तालिबान की महबूबा...! politics taliban mahbuba mufti

 पॉलिटिक्स




  


अफगानिस्तान में तालिबान की आतंक की सत्ता के पक्ष में लामबंद होने वालों में महबूबा मुफ़्ती भी शुमार हो गई हैउन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान के हालिया कब्जे की मिसाल देते हुए भारत सरकार को ताकीद किया है कि वह कश्मीरियों के सब्र का और इम्तिहान न ले और अमेरिका से सबक सीखे कि उसे कैसे अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भागना पड़ा। इसके पहले उन्होंने कुलगाम में एक जन सभा में कहा था कि  जैसी हालत अमेरिका की अफगानिस्तान में हुई वैसी ही कश्मीर में भारतीय सेना की होगी


दरअसल कश्मीर में चरमपंथ को सामाजिक स्वीकार्यता के साथ राजनीतिक समर्थन देने का काम महबूबा मुफ़्ती कई सालों से करती रही है। वह राजनीतिक सभाओं में राजनीतिक कैदियों को रिहा करने,सभी उग्रवादियों से वार्ता करने और आतंकवादियों के लिए कहर बने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को बंद करने की वकालत करती रही है। अपने स्वायत्तता प्रेम के कारण घाटी के अलगाववादियों एकमात्र पसंद महबूबा ही मानी जाती हैआतंक के खास केंद्र दक्षिणी कश्मीर में उनकी पार्टी पीडीपी का सिक्का चलता है

 


आतंकी गठजोड़  पर महबूबा की चुप्पी

 

पाकिस्तान,आईएसआई,तालिबान और कश्मीर में आतंकवाद का गहरा संबंध रहा है। पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। 1993 पाकिस्तान  में बने और कश्मीर में काम करने वाले आतंकी संगठन हरकत-उल अंसार का मुख्यालय मुजफ्फराबाद में है। इसके साथ की इसका एक केंद्र अफगानिस्तान के खोस्त में है। यह कश्मीर के अलावा बोस्निया और म्यांमार में भी सक्रिय है। कश्मीर के एक और कुख्यात आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन का मुख्यालय पाकिस्तान के सेहसाणा में है। करगिल युद्ध में पाक सेना के साथ इस आतंकी संगठन के आतंकी भी शामिल थे। हिजबुल मुजाहिदीन का केंद्र मुजफ्फराबाद में है।


 

कंधार कांड में तालिबान की भूमिका

 

24 दिसम्बर 1999 में काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करके कंधार ले जाया गया था। उस दौर में भी अफगानिस्तान में तालिबान की हुकुमत थी।  31 दिसंबर 1999 को सरकार और अपहरणकर्ताओं के बीच समझौते के बाद दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए सभी 155 बंधकों को रिहा कर दिया गया। इस समझौते के अनुसार तत्कालीन वाजपेयी सरकार भारतीय जेलों में बंद कुछ चरमपंथियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गई। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह ख़ुद तीन चरमपंथियों अपने साथ कंधार ले गए थे। छोड़े गए चरमपंथियों में जैश-ए -मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, अहमद ज़रगर और शेख अहमद उमर सईद शामिल थे।


 

पाक-अफगान आतंकी संगठनों का कभी विरोध नहीं करती महबूबा

 

पाकिस्तान का सबसे प्रभावी संगठन है जमात-उद दावा वल इरशाद। इसकी गतिविधियाँ मुख्य रूप से दो क्षेत्रों पर केंद्रित होती है शिक्षा और जिहाद.इस्लाम की स्वच्छ और शुद्ध छवि के प्रचार के नाम पर पाकिस्तान में यह कई स्कूलों का संचालन करता है। लश्कर-ए तैयबा इसकी अति प्रशिक्षित आतंकवादियों की शाखा है जो आमिर के आदेश पर युद्ध में जाने को हमेशा तैयार रहते है। इस संगठन का प्रमुख मुम्बई हमलें का मास्टर माईंड प्रोफेसर हाफिज सईद है जो अपनी तकरीरों में यह कहता है कि अल्लाह ने यह आदेश दिया है कि पूरी दुनिया में इस्लामिक कानून लागू किया जाए। इस संगठन का नारा है जम्हूरियत का जवाब,ग्रेनेड और ब्लास्ट.मुरीदके दावा का मुख्यालय होने के साथ साथ कश्मीर,बोस्निया,चेचन्या और फिलिपींस में जाने वाले आतंकवादियों का प्रशिक्षण केंद्र भी है,जहां मुस्लिम अलगाववादी आन्दोलन बड़े पैमाने पर चल रहे है।  आतंकी संगठनों को लेकर महबूबा आमतौर पर खामोश रहती है।


