काश...! धर्मसंसद को कोई गांधी मिल जाएं, gandhi dhrm sansad

 दबंग दुनिया

                     बापू को नकारने वाले राष्ट्र की पहचान को नकारते है


                  

                                                          

यह आधुनिक भारत के कथित आधुनिक संतों की धर्म संसद है,जहां धर्म के महान और शांतिप्रिय मूल्यों को धूल धूसरित करने की चेष्टाएँ बड़ी सरलता से कर ली जाती है। जहां धर्म और आध्यात्म पर आधारित चिंतन,मनन और मंथन की अपेक्षा विविध विशिष्टताओं से समाहित भारत की असीम शक्ति को कमतर या कमजोर बताकर राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती देने के प्रयास किए जाते है। धर्म संसद में एक संत कहलाने वाले महापुरुष महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित ठहराते हुए उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे की प्रशंसा में कसीदे गढ़ते है। धर्म संसद में शामिल एक महिला नाथूराम गोडसे की पूजा का आह्वान करती है। इन सबके बीच उन्मादी भीड़ करतल ध्वनि से तालियां बजाकर इसका स्वागत करती है।


दरअसल भारत की विविधता और विशिष्टता को सबसे ज्यादा बेहतर ढंग से जिस इन्सान ने पहचाना था उनमें महात्मा गांधी अग्रणी थे। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक हकीकत को राजनीतिक शक्ति बनाकर विविधता को भी राष्ट्रीय माला में गूंथने का दुष्कर कार्य करने में बड़ी सफलता हासिल कर ली थी। महात्मा गांधी भारतीय मूल्यों की उस शक्ति को जानते थे जिसके अंतर्गत रक्त सम्बन्ध हिन्दुओं को मुसलमानों और सिखों से जोड़ता है। धर्म इस सम्बन्ध को कमजोर करता है। भूगोल जोड़ता है जबकि भाषाओँ की विविधता उन्हें विभाजित कर देती है। इन चुनौतियों के बीच भी महात्मा गांधी और उनकी पीढ़ी को एक राष्ट्र का निर्माण करना था और उन्होंने इसे किया भी। भारत की इस विविधता को राष्ट्रीय शक्ति और मानवता के असीम स्रोत में रूप में खूबसूरती से प्रस्तुत करने का कार्य स्वामी  विवेकानन्द ने 1893 में शिकागों में धर्म संसद में किया था।


धर्म संसद की महत्ता को नजरअंदाज कर और बापू की आलोचना के कारण इन आयोजनों को लेकर दुनिया भर में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है। जो भारत की उस वैश्विक छवि को खराब कर रही है जिसे बेहतर करने में कई दशकों के प्रयास रहे है। धर्म संसद की साकार भावनाएं स्वामी विवेकानंद के भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की महान अवधारणाओं पर आधारित व्याख्यान में प्रतिबिंबित हुई थी। धर्म का अर्थ आस्था,शांति,सहिष्णुता और सार्वभौमिकता से है,ऐसे में धर्माचार्यों का सरोकार समन्वयकारी मानवीय विचारों से होना चाहिए। हरिद्वार और रायपुर की धर्म संसद में कथित धर्माचार्यों के विचार  भारतीय मूल्यों की समन्वयकारी परम्परा को चुनौती देते नजर आएं। भारत की विविधता को नजरअंदाज करने की उनकी यह कोशिश राष्ट्र की एकता और अखंडता पर संघातिक प्रहार है।


इन सबके बीच गांधी क्यों महात्मा है और उनकी आलोचना करने वाले कथित संत क्यों उनके आसपास भी नहीं ठहरते,इसे समझना बेहद आवश्यक है। 19 वीं सदी ने भारत के विभाजन का पूरा खाका जिस समय तैयार किया था,उस समय गांधी आज़ादी की लड़ाई के साथ हिन्दुओं के विखंडन की कोशिशों को रोकने की पुरजोर कोशिशें कर रहे थे। उनका दलित पिछड़ों की बस्तियों में रुकना,उस दौर की बेहद क्रांतिकारी घटना मानी जा रही थी। उन्होंने तमाम विरोध के बाद भी अपने आश्रम में एक दलित जाति के परिवार को रुकने को कहा था जब इसका विरोध पुरजोर किया गया था। महात्मा गांधी ने दलित परिवार की बेटी को उस समय गोद लिया था,जब इसे अकल्पनीय माना जाता था।


अंग्रेजों ने कम्युनल अवार्ड के जरिए दलितों को अलग से आरक्षण देकर हिन्दू धर्म में विखंडन के बीज तैयार कर दिए थे,लेकिन  डॉ.आम्बेडकर समेत तमाम आलोचनाओं के बाद भी महात्मा गांधी  ने यरवदा जेल में अनशन किया और इस आरक्षण का कड़ा विरोध किया। महात्मा गांधी जानते थे कि अंग्रेज दलितों को भी अलग से आरक्षण देंगे तब मुस्लिम और ईसाई की तरह पृथकतावाद की भावना बढ़ेगी और इससे अलग पहचान और अलगाव का संकट भी बढ़ेगा। यह हिन्दुओं के विखंडन का कारण बन सकता है। महात्मा गांधी ने कहा कि अपृश्यता पाप है और हिन्दुओं ने इसे किया है तो उसका प्रायश्चित भी वहीं करेंगे। अंततः डॉ.आम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच जो पूना पैक्ट हुआ इससे हिन्दुओं में से ही दलितों को आरक्षण दिया गया और हिन्दुओं का संभावित विभाजन रुक गया।


