पाक की अफगान नीति,जनसत्ता pak afgan nii janstta

जनसत्ता                                               



                                                              

संतुलनकर्ता राष्ट्र की स्थिति तटस्थ होना चाहिए जो शक्ति संतुलन की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं करता हो। अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता कायम करने के लिए पाकिस्तान की संतुलनकर्ता राष्ट्र  के रूप आगे आने की भूमिका को सैद्धांतिक और व्यवहारिक स्तर पर वैश्विक मान्यता मिलने की संभावना नगण्य रही है।अफगानिस्तान के लोग अपने देश में राजनीतिक अस्थिरता,आतंकवाद और तालिबानी कब्ज़े के लिए पाकिस्तान को उत्तरदायी मानते रहे है और यह विरोध अफगानिस्तान से लेकर वैश्विक स्तर पर देखा भी गया है।अफगानिस्तान के सर्वोच्च नेता रहे हामिद करजई से लेकर अशरफ़ गनीतक वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को उनके देश की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे है।अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ इस्लामिक देशों में भी पाकिस्तान को लेकर असमंजस बरकरार है,इसका एक प्रमुख कारण पाकिस्तान के बहुउद्देश्यी और बहुआयामी हित रहे है।पाकिस्तान समर्थित तालिबान सुन्नी संगठन माना जाता है और वह अल्पसंख्यक हजारा,ताजिक और शिया मुसलमानों को निशाना बनाता रहा है। अफगानिस्तान में कब्ज़े के बाद उसने इन अल्पसंख्यक समुदायों पर बेतहाशा अत्याचार किए है।


मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रिपोर्ट में इस साल  जुलाई में अफ़ग़ानिस्तान में शिया हज़ारा समुदाय के नरसंहार का दावा किया हैएमनेस्टी के अनुसार तालिबान ने ग़ज़नी प्रांत में हज़ारा समुदाय के हजारों पुरुषों को बेरहमी से मार डाला था।ये लोग  दूरस्थ इलाकों में रहते है और तालिबान ने इन इलाकों की व्यापक घेराबंदी कर रखी है।संचार सुविधाएँ नहीं होने से हजारा समुदाय को मदद मिल पाना भी मुश्किल होता है।हज़ारा अफ़ग़ानिस्तान के तीसरे सबसे बड़े नस्लीय समूह हैं और सुन्नी बहुल अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में उनका दशकों से शोषण होता रहा है। यही कारण है कि अफगानिस्तान की सीमा से लगने वाले अधिकांश मुस्लिम देश पाकिस्तान से ज्यादा भारत पर भरोसा करते है।


अफगानिस्तान पर तालिबान के फिर से कब्ज़े के बाद इस देश की स्थिति बद से बदतर हो गई है और करोड़ों लोगों के भूख और ठंड से मरने का मानवीय खतरा मंडराने लगा है। पाकिस्तान ने हाल ही में अफगानिस्तान की स्थिति पर चर्चा करने और उसे अंतर्राष्ट्रीय मदद मुहैया कराने के लिए राजधानी इस्लामाबाद में इस्लामिक दुनिया और कुछ अन्य चुनिंदा देशों के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया।  पाकिस्तान की इस समूची कवायद के पीछे यह योजना रही कि तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय मदद की बहाली हो,जो इस समय रुकी हुई है।   पाकिस्तान यह भी दिखाना चाहता है कि वह  अफगान लोगों के भविष्य के लिए चिंतित है और इस अस्थिर देश में शांति और स्थिरता बहाल करने में मदद करना चाहता है।