 

 

आतंकी बुरहान वानी को शहीद कहा

 

भारत के सुरक्षाबलों की कार्रवाइयों में मारे जाने वाले कई आतंकियों को महबूबा मुफ़्ती  अनेक सभाओं में शहीद बताती रही है। महबूबा मुफ्ती ने 2016 में मार गिराये हिज्बुल मुजाहिदीन के पोस्टर ब्वॉय बुरहान वानी को शहीद भी करार दे चुकी है । दो साल पहले जब वह अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुण्यतिथि पर बिजबिहाड़ा गई थीं। यहां उन्होंने फातिहा पढ़ने के बाद कहा था कि बुरहान के मारे जाने के बाद भड़की हिंसा में कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसके लिए वह लोगों से माफी मांगती हैं।

 


अफगानी मुजाहिदों के कश्मीर कनेक्शन को बेनजीर भुट्टों ने स्वीकार किया था

 

भारत के कश्मीर में आतंकवाद फ़ैलाने के पाकिस्तान पर लगने वाले आरोपों को उन्होंने बाद में उन्होंने साफगोई से स्वीकार कर लिया। बेनजीर भुट्टों ने अपनी जीवनी में लिखा है,मेरे पास 1990 में आईएसआई के दफ्तर से यह संदेश आया कि अरब,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के एक लाख से ज्यादा मुजाहिदीन इस बात के लिये तैयार है कि वह कश्मीर में घुसकर कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई में मदद करें। वह सारे बहादुर और प्रशिक्षित है और हिंदुस्तान की फौजों से बड़ी आसानी से लोहा ले सकते है।


 

महबूबा मुफ़्ती की बहन  के अपहरण की साजिश से शुरू हुआ था आतंक

इस खूबसूरत वादी को टूरिज्म से टेरेरिज्म की ओर धकेलने की गहरी साजिशों को परवान चढ़ाने में महबूबा मुफ़्ती का परिवार खास जिम्मेदार माना जाता है। घाटी में अलगाव को 1980 के दशक के शुरूआती दौर में महसूस किया जाने लगा था लेकिन इसे आतंक की शक्ल देने का काम किया रुबिया सैयद अपहरण कांड ने। भारत के तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद आठ दिसंबर 1989 को श्रीनगर के मशहूर ललदेन अस्पताल से बाहर निकलकर एक मिनी बस में सवार होती हैइस दिन उसकी सुरक्षा में किसी को भी नहीं रखा गया थाएक सुनसान इलाके से रुबिया सईद का आतंकियों द्वारा अपहरण कर लिया जाता हैइसके बाद अपनी बेटी को बचाने की एवज में तत्कालीन गृहमंत्री पांच दुर्दांत आतंकियों को छोड़ देते हैरुबिया की पांच दिनों बाद घर वापसी हो जाती है लेकिन कश्मीर जल उठता है और वह आग तीन दशक बाद भी बदस्तूर जारी हैरुबिया सईद के अपहरण की इस घटना के बाद ही कश्मीर में आतंकी वैखौफ हत्याएं और अपहरण करने लगते है और घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन भी यहीं से शुरू हुआ था

 


गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की आतंकियों से सांठगांठ

 

इसकी पुष्टि कश्मीर के एक अलगाववादी नेता हिलाल वार ने अपनी किताब ग्रेट डिस्क्लोजरः सीक्रेट अनमास्क्डमें भी की। हिलाल ने रूबिया सईद अपहरण को लेकर एक नया खुलासा करते हुए आरोप लगाया कि यह सिर्फ एक ड्रामा था जो तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जेकेएलएफ के कमांडर यासीन मलिक के साथ मिलकर रचा था2012 में एनएसजी के पूर्व अधिकारी रहे मेजर जनरल ओपी कौशिक ने रूबिया सईद अपहरण मामले में सनसनीखेज दावा किया थाकौशिक के अनुसार  रूबिया के पिता और तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी जल्द रिहा होउन्होंने साफ किया था कि अपहरण की सूचना मिलने के पांच मिनट के भीतर ही एनएसजी की टीम ने पता लगा लिया था कि रूबिया को कहां रखा गया है,लेकिन इसके बाद भी आतंकियों पर कार्रवाई नहीं करने दी गई थी।


 

