जब भारतीय सैनिकों ने चीन की सीमा में घुसकर उनके 300 सैनिकों को मार डाला indira gandhi china

 

सांध्य प्रकाश

इंदिरा गांधी का चीन को रणनीतिक जवाब

                    जब भारतीय सैनिकों ने चीन की सीमा में घुसकर उनके 300 सैनिकों को मार डाला


                                                                                                                

 

भारत और चीन के बीच की सीमा विवाद की गुत्थी सुलझती ही नहीं। आज़ादी के बाद जवाहरलाल नेहरु से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन से निपटने की नीति संतुलन पर आधारित रही है लेकिन उस पर नियन्त्रण भारत का कभी नजर नहीं आया। हालांकि इंदिरा गांधी के शासनकाल में ऐसा बिल्कुल नहीं था। 1962   में चीन से करारी पराजय,पाकिस्तान और चीन की मजबूत जुगलबंदी और अमेरिका दबाव के बाद भी इंदिरा गांधी ने चीन को कई रणनीतिक मोर्चों पर करारी शिकस्त दी थी।

 


1962 में चीन से पराजय का कडवा घूंट भारतीय सेना को बहुत परेशान करता रहा था। 1965 में पाकिस्तान पर निर्णायक विजय के बाद सेना की नजर चीनियों पर थी और यह मौका उन्हें जल्द मिल गया। चीन  में स्थित भारतीय दूतावास को चीन ने घेर कर भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसी अंदाज में जवाब देते हुए नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास को घेर कर राजनयिकों को नजरबंद कर दिया। भारत ने दिल्ली में चीन के दूतावास में प्रथम सचिव के पद पर काम कर रहे चीनी राजनयिक चेन लू चीह पर जासूसी करने और अवांछित कार्यों में लिप्त रहने का आरोप  लगाकर उनसे उनके राजनयिक अधिकारों को छीन लिया। जून 1967 में हुए इस समूचे घटनाक्रम पर चीन को भारत के इस आक्रामक जवाब का असर सेना के मनोबल पर पड़ा और उसके तीन महीने बाद भारतीय सैनिकों ने जो साहस और शौर्य दिखाया उसके नतीजे भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।


दरअसल भारत चीन सीमा पर नाथु ला  में दोनों देशों के सैनिक अक्सर आमने सामने होते थे और उनमे धक्का मुक्की भी हो जाया करती थी। 6 सितंबर 1967 को इस प्रकार दोनों देशों के सैनिक आमने सामने हुए और भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को करारा जबाव देते हुए उनके वहां तैनात सैन्य अधिकारी को ऐसा धक्का दिया की वह जमीन पर गिर गया और उसका चश्मा  टूट गया।

11 सितंबर 1967 को चीनी सैनिकों ने अचानक खुले में खड़े सैनिकों पर गोलियों से हमला कर दिया और इससे भारत के कुछ सैनिक हताहत हो गए। भारत के सैन्य अधिकारी जनरल सगत सिंह चीनियों की इस हिमाकत से इतने नाराज हुए कि उन्होंने अपनी पूरी बटालियन को चीनियों पर  तोप से हमला करने का आदेश दे दिया। देखते ही देखते भारतीय सैनिकों को करीब 300 चीनी सैनिकों को धराशाई कर दिया। यह युद्द करीब तीन दिनों तक चला। भारत के इसमें 65 सैनिक शहीद हुए लेकिन भारतीय सैनिकों ने चीन की एक पूरी बटालियन को ही खत्म कर दिया। 'लीडरशिप इन द इंडियन आर्मी' के लेखक मेजर जनरल वी.के.सिंह बताते हैं,इत्तेफ़ाक से मैं उन दिनों सिक्किम में ही तैनात था। जब युद्ध विराम हुआ तो चीनियों ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने चीनी क्षेत्र पर हमला किया है। एक तरह से उनकी बात सही भी थी,क्योंकि सारे भारतीय जवानों के शव चीनी इलाके में पाए गए थे,उन्होंने चीनी इलाके में घुसकर ही हमला किया था।


इस हमले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उस समय तोपख़ाने की फ़ायरिंग का हुक्म देने का अधिकार सिर्फ़ प्रधानमंत्री के पास था। यहाँ तक कि सेनाध्यक्ष को भी ये फ़ैसला लेने का अधिकार नहीं था। लेकिन सीमा पर चीनी दबाव बढ़ने लगा तो जनरल सगत सिंह ने तोपों से फ़ायर खुलवा दिया। इससे चीन को बहुत नुकसान हुआ और उनके 300 से अधिक सैनिक मारे गए। इस झड़प ने भारतीय सैनिकों को बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक फ़ायदा पहुंचाया। भारत के कड़े प्रतिरोध का इतना असर हुआ कि चीन ने भारत को यहाँ तक धमकी दे दी कि वो उसके ख़िलाफ़ अपनी वायु सेना का इस्तेमाल करेगा। लेकिन भारत पर इस धमकी का कोई असर नहीं हुआ। इतना ही नहीं 15 दिनों बाद 1 अक्तूबर 1967 को सिक्किम में ही एक और जगह चो ला में भारत और चीन के सैनिकों के बीच एक और भिड़ंत हुई। इसमें भी भारतीय सैनिकों ने चीन का ज़बरदस्त मुकाबला किया और उनके सैनिकों को तीन किलोमीटर अंदर तक ढकेल दिया। 1962 की लड़ाई में चीन के 740 सैनिक मारे गए थे,ये लड़ाई करीब एक महीने चली थी और इसका क्षेत्र लद्दाख़ से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैला हुआ था। वहीं 1967 में मात्र तीन दिनों में चीनियों को 300 सैनिकों से हाथ धोना पड़ा। ये बहुत बड़ी संख्या थी,इस लड़ाई के बाद काफ़ी हद तक 1962 का ख़ौफ़ निकल गया।




