आर्थिक कूटनीति से बदलेगा पाक,जनसत्ता pak surksha niti janstta

 जनसत्ता

                

                                                                      

आठवे दशक में प्रवेश कर चूका पाकिस्तान का निर्देशित जनतंत्र अब भारत के समतावादी लोकतंत्र की उपयोगिता और परिणामों को समझने को मजबूर हुआ है। पाकिस्तान की नई सुरक्षा नीति में पहली बार भू राजनैतिक और सामरिक नीति पर भू आर्थिक नीति को तरजीह देने की बात कहीं गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान  इस समय देश को दिवालिया होने से बचाने की कड़ी चुनौती से  जूझ रहे हैउनकी चिंता नई सुरक्षा नीति में प्रतिबिम्बित हो रही है जिसमें यह कहा गया है कि सैन्य रूप से पाकिस्तान जितना भी मजबूत हो लेकिन अगर इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो ये अपनी आज़ादी और संप्रभुता की हिफाजत नहीं कर सकता हैउन्होंने स्पष्ट किया है कि नई सुरक्षा नीति का फोकस देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने पर है और अब से विदेश नीति में भी आर्थिक कूटनीति को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा


 

दरअसल पाकिस्तान ने नई सुरक्षा नीति के जरिए अपने देश की जनता और वैश्विक समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की है वह एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरने को तैयार है जहां व्यापार और व्यवसाय के लिए बेहतर माहौल हो तथा प्रशासन भी इसी के अनुरूप हो। पाकिस्तान इस समय गहरे आर्थिक संकट में फंसा हुआ है,कर्ज उस पर लगातार बढ़ रहा है। पड़ोसी देशों से सम्बन्ध बेहद नाजुक है,वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का वह सामना करने को मजबूर है तथा 2023 में होने वाले आम चुनावों में इमरान खान के सामने सत्ता बचाएं रखने की असल चुनौती भी है।

 


1947 में भारत से विभाजित होकर अस्तित्व में आये पाकिस्तान ने लगातार राजनीतिक अस्थिरता का सामना किया है। अजनतांत्रिक और तानाशाहों से अभिशिप्त इस दक्षिण एशियाई देश के लोग लगातार अपने सैन्य शासकों की सामरिक असुरक्षा की नीति के बहकावे में आते रहे। यहीं कारण है कि पाकिस्तान खस्ताहाल और कंगाल राष्ट्र बनकर अपने अस्तित्व के संकट से बुरी  तरह जूझ रहा है। आज़ादी के बाद भारत की नीति समावेशी विकास और शांति पर आधारित रही वहीं पाकिस्तान 1950 के दशक में ही शीतकालीन सैन्य गुट सिएटों और सैंटो का सदस्य बनकर वैश्विक शक्तियों के सामरिक हितों का संवर्धन करने वाला माध्यम बन गया पाकिस्तान का भारत विरोध का यह तात्कालिक तरीका वहां की जनता को पसंद आया और इसी कारण सैन्य शासकों की तख्तापलट की नीतियों को बढ़ावा मिला इन सबमें विकास,आधुनिक शिक्षा,महिलाओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को दरकिनार किया जाता रहा जिसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे है पाकिस्तान पर विदेशी क़र्ज़ अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है,नया क़र्ज़ लेकर देश पर क़र्ज़ का और बोझ डाला जा रहा हैपाकिस्तान फ़ेडरल बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू यानी एफ़बीआर के पूर्व चेयरमैन शब्बर ज़ैदी  यह कह चूके है कि पाकिस्तान दिवालिया हो चुका हैदेश पर घरेलू और विदेशी क़र्ज़ 50 हज़ार अरब रुपये से भी अधिक हो गया हैपाकिस्तान का विदेशी क़र्ज़ सवा अरब डॉलर को पार कर गया है जो देश के इतिहास में उच्चतम स्तर पर पहुंच गया हैक़र्ज़ के इस बोझ में आईएमएफ़,अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों,पेरिस क्लब और विदेशों से लिए गए क़र्ज़ों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर कमर्शियल बैंकों से लिया गया क़र्ज़ भी शामिल है


