भारत की रणनीतिक चूक,taliban bharat rashtriy sahara

 राष्ट्रीय सहारा



                                                                        

यूरेशिया की  शांति, सुरक्षा व स्थिरता  के लिए गठित शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों कज़ाकिस्तान,चीन,किर्गिस्तान,रूस,ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान,भारत और पाकिस्तान में से अधिकांश की सीमाएं अफगानिस्तान से मिलती है। अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने से एससीओ का कोई भी देश इतना आशंकित नहीं है जितना भारत। करीब तीन दशक पहले तालिबान का जन्म रूस और साम्यवाद के विरोध में हुआ था,अब तालिबान के सबसे बड़े सहयोगी और हमराह रूस और चीन बन गए है। कूटनीति का आधार ही राष्ट्रीय हितों का संवर्धन होता है जिसमें यथार्थवादी दृष्टिकोण की निर्णायक भूमिका होती है। इसी दृष्टिकोण के सहारे अमेरिका ने तालिबान से गुपचुप समझौता करके अपने हित साध लिए,रूस ने तालिबान की मेजबानी कर डाली,चीन ने तालिबान को दो अरब रुपए की मदद का ऐलान कर दिया,तुर्की ने काबुल हवाई अड्डे की सुरक्षा और देखभाल का प्रस्ताव रख दिया और पाकिस्तान ने अपनी इच्छा के अनुसार तालिबान की अंतरिम सरकार का गठन करने के लिए आईएसआई प्रमुख को काबुल भेजने में कोताही नहीं बरती।वहीं भारत की कूटनीति आदर्शवादी दृष्टिकोण के अंतहीन मार्ग पर चल पड़ी है जहां देश के सामरिक हित गहरे संकट में पड़ते जा रहे है। चीन के अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भारत की विदेश नीति के अनुदार निर्णयों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए भारत की स्थिति को शर्मनाक बताया है।


दरअसल अफगानिस्तान भार की सामरिक सुरक्षा के लिए अतिमहत्वपूर्ण देश रहा है। पाकिस्तान विरोधी भावनाएं अफगानों में बड़े पैमाने पर रही है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद भी वहां पाकिस्तान विरोधी  प्रदर्शन इस हकीकत को बयां कर रहे है।भारत अफगानिस्तान में मजबूत रहकर पाकिस्तान पर दबाव बनाने में लगातार कामयाब रहा था।पिछले बीस सालों में भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब 500 छोटी-बड़ी परियोजनाओं में निवेश किया है जिनमें,स्कूल, अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र,बच्चों के होस्टल और पुल शामिल हैं।यहां तक कि भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में गणतंत्र की निशानी के तौर पर खड़ा संसद भवन,सलमा बांध और ज़रांज-देलाराम हाइवे में भी भारी निवेश किया है।भारत करोड़ों रुपये निवेश कर ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास का काम कर रहा है जिसे जोड़ने वाली सड़क अफ़ग़ानिस्तान से होकर जाती है।भारत ने अफगानिस्तान में करीब 22 हजार करोड़ का निवेश किया है और अब यह सारी परियोजनाएं अब अधर में पड़ गई है।2017 में क़ाबुल और दिल्ली के बीच हवाई रास्ते से माल ढुलाई के सीधे कॉरिडोर की शुरुआत हो गई  थी वहीं चाबहार बन्दरगाह से ईरान के रास्ते भारत-अफगानिस्तान का व्यापार शुरू हो गया था। भौगोलिक रूप से  भारत-अफगानिस्तान और ईरान से पाकिस्तान घिरा हुआ है। भारत,अफगानिस्तान और ईरान सामूहिक मोर्चाबंदी करके पाकिस्तान पर दबाव बना सकने की स्थिति में है। 


यह देखने में आया है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अफगानिस्तान के सामरिक महत्व को समझते हुए भी तालिबान को लेकर रुको और देखो की नीति को अपनाया और यह नीति अब भारत  की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है।अफगानिस्तान को लेकर एक दशक पहले बराक ओबामा ने साफ कर दिया था कि अमेरिका की सेनाएं अफगानिस्तान को छोड़ दे इस नीति पर आगे बढ़ा जा रहा है। बाद में ट्रम्प ने तालिबान के नेताओं से बात करने से गुरेज नहीं कियाऔर अंततः बाइडेन ने दोहा समझौते की आड़ लेकर अफगानिस्तान को छोड़ दिया। इस एक दशक में अफगानिस्तान के राजनीतिक भविष्य के अनुसार चीन,रूस,ईरान,पाकिस्तान और कतर ने अपनी विदेश नीति को यथार्थवादी नीति के अनुसार ढालकर अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित कर लिया। लेकिन इस दौरान भारत की अफगान नीति अदूरदर्शिता और अपरिपक्वता से भरी रही।


अफगानिस्तान की समस्या को लेकर रूस,चीन और कतर जैसे देशों ने शिखर सम्मेलन आयोजित किए और उन्होंने पाकिस्तान के दबाव में जानबूझकर भारत की अनदेखी की।अफगानिस्तान की लोकतान्त्रिक गनी सरकार और वहां के लोगों से मित्रतापूर्ण संबंध होने के बाद भी भारत ने ऐसे किसी शिखर सम्मेलन के आयोजन में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाई जिससे पाकिस्तान और तालिबान पर दबाव बनाया जा सके।इस दौरान भारत की नीति अमेरिका पर अतिविश्वास के रूप में सामने आई। भारत की इस नीति से भारत का परम्परागत मित्र रूस यथार्थवादी हितों के सहारे पाकिस्तान और चीन के खेमे में चला गया।रूस का समर्थन भारत की क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए अनिवार्य माना जाता है,लेकिन अब उसका रुख भारतीय हितों के प्रतिकूल दिखाई पड़ रहा है।


