शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

बिक गया पाकिस्तान.... ! bik gaya pakistan politics

 पॉलिटिक्स

                         

                   

                                                           

 

पाकिस्तान की जमीन,संस्कृति,पर्यटन,कृषि,संप्रभुता,संसाधन,बंदरगाह, अर्थव्यवस्था,स्टॉक एक्सचेंज,समुद्र और आसमान पर अब चीन का कब्जा बढ़ता जा है। पाकिस्तान चीनी मॉडल पर आधारित ऐसा देश बनने की ओर तेजी से अग्रसर  है जिसकी हर जरूरत चीन से पूरी होगी और देश पर चीन का पूरा नियंत्रण भी होगा। इस्लामाबाद में 50 हजार से ज्यादा चीनी रह रहे है,पाकिस्तान के स्कूलों में मंदारिन को अनिवार्य कर दिया गया है। बैंकों में युआन के लेन देन को आसान बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग,मेट्रो और अन्य यातायात के प्रबंधन की जिम्मेदारियां चीनी कम्पनियां उठा रही है। विकास के मास्टर प्लान के अंतर्गत पाकिस्तान की हजारों एकड़ जमीन चीन को सौंप दी गई है जिस पर वह फसल उगाएगा। चीन सीपीईसी परियोजना के जरिए निर्माण के साथ पाक के ऊर्जा संकट को दूर करने का दावा भी कर रहा है,इसके लिए चीन पूरे पाक में करीब 17 परियोजनाएं संचालित कर रहा है। आने वाले समय में पाकिस्तान के लोग अपनी बिजली जरूरतों के लिए चीन पर पूरी तरह निर्भर हो जाएंगे। दुनिया भर में सस्ता और नकली मॉल भेजने वाले चीन पाक के कई इलाकों में गोदामों का एक राष्ट्रीय भण्डारण नेटवर्क भी स्थापित कर रहा है,यहीं नहीं चीन की निगाहें पाकिस्तान के खनिज संसाधनों पर भी है


इमरान खान का नया पाकिस्तान धोखा

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने दावा किया है कि इस साल 2021 में ही इमरान खान ने 10 अरब डॉलर का लोन लिया है जिससे पाकिस्तान का कुल कर्ज 35 फीसदी बढ़ गया है। इस प्रकार इमरान खान के कार्यकाल में पाकिस्‍तान का बाहरी कर्ज 95 अरब डॉलर से बढ़कर 116 अरब डॉलर हो गया है।

इमरान खान नए पाकिस्तान कि बात कहकर करोड़ों लोगों को गुमराह कर रहे है जबकि हकीकत बेहद अलग है। अभी पाकिस्तान कि विकास दर पांच  फीसदी से भी कम है लेकिन 2022 तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का ख्याली महल,दस फीसदी बेरोजगारी दर,लाखों लोगों को रोजगार नहीं लेकिन सैन्य बलों की तनख्वाह में 10 फीसदी बढ़ोत्तरी,देश के 42 प्रतिशत लोग खेती से जुड़े लेकिन इसमें लगातार गिरावट जबकि सैन्य खर्च में 15 फीसदी बढोत्तरी,देशी और सरकारी कल कारखाने बर्बाद होकर बंद होने की कगार पर,कर देने वाले महज 1 प्रतिशत और सरकारी खर्च का कोई हिसाब नहीं,यहीं हकीकत है 21 करोड़ आबादी वाले पाकिस्तान की


चीन गुलाम बनाकर अब ऋण माफ नहीं करेगा

पाकिस्‍तान पर 30 दिसंबर 2020 तक कुल 294 अरब डॉलर का कर्ज था जो उसकी कुल जीडीपी का 109 प्रतिशत है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि कर्ज और जीडीपी का यह अनुपात वर्ष 2023 के अंत तक 220 फीसदी तक हो सकता है। इस साल इमरान खान सरकार के पांच साल पूरे हो जाएंगे। इमरान खान ने सत्‍ता संभालने से पहले चुनाव प्रचार में वादा किया था कि वह एक नया पाकिस्‍तान बनाएंगे जो दुनिया से कर्ज के लिए भीख नहीं मांगेगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्‍तान में बनाए ऊर्जा प्‍लांट पर चीन ने करीब 19 अरब डॉलर का निवेश किया है। चीन ने पाकिस्‍तान के ऊर्जा खरीद पर हुए समझौते को पुनर्गठित करने के अनुरोध को खारिज कर दिया और कहा कि कर्ज में किसी भी राहत के लिए चीनी बैंकों को अपने नियम और शर्तों में बदलाव करना होगा। चीनी बैंक पाकिस्‍तान सरकार के साथ पहले हुए समझौते के किसी भी शर्त को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं।


