संविधान में हिंदुत्व, sanvidhan hindutv राष्ट्रीय सहारा

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मै समाज से पृथक होकर अपनी अस्मिता की तलाश नहीं कर सकता। इसके लिए मुझे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय सभ्यता को अपनाना ही होगा। भारत के संविधान निर्माता यह भलीभांति जानते और समझते थे कि विविधता का सम्मान करते हुए भी भारतीय सभ्यता ही भारत और संविधान की पहचान बन सकती है। संविधान की मूल किताब में राम,कृष्ण.भगवतगीता,गंगा,विक्रमादित्य जैसे चित्र उन आदर्शों और मूल्यों का प्रतिबिम्ब है। संविधान की मूल किताब संसद के पुस्तकालय में अब भी संग्रहित है।

एक इतिहासकार ने संविधान और मौलिक अधिकारों को लेकर एक दिलचस्प टिप्पणी की थी कि देश  की संविधान सभा आम लोगों के मौलिक अधिकारों को उस वक्त तैयार कर रही थी जब मुल्क मौलिक गड़बड़ियों के नरसंहार से होकर गुजर रहा था।


हालांकि आस्था के कठिन प्रश्न पर कोई गलती नहीं हो,इसके प्रति नेता सचेत थे और नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव के जरिये भारत की भविष्य की तस्वीर को साफ भी किया। यही उद्देश्य प्रस्ताव भारत के संविधान की  प्रस्तावना में समाहित है और इसे संविधान की आत्मा भी कहा गया। प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास, प्रतिष्ठा और अवसर की समता,व्यक्ति की गरिमा,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को बनाएं रखने को लेकर प्रतिबद्धता जाहिर की गई है।


भारत विविधता को समेटे हुए है और ऐसे में संविधान का विशिष्ट रूप भारत की पहचान भी नजर आये इसको लेकर शांति वन में नेहरु की चर्चा एक जाने माने चित्रकार से हुई और इसके बाद संविधान में वह प्रतिबिम्बित हुआ। संविधान के सभी 22 अध्यायों को ऐतिहासिक और पौराणिक चित्रों और किनारियों से सजाया गया है। इन चित्रों में  भगवान राम,भगवद्गीता का  उपदेश,भगवान नटराज का चित्र,महावीर स्वामी,बुद्द,गंगा,मुगल बादशाह अकबर,टीपू सुल्तान,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई,सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह,वैदिक काल में चलाए जा रहे गुरुकुल  के एक प्रतीकात्मक चित्र के साथ राजा  विक्रमादित्य  नजर आते है। भारत सार्वभौमिकता से चलता रहा है और यहां यह रचा बसा है। इस देश ने राम से परस्पर सद्भाव और सामंजस्य सीखा है। मुगलकाल में भी इसे स्वीकार किया गया अकबर ने तो बाकायदा राम सिया के नाम पर एक सिक्का जारी किया था चांदी का इस सिक्के पर राम और सीता की तस्वीरें उकेरी गई थी

जिन्हें हिन्दुस्तान की समझ नहीं,वे यहां से चले जाएं

संविधान सभा के एक सदस्य आर.वी.धुलेकर ने जब यह कहा...

संविधान की मूल किताब में उकेरे गए चित्रों से यह साफ हो गया की विविधता को स्वीकार करते हुए भी भारत को राम राज्य और भारतीय सभ्यता के मूल्यों पर आधारित राष्ट्र के रूप में अंगीकार किया गया। हिन्दुस्तानी पहचान को लेकर कई बार बहस भी हुई। संविधान सभा के एक सदस्य आर.वी.धुलेकर ने सबको खरी खरी सुना दी। धुलेकर ने भाषा को लेकर एक संशोधन प्रस्ताव पेश करते हुए था कि,जो लोग हिन्दुस्तानी नहीं समझते है उन्हें इस देश में रहने का कोई हक नहीं है। जो लोग भारत का संविधान बनाने के लिए इस सदन में मौजूद है, लेकिन हिन्दुस्तानी भाषा नहीं समझते वे इस सदन के सदस्य बनने के काबिल नहीं है। बेहतर है की वे यहाँ से चले जाएँ।

 


 