अफगानिस्तान में दो दशक पहले भी तालिबान की सरकार काबिज हुई थी लेकिन उस समय तालिबान विरोधी नार्दन अलायंस को भारत का समर्थन बना रहा।यही कारण है कि तालिबान कभी अफगानिस्तान में मजबूत नही हो सका था।इस समय पंजशीर घाटी में भारत समर्थित मोर्चा तालिबान का प्रतिरोध कर रहा है। भारत की नीति में तालिबान को लेकर इतना संशय है कि भारत समर्थित शक्तियाँ बिना वैदेशिक मदद के कमजोर पडती जा रही है और यह स्थिति भारत के लिए बड़ा झटका है।


पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करते हुए भारत ने तालिबान की आलोचना करने और उसे आतंकवादी समूह कहने से परहेज किया था।इसका जवाब तालिबान ने भारत को दिया।तालिबान की अंतरिम सरकार का गठन किया गया तो इस मौके पर तुर्की,चीन,रूस,ईरान,पाकिस्तान और क़तर को तालिबान की सरकार ने आमंत्रित किया,जबकि भारत  को नजरअंदाज कर दिया गया।


पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद की काबुल की यात्रामें तालिबान के कमांडरों और नेताओं से मुलाक़ात के बाद तालिबान की सरकार का गठन भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है।तालिबान की नयी केबिनेट में पाकिस्तान की आतंक को प्रश्रय देने वाली यूनिवर्सिटी जामिया दारुल उलूम हक़्क़ानिया से पढ़ने वाले अधिकांश सदस्य शामिल है। तालिबान की कमान अधिकांश उन कुख्यात आतंकियों के हाथों में है जिनकी शिक्षा दीक्षा पाकिस्तान के उन मदरसों में हुई है जो भारत विरोध का प्रमुख केंद्र रहे है। तालिबान प्रशासित अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंदधार्मिक कट्टरपंथी माने जाते है।कट्टरपंथ और जिहाद से अभिशिप्त दक्षिण एशिया में अस्थिर देश अफगानिस्तान में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलने से भारत अप्रभावित नहीं रह सकता।मुल्ला अखुंद ने 2001 में बामियान में बुद्ध की मूर्तियाँ तुड़वाई थीं।उनकी अगुवाई में तालिबान की सरकार भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश के लिए कितनी समस्या बढ़ा सकती है,इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता।अफगानिस्तान के गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्क़ानी को बनाया गया है।इनका  हक्कानी नेटवर्क कुख्यात चरमपंथी समूह माना जाता है जिसे अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास,मुम्बई छब्बीस ग्यारह समेत कई आतंकी हमलों का जिम्मेदार माना जाता है। हक्कानी समूह के आईएसआई और आईएस से गहरे संबंध रहे है।


राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्धारण और उसकी सफलता के कुछ विशिष्ट आधार होते है जिनमें भू राजनैतिक और भू सामरिक नीति बेहद महत्वपूर्ण है।  अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने से भारत विरोधी शक्तियाँ लामबंद होती दिखाई दे रही है। इससे साफ है कि भारत के लिए चुनौती बढ़ गई है।  जाहिर है शक्ति संतुलन,राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक हितों की रक्षा तथा तालिबान पर दबाव बनाएं रखने के लिए अफगानिस्तान में भारत समर्थक शक्तियों का मजबूर रहना जरूरी है।उन्हें पूर्व की भारत की नीति की तरह आर्थिक,सामरिक और राजनीतिक समर्थन मिलता रहना चाहिए।

 

 

 

china aukus janstta

 

जनसत्ता

                                                                     


शक्ति संतुलन और सामूहिक सुरक्षा की मान्यताएं सैन्य प्रतिरोध के सिद्धांत पर आधारित है,इसमें शांति की स्थापना के लिए युद्द की आवश्यकताओं को भी स्वीकार किया जाता है। चीन की सामरिक,आर्थिक और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और आक्रामक व्यवहार ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में युद्द की आशंकाओं को बढ़ा दिया हैअब इस क्षेत्र के ऐसे देश भी परमाणु जखीरा और अत्याधुनिक हथियार बढ़ाने को मजबूर हो गए है,जो अमूमन शांत समझे जाते थे


दरअसल अमेरिका,ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक रक्षा समझौता हुआ है जिसे ऑकस नाम दिया गया हैइस रक्षा समझौते के अनुसार अमेरिका अपनी  पनडुब्बी तकनीक ऑस्ट्रेलिया से साझा कर रहा है इसका अर्थ साफ है कि  ऑस्ट्रेलिया की रॉयल नौसेना दुनिया की उन चुनिंदा सैन्य शक्तियों की बराबरी में खड़ी होगी जो परमाणु आयुध से सुसज्जित मानी जाती है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि कई दशकों पहले अमेरिका ने यह तकनीक ब्रिटेन से साझा की थी,अब ऑस्ट्रेलिया उसका नया साझीदार बन गया है ऑस्ट्रेलिया  को लेकर अमेरिका का बढ़ता सैन्य सहयोग किसी सैन्य समझौते से बढकर इस समूचे क्षेत्र के लिए बेहद दूरगामी कदम नजर आता है


