आंतरिक सुरक्षा का संकट,Asam mijoram vivad rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा


                         

विविधताओं वाले भारत की संविधानिक प्रतिबद्धताताओं को क्षेत्रीयतावाद की चुनौती का अक्सर सामना करना पड़ता है। पूर्वोत्तर में जितनी भौगोलिक असमानताएं है उससे कही ज्यादा सांस्कृतिक विभिन्नताएं है। बराक घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी में बंटे इसके प्राकृतिक क्षेत्र कबीलों और जातियों के प्रभुत्व की रक्तरंजित लड़ाई से अभिशिप्त रहे है और देश की सुरक्षा के लिए यह बड़ा चुनौतीपूर्ण रहा है। इन समस्याओं को क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी बढ़ाते रहे है। दरअसल असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद में पुलिसकर्मियों का मारा जाना तो दुखदायी है ही उससे भी बड़ी हिमाकत यह है कि उन पुलिसकर्मियों को शहीद कहकर असम की सरकार ने क्षेत्रीय राजनीति का ऐसा दांव खेला है जिसके दूरगामी परिणाम अलगाव और आतंक की ओर जाते है।  


हम सब जानते है कि पूर्वोत्तर में लोकतंत्र पर अलगाववाद हावी रहा है और आज़ादी के आठवे दशक में प्रवेश करने के बाद भी समस्या जस की तस नजर आती है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि गृहमंत्री इस घटना के  कुछ समय पहले असम की यात्रा पर थे और उन्होंने पूर्वोत्तर में शांति स्थापित हो जाने का दावा किया था। इसके बाद भी दो राज्यों के बीच सीमा विवाद  का हिंसक हो जाना यह इशारा करता है कि पूर्वोत्तर में सब कुछ सामान्य नहीं है और इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए महज राजनीतिक प्रयासों के बूते निश्चिंत हो जाना देश की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।


पूर्वोत्तर का केंद्र असम अन्य उत्तर पूर्वी भारतीय राज्यों से घिरा हुआ है।  प्रशासनिक दृष्टि से इसका विभाजन कर अन्य राज्य बनाएं गए है। उत्तर पूर्व में अधिकांश जनजातीय समाज रहता है जो अपनी सांस्कृतिक महत्ताओं को लेकर बेहद सजग और संवेदनशील है,इसी को दृष्टिगत रखते हुए इस क्षेत्र को विशेषाधिकार दिए गये है। असम के उत्तर में अरुणाचल प्रदेश,पूर्व में नागालैंड तथा मणिपुर,दक्षिण में मिजोरम,मेघालय तथा त्रिपुरा एवं पश्चिम में पश्चिम बंगाल स्थित है।


2019 में जम्मू कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 के विशेष अनुबंध को समाप्त किया गया तब पूर्वोत्तर में यह बवाल उठा था कि यह सब पूर्वोत्तर के राज्यों में भी किया जायेगा। इसके जवाब में केंद्र को यह आश्वस्त करना पड़ा था कि देश पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान बनाएं और बचाएं रखने के लिए प्रतिबद्द है। गौरतलब है कि भारतीय संविधान के भाग-21 में कुछ राज्यों को विशेष दर्जा दिया गया हैनगालैंड की सांस्कृतिक स्वायतत्ता और वहाँ मज़बूत कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने के अनुच्छेद 371 क को शामिल किया गयाइसी प्रकार अनुच्छेद 371 ख असम राज्य के लिये विशेष उपबंध करता है। अनुच्छेद 371 ग में मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों के संबंध में विशेष उपबंध किये गए। वहीं मिज़ोरम को चकमा,मारा तथा लई जनजातीय जिलों के आधार पर विशेषाधिकार प्राप्त है


ऐसा माना जाता है कि प्रशासनिक सहूलियत के लिए असम से अलग कर अस्तित्व में आएं विभिन्न राज्यों की सीमाएं जनजातीय इलाकों और उनकी पहचान के साथ मेल नहीं खाती हैंइस वजह से सीमावर्ती इलाकों में लगातार तनाव बना रहता है और अक्सर हिंसक झड़पें होती रहती हैं इस क्षेत्र की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ भी सुरक्षा के लिए चुनौतियां उत्पन्न करती रही है

मेघालय असम पुनर्गठन अधिनियम,1971 को चुनौती देता रहा है,इस राज्य के अनुसार इस अधिनियम से मेघालय की खासी और जयंतिया पहाड़ियों को असम में रखा गया है जबकि यह जनजातीय पहाड़ियां उसकी सांस्कृतिक पहचान है। पूर्वोत्तर में घुसपैठ ने  समस्या को बढ़ाया है और जनसंख्या की बढती तादाद से जनजातीय इलाके प्रभावित होते है जिससे असंतोष भडकता रहा है। मिजोरम या मेघालय जैसे राज्य बहुत छोटे है और यह जंगल से घिरे हैलेकिन आबादी के बढ़ते दबाव की वजह से लोगों को जीवन निर्वहन के लिए स्थान ढूँढना पड़ रहा है और यह जमीन का मुद्दा ही संकट का कारण बन गया है