1962 के युद्द के बाद भारत में राजनीतिक हालात बहुत बदल रहे थे। यह वह दौर था जब चीन ने भारत की घेराबंदी करके पिंडी-जकार्ता-पीकिंग धुरी बनाई। भारत में इंदिरा गांधी युग शुरू हुआ था और उनकी सत्ता पर एकाधिपत्य की कोशिशें परवान चढ़ रही थी वहीं माओं के बाद चीन का क्या होगा,इस पर इस साम्यवादी देश में मंथन चल रहा था। भारत चीन सीमा पर उस समय भारी तनाव था,वहीं पाकिस्तान को लेकर भी भारत को कड़ी चुनौती से जूझना पड़ रहा था। 1968 तक भारतीय राजनीति गैर कांग्रेस वाद की ओर मुड गई थी। भारत के धुर विरोधी अमेरिका के लिए यह मुफीद स्थिति थी कि राजनीतिक रूप से कमजोर इंदिरा पाकिस्तान के विरुद्द शायद ही कोई कदम उठा सकती है। वहीं पाकिस्तान अमेरिका के साथ चीन को भी अपना मजबूत हमराह बना चूका था। मार्च 1963 में पाकिस्तान ने कश्मीर का एक इलाका चीन को दे दिया। 1963 में की गई संधि के बाद पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा रही शख्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी। इसकी वजह से उत्तरी सीमा रेखाओं का एकदम नया स्वरूप वजूद में आया था। 1963 में हुई इस संधि ने काराकोरम सड़क बनाने की राह प्रशस्त की थी, जिसे चीन और पाकिस्तान के इंजीनियरों ने मिलकर बनाया है। यह राजमार्ग चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीरी क्षेत्र से जोड़ता है। चीन के लिए उक्त संधि भारत से निपटने की प्रक्रिया में पाकिस्तान के साथ सैन्य गठजोड़ बनाने का आधार बनी थी।


भारत की सीमा पर आक्रामक कार्रवाई से चीनी बौखला गए। इस दौरान उन्हें यह डर भी सताने लगा कि भारत उस पर बड़ा हमला कर सकता है और अमेरिका भारत की सैन्य मदद कर सकता है। पाकिस्तान ने नई व्यूह रचना के तहत् चीन और उसके  धूर विरोधी अमेरिका को एक साथ लाने की योजना पर काम करना शुरू किया जिससे भारत पर दबाव बढ़ाया जा सके। नवम्बर 1970 में चीन की अपनी राजकीय यात्रा के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान ने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन का एक व्यक्तिगत पत्र  चेयरमेन  माओ को दिया था। बाद में 21 फरवरी 1972 को राष्ट्रपति निक्सन ने चीन की यात्रा की और इसे शांति यात्रा की संज्ञा दी गई। 1971 में जब पूर्व पाकिस्तान में तनाव चरम पर था उस समय पाकिस्तान ने यह घोषणा कर दी कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई युद्द होगा तो चीन पाकिस्तान के पक्ष में  युद्द करेगा। यह भी दिलचस्प है कि चीन ने इसका कोई खंडन भी नहीं किया। 3 दिसम्बर 1971 को जब पाकिस्तान की वायुसेना ने भारत पर हमला किया तो वहीं रात पाकिस्तान के इतिहास की सबसे काली बन गयी। इसका जवाब उन्हें आधी  रात को भरतीय वायुसेना ने दिया और अंततः 14 दिनों में पाकिस्तान की सेना को नतमस्तक करके दुश्मन देश को ऐसा घाव दिया जिससे वह सदैव कराहता रहेगा। भारत की सहयता से पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और एक नया देश बंगलादेश अस्तित्व में आया।


इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक कौशल से चीन, पाकिस्तान और अमेरिका पर नकेल कसी बल्कि रूस को भी हद में रहने को मजबूर कर दिया। अगस्त 1971 में हुए  भारत-रूस शांति समझौते के लिए सोवियत के विदेश मंत्री आंद्रेई ग्रॉमिको भारत से लौटते वक्त पाकिस्तान होकर जाना चाहते थे। लेकिन इंदिरा गांधी को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने सोवियत को सख्त संदेश दिया कि यदि भारत से लौटते समय पाकिस्तान जाना है तो फिर आने की ही जरूरत नहीं है। उनके इस संदेश का असर था कि आंद्रेई भारत और समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए,लेकिन वह पाकिस्तान गए बिना ही सीधे मॉस्को निकल गए।