यह देखा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया चीन को लेकर बहुत मुखरता से सामने आया  हैचीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने राष्ट्रीय हितों पर चीन को चुनौती देने से परहेज भी नहीं किया है। इसकी शुरुआत 2018 में हुई जब ऑस्ट्रेलिया दुनिया का ऐसा पहला देश बन गया जिसने चीनी कंपनी ख़्वावे के 5 जी नेटवर्क पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद  कोविड-19 को लेकर भी ऑस्ट्रेलिया ने विश्व समुदाय से यह मांग कर डाली की वह इसके उत्पन्न होने को लेकर चीन की भूमिका की जांच पड़ताल करें। चीन ने जब ऑस्ट्रेलिया पर दबाव बनाने की कोशिश की तो ऑस्ट्रेलिया ने पलटवार करते हुए न केवल चीन में रहने वाले वीगर मुसलमानों पर अत्याचारों को लेकर उसकी कड़ी आलोचना की बल्कि उसकी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना से जुड़े दो समझौते भी रद्द कर दिए ऑस्ट्रेलिया क्वाड का भी सदस्य है,इस संगठन को चीन विरोधी माना जाता है


ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच बढ़ते विवाद के पीछे अमेरिका और इन दोनों देशों के एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आपसी हित रहे है ऑस्ट्रेलिया सबसे छोटा महाद्वीप है। यह दक्षिणी गोलार्ध में स्थित है तथा उत्तर तथा पूर्व में प्रशान्त महासागर द्वारा और पश्चिम तथा दक्षिण में हिन्द महासागर द्वारा घिरा हुआ है। ऑस्ट्रेलिया और चीन आपस में समुद्री सीमाएँ साझा करते हैंऑस्ट्रेलिया दक्षिण चीन सागर में चीन की दादागिरी से चिंतित रहा है और उसे लगता है कि अगर हिंद- प्रशांत क्षेत्र में चीन की पनडुब्बी सामरिक दबाव डालने के लिए घूम सकती है तो निश्चित ही यह भविष्य में पश्चिमी-प्रशांत क्षेत्र में भी आ सकती हैऑकस समझौते के बाद ऑस्ट्रेलिया अब परमाणु-संचालित पनडुब्बियों का निर्माण करने में सक्षम होगा जो कि पारंपरिक रूप से संचालित पनडुब्बियों के बेड़े की तुलना में कहीं अधिक तेज़ और मारक होंगीये ख़ास पनडुब्बियां महीनों तक पानी के भीतर रह सकती हैं और लंबी दूरी तक मिसाइल दाग सकती हैं


ऑस्ट्रेलिया में पनडुब्बियों का होना दक्षिणी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभाव को बढ़ाने में सहायक होगापिछले एक दशक  में अमेरिका ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन का सामना करना के उद्देश्य से कई कदम उठाएं है जिसमें क्वाड के बाद ऑकस बेहद खास माना जा रहा है। यह विशुद्ध सैन्य समझौता है जिसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस,क्वांटम टेक्नोलॉजी और साइबर साझेदारी भी शामिल है

क्वाड के देशों के आपसी हितों के इतर अमेरिका के हालिया रुख को बेहद आक्रामक माना जा रहा  है। इसका खास कारण यह भी है कि क्वाड के जापान और भारत जैसे देश चीन के खिलाफ उस मुखरता से सामने नहीं आएं  जैसे तेवर ऑस्ट्रेलिया ने दिखाएँ है। भारत की अपनी क्षेत्रीय और सामरिक मजबूरियां रही है। वह अमेरिका से मजबूत संबंध तो चाहता है लेकिन रूस और ईरान जैसे धुर अमेरिकी विरोधी देशों से सम्बन्धों को सामान्य किए हुए है। वहीं जापान अपने आर्थिक हितों को लेकर ज्यादा प्रतिबद्द नजर आता है जिसमें उसकी चीन से आर्थिक साझेदारी शामिल है। जाहिर है अमेरिका के लिए इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया जैसा देश सबसे खास बन गया है जो चीन को लेकर लगातार आक्रामक व्यवहार अपना रहा है।


ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन यह  ऐलान भी कर चूके है कि वो अगले 10 साल में सेना के बजट में 40 फ़ीसदी की वृद्धि करके इसे 270 अरब ऑस्ट्रेलियन डॉलर करेंगेइसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया अमरीकी नौसेना से लंबी दूरी की 200 जहाज़रोधी मिसाइलें खरीदने और हाइपरसोनिक हथियार सिस्टम मिसाइल विकसित करने पर काम कर रहा है,ये मिसाइलें भी हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय कर सकती हैंसाइबर वॉरफ़ेयर के लिए ऑस्ट्रेलिया 15 अरब ऑस्ट्रेलियन डॉलर ख़र्च कर रहा हैमाना जाता है कि ऑस्ट्रेलियाई संस्थानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर चीनी साइबर अटैक का ख़तरा है,जिससे निपटने के लिए यह अभूतपूर्व कदम उठाएं जा रहे है


