सोमवार, 7 जून 2021

सीरिया में सत्ता संकट syria asad janstta

 जनसत्ता

 


                                                                  

लोकतांत्रिक देशों में सत्ता में असीमित शक्ति एक विवादास्पद संकल्पना रही है। बदलते दौर में आधुनिक राज्यों में सत्ता का वैधानिक और तार्किक रूप राजनीतिक नेतृत्व में केंद्रित करने के प्रयास बढ़े है। इसके प्रतिकूल प्रभाव राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आ रहे है और स्थापित व्यवस्थाएं ध्वस्त होकर मानवीय और राजनीतिक संकट को बढ़ा रही है। दरअसल गृहयुद्द से जूझते सीरिया में हुए आम चुनावों में बशर अल-असद ने अपनी सत्ता चौथी बार बरकरार रखी है। आम चुनावों में लोगों की भागीदारी,निष्पक्षता और विश्वसनीयता का संकट होने से इसे सम्पूर्ण क्षेत्र में शांति स्थापित होने की उम्मीदों के लिए गहरा आघात माना जा रहा है।  


करीब एक दशक पहले सीरिया में राजनीतिक बदलाव के लिए उठे राजनीतिक आंदोलन को बशर अल-असद की सरकार ने सख्ती से कुचल दिया थाइसके बाद से यह देश गृहयुद्द जैसे हालात का सामना कर रहा हैसीरिया के कई इलाकों पर विद्रोहियों का कब्ज़ा हैकई देश अपने अपने हितों को देखते हुए सीरिया के विभिन्न लड़ने वाले समूहों को मदद दे रहे हैयहां पर शांति स्थापित करने के लिए संयुक्तराष्ट्र ने सर्वमान्य सरकार की जरूरत को दोहराया है,वहीं असद रूस,चीन और ईरान जैसे देशों की मदद से अपने को सत्ता में बनाएं रखे हुए है। इस स्थिति में मानवीय और राजनीतिक संकट से जूझ रहे इस देश में शांति और स्थिरता कायम करना चुनौती बनता जा रहा है। 

दक्षिण पश्चिम एशियाई देश सीरिया की भौगोलिक और राजनैतिक स्थिति उसकी समस्याओं को ज्यादा बढ़ा रही है इसके पश्चिम में लेबनॉन तथा भूमध्यसागर,दक्षिण-पश्चिम में इजराइल,दक्षिण में ज़ॉर्डन,पूर्व में इराक़ तथा उत्तर में तुर्की है। इजराइल तथा इराक़ के बीच स्थित होने के कारण इसकी स्थिति जटिल हो जाती है  कई प्राचीन सभ्यताएं भूमध्यसागरीय तटों के आसपास ही पनपी है अत: यह क्षेत्र धार्मिक संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है आईएसआईएस का उभार इस क्षेत्र में इसीलिए हुआ था कि ईसाई और  उदार मुसलमानों को खत्म कर इस्लामिक राज्य की स्थापना की जा सके   रोमन साम्राज्य के लिए भी भूमध्यसागर महत्व्प्पूर्ण रहा है,अत: यूरोप का इस क्षेत्र में हस्तक्षेप बना रहता है 


सीरिया शिया-सुन्नी प्रतिद्वंदिता के हिंसक केंद्र के रूप में भी कुख्यात बन गया है बशर अल-असद शिया है और सीरिया की आबादी सुन्नी बाहुल्य हैसीरिया में सुन्नी मुस्लिम कुल जनसंख्या का 74 प्रतिशत हैं जबकि शिया क़रीब 13 प्रतिशत रहते है। अल्पसंख्यक शिया समुदाय से संबंधित असद का सुन्नी बहुल देश सीरिया में सत्ता में बने रहना सऊदी अरब जैसी इस्लामिक ताकतों को स्वीकार नही है,वहीं ईरान असद को सत्ता में बनाएं रखने के लिए हथियारों की अबाधित आपूर्ति समेत सामरिक मदद करता रहा है। सऊदी अरब सीरिया के विद्रोही संगठनों को सहायता देकर असद की सरकार को सत्ता को उखाड़ फेंक देना चाहता है। अमेरिका और फ्रांस जैसे देश भी असद के खिलाफ है और वे सीरिया के विद्रोहियों को मदद देते रहे है। तुर्की के लिए सीरिया पारंपरिक गढ़ रहा है और वह सीरिया की राजनीति पर अपना अधिकार मजबूत रखना चाहता है। सीरिया से विस्थापित लोग तुर्की में ही सबसे पहले प्रवेश करते है और इसके कारण तुर्की को भी मानवीय संकट से जूझना पड़ रहा है।


