शनिवार, 12 जून 2021

अस्पतालों के राष्ट्रीयकरण की जरूरत, india private hospital rashtriya sahara

राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप विशेषांक 


              

स्वास्थ्य सुरक्षा किसी भी देश की प्राथमिकता होनी चाहिए लेकिन भारत में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है भारत वर्तमान में दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था है जो कुल जीडीपी का तक़रीबन सवा फीसदी हिस्सा ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है,यह पाकिस्तान, सूडान और कंबोडिया  जैसे अल्पविकसित देशों से भी कम हैस्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी के खर्च का वैश्विक स्तर 6 फीसदी माना गया है विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक 1000 नागरिकों पर 1 डॉक्टर होना अनिवार्य है। जबकि भारत में इससे दस गुना अधिक नागरिकों पर मुश्किल से 1 सरकारी डॉक्टर उपलब्ध हो पाता  है स्वास्थ्य को लेकर भारत की वैश्विक रैंकिंग बदतर है और लोगों को समय पर प्राथमिक चिकित्सा भी मुहैया नहीं होती


यह बेहद दिलचस्प है कि देश में उपलब्ध 1 मिलियन डॉक्टरों में से मात्र 10 प्रतिशत ही सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य करते हैं। इसका मतलब साफ है कि समाजवादी भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का प्रभावी जाल है  जिससे किसी न किसी तरीके से देश के 90 फीसदी डॉक्टर जुड़े हुए है इन अस्पतालों के मालिक उस पूंजीवादी समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते है जिसका पैमाना ऊंची बोली और ऊंचा रसूख होता हैऐसे में आम लोगों के लिए ज्यादा गुंजाईश नहीं बचती


कोरोना महामारी के कहर में यह तथ्य साफ उभर कर आया कि भारत अपने मौजूदा बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के साथ महामारी से लड़ने के लिए तैयार नहीं है लचर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से आशंकित कोविड मरीज जिन्दा बचे रहने की आस में निजी अस्पतालों की ओर रुख करने को मजबूर हुए है लेकिन बेलगाम निजी अस्पतालों के भारी भरकम बिल के आगे कई उम्मीदें धराशाई हो गईदेश के अमूमन सभी क्षेत्रों में निजी अस्पतालों की मनमानी देखी जा रही है

 


 

कोरोना महामारी से जूझते नागरिकों के लिए जो भी राहत देने की कोशिशें हुई उसमें उच्चतम न्यायालय की भूमिका स्पष्टता से कई बार सामने आई है पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए  कहा था कि सरकारों से मुफ़्त में ज़मीन लेने वाले अस्पताल कोविड मरीज़ों का मुफ़्त में इलाज क्यों नहीं कर सकते? दरअसल यह सवाल इसलिए उठ खड़ा हुआ क्योंकि महामारी से मौत के आतंक के बीच निजी अस्पतालों की मनमानी भी आतंकित करने वाली रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि  लोककल्याणकारी समाजवादी भारत की स्वास्थ्य पर आधारित व्यवस्थाएं पूंजीवादी मॉडल पर सवार  हो चूकी है इसके बावजूद की ब्रिटेन जैसे पूंजीवादी देश में भी स्वास्थ्य की जरूरतों को सार्वजनिक सेवाओं के माध्यम से पूरा किया जाता है। भारत में संविधानिक तौर पर राज्य के नीति निदेशक तत्वों में  यह जाहिर किया गया है कि अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की देखभाल और उसकी सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है


भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य और उत्पादक जीवन मुहैया कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अलग अलग रूप लगातार सामने आएं है। हालांकि उनके केंद्र में सदैव यह सुनिश्चित करने का आम नागरिकों को भरोसा दिलाया गया कि स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को कम किया जा सकता है। इससे नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी खर्च के जोखिम से भी बचाया जा सकता है।  लेकिन निजी अस्पतालों के प्रभाव ने खर्च को असीमित कर दिया है जबकि जान का जोखिम बरकरार रहता हैकोविड से प्रभावित मरीजों से लाखों रुपए वसूली की अनगिनत घटनाओं के बीच अनेक राज्य सरकारों को निजी अस्पतालों की इलाज के लिए निश्चित फीस  तय करना पड़ा पड़ा। फिर भी यह खर्च जनरल वार्ड के लिए प्रतिदिन के हिसाब से 5 हजार से 10 हजार और आईसीयू वार्ड का खर्च अधिकतम 15 हज़ार से 20 हजार तक देने को मजबूर होना पड़ा भारत में जहां 60 फीसदी आबादी के लिए रोज रोटी जुटाने का संकट होता है वहां आम नागरिक के लिए  इलाज पर हजारों-लाखों रुपया खर्च  करना मुमकिन नहीं होताऐसे में न केवल निजी अस्पतालों पर नकेल कसने की जरूरत है बल्कि भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को बेहतर करने की जरूरत भी है जिससे आम नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल सके