पूर्वोत्तर राज्यों के बीच आपसी सीमा विवाद की जड़ में भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4 हजार किलोमीटर से ज्यादा की सीमा रेखा भी है,जो मुख्यतः असम,त्रिपुरा,पश्चिम बंगाल,मेघालय और मिजोरम को छूती है। पूर्वी पाकिस्तान से असम में घुसपैठ का सिलसिला 1947 से लगातार चल रहा है।1971 में पाकिस्तान सेना के बंगालियों पर अत्याचार से यह समस्या और ज्यादा गहरा गई। इस समय देश  से कही ज्यादा असम के एक परिवार में औसतन 5.5 सदस्य हैजिसके कारण राज्य की बेरोजगारी दर बढ़कर 61 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यहीं नहीं जनसंख्या घनत्व 340 से बढ़कर वर्तमान में 400 तक पहुंच गया है

असम से अलग हुए मेघालय,मणिपुर,नागालैंड समेत त्रिपुरा को जनजातियों का राज्य माना जाता था और यहां 80 प्रतिशत जनजातियां निवास करती थी। 1971 के बाद यहां की जनसंख्या में भारी बदलाव आया है और अब जनजातीय समूह अल्पमत में आ गए है। पूर्वोत्तर के जनसांख्यिकी बदलाव से सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खोने का संकट बढ़ा तो जनजातीय समूहों ने हथियार उठा लिए और अब इन इलाकों में पृथकतावादी और हिंसक आंदोलनों  का गहरा प्रभाव देखने में आता है। दूसरी तरफ पूर्वोत्तर में घुसपैठ और उग्रवाद की समस्या इतनी विकराल रही है कि यहां काम करने वाली सरकारें इन्हीं मुद्दों में उलझी रहती है,जिससे यह समूचा क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता के बाद भी गरीबी,पिछड़ेपन,जातीय हिंसा और साम्प्रदायिक समस्याओं में बूरी तरह जकड़ा हुआ है


असम बड़ा राज्य है और उसकी समस्याएं भी बड़ी हैअसम से अलग हुए अरुणाचल,नागालैंड,मिजोरम और मणिपुर में इनर लाइन परमिट प्रणाली लागू हैइसका अर्थ यह है कि  इन राज्यों में परमिट लेकर ही अन्य राज्य का व्यक्ति बाहर राज्यों में प्रवेश कर सकता और निश्चित अवधि तक वहां रुक सकता है जबकि इन राज्यों के लोग बिना किसी रोक के असम में आवाजाही कर सकते हैं। असम के व्यापारी ऐसे कानून का विरोध करते रहे है। वहीं असम के बोडो ने मूल निवासी बनाम प्रवासी को अपना मुख्य एजेंडा बना लिया,उन्होंने प्रवासी मुसलमानों और अन्य आदिवासी समूहों को निशाना बनाना शुरू किया जो जातीय और साम्प्रदायिक उन्माद का कारण बन गया है


केंद्र सरकार ने देश में 7 अंतर-राज्यीय सीमा विवाद को स्वीकार किया है जिसमें हरियाणा-हिमाचल प्रदेश,लद्दाख संघ राज्य क्षेत्र-हिमाचल प्रदेश,महाराष्ट्र-कर्नाटक,असम-अरूणाचल प्रदेश,असम-नागालैंड,असम-मेघालय और असम-मिजोरम शामिल हैइन राज्यों के बीच सीमाओं के निर्धारण के फलस्वरूप सीमा विवाद पैदा हुए हैं तथा उनके बीच क्षेत्र संबंधी दावे एवं प्रति दावे किये गए हैंरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले साल आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों के बारे में बात करते हुए कहा था कि,सरकार ने एक त्रि-आयामी दृष्टिकोण अपनाया हैइसमें पीड़ितों को न्याय के प्रावधान के साथ-साथ आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्रों का विकास शामिल हैइसमें राजनीतिक समाधान को संभव बनाने के उद्देश्य से असंतुष्ट समूहों के साथ समझौतों पर बातचीत करने के लिए आधे से अधिक रास्ते तक जाने की क्षमता और इच्छा भी शामिल हैअगर यथास्थिति असहाय नागरिकों और शासन के प्रावधानों के शोषण का एक उपकरण बन जाती है,तो हम यथास्थिति को चुनौती देने के लिए भी तैयार हैं।”


जाहिर है पूर्वोत्तर समेत अन्य राज्यों के बीच यथास्थिति आंतरिक सुरक्षा का संकट और समस्याओं को बढ़ा रही है। केंद्र सरकार को इन समस्याओं को खत्म करने के लिए अपने त्रि-आयामी दृष्टिकोण को इच्छाशक्ति के साथ जमीन पर उतारने की जरूरत है

