धर्म या गांधी ...? पॉलिटिक्स

 

 पॉलिटिक्स                             

                       


                                                               

दुनिया को धर्म की ज्यादा जरूरत है या गांधी की। मानव अस्तित्व को बचाएं रखने के लिए यह विचार किए जाने की जरूरत बार बार पड़ रही है। धर्म का अर्थ सदाचार,शांति,सहिष्णुता और संयम है। धर्म को देखने की दृष्टि सबकी अलग अलग हो सकती है लेकिन जब इस दृष्टि में श्रेष्ठता के भाव आ जाते है तो वह उसके  विध्वंसक होने की संभावनाएं बढ़ जाती है। गांधी के सहयोगी विनोबा भावे ने कहा था कि गांधी के विचारों में सदैव ऐसा मनुष्य और समाज रहा जहां वह करुणा मूलक,साम्य पर आश्रित स्वतंत्र लोक शक्ति के रूप में वह आगे बढ़े।


भारत  में कितने गांधीवादी है इसे लेकर बहस किए जाने की कोई जरूरत नजर नहीं आती क्योंकि गांधी की अस्मिता को चुनौती राज दर्शन का मनपसन्द अध्याय बना दिया गया है लेकिन बाकि विश्व भारत को गांधी के नजरिये से बार बार देखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में जब अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से व्हाइट हाउस में मुलाकात की तो दोनों ने महात्मा गांधी को  खूब याद किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने महात्मा गांधी को लेकर कहा कि विश्व को आज उनके अहिंसा, सम्मान और सहिष्णुता के संदेश की जितनी जरूरत है,उतनी शायद पहले नहीं थी। धार्मिक असहिष्णुता से न  तो अमेरिका बचा है और नही भारत। जबकि इन दोनों देशों को दुनिया में लोकतंत्र के लिहाज से बेहतर माना जाता है।


भारत का धर्मभीरु और कथित परम्परावादी विद्वतजन गांधी से उद्देलित होता रहता  है। यहाँ के सामान्य नागरिक के लिए गांधी एक ऐसा रहस्य है जिसे वह समझने की कोशिश भर करता रहता  है। युवा पीढ़ी के लिए गांधी अबूझ सी पहेली है,और वह अप्रत्यक्ष स्रोतों से हासिल आधे अधूरे ज्ञान से गांधी का मूल्यांकन करते  रहते  है। संस्कृतिवादी अपने सांचे में ढालकर गांधी का अक्स कई मोर्चो पर बदलते नजर आते है। दक्षिणपंथियों के लिए गांधी एक घाव की तरह है,जिसे याद कर वे बार बार कराहते रहते है। वामपंथियों अक्सर स्थापित वैधानिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होते है ऐसे में गांधी का अस्तित्व ही उन्हें स्वीकार नहीं। यदि बात सियासत की की जाए तो वह रामघाट की और बार बार देखती है और समयानुसार गांधी को परखती है। कभी वे  स्वच्छता के प्रतीक बना दिए जाते है तो कभी साम्प्रदायिकता की झाड़ू से उनके सार्वभौमिकतावाद को मिटा देने की कोशिश की जाती है। वे कभी वसुदैव कुटुम्बकम के प्रतीक होते है तो कभी कभी अम्बेडकर के साथ उनकी तस्वीर लगाने से ख़ामोशी से परहेज कर लिया जाता है। पाकिस्तान में वे हिन्दुओं के प्रतिनिधि के तौर पर इस प्रकार गढ़ दिए गए जैसे जिन्ना कथित पृथकतावादी मुसलमानों की उन्मादी भीड़ के साथ अलग देश बनाने में कामयाब हो गए थे।


महात्मा गांधी से एक प्रार्थना सभा में यह पूछा गया कि क्या इस्लाम और ईसाई प्रगतिशील धर्म है जबकि हिन्दू धर्म स्थिर या प्रतिगामी। इस पर गांधी ने कहा कि,”नहीं मुझे किसी धर्म में स्पष्ट प्रगति देखने को नहीं मिली,अगर संसार के धर्म प्रगतिशील होते तो आज विश्व जो लड़खड़ा रहा है वह नहीं होता।“ दरअसल धर्म को लेकर क्या दृष्टि होना चाहिए और इसे दिशा कौन दे,इसे लेकर आधुनिक समाज अंतर्द्वंद से घिरा नजर आता है और इस विरोधाभास में राजनीतिक हित मानवीय संकट को व्यापक स्तर तक बढ़ा रहे है। धर्म यदि व्यक्तिगत आस्था तक सीमित है और इसकी सुरक्षा को लेकर व्यक्तिगत चिंताएं व्यक्ति महसूस करता है तो इससे धार्मिक विद्वेष बढ्ने की आशंका बनी रहती है। दुनिया के सामने व्यक्तिगत आस्था से उठा यह मानवीय संकट यूरोप के प्रगतिशील समाज से लेकर भारत,पाकिस्तान,श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे पिछड़े देशों तक दिखाई भी देता है।