रुबिया का अपहरण या आतंकियों से मिलकर रची साजिश

इस समूचे घटनाक्रम की जब परते खुली तो इस बात की आशंका बलवती हो गई कि इस अपहरण कांड में रुबिया मददगार थी और राजनीतिक साजिश के तहत् इस घटना को अंजाम दिया गया था। अब कश्मीर तीन दशकों से आतंकवाद से जल रहा है,हजारों लोग मारे गए है,भारतीय सेना और पुलिस जवान जान पर खेल कर ड्यूटी कर रहे है,जबकि रुबिया स्वयं चेन्नई के एक अस्पताल में डाक्टर है और उसकी जिंदगी आराम से कट रही है

 


हाफिज सईद की सहयोगी महिला आतंकी आसिया अंद्राबी की प्रशंसक

 

1987 में इस्लामी नारीवादी के आधार पर कश्मीर में स्थापित अलगाववादी संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत आतंकी संगठनों का सबसे मददगार माना जाता हैअपने को राष्ट्र की बेटियां बताने वाले इस संगठन की मुखिया आसिया अंद्राबी फिलहाल जेल में है और वह कश्मीर में आतंक का ताना बाना बुनने की सबसे बड़ी रणनीतिकार मानी जाती है 2017 में जब महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री थी उस दौरान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के प्रचार में कुख्यात आतंकी संगठन दुख्तरान-ए-मिल्‍लत की अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को जम्‍मू-कश्मीर का महिला रोल मॉडल के तौर पर पोस्टर पर जगह दी गई थीपोस्टर में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी,मदर टेरेसा,किरण बेदी,लता मंगेशकर,सानिया मिर्जा,महबूबा मुफ्ती,कल्पना चावला आदि की भी तस्वीरें लगाई गई थीसामाजिक कल्‍याण मंत्रालय के इस कार्यक्रम के दौरान मुख्‍यमंत्री महबूबा के भाई तसादुक मुफ्ती समेत दर्जनों अधिकारी और मंत्री उपस्थित थे


दुख़्तरान-ए-मिल्लत की आतंकी चालें

 

यह संगठन खुले तौर पर जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात करता हैअंद्राबी के खिलाफ पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस और पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस क्रमश: 14 अगस्त और 23 मार्च को पाकिस्तानी झंडा फहराने सहित अन्य मामले दर्ज हैंग़ौरतलब है कि आसिया अंद्राबी के ऊपर पाकिस्तान के साथ मिलकर काम करने के आरोप लगते रहे हैंवहीं उनके संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत को कश्मीर में इस्लामी कानून लागू करने और भारत से अलग राष्ट्र बनाने के लिए काम करने वाला संगठन बताया जाता हैभारत सरकार इस संगठन को आतंकवादी घोषित कर चुका हैअंद्राबी मुख्य तौर पर नौजवानों को उकसाने का काम करती हैवह बुरहान वानी और अफ़ज़ल गुरु को "ब्‍वॉयज ऑफ शहादत' यानी 'शहादत के लड़के' क़रार देती रही हैअंद्राबी ने घाटी की महिलाओं को आतंकवाद से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है इस संगठन के सम्पर्क में देश विदेश की कई लड़कियां है,जिनका माईंड वाश करके उन्हें आतंकी दलदल में धकेल दिया जाता है।

 


शिमला समझौते के बाद कश्मीर

2 जुलाई 1972 को कश्मीर के स्थायी हल का प्रयास करते हुए नियंत्रण रेखा को स्वीकार कर लिया गया था,जिसके अनुसार कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया। भारत और पाकिस्तान के फ़ील्ड कमांडरों और संयुक्तराष्ट्र प्रतिनिधि ने सीमा पर जाकर 11 दिसम्बर 1972 को इसका निर्धारण किया। दोनों देशों ने 25 नक्शों की आपस में अदला बदली की और नियंत्रण रेखा को अपनी मंजूरी देने के लिए हस्ताक्षर किये। एलओसी कश्मीर को दो एक के अनुपात में बांटती है,करीब 90 लाख की आबादी वाला पूर्व से दक्षिण तक भारतीय जम्मू कश्मीर है,जबकि तकरीबन 30 लाख की आबादी वाला पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर जो उत्तर से पश्चिम तक है,पाकिस्तान इसे आज़ाद कश्मीर कहता है।


महबूबा को राजनीतिक भविष्य की चिंता

महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद अपने राजनीतिक  भविष्य को लेकर गहरे असमंजस में है। उनकी राजनीतिक जमीन खिसक गई है। महबूबा अनुच्छेद 370 के पक्ष में बेहद मुखर रही है और उसे पुन: बहाल करवाने के लिए वह तालिबान का सहारा लेकर कश्मीर को आतंक के जंजाल में फिर से धकेलने के कुत्सित प्रयास कर रही है।

 

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