 

 

लोकतंत्र बर्खास्त... ! loktantra barkhast politics Tunisia Africa

 पॉलिटिक्स

      

उत्तरी अफ़्रीकी देश टयूनेशिया के लोग सडकों पर प्रधानमंत्री हिचम मेकिची सरकार के बर्खास्त होने का जश्न मना रहे है  उनके इस जश्न में देश के राष्ट्रपति कैस सैयद भी शामिल हो गए है  राष्ट्रपति का कहना है कि उन्होंने देश में शांति लाने के इरादे से ऐसा किया है   करीब सवा करोड़ की आबादी वाला  ट्यूनीशिया उदार इस्लामिक राष्ट्र है जिसे अफ्रीका का यूरोप कहा जाता है  यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित खूबसूरत देश जिसके पूर्व में लीबिया और पश्चिम मे अल्जीरिया हैं। देश की पैंतालीस प्रतिशत ज़मीन सहारा रेगिस्तान में है जबकि बाक़ी तटीय जमीन खेती के लिए इस्तमाल होती है   इस्लामिक  देश होने के बावजूद इस देश का समाज खुलेपन और विकास को पसंद करता है और इसी कारण ट्यूनीशिया अफ्रीका में यूरोप की तरह  दिखाई देता है 


करीब एक दशक पहले 2011 में अरबी राजशाहों व तानाशाहों से त्रस्त इस देश की जनता ने सड़कों पर शुरू हुए प्रदर्शन कर सत्ता को चुनौती दी थी   इसके बाद यह सत्ता विरोधी आंदोलन सूडान,अल्जीरिया,सीरिया और अन्य अरब के देशों में भी फ़ैल गए,इसे  अरब स्प्रिंग कहा जाता है ट्यूनीशिया में हुई क्रांति ने देश में लोकतंत्र की राह बनाई थी लोगों की उम्मीद थी कि लोकतांत्रिक सरकार आने के बाद उनके लिए नौकरियों और रोज़गार के मौके बढ़ेंगेलेकिन उनके हाथ निराशा ही लगी है एक बार फिर लोग सरकार से गुस्से में है और विरोध प्रदर्शनों से देश की समूची व्यवस्थाएं चरमरा गई है


 

 

कोरोना काल की सरकार की नाकामी से जनता भड़क गई

 

प्रधानमंत्री हिचम मेकिची से टयूनेशिया के लोगों को अपेक्षा थी कि वे देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट से उबार कर युवाओं को रोजगार देंगे,लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ  आज ट्यूनीशिया गंभीर आर्थिक संकट और कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहा है  संक्रमण के मामलों ने  तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है और इससे ट्यूनीशियाई अर्थव्यवस्था पर दबाव ज्यादा  बढ़  गया है  समय पर इलाज नहीं मिल पाने से लोग मर रहे है,स्वास्थ्य सेवाएं अस्त व्यस्त है  कोरोना महामारी से निबटने में सरकार की नाकामी से लोगों का ग़ुस्सा सातवे आसमान पर है  हालात की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री हिचम मेकिची ने कुछ दिनों पहले स्वास्थ्य मंत्री को बर्ख़ास्त किया था,लेकिन यह लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए नाकाफ़ी साबित हुआ  लोग सरकार को गेट आउट कहकर विरोध कर रहे थे  ऐसे प्रदर्शन देश भर में लगातार हो रहे थे,जिसके बाद राष्ट्रपति कैस सैयद ने प्रधानमंत्री हिचम मेकिची की सरकार को बर्खास्त कर दिया 


 

तख्तापलट की आशंका

 

ट्यूनीशियाई संसद के स्पीकर रैच गनाची ने राष्ट्रपति पर तख़्तापलट का आरोप लगाया है  वहीं आम जनता सरकार से इतना गुस्सा है कि कई प्रदर्शनकारियों ने सत्ताधारी पार्टी एनादा के दफ़्तरों में घुसकर वहाँ कंप्यूटर और बाकी चीज़ों में आग लगा दी है  इस समय जनता राष्ट्रपति कैस सैयद के प्रभाव में है और राष्ट्रपति ने विश्वास पूर्वक कहा है कि ट्यूनीशिया में सामाजिक शांति बहाल करने और अपने देश को बचाने के लिए यह कदम जरुरी था 


 

टयूनेशिया की राजनीतिक अस्थिरता अल कायदा के लिए मुफीद

 