बाद में भारत 18 मई 1974 को प्रथम परमाणु विस्फोट कर  वैश्विक सामरिक राजनीति का एक बड़ा ख़िलाड़ी बन गया। भारत की इस महान नेता ने अमेरिका,चीन और पाकिस्तान को एक और घाव दिया। पूर्वी हिमालय में एक छोटा सा राज्य सिक्किम है। इस पर नामग्याल वंश का शासन हुआ करता था।इसके राजा चोग्याल की पत्नी होप अमेरिकी थी। चोग्याल की चीन,नेपाल,पाकिस्तान और अमेरिका से बड़ी नजदीकी थी।1962 के भारत चीन युद्द से भारत को बहुत सीख मिली थीभारत के सामरिक विशेषज्ञों ने महसूस किया कि चीन की चुंबी घाटी के पास भारत की सिर्फ़ 21 मील की गर्दन है जिसे 'सिलीगुड़ी नेक' कहते हैंचुंबी घाटी के साथ ही लगा है सिक्किमभारत को लगता था कि चीन चाहें तो एक झटके में उस गर्दन को अलग कर उत्तरी भारत में घुस सकते हैंइस प्रकार सिक्किम को भारत में शामिल किए जाने की सोच 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद शुरू हुईइंदिरा गांधी ने इस योजना को बहुत ही गोपनीयता और साहस से अंजाम दिया


भारत की सेना ने रातो रात सिक्किम के महाराजा का महल घेर कर उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया दुनिया को दिखाने के लिए इंदिरा गाँधी ने वहां जनमत संग्रह करवा कर और चोग्याल की प्रासंगिकता समाप्त कर भारत में विलय को मोहर लगवा दी। इसके बाद 1980 के दशक में भारत ने सियाचिन ग्लेशियर को अपने नियंत्रण में करने से पाकिस्तान को कड़ा झटका दिया।


वास्तव में 1967 में चीनियों को उनकी सीमा में घुसकर मार गिराने का जो कारनामा भारतीय सैनिकों ने किया था उसके बाद चीन इंदिरा गांधी के रहते भारत की ओर देखने का कभी साहस ही नहीं जुटा पाया था।

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दबंग दुनिया

                         

                                                                            


क्रिकेट के विश्वकप में पाकिस्तान की भारत पर विजय के बाद पाकिस्तान के गृहमंत्री शेख़ रशीद ने इसे इस्लाम की विजय के तौर पर निरुपित किया है। इसके पहले 2007 में टी-20 विश्व कप फ़ाइनल में भारत से हारने के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन कप्तान शोएब मलिक ने मुस्लिम दुनिया से माफ़ी मांगी थी।


दरअसल पाकिस्तान असहिष्णुता,अनिश्चितताओं और असुरक्षा से ग्रस्त देश है जो धर्म को हथियार की तरह उपयोग करता है,जिससे उन्माद पैदा किया जा सके। यह देखने में आया है कि मोहाजिर अपनी पहचान के संकट से अक्सर जूझते है और उन्हें अपनी निष्ठा साबित करने के लिए बार बार कोशिशें कारण पड़ती है। इस्लामिक दुनिया में पाकिस्तान की स्थिति कुछ ऐसी ही है जो किसी भी कीमत पर अपनी धार्मिक पहचान को आगे रखकर विशुद्ध इस्लामिक होने का प्रमाण पेश करता रहा है। यह विडम्बना ही है कि अरब देशों में भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान इस्लामिक शुद्धता के आधार पर अक्सर गैर बराबरी से जूझते है। इन देशों में अरब शेखों का अमानवीय व्यवहार कई बार विचलित कर देता है।   पाकिस्तान के जन्मदाता जिन्ना को इसका एहसास था। भारत के विभाजन के कुछ समय पहले जिन्ना ने पैन इस्लामिक सम्मेलन में शिरकत की थी। जहाँ पर मिस्र और फिलीस्तीन के नेताओं से बातचीत में उन्होंने कहा था कि,मध्य पूर्व के लिए हिन्दू साम्राज्य बड़ा खतरा है और पाकिस्तान बनने के बाद वह नस्ल या रंग का ख्याल किए बिना सभी इस्लामिक राष्ट्रों का सहयोग करेगा। जिन्ना ने मिस्र के साथ अटल धार्मिक और आध्यत्मिक रिश्तों का हवाला दिया जबकि मध्य पूर्व के लिए हिन्दू साम्राज्य को बड़ा खतरा बताया। जाहिर है जिन्ना भारत को हिन्दू देश कहकर सुदूरवर्ती इस्लामिक देशों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे। यही नहीं वे अपनी सांस्कृतिक  जड़ों को भी नकार रहे थे।


जिन्ना ने पाकिस्तान को अरब देशों की सभ्यता से जोड़ने का जो प्रयास किया था,वहां के हुक्मरानों ने  इस नीति पर चलकर पाकिस्तान की वास्तविक पहचान को धुल धूसरित कर दिया। पाकिस्तान के कारनामों को समूचे इस्लामिक जगत से जोड़ने की धुन ऐसी की पाकिस्तान ने अपने परमाणु बम को इस्लामिक परमाणु बम के तौर पर प्रचारित किया। पाकिस्तान की हिमाकतों के इसके नतीजे इतने घातक हुआ कि इस देश का आतंकवाद ही इस्लामिक आतंकवाद बन गया।


