नाटो के केंद्र में चीन,nato china janstta

 जनसत्ता


नियंत्रण और संतुलन वैश्विक व्यवस्था की अनिवार्य स्थिति रही है,अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव कायम रखने के लिए अमेरिका समेत यूरोप के ताकतवर देश सतत प्रयत्नशील और सजग रहते है 1949 में अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए स्थापित सैन्य संगठन नाटो का प्राथमिक लक्ष्य उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में साम्यवाद को रोकना तथा शांति और व्यवस्था बनाएं रखना रहा था। लेकिन तेजी से बदलती अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में यूरोप और अमेरिका की प्रासंगिकता बनाएं रखने के लिए यह सैन्य संगठन राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों की ओर भी प्रवृत हो गया है। पिछले कई दशकों से नाटो के लिए रूस सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था लेकिन अब यह स्थिति बदल गई हैसामूहिक सुरक्षा के सबसे बड़े और शक्तिशाली क्षेत्रीय संगठन नाटो के हालिया शिखर सम्मेलन में चीन को सुरक्षा जोखिम मानते हुए नाटो के महासचिव जेंस स्टोल्टेनबर्ग ने सदस्य देशों से चीन को नियंत्रित करने की नीति पर काम करने को कहा है


इसके पहले नाटो के कई यूरोपीय सहयोगी और सदस्य देश चीन को एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी की तरह तो देखते थे लेकिन चीन से आर्थिक सम्बन्धों को लेकर वे  उत्साहित भी रहते थे। आर्थिक सहयोग को लेकर चीन और यूरोपीय संघ एक दूसरे के बड़े व्यापारिक साझेदार भी है। इस समय चीन अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए  यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है कोरोना महामारी के कारण यूरोप के प्रमुख साझेदार देशों के बीच व्यापार घटा लेकिन चीन का व्यापार ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ 2020 में प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में चीन ही एकमात्र देश था,जहाँ आर्थिक विकास देखा गया यहीं नहीं यूरोपीय संघ और चीन अपने आर्थिक संबंधों को और गहरा करने की लगातार कोशिश करते देखे गए है 


अब नाटो और जी-7 का चीन को लेकर जो बेहद अप्रत्याशित रुख सामने आया है, उससे ऐसा लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन अपने देश के प्रभाव का उपयोग करके यूरोप के देशों को लामबंद करने में सफल हो गए है और यह अमेरिका की चीन पर बड़ी कूटनीतिक विजय हैनाटो ने  चीन को सामूहिक सुरक्षा के लिए चुनौती बता कर पहली बार अमेरिका की चीन के प्रति आक्रामक और नियंत्रणकारी नीति को अपना पूर्ण समर्थन देने  की ओर कदम बढ़ाया है,वही जी-7 के ताकतवर देशों ने भी चीन की शिनजियांग में वीगर मुसलमानों के मानवाधिकार हनन और हांगकांग में लोकतंत्र को कुचलने की कोशिशों की कड़ी आलोचना की है इसके पहले ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका यूरोप के साथ सहयोग बढ़ाने और अपने अन्तर्राष्ट्रीय हितों का संवर्धन करने में नाकाम रहा था स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि ट्रम्प ने नाटो के साथ सहयोग को आगे बढ़ाने को लेकर संशय बढ़ा दिया था वहीं बाइडन प्रशासन का प्रभाव जी-7 से लेकर नाटों तक दिखाई पड़ रहा है और इससे निपटना चीन के लिए आसान नहीं होगा