वन बेल्ट वन रोड से पाकिस्तान रोड पर आया

यह तीन ख़रब अमरीकी डॉलर से ज़्यादा की लागत वाली परियोजना है। इसके तहत आधारभूत ढांचा विकसित किया जाना है। इसके ज़रिए चीन सेंट्रल एशिया, दक्षिणी-पूर्वी एशिया और मध्य-पूर्व में अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है। पाकिस्तान इसका महत्वपूर्ण अंग है और चीन ने विकास के सपने दिखाकर पाकिस्तान को बूरी तरह उलझा दिया है। इस परियोजना में  चीन के सरकारी बैंकों का पैसा लगा है और इसकी शर्ते बेहद सख्त है। पाकिस्तान ने कभी यह अनुमान नहीं लगाया कि कर्ज़ से उनकी प्रगति किस हद तक होगी लेकिन यह साफ है कि कर्ज़ नहीं चुकाने की स्थिति में ही कर्ज़ लेने वाले पाकिस्तान को पूरा प्रोजेक्ट चीन के हवाले करना होगा। पाकिस्तान के बारे में कहा जा रहा है कि दबाव के बावजूद इस प्रोजेक्ट के अनुबंधों को सार्वजनिक नहीं किया गया है।


 

 पाकिस्तान बना आर्थिक उपनिवेश

पाकिस्तान में ग्वादर और चीन के समझौते को लेकर कहा जा रहा है कि पाकिस्तान चीन का आर्थिक उपनिवेश बन रहा है। ग्वादर में पैसे के निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर 40 सालों का समझौता है। चीन का इसके राजस्व पर 91 फ़ीसदी अधिकार होगा और ग्वादर अथॉरिटी पोर्ट को महज 9 फ़ीसदी मिलेगा। इससे साफ है कि  पाकिस्तान का अगले चार दशकों तक  ग्वादर पर नियंत्रण नहीं रहेगा।  चीन ने पाकिस्तान को उच्च ब्याज़ दर पर कर्ज़ दिया है। पाकिस्तान कि खस्ताहाल आर्थिक स्थिति से यह बल मिला है कि पाकिस्तान पर आने वाले वक़्त में चीनी कर्ज़ का बोझ और बढ़ेगा।


 

वैश्विक संस्थाओं ने भी चिंता जताई

इस साल पाकिस्तान को आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक की तरफ से 130 अरब रुपये का लोन मिला है। जिसमें आईएमएफ ने पाकिस्तान को 500 मिलियन डॉलर यानि 36 अरब 22 करोड़ 37 लाख रुपये का लोन दिया है। यानि,पाकिस्तान पूरी तरह से कर्ज के बोझ में धंसा हुआ है और रिपोर्ट के मुताबिक हर पाकिस्तानी नागरिक के सिर पर 2 लाख रुपये का कर्ज हो चुका है। ऐसे में आईएमएफ ने कहा है कि पाकिस्तान की जो स्थिति है, वो बेहद खराब है।


आतंकवाद के कारण पाकिस्तान को दस  बिलियन डॉलर का नुक़सान

पाकिस्तान विदेशी मदद पर अपनी आर्थिक स्थिति के लिए बहुत हद तक निर्भर है।  फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट में बने रहना देश की अर्थव्यवस्था को तोड़ने वाला हैइससे पाकिस्तान को हर साल करीब 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है इमरान खान को डर सता रहा है की एफएटीएफ़ पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करता है तो पहले से ही लचर चल रही अर्थव्यवस्था पर ख़तरा और बढ़ जाएगा,क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मदद नहीं मिल पाएगी। अंतर्राष्ट्रीय दबावों और प्रतिबंधों का असर दिख रहा है,देश में महंगाई बढ़ रही है तथा आम जनता के लिए रोजी रोटी जुटाना मुश्किल होता जा रहा है  

जाहिर है कर्ज में डूबा पाकिस्तान भविष्य में इससे कभी उबर पाएगा,इसकी संभावना बहुत कम है और ऐसे में पाकिस्तान में अस्थिरता ही बढ़ेगी। मुमकिन है जल्द ही पाकिस्तान में फिर से सैन्य शासन लागू हो,जिससे लोगों कि आवाज दबाई जा सके। चीन का प्रभाव इन आशंकाओं को बढ़ा रहा है।

 

बुधवार, 21 जुलाई 2021

इथोपिया में दांव पर नोबल शांति,ithopiya nobal shanti prize sahara

 राष्ट्रीय  सहारा


                         

