काश...! धर्मसंसद को कोई गांधी मिल जाएं, gandhi dhrm sansad

 दबंग दुनिया

                     बापू को नकारने वाले राष्ट्र की पहचान को नकारते है


                  

                                                          

यह आधुनिक भारत के कथित आधुनिक संतों की धर्म संसद है,जहां धर्म के महान और शांतिप्रिय मूल्यों को धूल धूसरित करने की चेष्टाएँ बड़ी सरलता से कर ली जाती है। जहां धर्म और आध्यात्म पर आधारित चिंतन,मनन और मंथन की अपेक्षा विविध विशिष्टताओं से समाहित भारत की असीम शक्ति को कमतर या कमजोर बताकर राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती देने के प्रयास किए जाते है। धर्म संसद में एक संत कहलाने वाले महापुरुष महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित ठहराते हुए उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे की प्रशंसा में कसीदे गढ़ते है। धर्म संसद में शामिल एक महिला नाथूराम गोडसे की पूजा का आह्वान करती है। इन सबके बीच उन्मादी भीड़ करतल ध्वनि से तालियां बजाकर इसका स्वागत करती है।


दरअसल भारत की विविधता और विशिष्टता को सबसे ज्यादा बेहतर ढंग से जिस इन्सान ने पहचाना था उनमें महात्मा गांधी अग्रणी थे। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक हकीकत को राजनीतिक शक्ति बनाकर विविधता को भी राष्ट्रीय माला में गूंथने का दुष्कर कार्य करने में बड़ी सफलता हासिल कर ली थी। महात्मा गांधी भारतीय मूल्यों की उस शक्ति को जानते थे जिसके अंतर्गत रक्त सम्बन्ध हिन्दुओं को मुसलमानों और सिखों से जोड़ता है। धर्म इस सम्बन्ध को कमजोर करता है। भूगोल जोड़ता है जबकि भाषाओँ की विविधता उन्हें विभाजित कर देती है। इन चुनौतियों के बीच भी महात्मा गांधी और उनकी पीढ़ी को एक राष्ट्र का निर्माण करना था और उन्होंने इसे किया भी। भारत की इस विविधता को राष्ट्रीय शक्ति और मानवता के असीम स्रोत में रूप में खूबसूरती से प्रस्तुत करने का कार्य स्वामी  विवेकानन्द ने 1893 में शिकागों में धर्म संसद में किया था।


धर्म संसद की महत्ता को नजरअंदाज कर और बापू की आलोचना के कारण इन आयोजनों को लेकर दुनिया भर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है। जो भारत की उस वैश्विक छवि को खराब कर रही है जिसे बेहतर करने में कई दशकों के प्रयास रहे है। धर्म संसद की साकार भावनाएं स्वामी विवेकानंद के भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की महान अवधारणाओं पर आधारित व्याख्यान में प्रतिबिंबित हुई थी। धर्म का अर्थ आस्था,शांति,सहिष्णुता और सार्वभौमिकता से है,ऐसे में धर्माचार्यों का सरोकार समन्वयकारी मानवीय विचारों से होना चाहिए। हरिद्वार और रायपुर की धर्म संसद में कथित धर्माचार्यों के विचार  भारतीय मूल्यों की समन्वयकारी परम्परा को चुनौती देते नजर आएं। भारत की विविधता को नजरअंदाज करने की उनकी यह कोशिश राष्ट्र की एकता और अखंडता पर संघातिक प्रहार है।


इन सबके बीच गांधी क्यों महात्मा है और उनकी आलोचना करने वाले कथित संत क्यों उनके आसपास भी नहीं ठहरते,इसे समझना बेहद आवश्यक है। 19 वीं सदी ने भारत के विभाजन का पूरा खाका जिस समय तैयार किया था,उस समय गांधी आज़ादी की लड़ाई के साथ हिन्दुओं के विखंडन की कोशिशों को रोकने की पुरजोर कोशिशें कर रहे थे। उनका दलित पिछड़ों की बस्तियों में रुकना,उस दौर की बेहद क्रांतिकारी घटना मानी जा रही थी। उन्होंने तमाम विरोध के बाद भी अपने आश्रम में एक दलित जाति के परिवार को रुकने को कहा था जब इसका विरोध पुरजोर किया गया था। महात्मा गांधी ने दलित परिवार की बेटी को उस समय गोद लिया था,जब इसे अकल्पनीय माना जाता था।