पिछले कुछ वर्षों में चीन ने यूरोप के कई देशों को व्यापारिक और सहायता कूटनीति के जरिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावित किया है। अमेरिका को यह लगता है कि आने वाले समय में चीन का यूरोप पर प्रभाव सामरिक संकट को बढ़ा सकता है। अमेरिका की आशंका को चीन की साम्राज्यवादी नीतियों से बल ही मिला है। इस समय दक्षिण पूर्वी यूरोप में चीन ने अपना आर्थिक प्रभाव तेजी से स्थापित किया है,यह क्षेत्र अमेरिका और यूरोप के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। बाल्कन प्रायद्वीप यहीं स्थित है जो पश्चिम में एड्रियाटिक सागर,भूमध्य सागर और दक्षिण में मरमरा सागर और काला सागर से घिरा हुआ है। चीन नए सिल्क रोड के जरिए इस क्षेत्र के देशों में न केवल अपना रुतबा बढ़ा रहा है बल्कि कर्ज कूटनीति से उसने कई देशों पर अपना प्रभाव भी जमा लिया है। कई देशों के बंदरगाह निर्माण में चीनी कम्पनियों की बड़ी भूमिका है।  कर्ज के नाम पर चीन इन देशों में अपने सैन्य अड्डे बना सकता है और यह यूरोप की सुरक्षा की एक बड़ी चुनौती के रूप में भी सामने आ सकता है। पिछले दिनों लिथुआनिया ने चीन की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए चीन की अगुआई वाले सीईईसी (चीन और मध्य-पूर्वी यूरोपीय देशों के बीच सहयोग) से अलग होने का फ़ैसला किया है  और यूरोप की एकता और सुरक्षा के लिए बाकी देशों से भी अपील की है कि वे चीन की आर्थिक नीतियों के जाल से तुरंत बाहर निकल जाएं। चीन ने आपसी सहयोग के नाम पर  2012 में इसे बनाया था। गौरतलब है कि 2019 में लिथुआनिया के स्टेट सिक्योरिटी डिपार्टमेंट और सेकेंड इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट ने नेशनल थ्रेट असेसमेंट 2019 रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र किया था कि चीन की आर्थिक और राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिथुआनिया के अलावा अन्य नेटो और यूरोपीय संघ के देशों में बढ़ रही है और इसके साथ ही चीनी ख़ुफ़िया और सिक्योरिटी सर्विस की गतिविधि भी तेज़ हो रही है।


चीन ग्रीस के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह पिरेयस को नियंत्रित करता है,तुर्की के तीसरे बड़े पोर्ट कुम्पोर्ट पर भी चीन का ही नियंत्रण है। इसके साथ-साथ दक्षिण यूरोप के कई बंदरगाहों में चीन का सहयोग है। इस प्रकार चीन का निवेश और हस्तक्षेप उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा नजर आता है और ऐसा लगता है कि अब इस समस्या को नाटो ने भी महसूस कर लिया है। इस समय यूरोप में चीन जिस सीईईसी योजना को लेकर तेजी से आगे बढ़ रहा है उसमें बाल्कन प्रायद्वीप के सर्बिया,स्लोवेनिया,अल्बानिया, बोस्निया एवं हर्जेगोविना, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, ग्रीस, हंगरी, लात्विया, नॉर्थ मेसिडोनिया, मॉन्टेनिग्रो, पोलैंड, रोमानिया, और स्लोवाकिया देश शामिल हैं। ये देश मध्य आय सीमा वाले देश है और अधिकांश देशों में संसदीय प्रणाली हैं जो खुली बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं को अपनाएं हुए है। चीन राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए इसका फायदा उठाता हुआ दिखाई देता है। इन देशों में चीन व्यापक निवेश कर रहा है और खुले हाथ से कर्ज भी दे रहा है जिससे कई छोटे देशों में उनकी संप्रभुता के लिए बड़ा संकट माना जाने लगा है।  चीन ने कर्ज से मॉन्टिनेग्रो बूरी तरह घिर गया है,उसका  सरकारी क़र्ज़ इसके आर्थिक उप्तादन के 103 फ़ीसदी के बराबर है।  मॉन्टिनेग्रो यूरोपीय संघ से लोन चुकाने में मदद करने के लिए यूरोपीय संघ से मदद देने की गुहार लगा चूका है।  चीन की अनुबंध की शर्तों में बहुत सारी अनिश्चितताएँ होती है और इसी कारण दुनिया के कई देश चीन के कर्ज के जाल में फंसते जा रहे है।