अमेरिका की नजर हिन्द प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक और आर्थिक महत्व पर भी है। इस क्षेत्र में चीन ने कई देशों को चुनौती देकर विवादों को बढ़ाया है। चीन वन बेल्ट वन रोड परियोजना को साकार कर दुनिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और उसके केंद्र में हिन्द प्रशांत क्षेत्र की अहम भागीदारी है। चीन पाकिस्तान की बढ़ती साझेदारी ने भी समस्याओं को बढ़ाया है चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का प्रमुख भागीदार है। श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट,बांग्लादेश का चिटगाँव पोर्ट,म्यांमार की सितवे परियोजना समेत मालद्वीप के कई निर्जन द्वीपों को चीनी कब्ज़े से भारत की सामरिक और समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ गई है हिन्द प्रशांत क्षेत्र में 38 देश शामिल हैं,जो विश्व के सतह क्षेत्र का 44 फीसदी,विश्व की कुल आबादी का 65 फीसदी,विश्व की कुल  जीडीपी का 62 फीसदी तथा विश्व के माल व्यापार का 46 फीसदी योगदान देता है।  वर्तमान में विश्व व्यापार की 75 फीसदी वस्तुओं का आयात-निर्यात इसी क्षेत्र से होता है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े हुए बंदरगाह विश्व के सर्वाधिक व्यस्त बंदरगाहों में शामिल हैं। इसके अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र दक्षिण चीन सागर आता है। दक्षिण चीन सागर का इलाक़ा हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच है और चीन,ताइवान,वियतनाम,मलेशिया,इंडोनेशिया,ब्रुनेई और फिलीपींस से घिरा हुआ है। यहाँ आसियान के कई  देशों के साथ चीन विवाद चलता रहता है। किन्तु चीन पर आर्थिक निर्भरता के चलते अधिकांश देश चीन को चुनौती देने में नाकामयाब रहे है चीन आसियान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और आसियान देश किसी भी स्थिति में उसे दरकिनार नहीं कर सकते

वहीं भारत की चीन को लेकर चिंताएं किसी से छुपी नहीं है भारतीय नौसेना में इस समय एकमात्र आईएनएस अरिहंत परमाणु पनडुब्बी ही कार्यरत है। इससे पहले रूस से लीज पर ली गई आईएनएस चक्र परमाणु पनडुब्बी भारतीय समुद्री क्षेत्र की रखवाली करती थी। अभी तक भारत समुद्री सुरक्षा को लेकर काफी हद तक रूस पर निर्भर रहा है। वहीं 2007 में स्थापित क्वाड भारत, जापान,संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का समूह है जो स्वतंत्र,खुले और समृद्धहिंद-प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित करने की बात कहते रहे हैहालांकि इन चार देशों के साझा उद्देश्य को लेकर चीन के साथ रूस इसकी आलोचना करता रहा है।


चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के दौर में चीन के रक्षा बजट में अप्रत्याशित वृद्धि हुई  है,चीन ने बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए भी काफी निवेश किया है। चीन को रोकने के लिए अमेरिका प्रतिबद्द नजर आता है और उसकी अन्य सहयोगियों से भी अपेक्षाएं बढ़ गई है। अमेरिका,ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच ऑकस के आकार लेने के बाद क्वाड के बाकी सहयोगी देशों जापान और भारत पर सैन्य समझौते को लेकर दबाव बढ़ेगा। बाइडन प्रशासन यह स्वीकार कर चूका है कि चीन ही आर्थिक,राजनयिक, सैन्य और तकनीकी दृष्टिकोण से उसका संभावित प्रतिद्वंद्वी है जो स्थिर और खुली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की निरंतर चुनौती से पार पाने में सक्षम है नाटो भी चीन को सामूहिक सुरक्षा के लिए चुनौती बता कर अमेरिका की चीन के प्रति आक्रामक और नियंत्रणकारी नीति को अपना पूर्ण समर्थन देने  की घोषणा कर चूका है


सामूहिक सुरक्षा की स्पष्ट अवधारणा है कि विश्व में युद्द को समाप्त नहीं किया जा सकता,बल्कि शक्ति पर नियंत्रण रखने की कोशिश की जा सकती है,जो युद्द का मूल कारण है  पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो पहले ही कह चूके है कि चीन से भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया में बढ़ते ख़तरों को देखते हुए अमरीका ने यूरोप से अपनी सेना की संख्या कम करने का फ़ैसला किया है। जाहिर है ऑस्ट्रेलिया के बाद अमेरिका की अपेक्षाएं भारत से होगी। हिन्द महासागर से भारत के बड़े सामरिक और आर्थिक हित जुड़े हुए है  इस क्षेत्र  का बड़ा वैश्विक महत्व है और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है बाइडन के पहले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा की एशिया-प्रशांत केंद्रित नीति के केंद्र में भारत रहा था अब पूरी संभावना है की भारत भी अपनी समुदी सीमा को मजबूत करने के लिए ऑकस जैसे समझौते को लेकर आगे बढ़ सकता हैभारत के लिए नौसेना को अत्याधुनिक बनाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हिंद- प्रशांत क्षेत्र में चीन की पनडुब्बी घूमती रहती है तथा चीन ने स्ट्रिंग ऑफ पर्ल की नीति के जरिए भारत को घेर लिया है

 

 

 

 

 

मत चुको चौहान...! shivraj singh chouhan,mat chuko chouahn politics

 पॉलिटिक्स

                 


             

शिवराजसिंह चौहान को अब तक के राजनीतिक जीवन में केवल एक बार हार का सामना करना पड़ा है 2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने चौहान को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सामने  राघोगढ़ से खड़ा किया थातब भाजपा ने उमा भारती को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था इस चुनाव में शिवराजसिंह चौहान को हार का सामना करना पड़ाहालांकि शिवराजसिंह चौहान को भी पता था कि राघोगढ़ से दिग्विजय सिंह को हराना संभव नहीं है,लेकिन उन्होंने पार्टी की बात मानी थीवह दौर अटल आडवाणी का था,जिन पर शिवराजसिंह का अटूट भरोसा था। लेकिन अब दौर बदल गया है,जोड़ियाँ बदल गई है,हसरतें और ख्वाइश भी बदल गई है तथा दौर-ए-जज्बात भी जुदा नजर आते है।