भारतीय समाज में विभाजनकारी आचरण भारत के विखंडन का कारण बनते रहे है। 16 अगस्त 1946 को जिन्ना के आह्वान पर पाकिस्तान की मांग को लेकर सीधी कार्रवाई दिवस मनाया गया था। इसमें हिन्दू मुस्लिम दंगे भयावह रूप से भड़क गए थे। इसमें हजारों लोग मारे गए थे। बापू स्वयं दंगा प्रभावित इलाकों में गए और उनके साहस और अथक प्रयासों से ही यह साम्प्रदायिक संघर्ष रुक सका था। गांधी ने 1 अगस्त 1947 को अपनी अस्वस्थता के बाद भी कश्मीर की यात्रा की थी और बहुसंख्यक मुसलमानों ने उन्हें जिंदा पीर कहकर संबोधित किया था। भारत के कश्मीर विलय को बहुसंख्यक मुस्लिमों की स्वीकृति का एक प्रमुख कारण यह भी था।


वास्तव में धर्म संसद,राजनीति मंचों या सामाजिक मंचों से महात्मा गांधी को निशाना बनाने की जो कोशिशें होती रही है,वे गांधी को नहीं इस देश के मूल्यों,एकता और अखंडता को निशाना बनाते है। गांधी का अर्थ देश के प्रति निष्ठा,त्याग,बलिदान,सांस्कृतिक मूल्य,सत्य,शाकाहार,अहिंसा और मानवता के प्रति असीम समर्पण है। गांधी का अर्थ उच्च आदर्शों और मानवीय मूल्यों से है। इसीलिए गांधी पूज्यनीय है लेकिन उन्होंने कभी इसे स्वीकार नहीं किया। एक 70 साल का बुजूर्ग अपने गले में गांधी की तस्वीर टांगे उनके चरणों में गिर पड़ा। बापू ने उसे उठाकर पूछा तो उस बुजूर्ग ने बताया कि उसे लकवा लग गया था और उसने जब बापू की पूजा और आराधना की तो वह ठीक हो गया।


बापू ने मुस्कुराते हुए बुजूर्ग से कहा कि यह ईश्वरीय कृपा से हुआ है,इसमें उनका कोई योगदान नहीं है। दरअसल धर्म संसद में बापू जैसे विनम्र और त्यागी महात्मा की जरूरत है, लेकिन अफ़सोस इस दौर में वह मिलना मुमकिन ही नहीं है। धर्म संसद को सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए कमर कसना चाहिए,वह धर्म और राष्ट्र के लिए बहुउपयोगी और बहुआयामी आयामी होगा। वे महात्मा गांधी के जीवन और कार्यों से इसे सीख सकते है। 

पाक की अफगान नीति,जनसत्ता pak afgan nii janstta

जनसत्ता                                               



                                                              

संतुलनकर्ता राष्ट्र की स्थिति तटस्थ होना चाहिए जो शक्ति संतुलन की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं करता हो। अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता कायम करने के लिए पाकिस्तान की संतुलनकर्ता राष्ट्र  के रूप आगे आने की भूमिका को सैद्धांतिक और व्यवहारिक स्तर पर वैश्विक मान्यता मिलने की संभावना नगण्य रही है।अफगानिस्तान के लोग अपने देश में राजनीतिक अस्थिरता,आतंकवाद और तालिबानी कब्ज़े के लिए पाकिस्तान को उत्तरदायी मानते रहे है और यह विरोध अफगानिस्तान से लेकर वैश्विक स्तर पर देखा भी गया है।अफगानिस्तान के सर्वोच्च नेता रहे हामिद करजई से लेकर अशरफ़ गनीतक वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को उनके देश की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे है।अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ इस्लामिक देशों में भी पाकिस्तान को लेकर असमंजस बरकरार है,इसका एक प्रमुख कारण पाकिस्तान के बहुउद्देश्यी और बहुआयामी हित रहे है।पाकिस्तान समर्थित तालिबान सुन्नी संगठन माना जाता है और वह अल्पसंख्यक हजारा,ताजिक और शिया मुसलमानों को निशाना बनाता रहा है। अफगानिस्तान में कब्ज़े के बाद उसने इन अल्पसंख्यक समुदायों पर बेतहाशा अत्याचार किए है।


मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी एक रिपोर्ट में इस साल  जुलाई में अफ़ग़ानिस्तान में शिया हज़ारा समुदाय के नरसंहार का दावा किया हैएमनेस्टी के अनुसार तालिबान ने ग़ज़नी प्रांत में हज़ारा समुदाय के हजारों पुरुषों को बेरहमी से मार डाला था।ये लोग  दूरस्थ इलाकों में रहते है और तालिबान ने इन इलाकों की व्यापक घेराबंदी कर रखी है।संचार सुविधाएँ नहीं होने से हजारा समुदाय को मदद मिल पाना भी मुश्किल होता है।हज़ारा अफ़ग़ानिस्तान के तीसरे सबसे बड़े नस्लीय समूह हैं और सुन्नी बहुल अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में उनका दशकों से शोषण होता रहा है। यही कारण है कि अफगानिस्तान की सीमा से लगने वाले अधिकांश मुस्लिम देश पाकिस्तान से ज्यादा भारत पर भरोसा करते है।