 चीन ने मास्क और वैक्सीन डिप्लोमेसी के माध्यम से इस क्षेत्र के कई देशों में पहुँच बनाने की कोशिश की है। चीन को टक्कर देने की चाहत रखने वाले जी-7 नेताओं ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों का समर्थन करने की योजना अपनाई है जिसके तहत जी-7 देश इन्हें बेहतर बुनियादी ढाँचा खड़ा करने में मदद करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि वो चाहते हैं कि अमेरिका समर्थित 'बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड' प्लान को एक उच्च गुणवत्ता वाले विकल्प के तौर  आगे बढ़ाया जाए जिससे यूरोप के देशों में आपसी सहयोग को बढ़ावा मिल सके तथा इससे चीन की निर्माण और व्यापारिक योजनाओं को रोकने में मदद मिल सकती हैजी-7 देशों के नेताओं ने अगले साल तक ग़रीब देशों को कोविड वैक्सीन की एक अरब डोज़ दान करने का प्रण लिया हैइनमें से 10 करोड़ डोज़ अकेले ब्रिटेन देगा। इसे चीन की वैक्सीन सहयोग नीति का जवाब माना जा रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन को वैश्विक मुद्दों और संबंधों की बेहतर समझ है,अब वे इसका इस्तेमाल अमेरिका का प्रभाव बढ़ाने के लिए बेहतर तरीके से करते नजर आ रहे है। यदि नाटो की बात की जाए तो उसकी भूमिका को शीतयुद्धकालीन गुटीय राजनीति से बाहर निकालकर वैश्विक स्वरूप प्रदान करने का श्रेय अमेरिका को ही जाता हैयूरोप के कई देशों में लाखों अमेरिकी सैनिक तैनात है जिन पर अमेरिका अरबों डॉलर खर्च करता हैशीत युद्ध के समय यूरोप में चार लाख से ज़्यादा अमरीकी सैनिक उसकी सुरक्षा के लिए तैनात थे और अभी भी तुर्की सहित यूरोपीय देशों में हज़ारों अमरीकी सैनिक तैनात हैंये सैनिक  नाटो के उद्देश्यों के अलावा अन्य कार्रवाई में भी मदद करते हैं


बाइडन प्रशासन यह स्वीकार कर चूका है कि चीन ही आर्थिक, राजनयिक, सैन्य और तकनीकी दृष्टिकोण से उसका संभावित प्रतिद्वंद्वी है जो स्थिर और खुली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की निरंतर चुनौती से पार पाने में सक्षम है। चीन रूस के मुकाबलें कही बेहतर प्रतिद्वंदी बनकर अमेरिका के सामने आ रहा है और  बाइडन इससे निपटने के लिए मुख्य रूप से यूरोप की ओर देख रहे है नाटो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों के मध्य एक सैन्य गठबंधन है जिसका उद्देश्य साम्यवाद और रूस का प्रभाव कम करना रहा है। अब चीन की बढती ताकत से साम्यवाद के मजबूत होने की आशंका नाटो को परेशान कर रही है। दुनिया में ऐसे भी कई देश है जो नाटो के सदस्य नहीं है लेकिन वे नाटो के सदस्य देशों से सैनिक गठबंधन करते रहे है। चीन के प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका ऐसी नीतियों पर भी लगातार काम कर रहा है।


बहरहाल अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने कूटनीतिक कौशल का परिचय देते हुए चीन  पर दबाव बढ़ाने की नीति को मजबूती से आगे बढ़ाया है वे नाटो और जी-7 के देशों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब होते दिख रहे है कि चीन की ओर से आक्रामक,असंतुलित और अस्थिरता वाली गतिविधियां यूरोप को संकट में डाल सकती है अत: चीन को रोकना बेहद जरूरी है तथा इसके लिए सभी देशों को मिलकर साझा प्रयास करने होंगे

रंगीन पीएम का बुरका प्रेम imran khan burkha

 पॉलिटिक्स

 

                                                    

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की दूसरी पत्नी रेहम खान की किताब "टेल ऑल" में इमरान खान उस  रंगीले किरदार की तरह प्रस्तुत किए गए है जिसे कोई बंधन पसंद नहीं है और वह अपनी पसंद और अपनी शर्तों पर जीता है। जबकि स्वयं इमरान खान पाकिस्तान की महिलाओं को मूल्यों और आदर्शों की नसीहत देते हुए सामाजिक रीति नीति के अनुसार चलने,रहने और बंधनों का पालन करने की अक्सर  नसीहत देते हुए दिखाई देते है।  दरअसल  महिला अपराध,हिंसा,हत्या,बलात्कार,आत्महत्या,एसिड हमलें,अपहरण,घरेलू हिंसा,जबरन विवाह और ऑनर किलिंग के लिए दुनियाभर में बदनाम पाकिस्तान की आधी आबादी दहशत में हैमहिलाओं के खिलाफ  बढ़ती यौन हिंसा के लिए प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बार फिर पहनावें को जिम्मेदार माना है और महिलाओं को नसीहत दी है कि वे परम्पराओं का पालन सुनिश्चित करें


