नर्किस्तान... ! अफगानिस्तान पॉलिटिक्स afganistan mahila poltics

 

 पॉलिटिक्स

              


                                                                   

 

यहां गर्भ में बेटी का पता चल जायें तो पिता उसका सौदा तय कर देते है। मासूम बच्चियों का विवाह के नाम पर सौदा,वह भी दो या तीन गुना उम्र में बड़े पुरुष से होना यहां सामान्य बात है। टीवी, संगीत और सिनेमा हराम है। लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक है। औरतों को न पढ़ने का,न नौकरी करने का,न बाहर जाने का,ना खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार है। उन्हें पूरा शरीर ढ़ककर रखना पड़ता है। बाहर जाना भी हो तो वो परिवार के किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ ही बाहर जा सकती है। ज्यादातर समय वो अपने घरों में कैद होती है। महिलाओं को सरेआम 'इस्लामी' सज़ाएं देने के नाम पर उन्हें भरे बाज़ार में पत्थरों से मारा जाता है। 8 साल की उम्र से ही लड़कियों को बुरखे से ढंक दिया जाता है। यहां लड़की का पैदा होना गुनाह है।


दरअसल यह अफगानिस्तान का तालिबान शासन है जो इस्लामी कानूनों के नाम पर महिलाओं से क्रूरता की सीमाएं लाँघ जाते है। अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान का कब्जा होते ही महिलाओं के लिए जीवन जीना दूभर हो गया है। उत्तरी अफगानिस्तान के एक दूरस्थ इलाके में तालिबान के एक कमांडर ने सभी परिवारों से कहा कि वो विधवा और शादी की उम्र लायक लड़कियों की लिस्ट सौंपे,उनका निकाह मुजाहिदों से कराया जाएगा। हजारा बहुल इलाकों से लोगों ने तालिबान के आने की आहट पर ही अपनी जवान लड़कियों को काबुल भेज दिया है,लेकिन अब उन्हें ये डर है कि वो कब तक काबुल में रहेंगी और वहां भी कब तक सुरक्षित हैं। वास्तव में यह इस्लाम का नहीं लेकिन तालिबान का शरीयत कानून है जिसे तालिबानी मनमाने तरीके से अफगानिस्तान के लोगों पर थोप रहा है।

 


मोहम्मद साहब की पत्नी स्वयं पढ़ी लिखी थी

भारतीय सेना में धर्म शिक्षक रहे डॉ.सैयद उरूज अहमद कहते है कि इस्लाम के आदर्श मोहम्मद साहब का जीवन है। मोहम्मद साहब  की पत्नी आईशा बीबी इस्लामिक नियमों की सबसे बड़ी ज्ञाता थी और मोहम्मद साहब के गुजर जाने के बाद पांच दशक तक इस्लाम के नियमों का प्रचार प्रसार और लोगों की शंकाओं का निवारण किया था।  मोहम्मद साहब की शिक्षाओं में गैर बराबरी को खत्म कर सभी के लिए शिक्षा को अनिवार्य बताया गया है।


शरिया कानून क्या है

तालिबान इस्लाम के शरिया कानूनों का हवाला देकर महिलाओं पर अत्याचार कर रहा है लेकिन दुनिया के कई मुस्लिम देशों की राय इससे बिल्कुल जुदा है। वास्तव में शरिया कानून इस्लामिक कानूनी व्यवस्था है इसे कुरान और इस्लामी विद्वानों के फैसलों यानी फतवों को मिलाकर तैयार किया गया है। शरिया कानून के पांच अलग-अलग स्कूल हैं। जिसमें से 4 सुन्नी सिद्धांत हैं और एक शिया सिद्धांत. हनबली, मलिकी, शफी और हनफी ये चार सुन्नी सिद्धांत हैं। वहीं शिया सिद्धांत को शिया जाफरी कहा जाता है। ये पांचों सिद्धांत इस बात में एक-दूसरे से अलग हैं कि वे उन ग्रंथों की व्याख्या कैसे करते हैं, जिनसे शरिया कानून निकला है।

इस कानून का लागू होना इस बात पर पूरी तरह से निर्भर करता है कि जानकारों के गुण और उनकी शिक्षा कैसी है? तालिबानी आतंक के पाकिस्तानी मदरसों से शिक्षा प्राप्त करते है। अत: वे इस्लाम के समावेशी विचारों को नजरअंदाज कर मनमाफिक नियमों को अफगानिस्तान में लागू करते है।


शरिया लेकिन सऊदी अरब का महिलाओं के प्रति उदार चेहरा

इस साल सऊदी अरब ने नया कानून बनाते हुए महिलाओं को अकेले रहने की आजादी भी दे दीअब वे अकेली भी रह सकती है। इसके पहले देश में महिलाओं को कार चलाने की अनुमति भी दी जा चूकी है। सऊदी अरब धीरे धीरे खुद को कट्टरवादी छवि से बाहर लाने की कोशिश कर रहा है।   इसके पहले सऊदी अरब ने महिलाओं को कार चलाने की आजादी दे दी थी और अब सऊदी अरब ने नया कानून बनाते हुए महिलाओं को अकेले रहने की आजादी भी दे दी है। यानि, अब अगर सऊदी अरब की महिलाएं अकेले रहना चाहें,तो उन्हें किसी से भी इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी।


पाकिस्तान में भी शरिया लेकिन महिलाओं को कई अधिकार  

किसी मुस्लिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों थी,जो पाकिस्तान की थी। अफगानिस्तान में तालिबान ने सिनेमा,संगीत और सैलून की सभी दुकानें बंद  कर दी है। उसकी नजर में यह सब हराम है। जबकि पाकिस्तान के टीवी धारावाहिक भारत में भी देखे जाते है। वहां गायकी को बड़े सम्मान से देखा जाता है। बड़ी संख्या में लडकियां स्कूल और कॉलेज जाती है। अब पाकिस्तान में पुलिस और सुरक्षा बलों में भी महिलाओं को शामिल कर लिया गया है।


जब अफगानिस्तान के बादशाह ने महिलाओं की शिक्षा को सर्वोपरी बताया था

अमानुल्ला ख़ान ने 1919 में जब अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता संभाली तो सार्वजनिक तौर पर पर्दा,बहुविवाह प्रथा का विरोध किया और काबुल और उसके आस-पास के इलाक़ों में लड़कियों की शिक्षा पर ज़ोर दिया था। अमानुल्लाह ने एक सार्वजनिक समारोह में कहा था कि इस्लाम में महिलाओं को अपने शरीर को ढँकने और किसी ख़ास प्रकार का नक़ाब पहनने को ज़रूरी नहीं बताया गया है।

 


महारानी सोराया तार्ज़ी अफगानिस्तान की पहली शिक्षा मंत्री थी

1926 में अमानुल्ला ख़ान ने एक बयान में कहा था,'मैं भले ही जनता का राजा हूं लेकिन शिक्षा मंत्री मेरी पत्नी ही है। 'एक सार्वजनिक सभा में अमानुल्ला ने कहा था कि इस्लाम महिलाओं को अपना शरीर छुपाने या ख़ास बुर्का पहनने का आदेश नहीं देता है। अमानुल्ला का ये भाषण ख़त्म होने के बाद सोराया ने अपना नकाब हटा दिया और वहां मौजूद महिलाओं ने भी ऐसा ही किया। अमानुल्ला ख़ान ने अपने देश को ब्रितानी साम्राज्य से आजा़द कराया और 1919 में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान को आज़ाद घोषित कर दिया था।  उनका  शासन 1929 तक चला।  इस दौरान वो और रानी सोराया अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहे।