अफगानिस्तान पर तालिबान के फिर से कब्ज़े के बाद इस देश की स्थिति बद से बदतर हो गई है और करोड़ों लोगों के भूख और ठंड से मरने का मानवीय खतरा मंडराने लगा है। पाकिस्तान ने हाल ही में अफगानिस्तान की स्थिति पर चर्चा करने और उसे अंतर्राष्ट्रीय मदद मुहैया कराने के लिए राजधानी इस्लामाबाद में इस्लामिक दुनिया और कुछ अन्य चुनिंदा देशों के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया।  पाकिस्तान की इस समूची कवायद के पीछे यह योजना रही कि तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय मदद की बहाली हो,जो इस समय रुकी हुई है।   पाकिस्तान यह भी दिखाना चाहता है कि वह  अफगान लोगों के भविष्य के लिए चिंतित है और इस अस्थिर देश में शांति और स्थिरता बहाल करने में मदद करना चाहता है।


यह देखने में आया है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी को विदेशी गुलामी से मुक्ति कहकर प्रचारित करने के बाद अब पाकिस्तान विभिन्न वैश्विक मंचों पर अफगानिस्तान में अस्थिरता से उभरते खतरेका संकेत देकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को भयभीत करने की कोशिशें करता रहा है। इसके पीछे पाकिस्तान की यह रणनीति रही है कि वैश्विक स्तर पर तालिबान को मान्यता मिलने से उसके सामरिक हित सुरक्षित हो सकते है और वह भारत को दबाव में लाने में सफल हो सकता है।वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की पहचान एक ऐसे देश के रूप में बन गई है जिस पर भरोसा तो नहीं किया जा सकता लेकिन आतंकवाद की जटिलताओं को देखते हुए उसकी भूमिका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। खासकर पाकिस्तान की भू राजनैतिक स्थिति ने उसे अति संवेदनशील बना दिया है। इन सबके बीच पाकिस्तान अफगानिस्तान को मिलने वाली विदेशी मदद पर नियन्त्रण करके भारत को इससे दूर रखना चाहता है।वह चीन के आर्थिक हितों की अंतर्गत अफगानिस्तान को दांव पर लगा देना चाहता है। वहीं अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव कहीं फिर से न बढ़ जाएँ,इससे आशंकित पाकिस्तान की संकीर्ण नीति वहां के करोड़ों लोगों की परेशानियों को बढ़ा रही है।अफगानिस्तान को लेकर बुलाई गई अहम बैठकों में भारत को आमंत्रित न करने की उसकी मंशा से मानवीय संकट ही बढ़ा है। जबकि पिछलें कई दशकों से भारत ने अफगानिस्तान के विकास में अहम योगदान दिया है और शिक्षा,स्वास्थ्य  की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किए है,जो तालिबान की वापसी के बाद रुक गये है।


1980 के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत सेना को बाहर करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान का उपयोग फ्रंट लाईन राष्ट्र के रूप में किया था। इसके बदले पाकिस्तान को व्यापक आर्थिक और सामरिक सहायता हासिल हुई।1988 में जिनेवा समझौते के बाद सोवियत सेना तो लौट गई लेकिन अफगानिस्तान में शांति कभी स्थापित नहीं हो सकी। पाकिस्तान ने सोवियत सेना के खिलाफ जिन मुजाहिदीनों को प्रशिक्षित किया था,वे आगे चलकर तालिबान के रूप में सामने आये और उन्होंने हिंसात्मक तरीके से अफगानिस्तान की समूची व्यवस्था को नष्ट कर दिया। पिछले कई दशकों से तालिबान के नेताओं को पाकिस्तान का राजनीतिक और आर्थिक समर्थन प्राप्त है और यह जगजाहिर है। अफगानिस्तान में 20 वर्षों पर रहकर भी तालिबान को खत्म न कर पाने की अमेरिका की असफलता के पीछे भी पाकिस्तान की तालिबान को मदद देने की नीति को जिम्मेदार माना जाता है। अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में तालिबान के लिए चंदा इकट्ठा करने और उनके लड़ाकों का शहीद की तरह सम्मान करने की कई घटनाएं सामने आ चूकी है। इस काम में पाकिस्तान के मदरसों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।यहां तक की कई कुख्यात और शीर्ष स्तर के तालिबानों लड़ाकों के परिवार पाकिस्तान में ही रहते है जहां उन्हें पाकिस्तान की सेना,आईएसआई और सरकार सभी तरीके की सुविधाएँ मुहैया कराती रही है।