वास्तव में सियासत का उन्माद सहिष्णु समाज को कट्टरता के कलेवर में ढालकर कभी भी हाहाकार मचा सकता है। जिन्ना इस खेल के माहिर खिलाड़ी रहे और उन्होंने अपने अल्पकालीन सियासी हितों के लिए पाकिस्तान को गैर इस्लामिक लोगों के लिए कब्रिस्तान बना दिया। पाकिस्तान के इस्लामीकरण के जूनून में यह देश अल्पसंख्यकों के लिए नर्क बन गया। किसी देश के  मूल निवासियों पर अत्याचार का ऐसा अंत:हीन सिलसिला और कहीं इतिहास में नहीं है की जब दुनिया की आबादी में  50 गुना की वृद्धि हो वहीं हिन्दुओं की आबादी 75 सालों में  घटकर 1  प्रतिशत तक आ जाये। इससे अलग भारत की तस्वीर नजर आती है। भारत में मुसलमानों की आबादी पाकिस्तान से कहीं ज्यादा है और वह अब बढ़कर 21 करोड़ के करीब पहुंच गई है।  यहां मुस्लिमों को ठीक वैसे ही अधिकार प्राप्त है जैसे अन्य किसी आम भारतीय नागरिक को। वे देश के सर्वोच्च पदों से लेकर देश के नीति निर्माता बने हुए है।


पाकिस्तान बनने के बाद उसे अपनी अलग पहचान स्थापित करने की जल्दबाजी थी। पाकिस्तान हुकुमरानों ने इसके लिए आसान और आत्मघाती रास्ता चुना, उनके लिए पाकिस्तानी वह है जो हिन्दुस्तानी नहीं है। हिन्दुस्तानी पहचान को मिटाने की कोशिश करने का मतलब था,अपनी सभ्यता,संस्कृति,जीवन जीने के तरीकों,अपने इतिहास और अपनी बेशकीमती परम्पराओं को मिटाना। जिन्ना तो बहुत जल्दी अलविदा कह गए लेकिन उनकी अलग पहचान की थ्योरी ने वहां की फौज ने इस प्रकार उभारा की पाकिस्तान एक धर्म का कट्टपंथी मुल्क बन कर रह गया और अब वह अपने अस्तित्व  बचाने को बुरी तरह जूझ रहा है।


अब पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथी है,आतंकवाद है,आर्थिक कंगाली है,लोकतांत्रिक नाकामी है और सैन्य तानाशाही है। तमाम नाकामियों और बर्बादी के बाद भी वहां के हुक्मरानों की भारत से अपनी अलग पहचान बनाने की आत्मघाती नीतियां बदस्तूर जारी है।


यह भी बेहद दिलचस्प है की जिन्ना का कोई भी नजदीकी वंशज अब पाकिस्तान में नहीं है। बदहाल पाकिस्तान में जिन्ना की कब्र की ख़ामोशी सब कुछ बयाँ करती है। जिन्ना काश यह समझ गए होते की अपनी हिन्दुस्तानी पहचान को नकारने का मतलब अपनी हस्ती मिटा देना है। अफ़सोस वहां के नेता पाकिस्तान की बदहाली से सबक न लेकर उसे अब भी इस्लाम का मसीहा बनाना चाहते है। जबकि इस्लामिक कांफ्रेंस में ही पाकिस्तान को इस्लामिक देशों का समर्थन मुश्किल से ही हासिल हो पाता है। इन सबके बीच पाकिस्तान जिहाद की फैक्र्टी बन गया है जिसका विरोध तालिबान के कब्ज़े के बाद भी अफगानिस्तान में खूब हो रहा है। शेख़ रशीद ने यहाँ तक कह दिया कि दुनिया के मुसलमान समेत हिन्दुस्तान के मुसलमानों के जज़्बात भी पाकिस्तान के साथ हैं। उनका यह बयाँ अन्य देशों में रहने वाले मुसलमानों के लिए कितना घातक हो सकता है,इससे वे बेपरवाह नजर आते है।


पंडित जवाहरलाल नेहरु ने जिन्ना की धर्म पर आधारित  नये राष्ट्र की परिकल्पना पर कहा था कि आधुनिक युग में कोई राष्ट्र धर्म के आधार पर कैसे बन सकता है,यह विचार ही मध्ययुगीन है। बहरहाल पाकिस्तान के मध्ययुगीन विचार बदस्तूर जारी है और वह खेल की पवित्र प्रतिद्वंदिता को धर्मयुद्द से जोड़कर सभ्यताओं के टकराव की कोशिशों को बढ़ावा दे रहा है।

 

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राष्ट्रीय सहारा


भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की कहानी नोआखाली के ज़िक्र के बिना अधूरी मानी जाती है तकरीबन पचहत्तर साल पहले 1946 में लक्ष्मी पूजन के दिन यहां भीषण साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए थे उस समय जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे से सबसे ज्यादा प्रभावित इस क्षेत्र में हजारों हिन्दुओं का कत्लेआम कर दिया गया था। सात दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद दुनिया में बहुत कुछ बदला है लेकिन मौजूदा बांग्लादेश के चटगांव डिवीज़न के नोआखाली ज़िले में स्थितियां जस की तस नजर आती हैइस साल दुर्गा पूजा पर नोआखाली में एक बार फिर हिन्दुओं को बड़े पैमाने निशाना बनाया गया 1946 में नोआखाली मुस्लिम बहुल था,लेकिन ज़मींदारों में हिंदुओं की संख्या अधिक थी उस समय यह माना गया था कि नोआखाली में एक सुनियोजित दंगा था,जिसका लक्ष्य  हिंदुओं को भगाकर उनकी संपत्तियों पर क़ब्ज़ा करना था इस समय भी हालात मिले जुले और समान नजर आते है