साल 2020-21 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का बजट तकरीबन 65 हज़ार करोड़ रुपए था,जबकि रक्षा का बजट चार लाख 71 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा रक्षा पर ख़र्च केंद्र सरकार के बजट का 15.5 फीसदी है, यह स्वास्थ्य से कई गुना ज्यादा है दुनिया में अपनी रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर आने वाले भारत में ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी से लाखों लोग असमय मौत का शिकार हो गए। इसका प्रमुख कारण देश में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का अभाव रहा है। स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की अनदेखी कई दशकों से की जा रही है और इसमें आमूलचूल परिवर्तन करने की सख्त जरूरत है


2017 में आई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के आयामों पर ही ठीक ढंग से काम किया जाएं तो स्वास्थ्य की दिशा में आम लोगों को बड़ी सुरक्षा और राहत मिल सकती हैइस नीति का उद्देश्‍य सभी लोगों,विशेषकर उपेक्षित लोगों को सुनिश्चित स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल उपलब्‍ध कराना है। इसके साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में निवेश,स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल सेवाओं का प्रबंधन और वित्‍त-पोषण करने, विभिन्‍न क्षेत्रीय कार्रवाई के जरिये रोगों की रोकथाम और अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने,चिकित्‍सा प्रौद्योगिकियां उपलब्‍ध कराने,मानव संसाधन का विकास करने,चिकित्‍सा बहुलवाद को प्रोत्‍साहित करने,बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य के लिये अपेक्षित ज्ञान आधार बनाने,वित्‍तीय सुरक्षा कार्यनीतियां बनाने तथा स्‍वास्‍थ्‍य के विनियमन और उत्तरोत्तर आश्‍वासन के संबंध में स्‍वास्‍थ्‍य प्रणालियों को आकार देने पर विचार करते हुए प्राथमिकताओं का चयन किया गया है। इस नीति में वित्‍तीय सुरक्षा के माध्यम से सभी सार्वजनिक अस्‍पतालों में नि:शुल्‍क दवाएं, नि:शुल्‍क निदान तथा नि:शुल्‍क आपात तथा अनिवार्य स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल सेवाएं प्रदान करने का प्रस्‍ताव किया गया है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में नीतिगत रूप से भी आमूलचूल बदलाव करने के लिए डॉक्टर्स की कमी को दूर करना बेहद आवश्यक हैस्वतंत्र भारत में प्रशासनिक सेवाओं की तर्ज पर एक अलग सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर गठित का सुझाव सर्वप्रथम मुदलियार समिति द्वारा दिया गया था। इसकी जरूरत अब महसूस की जा रही है।  2017 में आई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी इसकी जरूरत को उभारा गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए एक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर की शुरुआत की जानी चाहिएइसके माध्यम से समर्पित और काबिल प्रतिभावों को मौका मिल सकेगा जिससे स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में तेजी से कार्य हो सकेंगेफ़िलहाल जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर की होती है और वे प्रशासनिक दायित्वों से बंधे होते हैऐसे में  स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर होने की संभावनाएं सीमित हो जाती है


भारत जैसे विकासशील और लोककल्याणकारी राज्य में स्वास्थ्य सुरक्षा से ही देश की प्रगति और खुशहाली सुनिश्चित हो सकती है। कोरोना काल में लचर स्वास्थ्य सेवाओं के चलते ही लाकडाउन जैसे कदम उठाना पड़े और इससे अर्थव्यवस्था भी धराशाई हो गई। जाहिर है देश में सुदृढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली सुनिश्चित  करने की तुरंत जरूरत है। इसके लिए भारतीय चिकित्सा सेवा के गठन को प्रभाव में लाना होगा सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं के मानवीकरण, स्वास्थ्य सामग्री प्रबंधन,तकनीकी विशेषज्ञता, आवश्यक सामाजिक निर्धारकों एवं वित्तीय प्रबंधन की प्राप्ति में मदद मिलेगी इसके साथ ही निजी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण करने जैसे क्रांतिकारी कदम भी उठाएं जा सकते है। जब देश के 90 फीसदी डॉक्टर्स सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से दूर है,ऐसे में अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण निर्णायक और आमूलचूल परिवर्तन लाने का माध्यम बन सकता है।

