संविधानिक सत्ता संभव नहीं,talibani stta afganistan rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा


                              


                                     

अफगानिस्तान में तालिबान सैन्य प्रशासन सशस्त्र सेनाओं का प्रबंधन तो कर सकता है,लेकिन लोकसेवा को लेकर उसकी स्थिति जटिल ही होगी। तीन दशक पहले अस्तित्व में आएं तालिबान का समूचा इतिहास गुरिल्ला युद्द और कबीलाई लड़ाइयों से भरा पड़ा है। तालिबान ने इस दौर में अफगानिस्तान में स्थापित वैधानिक व्यवस्था का समूचा ढांचा नष्ट कर दिया है। देश के विभिन्न प्रान्तों में स्थापित प्रशासनिक केंद्र,लोक कल्याणकारी संस्थान,पुलिस मुख्यालय और अन्य सभी सरकारी संस्थानों में काम करने वाले लोग भाग गये है,तालिबान उन्हें वापस बुलाने में क्या कामयाब हो पायेगा,इसे लेकर संदेह बना हुआ है।


2001 में सत्ता से बेदखल होने के पहले तालिबान का अफगानिस्तान में सत्ता पर बने रहने का तरीका रक्तरंजित होकर अमानवीयता से भरा पड़ा रहा। एक बार फिर तालिबान सत्ता के शीर्ष पर है और वह नये अफगानिस्तान के निर्माण को लेकर वैश्विक समुदाय को भरोसा दिला रहा है। लेकिन अफगानिस्तान की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताएं किसी लडाका संगठन के पक्ष में लामबंद हो जायें,इसकी कोई भी संभावना दूर दूर तक नजर नहीं आती। इसी कारण अफगानिस्तान में गृह युद्द का खतरा मंडराने लगा है।


करीब चार दशक पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान की स्थापित और सोवियत समर्थक सरकार को उखाड़ फेंकने के मुजाहिदीन नेताओं की मेज़बानी  कर उन्हें जंग-ए-आज़ादी के सिपाही कहकर विध्वंसक हथियार और गोलाबारूद भी मुहैया कराया था। इसी का परिणाम यह हुआ कि 1988 में सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्बाचोव को अफगानिस्तान से सेना बुलाने का आदेश देना पड़ा था। अफगानिस्तान में इसके बाद गहरी अशांति फैलती गई लेकिन अमेरिका ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा था कि तालिबान के प्रभाव से ज्यादा महत्वपूर्ण सोवियत संघ का विभाजन है और अमेरिका ने इसे अपनी बड़ी सामरिक विजय भी माना। अब अमेरिका भी अफगानिस्तान छोड़कर चला गया है।


एक बार फिर अफगानिस्तान अशांत होकर अपने अस्तित्व से जूझ रहा है।तालिबान की नई सरकार कैसी होगी,देश में रहने वाले विभिन्न जातीय समूह उसे कैसे स्वीकार करेंगे, वैश्विक स्तर पर उसकी क्या स्थिति होगी,ऐसे कई सवाल है जिनसे अफगानिस्तान के लोगों का आगामी भविष्य तय होगा।अफगानिस्तान में इस समय कोई ठोस शासन व्यवस्था बहाल नहीं है। लोगों के मन में कई सवाल है और वे असहज है,बैंकों के बाहर लंबी कतार लगी हुई है। रोज़मर्रा के ज़रूरी सामान की क़िल्लत से लोग परेशान हैं। अफ़ग़ानिस्तान की जीडीपी का आधा हिस्सा विदेशी मदद के ज़रिए आता था । अब वो विदेशी मदद बिल्कुल बंद हो चुकी है।इस वजह से वहाँ आर्थिक गतिविधियाँ फ़िलहाल बंद पड़ी हैं। कई लोगों को तनख़्वाह नहीं मिल रही है और देश के विभिन्न क्षेत्रों में लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं।


देश में स्थितियां बेहतर करने के लिए व्यवस्थाओं को कई स्तर पर ठीक किया जाना होगा,तब ही देश का शासन और प्रशासन ढांचा काम करेगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि तालिबान के डर से प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी देश छोड़कर भाग गए है या सुरक्षित जगहों पर क छुप गए है। प्रशासन में पारदर्शिता की ज़रूरत  है और इन सबमें तालिबान में शामिल लोगों को किसी तरह की महारत हासिल नहीं है।पहले भारत की ओर से इस तरह के  प्रशिक्षण दिए जाते थे लेकिन तालिबान ऐसी किसी नीति पर काम करे इसकी दूर दूर तक संभावना नहीं है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की किसी भी तरह की उपस्थिति का विरोध करता रहा है। वहीं अफगानिस्तान की आम जनता में पाकिस्तान के प्रति बेहद गुस्सा है,अत: वे पाकिस्तान के किसी भी प्रशासनिक हस्तक्षेप को पसंद नहीं करेंगे।


अफगानिस्तान एक बहुसंख्यक जनजातीय समाज है। देश की आबादी पश्तुन, ताजिक,हजारा,उज़्बेक,अमाक, तुर्कमेनिस्तान,बलूच, पशाई, नूरिस्तान,गुज्जर, अरब, ब्राहुई, पामिरी और कुछ अन्य समूहों में विभाजित है।अधिकांश लोग जनजातीय पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। प्रशासन के लिए चुनौतियां इससे ज्यादा बढ़ जाती है।