दुर्गा पूजा पर हिन्दुओं और उनके धर्म स्थलों पर हमलें इतने सुनियोजित  थे कि पुलिस प्रशासन और सरकार के नुमाइन्दें प्रभावित हिन्दुओं को राहत देने में नाकामयाब रहेयहां तक की अल्पसंख्यक हिन्दुओं का यह कहना है कि प्रशासन से सुरक्षा के लिए मदद की गुहार करने के बाद भी उसे नजरअंदाज कर दिया गया1946 में महात्मा गांधी दिल्ली से पंद्रह सौ किलोमीटर दूर सांप्रदायिकता की आग में जल रहे पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में अमन बहाली की कोशिशों में जुटे थे और उन्होंने नोआखाली में लम्बा समय बिताया था,इस दौरान  उनके साथ जेबी कृपलानी,सुचेता कृपलानी,राममनोहर लोहिया और सरोजनी नायडू जैसे नेता था जिनकी अमन बहाली की कोशिशे कामयाब रही थी लेकिन इस समय मौजूदा अवामी लीग की सरकार के नुमाइन्दें ऐसी कोई कोशिश करते नहीं दिख रहे है और इसी का परिणाम है कि नोआखाली समेत जेसोर,देबीगंज,राजशाही,मोईदनारहाट,शांतिपुर,प्रोधनपारा,आलमनगर,खुलना,राजशाही,रंगपुर और चटगांव जैसे अहम इलाकों से हिंदू पलायन करने को मजबूर हो गए है यह पलायन का तात्कालिक कारण जरुर है लेकिन  पीछे बांग्लादेश में पनपने वाला वह कट्टरतावाद है जिसके परिणामस्वरूप अगले कुछ सालों में इस देश के हिन्दू विहीन होने का दावा किया गया हैढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ.अबुल बरकत का एक शोध 2016 में सामने आया था जिसके अनुसार यह दावा किया गया है कि  करीब तीन दशक में बांग्लादेश से हिंदुओं का नामोनिशान मिट जाएगा। इस शोध के मुताबिक हर दिन अल्पसंख्यक समुदाय के औसतन 632 लोग बांग्लादेश छोड़कर जा रहे हैंदेश छोड़ने की यह दर बीते 49 सालों से चल रहा है और यदि यही दर आगे भी जारी रही तो अगले 30 सालों में देश से करीब-करीब सभी हिंदू चले जाएंगे


यह भी बेहद दिलचस्प है कि बंगलादेश के मुक्ति संग्राम में हिन्दुओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और इसी के कारण 1971 में पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले और मौजूदा बांग्लादेश को पाकिस्तान के अत्याचारों से मुक्ति मिली थीउस समय यह माना गया था कि बांग्लादेश भारत की तरह ही समावेशी विचारों वाला लोकतांत्रिक समाजवादी धर्मनिरपेक्ष गणराज्य होगा लेकिन बांग्लादेश के राष्ट्रपिता मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद स्थितियां तेजी से बदल गईबाद के शासकों जियाउर रहमान और जनरल एच.एम. इरशाद के सैन्य शासनकाल में देश का इस्लामीकरण तेजी से हुआ। खालिदा जिया जैसी नेताओं ने जमात ए इस्लामी जैसे संगठनों को मजबूती दी और इसी कारण बांग्लादेशी समाज में कट्टरता को बढ़ावा मिलाइसके सबसे ज्यादा घातक नतीजे यहां रहने वाले हिन्दुओं को भोगने को मजबूर होना पड़ा है


पिछलें कुछ वर्षों से बांग्लादेश में अवामी लीग का शासन है और प्रधानमंत्री शेख हसीना को हिन्दू अल्पसंख्यकों के लिए उदार माना जाता हैइसके बाद भी देश में कोई ऐसे निर्णायक बदलाव देखने में नहीं आये है जिनके दीर्घकालीन प्रभाव पड़ सके,खासकर सम्पत्ति नियमों को लेकर गौरतलब है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से हिन्दुओं के पलायन का प्रमुख कारण सम्पत्ति रही है जिस पर कब्जा करने के लिए मुस्लिमों द्वारा अक्सर और सुनियोजित रूप से उन्हें निशाना बनाया जाता है1965 में तत्कालीन पाकिस्तान सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम बनाया था,जिसे अब वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट के नाम से जाना जाता है भारत के साथ जंग में हुई हार के बाद अमल में लाए गए इस क़ानून के तहत 1947 में पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान से भारत गए लोगों की अचल संपत्तियों को शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया गया था बांग्लादेश में ‘शत्रु संपत्ति अधिनियम’ की वजह से लाखों हिंदुओं को अपनी जमीनें गंवानी पड़ी थी प्रो.अबुल बरकत के अनुसार,वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट की वजह से बांग्लादेश में 1965 से 2006 के दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं के स्वामित्व वाली 26 लाख एकड़ भूमि दूसरों के कब्जे में चली गई2001 मे अवामी लीग की सरकार ने  ‘वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट’ में बदलाव कर इसका नाम ‘वेस्टेड प्रॉपर्टी रिटर्न एक्ट’ कर दियाइस फैसले का मकसद बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यकों को उनकी अचल संपत्तियों का लाभ दिलाना था लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अदालत के निर्णय के बाद भी हिंदुओं का सम्पत्ति को शांतिपूर्ण हस्तान्तरण मुमकिन नहीं होता