 

सोमवार, 7 जून 2021

सीरिया में सत्ता संकट syria asad janstta

 जनसत्ता

 


                                                                  

लोकतांत्रिक देशों में सत्ता में असीमित शक्ति एक विवादास्पद संकल्पना रही है। बदलते दौर में आधुनिक राज्यों में सत्ता का वैधानिक और तार्किक रूप राजनीतिक नेतृत्व में केंद्रित करने के प्रयास बढ़े है। इसके प्रतिकूल प्रभाव राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आ रहे है और स्थापित व्यवस्थाएं ध्वस्त होकर मानवीय और राजनीतिक संकट को बढ़ा रही है। दरअसल गृहयुद्द से जूझते सीरिया में हुए आम चुनावों में बशर अल-असद ने अपनी सत्ता चौथी बार बरकरार रखी है। आम चुनावों में लोगों की भागीदारी,निष्पक्षता और विश्वसनीयता का संकट होने से इसे सम्पूर्ण क्षेत्र में शांति स्थापित होने की उम्मीदों के लिए गहरा आघात माना जा रहा है।  


करीब एक दशक पहले सीरिया में राजनीतिक बदलाव के लिए उठे राजनीतिक आंदोलन को बशर अल-असद की सरकार ने सख्ती से कुचल दिया थाइसके बाद से यह देश गृहयुद्द जैसे हालात का सामना कर रहा हैसीरिया के कई इलाकों पर विद्रोहियों का कब्ज़ा हैकई देश अपने अपने हितों को देखते हुए सीरिया के विभिन्न लड़ने वाले समूहों को मदद दे रहे हैयहां पर शांति स्थापित करने के लिए संयुक्तराष्ट्र ने सर्वमान्य सरकार की जरूरत को दोहराया है,वहीं असद रूस,चीन और ईरान जैसे देशों की मदद से अपने को सत्ता में बनाएं रखे हुए है। इस स्थिति में मानवीय और राजनीतिक संकट से जूझ रहे इस देश में शांति और स्थिरता कायम करना चुनौती बनता जा रहा है। 

दक्षिण पश्चिम एशियाई देश सीरिया की भौगोलिक और राजनैतिक स्थिति उसकी समस्याओं को ज्यादा बढ़ा रही है इसके पश्चिम में लेबनॉन तथा भूमध्यसागर,दक्षिण-पश्चिम में इजराइल,दक्षिण में ज़ॉर्डन,पूर्व में इराक़ तथा उत्तर में तुर्की है। इजराइल तथा इराक़ के बीच स्थित होने के कारण इसकी स्थिति जटिल हो जाती है  कई प्राचीन सभ्यताएं भूमध्यसागरीय तटों के आसपास ही पनपी है अत: यह क्षेत्र धार्मिक संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है आईएसआईएस का उभार इस क्षेत्र में इसीलिए हुआ था कि ईसाई और  उदार मुसलमानों को खत्म कर इस्लामिक राज्य की स्थापना की जा सके   रोमन साम्राज्य के लिए भी भूमध्यसागर महत्व्प्पूर्ण रहा है,अत: यूरोप का इस क्षेत्र में हस्तक्षेप बना रहता है 


सीरिया शिया-सुन्नी प्रतिद्वंदिता के हिंसक केंद्र के रूप में भी कुख्यात बन गया है बशर अल-असद शिया है और सीरिया की आबादी सुन्नी बाहुल्य हैसीरिया में सुन्नी मुस्लिम कुल जनसंख्या का 74 प्रतिशत हैं जबकि शिया क़रीब 13 प्रतिशत रहते है। अल्पसंख्यक शिया समुदाय से संबंधित असद का सुन्नी बहुल देश सीरिया में सत्ता में बने रहना सऊदी अरब जैसी इस्लामिक ताकतों को स्वीकार नही है,वहीं ईरान असद को सत्ता में बनाएं रखने के लिए हथियारों की अबाधित आपूर्ति समेत सामरिक मदद करता रहा है। सऊदी अरब सीरिया के विद्रोही संगठनों को सहायता देकर असद की सरकार को सत्ता को उखाड़ फेंक देना चाहता है। अमेरिका और फ्रांस जैसे देश भी असद के खिलाफ है और वे सीरिया के विद्रोहियों को मदद देते रहे है। तुर्की के लिए सीरिया पारंपरिक गढ़ रहा है और वह सीरिया की राजनीति पर अपना अधिकार मजबूत रखना चाहता है। सीरिया से विस्थापित लोग तुर्की में ही सबसे पहले प्रवेश करते है और इसके कारण तुर्की को भी मानवीय संकट से जूझना पड़ रहा है।