धार्मिक और अतिवादी संगठन शासन प्रशासन पर पूरी तरह से हावी हो गए है और वे कानून के राज को अक्सर चुनौती देते नजर आते है इसका एक प्रमुख कारण विभिन्न सरकारों की धार्मिक अतिवादी नीतियाँ भी रही है जिससे प्रशासन तंत्र भी प्रभावित हुआ है मदरसों को आधुनिक शिक्षा से ज्यादा धार्मिक शिक्षा की और मोड़ दिया गया जिसके दीर्घकालीन परिणाम बेहद खतरनाक हुए है दुनिया के कई भागों में होने वाले आतंकी हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़ते रहे है। पाकिस्तान की सरकार और सेना पर आतंकियों को मदद देने के आरोप के चलते कई वैश्विक आर्थिक विकास वाली संस्थाओं ने पाकिस्तान को मदद देने से इंकार किया हैअलकायदा और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों की मदद देने से अमेरिका नाराज है और उसने पाकिस्तान को दी जानी वाली अरबों डालर की सहायता को रोक दिया हैपाकिस्तान इस समय चीन के बेशुमार कर्ज के  जाल में उलझा हुआ नजर आता हैचीन के उच्च दर ब्याज से कर्ज में पाकिस्तान डूबता जा रहा हैचीन पर पाकिस्तान की निर्भरता इतनी बढ़ गई है कि वह उसका आर्थिक निवेश बनने की कगार पर है। व्यापार और सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह पर उसका अपना नियन्त्रण नहीं है और उस पर चीन का नियंत्रण हो गया है ग्वादर में पैसे के निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर चीन से पाकिस्तान का 40 सालों का समझौता हैचीन का इसके राजस्व पर 91 फ़ीसदी अधिकार होगा और ग्वादर अथॉरिटी पोर्ट को महज 9 फ़ीसदी मिलेगा। इस  प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के पास 40 सालों तक ग्वादर पर नियंत्रण नहीं रहेगापाकिस्तान की अधिकांश परियोजनाएं चीन की आर्थिक सहायता से संचालित हो रही है और इसमें चीन का 80 फ़ीसदी हिस्सा है


पाकिस्तान की नई सुरक्षा नीति में क्षेत्रीय  स्तर पर सहयोग बढ़ाने की बात की गई है लेकिन उसका रास्ता बिल्कुल आसान नहीं है। भारत से सम्बन्ध ख़राब होने से वहां रोजमर्रा की जरूरतों के सामान में भारी वृद्धि हो गई है और इसका सीधा असर जनता पर पड़ रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार 2019 से बंद है पुलवामा में चरमपंथी हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान से मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्ज छीन लिया था और वहाँ से आयात होने वाली चीज़ों पर कस्टम ड्यूटी 200 फ़ीसदी तक बढ़ा दी थीइसके बाद पाकिस्तान ने भी भारत से आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था


पाकिस्तान में जहाँ कपड़ा उद्योग और चीनी का बाज़ार इससे प्रभावित हुआ है, वहीं भारत में इसके कारण सीमेंट उद्योग, छुहारे और सेंधा नमक के बाज़ार पर असर पड़ाभारत दुनिया का एक बड़ा बाज़ार है और पाकिस्तान की भारत पर कपड़े और दवा उद्योग के कच्चे माल के लिए भारी निर्भरता रही है पाकिस्तान का कपड़ा उद्योग बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है और उसके कुल आयात में इसकी भागीदारी साठ फीसदी तक हैपाकिस्तान में कपास की ज़्यादा मांग है, क्योंकि कपास की कम घरेलू पैदावार के बीच कपड़ा निर्यात बढ़ चुका हैवहीं, दूसरे देशों की तुलना में भारत में चीनी के दाम बेहद कम हैंपाकिस्तान ने जब भारत के साथ व्यापार प्रतिबंधित किया,उसके बाद उसने ब्राज़ील, चीन और थाइलैंड से चीनी आयात करना शुरू कर दियाइसके कारण चीनी की सप्लाई कम हो गई और घरेलू बाज़ार में इसके दाम बढ़ गए


पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अशांति और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देकर खुद का संकट बढ़ा लिया है। अफगानिस्तान में स्थापित तालिबान सरकार को पाकिस्तान के अतिवादी संगठनों का भरपूर समर्थन हासिल है,इससे कट्टरपंथी मजबूत हुए है। अफगानिस्तान से आने वाले लाखों शरणार्थियों को बोझ उठाने के लिए पाकिस्तान मजबूर हुआ है। देश के बढ़ते आयात बिल और अफ़ग़ानिस्तान में डॉलर की कथित स्मगलिंग के कारण डॉलर की क़ीमत में तेज़ी से वृद्धि हुई है