पड़ोसी देश अल्जीरिया और लीबिया में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन हावी है और इन देशों में गृह युद्द चल रहा है   इसका प्रभाव टयूनेशिया पर भी पड़ता रहा हैसलाफ़ी कट्टरपंथियों  द्वारा टयूनेशिया को अपनी गिरफ्त में लेने की  हिंसक कोशिशें होती रही है2013 में उदार नेता ब्राहमी और धर्मनिरपेक्ष विपक्षी नेता चोकरी बलदोई की हत्या के लिए सलाफ़ी कट्टरपंथियों को ज़िम्मेदार ठहराया  गया था,इसके बाद सत्तारूढ़ एन्नाहदा पार्टी के विरोध में लोगों का गुस्सा काफी बढ़ गया था


 

जिहाद-अल-निकाह के लिए बदनाम है टयूनेशिया

 

सीरिया और इराक में आईएसआईएस की व्यापक निर्ममता के बीच 2013 में ट्यूनीशिया सरकार के गृहमंत्री ने  नेशनल एसेंबली में दावा किया था कि उनके देश से महिलाएं सीरिया जा रही हैं तथा वहां अपनी मर्ज़ी से असद सरकार विरोधी विद्रोहियों के साथ शारीरिक संबंध बना रही हैं ये महिलाएँ जिहाद अल-निकाह" के नाम पर कई जिहादियों के साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं और गर्भवती होकर ट्यूनिशिया वापस लौटती हैंजिहाद अल-निकाह को कुछ सलाफ़ी सुन्नी मुस्लिम संगठनों का समर्थन प्राप्त है,जिनका मानना है कि यह जिहाद का एक न्यायोचित तरीका हैसीमाई चांबी पर्वत क्षेत्र में दिसंबर 2012 के बाद ट्यूनीशिया की सेना और अल कायदा के चरमपंथियों के बीच कई बार भीषण मुठभेड़ें हुई हैंयहाँ के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने इस क्षेत्र से कई ऐसी महिलाओं और लड़कियों को गिरफ़्तार किया है जो लड़ाई में हिस्सा ले रहे जिहादियों को सेक्स सेवाएं देकर उनका उत्साह बढ़ाने के अभियान में जुटी थी ट्यूनीशिया के सबसे बड़े धर्मगुरु मुफ़्ती ओमान बतीख़ ने भी यह स्वीकार किया था कि ट्यूनीशिया की लड़कियाँ सीरिया जाकर सेक्स जिहाद में हिस्सा ले रही हैं


 

अरब देशों में लोकतन्त्र संकट में रहा है

 

अरब के अधिकांश देशों में अमीर सत्ता पर हावी रहे है और वे लोकतंत्र के विरोधी भी रहे है जनता इनके खिलाफ विद्रोह कर लोकतंत्र की स्थापना के संकेत तो देती है लेकिन अमीर धर्म का सहारा लेकर कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देते है,जिसे षडयंत्रपूर्वक जिहाद के रूप में प्रचारित कर दिया जाता है ऐसे संघर्ष अरब देशों में कई वर्षों से चल रहे है


 

ये मेरी देह है कोई तुम्हारी इज्जत नहीं,रूढ़िवादियों को अमीना की चुनौती

 

ट्यूनीशिया में इस्लामिक चरमपंथियों की सक्रियता बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर यहां की पुरातन जीवनशैली के प्रति स्त्रियों के बीच असंतोष भी बढ रहा है 2013 में ट्यूनीशिया की एक महिला कार्यकर्ता अमीना ने जब अपनी तस्वीरें ट्यूनीशिया की सोशल मीडिया पर जारी की तो एक नई बहस छिड़ गई थी  महिलाओं के मुद्दों पर सक्रिय 19 साल की अमीना के बाएं हाथ में सुलगती हुई सिगरेट  थी और खुले सीने पर अरबी में लिखा था कि ये मेरी देह है,कोई तुम्हारी इज्जत नहीं इस नग्न तस्वीर से खफा ट्यूनीशिया के रूढिवादी धार्मिक नेताओं ने अमीना को कोड़े लगाने और पत्थर से मार-मार कर खत्म कर देने का फरमान भी जारी कर दिया था बाद में ट्यूनीशिया में महिलाओं के मुद्दों पर आंदोलन कर रहे लोगों ने अमीना के समर्थन में फेसबुक पर फेमेननाम से एक अलग पेज ही बना डाला


 

टयूनेशिया का भविष्य

 

एक दशक पहले टयूनेशिया की सेना ने लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए देश में मजबूत लोकतान्त्रिक सरकार का समर्थन किया थाइसीलिए उन्होंने तानाशाहों से तौबा भी की थी,हालांकि सेना का प्रभाव लगातार अन्य सरकारों पर भी बना रहा वहीं लोकतान्त्रिक सरकारें भी तानाशाहों से नाराज जनाक्रोश को दूरदर्शी बदलाव से शांत करने में नाकामयाब रही है। इस समय टयूनेशिया एक बार फिर अस्थिरता तथा अशांति की ओर तेजी से बढ़ रहा है राष्ट्रपति ने राजनीतिक दलों को चेतावनी दी है कि जो हथियार उठाने के बारे में सोच रहे हैं उनसे सैन्यबल से निबटा जाएगा जो भी गोली चलाएगा,सेना उन्हें इसका जवाब गोली से ही देगी जाहिर है अफ्रीका का यह खूबसूरत और उदार देश इस समय गहरें राजनीतिक संकट में फंस गया है  इस स्थिति में कट्टरपंथी ताकतें यह भ्रम फैला सकती है कि देश में लोकतंत्र का कोई भविष्य नहीं है और हिंसा के ज़रिए ही इस्लामी राज्य स्थापित हो सकता है

