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संविधान में हिंदुत्व, sanvidhan hindutv राष्ट्रीय सहारा

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  राष्ट्रीय सहारा                                                                                                                                                           मै समाज से पृथक होकर अपनी अस्मिता की तलाश नहीं कर सकता। इसके लिए मुझे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय सभ्यता को अपनाना ही होगा। भारत के संविधान निर्माता यह भलीभांति जानते और समझते थे कि विविधता का सम्मान करते हुए भी भारतीय सभ्यता ही भारत और संविधान की पहचान बन सकती है। संविधान की मूल किताब में राम , कृष्ण.भगवतगीता , गंगा , विक्रमादित्य जैसे चित्र उन आदर्शों और मूल्यों का प्रतिबिम्ब है। संविधान की मूल किताब संसद के पुस्तकालय में अब भी संग्रहित है। एक इतिहासकार ने संविधान और मौलिक अधिकारों को लेकर एक दिलचस्प टिप्पणी की थी कि देश   की संविधान सभा आम लोगों के मौलिक अधिकारों को उस वक्त तैयार कर रही थी जब मुल्क मौलिक गड़बड़ियों के नरसंहार से होकर गुजर रहा था। हालांकि आस्था के कठिन प्रश्न पर कोई गलती नहीं हो , इसके प्रति नेता सचेत थे और नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव के जरिये भारत की भविष्य की तस्वीर क

इंदिरा गांधी,रॉ और पस्त दुश्मन देश indira gandhi raw rashtriy sahara

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  राष्ट्रीय सहारा 19 नवंबर-इंदिरा गांधी जयंती                        आज़ादी के बीसवें साल में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जब बीबीसी ने पूछा की आप देश को क्या संदेश देना चाहती है,इस पर उनका जवाब था कि हम बहुत मुश्किल जमाने से गुजरे है लेकिन हम उतने ही मजबूत बन कर उभरें है। वे इस मौके पर यह विश्वास दिलानी नहीं भूली कि वो दिन भी आएगा जब हमारा देश खूब तेजी से आगे बढ़ेगा। दरअसल इंदिरा गांधी भारत के उस दौर की प्रधानमंत्री थी जब भारत ने युद्द,अकाल,दुश्मनी का सामना किया था और वे देश को इन सब चुनौतियों से सफलतापुर्वक उबारने में कामयाब भी रही। उन्हें आज भी देश का सर्वकालीन लोकप्रिय और सफल प्रधानमंत्री माना जाता है । 1962 के चीन से युद्द की कडवी यादें और 1965 के पाकिस्तान से युद्द में वैश्विक दबाव का घूंट भारत ने पीया था और वे देश को इससे उबारने के लिए प्रतिबद्द थी। 1971 में पाकिस्तान से युद्द के समय जब पाकिस्तानी विमान भारत के किसी भी शहर को निशाना बना सकते थे,उन्होंने देश की निर्भयता और साहस दिखाने के लिए दिल्ली के रामलीला के मैदान पर आमसभा की और दुश्मन देशों को वहीं से चुनौती द

पृथ्वी का गौरव है जनजातियां prithvi aadivasi politics

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  पॉलिटिक्स                                                                                                          इन्हें आदिवासी,मूलनिवासी,जनजाति,भूमिपुत्र या धरतीपुत्र में से किसी भी नाम से संबोधित करें लेकिन वास्तव में यहीं प्रकृति के रक्षक और पर्यावरण के   संरक्षक है । जहां     आदिवासी     है   वहां     जंगल     बचे     हुए     है और जहां वे नहीं है या जाने को मजबूर हुए है वहां जंग का नामोनिशान मिट चुका है । आदिवासियों के पर्व त्योहार , रीति रिवाज , जीवन सब कुछ प्रकृति पर ही निर्भर है।   जनजातीय संस्कृति भारत के मूल निवासियों का वह समृद्द प्रतिबिम्ब है जहां लोकाचार में प्रकृति के प्रति असीम प्रेम दिखाई पडती है । जल,जंगल और जमीन के प्रति उनकी निष्ठा हजारों वर्षों से मानव सभ्यता के लिए सुरक्षा चक्र रही है और यह पर्यावरण संरक्षण की अनुपम मिसाल है ।   आदिवासियों का धर्म प्रकृति की आराधना   दुनिया ने 1970 में पहली बार पृथ्वी दिवस को मनाने और लोगों को पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जागरूक करने का संकल्प लिया,लेकिन भारत के मूल निवासियों ने सदियों से अपनी मिट

लोकतान्त्रिक नेहरु ने जब हिटलर और मुसोलिनी से मिलने से इंकार किया,nehru,musolini,hitlar

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  सुबह सवेरे अंग्रेजों की कड़ी प्रतिद्वंदिता और गुलामी के दंश को लंबे समय तक झेलने के बाद भी लोकतंत्र के प्रति सम्मान का जो जज्बा भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने दिखाया था उसकी कोई और मिसाल नहीं हो सकती । आजादी के बाद जो मंत्रिमंडल बनी उसमें पंडित नेहरू   स्वयम को प्रधानमंत्री के रुप में भी मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों के बराबर समझते हुए कभी किसी अन्य मंत्री के कामों में दखल नहीं देते थे। एक बार सरदार पटेल ने उन्हें खासतौर पर कहा था कि आप अन्य मंत्रियों के कार्यों में दखल दे सकते है। लोकतान्त्रिक मूल्यों को लेकर उनके इस आग्रह की प्रशंसा अटलबिहारी वाजपेयी ने भी की थी। अटलबिहारी वाजपेयी संसद में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले इकलौते सदस्य थे लेकिन इसके भी पंडित नेहरु उनका गहरा सम्मान करने थे। एक   बार तो अटलबिहारी वाजपेयी ने पंडित नेहरु पर हमला करते हुए कहा था कि, आपका मिला जुला व्यक्तित्व है। आप में चर्चिल भी हैं और चैंबरलेन भी है। लेकिन पंडित नेहरु इस पर नाराज नहीं हुए बल्कि शाम को किसी बैंक्वेट में जब बे अटलजी से मिले तो उनका उत्साहवर्धन करते हुए बोले