अंग्रेजों ने कम्युनल अवार्ड के जरिए दलितों को अलग से आरक्षण देकर हिन्दू धर्म में विखंडन के बीज तैयार कर दिए थे,लेकिन  डॉ.आम्बेडकर समेत तमाम आलोचनाओं के बाद भी महात्मा गांधी  ने यरवदा जेल में अनशन किया और इस आरक्षण का कड़ा विरोध किया। महात्मा गांधी जानते थे कि अंग्रेज दलितों को भी अलग से आरक्षण देंगे तब मुस्लिम और ईसाई की तरह पृथकतावाद की भावना बढ़ेगी और इससे अलग पहचान और अलगाव का संकट भी बढ़ेगा। यह हिन्दुओं के विखंडन का कारण बन सकता है। महात्मा गांधी ने कहा कि अपृश्यता पाप है और हिन्दुओं ने इसे किया है तो उसका प्रायश्चित भी वहीं करेंगे। अंततः डॉ.आम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच जो पूना पैक्ट हुआ इससे हिन्दुओं में से ही दलितों को आरक्षण दिया गया और हिन्दुओं का संभावित विभाजन रुक गया।


भारतीय समाज में विभाजनकारी आचरण भारत के विखंडन का कारण बनते रहे है। 16 अगस्त 1946 को जिन्ना के आह्वान पर पाकिस्तान की मांग को लेकर सीधी कार्रवाई दिवस मनाया गया था। इसमें हिन्दू मुस्लिम दंगे भयावह रूप से भड़क गए थे। इसमें हजारों लोग मारे गए थे। बापू स्वयं दंगा प्रभावित इलाकों में गए और उनके साहस और अथक प्रयासों से ही यह साम्प्रदायिक संघर्ष रुक सका था। गांधी ने 1 अगस्त 1947 को अपनी अस्वस्थता के बाद भी कश्मीर की यात्रा की थी और बहुसंख्यक मुसलमानों ने उन्हें जिंदा पीर कहकर संबोधित किया था। भारत के कश्मीर विलय को बहुसंख्यक मुस्लिमों की स्वीकृति का एक प्रमुख कारण यह भी था।


वास्तव में धर्म संसद,राजनीति मंचों या सामाजिक मंचों से महात्मा गांधी को निशाना बनाने की जो कोशिशें होती रही है,वे गांधी को नहीं इस देश के मूल्यों,एकता और अखंडता को निशाना बनाते है। गांधी का अर्थ देश के प्रति निष्ठा,त्याग,बलिदान,सांस्कृतिक मूल्य,सत्य,शाकाहार,अहिंसा और मानवता के प्रति असीम समर्पण है। गांधी का अर्थ उच्च आदर्शों और मानवीय मूल्यों से है। इसीलिए गांधी पूज्यनीय है लेकिन उन्होंने कभी इसे स्वीकार नहीं किया। एक 70 साल का बुजूर्ग अपने गले में गांधी की तस्वीर टांगे उनके चरणों में गिर पड़ा। बापू ने उसे उठाकर पूछा तो उस बुजूर्ग ने बताया कि उसे लकवा लग गया था और उसने जब बापू की पूजा और आराधना की तो वह ठीक हो गया।


बापू ने मुस्कुराते हुए बुजूर्ग से कहा कि यह ईश्वरीय कृपा से हुआ है,इसमें उनका कोई योगदान नहीं है। दरअसल धर्म संसद में बापू जैसे विनम्र और त्यागी महात्मा की जरूरत है, लेकिन अफ़सोस इस दौर में वह मिलना मुमकिन ही नहीं है। धर्म संसद को सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए कमर कसना चाहिए,वह धर्म और राष्ट्र के लिए बहुउपयोगी और बहुआयामी आयामी होगा। वे महात्मा गांधी के जीवन और कार्यों से इसे सीख सकते है। 

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brahmadeep alune

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