जिनपिंग का तिब्बत पर नया दांव,zinping tibbt china

 जनसत्ता



 

                                                                                     

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप को एक तानाशाही दखलंदाजी माना जाता है जो एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के मामलों को पलटने के लिए करता है। चीन की वैदेशिक नीतियों में हस्तक्षेप करके किसी राज्य की संप्रभुता को शत्रुतापूर्ण तरीके से चोट पहुँचाने की नीति शुमार रही है और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसे लगातार बढ़ावा दे रहे हैहाल ही में शी जिनपिंग ने अचानक तिब्बत की यात्रा कर उसी आक्रामकता का प्रदर्शन किया हैचीनी कम्युनिस्ट पार्टी इस साल अपनी स्थापना के सौ वर्ष मना रही है,इस मौके पर शी जिनपिंग  ने तिब्बत की ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं पर प्रहार करते हुए तिब्बत को कम्युनिस्ट पार्टी का अनुसरण करने और समाजवाद के रास्ते पर  चलने की नसीहत दे डाली


जिनपिंग की तिब्बत यात्रा से सामरिक,आर्थिक,सांस्कृतिक और धार्मिक संदेश  स्पष्ट दिखाई दे रहे हैवे ल्हासा में एक बड़े महत्वपूर्ण बौद्ध मठ-द्रेपुंग मठ भी गए और उन्होंने प्राचीन और धार्मिक तिब्बत के इलाक़े के धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षण के बारे में जानकारी हासिल कीतिब्बत की राजधानी ल्हासा को चीन ने लम्बे समय तक बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया था और किसी बाहरी व्यक्ति को तिब्बत और उसकी राजधानी ल्हासा जाने की अनुमति मुश्किल से ही दी जाती है इसीलिये इसे प्रतिबन्धित शहर कहा जाता है



दरअसल तिब्बत पर कब्जे के  सात दशक बीतने के बाद भी चीन की पकड़ उतनी मजबूत नहीं हो पाई है,जितना चीनी कम्युनिस्ट पार्टी चाहती है। इसी कारण जिनपिंग प्रशासन अब तिब्बत में धर्म का कार्ड खेलने की तैयारी कर रहा है। तिब्बत में बौद्ध धर्म के सबसे ज्यादा अनुयायी रहते हैं,जबकि चीन की कम्युनिस्ट सरकार किसी भी धर्म को नहीं मानती है। इसलिए,यहां के लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए जिनपिंग अपना उदार चेहरा दिखाने चाहते है। तिब्बत को चीन ने 1951 में अपने नियंत्रण में ले लिया था और इसके बाद तिब्बत के सबसे बड़े धर्म गुरु दलाई लामा ने अपने अनुयायियों के साथ भारत में शरण ले ली थी। वे तब से भारत में ही रहते है और तिब्बत को स्वायत्तता देने के लिए चीन की सरकार पर दबाव बनाते रहे हैदलाई लामा के प्रभाव को तिब्बत के लोगों में कम करने के लिए चीनी सरकार लगातार प्रयास कर रही हैचीन तिब्बत की धार्मिक संस्कृति को खत्म कर उसे दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में व्यापार का बड़ा केंद्र बनाने के लिए व्यापक योजनाओं पर काम कर रहा है


यह भी देखा जा रहा है कि दलाई लामा की बढ़ती उम्र को आधार बनाकर चीन अपनी ओर से किसी ऐसे व्यक्ति को दलाई लामा के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में है,जिसकी निष्ठा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति होअमेरिका ने चीन की इस नीति का विरोध किया है और पिछले साल तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति  ट्रम्प ने नई तिब्बत नीति को मंजूरी  देते हुए बौद्ध धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु के चयन में चीनी हस्तक्षेप को रोकने की बात कहीं थी। इसमें तिब्बत में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास स्थापित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की बात की गई थी। इस साल मार्च में बाइडेन प्रशासन ने भी इस अमेरिकी प्रतिबद्धता को दोहराया है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन में चीनी सरकार का कोई हाथ नहीं होना चाहिए