सीरिया में असद सरकार के सत्ता में बने रहने और आम चुनावों को लेकर कड़ी प्रतिक्रियाएं  सामने आई हैसीरिया के विपक्षी दलों ने इस चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठायें है वहीं अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी कहा है कि ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थागौरतलब है कि सीरिया के राष्ट्रपति चुनाव में सरकार के नियंत्रण वाले इलाकों और विदेशों में कुछ सीरियाई दूतावासों में मतदान करवाए गएसीरिया सरकार का कहना है कि चुनाव का होना ये दिखाता है कि सीरिया में सब सामान्य है और देश के भीतर और बाहर एक करोड़ 80 लाख लोग मतदान में हिस्सा ले सकते हैंजबकि हकीकत इससे उलट हैदेश के कई इलाकों पर असद सरकार का कोई प्रभाव नहीं है और वहां विद्रोही समूह काबिज हैसीरिया में ज़्यादातार हिस्सों पर विद्रोहियों, जिहादियों और कुर्दों के नेतृत्व वाली सेनाओं का नियंत्रण हैलाखों लोग सीरिया से पलायन करके तुर्की समेत यूरोप के कई देशों में चले गए हैलाखों लोग अस्थाई टेंटों में रहने को मजबूर हैसंयुक्त राष्ट्र के अनुसार,इस लड़ाई में अब तक चार लाख लोग मारे जा चुके हैं2011 में राजनीतिक अस्थिरता और विद्रोही समूहों के आपसी संघर्षों के चलते क़रीब आधी आबादी को मज़बूरन देश छोड़ना पड़ा था। इस समय देश की 90 फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रह रही है और लोग भुखमरी का सामना करने को मजबूर हो गए हैयूनीसेफ़ के अनुसार, 50 लाख से ज्यादा लोग कुपोषित हैंवहीं पांच साल से कम उम्र के पांच लाख बच्चों का विकास गंभीर कुपोषण के चलते रुक गया है

बशर अल-असद राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नेता नहीं है और न ही वे अपने देश को संकट से उबारने की कोई कोशिश करते नजर आते हैरूस का सीरिया में सैन्य बेस है और वह असद सरकार को मजबूत रखने के लिए विद्रोहियों पर हवाई हमलें करता रहा है इजराइल भी सीरिया में ईरान के बढ़ते दख़ल को लेकर चिंतित रहा और हवाई हमलों के ज़रिए हिज़बुल्ला और अन्य शिया लड़ाकों को काबू में करने की कोशिश करता रहा है। सीरिया का संकट राजनीतिक समस्या के साथ ही साथ सामरिक,कूटनीतिक और मानवीय संकट भी है। 2011 के बाद इस देश में राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होने से  सीरिया के बड़े क्षेत्र में कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने कब्जा जमा लिया था और इसके बाद यहां खून खराबे का वहशियाना दौर लंबे समय  तक चला। 2019 मे अमेरिका ने दावा किया था कि सीरिया से आईएसआईएस को खदेड़ दिया गया है लेकिन आईएसआईएस के लड़ाके अब भी विभिन्न क्षेत्रों में छुपे हुए है और राजनीतिक अस्थिरता कि स्थिति में उनका समांतर शासन स्थापित करने का खतरा बरकरार रहता है। सीरिया के कुछ इलाकों में शिविर और जेल बनाकर आईएसआईएस के लड़ाकों को रखा गया है जिसमें हजारों विदेशी महिलाएं और उनके बच्चे शामिल है। लड़ाकों और महिलाओं की क्रूरता और कट्टरता में कोई कमी नहीं आई है। इस क्षेत्र में तुर्की के हमलों का फायदा उठाकर ये जेल से भागने मे कामयाब भी रहे है। ऐसे में सीरिया का भविष्य चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है।

 