2018 में तत्कालीन अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान की सैनिक सहायता और आर्थिक सहायता रोकने का ऐलान करते हुए कहा था कि,हमने पाकिस्तान को पिछले 15 सालों में बेवकूफों की तरह 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और उन्होंने इसके बदले में हमारे नेताओं को बेवकूफ समझकर झूठ और धोखे से अलावा कुछ नहीं दिया है वे आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं जिनका हम अफगानिस्तान में शिकार कर रहे हैं,अब और नहीं। इन वैश्विक आलोचनाओं और ग्रे वॉच लिस्ट में होने के बाद भी पाकिस्तान ने साढ़े तीन हजार से ज्यादा संदिग्धों को आतंकवाद की वॉच लिस्ट से ही हटा  दिया थाजिसकी पश्चिमी देशों में खासतौर पर काफी आलोचना हुईकाउंटर टेररिज्म पर अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे पाकिस्तान ने अपनी सीमाओं में आतंकियों को पाल कर ना केवल भारत को बल्कि अफगानिस्तान को भी निशाने पर रखा। अमेरिकी सेना की मौजूदगी के दौरान भी आईएसआई और पाकिस्तान की सेना ने तालिबान का लगातार बचाव किया और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया। अमरीकी सैनिकों पर हमलें में भी पाकिस्तान की सहायता की कई रिपोर्टे सामने आ चूकी है।

दरअसल तालिबान अफगानिस्तान में इस्लामिक शासन व्यवस्था स्थापित करने का हिमायती रहा है जहां अल्पसंख्यकों को कड़े धार्मिक प्रतिबंधों के साथ महिलाओं शिक्षा से दूर रखना शामिल है।कोई महिला किसी दूसरे पुरुष के साथ दिखाई दे तो उसे सरेआम कोड़े मारने  की सजा से लेकर कई मामलों में  सिर कलम कर देने की सजाएं  इसमें शामिल है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय तालिबान पर यह दबाव बना रही है कि वह अफगानिस्तान में महिलाओं समेत सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व बहाल करें और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति निष्ठा और जिम्मेदारी से कार्य करें।


पाकिस्तान तालिबान के प्रवक्ता की तरह वैश्विक मंच पर बर्ताव कर रहा है और उसकी यह नीति अफगानिस्तान के लोगों की समस्याओं को बढ़ा रही है। पाकिस्तान पर न तो अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को भरोसा है और न ही इस्लामिक दुनिया के सभी देशों को। यह पाकिस्तान में आयोजित हालिया सम्मेलन में प्रतिबिम्बित भी हुआ।पाकिस्तान की पहल पर आयोजित इस विशेष सम्मेलन में बहुत कम देशों के शिखर नेता शामिल हुए।कई देशों ने अपने उपमंत्रियों और प्रतिनिधियों को भेजकर औपचारिकतायें पूर्ण कर ली।दूसरी ओर उसी समय इंडिया-सेंट्रल एशिया डायलॉग की एकदिवसीय बैठक नयी दिल्ली में आयोजित की गई इसकी अध्यक्षता भारत  के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने की तथा इस बैठकमें कजाकिस्तान,किर्गीज़तान,ताजिकिस्तान,तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान के विदेश मंत्री शामिल हुए।पिछले महीने भी इन सभी मध्य एशियाई देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने भारत में ऐसी ही एक अन्य बातचीत में भाग लिया था जिसका विषय अफ़ग़ानिस्तान ही था। ये सभी देश ओआईसी के सदस्य हैं, और ताजिकिस्तान,तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा साझा करते हैं।इन  मंत्रियों ने इस्लामाबाद में ओआईसी की बैठक में भाग लेने से ज्यादा भारत को तरजीह दी और यह संदेश दिया  जाने का फैसला किया, कि वे अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भारत के साथ सहयोग बनाए रखना चाहते हैं।


इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मदद करने के तरीके खोजने  पर खास तौर से चर्चा हुई।भारत यह सोचता है कि अगर वह मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध बनाता है, तो वह अफ़ग़ानिस्तान में भी अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम होगा। वहीं ताजिकिस्तान,तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे देश जो अफ़ग़ानिस्तान के साथ सीमा साझा करते हैं,उन्हें यह चिंता है कि आने वाले समय में अफ़ग़ानिस्तान की सरहदों पर मानवीय और सुरक्षा संकट खड़े हो सकते हैं। यहीं नहीं तालिबान को पाकिस्तान से मिलने वाली सैन्य मदद इन राष्ट्रों के लिए सुरक्षा संकट बढ़ा सकती है।कज़ाकिस्तान और किर्गिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद बड़ी चिंता इस्लामी चरमपंथ को लेकर है।


अफ़ग़ानिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और संस्थानों के पुनर्निर्माण में भारत अब तक तीन अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है। वहीं  कई मध्य एशियाई देशों के जातीय समूह तालिबान से जूझने को मजबूर है। अब भारत मध्य एशियाई देशों के साथ सहयोग करके अफगानिस्तान के लोगों की परेशानियों को कम करने की कोशिशे कर रहा है।अफगानिस्तान के लोगों के मानवीय संकट को ध्यान में रखते हुए भारत ने तालिबान के आने के बाद पहली बार अनाज और जीवन रखक दवाइयों को पाकिस्तान के रास्ते भेजा है। जाहिर है अफगानिस्तान को लेकर भारत की पहल के सकारात्मक परिणाम आ सकते है और इसका फायदा अफगानिस्तान के करोड़ों लोगों को मिल सकता है जो जिंदा रहने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे है।अफ़ग़ानिस्तान में भारत के मज़बूत होने का एक मनोवैज्ञानिक और सामरिक दबाव पाकिस्तान पर रहता है। इससे अफगानिस्तान को नियंत्रित और संतुलित करने में भी मदद मिलती है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान द्वारा उत्पन्न की गई अस्थिरता और आतंकवाद से निपटने के  लिए वहां भारत का मजबूत होना जरूरी है।