इस समय ईशनिंदा की अफवाह फैलाकर अल्पसंख्यक हिन्दुओं को बांग्लादेश से भागने को मजबूर करने की सुनियोजित साजिश को बड़े पैमाने पर अंजाम दिया जा रहा है और इसमें सबसे बड़ा मददगार बांग्लादेश का प्रतिबंधित राजनीतिक संगठन जमात-ए-इस्लामी हैयह दल बांग्लादेश में इस्लामी शासन  स्थापित करना चाहता है,इसे पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिमायती माना जाता है यहां तक की 1971 में जब बांग्लादेशी जब पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों का सामना कर रहे थे तब भी यह दल पाकिस्तान का समर्थन ले रहा था. हाल ही में तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्ज़े का भी इस संगठन ने समर्थन किया था

इस साल मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बांग्लादेश की यात्रा पर गए थे तब भी उनकी यात्रा का विरोध बड़े पैमाने पर हुआ था और इसमें जमात-ए-इस्लामी की भूमिका खास मानी जाती है। देश में प्रतिबन्ध लगने के बाद यह अन्य कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करने में जुटा है और इस्लामीकरण को बढ़ावा दे रहा है।  2010 में जमात-ए-इस्लामी समर्थित संगठन  हिफाज़त-ए-इस्लाम ने बांग्लादेश में महिलाओं की शिक्षा का विरोध बड़े पैमाने पर किया था


इस समय बांग्लादेश में तकरीबन पौने दो करोड़ हिन्दू रह रहे है और इन्हें देश के सम्पूर्ण इस्लामीकरण में कट्टरपंथियों द्वारा बड़ी बाधा समझा जा रहा है अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत होने से इस्लामिक कट्टरतावाद को बढ़ावा मिला है और कई देशों में इसका प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है, बांग्लादेश का हालिया घटनाक्रम इसी का उदहारण है जहां कानून व्यवस्था की स्थिति को ध्वस्त करते हुए कट्टरपंथी लगातार हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है कुख्यात इस्लामिक आतंकी संगठन आईएसआईएस के द्वारा यह विश्वास किया जाता है कि दक्षिण एशिया में उसका प्रभाव मजबूत करने में दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला देश बांग्लादेश उसका खास मददगार हो सकता है 2015 में शियाओं के जुलूस और विदेशीं नागरिकों पर ढाका में जो हमले हुए थे उसमें इस्लामिक स्टेट का हाथ सामने आने की बात सामने आई थी   बहरहाल बांग्लादेश में हिन्दुओं का उत्पीड़न समूचे दक्षिण एशिया के लिए नए खतरे का संकेत है इसे हर हाल में रोका जाना नहीं तो सांस्कृतिक टकराव बढ़ सकता है     

 

 

हिन्दुओं पर हमले और चुनौतियां,bnagladesh hindu janstta

 

   जनसत्ता                 

                


परिवर्तन और परम्परा का निर्णायक संघर्ष अब राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख चुनौती बन गया हैइससे सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में दक्षिण एशिया का बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक समाज है जो सदियों से एक दूसरे के साथ समन्वय स्थापित कर आगे बढ़ता रहा है लेकिन कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव से अब इस पर भी संकट गहराने लगा है


दरअसल भारत की भौगोलिक परिस्थितियों की प्रतिकूलताओं ने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए नित नई चुनौतियां प्रस्तुत की है। किसी देश के शक्ति और सामर्थ्य में वहां के नागरिकों,संस्कृति और भूगोल का गहरा योगदान होता है। भारत ने जहां बहुसंस्कृतिवाद को अपनाया और उसे पोषित किया है वहीं पड़ोसी देशों के धार्मिक और संस्कृतिवाद ने इस समूचे क्षेत्र की समस्याओं को बढ़ाया है। भारत के पड़ोसी देश बंगलादेश के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक हिन्दु है और उनकी आबादी करीब पौने दो करोड़ है। यह देश की कुल आबादी की 9 फीसदी के आसपास हैबंगलादेश में नव दुर्गा का त्यौहार जोर शोर से मनाया जाता है। पिछले कुछ सालों में शेख हसीना की सरकार ने देश में धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को मजबूत करने के लिए इनकी संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि की है हाल ही में नवदुर्गा के उत्सव को देश के कट्टरपंथियों ने न केवल बाधित किया पर देश के कई इलाकों में हिन्दुओं और उनके मंदिरों को निशाना बनाया गयायह इतना सुनियोजितपूर्ण था कि पुलिस भी इन पर काबू नहीं कर सकी और हमलावर हिंसक और तोड़फोड़ की घटनाओं को व्यापक रूप से अंजाम देने में सफल रहे


इन सबके बीच बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने धार्मिक हिंसा को रोकने और जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा तो दिया लेकिन अप्रत्याशित रूप से भारत को नसीहत भी दे डाली की वहां कोई ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए जिससे बंगलादेश में रहने वाले हिंदू प्रभावित हो। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को समावेशी विचारों के लिए पहचाना जाता है और प्रधानमंत्री स्वयं बंगलादेश की उत्पत्ति में भारत के योगदान की प्रशंसा करती रही है। लेकिन दुर्गा पूजा पर उनकी नियन्त्रण और संतुलन की भाषा वहां रहने वाले हिन्दू अल्पसंख्यकों की चिंता बढ़ाने वाली है।