पाकिस्तान में गरीबी का स्तर बहुत आगे बढ़ गया है ऐसे में अफगान से आने  वाले लोग इस संकट को बढ़ा रहे है। पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच सीमा बेहद जटिल और लंबी हैइसकी लगातार निगरानी करना एक मुश्किल काम है इसलिए इस सीमा पर बाड़ लगाने की कोशिश की जा रही है जिससे  गैर क़ानूनी तौर पर लोग सीमा पार नहीं कर सकेंगे वहीं तालिबान इस बाड़ को तोड़कर पाकिस्तान की समस्याओं को बढ़ा रहा है.,इन कंटीली तारों के लिए पाकिस्तान की सरकार अरबों रुपये ख़र्च कर चूकी है

पाकिस्तान के एक और अहम पड़ोसी देश ईरान से उसके सम्बन्ध भी खराब है। ईरान का आरोप है कि पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल ईरानी चरमपंथी करते हैंदोनों देशों के बीच ये आरोप-प्रत्यारोप लंबे समय से चला आ रहा है


पाकिस्तान यदि आर्थिक कूटनीति पर काम करता है तो उसे भारत से होकर अफगानिस्तान और ईरान जाने वाले मार्ग को उन्नत करना होगा। पाकिस्तान भारत की अफगानिस्तान में उपस्थिति और ईरान से मजबूत सम्बन्धों का विरोध करता रहा है।

भारत ने तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत के बीच तापी गैस पाइप लाइन परियोजना के जरिए प्राकृतिक गैस की खरीद और बिक्री समझौते पर हस्ताक्षर  किए थे,इसे अमेरिका का भी समर्थन हासिल थाएक दशक बीत जाने के बाद भी यह योजना अंजाम तक नहीं पहुँच सकी है,इसका एक प्रमुख कारण पाकिस्तान की भारत के प्रति अस्थिर नीतियां रही हैतुर्कमेनिस्तान के पास विश्व के कुल प्राकृतिक गैस का चार प्रतिशत भंडार हैये पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान के दौलताबाद गैस फील्ड से प्रारंभ होकर अफगानिस्तान के हेरात-कंधार से होते हुए पाकिस्तान के कोएटा और मुल्तान पहुंचेगी तथा गैस पाइपलाइन भारत-पाकिस्तान सीमा के फजिल्का में खत्म होगीजाहिर है इसका लाभ भारत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के करोड़ों लोगों को मिल सकता हैवहीं पाकिस्तान के अतिवादी संगठन पाकिस्तान के रास्ते भारत को मिलने वाली मदद का विरोध करते रहे है,उन्हें रोक पाने की पाकिस्तान की सरकार को इच्छाशक्ति दिखाना होगीचीन की वन बेल्ट वन रोड़ योजना का भारत विरोधी है और इस व्यापारिक मार्ग में भारत के जुड़ने की कोई संभावना नहीं है


पाकिस्तान ने नीतियों में बदलाव की बात तो की है लेकिन लोकतंत्र की अनिश्चिता और अस्थिरता से आर्थिक प्रगति एवं सामाजिक कल्याण को बढ़ावा मिलना असम्भव है। इसके साथ ही समावेशी विकास के लिए प्रतिनिधित्व,उत्तरदायित्व,औचित्य और समता की दृष्टि भी देश में अभी बहुत कुछ सामाजिक,वैधानिक और राजनीतिक सुधार की जरूरत है इन सब चुनौतियों के बीच पाकिस्तान की आर्थिक सहयोग बढ़ाने की नीति पर आगे बढना भारत के लिए  निश्चित तौर पर लाभकारी हो सकता है। दोनों देशों के बीच आर्थिक सम्बन्ध मजबूत करने के लिए पाकिस्तान की सरकार,सेना और आईएसआई को आतंकवाद पर सख्ती से नकेल कसना होगा। यदि पाकिस्तान अपनी नई सुरक्षा नीति के अनुरूप क्षेत्रीय देशों से अच्छे सम्बन्ध कायम करने की  इच्छाशक्ति दिखाता है तो यह दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया के लिए शुभ संकेत होंगे।

