अमेरिका का नया दांव,amerika afganistan janstta

 जनसत्ता


                

अमेरिका ने काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया है और इसे क़तर की राजधानी दोहा स्थानांतरित किया गया है सभी अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़ चूके हैअमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने इसे अफ़ग़ानिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्तों का एक नया अध्याय बताया है, जिसमें सैनिक अभियान के  समाप्त होने और नए कूटनीतिक मिशन के शुरू होने की बात कही है


दरअसल अफगानिस्तान से आतंक समाप्त करने का अमेरिकी लक्ष्य भले ही पूरा न हुआ हो लेकिन उसके वैश्विक हित और उद्देश्य अवश्य बदल गए है। अमेरिका को लेकर यह धारणा रही है कि यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी नीतियां वहां की राजनीतिक पार्टियां या राष्ट्रपति तय नहीं करते,बल्कि तय वही होता है जो अमेरिकी हित में हो,चाहे सत्ता में कोई भी रहे। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी अप्रत्याशित नहीं होकर कूटनीति का ऐसा दांव है जिससे मध्यपूर्वदक्षिण एशियाचीनरूस सहित कई मोर्चों पर अमेरिका को निर्णायक बढ़त मिल सकती है। ऐसा लगता है कि अमेरिका और तालिबान ने आपसी गठजोड़ करके न केवल अपने हितों को सुरक्षित कर लिया बल्कि भविष्य में आपसी सहयोग की व्यूह रचना भी तैयार कर दी। इसकी शुरुआत ट्रम्प के कार्यकाल में ही हो गयी थी जब अमेरिका  और तालिबान के बीच वार्ताओं का दौर शुरू हुआ था। तालिबान का अफगानिस्तान में कब्जा इसी योजना का हिस्सा है जिसे बाइडेन ने अंजाम तक पहुंचा दिया है।


यह भी बेहद दिलचस्प है कि अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार अमेरिका और तालिबान के बीच होने वाली वार्ताओं को लेकर लगातार आशंकित रही और उन्होंने वार्ताओं का विरोध भी किया। लेकिन अमेरिका ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के विरोध को नजरअंदाज कर तालिबान की वह शर्ते भी मानी जिसमें अशरफ गनी को वार्ता से दूर रखने की बात  कही गई थी। जब ट्रम्प ने वार्ता को सफल बताया था तब भी अशरफ गनी ने इसकी आलोचना करते हुए इसे अमेरिका द्वारा तालिबान की शक्ति को मान्यता देने जैसा बताया था।  गनी अमेरिका और तालिबान के बीच पनपती साझेदारी को बहुत पहले भांप गए थे और उन्होंने फरवरी 2018 में तालिबान को एक वैध राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने की पेशकश के साथ बिना शर्त शांति वार्ता के लिए आमंत्रित किया था,तब भी तालिबान अफगान सरकार के साथ बातचीत के लिए राजी नहीं हुआ जबकि अमेरिका के साथ ऐसा नहीं था 12 अक्टूबर 2018 को अमेरिका और तालिबान के बीच कतर में शांति वार्ता की शुरुआत हुई थी और यही से  अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी की संभावनाएं प्रबल हो गई थीइस बीच ट्रम्प प्रशासन ने अफगानिस्तान में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अफगान मूल के जलील खलीलजाद को अपना वार्ताकार बनाकर एक और दांव खेला था जिन्होंने अक्टूबर 2019 में पाकिस्तान पहुंचकर तालिबान के सह संस्थापक और मुख्य शांति वार्ताकार मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की अगुवाई वाले तालिबान प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक करके भविष्य की कार्ययोजना तय कर दी थी


अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर अमेरिका की तालिबान के प्रति नीति को बहुआयामी दृष्टिकोण से देखना होगा।   2001 के सितंबर में अमेरिका पर बड़ा आतंकी हमला हुआ था जिसके लिए उसने अल-क़ायदा को ज़िम्मेदार ठहराया था  इसके बार अल-क़ायदा का समर्थन करने के आरोप में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और तालिबान को सत्ता से बेदखल कर वहां नई सरकार बनाने के रास्ते तैयार किए थे। लेकिन दो दशकों तक अफगानिस्तान की सत्ता को संचालित करने और अरबों डॉलर खर्च करने वाले अमेरिका के लिए स्थितियां अनुकूल बन ही नहीं सकी। अफगानिस्तान के शहरों से अमेरिकी फौज तालिबान को खदेड़ने में कामयाब रही लेकिन अफगानिस्तान की अस्सी फीसदी आबादी गांवों में रहती है जहां से तालिबान को खदेड़ने में न तो हमीद करजई कामयाब हो सके और न ही गनी के पास इसे लेकर कोई योजना थी। इन सबके बीच अमेरिका को भी यह अनुभव हो गया कि कबीलों से संचालित होने वाले इस देश में सर्वप्रिय,समन्वयकारी और वैधानिक सरकार की स्थापना नामुमकिन है। अफगानिस्तान का इतिहास इसका गवाह भी है।