अपने अपने अटलजी,atal bihari vajpeyi

सांध्य प्रकाश 

                    



                                                                            

ऑस्कर वाइल्ड ने कहा है कि स्मृति एक ऐसी डायरी है,जिसे हम सब हमेशा अपने साथ रखते हैभारतीय राजनीति में अटलबिहारी वाजपेयी की निरपेक्षता सहेजने और सीखने के कई अवसर देती है उनके राजनीतिक मित्र लालकृष्ण आडवाणी अपनी किताब मेरा देश मेरा जीवन में लिखते है कि,लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटलजी की आसक्ति कमाल की थी और यह निष्ठा तब भी बनी रही जब वे देश के प्रधानमंत्री बन गए के.आर.नारायणन के बाद देश के राष्ट्रपति कौन होगे इसे लेकर उनके और अटलजी के बीच मंथन का किस्सा सुनाते हुए कहते है कि अटलजी चाहते थे कि वे देश के राष्ट्रपति के रूप में किसी उदात्त हृदय के व्यक्ति को बनाएं और जो गैर भाजपाई हो और देश में यह सन्देश जाएं की वे सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते है अंततः उन दोनों की सहमति पी.सी.अलेक्जेंडर पर बनी,जो इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नजदीकी रहे थे हालांकि कुछ कारणों से वे नही बन सके और देश को अब्दुल कलाम मिले लेकिन  अटलजी की मंशा बेहद साफ थी


दरअसल अटलबिहारी वाजपेयी ने आज़ादी के बाद उस नेहरु युग में संसद में कदम रखा था जब मुद्दों पर आधारित राजनीति होती थी और कई बार सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी की मुखर आलोचना करने से नहीं चूकते थे। नेहरु को इससे कोई एतराज भी नहीं था। जाने माने पत्रकार किंगशुक नाग अपनी किताब अटलबिहारी वाजपेयी ए मैन फ़ॉर ऑल सीज़न में लिखते हैं कि एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था,इनसे मिलिएये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं,हमेशा मेरी आलोचना करते हैं,लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूँ एक बार एक दूसरे विदेशी मेहमान से नेहरू ने वाजपेयी का परिचय संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया थावाजपेयी के मन में भी नेहरू के लिए बहुत इज़्ज़त थी। बाद में अटलजीने भी उन्हीं मूल्यों का पालन किया। एक बार वे विपक्ष के नेता होकर भी देश का प्रतिनिधित्व करने सरकार के द्वारा वैश्विक मंच भेजे गए थे और उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकार भी किया था।


लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर उनकी सजगता उनकी लिखी और बोली गई कविताओं और भाषणों में भी प्रतिबिम्बित होती रहीउनका मुद्दों पर आधारित विरोध होता था,वह व्यक्तिगत कभी नहीं बना द अनटोल्ड वाजपेयी में अटलजी ने कहा कि,जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे,तब उन्हें पता चला कि मुझे किडनी की दिक़्क़त हैएक दिन उन्होंने मुझे अपने दफ़्तर बुलाया और कहा कि वो मुझे संयुक्त राष्ट्र में भेजे जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैंउन्होंने उम्मीद जताई कि मैं इस मौक़े का इस्तेमाल अपने इलाज के लिए करूंगामैं न्यूयॉर्क गया,ये एक वजह है,जिसके चलते आज मैं ज़िंदा हूं। वास्तव में अटलजी उदार मन से और सार्वजनिक रूप से कृतज्ञता ज्ञापित करने से कभी पीछे नहीं हटें,फिर चाहे वह उनके राजनीतिक विरोधी क्यों न हो।  


 

अटलजी के जीवन में जब विरोधियों ने साम्प्रदायिकता के आरोप लगाएं तो उन्होंने उसका जवाब भी बेहद शानदार तरीके से दिया था। 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान लखनऊ की सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं ने उनकी सफलता के लिए उनकी दाहिनी भुजा पर इमाम-जामिन अर्थात पवित्र ताबीज बांधा था। भारत में साम्प्रदायिक विद्वेष के बहुसंख्यकों पर प्रभाव को लेकर उन्होनें संसद में बेबाकी से सर्वधर्म समभाव को हिन्दू धर्म की जन्म घूंटी बताते हुए कहा था की इस देश में ईश्वर को मानने वाले भी है और ईश्वर को नकारने वाले भी है यहाँ किसी को सूली पर नही चढ़ाया गया। किसी को पत्थर मारकर दुनिया से नही उठाया गयाये सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है। ये अनेकान्तवाद का देश है,और भारत कभी मजहबी राष्ट्र नहीं हो सकता।