 

 

एर्दोआन के राष्ट्रवाद से उपजे संकट,ardoaan,turki rashtrvad janstta

 जनसत्ता 



यूरोप का आधुनिक देश तुर्की अपने शीर्ष नेता आर्दोआन की इस्लामिक राष्ट्रवाद की नीतियों से आर्थिक जंजाल में बूरी तरीके से फंस गया है। यूरोप का एकमात्र इस्लामिक देश होने के बाद भी लम्बे समय तक धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद के जरिए सामाजिक और आर्थिक रूप से अग्रणी यह देश पिछले दो दशकों से आर्दोआन की सत्ता में बने रहने की सनक का शिकार बनता गया। आर्दोआन,दशकों पुरानी धार्मिक नीतियों को लगातार तुर्की समाज पर थोप रहे है जिससे वे बहुसंख्यक मुसलमानों का भरोसा हासिल करके लंबे समय तक सत्ता पर अपनी पकड़ बनाएं रखे। लेकिन इसका खामियाजा तुर्की के आम लोगों को भोगना पड़ रहा है।इसका प्रभाव गिरती अर्थव्यवस्था से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक पड़ रहा है।


तुर्की में अस्थिरता बढ़ी है,देश के अधिकतर युवा देश छोड़कर अन्य जगह पर बस जाना चाहते है। यूरोप के इस खुबसूरत देश को आर्दोआन की दो दशक की राजनीति ने बदल  दिया है। इस्लामिक बाहुल्य वाला यह देश विविधता के चलते दुनिया में अपना विशिष्ट स्थान रखता था। यहां रुसी, आर्मेनियाई,अल्बेनियाई,कुर्द,यहूदी,ईसाई समेत कई नस्ल और जातीय समूह समानता और धार्मिक स्वतन्त्रता के साथ बढ़िया जीवन जीते थे। इसी कारण इस देश को धर्मनिरपेक्ष पहचान मिली हुई थी। लेकिन लगभग दो दशक पहले तुर्की में आर्दोआन के सत्ता में आने के बाद मानों सब कुछ बदल  गया। आर्दोआन ने देश की सत्ता में बने रहने के लिए इस्लाम को राष्ट्रवाद से जोड़कर इसे लोकलुभावन बनाने की कोशिश की और यहीं से इस देश में वैचारिक कट्टरता को बढ़ावा मिलने लगा।


आर्दोआन ने इस्लाम को सर्वोपरी मानने और दिखाने की राजनीतिक  और सामाजिक कोशिशें की जो इस विविधता वाले देश में अभूतपूर्व था और समाज को असहज भी करने वाला था। पंद्रहवी सदी के इस्लामिक ऑटोमन साम्राज्य जिसे सल्तनत-ए-उस्मानिया  को आधार बनाकर आर्दोआन देश में विभाजनकारी भावनाएं उभार रहे है। उनकी इन कुटिल कोशिशों के कारण  तुर्की की बहुलतावादी पहचान को बनाएं रखना मुश्किल हो गया है। तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में स्थित ऐतिहासिक इमारत हागिया सोफ़िया को प्राचीन चर्च के रूप में ख्याति मिली हुई थी और दुनिया भर के  लोग इसे देखने आते थे। हागिया सोफ़िया का लगभग डेढ़ सौ साल पहले एक ईसाई चर्च के रूप में निर्माण हुआ था और 1453 में इस्लाम को मानने वाले ऑटोमन साम्राज्य ने विजय के बाद इसे एक मस्जिद में बदल दिया था। 


