नर्किस्तान... ! अफगानिस्तान पॉलिटिक्स afganistan mahila poltics

 

 पॉलिटिक्स

              


                                                                   

 

यहां गर्भ में बेटी का पता चल जायें तो पिता उसका सौदा तय कर देते है। मासूम बच्चियों का विवाह के नाम पर सौदा,वह भी दो या तीन गुना उम्र में बड़े पुरुष से होना यहां सामान्य बात है। टीवी, संगीत और सिनेमा हराम है। लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक है। औरतों को न पढ़ने का,न नौकरी करने का,न बाहर जाने का,ना खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार है। उन्हें पूरा शरीर ढ़ककर रखना पड़ता है। बाहर जाना भी हो तो वो परिवार के किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ ही बाहर जा सकती है। ज्यादातर समय वो अपने घरों में कैद होती है। महिलाओं को सरेआम 'इस्लामी' सज़ाएं देने के नाम पर उन्हें भरे बाज़ार में पत्थरों से मारा जाता है। 8 साल की उम्र से ही लड़कियों को बुरखे से ढंक दिया जाता है। यहां लड़की का पैदा होना गुनाह है।


दरअसल यह अफगानिस्तान का तालिबान शासन है जो इस्लामी कानूनों के नाम पर महिलाओं से क्रूरता की सीमाएं लाँघ जाते है। अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान का कब्जा होते ही महिलाओं के लिए जीवन जीना दूभर हो गया है। उत्तरी अफगानिस्तान के एक दूरस्थ इलाके में तालिबान के एक कमांडर ने सभी परिवारों से कहा कि वो विधवा और शादी की उम्र लायक लड़कियों की लिस्ट सौंपे,उनका निकाह मुजाहिदों से कराया जाएगा। हजारा बहुल इलाकों से लोगों ने तालिबान के आने की आहट पर ही अपनी जवान लड़कियों को काबुल भेज दिया है,लेकिन अब उन्हें ये डर है कि वो कब तक काबुल में रहेंगी और वहां भी कब तक सुरक्षित हैं। वास्तव में यह इस्लाम का नहीं लेकिन तालिबान का शरीयत कानून है जिसे तालिबानी मनमाने तरीके से अफगानिस्तान के लोगों पर थोप रहा है।

 


मोहम्मद साहब की पत्नी स्वयं पढ़ी लिखी थी

भारतीय सेना में धर्म शिक्षक रहे डॉ.सैयद उरूज अहमद कहते है कि इस्लाम के आदर्श मोहम्मद साहब का जीवन है। मोहम्मद साहब  की पत्नी आईशा बीबी इस्लामिक नियमों की सबसे बड़ी ज्ञाता थी और मोहम्मद साहब के गुजर जाने के बाद पांच दशक तक इस्लाम के नियमों का प्रचार प्रसार और लोगों की शंकाओं का निवारण किया था।  मोहम्मद साहब की शिक्षाओं में गैर बराबरी को खत्म कर सभी के लिए शिक्षा को अनिवार्य बताया गया है।


शरिया कानून क्या है

तालिबान इस्लाम के शरिया कानूनों का हवाला देकर महिलाओं पर अत्याचार कर रहा है लेकिन दुनिया के कई मुस्लिम देशों की राय इससे बिल्कुल जुदा है। वास्तव में शरिया कानून इस्लामिक कानूनी व्यवस्था है इसे कुरान और इस्लामी विद्वानों के फैसलों यानी फतवों को मिलाकर तैयार किया गया है। शरिया कानून के पांच अलग-अलग स्कूल हैं। जिसमें से 4 सुन्नी सिद्धांत हैं और एक शिया सिद्धांत. हनबली, मलिकी, शफी और हनफी ये चार सुन्नी सिद्धांत हैं। वहीं शिया सिद्धांत को शिया जाफरी कहा जाता है। ये पांचों सिद्धांत इस बात में एक-दूसरे से अलग हैं कि वे उन ग्रंथों की व्याख्या कैसे करते हैं, जिनसे शरिया कानून निकला है।

इस कानून का लागू होना इस बात पर पूरी तरह से निर्भर करता है कि जानकारों के गुण और उनकी शिक्षा कैसी है? तालिबानी आतंक के पाकिस्तानी मदरसों से शिक्षा प्राप्त करते है। अत: वे इस्लाम के समावेशी विचारों को नजरअंदाज कर मनमाफिक नियमों को अफगानिस्तान में लागू करते है।