द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह अपेक्षा की गई थी की आधुनिक दुनिया मध्यकालीन धार्मिक द्वंद को पीछे छोड़कर समूची मानव जाति के विकास पर ध्यान देगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और दुनिया भर में आस्था को अंधविश्वास से तथा धार्मिक हितों को व्यक्तिगत सम्मान से जोड़ने की राजनीतिक विचारधाराएँ बढ़ गई,इसके साथ ही सत्ता प्राप्त करने का इसे साधन भी बना लिया गया। महात्मा गांधी इसे लेकर आशंकित तो थे ही।  

गांधी ने अंग्रेजी शासन में हिन्दू मुसलमानों में एकता की कोशिशों से पूरी दुनिया में सार्वभौमिकता का सन्देश दिया। उन कोशिशों के अवशेष अब राजनीति के कहकरे में कहीं नजर नहीं आते।  कुछ मिसालें अवश्य है। भारत के राष्ट्रवादी राष्ट्रपति कहे जाने वाले डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने कार्यकाल में संसद में अपने भाषण के दौरान पंथनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल कर यह संदेश देने कि कोशिश कि थी  की धर्म आस्था का विषय है जबकि हम सबकी पहचान भारतीय ही हो सकती है। डॉ. कलाम ने अपने जीवनकाल में कोई भी एक ऐसी बात नहीं की या आचरण नहीं किया जिससे यह लगे कि किसी धर्म विशेष के प्रति उनका लगाव या झुकाव था। गांधी में  सर्वधर्म समभाव से सबसे ज्यादा जिन्ना डरते थे। जिन्ना के कुत्सित इरादों को गाँधी बखूबी जानते थे  और वे किसी भी कीमत पर देश का विभाजन रोकना चाहते थे।  महात्मा गांधी ने  माउन्टबेटन के सामने इस शर्त पर जिन्ना को देश का प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा था कि जिन्ना की मंत्री परिषद् जो भी कदम उठाए वे कुल मिलाकर भारतीय जनता के हित में हो। वास्तव में देश को विभाजन से बचाने का ये अनूठा तरीका गांधी ने अपनाया था और गांधी जिन्ना की हसरतों से पूरी तरह वाकिफ भी थे,हालांकि गांधी के इन विचारों से कभी जिन्ना को अवगत नहीं कराया गया।


अब गांधी नहीं है लेकिन धर्म है। यदि धर्म हिंसा का कारण बने तो यह विचार किया जाना चाहिए की हमें किसकी जरूरत है,धर्म की या गांधी की।  गांधी धार्मिक हिसा को मानवता के लिए कलंक मानते थे। वे अब भी याद दिलाते है कि हिंसा हिंदुस्तान के दुखों का इलाज नहीं है और उसकी संस्कृति को देखते हुए उसे आत्मरक्षा के लिए कोई अलग और ऊँचे प्रकार का अस्त्र काम में लाना चाहिए।


हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने धर्म को लेकर अपना मत रखते हुए कहा कि,कोई भी मुल्क तभी एक राष्ट्र माना जाएगा जब उसमे दूसरे धर्मों के समावेश करने का गुण आना चाहिए। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक दूसरे के धर्मों में दखल नहीं देते,अगर देते है तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है।

 

5 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

ये बात बिल्कुल सही है कि आज धर्म से ज्यादा गाँधी के विचारों पर मनन करने की आवश्यकता है । भयत सुंदर विश्लेषण करने हेतु आदरणीय अलुने सर को शुभकामनाएं।

Mahima Bajpai ने कहा…

ये बात बिल्कुल सही है कि आज धर्म से ज्यादा गाँधी के विचारों पर मनन करने की आवश्यकता है । भयत सुंदर विश्लेषण करने हेतु आदरणीय अलुने सर को शुभकामनाएं।

Adity Narayan Upadhyay ने कहा…

बहुत सुंदर
साधुवाद!

Adity Narayan Upadhyay ने कहा…

बहुत सुंदर
साधुवाद!

Adity Narayan Upadhyay ने कहा…

बहुत सुंदर
साधुवाद!

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