सीरिया में असद सरकार के सत्ता में बने रहने और आम चुनावों को लेकर कड़ी प्रतिक्रियाएं  सामने आई हैसीरिया के विपक्षी दलों ने इस चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठायें है वहीं अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी कहा है कि ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थागौरतलब है कि सीरिया के राष्ट्रपति चुनाव में सरकार के नियंत्रण वाले इलाकों और विदेशों में कुछ सीरियाई दूतावासों में मतदान करवाए गएसीरिया सरकार का कहना है कि चुनाव का होना ये दिखाता है कि सीरिया में सब सामान्य है और देश के भीतर और बाहर एक करोड़ 80 लाख लोग मतदान में हिस्सा ले सकते हैंजबकि हकीकत इससे उलट हैदेश के कई इलाकों पर असद सरकार का कोई प्रभाव नहीं है और वहां विद्रोही समूह काबिज हैसीरिया में ज़्यादातार हिस्सों पर विद्रोहियों, जिहादियों और कुर्दों के नेतृत्व वाली सेनाओं का नियंत्रण हैलाखों लोग सीरिया से पलायन करके तुर्की समेत यूरोप के कई देशों में चले गए हैलाखों लोग अस्थाई टेंटों में रहने को मजबूर हैसंयुक्त राष्ट्र के अनुसार,इस लड़ाई में अब तक चार लाख लोग मारे जा चुके हैं2011 में राजनीतिक अस्थिरता और विद्रोही समूहों के आपसी संघर्षों के चलते क़रीब आधी आबादी को मज़बूरन देश छोड़ना पड़ा था। इस समय देश की 90 फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रह रही है और लोग भुखमरी का सामना करने को मजबूर हो गए हैयूनीसेफ़ के अनुसार, 50 लाख से ज्यादा लोग कुपोषित हैंवहीं पांच साल से कम उम्र के पांच लाख बच्चों का विकास गंभीर कुपोषण के चलते रुक गया है

बशर अल-असद राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नेता नहीं है और न ही वे अपने देश को संकट से उबारने की कोई कोशिश करते नजर आते हैरूस का सीरिया में सैन्य बेस है और वह असद सरकार को मजबूत रखने के लिए विद्रोहियों पर हवाई हमलें करता रहा है इजराइल भी सीरिया में ईरान के बढ़ते दख़ल को लेकर चिंतित रहा और हवाई हमलों के ज़रिए हिज़बुल्ला और अन्य शिया लड़ाकों को काबू में करने की कोशिश करता रहा है। सीरिया का संकट राजनीतिक समस्या के साथ ही साथ सामरिक,कूटनीतिक और मानवीय संकट भी है। 2011 के बाद इस देश में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होने से  सीरिया के बड़े क्षेत्र में कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने कब्जा जमा लिया था और इसके बाद यहां खून खराबे का वहशियाना दौर लंबे समय  तक चला। 2019 मे अमेरिका ने दावा किया था कि सीरिया से आईएसआईएस को खदेड़ दिया गया है लेकिन आईएसआईएस के लड़ाके अब भी विभिन्न क्षेत्रों में छुपे हुए है और राजनीतिक अस्थिरता कि स्थिति में उनका समांतर शासन स्थापित करने का खतरा बरकरार रहता है। सीरिया के कुछ इलाकों में शिविर और जेल बनाकर आईएसआईएस के लड़ाकों को रखा गया है जिसमें हजारों विदेशी महिलाएं और उनके बच्चे शामिल है। लड़ाकों और महिलाओं की क्रूरता और कट्टरता में कोई कमी नहीं आई है। इस क्षेत्र में तुर्की के हमलों का फायदा उठाकर ये जेल से भागने मे कामयाब भी रहे है। ऐसे में सीरिया का भविष्य चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है।

 