अटल आडवाणी के बारे में कहा जाता था कि वे सत्ता और शक्ति की अपेक्षा  विचार और विश्वास की राजनीति करते थे,लेकिन अब वह राजनीति पीछे छूट गई हैगुजरात को ही देखिये,विधानसभा चुनाव के पहले कुछ बदलने की चाहत में सब कुछ बदल डालामुख्यमंत्री के साथ पूरी केबिनेट को ही बदल दियाबदले तो कर्नाटक में येदुरप्पा भी और यही हाल उत्तराखंड का भी हुआ। वास्तव में भारतीय राजनीति के मैदान में यह मोदी-शाह का दौर है जहां प्यादों पर अप्रत्याशित दांव लगाया जाता है और उनका भविष्य पूरे आत्मविश्वास के साथ तय किया जाता हैइस साल जब मोदी केबिनेट का विस्तार हुआ तो दिग्गज नेता रविशंकर प्रसाद,प्रकाश जावड़ेकर,हर्षवर्धन और संतोष गंगवार को बाहर का रास्ता दिखा दिया गयाये नेता अटल-आडवाणी युग के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते थे लेकिन मोदी शाह ने यह भी कर दिखाया। मोदी-शाह की जोड़ी ने राजनीतिक जमीन पर लगातार सफलताएँ अर्जित की है। ऐसे में वे अन्य नेताओं पर पूरी तरह से हावी हो गए है और उनकी चुनाव जिताऊ भूमिका के चलते कोई विरोध की आवाज भी सुनाई नहीं देती।

 


 

आडवाणी की पहली पसंद शिवराज

जब भाजपा शासित प्रदेशों में बदलाव के नित नए प्रयोग हो रहे हो वहां शिवराज सिंह चौहान किसी के जेहन में न हो यह भी नहीं हो सकतादिल्ली  के तख्तोताज पर शिवराज सिंह का दावा किसी से कम नहीं रहामोदी युग की शुरुआत ही शिवराजसिंह चौहान से आशंकित रही थी1 जून 2013 को भाजपा के पितृ पुरुष समझे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी ने पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में शिवराज की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से की थी। उन्होंने कहा था कि अनेक सफलताओं के बाद भी चौहान में अहंकार नहीं है और वे  बाजपेयी जैसे विनम्र है। जाहिर है आडवाणी की इस बात को मोदी की उग्र छवि से जोड़कर देखा गया था


 

जनआशीर्वाद यात्रा में शिवराज की चुनौती 

जुलाई 2013 में उज्जैन में जन आशीर्वाद यात्रा की भरपूर तैयारियां की गई थी। यह वह दौर था जब मोदी को भारतीय जनता पार्टी का मुख्य चेहरा बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा था। लेकिन मध्यप्रदेश में ऐसा कुछ नहीं था। जनआशीर्वाद यात्रा में  उज्जैन पोस्टर बैनर से पटा पड़ा थाइन पोस्टरों में अटल बिहारी वाजपेयी,लालकृष्ण आडवाणी,सुषमा स्वराज,राजनाथ सिंह, नरेंद्र सिंह तोमर व मुख्यमंत्री चौहान के अलावा स्थानीय नेताओं की तस्वीर भी थी लेकिन मोदी नदारद थे शिवराज की यह चुनौती राजनीतिक संदेश देने के लिए काफी थी।

 


जब सुषमा स्वराज को विदिशा में प्रधानमंत्री भव: का आशीर्वाद मिला

2014 में देश में जब अबकी बार मोदी सरकार का नारा गूंज रहा था तब विदिशा से चुनाव लड़ने वाली सुषमा स्वराज को वहां के दुर्गा मन्दिर से प्रधानमंत्री भव: का आशीर्वाद मिलना महज संयोग नहीं था दरअसल  चौहान दंपती की मौजूदगी में सुषमा स्वराज ने नामांकन  भरा था और उसके बाद वे विदिशा के विख्यात दुर्गा मंदिर पहुंची थी जहां उन्हें पुजारी ने उन्हें प्रधानमंत्री भव: का आशीर्वाद दिया था  सुषमा स्वराज को बहन मानकर सम्मान करने वाले शिवराजसिंह चौहान के कई दांव उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को धराशाई करते रहे है. मध्यप्रदेश की धरती से प्रधानमंत्री पद के लिए सुषमा स्वराज का नाम सामने आने के गहरे संदेश माने गए थे

 


कांग्रेस की गुटीय राजनीति शिवराजसिंह के लिए संजीवनी बनी

कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को कांग्रेस दिल्ली में बड़ी जिम्मेदारी देना चाहती है। लेकिन कमलनाथ शिबराज सिंह चौहान से दो दो हाथ करने के मूड में है,वे दिल्ली जाना नहीं चाहते। वहीं शिवराजसिंह चौहान और दिल्ली का गहरा नाता है। यह बात और है की दिल्ली से शिवराजसिंह चौहान को दूर रखने की कोशिशें कम नहीं हुई है। 2018 के बाद शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश की फिर से सत्ता संयोग और प्रयोग से मिल गई। कांग्रेस में अलग-अलग गुट और आपसी मतभेद के कारण भी शिवराज सिंह चौहान के लिए चुनाव जीतना आसान रहा है। दल बदलुओं के बूते 2019 में शिवराज सिंह फिर से प्रदेश के मुखिया बन गएलेकिन 2023 का सफर उनके लिए आसान नहीं हैकांग्रेस अब पलटवार करने की तैयारी में है वहीं शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में यदि सरकार बन गई तो दिल्ली में उनका कद बढ़ जायेगा दिल्ली में उनका बढ़ा हुआ कद भाजपा के कथित दिग्गजों की नींद उड़ा सकता है