बंगलादेश का नौआखाली इलाका धार्मिक हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है,यह वहीं क्षेत्र है जहां आज़ादी के समय भीषण सांप्रदायिक संघर्ष हुए थे और महात्मा गांधी ने प्रभावितों के बीच जाकर इसे रोकने में सफलता हासिल की थी। इस समय भी हिन्दुओं के लिए हालात वहां बहुत खराब है लेकिन सरकार के नुमाइंदों की नजर 2023 में होने वाले आम चुनावों पर है। जाहिर है अवामी लीग कट्टरपंथी ताकतों के आगे बेबस महसूस कर रही है और यह बंगलादेश की अस्थिरता को बढ़ावा दे सकता है। दुर्गा पूजा पर देश भर में हुए हमलों में भारत विरोधी नारे लगाएं गए,यह भारत के लिए भी सुरक्षा चुनौती को बढ़ा सकता है। भारत और बंगलादेश के बीच करीब 4 हजार किलोमीटर से ज्यादा की सीमा रेखा है और यह मुख्यतः असम,त्रिपुरा,पश्चिम बंगाल,मेघालय और मिजोरम को छूती है। बांग्लादेश और भारत सीमा के  बीच पूर्वोत्तर की भौगोलिक परिस्थितियां घुसपैठ के अनुकूल है और इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आईएसआई पूर्वोत्तर के रास्ते भारत में आतंकवादियों को भेजती रही,इसमें घुसपैठ,तस्करी,मदरसों का जाल और नकली मुद्रा का अवैध कारोबार शामिल है। भारत और बंगलादेश के बीच नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तो तनाव होता ही रहा है,अब  हिन्दुओं पर सुनियोजित हमलों में कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव से धार्मिक सद्भाव को बनाएं रखने की चुनौतियां भी बढ़ गई है। 

डेढ़ दशक पहले भारत के गृह मंत्रालय ने एक दस्तावेज तैयार किया था,जिसका शीर्षक था पाकिस्तान के वैकल्पिक परोक्ष युद्द का आधारइसमें पाकिस्तान द्वारा अपनों विध्वंसात्मक गतिविधियों को तेज करने के लिए चलाए गए नए ऑपरेशन के बारे में उल्लेख था इस दस्तावेज में खासतौर पर बताया गया था कि पाकिस्तान अपने भारत विरोधी अभियानों के लिए बंगलादेश को एक नए आधार के रूप में विकसित कर रहा है दस्तावेज में इस बात का भी खुलासा था कि पाकिस्तान ने लगभग 200 आतंकवादी प्रशिक्षण कैम्पों को पहले ही अपने यहां से हटाकर बंगलादेश में व्यवस्थित करवा चुका है


1971 में पाकिस्तान से अलग होकर अस्तित्व में आया बंगलादेश अव्यवस्थाओं से लम्बे समय तक जूझता रहा। बांग्लादेश के संस्थापक मुजीबुर्रहमान की कट्टरपंथियों ने 1975 में हत्या कर दी थी। इन चुनौतियों के बीच बंगलादेश ने उदारवाद,महिलाओं और अल्पसंख्यकों के विकास को बढ़ावा देकर उल्लेखनीय सफलताएं भी अर्जित की है। बंगलादेश के मोहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को सामाजिक और लोकतांत्रिक विकास में योगदान’के लिए 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार  से सम्मानित किया गया था


वहीं आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान का संकट बंगलादेश में बहुत बढ़ा है। वहां हिंदू रहना चाहते है लेकिन उनकी सुरक्षा चिंताओं को जनसंख्या असंतुलन से समझा जा सकता है। 1971 में बंगलादेश के जन्म के समय हिन्दुओं की आबादी 20 फीसदी से भी ज्यादा थी जो अब घटकर महज नौ फीसदी तक सिमट गए है। इसके प्रमुख कारणों में इस्लामिक कट्टरतावाद को माना जाता है। पिछलें कुछ दशकों से बंगलादेश में इस्लाम के कट्टरपंथी वहाबी रूप का चलन जोर शोर से बढ़ रहा है,जो जिहादी आतंकवाद को बढ़ावा देता है। बंगलादेश के कौमी मदरसे जो एल लाख से ऊपर है वह सरकार के नियन्त्रण से बाहर है और यह मदरसों को मुख्य रूप से पाकिस्तान और सऊदी अरब से वित्तीय मदद मिलती रही है। इसमें ईशनिंदा को आधार बनाकर कट्टरपंथी तत्व अल्पसंख्यकों के खिलाफ दुष्प्रचार करते रहे हैइसमें बंगलादेश का एक प्रतिबंधित राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी प्रमुख है जमात-ए-इस्लामी को देश की सबसे बड़ी इस्लामी राजनीतिक पार्टी माना जाता है। 1971 में होने वाली स्वतंत्रता युद्ध में इस दल ने  पाकिस्तान  का समर्थन किया था। बाद में यह बंगलादेश के इस्लामिकरण के प्रयास में जुटकर एक सक्रिय दल के रूप में उभरी। जमात-ए-इस्लामी वही संगठन है जिसने तालिबान  द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा किए जाने के बाद बंगलादेश बनेगा अफगानिस्तान जैसे नारे गढ़े हैं। जमात-ए-इस्लामी इस्लाम के कट्टर और रुढ़िवादी रूप को बंगलादेश में लाना चाहता है। इसी कड़ी में इस तरह के नारे गढ़कर यह संगठन युवाओं को कट्टरपंथी बना रहा है।