सुशासन जनतंत्र का मूल आधार हैआज ये अपने तौर तरीकों को लेकर विवादों में भी  रहता हैलेकिन अटलजी ने सुशासन की अपनी कोशिशों में दलीय राजनीति को कभी हावी नही होने दियासामान्यत सरकारें बदलने के साथ नीतियां भी बदल जाती है लेकिन वाजपेयी अलहदा थेश्री नरसिम्हा राव ने आर्थिक सुधारों की जो नीति आरम्भ की थी,उसे अटल जी ने जारी रखाउन्हें इस नीति के सकारात्मक तथ्यों का ज्ञान था। वह उसे इस कारण ख़ारिज नहीं करना चाहते थे कि वह कांग्रेस की आर्थिक नीति थी। अटलजी का इस साहस के दूरगामी परिणाम हुए और अर्थव्यवस्था के सुधार से देश आर्थिक रूप से सम्पन्न हुआ।


अब अटलजी नहीं है और न ही उन जैसी राजनीति करने की किसी में कूबत है या इच्छा। अब पक्ष और विपक्ष वैचारिक लड़ाई के साथ सार्वजनिक मंचों पर अपनी घृणा को उभारने से भी परहेज नहीं करते। लोककल्याण से ज्यादा जातीय और धर्म की राजनीति,व्यक्तिगत आक्षेप और विदेशी जमीन पर भी एक दूसरे की आलोचना करने से कोई परहेज नहीं किया जाता। अब देश में साम्प्रदायिक राजनीति भी की जाती है और लोगों को धर्म के अपमान के नाम पर मार भी दिया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर भी पक्ष विपक्ष के नेता बोलने से परहेज करते है।  हाल ही में  सेना के पूर्व प्रमुखों एडमिरल अरुण प्रकाश,जनरल वेद मलिक और सेवानिवृत मेजर जनरल यश मोर ने  धार्मिक उन्माद फ़ैलाने की कोशिशों के साथ अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और पंजाब के कपूरथला के एक गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब के कथित अपमान के मामले में लिंचिंग की निंदा की हैमेजर जनरल यश मोर ने पंजाब में लिंचिंग को लेकर ट्वीट में लिखा है,यह परेशान करने वाला है कि दो लोगों की पंजाब में मज़हब के नाम पर हत्या कर दी गईहम दूसरा पाकिस्तान बन गए हैंयह नफ़रत बंद होनी चाहिए नहीं तो हम तबाह हो जाएंगे


अब नेता अभिव्यक्ति,किताब या लेख का जवाब हिंसा से देने के लिए लोगों को उकसाते है अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि किसी किताब या लेख का जवाब दूसरी किताब या लेख हो सकता है। अब लोकतंत्र में न शुचिता है,न ही सादगी और न ही मुद्दों पर आधारित प्रतिद्वंदिता जाहिर है क्योंकि अब  अटलजी भी नहीं है

 

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 राष्ट्रीय सहारा

                              


                                                                                                          

पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना की 1971 की कार्रवाई को द लाईटनिंग कैंपेन का नाम दिया गया था। भारत के लिए यह एक बेहद जटिल सैन्य अभियान था, जिसके लिए बहुत उच्च स्तर की सैनिक,कूटनीतिक,राजनैतिक,सामाजिक और प्रशासनिक तैयारी की जरूरत थी। 16 दिसम्बर 1971 को बांग्लादेश के विश्व नक्शे पर उभरने के बाद,इस पूरे अभियान का कई देशों के सैन्य संस्थानों में अध्ययन किया जाता है। नेशनल डिफेंस कॉलेज ऑफ़ पाकिस्तान के जंगी दस्तावेज में भारत पाकिस्तान के बीच 1971 के इस समूचे युद्ध पर कुछ इस तरह लिखा गया है कि हिंदुस्तानियों ने पूर्वी पाकिस्तान के खिलाफ हमले का खाका तैयार करने और उसे अंजाम देने में बिलकुल ऐसे पक्के ढंग से बनाया गया था जैसे किताबों में होता है। यह जंग सोच समझकर की गई तैयारी, बारीकी से बैठाए गए आपसी तालमेल और दिलेरी से अंजाम देने की बेहतरीन मिसाल है।


दरअसल 16 दिसम्बर 1971 को यह खबर सब दूर फ़ैल चूकी थी कि पाकिस्तान की सेना भारतीय सेना के सामने हथियार डालने वाली है। ढाका के रेसकोर्स मैदान में इसके लिए आत्मसमर्पण समारोह का आयोजन किया गया। सुबह से ही लाखों लोग इस मैदान पर जमा होने लगे। पाकिस्तानी सैनिकों के अत्याचारों से बंगला जनता बहुत गुस्से में थी और किसी अनहोनी को लेकर आशंकाएं भी जताई जा रही थी। यह रेसकोर्स का वहीं मैदान था जहां बंग बंधु शेख मुजीब ने मार्च 1971 में ही स्वतंत्र बंगलादेश का नारा लगाकर पाकिस्तान से अलग होने की घोषणा कर दी थी। हालांकि उन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था।