लेकिन 1934 में आधुनिक तुर्की के निर्माता मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने मस्जिद को म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया और देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित  कर दिया था। इसके बाद तुर्की के उदार समाज ने दुनिया में अपने देश की खास पहचान बनाई थी।  कमाल पाशा ने तुर्की को एक आधुनिक यूरोपियन मुल्क  के रूप में स्थापित करने के लिए मजहबी अदालतें खत्म कर दी,धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों को रोकने के लिए इस्लामिक खलीफाओं को ख़ारिज कर दिया,अरबी भाषा पर रोमन या अंग्रेजी को तरजीह दी और  स्विस सिविल कोड को लागू  कर महिलाओं को वोटिंग का अधिकार दे दिया। उनके उदार बदलावों से लंबे समय तक संचालित तुर्की ने एक मजबूत राष्ट्र के रूप में जो पहचान बनाई थी,वह अब संकट में है। इसका प्रमुख कारण देश की सियासी राजनीति में आर्दोआन की धार्मिक नीतियां बन गई है,जो सत्ता प्राप्त करने का साधन भी बना दी गई है। अर्दोआन अपनी रैलियों में तुर्की के राष्ट्रवादी विचारक ज़िया गोकाई के दिए विचार को बार बार दोहराते है कि, मस्जिदें हमारी छावनी हैं,गुंबदें हमारी रक्षा कवच,मीनारें हमारी तलवार और इस्लाम के अनुयायी हमारे सैनिक हैं।


आर्दोआन ने अपने चुनावी एजेंडे के अनुसार ऐतिहासिक  हागिया सोफ़िया को मस्जिद में बदल दिया। ग्रीस के ईसाइयों और दुनिया भर के मुसलमानो के लिए इसका खास महत्व था। आर्दोआन ने यहां पहली बार नमाज अता करते हुए इसका राष्ट्रीय टीवी पर सीधा प्रसारण भी करवाया।  इसकी तुर्की के उदार समाज ने गहरी आलोचना की।हागिया सोफ़िया में नमाज़ पढ़ने या किसी अन्य धार्मिक आयोजन पर अब तक पाबंदी थी। अब आर्दोआन ने इसे तुर्की की धार्मिक अस्मिता से जोड़कर इसे राष्ट्रवाद और असल पहचान बताया है।


आर्दोआन के इन कदमों का प्रभाव अब इस देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। आर्दोआन की आधुनिक शिक्षा से ज्यादा धार्मिक शिक्षा को तरजीह देने की नीति की चलते देश में मदरसों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आधुनिक तुर्की में इस्लाम के उदार रूप को धार्मिक कट्टरता में बदलने की राजनीतिक कोशिशों का असर समाज पर पड़ा है। दो दशक पहले सडक पर बुर्का या धार्मिक पहचान रखने वल्ले वस्त्र पहने लोग इक्का दुक्का नजर आते थे। वह अब बहुतायत में दिखते है।विश्वविद्यालयों में बुर्का प्रतिबंधित रहा है लेकिन आर्दोआन की पत्नी सार्वजनिक स्थानों पर इसे पहन कर जाती है।


आर्दोआन की इन नीतियों से तुर्की के आने वाले पर्यटकों की संख्या में खासी कमी आई है। तुर्की के कई मित्र राष्ट्रों से सम्बन्ध खराब हुए है और वैश्विक संस्थाओं में भी तुर्की की छवि खराब हुई है।पर्यटन से अरबों डालर अर्जित करने वाला इस देश का  पर्यटन उद्योग खस्ताहाल हो चला है।तुर्की में मुद्रा इतनी अस्थिर हो चुकी है कि उसकी क़ीमत हर रोज़ बदल रही है। महंगाई चरम पर है और क़ीमतें बढ़ रही हैं। तुर्की की राष्ट्रीय मुद्रा लीरा में डॉलर के मुक़ाबले गिरावट अपने निम्नतम स्तर पर है। इस व्यापक गिरावट का एक सबसे प्रमुख कारण तुर्की के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए कम ब्याज़ दर रखने की आर्दोआन की अपरंपरागत आर्थिक नीति है।पेट्रोल स्टेशन और स्थानीय सरकारी कार्यालयों के बाहर सस्ते दामों में रोटी लेने के लिए क़तारें लगती हैं।तुर्की में हर पाँच में से एक युवा के पास काम नहीं है।महिलाओं और लड़कियों के मामले में यह आँकड़ा और भी बुरा है।तुर्की में वार्षिक महंगाई दर 2002 के बाद से सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। महंगाई दर में 36 प्रतिशत से ज़्यादा कि बढ़ोतरी हुई है जो दो दशकों में सबसे ज़्यादा है।परिवहन लागत में आधे से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो गई है वहीं,खाने और घरेलू सामान की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। बढ़ती महंगाई के दौरान भी ब्याज दरों में कटौती को जारी रखा गया।इसे आर्दोआन ने इस्लाम के मूल्यों और आदर्शों से जोड़कर राष्ट्रवादी भावनाओं को उभार देने की कोशिश की। जबकि यह उनकी नाकामी को छुपाने का प्रयास समझा जा रहा है।