अफ्रीका के बड़े और अग्रणी देशों में शुमार इथोपिया के प्रधानमंत्री अबिय अहमद अली को अपने देश में शांति और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने के उनके सकारात्मक प्रभाव वाले प्रयासों के लिए 2019 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया था  इसका खास कारण यह था कि  उन्होंने पड़ोसी देश इरिट्रिया के साथ दो दशक से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने में निर्णायक पहल  की थीनोबेल समिति ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा था कि उनकी राजनीतिक पहल और सुधारों ने कई नागरिकों के बीच बेहतर जीवन और बेहतर भविष्य के लिए उम्मीद जगा दीयहीं नहीं समिति ने यह उम्मीद भी जताई थी कि यह पुरस्कार प्रधानमंत्री अबिय अहमद के शांति और मेल-मिलाप के प्रयासों को मजबूती प्रदान करेगा


लेकिन अब इथोपिया के नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित प्रधानमंत्री अबिय अहमद की राजनीतिक सत्ता का व्यवहार शांति की उम्मीदों को ध्वस्त करता हुआ दिखाई दे रहा है अहमद के राजनीतिक क्रियाकलाप और अपने ही देश के लोगों पर हिंसा की कोशिशों से  इथोपिया में अस्थिरता बढ़ी है और इससे प्रभावित लाखों लोग  मानवीय त्रासदी से बूरी तरह से जूझने को मजबूर हो गए हैअहमद विपक्षी नेताओं के खिलाफ दमनकारी रणनीति अपनाएं हुए हैसंयुक्त राष्ट्र और अन्य सहायता समूहों के अनुसार इथोपिया के टिग्रे प्रांत में बच्चे कुपोषण से मर रहे हैंसैनिक खाद्य सहायता लूट रहे हैं और सहायता कर्मियों को सबसे कठिन क्षेत्रों में पहुंचने से रोका गया हैइथोपिया की सरकारी सेना जमीनी और हवाई हमलों से टिग्रे प्रांत के लोगों को बड़ी संख्या में निशाना बना रही है और इन इलाकों में जाने से चिकित्सा कर्मियों को भी रोका जा रहा है जिससे प्रभावितों का इलाज न हो सके। इन सबके पीछे टिग्रे प्रांत में अबिय का राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की आक्रामक कोशिश है जिससे इस प्रांत की प्रभावशील और लोकप्रिय पार्टी पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट को दबाया जा सके


यह बेहद अविश्वनीय है कि कुछ समय पहले तक शांति के लिए प्रतिबद्द प्रधानमंत्री अबिय अहमद अमानवीयता की सीमाएं लाँघ रहे है और अपनी सरकारी सेनाओं का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग कर रहे है गौरतलब है कि इरिट्रिया की राजधानी अस्मारा में नौ जुलाई 2018 को ऐतिहासिक बैठक के बाद अबी और इरिट्रियाई राष्ट्रपति इसैआस अफवेरकी ने दोनों देशों के बीच 20 सालों के गतिरोध को औपचारिक रूप से समाप्त किया था और इसे अफ्रीका महाद्वीप में शांति स्थापना की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम माना गया था अबिय ने जेल से बागियों को रिहा किया,सरकार की नृशंसता के लिए माफी मांगी और निर्वासन में रह रहे सशस्त्र संगठनों का स्वागत कियाइसके अलावा उन्होंने केन्या और सोमालिया के बीच एक समुद्री क्षेत्र विवाद में मध्यस्थता करने में मदद की। तथा सूडान और दक्षिण सूडान के नेताओं को बातचीत के लिए एक साथ लाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईअबिय अफ्रीका के सबसे युवा और लोकप्रिय नेताओं में शुमार है। इथोपिया को प्राचीन ईसाई राज्य कहा जाता है,चौथी शताब्दी में आधिकारिक तौर पर ईसाई धर्म अपनाने वाला इस क्षेत्र का पहला देश था 2018 में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद अबिय अहमद ने प्रधानमंत्री का पद संभाला और उन्होंने इथोपिया में परिवर्तनकारी बदलाव की बड़ी उम्मीदें जगाईं