तुर्की नाटों का सहयोग लेकर बशीर-अल-असद को सीरिया में सत्ता से हटाना चाहता है और वह इसलिए यूरोपीय यूनियन पर दबाव बना रहा है। सीरिया में कई देशों की सेना,सामरिक और आर्थिक हित होने से यहाँ युद्ध की स्थिति गंभीर हो गई है तथा सीरिया दुनिया का एक छद्म युद्ध का मैदान बन गया है। 2013 में अलकायदा से अलग होकर आईएसआईएस अस्तित्व में आया और इससे मध्य पूर्व में संघर्ष का एक नया सिलसिला शुरू हो गया था। आईएसआईएस ने ईसाइयों और उदार मुस्लिमों के विरुद्द जेहाद की घोषणा कर मध्यपूर्व के राजनीतिक संघर्ष की दिशा बदल दी। आईएसआईएस ने इस इलाके के तेल कुओं पर अपना कब्जा जमाकर महाशक्तियों को चुनौती पेश कर दी और इसके बाद पश्चिमी देशों,अमेरिका,रूस,तुर्की जैसे देशों ने आईएसआईएस को मिलकर खत्म करने मे अपनी भूमिका निभाई। लंबे समय से युद्दग्रस्त इस इलाके से आईएसआईएस समाप्त होने की कगार पर आया तो तुर्की ने असद सरकार और कुर्दों के खिलाफ मोर्चा खोलकर एक नए संकट को जन्म दे दिया। दूसरी ओर महाशक्तियों के हित और आपसी टकराव के कारण संयुक्तराष्ट्र बशीर-अल-असद पर दबाव बनाने में सफल नहीं हो पा रहा है। सीरिया में शांति स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2012 में हुए जेनेवा समझौते को लागू करने की बात कही है जिसके अनुसार सबकी सहमति से एक अस्थायी गवर्निंग बॉडी बनायी जाएगी। इस गवर्निंग बॉडी के माध्यम से देश का संचालन सुनिश्चित किया जायेगा लेकिन इस दिशा में जमीन पर कोई प्रगति नजर नहीं आती है विपक्षी दल राष्ट्रपति बशर अल असद से सत्ता छोड़ने के लिए दबाव बना रहे है और असद को किसी भी कीमत पर यह स्वीकार नहीं है  


2017 में रूस,ईरान और तुर्की ने अस्ताना प्रक्रिया के तहत राजनीतिक बातचीत शुरू की थीबाद में संविधान बनाने के लिए 150 सदस्यों की एक समिति बनाने पर सहमति बनाई गई थीइसमें यह तय किया गया था कि संविधान में आवश्यक परिवर्तन किये जाएंगे। अभी तक न तो जेनेवा समझौते के प्रावधान लागू हो सके है और न ही अस्ताना प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है  हालांकि यूरोपीय यूनियन,अमेरिका,रूस,सऊदी अरब,ईरान और तुर्की समझौते के रास्ते तलाशकर सीरिया में शांति स्थापित करने की बात तो कहते है लेकिन बशर-अल -असद को सत्ता से हटाने को लेकर कई देश एक दूसरे के सामने आ जाते है


इस समय सीरिया में कुर्द और सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज,कुर्दिश डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी और कुर्दिश पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स अलग कुर्दिस्तान के लिए संघर्ष कर रही हैइसे यूरोप और अमेरिका का समर्थन मिलता रहा है लेकिन तुर्की इसके खिलाफ है। वहीं तुर्की समर्थित जेएफएस के लड़ाके सीरिया तुर्की सीमा पर मजबूत हैसीरिया में अभी भी आईएसआईएस का खतरा बरकरार है और सीरिया की कथित सरकारी सेना बशर-अल-असद को मजबूत करने के लिए लड़ रही है असल में सीरिया को एक राष्ट्र के तौर पर बचाएं रखने के लिए विभिन्न राजनीतिक,भाषाई,जातीय,धार्मिक एकजुटता और सर्वसम्मत सरकार की जरूरत है। लेकिन इनके बीच सामंजस्य को लेकर न तो वैश्विक समुदाय ईमानदार है और न ही बशर-अल-असद ऐसी कोई कोशिश करते दिखाई दे रहे है  इसका खामियाजा सीरिया के आम लोग बेउम्मीद और बेबस होकर भोग रहे है  

 

 

 

रविवार, 6 जून 2021

चीन ने वायरस से विनाश की स्क्रीप्ट कैसे लिखी Wuhan Lab china inside story

 

पॉलिटिक्स

 


                            