आर्दोआन देश के धर्म निरपेक्ष संविधान को कमजोर करके अरबी को बढ़ावा देते नजर आते है।उनकी पत्नी हिजाब पहनती हैं।हिजाब के साथ लड़कियाँ के यूनिवर्सिटी में जाने के प्रतिबंधो के कारण अर्दोआन ने अपनी बेटियों को इंडियाना यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए भेजा,क्योंकि वहाँ वो हिजाब पहन सकती थीं। आर्दोआन मीडिया का दुरूपयोग करने से भी नहीं चूके। वे मीडिया को सरकारी तन्त्र की तरह उपयोग करते नजर आते है और कई पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया है।


डिजिटल और मनोरंजक माध्यम को भी आर्दोआन ने अपने राजनीतिक प्रचार का साधन बना लिया है।  तुर्की के ऐतिहासिक ऑटोमन साम्राज्य के गठन पर बनी टीवी सिरीज़ दिरलिस एर्तरुलको तुर्की के सरकारी टीवी पर प्रसारित  करके धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिशें की गई।इसी प्रकार तुर्की में सुल्तान सुलेमान के जीवन पर 'द मैग्निफिसेंट सेंचुरी' नाम से एक टीवी ड्रामा बना था।16वीं सदी में सुल्तान सुलेमान के नेतृत्व में ऑटोमन साम्राज्य शिखर पर था और इस ड्रामा में इसे ही दिखाया गया है।यह ड्रामा तुर्की के विविध समाज को बाँटने वाला साबित हुआ।इन धारावाहिकों में तुर्की और इस्लाम के लिए धर्म युद्द की तरह प्रचारित किया गया। ऐसे धारावाहिकों से देश में कट्टरता बढ़ रही है और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन मजबूत हुए है। यूरोपियन राष्ट्र तुर्की को लेकर असहज हो रहे है और इससे वहां के नागरिक परेशान है। आर्दोआन पाकिस्तान जैसे देशों से सम्बन्ध मजबूत करके कट्टरवादी ताकतों को लगातार बढ़ावा दे रहे है जिससे तुर्की पर आतंकी हमलों के खतरें बढ़े है। देश के कई युवा इस्लामिक स्टेट की ओर आकर्षित होकर मध्यपूर्व में लड़ने को जा चूके है। अब बे भाड़े के सैनिक बनकर भी युद्द में भाग ले रहे है।


आर्दोआन तुर्की के प्राचीन गौरव को लौटाने की बात कहकर खुद की नीतियों को निर्णायक और बदलावकारी दिखाना चाहते है। इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने की  उनकी धुन के चलते कई यूरोपियन देशों से उनके सम्बन्ध ख़राब हो गए है। इसका असर निवेश पर पड़ा है।रोज़गार खत्म हो रहे है,उत्पादन प्रभावित हुआ है।धार्मिक शिक्षा के प्रसार से समाज विभाजित हो रहा है तथा औद्योगिक परिवेश नष्ट हो रहा है।अर्दोआन इस्लाम के सहारे चुनाव जीतने में तो लगातार सफल हो रहे है लेकिन तुर्की की अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही है।


बहरहाल आर्थिक मोर्चे पर तमाम नाकामियों के बाद भी आर्दोआन देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में खुद को प्रचारित करने के लिए राजनीतिक,धार्मिक हथकंडे अपना रहे है।वे इस्लाम के पुराने वैभव के ज़रिए अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं और देश बदहाली की ओर बढ़ता जा रहा है।

 

बापू से भयभीत,राष्ट्रीय सहारा gandhi bhaybheet

 राष्ट्रीय सहारा,मंथन 


                               

