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नाटो के केंद्र में चीन,nato china janstta

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  जनसत्ता नियंत्रण और संतुलन वैश्विक व्यवस्था की अनिवार्य स्थिति रही है , अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव कायम रखने के लिए अमेरिका समेत यूरोप के ताकतवर देश सतत प्रयत्नशील और सजग रहते है । 1949 में अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए स्थापित सैन्य संगठन नाटो का प्राथमिक लक्ष्य उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में साम्यवाद को रोकना तथा शांति और व्यवस्था बनाएं रखना रहा था । लेकिन तेजी से बदलती अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में यूरोप और अमेरिका की प्रासंगिकता बनाएं रखने के लिए यह सैन्य संगठन राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों की ओर भी प्रवृत हो गया है। पिछले कई दशकों से नाटो के लिए रूस सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था लेकिन अब यह स्थिति बदल गई है । सामूहिक सुरक्षा के सबसे बड़े और शक्तिशाली क्षेत्रीय संगठन नाटो के हालिया शिखर सम्मेलन में चीन को सुरक्षा जोखिम मानते हुए नाटो के महासचिव जेंस स्टोल्टेनबर्ग ने सदस्य देशों से चीन को नियंत्रित करने की नीति पर काम करने को कहा है । इसके पहले नाटो के कई यूरोपीय सहयोगी और सदस्य देश चीन को एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी   की तरह तो देखते थे लेकिन चीन से आर्थिक स

रंगीन पीएम का बुरका प्रेम imran khan burkha

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  पॉलिटिक्स                                                        पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की दूसरी पत्नी रेहम खान की किताब "टेल ऑल" में इमरान खान उस  रंगीले किरदार की तरह प्रस्तुत किए गए है जिसे कोई बंधन पसंद नहीं है और वह अपनी पसंद और अपनी शर्तों पर जीता है । जबकि स्वयं इमरान खान पाकिस्तान की महिलाओं को मूल्यों और आदर्शों की नसीहत देते हुए सामाजिक रीति नीति के अनुसार चलने,रहने और बंधनों का पालन करने की अक्सर  नसीहत देते हुए दिखाई देते है।  दरअसल   महिला अपराध,हिंसा, हत्या,बलात्कार,आत्महत्या,एसिड हमलें,अपहरण,घरेलू हिंसा,जबरन विवाह और ऑनर किलिंग के लिए दुनियाभर में बदनाम पाकिस्तान की आधी आबादी दहशत में है । महिलाओं के खिलाफ  बढ़ती यौन हिंसा के लिए प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बार फिर पहनावें को जिम्मेदार माना है और महिलाओं को नसीहत दी है कि वे परम्पराओं का पालन सुनिश्चित करें । इस पर पलटवार करते हुए विपक्षी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सीनेटर शेरी रहमान ने कहा कि  महिलाएं क्या पहनें , ये बताने का किसी को अधिकार नहीं है । हमारे प्रधानमंत्री ऐसा कर रहे हैं,इससे हैर

पुजारियों पर द्रविड़ राजनीति,Pujari drvid politics tamilnadu

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  राष्ट्रीय सहारा                             धर्म का अस्तित्व परम्पराओं के साथ है या वह परिवर्तन को स्वीकार कर मजबूत हो सकता है । यह सवाल सभ्यताओं के विकास और संघर्ष के केंद्र में सदियों से रहा है । लेकिन तमाम विरोधाभास के बाद भी यथास्थितिवाद कायम रखने   और बदलाव की कोशिशें साथ साथ चलती रही है। भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडू की सरकार ने राज्य में 100 दिन का शैव अर्चक कोर्स कराने की घोषणा की है जिसे करने के बाद कोई भी पुजारी बन सकता है । सरकार के इस कदम को गैर ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति के तौर पर देखा जा रहा है । दिलचस्प है कि पूजा को तमिल भाषा में करने के साथ ही महिला पुजारी की नियुक्ति को लेकर भी राज्य की स्टालिन सरकार ने आगे कदम बढ़ाएं है । सामाजिक बदलाव की स्टालिन सरकार की ऐसी कोशिशों पर सामाजिक और राजनीतिक विरोध शुरू हो गया है जिसे बिल्कुल अप्रत्याशित नहीं माना जा सकता । दरअसल द्रविड़ स्वाभिमान और आत्मसम्मान तमिलनाडू में बड़ा   मुद्दा रहा है,इसे ब्राह्मण आर्य संस्कृति पर तमिल   द्रविड़ीयन संस्कृति की श्रेष्ठता स्थापित करने के तौर पर देखा जाता है । उत्तर भारत के मुकाबले