इस पर पलटवार करते हुए विपक्षी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सीनेटर शेरी रहमान ने कहा कि  महिलाएं क्या पहनें,ये बताने का किसी को अधिकार नहीं है हमारे प्रधानमंत्री ऐसा कर रहे हैं,इससे हैरान हूं उन्होंने इमरान खान पर निशाना साधते हुए कहा कि वे ऐसा कहकर महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले और उनका दमन करने वालों की हरकतों को जायज ठहरा रहे हैं। इसके पहले भी इमरान खान महिलाओं को लेकर विपरीत टिप्पणी करते रहे है।  इसी साल अप्रैल में इमरान ख़ान ने रेप और यौन हिंसा के बढ़ते मामलों को लेकर सरकार की योजना के सम्बन्ध में जवाब देते हुए कहा था कि,समाज को ख़ुद को अश्लीलता से बचाना होगा अश्लीलता के  बढने का असर होता है,हर इंसान में विल पावर नहीं होता और सभी के पास ख़ुद को कंट्रोल करने की ताक़त नहीं होतीइमरान ख़ान के महिला विरोधी बयानों का कई अधिकारवादी संगठनों ने विरोध किया है इसमें पाकिस्तान मानवाधिकार संगठन,वॉर अगेंस्ट रेप और पाकिस्तान बार काउंसिल शामिल है,यहां तक की मीडिया ने भी इसे असंवेदनशील बताया है वहीं जानी मानी पत्रकार मेहर तरार ने प्रधानमंत्री को शिक्षित होने की नसीहत देते हुए इसे यह सत्ता का विकृत अमानवीय पहलू बताया है

 

इमरान खान की उनके देश में छवि

इमरान खान परम्परावादी समाज के झंडाबरदार बनकर देश में पुरुषवादी समाज को अपना वोट बैंक बनाने की कोशिशें भले ही कर रहे हो लेकिन उनके अपने देश में इमरान की छवि किसी प्ले बॉय जैसी मानी जाती है। ऑक्सफोर्ड से पढ़ा यह शख्स 1970 और 1980 के दशक में,लंदन के एनाबेल्स और ट्रैम्प जैसे नाइट क्लबों की पार्टियों में निरंतर मशगूल होने के कारण, सोशलाइट के रूप में भी मशहूर रहा। सुज़ाना कॉन्सटेनटाइन, लेडी लीज़ा कैम्पबेल जैसे नवोदित युवा कलाकारों और चित्रकार एम्मा सार्जेंट के साथ इमरान खान के रोमांस ब्रिटेन में बेहद चर्चित रहे है और बाद में यह भी सामने आया कि सीता व्हाइट कथित रूप से उनकी बेटी की मां भी बनी थी। बाद में अमेरिका की एक अदालत ने इसकी पुष्टि  करते हुए टीरियन जेड व्हाइट को इमरान खान की बेटी बताया था हालांकि इमरान खान इससे मुकर गए। यदि विवाह की बात की जाए तो इमरान वहां भी बदलते नजर आते हैइंग्लैंड की जेमिमा गोल्डस्मिथ के साथ उनका पहला निकाह  हुआ था,जो नौ साल के रिश्ते के बाद जून 2004 में टूट गया। इसके बाद उनका निकाह रेहम खान से हुआ जो करीब 10 महीने चलाकुछ महीनों पहले ही इमरान खान ने तीसरी शादी अपने से बहुत कम उम्र की लड़की से की है और उसके भी टूटने की खबरें आती रही है




दूसरी पत्नी रेहम खान की किताब "टेल ऑल में कई खुलासे

रेहम खान की किताब "टेल ऑल" में इमरान खान की जिंदगी के कई पहलू सामने आयें है.इस किताब में कथित तौर पर रेहम की अलग-अलग सिलेब्रिटीज के साथ बातचीत और उनकी शादी के बारे में लिखा गया हैइमरान से उनकी शादी महज 15 महीनों में ही टूट गई थीरेहम खान ने लंदन में रहनेवाले इमरान के महत्वपूर्ण सहयोगी बुखारी के बारे में यह खुलासा भी किया है कि लंदन में एक युवा लड़की से इमरान खान के अंतरंग संबंध थे "टेल ऑल" की भाषा और अंतरंग खुलासों से पाकिस्तान में हंगामा तो होना ही था लेकिन कोई भी शख्स इमरान पर लगे आरोपों को सिरे से ख़ारिज करने का साहस नहीं कर पाया है यहां तक की स्वयं इमरान खान भी