16 दिसम्बर का दिन ढलता जा रहा था कि करीब 4 बजे पूर्वी कमान के सेनापति जनरल अरोड़ा हेलीकाप्टर से ढाका के तेजगांव हवाई अड्डे पर पहुंचे। पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष ले.जनरल नियाजी तथा मेजर जनरल फरमान अली ने उनका स्वागत किया। यह बेहद दिलचस्प है कि जनरल अरोड़ा और जनरल नियाजी दोनों ने ही देहरादून के सैनिक स्कूल से साथ शिक्षा पाई थी और वे अच्छे दोस्त भी थे। वे 24 साल बाद मिले वह भी दुश्मन देशों के सेना प्रमुख के तौर पर।  लेकिन दोनों गर्म जोशी से मिलें और एक दूसरे के परिजनों का हालचाल पूछा।


इस समय हजारों ढाकावासी हवाई अड्डे पर जमा हो गए थे और उन्होंने जनरल अरोड़ा को फूलों से लाद दिया था।  लोग जय भारत,जय बांग्ला और जय इंदिरा के नारे लगा रहे थे। विदेशी पत्रकारों ने कहा कि उन्होंने किसी अन्य देश के सेनाध्यक्ष का ऐसा स्वागत और किसी देश में नहीं देखा। रेसकोर्स मैदान में लाखों की भीड़ के बीच से बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष ले.जनरल नियाजी तथा मेजर जनरल फरमान अली को ऊँचे मंच पर ले जाया गया। बंगला जनता पाकिस्तानी अफसरों को जोर-जोर से  गालियां देकर मार डालने की बात कह रही थी।


रुआंसे जनरल नियाजी ने आत्मसमर्पण के पत्र पर हस्ताक्षर किए,उनके हाथ कांप रहे थे और पेन भी उन्हें जनरल अरोड़ा ने दी थी। आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर करके परम्परा के अनुसार ले.जनरल नियाजी ने अपने कंधे से अपने पद के चिन्ह फाड़े। अपनी पिस्तौल से गोलियां निकालकर जनरल अरोड़ा को दी तथा झुककर जनरल अरोड़ा के माथे से माथा रगडा। इस प्रकार कुछ ही मिनटों में आत्म समर्पण समारोह समाप्त हो गया और इसके साथ ही स्वतंत्र बंगलादेश का जन्म हुआ।


बांग्लादेश के बन जाने से इस भारतीय उपमहाद्वीप में दो की जगह तीन देश हो गए और राजनीतिक नक्शा ही बदल गया। लगभग 55 हजार वर्गमील के पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बन जाने से भारत की 4712 किमी लंबी सीमा रेखा पर दुश्मन का आमना-सामना सदैव के लिए समाप्त हो गयाजिससे हमारे सैन्य खर्च का बड़ा हिस्सा अन्य विकास के कार्यो में लगाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। जमीन गंवाने के साथ ही महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदी का डेल्टा, चावल और पटसन की खेती जैसी प्राकृतिक धरोहर हमेशा के लिए पाकिस्तान से अलग हो गई,जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था हमेशा के गर्त में चली गयीवास्तव में 16 दिसम्बर 1971 को अपमान भरी पराजय के साथ ही बांग्लादेश के रूप में जो घाव भारत ने दिया हैयही दर्द पाकिस्तान को कभी चैन से नहीं बैठने देता। इस करारी पराजय के बाद पाकिस्तान ने भारत से आमने सामने के युद्द की को खत्म कर छद्म युद्द  लड़ने की रणनीति अपनाई और वह बदस्तूर जारी है

जनरल रावत का आधा मोर्चा,gen ravat aadha morcha

 दबंग दुनिया

                  


देश के पहले सीडीएस जनरल विपिन रावत ने कहा था कि  भारत की तैयारी हमेशा टू एंड हाफ़ फ्रंट वॉर की रहती है उनके ढाई मोर्चे का मतलब बिल्कुल साफ था कि भारत को चीन और पाकिस्तान के साथ आंतरिक मोर्चे पर इन दोनों देशों के द्वारा उत्पन्न की गई समस्याओं का भी सामना करने के लिए मुस्तैद रहना पड़ता हैअब सीडीएस जनरल विपिन रावत हमारे बीच नहीं है लेकिन उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा को चाक चौबन्द कर सफलता की जो इबारत गढ़ी है उसके लिए देश उनका सदैव ऋणी रहेगा


31 दिसंबर, 2016 को जनरल बिपिन रावत को थल सेना की कमान सौंपी गई थी और उसके बाद पिछले साल उन्हें देश का पहला सीडीएस बनाया गया था। उनके नेतृत्व में सामरिक मोर्चो पर  देश ने कई अभियानों को  सफततापूर्वक अंजाम दिया। यदि देश के भीतर की बात की जाए तो उनकी सफल रणनीति के ये आंकड़े गवाह है जिसने देश में नक्सलवाद और अलगाववाद की कमर तोड़ दी। देश में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है। नक्सलियों का विस्तार तेजी से कम हो रहा है। खुफिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अपने कोर गढ़ में लगातार कमजोर हो रहे नक्सली नए त्रिकोण की जद्दोजहद में हैं,लेकिन सुरक्षाबलों की रणनीति के आगे वे बेबस हो गए है। एक दशक पहले नक्सली हमलें की घटनाएं तकरीबन बाईस सौ थी जो अब घट कर 2020 में 665 हो गई है।


