रविवार, 2 मई 2021

कैसे ममता बनर्जी ने सत्ता बरकरार रखी.mamta banrji,bangal

 

दबंग दुनिया


                    

                                                                             

 

ओर पश्चिम बंगाल में अंतत: ममता बनर्जी की सत्ता बरकरार रही। यहां शतरंज के मोहरे बदले और दांव भी। लेकिन जीत का सेहरा नहीं बदल सका। युद्द नीति में यह माना गया है कि विरोधी खेमे के मजबूत सरदारों को तोड़ कर अपने में मिला लीजिये,समझों मैदान में जीत पक्की है। पश्चिम बंगाल में भी इस नुस्खे को आजमाया गया। राजनीतिक चौसर पर दीदी को सत्ता से बेदखल करने की सारी चालें चली जा चूकी थी। भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस के कई विधायकों,सांसदों और नेताओं को चुनाव पूर्व ही अपने दल में शामिल कर लिया। इसमें एक कद्दावर नेता शुभेन्दू अधिकारी भी थे, जो तृणमूल कांग्रेस में दूसरे नंबर की हैसियत पर थे। शुभेन्दू उसी नंदीग्राम से आते है,जिसकी जमीन पर आंदोलन करके ही ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल कि सत्ता के शीर्ष को छुआ था। 


बीजेपी लगातार ममता बनर्जी को चुनौती दे रही थी कि वो नंदीग्राम से चुनाव लड़कर दिखाएं। नंदीग्राम शुभेन्दू अधिकारी कि मजबूत राजनीतिक जमीन मानी जाती है जहां वे और उनका परिवार दशकों से प्रभावी है। तमाम चुनौतियों के बाद भी ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ना स्वीकार किया। ममता बनर्जी के इस फैसले का व्यापक असर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर पड़ा और उनका जोश बढ़ गया। इस प्रकार बंगाल के चुनाव में विरोधी भाजपा के द्वारा जो पूरा माइंड गेम चलाया जा रहा था,उस पर ममता बनर्जी हावी हो गई।  


यदि ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव नहीं लड़ा होता तो  मुमकिन है की  तृणमूल कांग्रेस उसी दिन चुनाव हार गई होती या अगर ममता किसी और सीट से भी चुनाव लड़ रही होतीं तो यह टीएमसी के कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने वाला होता। लेकिन ममता बनर्जी ने दिखाया कि वे क्यों जमीनी नेता है और अंतत: वे सिकंदर साबित हुई।

किसी राज्य में आठ चरण में विधानसभा चुनाव का अभूतपूर्व फार्मूला पश्चिम बंगाल में आजमाया गया। देश कोरोना संकट से जूझ रहा था और इस बीच प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कि कई सभाएं राज्य के विभिन्न हिस्सों में हुई। गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड़ड़ा के कई रोड शो भी हुए। तृणमूल कांग्रेस के नेता जब भी भाजपा में शामिल होते,उस समय उनके लिए बड़े समारोह आयोजित किए गए। मीडिया में पलायन' और 'भगदड़' जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर इसे खूब प्रचारित भी किया गया। ममता बनर्जी को इसके अतिरिक्त भी कई मोर्चों पर जूझना था। सीपीएम लंबे समय तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रही है,उनके लिए ममता बनर्जी को रोक्नना बेहद जरूरी था। कम्युनिस्ट और कांग्रेस ने इंडियन सेक्यूलर फ़्रंट के साथ गठबंधन करके कई मुस्लिम बाहुल्य सीटों को प्रभावित करने वाला दांव खेला। असदुद्दीन ओवैसी कथित राष्ट्रीय मुस्लिम नेता बनने का ख्वाब लिए पश्चिम बंगाल में भी नजर आए। लेकिन यह सब प्रयास इसलिए भी धराशायी हो गए क्योंकि मतदाताओं में इन दलों के उद्देश्य को लेकर भ्रम की स्थिति बन गई।