2001 में तालिबान के शासन के बाद बदली थी महिलाओं की जिंदगी

1992-1996 के दौर में मुजाहिदीन गुटों की क्रूरता जैसे हत्या,बलात्कार,अंगों को काटने और अन्य तरह की हिंसक घटनाओं की कहानियां रोज़ आती थीं। बलात्कार और जबरन विवाह से बचने के लिए लड़कियां आत्महत्याएं तक कर रही थीं। अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा तालिबान को सत्ता से बेदखल करने के बाद  2004 में  देश का नया संविधान बना था। वहां महिलाओं को समान अधिकार का प्रावधान रखा गया। महिलाओं को कई क्षेत्रों में आरक्षण दिया गया। संसद में 27 प्रतिशत आरक्षण था। औरत,अल्पसंख्यक और पिछड़ों को आगे बढ़ाने की जागरुकता भी साफ़ दिखाई देती थी। महिलाएं आगे आईं और देश का माहौल बदलने लगा था।


एक बार फिर तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया है और महिलाओं की जिंदगी नर्क बना दी गई है। जहां उनकी बेबसी,लाचारी और मजबूरियां बंद दरवाजे के पीछे कराहने की आशंका बढ़ गई है। करोड़ों महिलाओं को अंधकार में धकेलने के जिम्मेदार तालिबान का विरोध करने का सामर्थ्य किसी में नहीं और इसीलिए इस अंधकार से मुक्ति की उम्मीद भी टूटने लगी है। 

विभाजन की स्मृति या सबक,bharat vibhajan ya sabak rashtriya sahara

राष्ट्रीय सहारा





मशहूर शायर फैज़ ने भारत के बंटवारें,उसकी कीमत,उसमें हुए खून खराबे और आज़ादी की पहली किरण को देखने की टूटी हसरतों का इन दर्द भरे शब्दों में इजहार किया कि,कैसी दागदार रौशनी के साथ निकली है यह सुबह, जिसमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा।जब हम इस सफर में निकले थे,हमने ऐसी सुबह की तो कल्पना नहीं की थी। हमारी कल्पनाओं की सुबह तो उस मुकाम की तरह थी जिसमें कोई आसमान की चादर पर चलते हुए जगमगाते तारों के पास पहुंच जाएँ  या जैसे की रात में समन्दर की धीमी लहरों को उसका किनारा मिल जाए। आखिर कहीं तो गम से भरे इस दिल की नैया को किनारा तो मिलेगा...।




दरअसल बंटवारे का एक लम्बा अरसा बीत जाने के बाद लाल किले के प्राचीर से उसे स्मरण करने का सरकारी ऐलान हुआ है। खंडित भारत का दंश,उसकी विभीषिका और दो धर्मों के बीच कटुता पैदा करने की कोशिशों के परिणाम से उपजी यह त्रासदी ऐसी वीभत्स दास्तान है जो  मानवीयता को झकझोरती रही है। इस दौरान कितने लोग मारे गये,किसने कितनी पीड़ा झेली या कितने घर से बेघर हो गए,इसका कोई निश्चित आंकड़ा अब तक उपलब्ध नहीं है। लेकिन उसके दर्द को महसूस करने वाले लोगों की कमी भी नहीं है। भारत विभाजन पर शोध करने वाले स्टेनले वोलपर्ट ने अपनी पुस्तक ,द शेमफूल फ्लाइट में लिखा है कि, आज़ादी के उन खौफनाक दिनों के दौरान मुल्क मौत और तबाही के जिन कयामत से हालात से गुजरा,उसका जिक्र करते हुए नेहरु ने माउंटबेटन को उनकी इंग्लैण्ड रवानगी से पहले वाली शाम को कहा था-मेरे लिए या किसी के लिए भी यह तय कर पाना बहुत मुश्किल है कि हमने पिछले एक साल के दौरान क्या किया। जो कुछ हुआ हम उसके बहुत नजदीक है,और उन तमाम वाकयों से जुड़े हुए है। शायद हमने बहुत  सारी गलतियां की है  आपने और हमने। हो सकता है एक या दो पीढ़ी बाद के इतिहासकार ठीक से यह तय कर पाएं कि हमने क्या सही किया है क्या  गलत...।मेरा मानना है कि हमने सही करने की कोशिश की है,इसीलिए हमारे बहुत सारे गुनाह और बहुत सारी गलतियों को माफ़ कर दिया जाएगा


भारत की आज़ादी का संघर्ष.अंग्रेजों की विभेदकारी नीतियां और साझा संस्कृति को तोड़ने की साम्प्रदायिक कोशिशें साथ साथ सफर तय कर रहे थे।अंत में सबको कुछ न कुछ हासिल हुआ।आखिर किसी भी कोशिश में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही थी।


विभाजन को नेहरु गुनाह मानते थे,गांधी विभाजन को होने देना नहीं चाहते थे जबकि जिन्ना हिन्दू मुस्लिम साथ रह सकते है इस विचार को ही ख़ारिज कर देते थे, लेकिन भारत को देखने का नजरिया मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का अपना था।उन्होंने 1940 में भारतीय राष्ट्रीय  कांग्रेस के अध्यक्षीय  उदबोधन में कहा था कि,यह हिंदुस्तान की नियति है कि  बहूत सारी नस्लें और संस्कृतियां उसकी तरफ खींचती चली आई।बहुतों ने अतिथियों के स्वागत में बिछी हुई इस सरजमीं को अपना ठौर बनाया और बहुत  सारे काफिलें यहाँ रुकते रहे।हिन्दू और मुसलमानों के ग्यारह सदी के साझा इतिहास ने अपनी साझा उपलब्धियों से इसकी संस्कृति को समृद्द बनाया है।हमारी  भाषा,हमारी कविता,हमारा साहित्य,हमारी संस्कृति,हमारी कला,हमारा पहनावा,हमारे तौर तरीके,हमारे रीती रिवाज और हमारे जीवन में घटने वाली असंख्य घटनाएँ और हरेक चीज़ हमारे साझा प्रयासों की मुनादी करते है।इन हजार सालों की हमारी साझा जिंदगी ने हमें एक साझी राष्ट्रीयता के रूप में ढाला है। चाहे हम इसे पसंद करें या न  करें,हम एक भारतीय राष्ट्र बन चुके है,जो एक है और अविभाज्य है। कोई भी अतिकल्पना या नकली योजना इस एकता को विखंडित नहीं कर सकती।


