संदेश

अगस्त, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नर्किस्तान... ! अफगानिस्तान पॉलिटिक्स afganistan mahila poltics

चित्र
    पॉलिटिक्स                                                                                      यहां गर्भ में बेटी का पता चल जायें तो पिता उसका सौदा तय कर देते है। मासूम बच्चियों का विवाह के नाम पर सौदा,वह भी दो या तीन गुना उम्र में बड़े पुरुष से होना यहां सामान्य बात है। टीवी , संगीत और सिनेमा हराम है। लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक है। औरतों को न पढ़ने का , न नौकरी करने का , न बाहर जाने का , ना खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार है। उन्हें पूरा शरीर ढ़ककर रखना पड़ता है। बाहर जाना भी हो तो वो परिवार के किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ ही बाहर जा सकती है। ज्यादातर समय वो अपने घरों में कैद होती है। महिलाओं को सरेआम ' इस्लामी ' सज़ाएं देने के नाम पर उन्हें भरे बाज़ार में पत्थरों से मारा जाता है। 8 साल की उम्र से ही लड़कियों को बुरखे से ढंक दिया जाता है। यहां लड़की का पैदा होना गुनाह है। दरअसल यह अफगानिस्तान का तालिबान शासन है जो इस्लामी कानूनों के नाम पर महिलाओं से क्रूरता की सीमाएं लाँघ जाते है। अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान का कब्जा होते ही महिलाओं के लिए जीवन जीना दूभर

विभाजन की स्मृति या सबक,bharat vibhajan ya sabak rashtriya sahara

चित्र
राष्ट्रीय सहारा मशहूर शायर फैज़ ने भारत के बंटवारें,उसकी कीमत,उसमें हुए खून खराबे और आज़ादी की पहली किरण को देखने की टूटी हसरतों का इन दर्द भरे शब्दों में इजहार किया कि,कैसी दागदार रौशनी के साथ निकली है यह सुबह, जिसमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा।जब हम इस सफर में निकले थे,हमने ऐसी सुबह की तो कल्पना नहीं की थी। हमारी कल्पनाओं की सुबह तो उस मुकाम की तरह थी जिसमें कोई आसमान की चादर पर चलते हुए जगमगाते तारों के पास पहुंच जाएँ   या जैसे की रात में समन्दर की धीमी लहरों को उसका किनारा मिल जाए। आखिर कहीं तो गम से भरे इस दिल की नैया को किनारा तो मिलेगा...। दरअसल बंटवारे का एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद लाल किले के प्राचीर से उसे स्मरण करने का सरकारी ऐलान हुआ है। खंडित भारत का दंश,उसकी विभीषिका और दो धर्मों के बीच कटुता पैदा करने की कोशिशों के परिणाम से उपजी यह त्रासदी ऐसी वीभत्स दास्तान है जो   मानवीयता को झकझोरती रही है। इस दौरान कितने लोग मारे गये,किसने कितनी पीड़ा झेली या कितने घर से बेघर हो गए,इसका कोई निश्चित आंकड़ा अब तक उपलब्ध नहीं है। लेकिन उसके दर्द को महसूस करने वाले लोगों की कमी

अफगान आतंक की नई चुनौती afgan aatank ki nayi, janstta

चित्र
    जनसत्ता                            दुर्गम पहाड़ों को चीरकर आगे बढ़ जाने की मनुष्य की जिजीविषा में दर्रों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। इन दर्रो पर भूकम्प और ज्वालामुखी की छाप तो होती ही है लेकिन ये दर्रे सैकड़ों वर्षों से व्यापार,प्रवास और युद्द के सुरक्षित मार्ग भी बन गए। यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया को जमीन से जोड़ने वाला अफगानिस्तान अपने भौगोलिक दर्रों की वजह से इतिहास में हमेशा दर्ज होता रहा है । लेकिन अब यह दर्रे कहीं दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए अभिशाप न बन जाएं,इसे लेकर आशंकाएं गहरा गई है। दरअसल अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के साथ ही आतंकवाद को सुरक्षित ठिकाना मिलने की संभावनाएं बढ़ गई है और इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते है। अफगानिस्तान पर हिंदुकुश पर्वत श्रृंखला का बड़ा प्रभाव है और यह इस क्षेत्र को तीन   भागों में बांटती है,मध्य उच्चभूमि,उत्तरी मैदान और दक्षिण-पश्चिमी पठार । उत्तरी उच्चभूमि में गहरी,संकरी घाटियां हैं । जो खास तरह के लंबे दर्रे बनाती हैं । हिंदूकुश पर्वतों के प्रमुख दर्रे खैबर,गोमल एवं बोलन हैं । ये दर्रे व्यापारियों