तुर्की नाटों का सहयोग लेकर बशीर-अल-असद को सीरिया में सत्ता से हटाना चाहता है और वह इसलिए यूरोपीय यूनियन पर दबाव बना रहा है। सीरिया में कई देशों की सेना,सामरिक और आर्थिक हित होने से यहाँ युद्ध की स्थिति गंभीर हो गई है तथा सीरिया दुनिया का एक छद्म युद्ध का मैदान बन गया है। 2013 में अलकायदा से अलग होकर आईएसआईएस अस्तित्व में आया और इससे मध्य पूर्व में संघर्ष का एक नया सिलसिला शुरू हो गया था। आईएसआईएस ने ईसाइयों और उदार मुस्लिमों के विरुद्द जेहाद की घोषणा कर मध्यपूर्व के राजनीतिक संघर्ष की दिशा बदल दी। आईएसआईएस ने इस इलाके के तेल कुओं पर अपना कब्जा जमाकर महाशक्तियों को चुनौती पेश कर दी और इसके बाद पश्चिमी देशों,अमेरिका,रूस,तुर्की जैसे देशों ने आईएसआईएस को मिलकर खत्म करने मे अपनी भूमिका निभाई। लंबे समय से युद्दग्रस्त इस इलाके से आईएसआईएस समाप्त होने की कगार पर आया तो तुर्की ने असद सरकार और कुर्दों के खिलाफ मोर्चा खोलकर एक नए संकट को जन्म दे दिया। दूसरी ओर महाशक्तियों के हित और आपसी टकराव के कारण संयुक्तराष्ट्र बशीर-अल-असद पर दबाव बनाने में सफल नहीं हो पा रहा है। सीरिया में शांति स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2012 में हुए जेनेवा समझौते को लागू करने की बात कही है जिसके अनुसार सबकी सहमति से एक अस्थायी गवर्निंग बॉडी बनायी जाएगी। इस गवर्निंग बॉडी के माध्यम से देश का संचालन सुनिश्चित किया जायेगा लेकिन इस दिशा में जमीन पर कोई प्रगति नजर नहीं आती है विपक्षी दल राष्ट्रपति बशर अल असद से सत्ता छोड़ने के लिए दबाव बना रहे है और असद को किसी भी कीमत पर यह स्वीकार नहीं है  


2017 में रूस,ईरान और तुर्की ने अस्ताना प्रक्रिया के तहत राजनीतिक बातचीत शुरू की थीबाद में संविधान बनाने के लिए 150 सदस्यों की एक समिति बनाने पर सहमति बनाई गई थीइसमें यह तय किया गया था कि संविधान में आवश्यक परिवर्तन किये जाएंगे। अभी तक न तो जेनेवा समझौते के प्रावधान लागू हो सके है और न ही अस्ताना प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है  हालांकि यूरोपीय यूनियन,अमेरिका,रूस,सऊदी अरब,ईरान और तुर्की समझौते के रास्ते तलाशकर सीरिया में शांति स्थापित करने की बात तो कहते है लेकिन बशर-अल -असद को सत्ता से हटाने को लेकर कई देश एक दूसरे के सामने आ जाते है


इस समय सीरिया में कुर्द और सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज,कुर्दिश डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी और कुर्दिश पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स अलग कुर्दिस्तान के लिए संघर्ष कर रही हैइसे यूरोप और अमेरिका का समर्थन मिलता रहा है लेकिन तुर्की इसके खिलाफ है। वहीं तुर्की समर्थित जेएफएस के लड़ाके सीरिया तुर्की सीमा पर मजबूत हैसीरिया में अभी भी आईएसआईएस का खतरा बरकरार है और सीरिया की कथित सरकारी सेना बशर-अल-असद को मजबूत करने के लिए लड़ रही है असल में सीरिया को एक राष्ट्र के तौर पर बचाएं रखने के लिए विभिन्न राजनीतिक,भाषाई,जातीय,धार्मिक एकजुटता और सर्वसम्मत सरकार की जरूरत है। लेकिन इनके बीच सामंजस्य को लेकर न तो वैश्विक समुदाय ईमानदार है और न ही बशर-अल-असद ऐसी कोई कोशिश करते दिखाई दे रहे है  इसका खामियाजा सीरिया के आम लोग बेउम्मीद और बेबस होकर भोग रहे है  

 

 

 

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