शरिया लेकिन सऊदी अरब का महिलाओं के प्रति उदार चेहरा

इस साल सऊदी अरब ने नया कानून बनाते हुए महिलाओं को अकेले रहने की आजादी भी दे दीअब वे अकेली भी रह सकती है। इसके पहले देश में महिलाओं को कार चलाने की अनुमति भी दी जा चूकी है। सऊदी अरब धीरे धीरे खुद को कट्टरवादी छवि से बाहर लाने की कोशिश कर रहा है।   इसके पहले सऊदी अरब ने महिलाओं को कार चलाने की आजादी दे दी थी और अब सऊदी अरब ने नया कानून बनाते हुए महिलाओं को अकेले रहने की आजादी भी दे दी है। यानि, अब अगर सऊदी अरब की महिलाएं अकेले रहना चाहें,तो उन्हें किसी से भी इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी।


पाकिस्तान में भी शरिया लेकिन महिलाओं को कई अधिकार  

किसी मुस्लिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों थी,जो पाकिस्तान की थी। अफगानिस्तान में तालिबान ने सिनेमा,संगीत और सैलून की सभी दुकानें बंद  कर दी है। उसकी नजर में यह सब हराम है। जबकि पाकिस्तान के टीवी धारावाहिक भारत में भी देखे जाते है। वहां गायकी को बड़े सम्मान से देखा जाता है। बड़ी संख्या में लडकियां स्कूल और कॉलेज जाती है। अब पाकिस्तान में पुलिस और सुरक्षा बलों में भी महिलाओं को शामिल कर लिया गया है।


जब अफगानिस्तान के बादशाह ने महिलाओं की शिक्षा को सर्वोपरी बताया था

अमानुल्ला ख़ान ने 1919 में जब अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता संभाली तो सार्वजनिक तौर पर पर्दा,बहुविवाह प्रथा का विरोध किया और काबुल और उसके आस-पास के इलाक़ों में लड़कियों की शिक्षा पर ज़ोर दिया था। अमानुल्लाह ने एक सार्वजनिक समारोह में कहा था कि इस्लाम में महिलाओं को अपने शरीर को ढँकने और किसी ख़ास प्रकार का नक़ाब पहनने को ज़रूरी नहीं बताया गया है।

 


महारानी सोराया तार्ज़ी अफगानिस्तान की पहली शिक्षा मंत्री थी

1926 में अमानुल्ला ख़ान ने एक बयान में कहा था,'मैं भले ही जनता का राजा हूं लेकिन शिक्षा मंत्री मेरी पत्नी ही है। 'एक सार्वजनिक सभा में अमानुल्ला ने कहा था कि इस्लाम महिलाओं को अपना शरीर छुपाने या ख़ास बुर्का पहनने का आदेश नहीं देता है। अमानुल्ला का ये भाषण ख़त्म होने के बाद सोराया ने अपना नकाब हटा दिया और वहां मौजूद महिलाओं ने भी ऐसा ही किया। अमानुल्ला ख़ान ने अपने देश को ब्रितानी साम्राज्य से आजा़द कराया और 1919 में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान को आज़ाद घोषित कर दिया था।  उनका  शासन 1929 तक चला।  इस दौरान वो और रानी सोराया अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहे।

2001 में तालिबान के शासन के बाद बदली थी महिलाओं की जिंदगी

1992-1996 के दौर में मुजाहिदीन गुटों की क्रूरता जैसे हत्या,बलात्कार,अंगों को काटने और अन्य तरह की हिंसक घटनाओं की कहानियां रोज़ आती थीं। बलात्कार और जबरन विवाह से बचने के लिए लड़कियां आत्महत्याएं तक कर रही थीं। अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा तालिबान को सत्ता से बेदखल करने के बाद  2004 में  देश का नया संविधान बना था। वहां महिलाओं को समान अधिकार का प्रावधान रखा गया। महिलाओं को कई क्षेत्रों में आरक्षण दिया गया। संसद में 27 प्रतिशत आरक्षण था। औरत,अल्पसंख्यक और पिछड़ों को आगे बढ़ाने की जागरुकता भी साफ़ दिखाई देती थी। महिलाएं आगे आईं और देश का माहौल बदलने लगा था।


एक बार फिर तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया है और महिलाओं की जिंदगी नर्क बना दी गई है। जहां उनकी बेबसी,लाचारी और मजबूरियां बंद दरवाजे के पीछे कराहने की आशंका बढ़ गई है। करोड़ों महिलाओं को अंधकार में धकेलने के जिम्मेदार तालिबान का विरोध करने का सामर्थ्य किसी में नहीं और इसीलिए इस अंधकार से मुक्ति की उम्मीद भी टूटने लगी है। 

टिप्पणियाँ

महोदय आपका लेख वास्तविक को उजागर करता है। बहुत अच्छा लिखा है।
लेखिका व संपादिका
Bi-monthly (soul of words ) शब्दों की आत्मा
सुशीला रोहिला सोनीपत हरियाणा ।

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