यहीं नहीं नक्सली हमलों में जान गंवाने वाले आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की संख्या में भी 80  फीसदी की कमी आई है। नक्सली हिंसा का भौगोलिक विस्तार भी सीमित हो गया है। नक्सली प्रभाव को कम करने में जनरल रावत की सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के साथ अर्द्ध सैनिक बलों का आधुनिकीकरण रहा है,जो बदस्तूर जारी है। जो नक्सलवाद कभी देश के करीब ढाई सौ जिलो में खौफ पैदा करता था उसका प्रभाव अब 40-42 जिलों तक सिमट गया है। इन जिलों में भी नक्सली सुरक्षाबलों के सामने खौफ में है। छत्तीसगढ़,झारखंड, ओडिशा और बिहार को सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्यों की कैटेगरी में रखा जाता था अब इन राज्यों के कई जिलों की नक्सल प्रभाव से मुक्त घोषित कर दिया गया हैइंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, सेलफोन कनेक्टिविटी, पुल, स्कूल जैसे विकास कार्यों पर काम किया जाता रहा है। नक्सल प्रभावित इलाकों में अब तक हजारों की तादाद में मोबाईल टॉवर लगाए जा चुके हैं जबकि कई हज़ार किलोमीटर सड़क का निर्माण भी हो चुका है।


जम्मू कश्मीर से देश की आंतरिक सुरक्षा को बड़ी चुनौती मिलती रही है लेकिन जनरल रावत ने सुरक्षा बलों का व्यापक समर्थन करके यहां हिंसा को काबू करने में बड़ी सफलता पाई। गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर के संबंध में आतंकी वारदातों और घुसपैठ का जो  ब्यौरा दिया है,उसके मुताबिक 31 अक्टूबर, 2021 तक यहां घुसपैठ की अनुमानित 28 घटनाएं सामने आई हैं।  यह 2018 और 2019 के मुकाबलें बहुत कम है। बता दें कि जम्मू-कश्मीर से सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को आर्टिकल 370 का प्रावधान खत्म किया था आर्टिकल 370 को लेकर चीन और पाकिस्तान के विष वमन से सुरक्षा की बड़ी चुनौती उत्पन्न होने की आशंकाएं जताई गई थी लेकिन जनरल रावत ने सैन्य समन्वय का बड़ा उदाहरण पेश करके आतंकवाद पर काबू पाने में बड़ी सफलता अर्जित की गृह मंत्रालय के अनुसार 21 नवंबर, 2021 तक जम्मू कश्मीर में दहशतगर्दी की कुल 200 घटनाएं हुई हैं। जबकि,आर्टिकल 370 हटने से पहले 2018 में वहां कुल 417 आतंकी घटनाएं हुई थीं। इस दौरान जम्मू कश्मीर में आतंकियों के सफाएं के  लिए ऑल आउट जैसे  अभियान चलाएं गए और कई कुख्यात आतंकियों को मार गिराने में  सुरक्षा एजेंसियों को सफलता मिली। दिसंबर,2020 से लेकर 26 नवंबर,2021 तक जम्मू-कश्मीर में 14 आतंकवादियों को पकड़ा गया है और 165 आतंकी मार गिराए गए हैं। आतंकियों के खिलाफ हुई इन कार्रवाइयों की वजह से ही इस साल नवंबर में  सवा लाख से ज्यादा पर्यटक जम्मू कश्मीर पहुंचे,यह कई वर्षों बाद मुमकिन हुआ है।


भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4 हजार किलोमीटर से ज्यादा की सीमा रेखा है और यह मुख्यतः असम,त्रिपुरा,पश्चिम बंगाल,मेघालय और मिजोरम को छूती है। बांग्लादेश और भारत सीमा के  बीच पूर्वोत्तर की भौगोलिक परिस्थितियां घुसपैठ के अनुकूल है और इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई द्वारा पूर्वोत्तर के रास्ते भारत को आतंकवाद निरंतर आयातीत कर रही थी। इसमें घुसपैठ,तस्करी,मदरसों का जाल और नकली मुद्रा का अवैध कारोबार शामिल रहा। लेकिन अब सामरिक कदमों से स्थितियां बदल गई है चीन को लेकर जनरल रावत के सख्त तेवर हमेशा देखे गए और उन्होंने चीन को कड़े सन्देश देने से भी कभी गुरेज नहीं किया  चीन  के लिए पूर्वोत्तर का पिछड़ा होना फायदेमंद हुआ करता था लेकिन अब ऐसा नहीं हैचीन से सीमा विवाद के चलते और पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियों से जूझते भारत ने अब अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत किया है। इससे चीन समर्थित नक्सलवाद को रोकने में  बड़ी  मदद मिली है


अशांत इलाकों में काम करने के अनुभव को देखते हुए सरकार ने जनरल रावत को दो वरिष्ठ अफसरों पर तरजीह देते हुए सेना प्रमुख बनाया था। इसके बाद उन्होंने सीडीएस के तौर पर भी बेहतरीन काम किया। वे देश के ऐसे सैनिक रहे जिन्होंने देश की सीमा पर कड़े प्रतिद्वंदियों को नियंत्रित किया वहीं देश के अंदर अलगाववाद को खत्म करने में महती भूमिका निभाई।

 

 

 

brahmadeep alune

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