आध्यात्मिकता पर लौकिकता को तरजीह

धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता में मान्यताओं का नहीं बल्कि धर्म के प्रति गहरा वैचारिक  मतभेद दिखाई पड़ता है। धर्मनिरपेक्षता राज्य की नीति हो सकती है वहीं पंथ निरपेक्षता में राज्य या व्यवस्थाओं के लिए कोई आदेश नहीं होता। पंथ निरपेक्षता भारतीय शब्द है जिसमें सर्वधर्म समभाव प्रदर्शित होता है। धर्म का संबंध आध्यात्मिकता से स्वत: जुड़ता है और विविध धर्मों में अलग अलग मान्यताएं संघर्ष का कारण बन सकती है। भारतीय संविधान में इसीलिए आध्यात्मिकता पर लौकिकता को तरजीह  देते हुए इसे पंथनिरपेक्ष कहा गया। भारतीय संविधान में पंथनिरपेक्षता की सभी अवधारणाएँ विद्यमान हैं अर्थात् हमारे देश में सभी धर्म समान हैं और उन्हें सरकार का समान समर्थन प्राप्त है।


 

मैं हिन्दू क्यों हूँ, सलमान खुर्शीद को शशि थरूर का  जवाब

हिंदुत्व "रूढ़िवाद" या "नैतिक निरपेक्षता" का एक चरम रूप  नहीं है..

सलमान ख़ुर्शीद की नई किताब 'सनराइज़ ओवर अयोध्या' हाल ही में बाज़ार में आई है,जिसकी एक लाइन पर विवाद हो रहा है,जिसमें हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और बोको हराम से की गई है  खुर्शीद का विरोध कांग्रेस के ही एक नेता  गुलाम नबी आज़ाद ने करते हुए कहा कि हिंदुत्व की तुलना आईएसआईएस और जिहादी इस्लाम से करना तथ्यात्मक रूप से ग़लत और अतिशयोक्ति है  वहीं हिन्दूवाद को लेकर शशि थरूर अपना नजरिया अपनी किताब में रख चूके है।  धर्म आस्था से जुड़ा प्रश्न है,वहीं भारतीयता या इसे हिन्दूवाद  भी कह सकते है,इसके दायरे असीमित है। शशि थरूर ने अपनी किताब मैं हिन्दू क्यों हूँ,में इसे कुछ इस प्रकार बयाँ किया है,हिन्दूवाद विदेशियों द्वारा भारत के स्वदेशी धर्म को दिया गया नाम है। इसके दायरे में बहुत से सिद्धांत और धार्मिक व्यवहार आते है,जो पंथवाद से लेकर अनीश्वरवाद तक और अवतारों में आस्था से लेकर जातिवाद में विश्वास तक फैले है,परन्तु इनमें से किसी में भी हिन्दू के  लिए  कोई अनिवार्य मूलमन्त्र नहीं है। हमारे धर्म में कोई भी हठधर्मिता नहीं है।  

 

गांधी एक दूसरे के धर्म में दखल देने के खिलाफ रहे

द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह अपेक्षा की गई थी की आधुनिक दुनिया मध्यकालीन धार्मिक द्वंद को पीछे छोड़कर समूची मानव जाति के विकास पर ध्यान देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दुनिया भर में आस्था को अंधविश्वास से तथा धार्मिक हितों को व्यक्तिगत सम्मान से जोड़ने की राजनीतिक विचारधाराएँ बढ़ गई,इसके साथ ही सत्ता प्राप्त करने का इसे साधन भी बना लिया गया। महात्मा गांधी इसे लेकर आशंकित तो थे ही।  हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि,कोई भी मुल्क तभी एक राष्ट्र माना जाएगा जब उसमे दूसरे धर्मों के समावेश करने का गुण आना चाहिए। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्मों में दखल नहीं देते,अगर देते है तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है।


अदालत में हिंदुत्व

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने डॉ. रमेश यशवंत प्रभू बनाम श्री प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और अन्य, बाल ठाकरे बनाम श्री प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और अन्य और श्री सूर्यकांत वेंकटराव महादिक बनाम श्री सरोज संदेश नाइक केसों में 11 दिसंबर 1995 को अपने फैसले में कहा था कि हिंदुत्व या हिन्दूवाद एक जीवन शैली है और हमें यह देखना होगा कि चुनावी भाषणों में इन शब्द का किस संदर्भ में उपयोग किया गया है