पिछले साल मार्च में दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच वार्ता के पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान के लोगों को नए भविष्य के लिए बदलाव को अपनाने की अपील की थीदोहा वार्ता शुरू होने से पहले तालिबान ने कहा था कि वह केवल अमेरिका के साथ सीधी बातचीत करेगा,न कि काबुल सरकार के साथ,जिसे उन्होंने मान्यता नहीं दी थी। अमेरिका ने प्रक्रिया से अफगान सरकार को अलग रखते हुए इस मांग को प्रभावी ढंग से स्वीकार कर लिया और विद्रोहियों के साथ सीधी बातचीत शुरू की। दोहा वार्ताओं को तालिबान के पक्ष में दिखाने के लिए अमेरिका ने अफगान सरकार पर हज़ारों तालिबानी कैदियों को रिहा करने का दबाव बनाया जिसे लेकर अफगानिस्तान की गनी सरकार तैयार नहीं थी।


इस समय अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के लिए अमेरिका की चौतरफा आलोचना हो रही है लेकिन अमेरिकी प्रशासन तालिबान का लगातार बचाव कर रहा है। हाल में सुरक्षा परिषद ने तालिबान को आतंकी संगठन बताने से परहेज किया तथा काबुल हवाई अड्डे पर आतंकी हमले के लिए इस्लामिक स्टेट को जिम्मेदार ठहराकर तालिबान की छवि को जनप्रिय बताने की कोशिश की। अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख विलियम बर्न्स ने काबुल में तालिबान के नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ गोपनीय मुलाकात  कर तालिबान अमेरिकी साझेदारी के बढने के संकेत दिए है।


अमेरिका की वैदेशिक नीति में इस समय उसकी मुख्य चिंता चीन की विस्तारवादी नीतियों को लेकर रही है। अब अमेरिका तालिबान की मदद लेकर ड्रैगन को झटका दे सकता है। चीन अफगानिस्तान को  आर्थिक गलियारे में शामिल करने के संकेत भी दे चुका है। चीन अफगानिस्तान के पहाड़ी इलाके वाखान गलियारे के पास सैन्य अड्डा बनाना चाहता है। अब तालिबान-अमेरिका गठजोड़ के चलते चीन की आर्थिक और सामरिक समस्या बढ़ सकती है।


तालिबान को लेकर अमेरिका का पारंपरिक प्रतिद्वंदी रूस भी आशंकित है। वह तालिबान से मजबूत संबंध रख कर इस्लामिक स्टेट को इस क्षेत्र से दूर रखना चाहता है। उसकी चिंता चेचन्या को लेकर है। रूस इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि दक्षिण और मध्य एशियाई देशों में सक्रिय आइएस से इस क्षेत्र में सहानुभूति रखने वाले कट्टरपंथी मौजूद है। अमेरिका अफगानिस्तान से लगने वाले देश ईरान को भी नियंत्रित करने के मौके ढूंढ़ता रहा है। तालिबान और ईरान के संबंध असहज ही रहे है। ईरान के कथित गोपनीय परमाणु कार्यक्रम- अमाद को लेकर अलग-अलग कारणों से अमेरिकासऊदी अरब और इजराइल दहशत में हैं। ईरान वैश्विक प्रतिबंधों से जूझ रहा है और उसके लिए विदेशों में जमा विदेशी मुद्रा भंडार को इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है। ऐसे में ईरान की सीमा से लगा अफगान शहर हेरात नकदी के स्रोत की अहम भूमिका निभाता है। ईरान की तुलना में हेरात में अनुकूल दरों पर अमेरिकी डॉलर का लेनदेन होता है और इस्लामिक रिपब्लिक नकदी के अपने सबसे नजदीकी और प्रमुख स्रोतों में से एक तक पहुंच खोना नहीं चाहेगा। अब अमेरिका सुन्नी कट्टरपंथी संगठन तालिबान पर दबाव डालकर न केवल ईरान की अफगानिस्तान से लगती सीमा को असुरक्षित कर सकता है,बल्कि उसे आर्थिक नुकसान भी पहुंचा सकता है।


इस समय बाइडन ने तालिबान के लिए अफगानिस्तान की सत्ता का मार्ग खोल कर कई कूटनीतिक मोर्चों पर बढत हासिल कर ली है। इस्लामिक स्टेट का प्रभाव अफगानिस्तान के हेलमंदजाबुलफराहलोगार और नंगरहार जैसे प्रान्तों में देखने को मिल रहा है। इस्लामिक स्टेट और तालिबान लड़ाकों का संघर्ष आने वाले समय में बढ़ सकता है। इससे तालिबान पर दबाव बढ़ेगा। तालिबान के लिए अमेरिका से सामरिक और आर्थिक सहयोग मिलता रहना बेहद जरुरी है और यह उसकी प्राथमिकता भी होगी। अमेरिका की नजर मध्यपूर्व से लेकर ईरान,रूस और चीन तक है,तालिबान और दोहा उसके लक्ष्यों को पूरा करने का माध्यम बन सकता है। बहरहाल अमेरिका ने अपने वैश्विक हितों के संवर्द्धन के लिए वैश्विक शांति को दांव पर लगा दिया है और इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते है।

 

 

 

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