डॉक्टर ली वेनलियांग जी हां !  यही वहीं शख्स है जिन्होंने कोरोना के घातक वायरस को सबसे पहले पहचान कर चीन की सरकार को इसके खतरों से आगाह किया था साल 2019 खत्म होने की ओर था की दिसम्बर के आखरी दिनों में वुहान सेट्रल अस्पताल के नेत्र-विशेषज्ञ वेनलियान्ग दिसम्बर 2019 में अचानक एक रहस्यमय वायरस से संक्रमित हो गए थेउन्होंने अपने साथी डॉक्टरों को चेताया था कि उन्होंने कुछ मरीज़ों में सार्स जैसे वायरस के लक्षण देखे हैंइसके बाद स्थानीय पुलिस ने उनसे मुँह बंद रखने को  कहते हुए कड़ी चेतावनी दी थी कि वे लोगों को भ्रमित ना करे डॉक्टर ली वेनलियांग ने साहस दिखाते हुए अस्पताल से अपनी कहानी एक वीडियो के ज़रिए पोस्ट कर दी थी। इसके बाद वे चीन की पुलिस के निशाने पर आ गए,उन पर सामाजिक व्यवस्था खराब करने का आरोप लगाकर जांच बैठा दी गईउन्हें गायब कर दिया गया और सात फरवरी 2020 को डॉक्टर ली की रहस्यमय हालात में मृत्यु हो गई ली वेनलियांग का नाम एक व्हीसलब्लोअर डॉक्टर के तौर पर चीन में जाना जाता है और उन्हें लोग अब भी याद करते हैउनकी मृत्यु के बाद लाखों यूज़र्स ने चीन के सोशल प्लेटफार्म साइना वीबो पर उनके समर्थन में लिखा हालांकि कम्युनिस्ट सरकार ने जानबूझकर इन पोस्ट्स को हटवा दियाअब कोरोना वायरस की भयावहता से यह साफ हो गया कि डॉक्टर ली की चिंता सही थी लेकिन  चीन ने जानबूझकर इस बीमारी को छुपाने का प्रयास किया था


यदि शुरूआती दौर में ही एहतियातन कदम  उठाए लिए गये होते तो दुनिया में कोरोना से लाखों लोग नहीं मारे जाते  उस समय चीन के  एक पत्रकार चेन कुशी वुहान से कोरोना पर रिपोर्टिंग कर रहे थे लेकिन वे भी एक दिन अचानक  गायब  कर दिए गए। एक ओर पत्रकार ली झेहुआ ने फरवरी 2020 में यूट्यूब पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने बताया था कि पुलिस उनकी कार का पीछा कर रही है इसके बाद वह लापता हो गएदो महीने तक किसी को उनके बारे में पता नहीं था लेकिन उसके बाद उनकी एक वीडियो आई जिसमें उन्होंने बताया कि वे क्वारंटीन में हैं और अथॉरिटी के साथ सहयोग कर रहे हैंउसके बाद से उन्होंने कोई वीडियो पोस्ट नहीं की। इस प्रकार उनकी आवाज को चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने हमेशा के लिए दबा दिया

             

वुहान का वायरस कनेक्शन

कोविड-19 का सबसे पहला केस दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर में दर्ज किया गया थाचीनी प्रशासन ने इसका संबंध वुहान की एक सीफ़ूड मार्केट से बताया था वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वायरस जानवरों से इंसानों में पहुँचा है  लेकिन अब वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट के हवाले से दावा किया है कि इससे पहले ही नवंबर 2019 में वुहान लैब के तीन सदस्यों को कोविड जैसे लक्षणों वाली बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था कोरोना वायरस फैलने के बाद चीन के वुहान का यह मार्केट बंद कर दिया गया था,यहां एक वन्य जीव सेक्शन था,जहां अलग-अलग जानवर ज़िंदा और उनके कटे मांस बेचे जाते थेयहां ऊंट,कोआला,भेड़िये का बच्चा,झींगुर,बिच्छू, चूहा,गिलहरी,लोमड़ी,सीविट,जंगली चूहे,सैलमैन्डर,कछुए और घड़ियाल के मांस मिलते थे और पक्षियों के मांस भी मिलते थे