हिंदुत्व पर अटलबिहारी वाजपेयी का नजरिया अपनाने की जरूरत

हिंदुत्व भारत की पहचान रही है और वह लोकाचार में दिखाई भी पड़ती है। हिंदुत्ब को  राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिशों और इसके उभार की  आशंकाओं पर  अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना नजरिया साफ किया था। वाजपेयी ने भारत में साम्प्रदायिक विद्वेष के बहुसंख्यकों पर प्रभाव को लेकर संसद में सर्वधर्म समभाव को हिन्दू धर्म की जन्म घूंटी बताते हुए कहा था की इस देश में ईश्वर को मानने वाले भी है और ईश्वर को नकारने वाले भी है,यहाँ किसी को सूली पर नही चढ़ाया गया। किसी को पत्थर मारकर दुनिया से नही उठाया गया,ये सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है। ये अनेकान्तवाद का देश है,और भारत कभी मजहबी राष्ट्र नहीं हो सकता ।


बहरहाल हिंदुत्व को समझने वाले,इसे न  समझने वाले और इसका राजनीतिक दोहन करने की कोशिश करने वाले सभी को अटलबिहारी वाजपेयी के विचारों को ग्रहण करने की जरूरत है। उन्होंने जिस हिंदुत्ब की बात की थी वहीं संविधान में भी नजर आता है। जरूरत इस बात की है कि उसे समझें,विचारों,व्यवहार और लोकाचार में उसका पालन सुनिश्चित करें।

 

 

 

 

 

 

 

इंदिरा गांधी,रॉ और पस्त दुश्मन देश indira gandhi raw rashtriy sahara

 राष्ट्रीय सहारा

19 नवंबर-इंदिरा गांधी जयंती

                    


आज़ादी के बीसवें साल में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जब बीबीसी ने पूछा की आप देश को क्या संदेश देना चाहती है,इस पर उनका जवाब था कि हम बहुत मुश्किल जमाने से गुजरे है लेकिन हम उतने ही मजबूत बन कर उभरें है। वे इस मौके पर यह विश्वास दिलानी नहीं भूली कि वो दिन भी आएगा जब हमारा देश खूब तेजी से आगे बढ़ेगा। दरअसल इंदिरा गांधी भारत के उस दौर की प्रधानमंत्री थी जब भारत ने युद्द,अकाल,दुश्मनी का सामना किया था और वे देश को इन सब चुनौतियों से सफलतापुर्वक उबारने में कामयाब भी रही। उन्हें आज भी देश का सर्वकालीन लोकप्रिय और सफल प्रधानमंत्री माना जाता है


1962 के चीन से युद्द की कडवी यादें और 1965 के पाकिस्तान से युद्द में वैश्विक दबाव का घूंट भारत ने पीया था और वे देश को इससे उबारने के लिए प्रतिबद्द थी। 1971 में पाकिस्तान से युद्द के समय जब पाकिस्तानी विमान भारत के किसी भी शहर को निशाना बना सकते थे,उन्होंने देश की निर्भयता और साहस दिखाने के लिए दिल्ली के रामलीला के मैदान पर आमसभा की और दुश्मन देशों को वहीं से चुनौती दी। उनका यह भाषण इतना भडकाऊ और आक्रामक था कि सरकारी मीडिया को भाषण के बहुत सारे अंश काटना पड़े थे। उस समय अमेरिका का सातवां बेड़ा भारत की और तेजी से आ रहा था। चीन पाकिस्तान के समर्थन ने खड़ा था और भारत के पास इन सबसे से निपटने के लिए सामरिक क्षमता नहीं थी। यह बात ओर है कि इंदिरा गांधी की निर्भयता से दुश्मनों के सारे दांव धराशायी हो गए। अमेरिकी नौ सेना  का सातवां बेड़ा 16 दिसम्बर 1971 को बंगाल की खाड़ी में पहुँचता लेकिन उसके एक दिन पहले ही पाकिस्तान की सेना को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर होना पड़ा और अमेरिका ने मुंह की खाते हुए अपने बेड़े को श्रीलंका की ओर मोड़ना पड़ा।


पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय सेना की 1971 की कार्रवाई को ‘‘द लाईटनिंग कैंपेन’’का नाम दिया गया था। भारत के लिए यह एक बेहद जटिल सैन्य अभियान था,जिसके लिए बहुत उच्च स्तर की सैनिक,कूटनीतिक,राजनैतिक,सामाजिक और प्रशासनिक तैयारी की जरूरत थी। 16 दिसम्बर 1971  को बांग्लादेश के विश्व नक्शे पर उभरने के बाद,इस पूरे अभियान का कई देशों के सैन्य संस्थानों में अध्ययन किया जाता है। नेशनल डिफेंस कॉलेज ऑफ़ पाकिस्तान के जंगी दस्तावेज में भारत पाकिस्तान के बीच 1971 के इस समूचे युद्ध पर कुछ इस तरह लिखा गया है कि हिंदुस्तानियों ने पूर्वी पाकिस्तान के खिलाफ हमले का खाका तैयार करने और उसे अंजाम देने में बिलकुल ऐसे पक्के ढंग से बनाया गया था जैसे किताबों में होता है। यह जंग सोच समझकर की गई तैयारी,बारीकी से बैठाए गए आपसी तालमेल और दिलेरी से अंजाम देने की बेहतरीन मिसाल है।