इमरान खान की पार्टी में महिलाओं का शोषण

रेहम के यह भी दावा किया है कि इमरान खान अपनी पार्टी  तहरीक-ए –इंसाफ में ऊँचा पद पाने की चाह रखने वाली महिलाओं से यौन संबंधों की मांग करते हैरेहाना खान के दावों में  दम भी नजर आता है 2017 में  इमरान खान की पार्टी पीटीआई की एक नेता आएशा गुलालई ने पार्टी के प्रमुख इमरान ख़ान पर मोबाइल फ़ोन के माध्यम से आपत्तिजनक संदेश भेजकर उत्पीड़न करने का आरोप लगाया थाउन्होंने यह भी कहा था कि इमरान ख़ान और उनके आसपास मौजूद लोगों के हाथों में सम्मानित औरतों की इज़्ज़त और आबरू सुरक्षित नहीं हैंसांसद आयशा गुलालई ने  साफ कहा था कि टेक्स्ट मैसेज भेजकर इमरान ख़ान लगातार उन्हें परेशान करते रहे

 


 

सलमान रूश्दी ने इमरान खान को विलासी बताया था

साल 2012 में  भारत में एक कार्यक्रम के दौरान विवादास्पद लेखक सलमान रूश्दी ने कहा था कि पूर्व क्रिकेटर और पाकिस्तान के उभरते राजनीतिक दल- तहरीके इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष इमरान खान ने "फौज और मुल्लाओं से सांठ-गांठ कर रखी है"उन्होंने यह भी कहा था कि कर्नल गद्दाफी और इमरान खान की शक्लें मिलती हैं और अगर भविष्य में कोई लीबिया के पूर्व नेता पर फिल्म बनाता है तो इमरान खान गद्दाफी के रोल के लिए सबसे उपयुक्त होंगे" यह इत्तेफाक ही है कि लीबिया का तानाशाह गद्दाफी तानाशाही के साथ विलासिता के लिए बदनाम रहा और इमरान खान की सियासी पहचान भी उसी दिशा में जा रही है


इमरान खान की सियासी मजबूरियां

80 और 90 के दशक में क्रिकेट के मैदान से पूरे पाकिस्तान को अपनी अँगुलियों पर नचाने वाला यह खिलाड़ी अब सियासत को भी अपनी पसंद के अनुसार चलाना चाहता है पाकिस्तान की सियासत परम्पराओं की नुमाइंदगी करती है और इमरान खान इस रास्ते पर चलाकर देश को मध्ययुग में झोंक रहे है


आतंकियों और मौलवियों का समर्थन

हाल ही में एक विदेशी टीवी चैनल को इंटरव्यू देते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने ओसामा बिन लादेन को शहीद बताया था,यहाँ तक की इमरान खान ने कभी भी हाफिज सईद समेत कई कुख्यात आतंकियों की कभी आलोचना नहीं कीआतंकियों से इसी प्रेम के कारण जब वह साल 2015 में पेशावर के तालिबान के हमले का निशाना बने आर्मी पब्लिक स्कूल पहुंचे तो हमले में मरने वाले बच्चों के परिजनों ने उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था16 दिसंबर 2014 को इस स्कूल में तालिबान के हमले में 134 छात्रों सहित 143 लोग मारे गए थेस्कूल के बाहर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने इमरान ख़ान का कड़ा विरोध किया और 'गो इमरान गो' के नारे लगाएइसके पहले इमरान खान पेशावर में तालिबान का ऑफिस खोलने की मांग सरकार से कर चुके थे,जिसे लेकर उनकी खूब आलोचना भी हुईयहाँ तक कि पाकिस्तान के आतंकी संगठन तालिबान ने पाकिस्तानी सरकार के साथ बातचीत के लिए पांच लोगों की एक टीम का ऐलान किया था  जिसमें तहरीके इंसाफ़ के चेयरमैन और पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान का नाम शामिल था


औरत मार्च में शामिल महिलाओं को  हत्या की धमकी

पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार बनने के बाद महिलाओं पर अत्याचार कई गुना बढ़ गए है 2018 में इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे और इसी साल से पाकिस्तान के कई शहरों में महिला दिवस के मौक़े पर आठ मार्च को  औरत मार्च का आयोजन किया जाता है  धार्मिक और दक्षिणपंथी समूहों का मानना है कि यह मार्च इस्लाम के ख़िलाफ़ है और कुछ महिलाओं का कहना है कि उन्हें बलात्कार और हत्या की धमकियां भी मिली हैं इस मार्च के जरिए महिलाएं,महिलाओं की सुरक्षा के लिए बेहतर कानून लाने,मौजूदा कानूनों को लागू करने, जागरूकता बढ़ाने और नज़रिया बदलने की मांग कर रही हैं