यह देखने में आया है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी को विदेशी गुलामी से मुक्ति कहकर प्रचारित करने के बाद अब पाकिस्तान विभिन्न वैश्विक मंचों पर अफगानिस्तान में अस्थिरता से उभरते खतरेका संकेत देकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भयभीत करने की कोशिशें करता रहा है। इसके पीछे पाकिस्तान की यह रणनीति रही है कि वैश्विक स्तर पर तालिबान को मान्यता मिलने से उसके सामरिक हित सुरक्षित हो सकते है और वह भारत को दबाव में लाने में सफल हो सकता है।वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की पहचान एक ऐसे देश के रूप में बन गई है जिस पर भरोसा तो नहीं किया जा सकता लेकिन आतंकवाद की जटिलताओं को देखते हुए उसकी भूमिका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। खासकर पाकिस्तान की भू राजनैतिक स्थिति ने उसे अति संवेदनशील बना दिया है। इन सबके बीच पाकिस्तान अफगानिस्तान को मिलने वाली विदेशी मदद पर नियन्त्रण करके भारत को इससे दूर रखना चाहता है।वह चीन के आर्थिक हितों की अंतर्गत अफगानिस्तान को दांव पर लगा देना चाहता है। वहीं अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव कहीं फिर से न बढ़ जाएँ,इससे आशंकित पाकिस्तान की संकीर्ण नीति वहां के करोड़ों लोगों की परेशानियों को बढ़ा रही है।अफगानिस्तान को लेकर बुलाई गई अहम बैठकों में भारत को आमंत्रित न करने की उसकी मंशा से मानवीय संकट ही बढ़ा है। जबकि पिछलें कई दशकों से भारत ने अफगानिस्तान के विकास में अहम योगदान दिया है और शिक्षा,स्वास्थ्य  की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए है,जो तालिबान की वापसी के बाद रुक गये है।


1980 के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत सेना को बाहर करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान का उपयोग फ्रंट लाईन राष्ट्र के रूप में किया था। इसके बदले पाकिस्तान को व्यापक आर्थिक और सामरिक सहायता हासिल हुई।1988 में जिनेवा समझौते के बाद सोवियत सेना तो लौट गई लेकिन अफगानिस्तान में शांति कभी स्थापित नहीं हो सकी। पाकिस्तान ने सोवियत सेना के खिलाफ जिन मुजाहिदीनों को प्रशिक्षित किया था,वे आगे चलकर तालिबान के रूप में सामने आये और उन्होंने हिंसात्मक तरीके से अफगानिस्तान की समूची व्यवस्था को नष्ट कर दिया। पिछले कई दशकों से तालिबान के नेताओं को पाकिस्तान का राजनीतिक और आर्थिक समर्थन प्राप्त है और यह जगजाहिर है। अफगानिस्तान में 20 वर्षों पर रहकर भी तालिबान को खत्म न कर पाने की अमेरिका की असफलता के पीछे भी पाकिस्तान की तालिबान को मदद देने की नीति को जिम्मेदार माना जाता है। अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में तालिबान के लिए चंदा इकट्ठा करने और उनके लड़ाकों का शहीद की तरह सम्मान करने की कई घटनाएं सामने आ चूकी है। इस काम में पाकिस्तान के मदरसों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।यहां तक की कई कुख्यात और शीर्ष स्तर के तालिबानों लड़ाकों के परिवार पाकिस्तान में ही रहते है जहां उन्हें पाकिस्तान की सेना,आईएसआई और सरकार सभी तरीके की सुविधाएँ मुहैया कराती रही है।


2018 में तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान की सैनिक सहायता और आर्थिक सहायता रोकने का ऐलान करते हुए कहा था कि,हमने पाकिस्तान को पिछले 15 सालों में बेवकूफों की तरह 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और उन्होंने इसके बदले में हमारे नेताओं को बेवकूफ समझकर झूठ और धोखे से अलावा कुछ नहीं दिया है वे आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं जिनका हम अफगानिस्तान में शिकार कर रहे हैं,अब और नहीं। इन वैश्विक आलोचनाओं और ग्रे वॉच लिस्ट में होने के बाद भी पाकिस्तान ने साढ़े तीन हजार से ज्यादा संदिग्धों को आतंकवाद की वॉच लिस्ट से ही हटा  दिया थाजिसकी पश्चिमी देशों में खासतौर पर काफी आलोचना हुईकाउंटर टेररिज्म पर अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं में आतंकियों को पाल कर ना केवल भारत को बल्कि अफगानिस्तान को भी निशाने पर रखा। अमेरिकी सेना की मौजूदगी के दौरान भी आईएसआई और पाकिस्तान की सेना ने तालिबान का लगातार बचाव किया और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया। अमरीकी सैनिकों पर हमलें में भी पाकिस्तान की सहायता की कई रिपोर्टे सामने आ चूकी है।