इस तथ्य को विश्व के बड़े सेनापतियों ने स्वीकार किया है और भारतीय सेना के रण कौशल की तुलना जर्मन सेना द्वारा पूरे फ्रांस को परास्त करने के अभियान से की है। ब्रिटिश सेनाधिकारी कैनेथ हंट ने कहा था कि भारतीय सेना ने 14 दिनों में बांग्लादेश के 50 हजार वर्गमील क्षेत्र मे एक लाख से अधिक पाकिस्तानी सेना को परास्त करके विश्व के सैनिक इतिहास में शौर्य और रण कौशल की नई मिसाल कायम की। इस समय भारतीय सेना की तुलना विश्व की सबसे ऊंची कोटि की सेनाओं में की जा सकती है। अमेरिकी जनरल ने लिखा कि भारतीय दस्ते पूर्व बंगाल में तेजी से बड़े और मजबूत छावनियों को घेरकर छोड़ते गए तथा कुछ दिन में ढाका तक पहुंच गए। दुनिया में कोई भी यह आशा नहीं करता था कि भारतीय सेना ऐसी सफाई से अमेरिकी हथियारों से लैस विशाल पाकिस्तानी सेना को इतनी जल्दी परास्त कर देगी। विश्व की सभी राजधानियों में भारतीय सेना की तेजी पर आश्चर्य प्रकट किया गया। अमेरिकी  गुप्तचर संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष ने भी माना कि वे भारतीय सेना की तेजी को समझने में असफल रहे।



18 मई 1974 में भारत में पहला परमाणु परीक्षण किया था और यह उसय दुनिया ने लिए अभूतपूर्व घटना थीयह संयुक्त राष्ट्र  के पाँच स्थायी सदस्य देशों के अलावा किसी अन्य देश द्वारा किया गया पहला परमाणु हथियार का परीक्षण था। भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश के पास इस तकनीक का होना मुमकिन ही नहीं था लेकिन इंदिरा गांधी का अपने देश के वैज्ञानिकों पर पूरा भरोसा था और उन्होंने इसे बेहद गोपनीयता से अंजाम भी दिया था। उस समय परमाणु बम बनाने के लिए संसाधनों की भारी कमी के बाद भी देश के वैज्ञानिक आत्मविश्वास से इतने भरे हुए थे कि उन्होंने कहा था की यदि भारत का परमाणु परीक्षण असफल होता है तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि उसमें कोई कमी रह गई। यदि ऐसा होता है तो यह समझा जाना चाहिए की भौतिकी का सिद्धांत ही असफल हो गया।


इंदिरा गांधी के कार्यकाल में बांग्लादेश का जन्म,भारत का पहला  परमाणु परीक्षण, सिक्किम का भारत में विलय जैसे गोपनीय मिशनों के पीछे रॉ का बड़ा हाथ था।  किसी भी देश की ख़ुफ़िया एजेंसी उस देश के राष्ट्रीय हितों के संवर्धन का बड़ी गोपनीयता से पालन करती है और रॉ के कारनामें इसका पर्याय रहे है। पाकिस्तान  और चीन की परम्परागत दुश्मनी से सामने आई परिस्थितियों में ही 1968 में रॉ का निर्माण किया गया था। इंदिरा गांधी द्वारा स्थापित रॉ ने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।