 

मेरा जिस्म मेरी मर्जी के नारे पर पाकिस्तान में हंगामा बरपा

 

पिछले साल महिला दिवस पर औरत मार्च का नारा था,"मेरा जिस्म, मेरी मर्ज़ी" इस पर पाकिस्तान में बड़ा हंगामा हुआ आलोचकों से इसे अश्लील और  मर्यादा के ख़िलाफ़  बताते हुए पश्चिम से प्रेरित विचार कहते हुए ऐसे आंदोलनों की कड़ी आलोचना की वहीं  औरत मार्च के समर्थकों का कहना है कि इस नारे का मतलब है एक महिला का उसके अपने शरीर पर नियंत्रण होना

 


 

 

अदालतें का दोहरा रुख

 

औरत मार्च को रोकने के लिए पाकिस्तान में अदालतों का रुख करने से भी रुढ़िवादी ताकतें नहीं बचती है,वहीं अदालत मार्च की अनुमति यह कहकर देती है कि इसमें शामिल होने वाले लोग "शालीनता और नैतिक मूल्यों का पालन करें" जाहिर है प्रधानमंत्री इमरान खान और अदालतों के व्यवहार का असर वहां के प्रशासन और पुरुषवादी समाज को रुढ़िवादी बना रहा है गौरतलब है कि पिछले साल पाकिस्तान का मोटरवे रेप केस चर्चित हुआ था जिसने  देश को झकझोर दिया थाआधी रात को एक महिला को कार से खींचकर उसके बच्चों के सामने बलात्कार किया गया थावहीं पुलिस अधिकारी ने इस घटना के लिए महिला को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि  तीन बच्चों की मां को रात में अकेली अपनी गाड़ी में नहीं निकलना चाहिए था


 

ऑनलाइन स्टार कंदील बलोच की हत्या

 

2017 में पाकिस्तान की मशहूर ऑनलाइन स्टार कंदील बलोच की हत्या

उसके भाई ने कर दी थीवसीम ने उसकी हत्या की बात  कबूल करते हुए कहा था कि कंदील के कारण उनके परिवार की बेइज़्ज़ती हो रही थीकंदील बलोच सोशल मीडिया पर एक बड़ी स्टार बन चुकी थीं और उसके ग्लेमरस अंदाज  के दीवाने लाखों थेकंदील ने पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान को भी सोशल मीडिया के माध्यम से ही शादी की पेशकश की थी


 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान दक्षिणपंथी ताकतों को मजबूत करके अपना राजनीतिक प्रभाव मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रहे है  वहीं इससे पाकिस्तान में महिलाओं की जिंदगी की दुश्वारियां बढ़ गई है। किसी समय  इमरान खान पाकिस्तान में बेहद सम्मानित ख़िलाड़ी माने जाते थे1992 में ख़ान को पाकिस्तान के प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कार हिलाल-ए-इम्तियाज़ से सम्मानित किया गया थाइससे पहले उन्होंने 1983 में राष्ट्रपति का प्राइड ऑफ़ परफार्मेंस पुरस्कार प्राप्त किया था। लेकिन अब प्रधानमंत्री इमरान खान का मौलाना अवतार महिलाओं को स्वीकार नहीं है और इससे उनकी लोकप्रियता में  भारी गिरावट आ रही है। जाहिर है इमरान खान के राजनीतिक भविष्य पर बड़ा संकट उनके खिलाफ महिलाओं की जुगलबंदी है,इसका व्यापक असर आने वाले  आम चुनावों में देखने को मिल सकता है 

 

पुजारियों पर द्रविड़ राजनीति,Pujari drvid politics tamilnadu

 

राष्ट्रीय सहारा


                           

धर्म का अस्तित्व परम्पराओं के साथ है या वह परिवर्तन को स्वीकार कर मजबूत हो सकता हैयह सवाल सभ्यताओं के विकास और संघर्ष के केंद्र में सदियों से रहा है। लेकिन तमाम विरोधाभास के बाद भी यथास्थितिवाद कायम रखने  और बदलाव की कोशिशें साथ साथ चलती रही है। भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडू की सरकार ने राज्य में 100 दिन का शैव अर्चक कोर्स कराने की घोषणा की है जिसे करने के बाद कोई भी पुजारी बन सकता है सरकार के इस कदम को गैर ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति के तौर पर देखा जा रहा है दिलचस्प है कि पूजा को तमिल भाषा में करने के साथ ही महिला पुजारी की नियुक्ति को लेकर भी राज्य की स्टालिन सरकार ने आगे कदम बढ़ाएं है। सामाजिक बदलाव की स्टालिन सरकार की ऐसी कोशिशों पर सामाजिक और राजनीतिक विरोध शुरू हो गया है जिसे बिल्कुल अप्रत्याशित नहीं माना जा सकता


