नीचे कर दिया हैइस प्रकार दक्षिण एशियाई क्षेत्र में दूसरे देशों की तुलना में श्रीलंका सबसे बुरी आर्थिक स्थिति में खड़ा हुआ है श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे देश में पहले ही आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर चुके हैं जिसमें सेना को खाद्यान्नों के वितरण के लिए विशेष अधिकार भी दिए गए हैं

किसी गरीब देश के ढांचागत,संस्थागत और क्रमिक विकास को दरकिनार कर उसे तेजी से अमीर बनाने की राजपक्षे बंधुओं की राजनीतिक धून श्रीलंका के अस्तित्व पर प्रहार करने वाली साबित हुई है। राजनीतिक सत्ता का फायदा उठाकर और सिंहली राष्ट्रवाद को हवा देकर राजपक्षे बंधुओं ने चीन से ऐसे समझौते किए जो उसे उपनिवेश बनाने के लिए पर्याप्त थे। इस दौरान संविधानिक नियमों को भी नजरअंदाज कर दिया गया।  दुबई और सिंगापूर की तर्ज पर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र श्रीलंका को बनाने की चीनी पेशकश को आँख मूंदकर स्वीकार कर लिया गया। पिछले साल श्रीलंका की संसद ने पोर्ट सिटी इकोनॉमिक कमिशन बिल पारित किया थायह बिल चीन की वित्तीय मदद से बनने वाले इलाकों को विशेष छूट देता हैविशेष आर्थिक ज़ोन विकसित करने और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के नाम पर बनाये गए इन कानूनों को लेकर न तो विपक्षी दलों से बात की गई और न ही देश में आम राय कायम करने की कोशिश की गईपोर्ट सिटी कोलंबो,श्रीलंका की व्यावसायिक राजधानी में 269 हेक्टेयर परिसर में फैली 1.4 अरब डॉलर की एक भूमि सुधार परियोजना हैइस परियोजना का निर्माण कार्य और फंडिंग चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी कर रही है इसमें से 116 हेक्टेयर की ज़मीन चीनी कंपनी को 99 साल के लिए लीज़ पर दी गई है


श्रीलंका का कायापलट करने के नाम पर विकसित की जा रही इस परियोजना को लेकर आलोचकों का कहना है कि पोर्ट सिटी का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग और दूसरे वित्तीय घपलों के लिए किया जाएगा। चीन पर हथियारों के अवैध कारोबार के आरोप तो पहले ही लगते रहे है।

इसके पहले चीन के छोटे किसानों के हितों की अनदेखी करके सरकार जैविक खेती के चीन के व्यापारिक मॉडल में उलझ गईसरकार ने अचानक ही रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया,इससे कृषि समुदाय पर व्यापक रूप से असर पड़ा है और कृषि अर्थव्यवस्था चौपट हो गई हैश्रीलंकाई सरकार ने पिछले साल मई में ये फ़ैसला लिया था कि वो जैविक खाद से खेती करने वाला दुनिया का पहला देश बनेगा और अचानक ही सभी रासायनिक खाद के आयात को बंद करने के बाद यह ऑर्डर चीन को दिया था। इसके लिए जैविक खाद बनाने वाली चीन की कंपनी क़िंगदाओ सीविन बायोटेक ग्रुप से 49.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भारी भरकम समझौता किया गया  चीन ने अपनी बेल्ट ऐंड रोड परियोजना के तहत श्रीलंका को अरबों डॉलर का कर्ज़ दिया हैइस समय श्रीलंका चीन के क़र्ज़ तले दबा हुआ है और यह अंदेशा है कि कर्ज न  चूका पाने की स्थिति में श्रीलंका के अधिकांश क्षेत्रों का चीन अधिग्रहण कर सकता है


 

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महाशक्तियाँ आर्थिक सहायता के नाम पर पर पिछड़े,अतिपिछड़े,विकासशील और अल्प विकसित  राष्ट्रों का दोहन करती रही है। इन नीतियों से एशिया और अफ्रीका के कई देश गृहयुद्द के शिकार हो गए। श्रीलंका कुछ सालों पहले ही तमिल समस्या को नियंत्रित करने में सफल  हुआ  था और अब यह देश दिवालिया होता है तो हिंसक संघर्ष में फिर से घिर सकता है। महंगाई बढ़ने से लोग परेशान है,इससे आम जनता में नाराजगी बढ़ती जा रही है।  सरकार को राजस्व मिलना बंद हो सकता है टैक्स देना लोग बंद कर  सकते है और ऐसे में  नए नोट छापने का कोई मतलब नहीं रह जाता हैसरकार लोगों से अपील कर रही है कि उनके पास विदेशी मुद्रा हो तो वे श्रीलंकाई मुद्रा के बदले उसे जमा करेंवहीं संकट गहरा रहा है कि  लोग देश की मुद्रा स्वीकार करना बंद न कर दे  क्योंकि हर मिनट उसका मूल्य गिरने की आशंका बढ़ती जा रही है  


श्रीलंका ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक सहायता हासिल करने की काफी कोशिशें की लेकिन आईएमएफ़ ने उसकी मांग को अनसुना कर दिया क्योंकि देश की मौजूदा सरकार एजेंसी के हिसाब से आर्थिक सुधार के एजेंडे पर अमल करने का इरादा नहीं रखती थी अगले कुछ महीनों में सरकार और श्रीलंका के निजी सेक्टरों को क़रीब सात अरब डॉलर के क़र्ज़ का भुगतान करना है। जबकि श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के अनुसार देश के पास कुल विदेशी मुद्रा ख़त्म होने की कगार पर पहुँच गया है


इन सबके बीच यह देखने में आया है कि चीन के आर्थिक शक्ति के रूप में उभार के बाद दिवालिया होने की स्थिति में कोई भी देश अमेरिका परस्त एजेंसियां आईएमएफ़ और वर्ल्ड बैंक पर निर्भर नहीं हैं। चीन श्रीलंका को दिवालिया होने से बचाएं रखने की कीमत पर उसका अपने सामरिक और आर्थिक हितों के लिए भरपूर दोहन कर सकता है। इससे भारत की सुरक्षा चिंताओं में भारी इजाफा हो सकता है। हालांकि भारत ने श्रीलंका को संकट से उबारने के लिए उसकी आर्थिक मदद तो की है लेकिन चीन के मुकाबले यह बहुत कम है।


चीन ने श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट का निर्माण कर हिंद महासागर में भारत की चुनौती को बढ़ा चूका हैश्रीलंका ने चीन को लीज़ पर समुद्र में जो इलाक़ा सौंपा है वह भारत से महज़ 100 मील की दूरी पर है चीन भारत को हिन्द महासागर में स्थित पड़ोसी देशों के बन्दरगाहों का विकास कर चारो और से घेरना चाहता है हिन्द महासागर में अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए भारत को श्रीलंका से संबंध भी मधुर रखना है और तमिलों के अधिकारों की रक्षा भी करना है। वहीं श्रीलंका में अस्थिरता भारत का संकट बढ़ा सकती है। फ़िलहाल चीन म्यांमार की तर्ज पर श्रीलंका में भी राजनीतिक अस्थिरता कायम करने की और अग्रसर है।

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...