मौलाना के भारत की एकता के विश्वास को खंडित करने के जिन्ना के प्रयास 1940 के दशक तक परवान चढ़ चूके थे।अप्रैल  1943 में नई दिल्ली में मुस्लिम लीग का सालाना अधिवेशन हुआ जिसमें मुस्लिम बहुल इलाकों को मिलाकर एक मानचित्र लगा था और उसके ऊपर लहराते हुए झंडे पर लिखा था कि ‘‘भारत की आजादी पाकिस्तान में निहित है।‘‘ यह भारत के खंडित होने की तरफ बड़ा इशारा था।इसके बाद भी जिन्ना को जब लगने लगा की पाकिस्तान बनना मुश्किल है तो उसने साम्प्रदायिक दंगों का खतरनाक दांव खेला,जिसमें पूरा देश झुलस गया। इस समय लोग पागलों की तरह एक  दूसरे की जान ले रहे थे। माउन्टबेटन,नेहरु और पटेल इस भीषण साम्प्रदायिक आग से जूझने लगे और दंगाई इलाकों का दौरा भी किया। इसका कोई असर होते न देख नेहरु भी असहाय हो गये और उन्होंने गांधी के सामने कहा,वे अपने को अपमानित और असहाय महसूस कर रहे है क्योंकि वे निर्दोषों को बचा नहीं पा रहे है। गांधी अब भी देश को विभाजन की विभीषिका से बचा लेना चाहते थे। 31 मई 1947 को उन्होंने अपनी प्रार्थना सभा में कहा था कि,यदि सम्पूर्ण भारत भी जलता रहे और मुस्लिम लीग तलवार की नोंक पर इसे मांगते है तो भी हम पाकिस्तान स्वीकार नहीं करेंगे।


भारत के विभाजन की कवायद के बीच एक अमेरिकी पत्रकार से गांधी ने  कहा था कि भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दें जिसे आधुनिक शब्दावली में अराजकता कहते हैं। इस सूरत में सारी पार्टियां या तो एक दूसरे के खिलाफ कुत्तों की तरह लड़ेगी या हो सकता है कि जिम्मेदारी आ पड़ने पर एक वाजिब समझौते पर पहुंच जाए।। उनका विश्वास था की अंग्रेजों के चले जाने के बाद भारत का विभाजन नहीं होगा।

गांधी के विश्वास का कारण उनकी वह दृष्टि थी जो भारत की विविधता को समन्वयकारी दृष्टि से देखती थी। लेकिन  जिन्ना की दृष्टि राजनीतिक हसरतों से प्रेरित होकर विभाजनकारी होते होते विध्वंसक भी हो गई थी। पाकिस्तान की मांग को लेकर सीधी कार्रवाई दिवस से हिंदुस्तान को जलाने की कोशिश के भयावह मंजर आतंकित कर रहे थे। जिन्ना की भारत को तोड़ने की इन कोशिशों से अन्य विभाजनकारी ताकतों को भी मौका मिल गया।हिंसा का यह तांडव गांधी की अहिंसा को चिढ़ा रहा था और अंग्रेजी राज के लिए यह फूट संजीवनी की तरह थी।


द हिंदू के संवाददाता  से बात करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि,वक्त एक बेरहम दुश्मन है। मैं इस सवाल से जूझता रहा हूँ  कि आखिर मैंने और सारे लोगों ने मिलकर सच्चे दिल से जो प्रयास किए उनके बावजूद एकता की कोशिशें नाकाम रहीं।” वास्तव में इस नाकामी के पीछे अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियाँ और जिन्ना की कुत्सित और घृणित हसरतें रही जिससे हिंदुस्तान को खंडित होना ही पड़ा।


बहरहाल विभाजन  की यादें बेहद कड़वी और खौफनाक है।आने वाली पीढी के लिए उसकी स्मृति को सहेज कर रखने से ज्यादा यह जरूरी है कि हम हमारे नौनिहालों को उससे मिलने वाली सीख और सबक को सामने लायें जिससे देश की एकता और अखंडता को मजबूती मिल सके।हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि,हिंदुस्तान में चाहे जिस धर्म के लोग रह सकते है,उससे यह राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। कोई भी मुल्क तभी एक राष्ट्र माना जाएगा जब उसमे दूसरे धर्मों के समावेश करने का गुण आना चाहिए। तभी हम एक राष्ट्र होने के लायक होंगे।

अफगान आतंक की नई चुनौती afgan aatank ki nayi, janstta

 

 जनसत्ता  


                     

 दुर्गम पहाड़ों को चीरकर आगे बढ़ जाने की मनुष्य की जिजीविषा में दर्रों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। इन दर्रो पर भूकम्प और ज्वालामुखी की छाप तो होती ही है लेकिन ये दर्रे सैकड़ों वर्षों से व्यापार,प्रवास और युद्द के सुरक्षित मार्ग भी बन गए। यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया को जमीन से जोड़ने वाला अफगानिस्तान अपने भौगोलिक दर्रों की वजह से इतिहास में हमेशा दर्ज होता रहा है। लेकिन अब यह दर्रे कहीं दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए अभिशाप न बन जाएं,इसे लेकर आशंकाएं गहरा गई है। दरअसल अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के साथ ही आतंकवाद को सुरक्षित ठिकाना मिलने की संभावनाएं बढ़ गई है और इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते है। अफगानिस्तान पर हिंदुकुश पर्वत श्रृंखला का बड़ा प्रभाव है और यह इस क्षेत्र को तीन  भागों में बांटती है,मध्य उच्चभूमि,उत्तरी मैदान और दक्षिण-पश्चिमी पठारउत्तरी उच्चभूमि में गहरी,संकरी घाटियां हैंजो खास तरह के लंबे दर्रे बनाती हैंहिंदूकुश पर्वतों के प्रमुख दर्रे खैबर,गोमल एवं बोलन हैंये दर्रे व्यापारियों के लिए खास तरह का रास्ते रहे हैंप्राचीन काल में इन्हीं दर्रो से होकर यूरोप और मध्य एशिया से विभिन्न आक्रमणकारी भारत तक पहुंचते रहे। 1990 के दशक में तालिबान के उभार के बाद ये दर्रे आतंकियों की पनाहगाह बन गये,जिसके दुर्गम रास्तों से होते हुए प्रशिक्षित आतंकियों ने कई देशों में कोहराम मचाया।  दो दशक की जानलेवा ख़ामोशी के बाद तालिबान पुनः अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया है और इससे आतंकी हिंसा की आशंकाएं  पुन: गहरा गयी है । 


 

अफगानिस्तान में रहने वाले विभिन्न जातीय समूहों की विविधता और भौगोलिक परिस्थितियां आतंक को बढ़ावा देने के लिए मुफीद है ।  अधिकांश आबादी पठान है,इसके बाद पच्चीस से तीस फीसदी ताजिक, करीब 10 फीसदी उजबेक,पांच फीसदी हजारा और दस से 15 फीसदी अन्य जातीय समूह हैअफगानिस्तान के पूर्व में पाकिस्तान,उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन,उत्तर में ताजिकिस्तान,कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है। अफ़ग़ानिस्तान चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ है और इसकी सबसे बड़ी सीमा पूर्व की ओर पाकिस्तान से लगी है। इसे डूरण्ड रेखा भी कहते हैं। केन्द्रीय तथा उत्तरपूर्व की दिशा में पर्वतमालाएँ हैं जो उत्तरपूर्व में ताजिकिस्तान स्थित हिन्दूकुश पर्वतों का विस्तार हैं। अफगानिस्तान की कबायली संस्कृति मध्य एशिया में बसने वाले कई नृजातीय समूहों को भी पसंद आती है। पश्तून,उजबेक,ताजिक और हजारा जैसे कबीलों का सांस्कृतिक समन्वय पामीर के पठार से चीन के शिंजियांग प्रांत तक नजर आता है और साम्यवादी चीन के लिए यही स्थिति मुश्किल पैदा करती रही है।