बांग्लादेश बनने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान को यह कहते हुए रॉ प्रमुख से मिलवाया कि आप चाहे तो हमारे  काव साहब से आपके देश के बारे में कोई भी जानकारी ले सकते है,वे बांग्लादेश के बारे में जितना जानते है शायद हम भी नहीं जानते। रॉ का प्रभाव पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र में भी रहा है। रॉ के एक पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमन ने अपनी किताब 'द काऊ बॉयज़ ऑफ़ रॉ' में लिखा है कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत के ऊपर हमला करने जा रहा है नबी एहमद शाकिर कराची युनिवर्सिटी में पढ़े,बाद में वे पाकिस्तानी सेना में शामिल हुए और बड़े ओहदे तक भी  पहुंचे। पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी की बेटी से उनका विवाह हुआ और बच्चें भी हुए। करीब 25 साल पाकिस्तान में बिताने वाले इस शख्स के बारे में बहुत बाद में पता चला की वे राजस्थान के रविंद्र कौशिक थे जो रॉ के एजेंट के रूप में पाकिस्तान गए थे।


वास्तव में इंदिरा गांधी भारत की बेहद साहसिक और आत्मविश्वास से भरपूर ऐसी नेता रही जिन्होंने प्रचार तंत्र से दूर रहकर बेहद गोपनीय तरीके से देश को सामरिक बढ़त दिलाने में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की। ऐसा करके उन्होंने  भारत को दुनिया के अग्रणी ताकतवर  राष्ट्रों में शुमार कर दिया  इंदिरा गांधी ने  अपने जीवनकाल में ही यह तय कर दिया था कि कोई भी वैदेशिक ताकत भारत पर हमला करने का साहस नहीं कर सकती। इतिहास इस बात का साक्षी है कि 1971 के बाद भारत पर हमला करने का साहस न तो पाकिस्तान जुटा पाया और न  ही चीन।  

पृथ्वी का गौरव है जनजातियां prithvi aadivasi politics

 पॉलिटिक्स


                           

                                                                            

इन्हें आदिवासी,मूलनिवासी,जनजाति,भूमिपुत्र या धरतीपुत्र में से किसी भी नाम से संबोधित करें लेकिन वास्तव में यहीं प्रकृति के रक्षक और पर्यावरण के  संरक्षक हैजहां   आदिवासी   है  वहां   जंगल   बचे   हुए   है और जहां वे नहीं है या जाने को मजबूर हुए है वहां जंग का नामोनिशान मिट चुका हैआदिवासियों के पर्व त्योहार, रीति रिवाज, जीवन सब कुछ प्रकृति पर ही निर्भर है।  जनजातीय संस्कृति भारत के मूल निवासियों का वह समृद्द प्रतिबिम्ब है जहां लोकाचार में प्रकृति के प्रति असीम प्रेम दिखाई पडती हैजल,जंगल और जमीन के प्रति उनकी निष्ठा हजारों वर्षों से मानव सभ्यता के लिए सुरक्षा चक्र रही है और यह पर्यावरण संरक्षण की अनुपम मिसाल है

 
आदिवासियों का धर्म प्रकृति की आराधना
 
दुनिया ने 1970 में पहली बार पृथ्वी दिवस को मनाने और लोगों को पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जागरूक करने का संकल्प लिया,लेकिन भारत के मूल निवासियों ने सदियों से अपनी मिटटी और प्रकृति की सुरक्षा को अपना जीवन और पहचान माना हैआदिवासियों का धर्म ही प्रकृति की आराधना करना है। ये प्रकृति-पूजक है और वन,पर्वत,नदियों एवं सूर्य की आराधना करते है। यह उनके गीतों और त्योहारों में भी दिखाई पड़ता है।

 
सरहुल त्योहार धरती माता को समर्पित है
 
झारखंड में आदिवासियों की आबादी 26.2 फीसदी है। साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला झारखंड पूरे देश के भौगोलिक क्षेत्र का 2.62 फीसदी है और पूरे देश का 40 फीसदी खनिज इस भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। घने वन,जंगल और झाड़ के कारण इस राज्य का नाम झारखंड पड़ा है। राज्य का पूरा प्रदेश पठारी है और यहाँ का छोटा नागपुर  पठार पर खनिज और ऊर्जा का विपुल भंडार है। झारखंड में सरहुल पर्व मनाया जाता है यह सरहुल आदिवासियों का प्रमुख त्योहार हैपतझड़ के बाद, जब पेड़-पौधे हरे-भरे होने लगते हैं तब सरहुल त्योहार शुरू होता हैयह पर्व महीने भर चलता हैसरहुल त्योहार धरती माता को समर्पित हैइस त्योहार के दौरान प्रकृति की पूजा की जाती है इस पर्व को झारखंड की विभिन्न जनजातियां अलग-अलग नाम से मनाती हैंउरांव जनजाति इसे 'खुदी पर्व', संथाल लोग 'बाहा पर्व', मुंडा समुदाय के लोग 'बा पर्व' और खड़िया जनजाति 'जंकौर पर्व' के नाम से इसे मनाती है
 