अब बापू तक कोई आवाज भले ही न जाती हो,लेकिन बापू की आवाज सब जगह सुनाई देती हैबापू अब शरीर से जीवित नहीं है लेकिन उनका जीवन कभी समाप्त भी न हो सकता बापू अब कोई विचार नहीं देते लेकिन उनके दिए विचार पथ प्रदर्शक बने हुए है भारत में अब उन जैसी कोई दृष्टि न हो लेकिन फिर भी भारत उन्हीं की दृष्टि से शांत,खुशहाल और सुरक्षित रह सकता है धर्म को लेकर संकुचित विचारधाराएं अब सब जगह दिखाई और सुनाई देती है लेकिन उन विचारधाराओं को बापू की सह्रदयता से डर लगता है राजनीतिज्ञ बापू के आदर्शों पर चलना नहीं चाहते लेकिन वे इससे आशंकित रहते है कि बापू का नाम न लेने से उनका राजनीतिक जीवन समाप्त न हो जाएं वे जनता को भरमाने की कोशिशो के बाद भी गांधी जैसा दिखने और होने का स्वांग रचने को मजबूर है


कथित धर्माचार्य गांधी को अभिशाप की तरह प्रस्तुत करते है लेकिन स्वयं समाज और राष्ट्र के लिए वरदान कैसे बने,इसका कोई खाका,योजना या विचार उनके पास नहीं हैगांधी को भी जात,धर्म,साम्प्रदायिकता,गरीबी,गुलामी और अशिक्षा से अभिशिप्त देश और समाज मिला था लेकिन उनकी दृष्टि औरों से अलग थीवे मुम्बई से चम्पारण रेल के तृतीय डब्बे में बैठकर पहुंचे उन्होंने यहां असल भारत देख लिया  गरीबों की पीड़ा को उन्होंने यहां और ज्यादा करीब से देखा और महसूस कियावे  किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए चम्पारण पहुंचे थे,लेकिन वे यह भी जानते थे कि बल और हिंसा से शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य का सामना नहीं किया जा सकतावे सत्याग्रह करने लगेलोग गरीब और भूखे थे,इसीलिए उन्होंने भूख हड़ताल और अनशन का रास्ता चुनालोग जात धर्म के नाम पर विभाजित थे,सो उन्होंने सर्वधर्म प्रार्थना करना प्रारम्भ कीयातायात के साधन पर्याप्त नहीं थे और पक्की सड़के नहीं थी बापू ने पगडंडियों के सहारे गांव,कस्बे और  शहरों को नाप दिया गांधी अपने जीवन काल में इतना पैदल चले जिसमें दो बार पूरी दुनिया घुमा जा सकता था नमक तोड़ो कानून,सबको याद हैदांडी मार्च,जिसे नमक मार्च और दांडी सत्याग्रह  के नाम से भी जाना जाता हैबापू ने साबरमती से अरब सागर के तटीय शहर दांडी तक 78 अनुयायियों के साथ 241 मील की यात्रा की गई थी  इस यात्रा का उद्देश्य गांधी और उनके समर्थकों द्वारा समुद्र के जल से नमक बनाकर ब्रिटिश नीति की अवहेलना करना था। इस यात्रा का प्रभाव अटक से कटक तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पड़ा था और अंग्रेजी शासन की चूलें हिल गई थी,यह अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन और यात्रा थी




बापू की इन यात्राओं से अंग्रेजी शासन खतरा जरुर महसूस करता था हालांकि कानून और व्यवस्था की दृष्टि से कभी कोई संकट प्रशासन के सामने उत्पन्न न हुआ  दरअसल महात्मा के जीवन और कार्यों में पूर्ण पारदर्शिता थी,इसलिए उनकों लेकर कभी भ्रम की स्थिति नहीं उत्पन्न होती थी


साम्प्रदायिकता को लेकर गांधी के सामने कभी चुनौतियां कम न थी धर्म को लेकर आम आदमी में समझ की अक्सर कमी होती है लेकिन वह धार्मिक होकर धर्मान्ध दिखने के लिए उतावला जरुर हो जाता है बापू के पास संचार के कोई साधन तो थे नहीं और न ही वे भाषण और सन्देश में विश्वास रखते थे बापू बंगाल के भीषण दंगों में भी गांव गांव घूमकर हिन्दू मुसलमानों को समझा रहे थेउनके पास एक पोटली होती थी जिसमे गीत्ता,कुरान,बाईबिल सब होती थी बापू की दृष्टि मानवीय थी इसलिए उन्हें कोई भी पराया नहीं लगता था उन्होंने अकेले ही बंगाल के दंगों को शांत करा दिया वहीं यह काम ब्रिटिश साम्राज्य के लाखों सिपाही न कर सके थे उनके पंजाब और उत्तर भारत के कई इलाकों में तैनात रहने के बाद भी हजारों लोगों का कत्लेआम हो गया था