तालिबान  के प्रति चीन की गर्मजोशी का प्रमुख कारण इस साम्यवादी देश की सुरक्षा  चिंताएं भी है। पिछले महीने जब तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल चीन पहुँचा तो चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इस प्रतिनिधिमंडल से साफ कहा है कि उसे 'चीन विरोधी' आतंकवादी संगठन ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से संबंध तोड़ने होंगे। वास्तव में चीन तालिबान के उभार को उसके उत्तर पश्चिम के  अशांत क्षेत्र शिंजियांग प्रांत के लिए खतरनाक समझता है। यहां रहने वाले उइगर मुस्लिम चीन के खिलाफ पृथकतावादी मूवमेंट चला रहे हैं। 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' का मकसद चीन से अलग होना है। यह पृथकतावादी मूवमेंट 1949 की स्थिति बहाल करना चाहता है और स्वतंत्र पूर्वी तुर्किस्तान को ही स्वीकार करता  है। पूर्वी तुर्किस्तान ही चीन प्रशासित शिंजियांग है। शिंजियांग की सरहदे दक्षिण में तिब्बत और भारत,पूर्व में मंगोलिया, उत्तर में रूस और पश्चिम में कजाकिस्तान,किरगिज़स्तान,ताजिकिस्तान,अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से मिलती हैं। चीन का सबसे बड़ा संकट शिंजियांग की पश्चिम की वह सीमा है जो मुस्लिम देशों से मिलती है और यही कारण है कि चीन अफगानिस्तान में मिलिट्री बेस भी बनाना चाहता है। चीन ये आर्मी कैंप दूर-दराज के पहाड़ी इलाके वाखान कॉरीडोर के पास बनाना चाहता है। यहां पर चीन की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। चीन इस इलाके को प्रभाव में लेकर 'ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट' के प्रभाव को खत्म करना चाहता है। चीन का विश्वास है कि उइगर आतंकी इसी कॉरीडोर से उसके शिंजियांग प्रांत में घुसते हैं। उज्बेक,तुर्कमान और परशियन भाषा बोलने वाले अफगान चीन के वीगर मुसलमानों से आसानी से जुड़ जाते है।


पिछले कुछ समय से अफगानिस्तान में आईएस के उभार से चीन के अशांत शिंजियांग में आंतरिक अशांति और ज्यादा बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है।  मध्य एशियाई देशों में सक्रिय इस्लामिक स्टेट से इस क्षेत्र में सहानुभूति रखने वाले कट्टरपंथी मौजूद है। इस क्षेत्र के विभिन्न देशों अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, कज़ाख़स्तान, किर्गिज़स्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान,उज़्बेकिस्तान और शिंजियांग से कुल मिलाकर  हजारों लड़ाके इस्लामिक स्टेट के समर्थन में लड़ने के लिए सीरिया और इराक़ जा चुके हैं। ऐसे में इस्लामिक स्टेट ने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में अपने पैर जमाने की कोशिशें जारी रखी हैं ताकि वो मध्य एशिया, चेचन और चीनी वीगर उग्रवादियों से गठजोड़ कर सके। अब तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज होने के बाद कई नाराज जातीय समूह इस्लामिक स्टेट से जुड़ सकते है और यह इस पूरे क्षेत्र के लिए सुरक्षा संकट बढ़ा सकता है। बेनजीर भुट्टों ने बाकायदा इसे स्वीकार भी किया था। उन्होंने अपनी जीवनी में लिखा है,मेरे पास 1990 में आईएसआई के दफ्तर से यह संदेश आया कि अरब,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के एक लाख से ज्यादा मुजाहिदीन इस बात के लिये तैयार है कि वह कश्मीर में घुसकर कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई में मदद करें। वह सारे बहादुर और प्रशिक्षित है और हिंदुस्तान की फौजों से बड़ी आसानी से लोहा ले सकते है।


अफगानिस्तान में आतंकवाद फलने फूलने के बाद यहां की जमीन चीन ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया से लेकर रूस तक को आशंकित करती रही है। इसका एक प्रमुख कारण पाकिस्तान के वे आतंकी केंद्र भी है जहां तालिबान समेत कई आतंकी संगठन प्रशिक्षण हासिल करते रहे है। मध्यपूर्व,कश्मीर,अजरबैजान और आर्मेनिया समेत कई क्षेत्रों में हुए युद्दों और संघर्षों में विरोधी  देशों ने अस्थिरता फैलाने के लिए भाड़े के  लड़ाकों का उपयोग किया है पैसे के लिए दुनिया के किसी भी भाग में जाकर लड़ने के लिए तैयार यह सैनिक अफगानिस्तान,पाकिस्तान,लीबिया,लेबनान,सीरिया,इराक,यमन,सुडान और नाइजीरिया जैसे गरीब और गृहयुद्द से जूझने वाले देशों से होते है। सैनिकों के साथ ही इनमें आतंकवादियों का भी उपयोग किया जाता है,जिनके प्रशिक्षण अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होते रहे है। पाकिस्तान  में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट और जमायत-उल-उलूम-इलइस्लामिया जैसे संस्थान बहुत कुख्यात है। मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। इस संस्थानों का काम इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देना है। यहां पर सिंकियांग के उइगुर समेत उजबेक और तुर्क प्रशिक्षण लेते रहे है। चेचन्या में रुसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी और मुल्ला उमर समेत तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले है।


कश्मीर के कुख्यात आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाक का एक प्रमुख आतंकी है। इस आतंकी संगठन का तंत्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया,अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। 1993 पाकिस्तान  में बने आतंकी संगठन हरकत-उल अंसार का मुख्यालय मुजफ्फराबाद में है। इसके साथ की इसका एक केंद्र अफगानिस्तान के खोस्त में है। यह कश्मीर के अलावा बोस्निया और म्यांमार में भी सक्रिय है। वह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मदरसों और आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों पर अक्सर प्रशिक्षु जिहादियों को मजहबी तकरीर सुनाने के लिए जाता है। जमात- उद- दावा और लश्कर- ए-तैयबा, मरकज-अलदावा-वर इरशाद नामक अफगानी मुजाहिदीन गिरोह का अंग है। अफगानिस्तान में अशांति का प्रमुख कारण यही आतंकी केंद्र रहे है जिनके प्रभाव में तालिबान निरंतर मजबूत हुआ है ।

 


तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में आने से म्यांमार भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। म्यांमार में बौद्ध रोहिंग्या मुस्लिम संघर्ष के बीच जेहादी संगठन एकजुट होकर म्यांमार को सबक सिखाने की घोषणा कर चुके है,इसमें यमन का अल कायदा समूह और पाकिस्तान के लश्कर-ए –तैयबा शामिल है। म्यांमार में लम्बे समय से मूलभूत अधिकारों से वंचित रोहिंग्या सुन्नी इस्लाम को मानते हैं । ये लोग 1991-92 में म्यांमार में  सेना के दमन के दौर में करीब ढाई लाख रोहिंग्या बांग्लादेश भाग गए थेउस दौरान पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों की सीमा से घुसकर तकरीबन चालीस हजार रोहिंग्या भारत के विभिन्न स्थलों पर बस गये। अब तालिबान के मजबूत होने से भारत के बौद्ध धर्म स्थलों को निशाना बनाया जा सकता है।


आतंकी संगठन अराकन रोहिंग्या सालवेशन आर्मी म्यांमार में सेना पर हमले करने के लिए जिम्मेदार रही है और उसके सम्बन्ध पाकिस्तान से माने जाते हैयह आतंकी संगठन हाफिज सईद के प्रभाव में है। यहीं नहीं बांग्लादेश के अतिवादी संगठन हूजी का भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के कई कट्टरपंथी संगठनों से गहरे सम्बन्ध है और वे आईएसआई के इशारे पर काम करते है। 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध जब चल रहा था उसी को ध्यान में रखते हुए बांग्लादेश की कट्टरपंथी ताकतों ने कुख्यात आतंकी संगठन हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लाम की स्थापना की थी। इस युद्द में बांग्लादेशी मुजाहिदीनों ने भी भाग लिया था। अब यह आतंकी संगठन संयुक्तराष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित है। हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लाम पश्चिमी म्यांमार में रोहिंग्या विद्रोह का समर्थन करने के लिए जाना जाता है। इसका कथित रूप से रोहिंग्या सॉलिडेरिटी ऑर्गनाइज़ेशन और अराकान रोहिंग्या नेशनल ऑर्गनाइज़ेशन के साथ संबंध है।


भारत के एक  और पड़ोसी श्रीलंका में भी आतंकी हमलों के तार अफगानिस्तान से जुड़ने की पुष्टि हुई है। 2019 में ईस्टर पर हुए आत्मघाती हमले के बाद श्रीलंका सरकार ने स्थानीय जिहादी समूह नेशनल तौहीद जमात तथा दो अन्य संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि एनटीजे देश के कुछ बौद्ध स्मारकों को उड़ाने की योजना बना रहा था। जाँच एजेंसियों के अनुसार 2016 में केरल के  कुछ कट्टरपंथी लोगों का एक समूह श्रीलंका के नेगोम्बो गया था। नेगोम्बो  समेत श्रीलंका के कई शहरों में 2019 में ईस्टर के मौके पर धमाके हुए थे,जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए थे।  माना जाता है कि ये लोग बाद में अफ़ग़ानिस्तान जाकर आईएस में शामिल हो गए थे। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रशिक्षित कट्टरपंथी विचारधारा से मालदीव और बांग्लादेश जैसे देशों के उदार या धर्मनिरपेक्ष लोग दहशत में है।


जाहिर है तालिबान के प्रभाव में दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में काम करने वाले कई आतंकी संगठन है। अफगानिस्तान एक बार फिर दुनिया के आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है इस समस्या से निपटने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप समेत दुनिया को नीतिगत  कदम तुरंत उठाना होंगे। इसमें पाकिस्तान को नियंत्रित किया जाना बेहद जरूरी होगा।

 

महात्मा गांधी ने क्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को नकार दिया था...? mahatma gandhi rashtrvad politics

 पॉलिटिक्स


महान शिक्षाविद और भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  एक बार महात्मा गांधी से तीन सवाल पूछे,आपका धर्म क्या है ? आप कैसे इस धर्म तक पहुंचे ? और इसका आपके जीवन पर क्या परिणाम हुआ ?


बापू ने इसका बेहद सहज लेकिन दिलचस्प जवाब दिया,पहले मैं कहा करता था कि मैं भगवान में विश्वास करता हूँ,अब कहता हूँ कि मैं सत्य में विश्वास करता हूँ। पहले मैं कहा करता था कि ईश्वर सत्य है,और अब मैं कहता हूँ कि सत्य ही ईश्वर है। और ऐसे लोग है जो ईश्वर को नहीं मानते है लेकिन ऐसा कोई इंसान नहीं होगा जो सत्य को नहीं मानता है,यह ऐसी बात है कि जिसे एक निरीश्वरवादी भी कबूल करता है।


दरअसल महात्मा गांधी के विचारों में भारत के भविष्य को विविधता से जोड़ने की वह जिजीविषा दिखाई दी जहां निरीश्वरवादियों को भी यह विश्वास हो की यह देश उन्हीं का है। क्योंकि यहां सत्य की पूजा होती है और सत्य सभी का प्रतिनिधित्व करता है। महात्मा गांधी भारत की आज़ादी में सबका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे और विविधता और बहुलता वाले इस देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से सभी के सहयोग की कल्पना कठिन थी। गांधी का अनुभव भी इसकी पुष्टि कर रहा था।  


 

बाल गंगाधर तिलक ने जनमानस में सांस्कृतिक चेतना जगाने,अंग्रेजों के खिलाफ सन्देश देने और लोगों को एकजुट करने के लिए ही सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरूआत 1894 में की थीवे 1890 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अक्सर समुद्र की चौपाटी पर जाकर बैठते और लोगों को एकजुट करने का तरीका सोचतेइसके लिए उन्होंने गणेशोत्सव मनाने का धार्मिक तरीका अपनाया जिससे लोग घरों से बाहर निकलकर एकजुट हो सके  महात्मा गांधी 1894 में दक्षिण अफ्रीका में थे और वहां उन्होंने नटाल इंडियन कांग्रेस का गठन  कर इस देश में भारतीय नागरिकों की दयनीय हालत की ओर दुनिया का ध्यान खींचा। तिलक का अपना तरीका था और गांधी का अपना लेकिन तिलक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से आज़ादी को दिशा देने को तत्पर दिखाई दे रहे थे जबकि गांधी का आंदोलन स्वतंत्रता,समानता और न्याय पर आधारित था 1906 में भारत में मुस्लिम लीग बन चूकी थी और यह कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रही थी कांग्रेस के पास इसका कोई जवाब नहीं थाकरीब 20 साल बाद गांधी ने इसका जवाब और समाधान सामने रख दिया महात्मा गांधी जब खिलाफत आंदोलन से जुड़े तो कांग्रेस ने भी उन्हें आशंकित होकर देखा।  महात्मा गांधी को कहाँ किसी की परवाह थी,वे मुस्लिमों के बीच गए,आंदोलन में भाग भी लिया और अंग्रेजों का विरोध भी किया। अगस्त 1919 को महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की घोषणा की गई और इसे खिलाफत आंदोलन के समर्थन में शुरू किया गया था। 1919 से 1922 तक भारत में ब्रिटिश शासन का विरोध करने हेतु खिलाफत और असहयोग,दो जन आंदोलन आयोजित किये गए थे। दोनों ही आंदोलनों में भिन्न-भिन्न मुद्दें होने के बावज़ूद अहिंसा और असहयोग की एक एकीकृत योजना को अपनाया गया। इस अवधि में कांग्रेस  और मुस्लिम लीग में अभूतपूर्व एकता देखने को मिलीइसका प्रभाव आम जनता पर पड़ा और  इन दोनों पार्टियों के संयुक्त प्रयास के तहत कई राजनीतिक प्रदर्शन आयोजित किये गए। नवंबर 1919 में दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमे  ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार का आह्वान किया गया। गांधी ने मुस्लिम लीग की स्थापना करने वाले अली बंधुओं  के साथ राष्ट्रीय एकता का प्रसार करने और सरकार के साथ असहयोग करने के संदेश का प्रचार करने हेतु व्यापक दौरे किये। इसका प्रभाव यह हुआ कि फूट डालो शासन करों की अंग्रेजों की नीति ध्वस्त हो गई और भारत की आज़ादी के आंदोलन में हिन्दू और मुस्लिमों की अभूतपूर्व एकता देखने को मिली।