अबिय अहमद एक मुस्लिम पिता और एक ईसाई मां के बेटे है और  उन्होंने देश में जातीय विभाजन को ठीक करने का वादा किया था। इथोपिया में 100 से ज्यादा जातीय समूह रहते है और इनका इतिहास बेहद रक्तरंजित रहा है। अबिय ने खुद की प्रशंसा को तो पसंद किया लेकिन उनके कुछ कार्यों को लेकर जैसे ही उनके देश में आलोचना होने लगी तो उनका व्यवहार आक्रामक हो गया। अबिय अहमद ने आलोचकों को दबाने के लिए पत्रकारों को गिरफ्तार करने,हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने तथा इंटरनेट बंद करने जैसे कदम उठायें इसके साथ ही सुरक्षा बलों पर यह भी आरोप है कि  उन्होंने विद्रोह दबाने के लिए सैकड़ों लोगों की हत्या  कर दी इस समय इथोपिया के टिग्रे क्षेत्र में हिंसा के चलते लोगों को भुखमरी और अकाल का सामना करना पड़ रहा है टिग्रे में सरकारी सेना के द्वारा हजारों लोगों को उनके घरों से खदेड़ दिया गया है,जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक जातीय सफाई अभियान कहा हैऐसे में वैश्विक समुदाय को यह डर सताने लगा है कि  अफ्रीका में राजनीतिक अस्थिरता का कारण इथोपिया का संकट न बन जाएं

संयुक्तराष्ट्र के अनुसार टिग्रे में हजारों बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं तथा करीब 18 लाख लोग अकाल की कगार पर खड़े हैं,जो पिछले कुछ महीनों से चल रहे संघर्ष का परिणाम हैटिग्रे पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट और सरकारी सेनाओं के बीच जारी लड़ाई की वजह से अभी तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है20 लाख के करीब लोगों को विस्थापित होना पड़ा हैयुद्ध लड़ रहे दोनों पक्षों पर बड़े पैमाने पर हत्या और मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगा है यह क्षेत्र दशकों में सबसे खराब अकाल की स्थिति का अनुभव कर रहा है करीब 52 लाख लोगों को अभी भी मानवीय सहायता की जरूरत है,इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं संयुक्तराष्ट्र इन इलाकों में मानवीय मदद देना चाहता है लेकिन इसे भी इथोपिया की सरकार रोक रही है


हाल ही में इथोपिया में प्रधानमंत्री अबिय अहमद की प्रॉस्‍पेरिटी पार्टी संसदीय चुनाव जीत गई है वहीं विपक्षी दलों ने चुनावों में व्यापक धांधली,परेशान करने और धमकी दिये जाने का आरोप लगाया हैइससे देश के दूसरे इलाकों में भी अस्थिरता बढने का खतरा मंडरा रहा है इथोपिया को जातीय आधार पर 10 क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित किया गया है इन राज्यों को स्वायत्त राज्य के रूप में बताया गया है,लेकिन यहां पर केंद्रीय संस्थानों की मौजूदगी भी है। टिग्रे के नेताओं  का कहना है कि अबी अहमद संघीय ताकतों को राज्य में बढ़ा रहे है तथा विरोधियों को निशाना बना रहे है। इथोपिया का टिग्रे प्रांत राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत माना  जाता है और यहां के राजनीतिक दलों ने देश की सत्ता को भी लंबे समय तक संभाली है। अबिय के निशाने पर टिग्रे के राजनीतिक नेता और राजनीतिक दल है।


इथोपिया ने राजशाही,साम्यवादी की तानाशाही के साथ विद्रोह,भयंकर अकाल और शरणार्थियों की बड़ी संख्या जैसी समस्याओं का लंबे समय तक सामना किया  है लेकिन बीते कुछ दशकों में यहां राजनीतिक स्थिरता कायम करने में सफलता मिली थी इथोपिया को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यस्थाओं में से एक माना जाता है तथा यह  कॉफी और अफ्रीका में शहद का अग्रणी उत्पादक देश है इथोपिया में राजनीतिक स्थिरता कायम रहने से इसका आर्थिक और राजनीतिक लाभ अफ्रीका के कई गरीब देशों को मिल सकता है इसके लिए जरूरी है कि प्रधानमंत्री अबिय अहमद राजनीतिक उदारता का परिचय देते हुए टिग्रे के नेताओं से बातचीत करके युद्द को रोके तथा  युद्दग्रस्त क्षेत्र में मानवीय सहायता को बाधित न होने दें अबिय अहमद को यह समझना  होगा की भुखमरी से जूझते लाखों लोगों के लिए मानवीय सहायता मरहम का काम करेगी और इससे निश्चित ही इस पूरे क्षेत्र में शांति स्थापित करने में मदद मिल सकती है 

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

क्या बदल जाएगी मुस्लिम पहचान...? uniform civil code politics india

 पॉलिटिक्स


                                                                                                      

                                                            