तिब्बत सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और चीन भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए इस मार्ग का उपयोग नेपाल से सम्बन्ध मजबूत करने के लिए  कर रहा है। जिनपिंग तिब्बत यात्रा में न्यिंग्ची रेलवे स्टेशन भी गए,यह उनकी भारत पर सामरिक दबाव बनाने की कोशिश हो सकती हैये इलाका सामरिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ से कुछ दूर पर ही अरुणाचल प्रदेश की सीमा लगती है जिनपिंग चीन के पहले बड़े नेता हैं जिन्होंने कई दशकों के दौरान भारत और चीन की सीमा के पास बसे इस शहर का दौरा किया हो


अंग्रेजी राज में 1914 में बनी मैकमोहन रेखा को ख़ारिज कर चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताते हुए उसे दक्षिण तिब्बत का भाग बताता है  दूसरे  विश्व युद्द के बाद बदलते राजनीतिक परिदृश्य में ब्रिटेन की दक्षिण एशिया से बिदाई के बाद माओ ने इस इलाके को अपनी गिरफ्त में लेने की साजिश को बेहद चुपके से अंजाम दिया था माओ ने सबसे पहले 1949 में तिब्बत को अपना निशाना बनाया चीन ने भारत और चीन सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत कर लिया तथा कराकोरम राजमार्ग 1956-57 का भी निर्माण कर लिया। इसके बाद चीन ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा भी कर दी कि भारत और चीन सीमा का स्पष्ट विभाजन नहीं हुआ है। चीन ने मैकमोहन रेखा को भी अस्वीकार कर दिया और अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत कहा। चीन अरूणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी वाले क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत कहता आया हैचीन अरुणाचल में भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा पर आपत्ति उठाता रहा है,वहीं उसने अपनी विस्तारवादी आकांक्षाओं को तेज करते हुए अरुणाचल प्रदेश के छह जगहों के नाम अवैधानिक रूप से बदलकर वोग्यैनलिंग,मिला री,काईनदेन गाब री,मेन क्यू का,बूमो ला और नामका पुब री रखा है चीनी विशेषज्ञ इसे चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया महत्वपूर्ण कदम बता चुके है 




लहासा से न्यिंग्ची रेलमार्ग नेपाल से चीन के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की दृष्टि से भी बेहद अहम हैये रेल योजना कुल एक हजार सात सौ किलोमीटर की है,इसे सिचुवान-तिब्बत रेल खंड का सामरिक रूप से अति महत्वपूर्ण भाग माना जा रहा है चीन हमेशा से ही नेपाल के साथ विशेष सम्बन्धों का पक्षधर रहा है,तिब्बत पर कब्जे के बाद उसकी सीमाएं सीधे नेपाल से जुड़ गयी है। चीन की नेपाल नीति का मुख्य आधार था कि नेपाल में बाह्य शक्तियां अपना प्रभाव न जमा सके जिससे टी.ए.आर. अर्थात तिब्बती आटोनामस रीजन की सुरक्षा हो सके। दूसरा नेपाल में भारत के प्रभाव को कम किया जाये। उसने नेपाल में अनेक परियोजनाएं आक्रामक ढंग से शुरू कर तिब्बत से सीधी सड़क भारत के तराई क्षेत्रों तक जोड़ी,रेल मार्ग नेपाल की कुदारी सीमा तक बनाया। इसके साथ ही चीन ने नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक और सैनिक मदद कर भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशों को भी अंजाम दिया है। चीन नेपाल के मजबूत संबंधों के कारण भारत की आर्थिक और सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ी है। चीनी सामानों की नेपाल के रास्ते भारत में डम्पिंग,माओवादी हिंसा के जरिये नेपाल से आंध्र तमिलनाडू तक रेड कॉरिडोर में आंतरिक सुरक्षा के खतरें,पाक की आई.एस.आई की नेपाल में लगातार गतिविधियां,तस्करी और आतंकवादियों का भारत में प्रवेश जैसी चुनौतियां बनी हुई है।


अभी तक नेपाल भारत के लिए एक ऐसा भूभाग से जुड़ा देश है जिसका लगभग सारा आयात और निर्यात भारत से होकर जाता है,भारत के कोलकाता और अन्य बंदरगाहों से नेपाल को व्यापार सुविधा तथा भारत होकर उस व्यापार के लिए पारगमन की सुविधा प्रदान की गयी है। नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में बहने वाली नदियों का उदगम भी इन क्षेत्रों में पड़ता है। इस प्रकार दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर है। भारत लगातार नेपाल के विकास में अपना अहम योगदान देता रहा है,लेकिन अब चीन का प्रभाव नेपाल पर बढ़ गया है।

माओ की क्षेत्रीय सामरिक नीति पांच उंगलियों के सिद्धांत पर आधारित मानी जाती है। माओ के अनुसार चीन हाथ है तो तिब्बत हथेली। उस तिब्बत की पांच उंगलियां है,नेपाल,भूटान,लद्धाख,सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश। नेपाल भारत की सुरक्षा परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है,भूटान की सुरक्षा को लेकर भारत अग्रगामी नीति पर रहा है और डोकलाम विवाद में भारत ने उसका पालन भी किया। लद्धाख,सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश भारत के भाग है और यह स्थिति बदलने को चीन आमादा नजर आता है।