दरअसल तालिबान अफगानिस्तान में इस्लामिक शासन व्यवस्था स्थापित करने का हिमायती रहा है जहां अल्पसंख्यकों को कड़े धार्मिक प्रतिबंधों के साथ महिलाओं शिक्षा से दूर रखना शामिल है।कोई महिला किसी दूसरे पुरुष के साथ दिखाई दे तो उसे सरेआम कोड़े मारने  की सजा से लेकर कई मामलों में  सिर कलम कर देने की सजाएं  इसमें शामिल है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय तालिबान पर यह दबाव बना रही है कि वह अफगानिस्तान में महिलाओं समेत सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व बहाल करें और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति निष्ठा और जिम्मेदारी से कार्य करें।


पाकिस्तान तालिबान के प्रवक्ता की तरह वैश्विक मंच पर बर्ताव कर रहा है और उसकी यह नीति अफगानिस्तान के लोगों की समस्याओं को बढ़ा रही है। पाकिस्तान पर न तो अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को भरोसा है और न ही इस्लामिक दुनिया के सभी देशों को। यह पाकिस्तान में आयोजित हालिया सम्मेलन में प्रतिबिम्बित भी हुआ।पाकिस्तान की पहल पर आयोजित इस विशेष सम्मेलन में बहुत कम देशों के शिखर नेता शामिल हुए।कई देशों ने अपने उपमंत्रियों और प्रतिनिधियों को भेजकर औपचारिकतायें पूर्ण कर ली।दूसरी ओर उसी समय इंडिया-सेंट्रल एशिया डायलॉग की एकदिवसीय बैठक नयी दिल्ली में आयोजित की गई इसकी अध्यक्षता भारत  के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने की तथा इस बैठकमें कजाकिस्तान,किर्गीज़तान,ताजिकिस्तान,तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान के विदेश मंत्री शामिल हुए।पिछले महीने भी इन सभी मध्य एशियाई देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने भारत में ऐसी ही एक अन्य बातचीत में भाग लिया था जिसका विषय अफ़ग़ानिस्तान ही था। ये सभी देश ओआईसी के सदस्य हैं, और ताजिकिस्तान,तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा साझा करते हैं।इन  मंत्रियों ने इस्लामाबाद में ओआईसी की बैठक में भाग लेने से ज्यादा भारत को तरजीह दी और यह संदेश दिया  जाने का फैसला किया, कि वे अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भारत के साथ सहयोग बनाए रखना चाहते हैं।


इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मदद करने के तरीके खोजने  पर खास तौर से चर्चा हुई।भारत यह सोचता है कि अगर वह मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध बनाता है, तो वह अफ़ग़ानिस्तान में भी अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम होगा। वहीं ताजिकिस्तान,तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे देश जो अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा साझा करते हैं,उन्हें यह चिंता है कि आने वाले समय में अफ़ग़ानिस्तान की सरहदों पर मानवीय और सुरक्षा संकट खड़े हो सकते हैं। यहीं नहीं तालिबान को पाकिस्तान से मिलने वाली सैन्य मदद इन राष्ट्रों के लिए सुरक्षा संकट बढ़ा सकती है।कज़ाकिस्तान और किर्गिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद बड़ी चिंता इस्लामी चरमपंथ को लेकर है।


अफ़ग़ानिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और संस्थानों के पुनर्निर्माण में भारत अब तक तीन अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है। वहीं  कई मध्य एशियाई देशों के जातीय समूह तालिबान से जूझने को मजबूर है। अब भारत मध्य एशियाई देशों के साथ सहयोग करके अफगानिस्तान के लोगों की परेशानियों को कम करने की कोशिशे कर रहा है।अफगानिस्तान के लोगों के मानवीय संकट को ध्यान में रखते हुए भारत ने तालिबान के आने के बाद पहली बार अनाज और जीवन रखक दवाइयों को पाकिस्तान के रास्ते भेजा है। जाहिर है अफगानिस्तान को लेकर भारत की पहल के सकारात्मक परिणाम आ सकते है और इसका फायदा अफगानिस्तान के करोड़ों लोगों को मिल सकता है जो जिंदा रहने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे है।अफ़ग़ानिस्तान में भारत के मज़बूत होने का एक मनोवैज्ञानिक और सामरिक दबाव पाकिस्तान पर रहता है। इससे अफगानिस्तान को नियंत्रित और संतुलित करने में भी मदद मिलती है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न की गई अस्थिरता और आतंकवाद से निपटने के  लिए वहां भारत का मजबूत होना जरूरी है।

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