महात्मा गांधी ने क्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को नकार दिया था...? mahatma gandhi rashtrvad politics

चित्र
  पॉलिटिक्स महान शिक्षाविद और भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने   एक बार महात्मा गांधी से तीन सवाल पूछे,आपका धर्म क्या है ? आप कैसे इस धर्म तक पहुंचे ? और इसका आपके जीवन पर क्या परिणाम हुआ ? बापू ने इसका बेहद सहज लेकिन दिलचस्प जवाब दिया,पहले मैं कहा करता था कि मैं भगवान में विश्वास करता हूँ,अब कहता हूँ कि मैं सत्य में विश्वास करता हूँ। पहले मैं कहा करता था कि ईश्वर सत्य है,और अब मैं कहता हूँ कि सत्य ही ईश्वर है। और ऐसे लोग है जो ईश्वर को नहीं मानते है लेकिन ऐसा कोई इंसान नहीं होगा जो सत्य को नहीं मानता है,यह ऐसी बात है कि जिसे एक निरीश्वरवादी भी कबूल करता है। दरअसल महात्मा गांधी के विचारों में भारत के भविष्य को विविधता से जोड़ने की वह जिजीविषा दिखाई दी जहां निरीश्वरवादियों को भी यह विश्वास हो की यह देश उन्हीं का है। क्योंकि यहां सत्य की पूजा होती है और सत्य सभी का प्रतिनिधित्व करता है। महात्मा गांधी भारत की आज़ादी में सबका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे और विविधता और बहुलता वाले इस देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से सभी के सहयोग की कल्पना कठिन थी। गांधी का

असुरक्षा से जूझती आज़ादी asurksha aazadi rashtriya sahara

चित्र
  राष्ट्रीय सहारा हस्तक्षेप                                                                           बहुसांस्कृतिक परिवेश और बहुविविधता को अंगीकार कर उभरते हुए राष्ट्र से इस अपेक्षा थी की आज़ादी के महान मूल्यों को आत्मसात कर वह मजबूत भारत का निर्माण करेगा। जहां देश की आंतरिक सुरक्षा और स्वतंत्रता का संरक्षण,आंतरिक शांति,सामाजिक   न्याय की स्थापना और साम्प्रदायिक सद्भाव कायम होगा। लेकिन आज़ादी के बाद आठवे दशक में प्रवेश कर चूके दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां आशंकाओं से जूझने को मजबूर है तथा भाषाई,जातीय,क्षेत्रीयता और धार्मिक विभिन्नताओं की कड़ी चुनौतियां बरकरार है।   आज़ादी के साथ पूर्वोत्तर में अशांति फैली,1954 में नागालैण्ड में फिजों ने विद्रोह का झंडा उठाया जो बाद में मणिपुर,मिजोरम और त्रिपुरा में भी फ़ैल गया। पूर्वोत्तर के राज्य अभी भी क्षेत्रीय पृथकतावाद से जूझ रहे है। सामाजिक और आर्थिक असमानता हिंसा के संगठित रूप में कितनी भयावह हो सकती है,यह साठ के दशक में शुरू हुए नक्सलबाड़ी आंदोलन के   प्रभावों में देखा जा सकता है। गरीबी

भाड़े के लड़ाकों का संकट,taliban afgan rashtriya sahara

चित्र
  राष्ट्रीय सहारा                                                                                                                                                                                                                  दुनिया के हस्तक्षेप और महाशक्तियों की प्रतिद्वंदिता के चलते बदहाल अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता से आतंकवाद बेहद खतरनाक   तरीके   से दुनिया के सामने आने की आशंका गहरा गयी है। तकरीबन साढ़े छह लाख वर्ग किलोमीटर की क्षेत्रफल और लैंड लाकड कंट्री के नाम से   पहचाने जाने वाले सम्पूर्ण अफगानिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करना बेहद जरूरी है जबकि हकीकत यह है कि तालिबान मध्ययुगीन धार्मिक और तानशाही शासन को पूरे देश में स्थापित करना चाहता है। तालिबान के प्रभावी रहते अफगानिस्तान में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता ऐसे में इस देश में अस्थिरता ही बढ़ेगी। दरअसल तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है और यही कारण है की तालिबान को रोक पाना आसान नहीं है।   2011 में भी अमेरिका ने गोपनीय दस्तावेजों   में ग्वांतनामो बे के 700 कैदियों के बैकग्राउंड का हवाले का हवाला देते हुए कई सं