इन सबके बीच भारत ने पूर्वोत्तर की सीमाओं को चाक चौबंद करने के लिए व्यापक कदम उठाएं हैचीन से सीमा विवाद के चलते और पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियों से जूझते भारत ने अब अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत किया है और रणनीतिक परियोजना के जरिए ब्रह्मपुत्र नदी पर बोगीबिल पुल का निर्माण पूर्ण कर लिया है जो  ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिण तट को अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती धेमाजी ज़िले में सिलापथार के साथ जोड़ेगा। सुरक्षा के लिहाज से यह अति महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सेना इस पुल के जरिए कम समय में अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती हिस्सों में पहुंचने सकेगीअसम के डिब्रूगढ़ शहर के पास बोगीबिल में ब्रह्मपुत्र नदी पर इसे पुल से भारी सैन्य टैंक आसानी से गुजर सकेंगे। यह पुल न केवल पूर्वोत्तर के विकास में मददगार होगा बल्कि सैन्य शक्ति के पर्याप्त उपयोग को भी सुनिश्चित करने में सहायक होगा।



भारत और चीन सीमा पर पिछले दो वर्षों से भारी तनाव है। गलवान घाटी में हुए हिंसक संघर्ष के बाद भी अभी तक दोनों देशों की सेनाओं के बीच कोई सर्वसम्मत समझौता नहीं हुआ है। इसका असर दोनों देशों के सामरिक और आर्थिक संबंधों पर भी पड़ा है। अरुणाचल के पश्चिम में भूटान,उत्तर में चीन,उत्तर पूर्व में तिब्बत तथा पूर्व में म्यांमार है। अब इन क्षेत्रों में भारत की सामरिक स्थिति बहुत मजबूत है।  भारत एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत सीमाई क्षेत्रों का व्यापक विकास कार्य कर रहा है। चीन की चिंता का एक कारण यह भी है। जाहिर है जिनपिंग तिब्बत की धरती से दलाई लामा,भारत और अमेरिका पर दबाव बढ़ाकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते है। सीमा समस्या को लंबे समय तक उलझाकर चीन का विरोधियों पर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाने का तरीका रहा है और जिनपिंग भी इसे आजमाते नजर आ रहे  है

 

 

बहनजी,बसपा और ब्राह्मण,mayavati brahman smmelan

 प्रात:किरण   


                                

                                                                                    

बहन जी के नाम से पहचानी जाने वाली मायावती के बहुजन समाज का यह परिवर्तित रूप है जिसे सर्व समतावादी समाज के नए कलेवर में दिखाने की कोशिश की गई है। बसपा की स्थापना के उद्देश्यों में पिछड़ों तथा अल्पसंख्यक वर्ग का विकास बताया जाता है लेकिन नई परिकल्पना में ब्राह्मण अचानक महत्वपूर्ण बना दिये गए है तथा अयोध्या की जमीन को इसके प्रचार के लिए सबसे मुफीद माना गया है। अगले साल देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में चुनाव होने है इसलिए राजनीतिक दलों का आकर्षण विभिन्न समाजों की ओर बढ़ना  लाजिमी है। हाल ही में अयोध्या में बहुजन समाज पार्टी के द्वारा कथित रूप से  प्रबुद्ध वर्ग विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया जो असल में ब्राह्मण सम्मेलन था। इस सम्मेलन में वह सब कुछ था जिसे भारतीय राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए आजमाते रहते है। सम्मेलन में जय भीम,जय हिन्द,जय परशुराम और जय श्री राम के नारे भरपूर लगाएँ गए।


भगवान बुद्ध के अष्‍टांगिक मार्ग सम्यक दृष्टि,सम्यक संकल्प,सम्यक वाणी,सम्यक कर्मांत,सम्यक आजीविका,सम्यक व्यायाम और सम्यक स्मृति की इस सम्मेलन में कहीं छाया भी दिखाई न पड़ी। कार्यक्रम की शुरुआत बाकायदा वेदमंत्रों से हुई और शंखध्वनि,घंटों और मजीरों की ध्वनि के साथ राजनीतिक आसमान को गुंजायमान किया गया। इस आयोजन की मंशा को साफ करते हुए  सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि,सत्ता की चाभी लेने के लिए 13  फीसदी ब्राह्मण अगर 23 फीसदी वाले दलित समाज के साथ मिल जाएं तो जीत सुनिश्चित है।