असहयोग आंदोलन की शुरुआत के एक वर्ष बाद महात्मा गांधी द्वारा तिलक स्वराज कोष की घोषणा की गई थी। यह फंड बाल गंगाधर तिलक को उनकी पहली पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि थी,जिसका उद्देश्य भारत के स्वतंत्रता संग्राम और ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध में सहायता हेतु 1 करोड़ रुपये एकत्र करना था। इस फण्ड में हिन्दूओं के साथ मुस्लिमों का भी गहरा योगदान था। तिलक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से कर पाते यह मुश्किल था,महात्मा गांधी ने इसे आसान बना दिया।


क्या गांधी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को चुनौती दी थी या उसे नकारना महात्मा की मज़बूरी थीआज़ादी के आंदोलन में महात्मा गांधी के प्रवेश के बाद मानों सब कुछ बदल गया थाअब यह आंदोलन रियासतों और संकुचित अर्थों से बाहर निकलकर देश का आंदोलन बन गया थागांधी राष्ट्रवादी तो थे लेकिन राष्ट्रवाद को लेकर उनकी समझ औरों से अलग थी


गांधी जानते थे कि एक संस्कृति,एक इतिहास,एक धर्म और एक भाषा के आधार  बंधुत्व की बातें कर विविधताओं वाले देश में एकता स्थापित नहीं की जा सकती पुराने रीतिरिवाज,मूल्यों और मिथकों को याद कर लोगों को जोड़ने से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मजबूत होगा भाषा,इतिहास,रंग,संस्कृति,साझा विश्वास और मूल्य के आधार पर लोग जुडाव महसूस करेंगे लेकिन यह पूरे भारत की आवाज नहीं हो सकती क्योंकि यह बहुसांस्कृतिक,बहुधार्मिक और बहुभाषाई राष्ट्र है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का रास्ता आसान और सरल था लेकिन इससे भारत की आज़ादी का मार्ग भला कैसे खुल सकता थाभारत की विविधता इसकी इजाजत देती ही नहीं थीयह किसी विशेष क्षेत्र को उद्देलित तो कर सकता था लेकिन समूचे भारत को इसके सहारे जोड़ देना आसान नहीं था


राष्ट्रवाद सृजनात्मक है लेकिन कट्टर राष्ट्रवाद संघर्ष का मार्ग प्रशस्त करता हैरविन्द्रनाथ टैगोर की इस भावना से महात्मा गांधी इत्तेफाक रखते थे और उनके आंदोलनों में यह प्रतिबिम्बित भी हुआ जब राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अवधारणा को ज़ोर-ज़बरदस्ती से लागू करवाया जाता है तो यह अतिराष्ट्रवादया अंधराष्ट्रवादकहलाता है। इसका अर्थ हुआ कि राष्ट्रवाद जब चरम मूल्य बन जाता है तो सांस्कृतिक विविधता के नष्ट होने का संकट उठ खड़ा होता है। भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता को मिटाकर ऐसे राष्ट्रवाद की मान्यता को ग्रहण नहीं सकता।  महात्मा गांधी ने भारत की एकता और अखंडता बनाएं रखने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर राजनीतिक राष्ट्रवाद को तरजीह दीगांधी की समझबूझ की दुनिया कायल है और उनके आदर्शों और मूल्यों की जरूरत को भारत को सदैव समझना होगा

 

असुरक्षा से जूझती आज़ादी asurksha aazadi rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा

हस्तक्षेप



                                                                         

बहुसांस्कृतिक परिवेश और बहुविविधता को अंगीकार कर उभरते हुए राष्ट्र से इस अपेक्षा थी की आज़ादी के महान मूल्यों को आत्मसात कर वह मजबूत भारत का निर्माण करेगा। जहां देश की आंतरिक सुरक्षा और स्वतंत्रता का संरक्षण,आंतरिक शांति,सामाजिक  न्याय की स्थापना और साम्प्रदायिक सद्भाव कायम होगा। लेकिन आज़ादी के बाद आठवे दशक में प्रवेश कर चूके दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां आशंकाओं से जूझने को मजबूर है तथा भाषाई,जातीय,क्षेत्रीयता और धार्मिक विभिन्नताओं की कड़ी चुनौतियां बरकरार है।  


आज़ादी के साथ पूर्वोत्तर में अशांति फैली,1954 में नागालैण्ड में फिजों ने विद्रोह का झंडा उठाया जो बाद में मणिपुर,मिजोरम और त्रिपुरा में भी फ़ैल गया। पूर्वोत्तर के राज्य अभी भी क्षेत्रीय पृथकतावाद से जूझ रहे है।


सामाजिक और आर्थिक असमानता हिंसा के संगठित रूप में कितनी भयावह हो सकती है,यह साठ के दशक में शुरू हुए नक्सलबाड़ी आंदोलन के  प्रभावों में देखा जा सकता है। गरीबी और पिछड़ेपन का फायदा उठाकर नक्सली भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गए है।  उनके प्रभाव वाले गलियारे में  मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र,ओडिशा,उत्तरप्रदेश,आंध्रप्रदेश,तेलंगाना,झारखंड, बिहार,कर्नाटक,पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्य शामिल है। भारत के कुल छह सौ से ज्यादा जिलों में से एक तिहाई नक्सलवादी समस्या से जूझ रहे हैं। विकिलीक्स के दस्तावेजों में गुप्त संदेशों के आधार पर यह खुलासा हुआ है कि  भारत की अर्थव्यवस्था में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद ग़रीब ग्रामीण भारत में नक्सलवादी संगठन और शहरों में नक्सलादियों से सहानुभूति रखने वाले पढ़े-लिखे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नक्सलवादी हमलों से पिछले पांच दशकों से जूझने और हजारों सुरक्षाबलों को खोने के बाद भी देश में नक्सलवाद से निपटने की कोई निर्णायक और दीर्घकालीन कार्ययोजना नही बन सकी है जिसके बेहद सकारात्मक परिणाम निकल सके हो। नक्सलवादियों के सामने भारत का आधुनिक बल होता है,इसके बाद भी वे अनियमित,खंड युद्द या छापामार युद्द पद्धति से सुरक्षा बलों को ज्यादा नुकसान पहुंचाने में सफल रहे है।