छत्तीसगढ़ में आदिवासी का प्रमुख त्यौहार पृथ्वी की पूजा है 
 

तकरीबन 32 फीसदी आदिवासी आबादी वाला छत्तीसगढ़ राज्य साल और सागोन के वन के लिए पहचाना जाता है। कोयला,लौह अयस्क, बॉक्साइट, चुना पत्थर और टिनकी खनिज संपदा से भरा यह राज्य भारत में विशिष्ट स्थान रखता है। छत्तीसगढ़ राज्य में महत्वपूर्ण महत्व माटी पूजा या पृथ्वी की पूजा हैइस त्यौहार के दौरान बस्तर जिले के आदिवासी लोग अगले सीजन के लिए फसलों की भरपूर पैदावार के लिए पृथ्वी की पूजा करते हैंधार्मिक संस्कार और परंपराएं भी उनके द्वारा अत्यंत श्रद्धा और समर्पण के साथ मनाई जाती हैं।

 


सोहराय पर्व का संबंध पृथ्वी की उत्पत्ति से

आदिवासियों का सोहराय पर्व भी बहुत लोकप्रिय हैपांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व का संबंध सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ है। आदिवासी समाज के इस महान पर्व को लेकर झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा आदि राज्यों में बहुत पहले से तैयारी प्रारंभ हो जाती है।

 

 


मध्यप्रदेश में वृक्षों में आदिवासी देवता को देखते है

मध्यप्रदेश की आबादी का तकरीबन 21 फीसदी आदिवासी है और इनकी जनसंख्या पौने दो करोड़ है मध्यप्रदेश के दक्षिण क्षेत्र में निवास करने वाली बैगा सर्वाधिक महत्वपूर्ण जनजाति है। यह गोंडों की ही उपजाति मानी जाती है। इनमें बासी भोजन की परम्परा है। सालइनका प्रिय वृक्ष है जिसमे इनके देवता  बुढा देव निवास करते हैं। सहरिया जनजाति की बसाहट को सहराना कहा जाता है, जिसका मुखिया पटेलहोता है। सहरिया जड़ी-बूटियों की पहचान में माहिर होते हैं। अलीराजपुर क्षेत्र में कुछ गाँवों में रेसकुल पेड़ के नीचे टटल देवी का स्थान होता है

 


करम त्यौहार में प्रकृति की पूजा

करम झारखण्ड, बिहार, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख त्यौहार है। मुख्य रूप से यह त्यौहार भादो मास की एकादशी के दिन और कुछेक स्थानों पर उसी के आसपास मनाया जाता है। इस मौके पर लोग प्रकृति की पूजा कर अच्छे फसल की कामना करते हैं करम पूजा नृत्य,सतपुड़ा और विंध्य की पर्वत श्रेणियों के बीच सुदूर गावों में विशेष प्रचलित है। यह दिन इनके लिए प्रकृति की पूजा का है। ऐसे में ये सभी उल्लास से भरे होते हैं। 

 


नुआखाई त्योहार का संबंध अच्छी फसल की कामना से

पश्चिमी ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला तीन दिवसीय नुआखाई त्योहार देश विदेश में विख्यात है। एक परंपरा के रूप में मनाये जाने वाले इस त्‍योहार पर लोग बम्पर फसल और अच्छी बारिश के लिए आभार के रूप में देवताओं की पूजा करते हैं। 

 

 


उत्तर पूर्व में अद्भुत परम्पराएं

खासी मेघालय में रहने वाली एक प्राचीन जनजाति है। खासी जनजाति के लोग पान के पत्ते,सुपारी और संतरे की खेती करते है। यह बांस और बेंत के उत्पाद बनाने में भी कुशल होते है। नोंगखिलम त्यौहार खासी समुदाय द्वारा पांच दिनो के लिए मनाया जाता है। यह त्यौहार अच्छी फसल पर भगवान को धन्यवाद देने के रूप में मनाया जाता है।


 

नई बहू  का कंगन उर्वरा शक्ति का प्रतीक

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के भरेवा,घड़वा,झारा समुदायों में घर की नई बहू को पीतल का एक कंगन दिया जाता हैजिस पर उर्वरा शक्ति के प्रतीक स्वरूप खेत में खड़ी फसल, वृक्ष, कुआँ, बावड़ी और जीवन चक्र से जुड़े अन्य प्रसंगों का जिक्र होता है यह कड़ा हाथ में लेकर बहू बुआई के लिए बीज तैयार करती है