दरअसल द्रविड़ स्वाभिमान और आत्मसम्मान तमिलनाडू में बड़ा  मुद्दा रहा है,इसे ब्राह्मण आर्य संस्कृति पर तमिल  द्रविड़ीयन संस्कृति की श्रेष्ठता स्थापित करने के तौर पर देखा जाता है। उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत में सामाजिक निर्योग्यताओं को लेकर सामाजिक आंदोलन करीब सवा सौ साल पहले ही प्रारम्भ हो गए थे और बदलते दौर के साथ यह राजनीतिक जरूरत भी बन गया है। ऐसे में बुद्दिवाद,तर्कवाद और विज्ञानवाद पर आधारित द्रविड़ राजनीति में धर्म और आस्था को अक्सर समानता और सामाजिक न्याय के कठिन प्रश्नों से जूझना पड़ता है क़रीब ढाई दशक पहले तमिलनाडु में विवाद इस विषय पर था कि भगवान कौन सी भाषा बोलते और समझते हैं। सवाल यह उठ खड़े हुए कि अगर पूजा अर्चना संस्कृत की जगह तमिल भाषा में होने लगे और मंत्र तमिल में पढ़े जाएं तो भगवान को क्या समस्या होगी? क्या भक्त की प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी?  विरोध यही से शुरू हो गया और ब्राह्मणों का यह तर्क था कि मंत्रों की शक्ति देवभाषा संस्कृत में निहित हैभाषा बदलने पर मंत्र अपनी शक्ति खो देंगेलेकिन दक्षिण भारत का ग़ैर-ब्राह्मण वर्ग इससे सहमत नहीं थाजब इस सवाल का सामना एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्री जी को करना पड़ा तो उन्होंने तपाक से यह कह डाला कि,अगर भगवान तमिल नहीं समझते तो उन्हें तमिलनाडू में रहने का हक़ नहीं है। जाहिर है इसे तमिलनाडू की जनता की राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता के तौर पर भी  देखा जाता है जिसमें तमिल श्रेष्ठता क्षेत्रीय,भाषाई और सामाजिक रूप से बार बार उभरती हुई दिखाई देती है।


गौरतलब है कि सामाजिक न्याय की स्थापना को लेकर पिछड़ी जातियों का सबसे पहला और मुखर आंदोलन तमिलनाडू में ही करीब एक सौ पांच साल पहले शुरू हो गया था। गैर ब्राह्मण द्रविड़ अस्मिता को लेकर  तत्कालीन मद्रास प्रान्त में 1916 में जस्टिस पार्टी का गठन किया गया था तथा टीएम नायर और राव बहादुर त्यागराज चेट्टी ने पहला ग़ैर-ब्राह्मण घोषणापत्र जारी किया था 1921 में जस्टिस पार्टी ने स्थानीय इन्हीं मुद्दों पर चुनाव जीता थापेरियार ने जन्म के आधार पर सामाजिक स्तर और योग्यता का एकमात्र पैमाना निश्चित करने का विरोध किया थाउन्होंने पौराणिक हिन्दुवाद से उपजे पुरोहित वाद पर सीधे प्रहार करते हुए तमिल या द्रविड़ीयन संस्कृति के व्यापक तंत्र का समर्थन प्राप्त किया,जिससे वह ब्राह्मण आर्य संस्कृति पर तमिल द्रविड़ीयन संस्कृति की श्रेष्ठता  स्थापित कर सके