अस्सी के दशक में पंजाब ने आतंक का भयावह रूप देखा। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी,कई अधिकारी,नेता,सैनिक और आम लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इन सबके बाद भी पंजाब आज भी आतंकवाद और खालिस्तान के उभरने को लेकर आशंकित रहता है। 1990 के दशक में कश्मीर में आतंक के लहर शुरू हुई और लाखों पंडितों को अपना घर बार छोडकर जान बचाने के लिए वहां से भागना पड़ा,वे अब भी अपने घर नहीं लौट  सके है। सरकारों के तमाम प्रयासों के बाद भी कश्मीर पंडितों की घर वापसी का सुरक्षित माहौल कभी भी नहीं बन सका है। भारत में अवैध प्रवासियों की समस्या सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक और सामरिक मुद्दा रहा है। उत्तर पूर्व इस समस्या से अभिशिप्त नजर आता है,वहीं दिल्ली से लेकर बिहार और पश्चिम बंगाल भी अवैध प्रवासियों से प्रभावित और आशंकित है।


छब्बीस नवम्बर दौ हजार आठ को मुंबई पर हुए हमले के बाद देश में आंतरिक सुरक्षा को चाक चौबंद करने की कवायद शुरू हुई और इंटेलीजेंस तंत्र के कायापलट की बात कही गई थी। 2008 में संसद द्वारा राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम भी बनाया गया था। इस समय देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाली प्रमुख एजेंसियों में इंटेलीजेंस ब्यूरों, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग,नेशनल टेक्नीकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन,डिफेंस इंटेलीजेंस एजेंसी,मिलिट्री इंटेलीजेंस,डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस और सेंट्रल इकॉनोमिक इंटेलीजेंस ब्यूरों शामिल है। इन एजेंसियों पर सरकार करोड़ों रुपया खर्च भी कर रही है। कई एजेंसियों में आपसी समन्वय की जगह अंतर्द्वंद्व की आशंका ज्यादा दिखाई पड़ती है। आतंक निरोधक आपरेशनों के लिए विभिन्न राज्य की पुलिस के साथ आईबी समन्वय की भूमिका निभाती हैपरन्तु एक ही समय में कई जगह आपरेशन एक साथ करना हो तो इसके लिए कोई एकीकृत कमांड नहीं हैआंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिस की होती है लेकिन राज्य पुलिस सुधारों को लागू करने में बुरी तरह नाकाम रहे है


इस समय भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र नहीं है,केंद्र और राज्यों के टकराव और क्षेत्रीय राजनीति इसमें लगातार बाधक बनी हुई है। पुलिस की भारी कमी है और आतंकवाद से मुकाबले के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं है। आईबी और रॉ के बीच कई मौकों पर तालमेल की कमी सामने आई है और आतंकियों का कोई केन्द्रीय  डाटाबेस भी नही है। सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा भगवान भरोसे है और हाई डेफिनेशन के कैमरों की संख्या नगण्य है। धार्मिक स्थलों की अधिसंख्यता बड़ी चुनौती है।


भारत में राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2013 अस्तित्व में है,जिसका काम देश में इंटरनेट और डिजिटल सिस्टमों को सुरक्षित बनाना है। लेकिन हकीकत यह है कि सुरक्षा नीति  के प्रमुख उद्धेश्य को स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा अभी तक नहीं बन पाया हैबैंक,शेयर बाज़ार,हवाई यातायात और रक्षा प्रतिष्ठान कंप्यूटर के बूते ही संचालित होते हैइन्हें हैक करने से देश की सारी व्यवस्थाएं ठप पड़ सकती है। आंतरिक सुरक्षा के समुचित प्रबन्धन के लिए सीमा सुरक्षा भी जरूरी है। सीमा क्षेत्रों में तारबंदी,फ्लड लाईट,बार्डर आउट पोस्ट,थर्मल छवि वाले उपकरण और गश्त और  निगरानी के लिए टावर  की जरूरत बनी हुई है और इस दिशा में अभी बहुत काम करने की संभावना है।


26/11 के  हमलें के लिए आतंकियों ने समुद्री रास्ता चुना था। मुम्बई हमले के एक दशक बीत जाने के बाद अभी भी तटीय सुरक्षा एकीकृत नहीं है,जिससे एक एक बोट का हिसाब रखना मुश्किल है। तटीय सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी होने के कारण बड़े शहरों समेत कच्छ से लेकर बलसाड तक बने भारत के विशाल औद्योगिक संयंत्रों पर  आतंकवादी हमलें का अंदेशा बना रहता है।  बहरहाल देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पड़ोसी देशों से लगने वाली सीमाओं की तारबंदी,भारत में रहने वाले सभी लोगों के डेटाबेस बनाने,राजनीतिक दलों में राष्ट्रीय हितों पर एकरूपता और सामाजिक न्याय की स्थापना के बहुआयामी प्रयासों को केंद्र में रखकर आगे बढने  की जरूरत है।  

भाड़े के लड़ाकों का संकट,taliban afgan rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा                   

                       


                                                                                                                                                                    

दुनिया के हस्तक्षेप और महाशक्तियों की प्रतिद्वंदिता के चलते बदहाल अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता से आतंकवाद बेहद खतरनाक  तरीके  से दुनिया के सामने आने की आशंका गहरा गयी है। तकरीबन साढ़े छह लाख वर्ग किलोमीटर की क्षेत्रफल और लैंड लाकड कंट्री के नाम से  पहचाने जाने वाले सम्पूर्ण अफगानिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करना बेहद जरूरी है जबकि हकीकत यह है कि तालिबान मध्ययुगीन धार्मिक और तानशाही शासन को पूरे देश में स्थापित करना चाहता है। तालिबान के प्रभावी रहते अफगानिस्तान में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता ऐसे में इस देश में अस्थिरता ही बढ़ेगी।


दरअसल तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है और यही कारण है की तालिबान को रोक पाना आसान नहीं है।  2011 में भी अमेरिका ने गोपनीय दस्तावेजों  में ग्वांतनामो बे के 700 कैदियों के बैकग्राउंड का हवाले का हवाला देते हुए कई संदर्भों का जिक्र किया था। इससे यह  साफ हुआ था की पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं से लड़ रहे विद्रोहियो,यहां तक की अलकायदा को समर्थन देती है। उनकी गतिविधियों का समन्वय करती है और उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। यही नहीं इन दस्तावेजों में पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस को आतंकवादी संगठन करार देते हुए माना है कि यह अल कायदा और तालिबान के समान ही एक चुनौती है। गौरतलब है कि 80 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई ने पूरी दुनिया से जिहादियों को इकट्ठा करना,फ़ौजी प्रशिक्षण देना और नियमित तनख्वाह पर अत्याधुनिक हथियारों से लैस कर अफगानिस्तान भेजने का सिलसिला शुरू किया था। बदलते दौर में भी यहीं भाड़े के जिहादी आज पूरी मुस्लिम दुनिया और खासकर दक्षिण और मध्य एशिया में आतंकवादी गतिविधियों की असली बागडोर सम्हालें हुए है। पाकिस्तान अफगानिस्तान को हथियाने का ख्वाब देखता रहा है और उसने भारत से बदला भांजने में भी जिहादियों का खूब उपयोग किया। पाकिस्तान ने लश्करए तैयबा,हिजबुल मुजाहिदीन और जैश--मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के जरिये कश्मीर को खून से नहलाया भी। जाहिर है भारत के खिलाफ उपयोग करने के लिए तालिबान को मजबूत रखना पाकिस्तान की प्राथमिकता है।