वायरस से मौत की भयावहता को चीन ने छुपाया

वूहान चीन के हुबेई प्रान्त की राजधानी है और यह मध्य चीन में सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर है। इसकी पहचान मध्य चीन के राजनीतिक,आर्थिक, सांस्कृतिक,शैक्षणिक और परिवहन केन्द्र के रूप में है। हुबेई में कोरोना से शुरूआती दौर में ही हजारों लोग मारे गए थेचीन की सरकार ने मरने वालों के सही आंकड़े छुपाकर 23 जनवरी 2020 को ही हुबेई को अलग-थलग कर दिया थाचीन ने इस वायरस को देश के दूसरे हिस्सों में फैलने से रोकने के लिए ऐसा किया था प्रसिद्द मीडिया और डेटा कंपनी ब्लूमबर्ग ने कोरोना वायरस से प्रभावित और मरने वाले लोगों पर चीन के अधिकारिक आंकड़ों को लेकर संदेह जताया हैचीन में कोरोना वाइरस से सबसे ज्यादा प्रभावित हुबेई प्रांत में संक्रमण के नए केसों में नाटकीय गिरावट बताई गई इससे यह संदेह गहरा गया था कि चीन ऐसे मामलों को  छुपा कर दुनिया को यह सन्देश देने की कोशिश की कि कोरोना से बढ़ती हुई समस्या अब नियंत्रण में हैब्लूमबर्ग ने हुबेई की तरफ से कोरोना वाइरस को लेकर जारी किए गए डेटा पर स्पष्टीकरण मांगा था लेकिन चीन के नैशनल हेल्थ कमिशन और हुबेई के प्रांतीय स्वास्थ्य आयोग ने सवालों के जवाब नहीं दिए

 

वुहान की लैब में क्या होता है..

चीन  के वुहान में एक बड़ा जैविक अनुसंधान केंद्र है वुहान में ही पहली बार इस वायरस का पता चला थावुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी नाम की इस संस्था में चमगादड़ में कोरोना वायरस की मौजूदगी पर दशकों से गुपचुप शोध चल रहा हैवुहान की यह प्रयोगशाला पशु बाज़ार से बस चंद किलोमीटर दूर है इसी वेट मार्केट में पहली बार संक्रमण का पहला कलस्टर सामने आया था। दुनिया के कई विशेषज्ञ यह दावा के साथ कह रहे है कि कोरोना वायरस इस लैब  से लीक होकर वेट मार्केट में फैल गया होगा। इनका मानना है कि यह चमगादड़ से हासिल किया गया असली वायरस होगा,इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया होगा


 

जैविक हथियार का संदेह क्यों ..?

 

आधुनिक दौर में सैन्य क्षमता को मजबूत करने के लिए कुछ राष्ट्र रासायनिक और जैविक हथियारों का जखीरा जमा कर वैश्विक अशांति को बढ़ाने में अग्रणी है और इसमें सबसे अव्वल साम्यवादी चीन नजर आता हैजिस इलाके से यह वायरस फैला है वहां स्थित वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी चीन के जैविक हथियार का केंद्र  माना जाता है और इसकी पुष्टि भी हो गई हैइस्राइल के एक जैविक हथियार विश्लेषक डैनी सोहम वुहान में जैविक हथियार तैयार करने की गोपनीय परियोजना की जानकारी दी है और इसे चीन  का जैविक हथियार तैयार करने का बड़ा केंद्र बताया है कोरोना वायरस को  एक जैविक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए ही कोरोना वायरस में परिवर्तन किए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस वायरस से निपटने में चीन ने जिस तेजी से सफलता पाई है,वह आश्चर्यजनक है। इस बात की भरपूर संभावना है कि कोरोना से निपटने की तैयारी भी यहां कर ली गई थी। चीन ने कोरोना के प्रयोग और परीक्षण के तौर पर हुबेई प्रान्त के हजारों लोगों की जान ले ली थी।


जैविक हथियारों से है चीन का पुराना नाता

जैविक हथियार से चीन का  सम्बन्ध बहुत पुराना है। एंथ्रेक्स की दहशत लगभग 90 साल पहले चीन ने देखी थी और भोगी थी जब 1930 में जापान ने चीन और मंचूरियन में प्लेग के जरिए निशाना बनाया था। वास्तव में जैविक हथियारों के तौर पर एंथ्रेक्स,कालरा,प्लेग,टाईफ़ायड से दहशत फ़ैलाने की संभावना रहती है और सूक्ष्म कणों के माध्यम में इसे खाद्य पदार्थों में मिलाकर इसे महामारी का रूप दिया जा सकता है। कोरोना को लेकर भी यह दावा किया जा रहा है कि यह खाद्य पदार्थों से ही महामारी का रूप धारण कर रही है। चीन के आक्रामक इरादों को दुनिया जानती है और जैविक हथियारों का जखीरा बढ़ाने के संदेह को आसानी से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।


विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी है संदेह

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से नियुक्त वैज्ञानिकों की एक टीम इस साल की शुरुआत में इसकी जाँच के लिए वुहान पहुँची थी कि कोरोना वायरस यहीं से फैला या नहीं इनके साथ चीनी रिसर्चर भी थेइस टीम की रिपोर्ट इसी साल मार्च महीने में आई थी जिसमें कहा गया था कि शायद कोरोना वायरस चमगादड़ों और दूसरे जानवरों के ज़रिए इंसानों में आया

टीम ने वहाँ 12 दिन बिताए और वुहान की प्रयोगशाला का दौरा भी कियावैज्ञानिकों ने लैब लीक थ्योरी की संभावनाओं पर भी विचार किया डब्ल्यूएचओ के डायरेक्टर-जनरल डॉक्टर टेड्रोस एडहॉनम गिब्रयेसुस ने कहा कि सभी अवधारणाएं खुली हुई हैं और इनका अध्ययन किया जाना चाहिए  उन्होंने साफ किया कि ये रिपोर्ट एक बहुत अच्छी शुरुआत है लेकिन ये अंत नहीं हैहमें अभी वायरस के स्रोत की जानकारी नहीं मिली है


चीन कर रहा है गुमराह

 

वैश्विक आलोचना से बचने के लिए चीन यह दावा कर रहा है कि कोरोना वायरस चीन में किसी दूसरे देश से भोजन लेकर आने वाले जहाज़ों से फैला होगा चीन ने मशहूर वॉयरोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर शी ज़ेंग्ली के उस रिसर्च का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है कि उनकी टीम ने 2015 में चीन की एक खदान में मौजूद चमगादड़ों में कोरोना वायरस की आठ प्रजातियों की पहचान की थी इस रिसर्च पेपर के मुताबिक़,उनकी टीम ने खदान में जो कोरोना वायरस पाए थे उनकी तुलना में पैंगोलिन में पाए गए कोरोना वायरस इंसान के लिए फ़िलहाल ज़्यादा ख़तरनाक हैंइसे 'नैचुरल ऑरिजिन' थ्योरी कहा जा रहा हैइसके अनुसार यह वायरस प्राकृतिक तौर पर जानवरों से फैलता है,इसमें किसी वैज्ञानिक या प्रयोगशाला का हाथ नहीं होता

 


 

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की क्या है योजना

 

 

जो बाइडन ने इंटेलिजेंस एजेंसियों को हाल ही में आदेश दिया है कि कोरोना वायरस कहां से फैला,यह 90 दिनों के अंदर पता लगाएंपिछले सप्ताह अमेरिकी मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक़,कुछ ऐसे सबूत हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि यह वायरस चीन की एक प्रयोगशाला से लीक हुआ हैबाइडन के चीफ़ मेडिकल एडवाइज़ डॉक्टर एंथनी फ़ाउची कहते रहे है कि उनके विचार से यह बीमारी जानवरों से इंसानों में फैली,मगर उन्होंने भी कह दिया कि वह इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैंपिछले साल पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि कोरोना वायरस वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वायरलॉजी से निकला हैउस समय कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने इस दावे को निराधार या झूठ बताया था


अब चीन पर डाला जायेगा दबाव

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि चीन पर पूरी तरह पारदर्शी और साक्ष्य आधारित अंतरराष्ट्रीय जाँच में शामिल होने और सभी सबूतों को उपलब्ध करवाने के लिए दबाव डाला जायेगाऑस्ट्रेलिया पहले ही जांच की मांग कर चूका है और संभव है ओर भी कई देश इस रहस्यमय बीमारी के असली गुनाहगार का पता लगाने के लिए अमेरिका के साथ आयेंगे



 

 

 

कोरोना से हाहाकार

 

विभिन्न सरकारी एजेंसियों के दावों की बात की जाये तो  कोरोना वायरस के कारण फैली महामारी के कारण दुनिया भर में अब तक कम से कम 35 से 36 लाख लोगों की जान जा चुकी है और संक्रमण के  करीब 17 करोड़ मामले दर्ज किए जा चुके हैं। वहीं स्वतंत्र संस्थाओं का कहना है कि चीन समेत पूरी दुनिया में कोरोना से मरने वालों के सही आंकड़े सरकारों द्वारा छुपाएं गए है और यदि इसकी ठीक पड़ताल की जाएं तो मरने वालों की संख्या डेढ़ करोड़ तक हो सकती है।

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