गौरतलब है कि बहुजन समाज पार्टी ने 2007 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण दलित के समर्थन के बूते सोशल इंजीनियरिंग का नारा गढ़ा था,जो सत्ता पाने के लिए कामयाब माना गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाने को प्राथमिकता दी गई और इस नुस्खे को अधिकांश राजनीतिक दलों ने अपनाया। 2007 में बीएसपी ने 86 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मणों को टिकट दिया था और 41 सीटों पर उन्हें जीत हासिल हुई थी। 2012 में समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने का अभियान चलाया और 21 ब्राह्मण विधायक जीतने एमएन सफल रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दो-तिहाई से ज़्यादा बहुमत मिला और इस बार भी सबसे ज़्यादा 46 विधायक ब्राह्मण हैं। मतलब पिछले कुछ चुनावों में जिस दल में ब्राह्मण समर्थन ज्यादा मिला,उसकी सत्ता पाने की संभावना ज्यादा देखी गई। इस सबसे आम ब्राह्मण को क्या हासिल हुआ, यह कभी किसी भी दल के लिए चिंतन या चिंता का विषय कभी नहीं रहा। वैसे भी भारत के लोकतंत्र का स्वरूप अभिजन वादी नजर आता है जहां कुछ लोग सत्ता का उपभोग करते रहते है और आम जन मतदान के बाद कहीं नजर नहीं आता। 


अयोध्या के इस मंच से मुसलमानों को भी संदेश देने कि कोशिश नजर आई।  बीएसपी की इस प्रबुद्ध विचार संगोष्ठी में मंच पर एक शख्स काले रंग के पठान सूट में बैठे थे जिन्हें  कपिल मिश्र के नाम से पहचाना जाता है। ये बसपा के मजबूत ब्राह्मण नेता सतीशचंद्र मिश्रा के बेटे है। बसपा ने पिछले विधानसभा चुनाओं में 403 सीटों में से 97 यानि 24 फीसदी मुसलमानों को मैदान में उतारा था उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की तादाद 20 फीसदी है। राज्य की विधानसभा की 403 सीटों में से करीब 130 से 135 सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमानों का वोट निर्णायक साबित होता है। जाहिर है बहनजी की नजर मुसलमानों पर भी है  


दरअसल भारत में सत्ता प्राप्त करने के लिए अलग अलग जातियों और धर्मों को अलग अलग प्रकार से उभारा जाता रहा है। यहां राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में सबसे पहले सत्ता,उसके बाद व्यक्तिगत हित,फिर समाज और अंत में धुंधला धुंधला कहीं राष्ट्र नजर आता है। इन सबमें भारत के लोकतंत्र को समतावादी,सुशासित और समावेशी देखने का महात्मा गांधी का सपना कब का धराशायी हो चूका है। आज़ादी के छह दशकों तक भारत की राजनीतिक पार्टियां देश के लोकतंत्र को अगड़े पिछड़ों में देखती थी लेकिन पिछले कुछ सालों से राजनीतिक दलों ने समाज को सैकड़ों जातीय पंचायतों में बांटकर सत्ता पाने की कुंजी ढूंढ ली है।




भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों की इन कोशिशों से भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान को संकट का सामना करना पड़ रहा है और आने वाले समय में यह चुनौती ओर बढ़ सकती है। स्वतंत्र भारत का भावी भविष्य तय करते हुए बाबा आम्बेडकर संविधान सभा के सामने भारत को राष्ट्र कहने से बचते हैंवे भारत को एक बनता हुआ राष्ट्र यानी नेशन इन द मेकिंग कहते हैं उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि जातियों में बंटा भारतीय समाज एक राष्ट्र की शक्ल कैसे लेगा और आर्थिक और सामाजिक ग़ैरबराबरी के रहते वह राष्ट्र के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे कर पाएगा


यह भी बेहद दिलचस्प है की बसपा डॉ.आंबेडकर के समावेशी समाज की कल्पना को साकार करने कि बात कहती रही है जबकि उसके राजनीतिक क्रियाकलाप ठीक इसके उलट नजर आते है। बसपा जातीय समस्या की समाप्ति से ज्यादा जातीय उभार देने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है,जिसका ताजा उदाहरण ब्राह्मण सम्मेलन है। बसपा चरणबद्द तरीके से ऐसे आयोजन मथुरा,काशी और चित्रकूट में भी करेगी। इन आयोजनों से बसपा को सत्ता मिलेगी या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में छूपा है। लेकिन इन राजनीतिक दलों के ऐसे आयोजनों में उमड़ती हुई भीड़ रोजगार,शिक्षा और स्वास्थ्य की हकीकत से कहीं दूर नजर आती है और ऐसे आयोजनो में लोककल्याण के कहीं संकेत भी नहीं मिलते। जाहिर है हर बार भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता से दूर नजर आता है और ऐसा लगता है कि भारत की राजनीतिक पार्टियां इसे परिपक्व होने देना ही नहीं चाहती।  

 

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