इस्लाम के पांच मूल स्तंभ माने जाते है,तौहीद,नमाज़,रोज़ा,ज़कात और हज। तौहीद अर्थात् एकेश्वरवाद।  ये किसी भी इस्लाम धर्म को मानने वाले के लिए पहली सीढ़ी है जिसमें एक ही ईश्वर को मानना मुसलमान होने के लिए आवश्यक है  इसके बाद नमाज है जो बेहद अहम है पांच वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ की गई है जो कि तय किये गए वक़्त में पढ़ना ज़रूरी है। तीसरा स्तंभ रोजा है,जिसे पाक रमजान महीने में हर दिन रखा जाता है यह इन्द्रियों को वश में रखने का संदेश देता है बुरा मत देखों,बुरा मत बोलो,बुरा मत सुनो के साथ इसका  मतलब कड़ी इबादत करना और खुद को भूख और प्यास को  सहन करना भी होता है जिसे अल्लाह को राजी करने का मार्ग माना जाता है। चौथा स्तंभ ज़कात है जिसका मतलब समाज के धनवान व्यक्ति अपनी कमाई का कुछ हिस्सा  गरीबों में बांटे, जिससे समाज मे एक संतुलन स्थापित होता है। पांचवा और  अंतिम महत्वपूर्ण स्तंभ हज है,जिसके बारे में यह साफ है कि इस्लाम मे हर इंसान को अपनी ज़िंदगी मे कम से कम एक बार हज करना ज़रूरी होता है। वहीं पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ने कहा है कि अगर किसी गरीब शख्स ने अपनी ईमानदारी कमाई से अपनी बेटी का निकाह ही कर दिया तो ये भी हज करने के बराबर ही मन जाएगा।


क्या भारत में समान नागरिक संहिता लागू होने से इन धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पांच स्तंभों का पालन करने में मुसलमानों को कोई अड़चन आएगीभारत में समग्र रूप से सभी धर्मों का सम्मान करने की संवैधानिक मान्यता प्रचलित है। भारत के संविधान ने यहां रह रहे नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए हैंउन्हीं अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी शामिल है। जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक में मिलता है भारत में यह अधिकार हर एक व्यक्ति या कहें कि नागरिकों को समान रूप से प्राप्त हैअल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा को लेकर भारत सरकार का स्पष्ट मत है कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है,जहाँ संविधान धर्मनिरपेक्षता का परिचायक है तथा मौलिक अधिकारों के माध्यम से धार्मिक स्वतंत्रता को संरक्षण प्रदान करता है और साथ ही लोकतांत्रिक शासन और विधि के शासन को बढ़ावा भी देता है। इसका स्पष्ट सन्देश है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू होने की दशा में धार्मिक स्वतन्त्रता बिलकुल भी प्रभावित नहीं होगी


समान नागरिक संहिता जैसे कानून पहले ही लागू है..

दंड प्रक्रिया संहिता,भारतीय अनुबंध अधिनियम,नागरिक प्रक्रिया संहिता,माल बिक्री अधिनियम,संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम,भागीदारी अधिनियम, साक्ष्य अधिनियम आदि एक समान है और भारत के सभी नागरिकों पर समान लागु होते है

निजी कानूनों से दुविधा

हाल ही में समान नागरिक संहिता लागू करने की पैरवी करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि शादी और तलाक़ को लेकर अलग-अलग पर्सनल लॉज़ में जो विवाद की स्थिति है,उसको ख़त्म करने की ज़रूरत है। दरअसल भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू पर्सनल के अंतर्गत हिंदू,सिख,जैन और बौद्ध आते हैंजबकि मुस्लिम और ईसाई के लिए अपने कानून हैं। मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है


इंदौर का शाहबानो केस के बाद राजनीतिक मुद्दा

 

इंदौर कि शाहबानों ने लगभग साढ़े तीन दशक पहले पति से भरण पोषण को लेकर उच्चतम न्यायालय से न्याय की गुहार की थी,जिसके बाद उच्चतम  न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया था  शाहबानो के  पति मोहम्मद अहमद खान ने अदालत में यह कहते हुए गुजारा भत्ता देने से इंकार कर दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में ऐसा कोई कोई नियम नहीं हैबाद में अदालती फैसले के विरोध में कट्टरपंथी ताकतें लामबंद हो गयी और  उलेमाओं के दबाव में  आकर तत्कालीन सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दियाइस प्रकार सरकार के द्वारा विधि में परिवर्तन करते हुए मुस्लिम महिलाओं को मजबूत करने वाले न्यायालय के फैसले को निष्फल बना दिया गया

मुस्लिम महिलाओं के लिए कितना उपयोगी

देश में तकरीबन 9 करोड़ मुस्लिम महिलाएं है और वे समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद सशक्त हो जाएगी तथा लैंगिक पक्षपात की समस्या से भी निपटा जा सकेगाअभी पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे।


 