करीब 21 साल पहले पश्चिम बंगाल में जब चुनाव होने वाले थे और राज्य के मुख्य मंत्री ज्योति बसु थे। उनसे मशहूर पत्रकार करण थापर ने पूछा कि लोग बोर हो गए हैं,वो कह रहे हैं,हमें परिवर्तन चाहिए। वाम दल वहां तीन दशक तक लगातार सत्ता में रहे थे। इस पर  ज्योति बसु ने उल्टा सवाल किया “पर क्या परिवर्तन? अच्छे के लिए या ख़राब के लिए? अगर अच्छे के लिए चाहिए तो हम एकमात्र विकल्प हैं।”

दरअसल पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों में ममता बनर्जी को तीसरी बार बहुमत हासिल होने से यह साफ हो गया है कि जनता को वे सबसे बेहतर विकल्प लगती है और इसलिए जनता परिवर्तन करना नहीं चाहती। वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए पश्चिम बंगाल की सत्ता में न आ पाने को उनकी नाकामी नहीं माना जा सकता। अब वह उस राज्य में दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है जहां कुछ सालों पहले इसकी कल्पना भी नहीं की सकती थी। 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी को राज्य में 42 में से केवल दो सीटें मिली थीं,मगर 2019 में उसके सांसदों की संख्या बढ़कर 18 हो गई। बीजेपी का वोट प्रतिशत भी 10 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया था। बीजेपी का इससे उत्साहित होना स्वाभाविक भी था। उसे लगने लगा था की वह राज्य में ममता का किला ढहा देगी।


हालांकि भाजपा को यह भी समझना चाहिए था कि भारत कि जनता का प्रदेश और देश के लिए सत्ता को लेकर अलग अलग और व्यापक सोच होती है। तृणमूल कांग्रेस के जो नेता शुभेन्दु अधिकारी,मुकुल राय या शोभन देव चट्टोपाध्याय भाजपा में शामिल हुए थे,वे विभिन्न घोटालों के दागी भी माने जाते है। इनके शामिल होने से भाजपा के वे नेता खुश तो नहीं थे,जो कई वर्षों से जमीन पर रहकर भाजपा को मजबूत कर रहे थे।  सीएए-एनआरसी पश्चिम बंगाल के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसको लेकर भाजपा का साफ रुख वहां सामने आ ही नहीं सका,वहीं असम में उनका अलग रुख  मतदाताओं के लिए संदेह बढ़ाने वाला साबित हुआ।


 जाहिर है राष्ट्रीय नेतृत्व के बूते किसी राज्य में सत्ता परिवर्तन का ख्वाब देखना भाजपा को बंद करना चाहिए। और कम से कम ममता बनर्जी जैसे नेताओं के सामने पश्चिम बंगाल में राज्य का कोई चेहरा लाने में भाजपा नाकाम रही और इसका व्यापक असर परिणामों पर भी पड़ा होगा, यह माना जा सकता है। इन सबके बीच धार्मिक और राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर भाजपा को सावधानी से आगे बढ्ने कि जरूरत है। जिस प्रकार पश्चिम बंगाल में जय श्री राम के नारे का राजनीतिक उपयोग किया गया,वह दुर्भाग्यपूर्ण है। बंगाल का इतिहास धर्म और विद्वत्ता को लेकर बेहद परिष्कृत रहा है,ऐसे में भाजपा को विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर आगे बढ्ने कि जरूरत थी,जबकि भाजपा कि सभाओं में प्रमुखता से राम को उभारा गया। राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के लिए भाजपा को इस प्रकार कि राजनीति से अब परहेज करना होगा।    


बहरहाल पश्चिम बंगाल के चुनावों में ममता बनर्जी कि मजबूत वापसी से राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष के मजबूती से उभरने कि संभावना बढ़ गई है। किसी लोकतांत्रिक देश में विपक्ष का सशक्त होना अहम माना जाता है और असरकारक भी। इसके दूरगामी परिणाम राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकते है।  

 

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