अफगानिस्तान गांवों का देश है। यहां के कुछ शहरों पर कब्जा करके पुरे अफगानिस्तान पर काबिज होने का दावा सोवियत संघ,अमेरिका समेत हामिद करजई भी कर चूके है।लेकिन इसके परिणाम खतरनाक ही रहे है।विभिन्न जातीय समूहों के लड़ाके कुछ समय के लिए पहाड़ों में छुप जाते है।तालिबान के लड़ाकों में गांवों में  छुपकर स्वयं को मजबूत किया और बीस साल बाद सत्ता पर फिर से कब्जा कर लिया।

उत्तर,उत्तर-पूर्व और मध्य प्रांतों जैसे ग़ज़नी और मैदान वर्दक सहित कुंदूज़, हेरात,कंधार और लश्कर गाह,उत्तरी हेलमंड, उरूज़गान और जाबुल प्रांतों में तालिबान मजबूत है ,लेकिन कई प्रान्तों में स्थानीय मिलीशिया का प्रभाव भी है। ऐसे बहुत सरे इलाके है जिन पर तालिबान का नियंत्रण है वहां आबादी बहुत कम है।कई जगह तो एक वर्ग किलोमीटर में पचास तक लोग ही रहते हैं।


तालिबान में पश्तून ज़्यादा है और अफ़ग़ानिस्तान की यह बहुसंख्यक आबादी है। इसके साथ साथ वहाँ अलग-अलग धर्म और संप्रदाय के लोग भी रहते हैं, जिनकी संख्या थोड़ी कम है जैसे हज़ारा और शिया, उज़्बेक और ताज़िक।

पश्तून जातीय अफगान अफगानिस्तान में सबसे बड़ा जातीय समूह होकर बेहद प्रभावी है और ये आबादी की दृष्टि से करीब 45 फीसदी हिस्सा है।  इनके मुख्य क्षेत्र को पश्तुनिस्तान कहा जाता है।अफगानिस्तान में हिंदूकुश पहाड़ों और पड़ोसी पाकिस्तान में सिंधु नदी के बीच ये रहते है है।जबकि अफगानिस्तान में ऐसे ओर भी जातीय समूह है जिन्हें तालिबान का पश्तून नेतृत्व स्वीकार नहीं है।

उज्बेक अफगानिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों में रहते है। इनकी आबादी 20 से 25 लाख है। उज्बेक आक्रामक है और पड़ोसी देश उज्बेकिस्तान का समर्थन इन्हें प्राप्त है।अफगानिस्तान में ताजिक  जातीय समूह की भी अच्छी खासी आबादी रहती है। पंजशीर घाटी में तालिबान के खिलाफ मोर्चा ताजिक कमांडर अहमद मसूद ने ही खोल रखा है जिन्हें सोवियत और तालिबान के खिलाफ अपनी वीरता के लिए 'पंजशीर के शेर' के रूप में जाना जाता है।1992 से 2001 के बीच दो बार अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने वाले बुरहानुद्दीन रब्बानी सहित ताजिक नेताओं ने गैर-पश्तून उत्तरी गठबंधन का नेतृत्व किया था। तालिबान के साथ इनकी परम्परागत प्रतिद्वंदिता रही है,जिसे खत्म करना आसान नहीं है।अशरफ गनी सरकार में रक्षा मंत्री जनरल बिस्मिल्लाह मोहम्मदी,जिन्होंने


तालिबान के अधिग्रहण के बाद देश को आतंकवादियों से मुक्त करने की कसम खाई है, वह भी ताजिक हैं।

हजारा अफगान आबादी का लगभग 10-15 प्रतिशत हैं। अफगानिस्तान के जिस मध्य-पहाड़ी इलाके में ये लोग रहते हैं उसे हजारिस्तान कहा जाता है। इसमें प्रमुख प्रांत हैं बामियान,देयकुंदी, गोर,गजनी,उरूजगान,परवान और मैदान वारदाक। इसके अलावा बदख्शा प्रांत में भी हजारा समुदाय रहता है। तालिबान हजारा समुदाय पर अत्याचार करता रहा है।यह मुख्यतः शिया लोग है।ईरान इनका समर्थन करता है।तालिबान के देश में प्रभावी होते ही बदख़शां, कुंदूज़, बल्ख़, बाग़लान और ताख़र में बड़ी तादाद में लोग विस्थापित हो रहे हैं।संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी मामलों की संस्था यूएनएचसीआर ने इसकी पुष्टि भी की है।


तालिबान के सामने स्वीकार्यता का संकट है और यदि वह विभिन्न जातीय समूहों  को संतुष्ट नहीं कर सका तो देश में आईएसआईएस-के और अल-क़ायदा जैसे चरमपंथी संगठनों  को मजबूती मिल सकती है। अब तालिबान के सामने देश का विश्वास अर्जित करने,प्रशासनिक व्यवस्था पारदर्शी बनाने और गरीबी दूर करने की चुनौती है।जाहिर है गृहयुद्द से अफगानिस्तान को बचाना आसान नहीं होगा।

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