मजहबी अदालतों का विचार ख़ारिज

भारत के तकरीबन 20  करोड़ आबादी वाले मुसलमानों कि शैक्षणिक,आर्थिक और सामाजिक हालात बद से बदतर तो है ही उनके कई धार्मिक ठेकेदार भी आम मुसलमान के लिए समस्याएँ पैदा कर रहे है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का ध्यान मुसलमानों कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चिंताओं पर होना चाहिए लेकिन इसके स्वयंभू धार्मिक नेता मुसलमानों में अपनी खोती हुई साख बहाल करने के लिए देश के सभी ज़िलों में शरीया अदालत क़ायम करने का ऐलान कर देते है वे कहते है कि इन मनोनीत अदालतों में जमाते इस्लामी,जमीयत उलेमा ए हिंद,देवबंद, नदवा इस जैसे संस्थानों के काज़ी और मुफ़्ती मुसलमानों के मसले का इस्लामी दृष्टिकोण से फ़ैसला सुनाएंगेभारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में मजहबी कोर्ट की बातें बहुसंख्यकों को परेशान करती है और इसका प्रभाव समाज से लेकर धार्मिक अलगाव तक सामने आ रहा है।


आधी आबादी का सवाल

संविधान सभी को बराबरी का अधिकार देता है,अत: गैर बराबरी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए समान नागरिक संहिता से गैर बराबरी समाप्त होगी और इसका सीधा फायदा महिलाओं को मिलेगा। इससे मुस्लिम महिलाओं समेत सभी धर्मों की महिलाओं का आत्म विश्वास बढ़ेगा। इसका साफ मतलब है कि देश की आधी आबादी सशक्त होगी।

दुनिया में स्थिति

दुनिया के कई देशों में समान नागरिक संहिता लागू है जिसमें बांग्लादेश,मलेशिया,तुर्की,इंडोनेशिया,सूडान और मिश्र जैसे देश भी है. इन देशों में मुसलमान बहुसंख्यक है लेकिन अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक भी बड़ी संख्या में रहते है। बांग्लादेश के हिन्दुओं को समान नागरिक संहिता से कोई शिकायत नहीं है वहीं तुर्की के ईसाई भी बढिया जीवन जीते है


बहरहाल समान नागरिक संहिता आस्था को प्रभावित किए बिना समानता स्थापित करने का  द्वार खोल  सकती है। भारत में गैर बराबरी से अभिशिप्त समाज को इसकी जरूरत है। जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने इसकी जरूरत पर बल देते हुए कहा है कि धर्म,जाति और समाज की पारंपरिक बेड़ियां आहिस्ता-आहिस्ता ग़ायब हो रही हैं इसलिए समान नागरिक संहिता केवल उम्मीद बनकर नहीं रहनी चाहिए  

 

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

नेपाल की नई सत्ता और संकट, nepal stta sankat

 

जनसत्ता

           


              

                                                                           

सत्ता औपचारिक,निश्चित व विशिष्ट होती है लेकिन सत्ता अपनी शक्ति को कभी भी निरंकुश,मनमाने व निरुद्देश्य तरीके से प्रयुक्त नहीं कर सकती है। स्पष्ट है कि लोकतान्त्रिक तंत्र में भी संविधानिक रूप से सत्ता पर कुछ प्रतिबन्ध या सीमाएं होती है जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। नेपाल की सर्वोच्च अदालत ने ओली की राजनीतिक सत्ता को कड़ा संदेश देते हुए तथा उनके और राष्ट्रपति द्वारा संसद भंग कर आम चुनाव करवाने की मंशा पर रोक लगाते हुए  शेर बहादुर देउबा को सत्ता संभालने का अवसर दिया है देउबा के पास 275  सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में 149 सदस्यों का समर्थन हासिल है। उन्हें करीब एक माह में समर्थन साबित करना है और इस बात की पूरी संभावना है कि वे अपना विश्वास मत साबित कर देंगे। ओली की बिदाई और देउबा की ताजपोशी भारत की दृष्टि से सकारात्मक है क्योंकि ओली जहां चीन के प्रभाव में थे वहीं देउबा भारत से मजबूत संबंधों को तरजीह देते रहे है।


इन सबके बीच नेपाल का राजनीतिक तंत्र करीब तीन वर्षों से केपी शर्मा ओली की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और कम्युनिज्म मजबूत करने की सनक से बूरी तरह पस्त रहा है। ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड की पार्टी सीपीएन-माओवादी सेंटर गठबंधन को 2018 में हुए आम चुनावों में 174 सीटों पर जीत  हासिल हुई थी प्रधानमंत्री पद के लिए ओली का समर्थन यूसीपीएन-माओवादी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल और मधेशी राइट्स फोरम डेमोक्रेटिक के अलावा  13  अन्य छोटी पार्टियों ने किया भी किया था