भारत   के विभिन्न इलाकों में   करीब साढ़े छह सौ जनजातियाँ   निवास  करती   है।  जल  , जंगल   और   ज़मीन   को   परंपराओं   में   भगवान   का   दर्जा  देने   वाले   आदिवासी  प्रकृति को धरोहर मानकर उसे सहेजने के लिए कृतसंकल्पित रहे है  और यह इनके लोकाचार का अहम भाग है यह   समुदाय   परंपराओं   को   निभाते   हुए   शादी   से   लेकर   हर   शुभ   कार्यो   में   पेड़ो   को   साक्षी   बनाते   है। दरअसल आदिवासी ही इस   धरती   से   सबसे   पुराने   साथी   है   जिन्होंने   प्रकृति   को   माँ   समान   समझा है और वे आज भी अपनी परम्पराओं का पालन करते हुए  जल ,जंगल  और ज़मीन   की    सुरक्षा के लिए प्रतिबद्द दिखाई पड़ते है

 

लोकतान्त्रिक नेहरु ने जब हिटलर और मुसोलिनी से मिलने से इंकार किया,nehru,musolini,hitlar

 

सुबह सवेरे




अंग्रेजों की कड़ी प्रतिद्वंदिता और गुलामी के दंश को लंबे समय तक झेलने के बाद भी लोकतंत्र के प्रति सम्मान का जो जज्बा भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने दिखाया था उसकी कोई और मिसाल नहीं हो सकतीआजादी के बाद जो मंत्रिमंडल बनी उसमें पंडित नेहरू  स्वयम को प्रधानमंत्री के रुप में भी मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों के बराबर समझते हुए कभी किसी अन्य मंत्री के कामों में दखल नहीं देते थे। एक बार सरदार पटेल ने उन्हें खासतौर पर कहा था कि आप अन्य मंत्रियों के कार्यों में दखल दे सकते है।


लोकतान्त्रिक मूल्यों को लेकर उनके इस आग्रह की प्रशंसा अटलबिहारी वाजपेयी ने भी की थी। अटलबिहारी वाजपेयी संसद में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले इकलौते सदस्य थे लेकिन इसके भी पंडित नेहरु उनका गहरा सम्मान करने थे। एक  बार तो अटलबिहारी वाजपेयी ने पंडित नेहरु पर हमला करते हुए कहा था कि, आपका मिला जुला व्यक्तित्व है। आप में चर्चिल भी हैं और चैंबरलेन भी है। लेकिन पंडित नेहरु इस पर नाराज नहीं हुए बल्कि शाम को किसी बैंक्वेट में जब बे अटलजी से मिले तो उनका उत्साहवर्धन करते हुए बोले कि  आज तो बड़ा जोरदार भाषण दिया आपने।

पंडित नेहरु देश में लोकतंत्र मजबूत रहे,इसका प्रयास निरंतर करते रहे। उन्होंने वैचारिक मतभेद के बाद भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ.आम्बेडकर को अपनी अंतरिम सरकार में मंत्री बनाया था। उनकी बेटी इंदिरा गांधी अपनी पिता की सहयोगी रही लेकिन उन्हें संसद में ले जाने का कोई भी कार्य पंडित नेहरु ने कभी नहीं किया।1964 में नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को राज्यसभा भेजा था। इस तरह वे पहली बार सांसद नेहरू की मौत के बाद बन सकी थी।जबकि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद पंडित नेहरु ने उनके परिवार की ओर विशेष ध्यान दिया। एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल के बेटे और बेटी, दोनों ही एक साथ लोकसभा और फिर राज्यसभा  सांसद रहे थे।

नेहरु स्वतंत्रता के पहले से ही लोकतांत्रिक सिध्दांतों को लेकर इतने सजग थे कि उनकी नीतियों में किसी आज़ाद मुल्क की दृढ नीतियों झलक मिलती थी। वे सोवियत संघ के मॉडल को तो बहुत पसंद करते थे लेकिन उन्होंने साम्यवाद को स्वीकार करने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि वे साम्यवाद को लोकतंत्र के अनुकूल नहीं समझते थे। नेहरु के विचार में नफरत और हिंसा से भरी कोई भी विचारधारा भारत को स्वीकार नहीं हो सकती इसीलिए उन्होंने समाजवाद के मॉडल को अपनाया। साम्यवाद के अपरिवर्तनशील ढांचे को उन्होंने अस्वीकार कर दिया। नेहरु के विचार में जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक पक्ष के प्रति साम्यवाद की घृणा उद्देलित करती है।नेहरु ने भारत की प्रगति के लिए समाजवाद का धीमा लेकिन प्रगतिशील मार्ग चुना। वे जानते थे की भारत जैसे पिछड़े राष्ट्र में सामाजिक संगठन का वास्तविक समाजवादी आधार धीरे धीरे ही आ सकता है।


इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने 1936 में अपने देश में जवाहरलाल नेहरु को आमंत्रित कियागुलाम भारत के उस दौर में भी नेहरु लोकतांत्रिक,मानवीय और वैश्विक सरोकारों को लेकर पूरी दुनिया में पहचाने जाने लगे थे नेहरु ने तत्कालीन समय की महाशक्ति के आमन्त्रण को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया की वह उस देश में जाना बिलकुल नहीं पसंद करेंगे जहां तानाशाही हो और लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया हो मुसोलिनी इटली को अपनी सल्तनत मान कर उसपर निरंकुश शासन करने लगा था,उसने अपने विरोधियों को बुरी तरह कुचलने के लिए कड़े कानून बनाए और अनेक लोगों को मार डाला था। नेहरु को मुसोलिनी की क्रूर नीतियाँ कभी स्वीकार नहीं की।

1938 में नेहरु के साथ एक बार फिर दिलचस्प घटना घटीजर्मनी की नाजी सरकार ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित कियाइस आमन्त्रण पत्र में साफ लिखा गया था की जर्मनी की नाजी सरकार उनके नात्सी मत के खिलाफ विचारों को जानती है फिर भी सरकार चाहती है कि नेहरु उनके देश में आकर हालात को देखे नेहरु ने एक बार तानाशाही शासन के देश जर्मनी के निमंत्रण को पूरी विनम्रता के साथ अस्वीकार कर दियायहीं नहीं नेहरु ने एक बड़े कार्यक्रम में हिटलर और मुसोलिनी की नीतियों का कड़ा विरोध करने से भी गुरेज नहीं किया


नेहरु का सोचना था की कोई भी राष्ट्र कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो वह अपने नागरिकों को साधन नहीं समझ सकता और न ही उस तरीके से व्यवहार कर सकता है वे लोकतंत्र को सर्वोपरी संस्था स्थापित करने  के लिए जीवन भर कृतसंकल्पित रहे जमींदारी उन्मूलन को लेकर न्यायालयीन हस्तक्षेप की आशंका को उन्होंने ख़ारिज कर दिया थानेहरु ने संविधान सभा के सामने कहा था कि” सीमाओं के अंतर्गत कोई  न्यायाधीश और न उच्चतम न्यायालय अपने को एक तीसरा सदन नही बना सकता है कोई भी उच्चतम न्यायालय और कोई भी न्यायपालिका निर्णय में समस्त समाज की आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करने वाली संसदीय सार्वभौम इच्छा से ऊपर नहीं हो सकती नेहरु की दृष्टि में भारतीय संसद ही अंततः संतुलन सत्ता थी

पंडित नेहरु संसद में बैठकर विपक्षी सदस्यों को पूरी गंभीरता से सुना करते थे। एक बार ऐसा भी आया जब बहुमत की सत्ता की शक्ति को नजरअंदाज कर उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों के विरोध के बावजूद 1963 में अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष की ओर से लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना मंज़ूर किया और उसमें भाग भी लिया।


इस साल एक कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने में पंडित नेहरु के योगदान की सराहना करते हुए उनके योगदान को बहुमूल्य बताया था। लोकतंत्र का चौथा और मजबूत स्तम्भ मीडिया को माना जाता है और पंडित नेहरु इसे पारदर्शी रखने के प्रतिबद्ध रहे। वे कहते थे कि मीडिया पर अंकुश लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है।आज़ादी के कुछ सालों बाद जब नेहरु चर्चिल से मिले और चर्चिल ने उनसे पूछा कि इतना सब कुछ सहने के बाद भी आप हमसे घृणा क्यों नहीं करते। जवाब में नेहरु ने कहा कि हम इसलिए आपसे घृणा नहीं करते  क्योंकि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है और मैं  एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के प्रधानमंत्री के रूप में आपके सामने हूँ।

 

brahmadeep alune

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