अफगानिस्तान में तालिबान के साथ ही एक प्रमुख चुनौती कुख्यात आतंकी संगठन आईएसआईएस की भी है। इस्लामिक स्टेट ने अरब जगत से बाहर अपने पैर पसारने की कोशिशों के तहत् बहुत कम समय में अफ़ग़ानिस्तान के कम से कम पांच प्रांतों हेलमंद, ज़ाबुल, फ़राह, लोगार और नंगरहार में अपनी मौजूदगी का अहसास कराया हैं। इस्लामिक स्टेट अफ़ग़ान तालिबान लड़ाकों को खदेड़ना चाहता है और ये भी चाहता है कि तालिबान-अलक़ायदा गठबंधन में शामिल लड़ाके उसका हाथ थाम लें। लेकिन स्थानीय समर्थन और राजनीतिक बल हासिल करने की इस क़वायद में इस्लामिक स्टेट को तालिबान से  जबरदस्त संघर्ष करना पड़ रहा है।


इस्लामिक स्टेट ने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान में अपने पैर जमाने की कोशिशें जारी रखी हैं ताकि वो मध्य एशिया, चेचन और चीनी वीगर उग्रवादियों से गठजोड़ कर सके। इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव से रूस आशंकित है और वह पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में तथाकथित इस्लामिक स्टेट के उदय को रोकने के लिए तालिबान की तरफ़ हाथ बढ़ा रहा है,क्योंकि रूस को डर है कि मध्य एशिया से होते हुए इस्लामिक चरमपंथी हिंसा कहीं रूस तक न पहुंच जाए। अफ़गानिस्तान में शांति की स्थापना के लिए तालिबान के साथ बातचीत की कोशिशों में रूस रूस की बढ़ी भूमिका को लेकर अमरीका आशंकित है और उसे यह मंजूर भी नहीं। पाकिस्तान, चीन,ईरान  और रूस के पनपते कूटनीतिक संबंधों को लेकर अमेरिका सावधान है, वही भारत की भूमिका को लेकर पाकिस्तान आशंकित है।


आतंकवाद से बेहाल अफगानिस्तान में बेरोज़गारी लगभग 25 फीसदी है और लगभग 55 फीसदी अफ़ग़ान गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। अफगानिस्तान में विकास की वैश्विक कोशिशें धराशाई हो रही है और अस्थिरता बढ़ती जा रही है। इसके पहले 2012 में टोकियों वार्ता के बाद अफगानिस्तान को व्यापक सहायता मिली थी। इस सहायता के कारण गृह युद्द से जूझते इस देश मे शिक्षा,स्वास्थ्य और संचार की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हुई बल्कि आधारभूत संरचना का भी विकास हुआ। बेहतर सड़कों का जाल बिछाया गया तथा बिजली की व्यवस्था भी दुरुस्त की गई। भारत ने अफगानिस्तान के स्थाई विकास के लिए व्यापक अभियान चलाया तथा कृषि,उत्खनन,स्वास्थ्य क्षेत्र, प्रौद्योगिकी तथा प्रशिक्षण में व्यापक सहयोग किया। लेकिन राजनीतिक स्थिरता जब तक यहां कायम नहीं हो जाती,तब तक इस देश का विकास सुनिश्चित नहीं हो सकता।


भारत में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत फ़रीद मामुन्दज़ई अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा बिगड़ती स्थिति और तालिबान पर शांति के लिए दबाव डालने में भारत की भूमिका को अहम  बताते है। जाहिर है भारत को नईदिल्ली में अफगानिस्तान को लेकर बहुपक्षीय वार्ता करना चाहिए। अफ़ग़ानिस्तान की सरकार भारत पर भरोसा करती है ऐसे में भारत को अग्रगामी नीति अपनाकर अफ़ग़ानिस्तान  में लोकतंत्र की स्थापना के लिए गंभीर प्रयास करना होंगे। अंतत: भारत को यह नहीं भूलना चाहिए की अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का उदय भारत की सुरक्षा पर संघातिक हमला होगा और भारत को इस स्थिति को हर हाल में रोकना चाहिए।


इस समय तालिबान को अन्य इस्लामी समूहों के लड़ाकों से मदद मिलती जा रही है,ऐसे में यूरोप और अमेरिका के शहरों में छोटे चरमपंथी समूहों के अफ़ग़ानिस्तान में जुटने की आशंका बढ़ेगी। अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथी तेज़ी से आगे बढ़े हैं क्योंकि देश में 20 साल के सैन्य अभियानों के बाद अमेरिकी सेना वापस बुला ली गई है। मध्यपूर्व में अस्थिरता फैलाने के लिए महाशक्तियां भाड़े के सैनिकों का उपयोग करती रही है।  पैसे के लिए दुनिया के किसी भी भाग में जाकर लड़ने के लिए तैयार यह सैनिक अफगानिस्तान,पाकिस्तान,लीबिया,लेबनान,सीरिया,इराक,यमन,सुडान और नाइजीरिया जैसे गरीब और गृहयुद्द से जूझने वाले देशों से होते है। सैनिकों के साथ ही इनमें आतंकवादियों का भी उपयोग किया जाता है,जिनके प्रशिक्षण अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होते रहे है। तुर्की की और से नागोर्नो-काराबाख में भेजे गए लड़ाके पाकिस्तान में प्रशिक्षित थे,अब इन लड़ाकों का तालिबान की और से लड़ने की आशंका बढ़ गयी है।    पाकिस्तान के प्रशिक्षण स्थलों से निकलने वाले लड़ाके धार्मिक युद्द के नाम पर तैयार किए जाते है और वे बेहद दुर्दांत होते है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान यह स्वीकार कर चुके है  कि उनके देश में अभी भी 30 से 40 हजार आतंकी है। पाकिस्तान  में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट और जमायत-उल-उलूम-इलइस्लामिया जैसे संस्थान बहुत कुख्यात है।  मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। इस संस्थानों का काम इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देना है। यहां पर सिंकियांग के उइगुर समेत उजबेक और तुर्क प्रशिक्षण लेते रहे है। चेचन्या में रुसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी और मुल्ला उमर समेत तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले है।


पाकिस्तान और तालिबान का आतंक का यह समूचा तंत्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया,अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। कॉकेशस से जुड़े नागोर्नो-काराबाख़ पर कब्ज़े को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच लड़ाई में इन लड़ाकों का शामिल होना यूरोप और एशिया के कई राष्ट्रों की सुरक्षा का संकट बढ़ा चूका है और अब तालिबान के पक्ष में इनके लड़ने से एक नए प्रकार के आतंक की समस्या इस क्षेत्र में उत्पन्न हो सकती है।

brahmadeep alune

लद्दाख पर अमेरिकी चिंता laddakh china amerika janstta

  जनसत्ता                                दुर्गम हिमालयीन क्षेत्र में स्पष्ट सीमा रेखा का प्रश्न उठाकर वास्तविक नियंत्रण रेखा के अस्...