मोदी स्टाइल के मुकाबले शिवराज स्टाइल

मोदी स्टाइल की राजनीति का साफ़ फलसफा है कि जिसके पास शक्ति है वह दूसरों को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की क्षमता रखता हैलेकिन शिवराज स्टाइल भी कम नहींशिवराज के लिए राजनीति म्यान में ढकी हुई तलवार है जो जरूरत पड़ने पर बाहर निकाली जा सकती हैराजनीति के मैदान में मोदी भी है और शिवराज भीख़ामोशी दोनों तरफ है लेकिन संदेश छुपे हुए भी नहीं है

शिवराज सिंह चौहान का गांव जैत होशंगाबाद के पास नर्मदा नदी के तट पर है गांव वाले बताते हैं कि चौहान आते हैं तो नहाने के लिए कपड़े खोल नर्मदा में छलांग लगा देते हैं और तैरते हुए नदी के दूसरे छोर पर चले जाते हैं। अपने राजनीतिक जीवन में शिवराज सिंह चौहान ने विपक्ष में रहने के बाद सत्ता का दूसरा छोर बखूबी हासिल किया है। इस समय शिवराज सिंह चौहान अपने बूते प्रदेश की राजनीति में ताल ठोंकते नजर आ रहे है वहीं मोदी-शाह की जोड़ी बदलाव के प्रयोग से सत्ता पर अपना दावा मजबूत करना चाहती है. उनकी इस कवायद में कई वरिष्ठ घर बिठा दिए गए है और  जो कुछ बचे है वह भी आशंकित रहने लगे है


मध्यप्रदेश की राजनीति पर मोदी शाह की जोड़ी का प्रयोग क्या असर दिखाता है,यह देखना दिलचस्प होगा। मुकाबले में शिवराजसिंह चौहान के बने रहने की कूबत के उनके राजनीतिक विरोधी भी मुरीद रहे है जाहिर है मध्यप्रदेश में मोदी शाह के प्रयोग और बदलाव की राजनीति शिवराजसिंह चौहान होने दे,यह मुमकिन नजर नहीं आता। वहीं घने बादल हर बार बिना बारिश के छंट जाएं,यह भी जरूरी तो नहीं है।

 

तालिबान की महबूबा...! politics taliban mahbuba mufti

 पॉलिटिक्स




  


अफगानिस्तान में तालिबान की आतंक की सत्ता के पक्ष में लामबंद होने वालों में महबूबा मुफ़्ती भी शुमार हो गई हैउन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान के हालिया कब्जे की मिसाल देते हुए भारत सरकार को ताकीद किया है कि वह कश्मीरियों के सब्र का और इम्तिहान न ले और अमेरिका से सबक सीखे कि उसे कैसे अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भागना पड़ा। इसके पहले उन्होंने कुलगाम में एक जन सभा में कहा था कि  जैसी हालत अमेरिका की अफगानिस्तान में हुई वैसी ही कश्मीर में भारतीय सेना की होगी


दरअसल कश्मीर में चरमपंथ को सामाजिक स्वीकार्यता के साथ राजनीतिक समर्थन देने का काम महबूबा मुफ़्ती कई सालों से करती रही है। वह राजनीतिक सभाओं में राजनीतिक कैदियों को रिहा करने,सभी उग्रवादियों से वार्ता करने और आतंकवादियों के लिए कहर बने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को बंद करने की वकालत करती रही है। अपने स्वायत्तता प्रेम के कारण घाटी के अलगाववादियों एकमात्र पसंद महबूबा ही मानी जाती हैआतंक के खास केंद्र दक्षिणी कश्मीर में उनकी पार्टी पीडीपी का सिक्का चलता है

 


आतंकी गठजोड़  पर महबूबा की चुप्पी

 

पाकिस्तान,आईएसआई,तालिबान और कश्मीर में आतंकवाद का गहरा संबंध रहा है। पाकिस्तान के मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और गुलाम कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। 1993 पाकिस्तान  में बने और कश्मीर में काम करने वाले आतंकी संगठन हरकत-उल अंसार का मुख्यालय मुजफ्फराबाद में है। इसके साथ की इसका एक केंद्र अफगानिस्तान के खोस्त में है। यह कश्मीर के अलावा बोस्निया और म्यांमार में भी सक्रिय है। कश्मीर के एक और कुख्यात आतंकी संगठन हरकत उल मुजाहिदीन का मुख्यालय पाकिस्तान के सेहसाणा में है। करगिल युद्ध में पाक सेना के साथ इस आतंकी संगठन के आतंकी भी शामिल थे। हिजबुल मुजाहिदीन का केंद्र मुजफ्फराबाद में है।


 

कंधार कांड में तालिबान की भूमिका

 