इन सबके बीच गैर ब्राह्मण पुजारी की लड़ाई तमिलनाडू में दशकों से जारी है। सामाजिक सुधार द्रविड़ आंदोलन के सबसे अहम एजेंडे में से एक था और दक्षिण भारत में सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत माने जाने वाले पेरियार परिवर्तन के लिए प्रतिबद्धता से कार्य करते रहे 1970 में पेरियार ने गैर ब्राह्मण पुजारी की पुरजोर मांग की तो तत्कालीन द्रमुक सरकार ने इस पर हामी भर दी और उनकी नियुक्ति के आदेश दे दिए। 1971 में तमिलनाडु की तत्कालीन सरकार ने क़ानूनी रूप से यह सुनिश्चित किया वेदों में प्रशिक्षित कोई भी व्यक्ति मंदिर का पुजारी नियुक्त किया जा सकता है,चाहे वह किसी वर्ण या जाति का हो। ब्राह्मणों के पुरजोर विरोध के बीच सरकार ने यह संदेश दिया गया कि समानता का अधिकार मंदिर में भी लागू होना चाहिएयह विवाद आगे भी चलता रहा 1982 में तत्कालीन  मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने जस्टिस महाराजन आयोग का गठन किया। आयोग ने सभी जातियों के व्यक्तियों को प्रशिक्षण के बाद पुजारी नियुक्त करने की सिफारिश की। 25 साल बाद डीएमके सरकार ने 2006 में फिर नियुक्ति के आदेश दिए और 2007 में एक साल का कोर्स शुरू किया गया। इसे 206 लोगों ने किया।  बाद में 2011 में अन्नाद्रमुक सरकार आई तो इस कोर्स को बंद कर दिया। अब द्रमुक की सरकार ने नए सिरे से सामाजिक बदलाव  की कोशिशों को लेकर पुनः आगे कदम बढ़ाएं है।


 

द्रविड़ आंदोलन पुरोहितों के बिना विवाह करना,बलात मंदिर प्रवेश करने और महिलाओं की  समानता पर जोर देता है1944 में सलेम अधिवेशन में पेरियार ने  द्रविड़ कड़गम संगठन को सामाजिक न्याय की लड़ाई का अग्रणी बना दियातमिलनाडू की वर्तमान राजनीति इन्हीं सिद्धांतों के इर्द गिर्द घूमती रही हैपेरियार का तमिलनाडू के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों पर इतना गहरा असर है कि कम्युनिस्ट,दलित आंदोलन विचारधारा,तमिल राष्ट्रभक्त से तर्कवादियों और नारीवाद की ओर झुकाव वाले सभी उनका सम्मान करते हैं,उनका हवाला देते हैं और उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखते हैंतर्कवादी,नास्तिक और वंचितों के समर्थक पेरियार के सिद्धांत तमिलनाडू की राजनीति का अब पर्याय बन गए हैइसीलिए जयललिता और करुणानिधि को मरने के बाद भी स्वीकार्यता बनाएं रखने के लिए दफनाना प्रासंगिक नजर आया था। द्रविड़ राजनीति में दफनाने के पीछे पुरोहितवाद का विरोध ही रहा है।  हिन्दू धर्म में मृतक को जलाने की परम्परा है। इसमें मुक्ति के लिए अस्थियों का गंगा में विसर्जन,मृतक का तर्पण,पिंडदान और पूर्वजों का श्राद्ध कर्म करना आवश्यक माना गया है। इन परम्पराओं के साथ पुरोहितों का होना आवश्यक माना गया है लेकिन  पिछड़े और वंचित समाज के लिए पुरोहित का उपलब्ध न होना बाद में आत्मसम्मान से जोड़ कर देखा जाने लगा।


पेरियार को नास्तिक माना जाता है,उन्होंने एक बार यह भी कहा था  कि जो ईश्वर की पूजा करता है वह बर्बर है। इसे लेकर पेरियार की कड़ी आलोचना हुई थीयहां सवाल यह भी उठ खड़ा होता है कि जो लोग ईश्वर की पूजा करने से दूसरों को रोकते है,वह भी किसी बर्बरता से क्या कम हैवास्तव में मीनाक्षी मन्दिर में पिछड़ों के प्रवेश से लेकर  सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश तक शुद्धता के नाम पर मानव अधिकारों का खूब हनन देखा गया है और इसे यथोचित ठहराने की दुर्भाग्यपूर्ण कोशिशें होती रही है। जबकि हकीकत में पवित्र और अपवित्र की धारणा भारतीय समाज के लिए सहस्त्रों वर्षों से अभिशाप बनी हुई है तथा सामाजिक निर्योग्यताओं को लागू करके समाज के पिछड़े वंचित तबके और महिलाओं को धार्मिक विधि विधान से बाहर कर दिया गया।


ऐसे में तमिलनाडू में मंदिरों के जरिए सामाजिक बदलाव की कोशिशों को व्यापक तरीके से देखने की जरूरत है। इसे भारत के खंडित समाज को एकता के सूत्र में बांधने और पिछड़ों और महिलाओं का सम्मान स्थापित करने के  अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।  

 

 

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...