प्रधानमंत्री बनते ही ओली ने वह सब कुछ किया जिसकी इस धार्मिक और सनातन परम्परा में विश्वास करने वाले देश में कल्पना भी नहीं की गई थीओली को अपनी कम्युनिस्ट पहचान मजबूत करने और चीन के साथ खड़े दिखने का इतना उतावलापन था कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए ईश्वर का नाम लेने से इंकार कर दिया,यह बुद्द और विष्णु की भूमि के लिए बेहद अप्रत्याशित घटना थीइसके बाद भारत के प्रधानमन्त्री जब नेपाल गये तो पीएम मोदी ने जनकपुर में पूजा की लेकिन ओली ने नहीं की। ओली यहीं नही रुके उन्होंने चीन के इशारे पर नेपाल का अपना नया नक्शा जारी कर भारतीय क्षेत्रों कालापानी,लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को शामिल  कर अपने देश के इलाके बताएं,राम जन्मभूमि को नेपाल में ही बताया और चीन के लिए अपने देश के दरवाजे खोल दिए

भारत नेपाल संबंधों की विशेषताओं को जानते हुए भी  ओली ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए राष्ट्रवाद का दांव खेला। नेपालियों की युवा पीढ़ी की उच्च आकांक्षाओं को जगाने और सामने लाने के लिए ओली ने राष्ट्रवाद का सहारा लेकर भारत से सीमा विवाद को बढ़ाया और इसे राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ दिया।  नेपाली के प्रधानमंत्री का यह कदम बेहद अप्रत्याशित रहा और उन्होंने ऐसा करके उन्होंने नेपाल के भविष्य को दांव पर लगा दिया बल्कि भारत से लगती हुई लगभग 18 सौ किलोमीटर की सीमा की शांति को भंग कर विश्व शांति के लिए नई चुनौती पेश कर दी।


कई शताब्दियों तक राजशाही को स्वीकार करने वाले इस देश में 2007 के अंतरिम संविधान बनने के बाद राजतंत्र को खत्म तो कर दिया गया था लेकिन वामपंथ के उभार से लोकतंत्र स्थापित करने के सपने चकनाचूर हो गये। कम्युनिज्म धर्म को नहीं मानता और बुद्ध की विचारों में सनातन धर्म की समानता निहित है।  नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेता नेपाल को चीन जैसा बना देना चाहते है जबकि नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास और परम्पराओं में सनातन धर्म और बुद्ध की मान्यताओं  के चलते उसकी भारत से निकटता खत्म हो ही नहीं सकती।  ओली की चीन परस्ती अंततः उनके गले की ही हड्डी बन गई है और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ही उनके खिलाफ मुखर और लामबंद हो गए। किसी समय चीन की ओर देखने वाले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल के चेयरमेन पुष्पकुमार दहल प्रचंड भारत का समर्थन करने लगे है,वहीं नेपाल के माओवादी नेता भट्टराई को भी ओली का नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास को चोट पहुँचाने की कोशिशे रास नहीं आई इससे नेपाल में राजनीतिक गतिरोध बढ़ गया और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल के टूटने की संभावनाएं  गहरा गई। नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा देश में लोकतंत्र और समाजवाद को पसंद करता है जबकि ओली की विचारधारा नेपाल की धार्मिक प्रतिबद्धताओं को खत्म कर साम्यवाद  की तानाशाही संस्कृति को अपनाती दिख रही थी,इससे चीन को नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का अवसर भी मिल गया था।


केपी शर्मा ओली के कई कदमों को उनकी अपनी ही पार्टी ने संदेह की दृष्टि से देखाकभी चीन के समर्थक रहे वामपंथी नेता प्रचंड ने ओली की नीतियों को आत्मघाती बताया,वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के उप-प्रमुख बिष्णु रिजल ने ओली के राम जन्मभूमि नेपाल में ही होने के दावे की कड़ी आलोचना करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण और उकसावे का कृत्य बताया था। माओवादी सभासद के नाम से विख्यात नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.बाबूराम  भट्टराई ने अपने देश के वामपंथी प्रधानमंत्री ओली के राम जन्मस्थान के नेपाल में होने के दावे की तीखी आलोचना करते हुए यह कहने से गुरेज नहीं किया था कि यह प्रधानमंत्री का असंगत और राष्ट्रहित के विपरीत आचरण है और उन्हें पद से बिदा करना ही होगा 