24 दिसम्बर 1999 में काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करके कंधार ले जाया गया था। उस दौर में भी अफगानिस्तान में तालिबान की हुकुमत थी।  31 दिसंबर 1999 को सरकार और अपहरणकर्ताओं के बीच समझौते के बाद दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए सभी 155 बंधकों को रिहा कर दिया गया। इस समझौते के अनुसार तत्कालीन वाजपेयी सरकार भारतीय जेलों में बंद कुछ चरमपंथियों को रिहा करने के लिए तैयार हो गई। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह ख़ुद तीन चरमपंथियों अपने साथ कंधार ले गए थे। छोड़े गए चरमपंथियों में जैश-ए -मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर, अहमद ज़रगर और शेख अहमद उमर सईद शामिल थे।


 

पाक-अफगान आतंकी संगठनों का कभी विरोध नहीं करती महबूबा

 

पाकिस्तान का सबसे प्रभावी संगठन है जमात-उद दावा वल इरशाद। इसकी गतिविधियाँ मुख्य रूप से दो क्षेत्रों पर केंद्रित होती है शिक्षा और जिहाद.इस्लाम की स्वच्छ और शुद्ध छवि के प्रचार के नाम पर पाकिस्तान में यह कई स्कूलों का संचालन करता है। लश्कर-ए तैयबा इसकी अति प्रशिक्षित आतंकवादियों की शाखा है जो आमिर के आदेश पर युद्ध में जाने को हमेशा तैयार रहते है। इस संगठन का प्रमुख मुम्बई हमलें का मास्टर माईंड प्रोफेसर हाफिज सईद है जो अपनी तकरीरों में यह कहता है कि अल्लाह ने यह आदेश दिया है कि पूरी दुनिया में इस्लामिक कानून लागू किया जाए। इस संगठन का नारा है जम्हूरियत का जवाब,ग्रेनेड और ब्लास्ट.मुरीदके दावा का मुख्यालय होने के साथ साथ कश्मीर,बोस्निया,चेचन्या और फिलिपींस में जाने वाले आतंकवादियों का प्रशिक्षण केंद्र भी है,जहां मुस्लिम अलगाववादी आन्दोलन बड़े पैमाने पर चल रहे है।  आतंकी संगठनों को लेकर महबूबा आमतौर पर खामोश रहती है।


 

 

आतंकी बुरहान वानी को शहीद कहा

 

भारत के सुरक्षाबलों की कार्रवाइयों में मारे जाने वाले कई आतंकियों को महबूबा मुफ़्ती  अनेक सभाओं में शहीद बताती रही है। महबूबा मुफ्ती ने 2016 में मार गिराये हिज्बुल मुजाहिदीन के पोस्टर ब्वॉय बुरहान वानी को शहीद भी करार दे चुकी है । दो साल पहले जब वह अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुण्यतिथि पर बिजबिहाड़ा गई थीं। यहां उन्होंने फातिहा पढ़ने के बाद कहा था कि बुरहान के मारे जाने के बाद भड़की हिंसा में कई लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसके लिए वह लोगों से माफी मांगती हैं।

 


अफगानी मुजाहिदों के कश्मीर कनेक्शन को बेनजीर भुट्टों ने स्वीकार किया था

 

भारत के कश्मीर में आतंकवाद फ़ैलाने के पाकिस्तान पर लगने वाले आरोपों को उन्होंने बाद में उन्होंने साफगोई से स्वीकार कर लिया। बेनजीर भुट्टों ने अपनी जीवनी में लिखा है,मेरे पास 1990 में आईएसआई के दफ्तर से यह संदेश आया कि अरब,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के एक लाख से ज्यादा मुजाहिदीन इस बात के लिये तैयार है कि वह कश्मीर में घुसकर कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई में मदद करें। वह सारे बहादुर और प्रशिक्षित है और हिंदुस्तान की फौजों से बड़ी आसानी से लोहा ले सकते है।


 

महबूबा मुफ़्ती की बहन  के अपहरण की साजिश से शुरू हुआ था आतंक

इस खूबसूरत वादी को टूरिज्म से टेरेरिज्म की ओर धकेलने की गहरी साजिशों को परवान चढ़ाने में महबूबा मुफ़्ती का परिवार खास जिम्मेदार माना जाता है। घाटी में अलगाव को 1980 के दशक के शुरूआती दौर में महसूस किया जाने लगा था लेकिन इसे आतंक की शक्ल देने का काम किया रुबिया सैयद अपहरण कांड ने। भारत के तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद आठ दिसंबर 1989 को श्रीनगर के मशहूर ललदेन अस्पताल से बाहर निकलकर एक मिनी बस में सवार होती हैइस दिन उसकी सुरक्षा में किसी को भी नहीं रखा गया थाएक सुनसान इलाके से रुबिया सईद का आतंकियों द्वारा अपहरण कर लिया जाता हैइसके बाद अपनी बेटी को बचाने की एवज में तत्कालीन गृहमंत्री पांच दुर्दांत आतंकियों को छोड़ देते हैरुबिया की पांच दिनों बाद घर वापसी हो जाती है लेकिन कश्मीर जल उठता है और वह आग तीन दशक बाद भी बदस्तूर जारी हैरुबिया सईद के अपहरण की इस घटना के बाद ही कश्मीर में आतंकी वैखौफ हत्याएं और अपहरण करने लगते है और घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन भी यहीं से शुरू हुआ था

 


गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की आतंकियों से सांठगांठ

 