यह गांधी के साथ का भारत था,गांधी के बाद के भारत में समस्याएं वैसी ही हैबापू बुनियादी  शिक्षा और गांव स्वराज को भारत की समस्याओं का हल मानते थे। आज़ाद  भारत ने उनकी नहीं सुनीकोरोना काल में लाकडाउन की घोषणा के बाद  सैकड़ों किलोमीटर के भीड़ के रेले गांव की और लौटे और कई तो रास्ते में ही भूख प्यास से मर गएइनमें वह अधिकांश लोग थे  जो गांव से बड़े शहरों की और रोजगार की  तलाश में गए थेयह दृश्य देश के कोने कोने में देखने को मिलेकोरोना का प्रभाव तो पूरी दुनिया में था,भारत से ज्यादा गरीबी और भी कई देशों में हैलेकिन पैदल चलते भारतीयों की तस्वीर दुनियाभर में प्रमुखता बन गई

भारत शहरों का नहीं गांवों का भारत हैबापू ने यही कहा था,यदि हमने गांधी की योजना पर आधारित गांवों का विकास किया होता तो ऐसे दृश्य कभी सामने नहीं आतेइन सबके बीच लोकतान्त्रिक प्रतिनिधि और धार्मिक संत कहां थे,यह सवाल बार बार लोगों के द्वारा  पूछा जाना चाहिए बापू समस्याओं में लोगों के बीच भी होते थे और उनका नेतृत्व भी किया करते थे.


एक बार गांधी काशी की एक सभा में आमंत्रित थेउस कार्यक्रम का आयोजन राजा महाराजाओं और पूंजीपतियों के सहयोग से आयोजित किया गया थाइसमें अधिकांश मेहमान सोने चांदी और हीरे जवाहरात से लदे थेबापू ने इन लोगों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह लोग देश की गरीबी कैसे दूर कर सकते है जो स्वयं धन का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैवे तब तक बोलते रहे जब तब कई  राजा महाराजा वहां से उठ कर नहीं चले गएअंततः गांधी को चुप कराना पड़ाइस भारत में सत्ता बिना पूंजीपतियों के चल ही नहीं पाती कथित  धर्माचार्यों का आधुनिक और भौतिकवादी जीवन देखिए,सादगी और शांति न तो उनके जीवन में दिखाई देती है और न ही उनके चेहरे पर ऐसे भाव होते है


बापू इसीलिए महात्मा बन पाए क्योंकि  उनकी दृष्टि,उनका जीवन,उनके कार्य,उनके आचरण और उनका स्वभाव मानवीयता की ऊँचाइयों को सदैव छूता रहा

बापू ने कभी किसी से घृणा और ईर्ष्या नहीं कीन ही उनके व्यवहार में कभी ऐसा रहाबा से तो वे कहते भी थे कि समूचा भारत उनका परिवार हैवे सामाजिक समरसता पर कभी बात नहीं करते थे बल्कि उन्होंने इसे अपने जीवन का अंग बनाया थाशौचालय को लेकर उनकी सोच ने भारत के करोड़ो दलित पतितों को सम्मान की दृष्टि दी थी, समाज का नजरिया इससे उनके प्रति बदला था


भारत में अब भी बहुत गरीबी हैधार्मिक संस्थाओं और कथित धर्माचार्यों के पास अकूत सम्पत्ति हैभारत के 90 फीसदी सांसद करोड़पति है, अरबपति  भी बहुतायत में हैइन सबमें  कितने गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का पालन करते हैबापू की नोट पर छपी तस्वीर की  बातें होती है दरअसल बापू की वह तस्वीर बार बार  याद दिलाती है कि इस नोट पर सिर्फ आपका अधिकार नहीं हैइसमें से वहीं खर्च कीजिये जो आपके लिए आवश्यक हो,बाकि समाज और देश के लिए अपने योगदान में दे दीजिये

अब न तो राजनेता ऐसा सोचते है और न ही धर्माचार्य वे गांधी तो बन नहीं सकते लेकिन गांधी से डरते जरुर है। यह डर बार बार भिन्न तरीकों से सामने आता है।

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