अंततः ओली के विचार ही उनकी सत्ता से बिदाई का कारण बने लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति से मिलकर मध्यावधि चुनाव का दांव खेल दिया उनकी सलाह पर पिछले साल 20 दिसंबर को राष्ट्रपति भंडारी ने संसद भंग कर दी थी लेकिन फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इसे बहाल कर दिया थाएक बार फिर देश की बागडोर ओली के हाथ में आ गयी लेकिन उनके राजनीतिक अन्तर्विरोध के कारण संसद में उनका बहुमत साबित करना मुमकिन नहीं था इस साल मई में वे बहुमत साबित नहीं कर पायें। दूसरी तरफ नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देऊबा ने अपने लिए प्रधानमंत्री पद का दावा किया था और कहा था कि उनके पास 149 सांसदों का समर्थन हैलेकिन राष्ट्रपति भंडारी ने 275 सदस्यों वाले सदन को भंग कर इस साल नवंबर में मध्यावधि चुनावों की घोषणा कर दी थी


नेपाली कांग्रेस ने राष्ट्रपति के फैसले को अवैधानिक ठहराते हुए इसे अदालत में चुनौती दी थी और अंततः अदालत ने उनके दावे को वैध मानाअदालत के फैसले से नेपाल में कार्यपालिका,न्यायपालिका और विधायिका के बीच शक्ति और नियंत्रण के संतुलन पर नई बहस छिड गई हैएक लोकतांत्रिक व्यवस्था नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत पर कार्य करती है। यह नियंत्रण और संतुलन व्यवस्था ही है जो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करती है.नियंत्रण एवं संतुलन के सिद्धांत का आशय यह है कि सरकार के विभिन्न अंग एक दूसरे की शक्ति पर इस प्रकार से नियंत्रण स्थापित करें की शक्तियों का संतुलन बना रहे और कोई भी एक विभाग निरंकुश शक्तियों का प्रयोग ना कर सके। नेपाली संविधान के अनुच्छेद 76(5) में कहा गया है कि राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदस्य को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त कर सकती हैं, अगर उन्हें इस बात पर विश्वास हो कि वो संसद में विश्वासमत हासिल कर सकने की स्थिति में है देउबा की मजबूत स्थिति के बाद भी राष्ट्रपति द्वारा ओली का समर्थन कर देश को मध्यावधि चुनाव की कगार पर धकेलना अदालत को भी रास नहीं आया

75 वर्षीय देउबा को संसद में 30 दिनों के अंदर विश्वास मत हासिल करना होगा। वहीं कार्यवाहक प्रधानमंत्री ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि उन्होंने कोर्ट पर विपक्षी दलों के पक्ष में जानबूझकर फैसला सुनाने का आरोप भी लगाया। ओली ने कहा कि फैसले का दीर्घकालीन प्रभाव पड़ेगा।


नेपाल की संघीय संसद में ओली की सत्तारुढ़ सीपीएन-यूएमएल के 121 वोट हैंलेकिन पार्टी में अंदरुनी विवाद चल रहा था जिसमें दो पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल और झलनाथ खनाल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है संघीय संसद में मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस और तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ खड़ी थीं

अब देउबा की सत्ता में वापसी से नेपाल में राजनीतिक गतिरोध  खत्म होने की संभावनाएं तो जगी है लेकिन चीन की असामान्य भूमिका राजनीतिक संकट बढ़ा सकती है गौरतलब है कि नेपाल में चीन की राजदूत  हाओ यांकी लगातार नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी में एकता स्थापित करने का प्रयास कर रही थी इसे नेपाल के राजनीतिक हलकों में असामान्य माना गया और इसकी कड़ी आलोचना भी हुई चीन की राजदूत हाओ यांकी ने सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं के अलावा राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी तक से सीधे मुलाकात की थी ओली की सत्‍ता को बचाने के लिए दिन-रात एक करने वाली चीन की राजदूत हाओ यांकी के खिलाफ नेपाल में आम जनता से से लेकर राजनीतिक रूप से विरोध हुआ और इसे नेपाल के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप माना गया था।


अब नेपाल ने राजनीतिक परिवर्तन के बाद चीन देउबा के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश तो करेगा,वहीं यह आशंका भी है कि देउबा के भारत से मजबूत संबंधों के चलते उन्हें अस्थिर करने की कोशिशें भी हो सकती है। नेपाल में चीन के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता।  जाहिर है नेपाल में अब राजनीतिक अस्थिरता का अर्थ होगा देश में माओवाद का पुनः सिर उठाना। इस स्थिति से न केवल नेपाल को बचना होगा। 

brahmadeep alune

बिक गया पाकिस्तान.... ! bik gaya pakistan politics

  पॉलिटिक्स                                                                                                             पाकिस्तान...