इसकी पुष्टि कश्मीर के एक अलगाववादी नेता हिलाल वार ने अपनी किताब ग्रेट डिस्क्लोजरः सीक्रेट अनमास्क्डमें भी की। हिलाल ने रूबिया सईद अपहरण को लेकर एक नया खुलासा करते हुए आरोप लगाया कि यह सिर्फ एक ड्रामा था जो तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जेकेएलएफ के कमांडर यासीन मलिक के साथ मिलकर रचा था2012 में एनएसजी के पूर्व अधिकारी रहे मेजर जनरल ओपी कौशिक ने रूबिया सईद अपहरण मामले में सनसनीखेज दावा किया थाकौशिक के अनुसार  रूबिया के पिता और तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी जल्द रिहा होउन्होंने साफ किया था कि अपहरण की सूचना मिलने के पांच मिनट के भीतर ही एनएसजी की टीम ने पता लगा लिया था कि रूबिया को कहां रखा गया है,लेकिन इसके बाद भी आतंकियों पर कार्रवाई नहीं करने दी गई थी।


 

रुबिया का अपहरण या आतंकियों से मिलकर रची साजिश

इस समूचे घटनाक्रम की जब परते खुली तो इस बात की आशंका बलवती हो गई कि इस अपहरण कांड में रुबिया मददगार थी और राजनीतिक साजिश के तहत् इस घटना को अंजाम दिया गया था। अब कश्मीर तीन दशकों से आतंकवाद से जल रहा है,हजारों लोग मारे गए है,भारतीय सेना और पुलिस जवान जान पर खेल कर ड्यूटी कर रहे है,जबकि रुबिया स्वयं चेन्नई के एक अस्पताल में डाक्टर है और उसकी जिंदगी आराम से कट रही है

 


हाफिज सईद की सहयोगी महिला आतंकी आसिया अंद्राबी की प्रशंसक

 

1987 में इस्लामी नारीवादी के आधार पर कश्मीर में स्थापित अलगाववादी संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत आतंकी संगठनों का सबसे मददगार माना जाता हैअपने को राष्ट्र की बेटियां बताने वाले इस संगठन की मुखिया आसिया अंद्राबी फिलहाल जेल में है और वह कश्मीर में आतंक का ताना बाना बुनने की सबसे बड़ी रणनीतिकार मानी जाती है 2017 में जब महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री थी उस दौरान बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के प्रचार में कुख्यात आतंकी संगठन दुख्तरान-ए-मिल्‍लत की अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को जम्‍मू-कश्मीर का महिला रोल मॉडल के तौर पर पोस्टर पर जगह दी गई थीपोस्टर में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी,मदर टेरेसा,किरण बेदी,लता मंगेशकर,सानिया मिर्जा,महबूबा मुफ्ती,कल्पना चावला आदि की भी तस्वीरें लगाई गई थीसामाजिक कल्‍याण मंत्रालय के इस कार्यक्रम के दौरान मुख्‍यमंत्री महबूबा के भाई तसादुक मुफ्ती समेत दर्जनों अधिकारी और मंत्री उपस्थित थे


दुख़्तरान-ए-मिल्लत की आतंकी चालें

 

यह संगठन खुले तौर पर जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात करता हैअंद्राबी के खिलाफ पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस और पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस क्रमश: 14 अगस्त और 23 मार्च को पाकिस्तानी झंडा फहराने सहित अन्य मामले दर्ज हैंग़ौरतलब है कि आसिया अंद्राबी के ऊपर पाकिस्तान के साथ मिलकर काम करने के आरोप लगते रहे हैंवहीं उनके संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत को कश्मीर में इस्लामी कानून लागू करने और भारत से अलग राष्ट्र बनाने के लिए काम करने वाला संगठन बताया जाता हैभारत सरकार इस संगठन को आतंकवादी घोषित कर चुका हैअंद्राबी मुख्य तौर पर नौजवानों को उकसाने का काम करती हैवह बुरहान वानी और अफ़ज़ल गुरु को "ब्‍वॉयज ऑफ शहादत' यानी 'शहादत के लड़के' क़रार देती रही हैअंद्राबी ने घाटी की महिलाओं को आतंकवाद से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है इस संगठन के सम्पर्क में देश विदेश की कई लड़कियां है,जिनका माईंड वाश करके उन्हें आतंकी दलदल में धकेल दिया जाता है।

 


शिमला समझौते के बाद कश्मीर

2 जुलाई 1972 को कश्मीर के स्थायी हल का प्रयास करते हुए नियंत्रण रेखा को स्वीकार कर लिया गया था,जिसके अनुसार कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया। भारत और पाकिस्तान के फ़ील्ड कमांडरों और संयुक्तराष्ट्र प्रतिनिधि ने सीमा पर जाकर 11 दिसम्बर 1972 को इसका निर्धारण किया। दोनों देशों ने 25 नक्शों की आपस में अदला बदली की और नियंत्रण रेखा को अपनी मंजूरी देने के लिए हस्ताक्षर किये। एलओसी कश्मीर को दो एक के अनुपात में बांटती है,करीब 90 लाख की आबादी वाला पूर्व से दक्षिण तक भारतीय जम्मू कश्मीर है,जबकि तकरीबन 30 लाख की आबादी वाला पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर जो उत्तर से पश्चिम तक है,पाकिस्तान इसे आज़ाद कश्मीर कहता है।


महबूबा को राजनीतिक भविष्य की चिंता

महबूबा मुफ़्ती जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद अपने राजनीतिक  भविष्य को लेकर गहरे असमंजस में है। उनकी राजनीतिक जमीन खिसक गई है। महबूबा अनुच्छेद 370 के पक्ष में बेहद मुखर रही है और उसे पुन: बहाल करवाने के लिए वह तालिबान का सहारा लेकर कश्मीर को आतंक के जंजाल में फिर से धकेलने के कुत्सित प्रयास कर रही है।

 

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