ईशनिंदा के आधार पर पाकिस्तान में जिस प्रकार अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता है,उसी तर्ज पर बंगलादेश में भी साजिश को अंजाम दिया जा रहा है कुस साल पहले पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आसिफ़ सईद खोसा ने आसिया बीबी केस की सुनवाई करते हुए कहा था कि पैग़ंबर मोहम्मद या क़ुरान का अपमान करने की सज़ा मौत या उम्र क़ैद है,लेकिन इस जुर्म का ग़लत और झूठा इल्ज़ाम अकसर लगाया जाता हैसुप्रीमकोर्ट के जस्टिस के इस कथन के बाद पाकिस्तान की मस्जिदों से इमामों और कट्टरपंथियों ने आम  लोगों से व्यापक विरोध करने की अपील कर देश की कानून व्यवस्था को ठप्प कर दिया थाकराची,इस्लामाबाद,फैसलाबाद,रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए गए,रोड़ जाम कर दिए गए और सरकारी सम्पत्ति को भारी नुकसान पहुँचाने की कुचेष्टा की गई। अब बंगलादेश में भी ऐसे ही दृश्य देखे जा सकते है।


बंगलादेश में राजनीति शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया के इर्द-गिर्द ही घूमती है ख़ालिदा ज़िया को जहां कट्टरपंथी ताकतों का समर्थक माना जाता है वहीं शेख हसीना उदार और भारत समर्थक मानी जाती है राजनीतिक अस्थिरता से लगातार जूझने वाले बंगलादेश के लिए शेख हसीना का करीब 13 साल का शासन अल्पसंख्यकों समेत सभी नागरिकों के लिए वरदान साबित हुआ है दुनिया भर के कई देशों में पिछले एक दशक से दक्षिणपंथी सरकारें अति राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा दे रही है वहीं  शेख हसीना के कार्यकाल में धर्म निरपेक्ष मूल्यों को लेकर बंगलादेश लगातार आगे बढ़ रहा है।  बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका में स्थित प्रसिद्द ढाकेश्वरी मंदिर को करीब 50 करोड़ टका की कीमत की जमीन देने की घोषणा कर यह संदेश भी दिया था की तरक्की और स्थायित्व के लिए सभी का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। प्रधानमंत्री के अनुसार समानता,सौहाद्रता और परस्पर धार्मिक सद्भाव से ही उनका देश मजबूत हो रहा है और सफलता की ओर बढ़ रहा हैइस्लामिक राष्ट्र होने के बाद भी बंगलादेश में हिन्दूओं का भरोसा जीतने के लगातार सरकार के प्रयास खूब सराहे गए है 

शेख हसीना को रोकने के लिए खालिदा जिया की बीएनपी जमात-ए-इस्लामी को लगातार समर्थन दे रही है। करीब डेढ़ दशक पहले बीएनपी सरकार के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों को मदद मिल रही थी जब से आवामी लीग की सरकार आई है,वह उन्हें दबाने की कोशिश कर रही है और इसमें कुछ क़ामयाबी भी मिली है बीएनपी की जमात और इस्लामिक कट्टरपंथियों से पुरानी क़रीबी है आम तौर पर बंगलादेश में हिंदुओं को आवामी लीग गठबंधन का समर्थक बताया जाता है और इसी कारण आम चुनावों में हिन्दुओं को निशाना बनाया जाता है


इस समय बंगलादेश में हिन्दू डरे हुए है और पुलिस का कहना है कि जिन मंदिरों पर हमला हुआ है,पुलिस उन सबसे मामला दर्ज कराने को कह रही हैलेकिन बहुत से मंदिरों के पदाधिकारी मामला दर्ज कराने को तैयार नहीं हैं। वहीं अल्पसंख्यकों का भरोसा पुलिस पर बिल्कुल नहीं है,उनका कहना है कि समय पर पुलिस की मदद न मिल पाने से ही कट्टरपंथी हिंसक घटनाओं को अंजाम देने में सफल रहे


बहरहाल बंगलादेश को अपनी उदार छवि को कायम रखते हुए आगे बढना चाहिए। अफगानिस्तान में तालिबान के उभार का प्रभाव न केवल बंगलादेश को बल्कि दक्षिण एशिया के अन्य देशों के लिए संकट बढ़ा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय नैतिकता की संकल्पना का महत्वपूर्ण पहलू है राष्ट्रीय हितों की पारस्परिकताराष्ट्रों को अपने हितों में समायोजन या तालमेल पैदा करने के उपाय तलाश करने चाहिए,राष्ट्रीय हितों का मेल अस्तित्व रक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत की और देखने के स्थान पर महात्मा गांधी की इस सीख को भी ध्यान रखना चाहिए कि एक राष्ट्र के हित का मानव जाति के वृहत्तर हित के साथ मेल बिठाया जा सकता है

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